भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 251–260

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १, पृष्ठ 251 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नाट्यशास्त्रम्१६२ [ तत्त्वं चानुगतं चापि ओघं च करणान्वितम् । स्थिरे तत्त्वं प्रयोक्तव्यं मध्ये चानुगतं भवेत् । भूयश्चौघः प्रयोक्तव्यस्त्वेष वाद्यगतो विधिः ।

छन्दोगीतकमासाद्य त्वङ्गानि परिवर्तयेत् ।

एष कार्यो विधिर्नित्यं नृत्ताभिनयवादिते ॥

यानि वस्तुनिबद्धानि तेषामन्ते ग्रहो भवेत् । अङ्गानां तु परावृत्तावादावेव ग्रहो मतः ॥ ] [ तत्त्व, अनुगत तथा ओघ सर्वदा करणों के साथ रहते हैं । वाद्यवादन के नियम के अनुसार इसमें से स्थिर लय के साथ तत्व का, मध्य लय के साथ अनुगत का और द्रुत लय के साथ ओघ का प्रयोग करना चाहिए । जब गीत के अङ्ग छन्दक अवस्था में हों तो उन्हें कई बार दोहराना चाहिए । यह द्वावर्तन का नियम नृत्त, अभिनय एवं वादन में एक जैसा रहता है । जिन गीतों में वस्तुरचना सन्निहित होती है, उनके अन्त में ग्रह ( विशिष्ट वाद्यवादन ) का प्रयोग किया जाता है । पर अंगों ( बड़ गीतों के अंशों ) की आवृत्ति के समय ग्रह का प्रयोग अन्त में किया जाता है' । ] एवमेव विधिः कार्यो गीतेष्वासारितेष्वपि । इस प्रकार आसारित गीत के प्रयोग में यह विधि प्रयुक्त की जानी चाहिए ॥ ३०२ ॥

सुकुमार नृत्त के प्रयोग की विधि- देवस्तुत्याश्रयं ह्य तत्सुकुमारं निबोधत ॥ ३०२ ॥

स्त्रीपुंसयोस्तु संलापो यस्तु कामसमुद्भवः ।

तज्ज्ञेयं सुकुमारं हि शृंगाररससम्भवम् ॥ ३०३ ॥

अब देवताओं की वन्दना से सम्बन्धित इस सुकुमार नृत्त के विषय में जानो । सुकुमार नृत्त शृंगार रस से उत्पन्न होता है, इसमें प्रणयोन्मत्त स्त्री- पुरुष का कथनोपकथन होता है ॥ ३०२.३०३ ॥

यस्यां यस्यामवस्थायां नृत्त योज्यं प्रयोक्तृभिः ।

यत्सर्वं सम्प्रवक्ष्यामि तच्च मे शृणुत द्विजाः ॥ ३०४ ॥

१. श्री घोष के अनुसार जब लम्बे गीतों के अंश दोहराए जाते हैं तो उनके प्रारम्भ में ग्रह का प्रयोग किया जाता है । संगीतकार के अनुसार सम, अतीत और अनागत यह तीन ग्रह ताल के होते हैं । ( संगीत रत्नाकर, ताल, पृ ० २७-२८ ) ।

पृष्ठ 252

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १, पृष्ठ 252 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चतुर्थोऽध्यायः १६३ हे ब्राह्मणों! जिस अवसर तथा स्थितियों में प्रयोक्तागण को नृत्त की योजना करनी चाहिए वह सब मैं अब आप लोगों को बतलाऊंगा ॥ ३०४ ॥

अङ्गवस्तुनिवृत्ती तु तथा वर्णनिवृत्तिषु ।

तथा चाभ्युदयस्थाने नृत्तं तज्ज्ञैः प्रयोजयेत् ॥ ३०५ ॥

नाटयज्ञ जनों द्वारा उस समय नृत्त का प्रयोग किया जाना चाहिए जब गीत अथवा नाटक की विषयवस्तु के अंग एवं वर्ण की समाप्ति हो, अथवा किसी पात्र के अभ्युदय का अवसर हो ॥ ३०५ ॥

यत्तु संदृश्यते किञ्चिद्दम्पत्योर्मदनाश्रयम् ।

नृत्तं तत्र प्रयोक्तव्यं प्रहर्षार्थगुणोद्भवम् ॥ ३०६ ॥

जहाँ दम्पति की प्रणयलीला के आधार पर प्रदर्शन किया जाए वहाँ आनन्द- -मूलक नृत्त की योजना करनी चाहिए ॥ ३०६ ॥

यत्र सन्निहिते कान्ते ऋतुकालादिदर्शनम् ।

गीतकार्थाभिसंबद्धं नृत्तं तत्रापि चेष्यते ॥। ३०७ ॥

जब नायक नायिका का मिलन हो, अनुकुल ऋतु या समय हो, उस समय गीत के अर्थ से सम्बन्धित नृत्त का प्रयोग करना चाहिए ॥ ३०७ ॥

खण्डिता विप्रलब्धा वा कलहान्तरितापि वा ।

यस्मिन्नङ्ग तु युवतिर्न नृत्तं तत्र योजयेत् ॥ ३०८ ॥

(नाटक के ) जिस अंग में खण्डिता, विप्रलब्धा या कलहान्तरिता नायिका का अभिनय हो वहाँ नृत्त का प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ ३०८ ॥

१. अङ्ग – जब गीत के पदभाग का रचनाक्रम समाप्त हो । अंग से यहाँ नाटकीय विभिन्न अंगों की रचना का अर्थ भी लिया जा सकता है । २. वर्ण -श्री घोष के मत में गीत के आलंकारिक विशिष्ट अंग की ही संज्ञा वर्ण है । अभिनवगुप्त के मत में वर्ण का अर्थ गान-क्रिया से विस्तारपूर्ण स्थायी ( वर्णानां स्थाय्यादीनां गीतक्रियाविस्ताररूपाणाम् ) है । ३. श्री घोष के अनुसार अभ्युदय नाटक के पात्र का होता है । किन्तु डा० रघुवंश ने इसे गीत एवं नाट्यवस्तु के अभ्युदय स्थलों से सम्बद्ध माना है । ४. यह नायिका भेद से सम्बन्धित पारिभाषिक शब्द है । तदनुसार जिस -नायिका का प्रिय वचनबद्ध होकर भी न आए वह 'खण्डिता', जिसका नायक दूती से सन्देश पाकर भी न आए वह 'विप्रलब्धा' एवं जिसका नायक कलह के कारण चला गया हो वह ' कलहान्तरिता' कहलाती है । अर्थात् यह सभी नायिकाएं अपने प्रिय के मिलन-सुख से वञ्चित होती हैं ।

पृष्ठ 253

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १, पृष्ठ 253 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१६४ नाट्यशास्त्रम्

सखीप्रवृत्ते संलापे तथाऽसन्निहिते प्रिये ।

नहि नृत्त प्रयोक्तव्यं यस्या वा प्रोषितः प्रियः ॥ ३० ९ ॥

जब सखी के साथ वार्तालाप हो रहा हो, प्रियतम समीप न हो अथवा पति परदेश गया हो तो नृत्त का प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ ३० ९ ॥ [ दूत्याश्रयं यदा तु स्यादृतुकालादिदर्शनम् । ॥ ] औत्सुक्यचिन्तासंबद्धं न नृत्त तत्र योजयेत् हो, उस समय ( जब दूत के द्वारा ऋतु या समय का वर्णन किया जा रहा निषिद्ध है । ) उत्सुकता तथा चिन्ता की अवस्था के कारण नृत्त की योजना करनी

यस्मिन्नङ्ग प्रसादं तु गृह्णीयान्नायिका क्रमात् ।

ततःप्रभृति नृत्तं तु शेषेष्वङ्गेषु योजयेत् ॥ ३१० ॥

यदि (नाट्य के ) किसी अंग के प्रदर्शन में नायिका को क्रमशः आह्लाद की प्राप्ति होती हो तो उस स्थिति की पूर्णता तक नृत्त की योजना करनी चाहिए ॥ ३१० ॥।देवस्तुत्याश्रयकृतं यदङ्गं तु भवेदथ ॥ ३११ ॥

माहेश्वरैरङ्गहारैरुद्धतैस्तत्प्रयोजयेत् तो वहाँ महेश्वर नाट्य में यदि कोई अंग देवता की आराधना से सम्बन्धित हो निर्देशित उद्धत अंगहारों से युक्त नृत्त का प्रयोग करना चाहिए ॥ ३११ ॥

द्वारा यत्तु शृङ्गारसम्बद्धं गानं स्त्रीपुरुषाश्रयम् ॥। ३१२ ॥ देवीकृतै रङ्गहारैर्ललितैस्तत्प्रयोजयेत् स्त्री- पुरुष के शृंगाररस से सम्बन्धित सहगान के अवसर पर भगवती पार्वती रचे गए ललित अंगहारों से पूर्ण नृत्त का संयोजन करना चाहिए ॥ ३१२ ॥

द्वारा १. प्रिय के मिलन की आशा या कोई सुखद समाचार की प्राप्ति इस आह्लाद के कारण हो सकते हैं । के अनुसार अंग का तात्पर्य छन्दकगीत के अंश विशेष से है २. अभिनवगुप्त) | परन्तु इसका अर्थ नाट्य की कथावस्तु के किसी अंग विशेष ( छन्दकसम्बन्धि (विभाग ) से भी हो सकता है । ३. उद्धत अङ्गहारों के अन्तर्गत अभिनव ने विद्युद्भ्रान्त तथा गरुडप्लुत आदि की गणना की है ( उद्धतैरिति । विद्युद्भ्रान्तगरुड प्लुतकादिप्रधानैः ) । ४. अभिनवगुप्त की व्याख्यानुसार ललित अङ्गहारों में तलपुष्पपुट, लीन, नितम्ब आदि की गणना होनी चाहिए ( ललितैरिति । तलपुष्पपुटलीन- नितम्बाद्यारब्धः ) ।

पृष्ठ 254

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १, पृष्ठ 254 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चतुर्थोऽध्यायः १६५ चतुष्पाद, नकुटक, खंजक तथा परिगीत आदि गीतों के गान के समय भाण्ड-वाद्य प्रयोग की विधि- चतुष्पदा नर्कुटके खञ्जके परिगीतके । विधानं संप्रवक्ष्यामि भाण्डवाद्यविधि प्रति ॥ ३१३ ॥

अब में चतुष्पाद', नर्कुटक', खंजक' तथा परिगीत ' नामक गीतों के प्रमेय के समय प्रयुक्त किएखञ्जनर्कुटजाने वालेसंयुक्ताभाण्ड वाद्यों भवेद्याकी प्रयोगविधितु चतुष्पदाबतलाऊँगा॥। ३१३ ॥ पादान्ते सन्निपाते तु तस्या भाण्डग्रहो भवेत् ॥ ३१४ ॥

खंजक तथा निर्कुटक वर्णगीत तथा सन्निपात ग्रह सहित चतुष्पाद गीत के अन्तिम पाद के समाप्त होने पर वाद्यवादन प्रारम्भ होना चाहिए ॥ ३१४ ॥

या ध्रुवा छन्दसा युक्ता समपादा समाक्षरा ।

तस्याः पादावसाने तु प्रदेशिन्या ग्रहो भवेत् ॥ ३१५ ॥

जो ध्रुवा समान अक्षर तथा समान चरण वाले द्वन्द्वों से युक्त होती है, तो उसके प्रथमपाद की समाप्ति पर प्रदेशिनी ( तर्जनी ) अङ्गुली से भाण्डवाद्य बजाया जाता है ॥ ३१५ ॥

कृत्वेकं परिवर्त तु गानस्याभिनयस्य च ।

पुनः पादनिवृत्ति तु भाण्डवाद्येन योजयेत् ॥ ३१६ ॥

१. ना० शा० ३१-५११ २. ना० शा० ३२-३०४ ३. ना० शा० ३१-५१२ ४. ना० शा० ३२-४३४ ५. अभिनवगुप्त के मत में चतुष्पाद ध्रुवा के खंजक तथा नर्कुटक नामक प्रकारों का प्रयोग जब किया जाता है तो पहला पाद समाप्त होते ही भाण्ड वाद्य बजाया जाता है, अर्थात् थाप देकर ताल दी जाती है । "खञ्जकजात्या नकुटक- जात्या वा या चतुष्पदान वा क्रियतेऽस्यां प्रथमपादस्य यावदुपा ( न्त्य ) ( कला) तावच्च श्रीवशान्वितं गानम्" अभिनव ने एक अन्य मत उद्धृत किया है । जिसके अनुसार सन्निपात संज्ञक कला के गान के समय भाण्डवाद्य का आरम्भ किमा जाता है । ६. गीत के आधारभूत एक निश्चित पाद-समूह की संज्ञा ध्रुवा होती है । ७. समपादा - जिस ध्रुवा के पाद समान हो ( यह लक्षण ) अभिनव- गुप्त के मतानुसार चतुष्पादाघ्र वा का ही है-' समपादा चतुष्पादा' । ८. प्रायः प्रदेशिनी उंगली से टंकार देने का ही कार्य लिया जाता है । अतः यहाँ टंकार से ताल देने का तात्पर्य प्रतीत होता है ।

पृष्ठ 255

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १, पृष्ठ 255 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१६६ नाट्यशास्त्रम् ऐसा करने के बाद ( उपर्युक्त विधि से वाद्यवादनपूर्वक ध्रुवा गीत गाये जाने पर ) गान तथा अभिनय के प्रयोग द्वारा इस ( ध्रुवा ) की पुनरावृत्ति करनी चाहिए और अन्तिम पाद के समाप्त होने पर भाण्डवादन करा देना चाहिए' ॥ ३१६ ॥

अङ्गवस्तुनिवृत्त तु वर्णान्तरनिवृत्तिषु । तथोपस्थापने चैव भाण्डवाद्यं प्रयोजयेत् ॥ ३१७ ॥

गीत के अङ्ग अथवा विषय ( वस्तु ) की समाप्ति वर्णों की आन्तरिक निवृत्ति' के अवसर पर अथवा ( गीत या वस्तु के ) उपस्थापन के अवसर पर भाण्डवाद्य का संयोजन किया जाना चाहिए ॥ ३१७ ॥

येsपि चान्तरमार्गास्स्युः तन्त्रीवाक्करणैः कृताः ।

तेषु सूची प्रयोक्तव्या भाण्डेन सह ताण्डवे ॥ ३१८ ॥

तन्त्री,, वाक तथा करणों के द्वारा प्रयुक्त अन्तरमार्ग के बीच में ताण्डव की योजना करनी चाहिए जिसमें भाण्डवाद्य सहित सूची चारी का प्रदर्शन किया जाना चाहिए ॥ ३१८ ॥

१. अभिनवगुप्त के विचार में शुद्धविभागयुक्त गीत की आवृत्ति भाण्डवादन के साथ ही होगी और उसका अभिनय किया जाएगा । अर्थात् जिस भाग के साथ पहले वादन हुआ था उसको अभिनय द्वारा नहीं प्रदर्शित किया जायगा । फिर आवृत्ति के समय उसको ही दोहराया जायगा अर्थात् उसका अभिनय किया जाएगा और उसी के अनुसार भाण्डवादन भी किया जाएगा । ( योऽसौ शुद्धविभागः पूर्व गीतः स परावर्तनीयो भाण्डवाद्येन सहाभिनेतव्य इति पश्चादसो " प्रयोज्य यावान्भागो भाण्डवाद्येन प्रानियोजितोऽत एव नाभिनीतस्तावतो निवृत्तिः परावर्तनं कार्यमियुक्त भवति । ) २. निवृत्ति का अर्थ अभिनव के अनुसार परावर्तन है । कुछ लोग इसका अर्थ समाप्ति भी करते है । ३. अभिनवगुप्त के अनुसार स्वरों के साथ अन्तर्वर्ती अल्पस्वरों की विचित्रता को उत्पन्न करने वाली संग्ति का नाम अन्तरमार्ग है । संगीतरत्नाकर के अनुसार स्वरों की यह संगति न्यास, अपन्यास विन्यासग्रह और अंश के अतिरिक्त, बीच- बीच में अंश, ग्रह, अपन्यास, विन्यास एवं संन्यास स्वरों के साथ कहीं अपन्यास द्वारा प्रयुक्त की जाती है और कहीं लंबन द्वारा । अन्तरमार्ग का प्रयोग तन्त्री- वाद्य, कण्ठगान एवं वृत्त के करणों द्वारा किया जाता है— 'अन्तरं परस्परवैलक्षण्यं मन्यते येनोपायेन सोऽन्तरमार्गः ।'

पृष्ठ 256

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १, पृष्ठ 256 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चतुर्थोऽध्यायः १६७

ताण्डवनृत्त के प्रयोग का महात्म्य- महेश्वरस्य चरितं य इदं सम्प्रयोजयेत् ।

सर्वपापविशुद्धात्मा शिवलोकं स गच्छति ॥ ३१ ९ ॥

महेश्वर शिव द्वारा निर्मित इस ताण्डव नृत्य का समुचित रीति से प्रयोग करने वाला सब पापों से रहित होकर शिवलोक को प्राप्त करता है ॥ ३१ ९ ॥

एवमेष विधिः सृ( दृ) ष्टस्ताण्डवस्य प्रयोगतः ।

भूयः किं कथ्यतामन्यन्नाट्यवेदविधिं प्रति ॥ ३२० ॥

॥ इति भारतीये नाट्यशास्त्रे ताण्डवलक्षणं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥। ४ ॥

ताण्डवनृत्त के प्रयोग की यह विधि कही गई है । नाट्यवेद के विधान के विषय में तुम'लोगों को और क्या बतलाया जाए? ॥ ३२० ॥

|| इस प्रकार भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र की ' नाट्यप्रदीप' नामक हिन्दी व्याख्या का ताण्डवलक्षण नामक चतुर्थ अध्याय की पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥

पृष्ठ 257

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १, पृष्ठ 257 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथ पञ्चमोऽध्यायः भरतमुनि से ऋषियों की पूर्वरङ्ग के स्वरूप की जिज्ञासा- । भरतस्य वचः श्रुत्वा नाट्यसन्तानकारणम्' ॥ १ ॥ पुनरेवाब्रुवन् वाक्यमृषयो हृष्टमानसाः

यथा नाट्यस्य जन्मेदं जर्जरस्य च सम्भवः ।

विघ्नानां शमनं चैव देवतानां च पूजनम् ॥ २ ॥

तदस्माभिः श्रुतं सर्वं गृहीत्वा चावधारितम् । ॥ ३ ॥ निखिलेन यथातत्त्वमिच्छामो वेदितुं पुनः

। पूर्वरङ्गं महातेजः सर्वलक्षणसंयुतम् ॥ ४ ॥ यथा बुद्धयामहे ब्रह्मस्तथा व्याख्यातुमर्हसि

नाटय के विषय को बताते रहने वाले आचार्य भरत से हर्षित मन वाले ऋषि-गण बोले- हे मुनि! आपसे हमलोगों ने नाट्य की उत्पत्ति, जर्जर का उद्गम, नाट्यविघ्नों का शमन तथा ( रङ्गमञ्च के ) देवताओं की पूजा की विधि सुनी । अब हमें भेदों एवं प्रभेदों के साथ एवं लक्षणों से युक्त पूर्व रङ्ग के स्वरूप की जानने की जिज्ञासा है । जिस तरह से हम समझ सकें कृपया उस तरह से आप उसकी

व्याख्या कीजिए । १-४ ॥

भरतमुनि द्वारा पूर्वरङ्ग के स्वरूप का वर्णन— तेषां तु वचनं श्रुत्वा मुनीनां भरतो मुनिः ॥। ५ ॥ प्रत्युवाच पुनर्वाक्यं पूर्वरङ्गविधि प्रति । पूर्वरङ्गं महाभागा गदतो मे निबोधत पादभागाः कलाश्चैव परिवर्तास्तथैव च ॥ ६ ॥

ऋषिगणों की बातें सुनकर 'पूर्वरङ्ग विधान ' के विषय में भरतमुनि ने कहा- हे महाभाग! मैं आपलोगों को पूर्वरङ्ग तथा उससे सम्बन्धित जिन पादभाग', १. 'लक्षणम्' इति वा पाठः । २. पादभाग - अभिनवगुप्त के मत में मात्राओं के संयोग से पादभाग का निर्माण होता है । श्री घोष का विचार है कि इसका ताल से सम्बन्ध होता है । संगीत रत्नाकर में चित्र, वार्तिक, दक्षिण एवं ध्रुव मार्ग में क्रमशः एक, दो, चार तथा आठ

पृष्ठ 258

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १, पृष्ठ 258 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पञ्चमोऽध्यायः १६ ९ कलाओं', एवं पादपरिवत' के विषय में बतलाता हूँ उनको आप सुनिये ॥ ५-६ ॥ पूर्वरङ्ग नामकरण का कारण— ` यस्माद्रङ्गप्रयोगोऽयं । पूर्वमेव प्रयुज्यते विज्ञेयो द्विजसत्तमाः ॥ ७ ॥ तस्मादयं पूर्व रङ्गो

क्योंकि रङ्गपीठ पर इसका सम्पादन नाट्यप्रयोग में सर्वप्रथम किया जाता है ।

अतः इसे पूर्वरङ्ग कहा जाता है ॥ ७ ॥

मात्राओं से एक पादभाग के निर्माण का विधान किया गया है । इस विषय में ३१.३०८-३०९ में भी विचार किया गया है । १. कला -वस्तुतः कला संगीतशास्त्र का एक पारिभाषिक शब्द है जो कि समय के पैमाने के रूप में स्वीकृत है । यों तो कला का समय ज्योतिष आदि शास्त्रों में एक निमेष के तुल्य माना जाता है किन्तु संगीत में कला का समय पाँच निमेष का माना जाता है । इस विषय में अभिनवगुप्त का मत है कि कला शब्द से निष्क्रामादि सात भेदों वाले ताल का बोध होता है, अर्थात् ताल का मात्राकाल 'कला' है -' अत्र कलाशब्देन सप्तविधा तालकला निष्क्रामादिरुच्यते । तथा समस्तो मानात्म कस्तालमार्गों गृहीतः ।" ताल उस समय को कहा जाता है जो गीत, वाद्य एवं नृत्य को परिमित करता है । कला का विशेष परिचय नाट्यशास्त्र के इकत्तीसवें अध्याय के ४-५ श्लोकों में दिया गया है । २. परिवर्त -पादभाग से युक्त ताल की आवृत्ति को 'परिवर्त' कहा जाता है । अभिनवगुप्त का कथन है कि गोलाकार घूमना ही परिवर्त है । ( परिवर्तन्त इति परिवर्ताः ) । घूमने का कार्य पैरों से ही सम्भव है । अतः पैरों के गोलाकार घूमने का ही नाम पादपरिवर्त कहा जाएगा । इसी अध्याय के पाँचवें, एवं पैंसठ से नवासी श्लोकों में परिवर्त का विशेष परिचय दिया गया है । ३. 'यस्माद्रङ्गळे प्रयोगोऽयं' इति वा पाठ: । – " ४. पूर्वरङ्ग कलापाताः पादभागाः परिवर्ताश्च सूरिभिः । पूर्व क्रियते यद्रङ्ङ्गैः पूर्वरङ्गो भवेदतः ॥। भावप्रकाश की इस व्याख्या के अनुसार सर्वप्रथम किए जाने वाले कलापात, पादभाग एवं परिवर्त की संज्ञा पूर्वरङ्ग है । अभिनवगुप्त का विचार हैं कि पूर्वरङ्ग शब्द की व्युत्पत्ति दो प्रकार से की जा सकती है ( अ) पूर्वोरङ्ग पूर्वरङ्गः – ऐसा सुप्सुपा समास माना जा सकता है । (ब ) राजदन्तादित्वात् परनिपात् -ऐसा माना जा सकता है 1। वह सारी क्रियायें जो कि नाट्य की सफलता के लिए

पृष्ठ 259

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १, पृष्ठ 259 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१७० नाट्यशास्त्रम् पूर्वरङ्ग के अङ्ग- अस्याङ्गानि तु कार्याणि यथावदनुपूर्वशः । ॥ ८ ॥ तन्त्रीभाण्डसमायोगैः पाठ्ययोगकृतैस्तथा

। प्रत्याहारोऽवतरणं तथा ह्यारम्भ एव च आश्रावणा वक्त्रपाणिस्तथा च परिघट्टना ॥ ९ ॥

सङ्घोटना ततः कार्या मार्गासारितमेव च । ॥ १० ॥ ज्येष्ठमध्य -कनिष्ठानि तथैवासारितानि च

। एतानि तु बहिर्गीतान्यन्तर्यवनिकागतैः प्रयोक्तृभिः प्रयोज्यानि तन्त्री भाण्डकृतानि च ॥ ११ ॥

इस पूर्वरङ्ग के अङ्ग तन्त्री वाद्य ( वीणादि ), भाण्ड वाद्य (मृदङ्गादि ) एवं संवाद (पाठ्य अंश ) के साथ क्रमशः प्रयोग किए जाने चाहिए । इन अङ्गों के नाम प्रस्तुत हैं -- प्रत्याहार, अवतरण, आरम्भ, आश्रावणा, वक्त्रपाणि, परिघट्टना, संघोटना, मार्गासारित तथा ज्येष्ठ, मध्यम एवं कनिष्ठ आसारित । यवनिका के पीछे स्थित प्रयोक्ताओं को चाहिए कि ( तन्त्री तथा भाण्डवाद्य के साथ ) ( इन वास्तविक प्रयोग के पूर्व की जाती हैं ' पूर्वरङ्ग' कही जाती हैं । अभिनवभारती-कार का तर्क है कि यथा तन्तु, तुरी, वेमा आदि के अभाव में पट का निर्माण असम्भव है । उसी भाँति प्रत्याहारादि अङ्गों के पूर्ण प्रयोग से गायन आदि समस्त साधनों का संयोग होने पर नाट्य प्रयोग सफल हो सकता है ( न ह्यहो किल तन्तु- तुरीवेमादे: ( विना ) शक्यः पटः कर्तुम् ) । श्रीहर्ष के मत में रङ्गशब्द का अर्थ तौर्यत्रिक है । वही नाट्चाङ्ग प्रयोग का पूर्व अङ्ग होता है । अतः ' पूर्वरङ्ग' पद का समासविच्छेद होगा- पूर्वश्चासौ मन्यमानःरङ्गः ( श्रीहर्षस्तुपूर्वश्चासौरङ्गशब्देनरङ्ग तौर्यत्रिकंइति समासममंस्तब्रुवन् नाट्याङ्गप्रयोगस्य) । किन्तु तस्यैवश्रीहर्ष पूर्वरङ्गतांका मत अभिनवगुप्त को मान्य नहीं है । उनका विचार है कि यह मण्डप के किसी देश जैसा भाग नहीं है, किन्तु जैसे धूपादि से देवता की तुष्टि होती है उसी भाँति लौकिक अलौकिक फलशाली कार्य होने से यहाँ 'पूर्वी रङ्गे इति पूर्व रङ्गः ' इस प्रकार की व्याख्या ही उचित है ( रङ्गस्य पूर्वो भाग इति त्वसत् । न ह्ययं मण्डपस्यैकदेशः । नापि नाट्यस्य । न ह्ययं भावानुकीर्तनात्मकव्याख्यानानुकारस्वभावः । अपि तु शिक्षा- दिवत्पारमार्थिक एव प्रयोगसम्पत्त्युपकरणभूतो भोजनादितुल्यः प्रत्याहारादिरर्थः । .. देवतापरितोषणफलं धूपविलेपनादिदानवत् सत्यमेवेति पूर्वो रङ्ग इत्येष एवं ( समासः ) ।

पृष्ठ 260

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १, पृष्ठ 260 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पञ्चमोऽध्यायः १७१ बहिगीतों को) प्रस्तुत करें ॥ ८-११ ॥

पूर्वरङ्ग के प्रयोग की विधि- ततः सर्वैस्तु कुतपैः संयुक्तानीह कारयेत् ।

विघटय वै यवनिकां नृत्तपाठ्यकृतानि तु ॥। १२ ॥

गीतानां मद्रकादीनां योज्यमेकं तु गीतकम् ।

१३ ॥ वर्धमानमथापीह ताण्डवं यत्र युज्यते ॥ ततश्चोत्थापनं कार्यं परिवर्तनमेव च ।

नान्दी शुष्कावकृष्टा च रङ्गद्वारं तथैव च ॥ १४ ॥

चारी चैव ततः कार्या महाचारी तथैव च ।

त्रिकं प्ररोचना चापि पूर्वरङ्गे भवन्ति हि ॥। १५ ॥

इसके पश्चात् ' यवनिका " को ऊपर उठाकर वाद्यवादन के साथ नृत्त तथा पाठ्य का सम्पादन करना चाहिए मद्रक' जाति के गीतों में से एक गीत अथवा 'भाण्डव' का प्रयोग किए जाने पर वर्धमानक गीतों में से एक गीत का प्रयोगः करना चाहिए और फिर क्रमशः उत्थापन, परिवर्तन, नान्दी, शुष्कावकृष्टा, रङ्गद्वार, चारी, महाचारी, त्रिक एवं प्ररोचना का प्रयोग किया जाना चाहिए. ॥ १२-१५ ॥ एतान्यङ्गानिएतेषां लक्षणमहंकार्याणि व्याख्यास्याम्यनुपूर्वशःपूर्वरङ्गविधौ द्विजाः ॥। १६ ॥ इन अङ्गों का प्रयोग पूर्वरङ्ग के विधान में विद्वानों द्वारा अवश्य किया जाना चाहिए । अब मैं क्रम से इन ( अङ्गों) के लक्षणों की व्याख्या करता हूँ ॥ १६ ॥

कुतपस्य तु विन्यासः प्रत्याहार इति स्मृतः ।

तथावतरणं प्रोक्तं गायिकानां निवेशनम् ॥ १७ ॥

प्रत्याहार - वाद्यों को उचित स्थान पर व्यवस्थित करने को 'प्रत्याहार' कहा १. बहिर्गीत -जिन गीतों के गायक अदृश्य हों अथवा जो गीत नाटयवस्तु के अन्तर्गत न आते हों उन्हें ' बहिर्गीत ' कहा जाता है । २. यवनिका -श्री घोष के मत में यवनिका का अर्थ आगे वाले पर्दे से है जो कि आधुनिक पर्दे की भाँति होता है । उनका यह भी अभिमत है कि पूर्वरङ्ग की प्रथम नौ क्रियायें यवनिका के गिरे रहने पर ही सम्पन्न की जाती थीं । ३. मद्रक - मद्रक एक गीतविशेष की जाति का नाम है । मद्रक तथा वर्धमानक गीतों की विशेष परिचर्चा नाट्यशास्त्र के उन्तीसवें एवं इकतीसवें अध्याय में की गयी है ।