भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 221–230
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 221–230
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१३२ नाट्यशास्त्रम् करणों का उपसंहार - यानि स्थानानि याश्चार्यो व्यायामे कथितानि तु ॥ १६ ९ ॥ पादप्रचारस्त्वेषां तु करणानामयं भवेत् । किया गया है, ( नृत्तरूपी ) व्यायाम ' में जिन स्थानों तथा चारियों का वर्णन उन करणों का यह पाद प्रचार है ॥ १६ ९.१७० ॥ करणों में नृत्तहस्तों की प्रयोग विधि- १७० ॥ ये चापि नृत्तहस्तास्तु गदिता नृत्तकर्मणि ॥। तेषां समासतो योगः करणेषु विभाव्यते । का, ऊरु वृत्त प्रक्रिया में नृत्त हस्तों का जो उल्लेख किया गया है करणों में उनका करें संश्लिष्टतया प्रयोग किया जाता है ॥ १७०-१७१ ॥ करे सभी करणों की सामान्य मुद्रा- प्रायेण करणे कार्यो वामो वक्षः स्थितः करः ॥ १७१ ॥
चरणश्चानुगश्चापि दक्षिणस्तु भवेत्करः । दाहिने हाथ को करण में प्रायः बायाँ हाथ वक्षःस्थल पर रखना चाहिए और चरण की गति के अनुकूल रखना चाहिये ॥ १७१-१७२ ॥ मातृका लक्षण- १७२ ॥ चार्यश्चैव तु याः प्रोक्ता नृत्तहस्तास्तथैव च ॥। सा मातृकेति विज्ञया तद्भेदात्करणानि तु । (४ जानना चाहिए जो चारियाँ तथा नृत्तहस्त बतलाये गये हैं उन्हीं को मातृका और उसी के भेद से करणों का ज्ञान करना चाहिए ॥ १७२-१७३ ॥ परि अङ्गहारों का अष्टोत्तरशतं उपक्रम - हयेतत्करणानां मयोदितम् ॥ १७३ ॥ ( मैंने इन एकअतःसौ परंआठ करणोंप्रवक्ष्यामिको बतायाह्यङ्गहारविकल्पनम्है । अब इसके बाद। में अंगहारों के द
लक्षण बतलाऊँगा ॥ १७३.१७४ ॥ हुए १. नृत्त को व्यायाम कहा गया है क्योंकि यह पूर्णतः अङ्गों के संचालन पर निर्भर होता है । २. स्थान - खड़े होने की स्थिति । ३. चारी- पैरों के संचालन की प्रक्रिया । - ४. पादप्रचार पैर को उठाने एवं रखने की विधि । से
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चतुर्थोऽध्यायः १३३ प्रसार्योत्क्षिप्य च करौ समपादं प्रयोजयेत् ॥। १७४ ॥
व्यंसितापसृतं सव्यं हस्तमूर्ध्वं प्रसारयेत् ।
प्रत्यालीढं ततः कुर्यात् तथैव च निकुट्टकम् ॥ १७५ ॥
ऊरूद्वृत्तं ततः कुर्यादाक्षिप्तं स्वस्तिकं ततः ।
नितम्बं करिहस्तं च कटिच्छिन्नं च योगतः ॥ १७६ ॥
स्थिरहस्तो भवेदेष त्वङ्गहारो हरप्रियः । ( १ ) स्थिर हस्त'– दोनों हाथों को प्रसारित करके उपर उठाकर समपाद' का प्रयोग करना चाहिए । दाहिने हाथ को ऊपर की ओर व्यंसित दशा में प्रसारित करें फिर प्रत्यालीढ स्थान नामक चेष्टा में खड़ रहकर क्रमशः निकुट्टक, ऊरुवृत्त, आक्षिप्त, स्वस्तिक, नितम्ब, करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों का प्रदर्शन करे तो शम्भु को प्रिय लगने वाला स्थिरहस्त नामक अंगहार बन जाता है ॥ १७४- १७७ ॥ तलपुष्पापविद्धे द्वे वर्तित सनिकुट्टकम् ॥ १७७ ॥
। ऊरूवृत्तं तथाक्षिप्तमुरोमण्डलमेव च नितम्बं करिहस्तं च कटिच्छिन्नं तथैव च ॥ १७८ ॥
एष पर्यस्तको नाम हयङ्गहारो हरोद्भवः । १. अभिनवगुप्त के मत में इस अंगहार के प्रारम्भ में लीन नामक करण ( ४-६६ ) किया जाता है । २. समपाद -यह स्थान अर्थात् खड़े होने की स्थिति विशेष का परिचायक है । ३. व्यंसितापसृत - श्री घोष के अनुवाद में इसका अर्थ किया गया है— 'कंधे के समतल फैलाया हुआ ।' डा० रघुवंश ने भी इसका यही अर्थ दिया है। ( दाहिने हाथ को कन्धों के स्तर से ऊपर की ओर फैलाया जाता है । ) अभिनवगुप्त के अनुसार इसका तात्पर्य व्यंसित करण की स्थिति से फैलाये हुए दोनों हाथों से है । ४. प्रत्यालीढ स्थानक— कुञ्चितं दक्षिणं कृत्वा वामं पादं प्रसार्य च । आलीढपरिवर्तस्तु प्रत्यालीढमिति स्मृतम् ॥ ( १०-७०-७१ ) यह अभिनवगुप्त की उक्ति है, जिसके अनुसार प्रत्यालीढस्थानक के परिवर्तन से निष्पन्न होता है ।
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१३४ नाट्यशास्त्रम् ( २ ) पर्यस्तक'–यदि पहले तलपुष्पपुट तथा अपविद्ध करणों का प्रयोग किया जाए, फिर वर्तित तथा निकुट्टक करणों का प्रयोग किया जाए, तत्पश्चात् उरुद्- वृत्त, आक्षिप्त तथा उरोमण्डल एवं नितम्ब, करिहस्त और कटिच्छिन्न करणों का प्रयोग किया जाए तो शिव से उत्पन्न पर्यस्तक नामक अंगहार सिद्ध होता है ॥ १७७-१७९ ॥ अलपल्लवसूचीं च कृत्वा विक्षिप्तमेव च ॥। १७ ९ ॥ ऊरूद्वृत्तंआवर्तितं ततःतथाकुर्यात्तथैवक्षिप्तमुरोमण्डलमेवच निकुट्टकम्च। ॥ १८० ॥
करिहस्तं कटिच्छिन्नं सूचीविद्धो भवेदयम् । ( ३ ) सूचीविद्ध -जब हाथ अलपल्लव मुद्रा में तथा पैर सूची ( मुख ) मुद्रा हो तथा क्रमशः विक्षिप्त, आवर्तित', निकुट्टक, उरुवृत्त, आक्षिप्त, उरोमण्डल, करिहस्त तथा कटिच्छन्न करणों का प्रयोग किया जाए तो' सूचीविद्ध' अंगहार माना जाता है ॥ १७ ९ -१८१ ॥ अपविद्धं तु करणं सूचीविद्धं तथैव च ॥। १८१ ॥
उद्वेष्टितेन हस्तेन त्रिकं परिवर्तयेत् ।
उरोमण्डलको हस्तौ कटिच्छिन्नं तथैव च ॥ १८२ ॥
अपविद्धोऽङ्गहारश्च विज्ञेयोऽयं प्रयोक्तृभिः । (४ ) अपविद्ध - सर्वप्रथम अपविद्ध तथा सूचीविद्ध करणों का प्रयोग करके फिर हाथ को उद्वेष्टित ' रखते हुए त्रिक को घुमाना चाहिए । तत्पश्चात् उरोमण्डल करण के अनुरूप हाथ रख कर कटिच्छिन्न करण का प्रयोग करना चाहिए । प्रयोक्ताओं को इस प्रकार के अङ्गहार का नाम अपविद्ध जानना चाहिए
॥ १८१-१८३ ।
करणंपुनराक्षिप्तकंनृपुरं कृत्वाकुर्यादुरोमण्डलकंविक्षिप्तालातके तथापुनः ।॥ १८३ ॥
१. अभिनवगुप्त का विचार है कि इस अंगहार में प्रत्यालीढ नामक स्थान का प्रयोग होता है । इसमें दस करणों" का उपयोग- किया जाता जैसा: "कि अभिनव- भारती में भी उल्लिखित है- एतेन करणदशकेन पर्यस्तक । -"२.आदिअभिनवद्वाराके जिसअनुसारआवर्तना०करणशा० का( ४-१२०लक्षण) दियामें "प्रसार्यगया कुञ्चितंआवर्तितपादंशब्द- से उसी आवर्त करण का बोध कराया गया है । ३. उद्वेष्टित - हस्तमुद्रा का प्रकार है । अभिवनगुप्त ने इसे उद्वेष्टित करण (ना० शा० ९ -२१६ ) माना है ।
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चतुर्थोऽध्यायः १३५ नितम्बं करिहस्तं च कटिच्छिन्नं तथैव च ॥ १८४ ॥
आक्षिप्तकः स विज्ञेयो हाङ्गहारः प्रयोक्तृभिः । ( ५ ) आक्षिप्तक - यदि सर्वप्रथम नूपुर करण का प्रयोग किया जाए, फिर विक्षिप्त, अलातक, आक्षिप्त, उरोमण्डल, नितम्ब, करिहस्त, तथा कटिच्छिन्न करणों का क्रमशः प्रयोग किया जाए तो उस अङ्गहार को प्रयोक्ताओं द्वारा 'आक्षिप्तक ' संज्ञक जानना चाहिये ॥ १८३-१८५ ॥ उद्वेष्टितापविद्धस्तु करः पादो निकुट्टितः ॥ १८५ ॥
। पुनस्तेनैव योगेन वामपार्श्वे भवेदथ उरोमण्डलको हस्तौ नितम्बं करिहस्तकम् ॥ १८६ ॥
। कर्तव्यं सकटिच्छिन्नं नृत्ते तद्धट्टिते सदा (६ ) उद्घट्टित - दाहिना हाथ उद्वेष्टित ' और अपविद्ध मुद्रा में हो और दाहिना पैर निकुट्टित रहे, तथा पुनः इसी रूप में बाये पार्श्व में किया जाए । उरोमण्डलकरण के अनुकूल दशा में हाथ रखते हुए, क्रमशः नितम्ब, करिहस्त एवं कटिच्छिन्न करणों का प्रदर्शन करना उद्घट्टित अङ्गहार कहा जाता है ॥ १८५-१८७ ॥ पर्यायोद्वेष्टितो हस्तौ पादौ चैव निकुट्टितौ ॥ १८७ ॥
कुञ्चितावञ्चितौ चैव ह्यरूद्वृत्तं तथैव च ।
चतुरश्रं करं कृत्वा पादेन च निकुट्टकम् ॥ १८८ ॥
भुजङ्गत्रासितं चैव करं चोद्वेष्टितं पुनः ।
परिच्छिन्न च कर्तव्यं त्रिकं भ्रमरकेण तु ॥ १८ ९ ॥
करिहस्तं कटिच्छिन्नं विष्कम्भे परिकीर्तितम् । ( ७ ) विष्कम्भ - विष्कम्भ अङ्गहार में हाथों को क्रम से उद्वेष्टित एवं पैरों को निकुट्टित रखते हुए इसी क्रम से हाथों को कुश्चित (सिकोड़ा ) और पैरों को अंवित (घुमाया ) जाए, फिर ऊरुवृत्त करण का प्रयोग करते हुए हाथों को चतुरस्त्र १. अभिनवगुप्त का विचार है कि जहाँ कहीं पुनर्ग्रहण हुआ है वहाँ प्रयोग को दोहराने की भी सम्भावना है ( यत्र यत्र पुनर्ग्रहणं तत्र तत्र केचित् द्वियोगमाहुः । ) २-३ दाहिने पार्श्व में की जाने वाली सम्पूर्ण प्रक्रिया बायें पार्श्व में भी की जानी चाहिए । तदनुसार बायें पार्श्व में बायां हाथ उद्वेष्टित तथा अपविद्ध मुद्रा में रहेगा और बायाँ पैर निकुट्टित किया जाएगा । ४. अभिनवगुप्त के मतानुसार हाथों तथा पैरों के कुश्चन के साथ अंचित करण का प्रयोग दोनों पावों से क्रमशः किया जाता है-
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१३६ नाट्यशास्त्रम् करके पैरों से निकुट्टक करण का प्रयोग करना चाहिए इसके बाद भुजङ्गत्रासित करण का प्रयोग करके हाथों को उद्वेष्टित मुद्रा में रखना चाहिए । फिर भ्रमर करण के प्रयोग के साथ त्रिक को वलित करना चाहिए और करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों को प्रदर्शित करना चाहिए ॥ १८७-१९ ० ॥ दण्डपादं करं चैव विक्षिप्याक्षिप्य चैव हि ॥ १ ९ ० ॥ व्यंसितं वामहस्तंकार्यमाक्षिप्तंच सह पादेनमण्डलोरसिसर्पयेत् ॥। १ ९ १ ॥ करिहस्तं कटिच्छिन्नं कर्तव्यमपराजिते । (८) अपराजित -जब दण्डपाद करण के प्रयोग के बाद हाथों को विक्षिप्त ( बाहर फेंका ) एवं ( आक्षिप्त शरीर की ओर वापिस लाया जाए ) किया जाए, फिर व्यंसित करण का प्रयोग करते हुए बायें हाथ को पैर के अनुरूप गतिशील रखे ', और फिर दोनों निकुट्टकों ( निकुट्टक तथा अर्धकुट्टक ) को प्रयुक्त करने के साथ साथ आक्षिप्त, उरोमण्डल एवं तत्पश्चात् करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों का क्रमशः प्रयोग किया जाए तो उस 'अपराजित' अङ्गहार मानना चाहिए
॥ १ ९०-१९ २ ।
कुट्टितं करणं कृत्वा भुजङ्गत्रासितं तथा ॥। १ ९ २ ॥
रेचितेन तु हस्तेन पताकं हस्तमादिशेत् । "तेन कुञ्चितस्य करणस्याञ्चितस्य चाङ्गद्वयपर्यायेण प्रयोज्यत्वम् । ” श्री घोष ने इसमें छिन्न एवं भ्रमरक करणों का प्रयोग माना है । किन्तु अभिनवभारती के अनुसार भ्रमरक करण के प्रयोग में त्रिक छिन्न (वलित ) की जाती है (छिन्नत्रिकं कुर्यात् ) छिन्न करण का प्रयोग नहीं होता । यही कारण है कि हमने भी छिन्न करण की उपस्थिति नहीं मानी । १. अभिनवगुप्त के अनुसार यहाँ प्रसर्पित करण - ना०शा० ( ४-१४८-४९ ) के अनुसार किया जाता है । ( हस्तपाद का संचालन ) प्रसर्पित करण का लक्षण निम्नलिखितहै— एकस्तु रेचितो हस्तः लताख्यश्च तथापरः । प्रसपित तलो पादौ प्रसर्पितकमेव तत् ॥ ( ४- १४८-१४९ ) किन्तु डा ० रघुवंश का विचार है कि सर्पित स्वयं भी एक करण है ( सं ०८१ ) और उसके प्रयोग का संदर्भ भी यहाँ हो सकता है । इस भाँति डा० रघुवंश ने इसका अर्थ किया है कि बायें पैर के साथ बायाँ हाथ सर्पितरूप में संचालित होता है ।
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चतुर्थोऽध्यायः १३७ आक्षिप्तकं प्रयुञ्जीत ह्य रोमण्डलकं तथा ॥ १ ९ ३ ॥ लताख्यं सकटिच्छिन्नं विष्कम्भापसृते भवेत् । (९ ) विष्कम्भापसृत - जब कुट्टित और भुजङ्गत्रासित करणों का प्रयोग करने के साथ रेचित हस्त' पताका मुद्रा में हो और फिर क्रमशः आक्षिप्तक व उरोमण्डल करणों का तथा कटिच्छिन्न करण साथ लता-हस्त का प्रयोग किया जाए तो ' विष्कम्भापसृत ' अङ्गहार कहा जाता है ॥ १ ९४-१९ ६ ॥ त्रिकं सुवलितं कृत्वा नूपुरं करणं तथा ॥ १ ९ ४ ॥ भुजङ्गत्रासितं सव्यं तथा वैशाखरेचितम् । आक्षिप्तकंबाह्यभ्रमरकंततः कृत्वाकुर्यां परिच्छिन्नंदुरोमण्डलमेवतथैव चच ॥। १ ९ ५ ॥ नितम्बं करिहस्तं च कटिच्छिन्न तथैव च ॥ १ ९ ६ ॥ मत्ताक्रीडो भवेदेष ह्यङ्गहारो हरप्रियः । ( १० ) मत्ताक्रीड -यदि त्रिक को सुन्दरता से वलित करते हुए नूपुर करण का प्रदर्शन दिया जाए, फिर भुजङ्गत्रासित तथा वैशाखरेचित करण प्रयुक्त किए जाए । इसके बाद क्रमशः आक्षिप्त, छिन्न, बाह्य भ्रमरकर, उरोमण्डल, नितम्ब, करिहस्त तथा कटिछिन्न करणों का प्रयोग किया जाए तो शिव जी का प्रिय 'मत्ताक्रीड' नामक अङ्गहार कहा जाता है ॥ १ ९४-१९ ७ ॥ रेचितं हस्तपादं च कृत्वा वृश्चिकमेव च ॥ १ ९ ७ ॥
पुनस्तेनैव योगेन वृश्चिकं सम्प्रयोजयेत् ।
निकुट्टकं तथा चैव सव्यासव्यकृतं क्रमात् ॥ १ ९ ८ ॥
लताख्यः सकटिच्छेदो भवेत्स्वस्तिकरेचिते । १. अभिनवभारती के व्याख्यानुसार भुजङ्गत्रस्तरेचित करण के लक्षण- भुजङ्गत्रासितं कृत्वा यत्रोभावपि रेचितौ । वामपार्श्वस्थिती हस्तौ भुजङ्गत्रस्तरेचितम् ॥ ( ४- ९ ६ ) में जिस रेचित का उल्लेख हुआ है वही यहाँ अभिप्रेत है । २. श्री घोष के अनुवाद के अनुसार बाह्यभ्रमरक करण का यहाँ प्रयोग होता है, यद्यपि इस नाम के किसी करण का उल्लेख नहीं हुआ है । अभिनव के अनुसार यह वामभ्रमरकम् है ( वाह्यभ्रमरकमिति वामभ्रमरकम् ) जिसका यह अर्थ है कि भ्रमरक करण का वायें अङ्ग से प्रयोग किया जाए । इस भाँति वाह्यभ्रमरक करण, भ्रमरक का ही एक रूप मात्र कहा जा सकता है ।
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१३८ नाट्यशास्त्रम् ( ११ ) स्वस्तिक रेचित - यदि हाथ पैर को रेचित मुद्रा में रखकर वृश्चिक करण का प्रयोग किया जाए और फिर उन्हीं हाथ, पैरों से वृश्चिक करण का प्रयोग किया जाए एवं फिर क्रमशः दाहिने व बायें दोनों अंगों से निकुट्टक -करण का प्रयोग किया जाए एवं अन्ततः लता के साथ कटिच्छेद करण का प्रयोग किया जाए तो 'स्वस्तिक- रेचित ' अङ्गहार सिद्ध होता है ॥ १ ९७-१९९ ॥ पार्श्वे तु स्वस्तिकं बध्द्वा कार्यं त्वर्धनिकुट्टकम् ॥ १ ९९ ॥
द्वितीयस्य च पार्श्वस्य विधिः स्यादयमेव हि ।
ततश्च करमावर्त्य ह्य रुपृष्ठे निपातयेत् ॥ २०० ॥
ऊरूद्वृत्तं ततः कुर्यादाक्षिप्तं पुनरेव हि ।
नितम्बं करिहस्तं च कटिच्छिन्न तथैव च ॥। २०१ ॥
पार्श्वस्वस्तिक इत्येष ह्यङ्गहारः प्रकीर्तितः । ( १२ ) पार्श्व स्वस्तिक - जिस अङ्गहार में चरणों को स्वस्तिक मुद्रा में पार्श्व में रखा जाए और उसी प्रकार अङ्ग से निकुट्टक करण का प्रयोग किया जाए व फिर दूसरे पार्श्व में उसी की आवृत्ति की जाए तथा हाथ को आवर्तित करके कटि प्रदेश पर स्थापित किया जाए एवं क्रम से ऊरुवृत्त, आक्षिप्त, नितम्ब, करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों का प्रयोग किया जाए तो उसे 'पार्श्वस्वस्तिक' अङ्गहार कहते हैं ॥ ९९९ -२०२ ॥ वृश्चिकं करणं कृत्वा लताख्यं हस्तमेव च ॥ २०२ ॥
तमेव च करं भूयो नासाग्रे सन्निकुञ्चयेत् ।
तमेवोद्वेष्टितं कृत्वा नितम्बं परिवर्तयेत् ॥ २०३ ॥
करिहस्तं कटिच्छिन्नं वृश्चिकापसृते भवेत् । ( १३ ) वृश्चिकापसृत – यदि वृश्चिक करण का प्रयोग करके लता मुद्रा में स्थित हाथ को [ नासिक के अग्रभाग पर झुका कर रखे तत्पश्चात् उसी हाथ को ] उद्वेष्टित मुद्रा' में रखते हुए नितम्ब को गतिशील करे फिर क्रमशः करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों का प्रयोग करे तो उसे 'वृश्चिकापसृत' करण कहते हैं ॥ २०४-२०६ ॥ १. उद्वेष्टित मुद्रा से यहाँ हाथ की चक्राकार गति का तात्पर्य है । २. नितम्ब की गतिशीलता के विषय में अभिनवगुप्त का मत नितम्ब नामक करण का प्रयोग है जैसा कि उन्होंने लिखा है-' नितम्बादित्रयं पूर्ववत्' अर्थात् नितम्ब करिहस्त तथा कटिच्छिन्न ये तीन पूर्ववत् ( पार्श्वस्वस्तिक अङ्गहार के समान ) करना चाहिए ।
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चतुर्थोऽध्यायः १३ ९. कृत्वा नूपुरपादं तु तथाक्षिप्तकमेव च ॥ २०४ ॥
परिच्छित्रं च कर्तव्यं सूचीपादं तथैव च ।
नितम्बं करिहस्तं चाप्युरोमण्डलकं तथा ॥ २०५ ॥
कटिच्छिन्नं ततश्चैव भ्रमरः स तु संज्ञितः । ( १४ ) भ्रमर - जब नूपुरपाद चारी के पश्चात् आक्षिप्तक, छिन्न', सूचीपाद, नितम्ब, करिहस्त, उरोमण्डल और कटिच्छिन्न करणों का इसी क्रम से प्रयोग किया जाए तो उसे 'भ्रमर' नामक अङ्गहार कहा जाता है ॥ २०४-२०६ ॥ मत्तलिकरणं कृत्वा करमावर्त्य दक्षिणम् ॥। २०६ ॥
कपोलस्य प्रदेशे तु कार्यं सम्यनिकुञ्चितम् ।
अपविद्धं द्रुतं चैव तलसंस्फोटसंयुतम् ॥ २०७ ॥
करिहस्तं कटिच्छिन्न मत्तस्खलितके भवेत् । ( १५ ) मत्तस्खलित - यदि मत्तलिकरण' का प्रयोग करके दाहिने हाथ को गोल घुमाकर गाल पर अच्छी तरह निकुञ्चित किया जाए और फिर अपविद्ध करण के बाद फौरन ही तलसंस्फोटित एवं अन्त में करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों का प्रयोग किया जाए तो वह ' मत्तस्खलित' अङ्गहार कहा जाता है ॥ २०६- २०८ ॥ दोलैः करैः प्रचलितैः स्वस्तिकापसृतैः पदैः ॥ २०८ ॥ 1 अश्वितैर्वलितैर्हस्तैस्तलसङ्घट्टितैस्तथा
१. अभिनवगुप्त ने यहाँ छिन्न करण की उपस्थिति मानी है । किन्तु श्री घोष ने इसके स्थान पर कटिच्छिन्न करण का होना माना है । श्री घोष का विचार इसलिए उपयुक्त नहीं प्रतीत होता कि आगे फिर कटिच्छिन्न करण का निर्देश दिया गया है । अतः छिन्न करण को मान्यता देने वाली अभिनव की धारणा का ही हमने समर्थन किया है । २. अभिनवगुप्त के मत में मत्तलिल-करण [ना० शा ० ४-८८ ] का लक्षण है-- वामदक्षिणपादाभ्यां घूर्णमानोपसर्पणे । उद्वेष्टितापविद्धैश्च हस्तैर्मत्तल्लयुदाहृतम् ॥ ( ४.८७-८८ ) मत्तस्खलित अङ्गहार में इस मत्तलिकरण का प्रयोग बायें व दाहिने दोनों पैरों से शुरू किया जाता है । ३. अभिनवगुप्त के अनुसार 'कपोलस्य' पद से गण्डसूची ( ना० शा० ४- १३२ ) करण के तथा सम्यक् निकुञ्चन से लीन ( ना० शा० ४-६६ ) करणों के प्रयोग का संकेत किया गया है ।
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१४० नाट्यशास्त्रम् निकुट्टितं च कर्तव्यमूरुद्वृत्तं तथैव च ॥ २० ९ ॥ करिहस्त' कटिच्छिन्न मदाद्विलसिते भवेत् । ( १६ ) मदविलसित - जब गतियुक्त दोनों हाथ दोला मुद्रा में हों एवं पैरों को स्वस्तिक चेष्टा में फैलाया जाए तथा हाथों को अश्चित, वलित एवं तलसंघट्टित किया जाए और इसके बाद क्रमशः निकुट्टित, ऊरुवृत्त, करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों को प्रयुक्त किया जाय तो 'मदविलसित ' अङ्गहार सम्पन्न होता है ' ॥ २०८- २१० ॥ उद्घट्टितेनमण्डलं स्थानकपादेनकृत्वामत्तलिकरणंतथा हस्तौ च रेचितौभवेत् ॥। २१० ॥ आक्षिप्त करणं चैव ह्य रोमण्डलमेव च ॥ २११ ॥
कटिच्छिन्नं तथा चैव भवेत्तु गतिमण्डले । ( १७ ) गतिमण्डल – जब मण्डल स्थानक का प्रयोग करके हाथों को रेचित मुद्रा एवं पैरों को उद्घट्टित प्रक्रिया में स्थित किया जाए और फिर क्रमशः मत्तल्लि, आक्षिप्त, उरोमण्डल तथा कटिच्छिन्न करणों का प्रयोग किया जाए तो उस अङ्गहार को ' गतिमण्डल' कहा जाता है ॥ २१०-२१२ ॥ समपादं प्रयुज्याथ परिच्छिन्नं त्वनन्तरम् ॥ २१२ ॥
आविद्धेन तु पादेन बाह्यभ्रमरकं तथा ।
वामसूच्या त्वतिक्रान्तं भुजङ्गत्रासित तथा ॥ २१३ ॥
करिहस्त कटिच्छिन्नं परिच्छिन्ने विधीयते । ( १८ ) परिच्छिन्न – पहले समपाद स्थान का प्रयोग कर बाद में फिर १. अभिनवभारती में इस बात का उल्लेख किया गया है कि आरम्भ के वलितादि तीन करणों का तीन बार प्रयोग करके तब निकुट्टित आदि चार करणों का प्रयोग करने का विधान कुछ आचार्यों ने किया है । इस प्रकार उन आचार्यों के अनुसार इस अङ्गहार में तेरह करण होते हैं । कुछ अन्य आचार्यों के विचारा- नुसार सम्पूर्ण सातों करण तीन बार प्रयुक्त होते हैं और इस भाँति कुल इक्कीस करण ' मदविलसित ' अङ्गहार में होते हैं । २. समपाद - अभिनवगुप्त ने इसे "श्लिष्टौ समनखी पादौ" आदि लक्षणसम्पन्न समनख करण ( ना शा० ४-६५ ) के रूप में माना है और प्रत्येक चारी, हस्त- मुद्रा तथा स्थानक आदि आदि संकेतों की करण संदर्भ में ही व्याख्या की है । श्री घोष ने इसे स्थान (खड़े होने की मुद्रा ) माना है । डा० रघुवंश ने भी अपने अनुवाद में 'समपाद स्थान ( खड़ होने की चेष्टा ) ' इस अर्थ को मान्यता दी है ।
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चतुर्थोऽध्यायः १४१ परिच्छिन्न करण का प्रयोग किया जाए,फिर आविद्ध पर से बाह्यभ्रमरक करण का तथा बायें पैर से सूची चारी के द्वारा अर्धसूची करण का और तदनन्तर क्रमशः अतिक्रान्त, भुजङ्गत्रासित, करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों का प्रयोग किया जाए, तो उस अङ्गहार की संज्ञा 'परिच्छिन्न ' होती है ॥ २१२-२१४ ॥ शिरसस्तुपरि स्थापयौ स्वस्तिकौ विच्युतौ करौ ॥ २१४ ॥
ततः सव्यं करं चापि गात्रमानम्य रेचयेत् । ॥ २१५ ॥ पुनरुत्थापयेत्तत्र गात्रमुन्नम्य रेचितम्
लताख्यौ च करौ कृत्वा वृश्चिकं सम्प्रयोजयेत् ।
रेचित करिहस्त च भुजङ्गत्रासितं तथा ॥ २१६ ॥
आक्षिप्तक प्रयुञ्जीत स्वस्तिक पादमेव च ॥। २१७ ॥ पराङ्मुखविधिर्भूय एवमेव भवेदिह । करिहस्त कटि छिन्न परिवृत्तकरेचिते ( १ ९ ) परिवृत्तक-रेचित -परिवृतक रेचित अङ्गहार में सर्वप्रथम दोनों हाथों को ढीले रखते हुए स्वस्तिक मुद्रा में मस्तक पर रखना चाहिए । तत्पश्चात् शरीर को झुकाकर दाहिने हाथ को रेचित करना चाहिए । फिर रेचित हाथ को उठा कर शरीर को भी उन्नत कर लेना चाहिए । इसके बाद हाथों को लता-मुद्रा में रखकर क्रमशः वृश्चिक, रेचित करिहस्त, भुजङ्गत्रासित और आक्षिप्तककरणों का प्रयोग करके पैरों को स्वस्तिक मुद्रा में रखते हुए पराङ्मुख हो कर उपर्युक्त सभी करणों की पुनरावृत्ति करनी चाहिए । सबसे अन्त में करिहस्त एवं कटि-- च्छिन्न करणों का प्रयोग करना चाहिए ॥ २१४-२१८ ॥ रेचितौपुनस्तेनैवसहदेशेनगात्रेण गात्रमुन्नम्यह्यपविद्धौ करौ रेचयेत्यदा ॥ । २१८ ॥ कुर्यान्नूपुरपादं च भुजङ्गवासित तथा ॥ २१ ९ ॥ ऊरूदद्वृत्तंरेचित मण्डलंतथाक्षिप्तमुरोमण्डलमेवचैव बाहुशीर्षे निकुञ्चयेत्च ॥। २२० ॥ करिहस्त कटिच्छिन्नं कुर्याद्वैशाख-रेचिते । (२० ) वैशाखरेचित-- जब शरीर के साथ दोनों हाथ रेचित करके अपविद्ध मुद्रा में रखे जाएं, फिर शरीर को दूसरी तरफ उन्नत करके उसी प्रक्रिया की १. स्वस्तिको विच्युतौ करौ --श्री घोष के अनुसार तो इसका केवल यही तात्पर्य है कि सिर के उपर हाथों की ढीली सी स्वस्तिक मुद्रा रहे । परन्तु अभिनव- गुप्त यहाँ नितम्ब ( ४-१४६ ) एवं स्वस्तिक रेचित करण ( ४-६७ ) का संकेत मानते हैं ।