भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 241–250
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 241–250
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१५२ नाट्यशास्त्रम् अतश्चैव प्रतिक्षेपाद् भूतसङ्घैः प्रवर्तिताः ॥ २६६ ॥
विवाह, बालक के जन्म, बारात के अवसर, मनोरंजन तथा विजयोल्लास के अवसर पर यह नृत्त आमोदकारी होता है, इसीलिए इस नृत्त को सृष्टि की गई है । इस प्रकार भूतगणों ने नृत्त को सुष्ठुरीत्या विभाजित करने के विचित्र गीतादि में'प्रयुक्त होने वाले प्रतिक्षेपों' को प्रवर्तित किया ॥ २६५-२६६ ॥
ताण्डव नृत्य का प्रयोग- ये गीतकादी युज्यन्ते सम्यनृत्तविभागकाः ।
देवेन चापि सम्प्रोक्तस्तण्डुस्ताण्डवपूर्वकम् ॥ २६७ ॥
गीत प्रयोगमाश्रित्य नृत्तमेतत्प्रवर्त्यताम् । भगवान् शङ्कर ने ताण्डव नृत्त के प्रयोग के साथ' तण्डु को बतलाया कि इस वृत्त का प्रयोग गीतों के प्रयोग के आधार पर ही किया जाना चाहिए ॥ २६७-२६८ ॥ ताण्डव नृत्य के प्रयोग के स्थल - प्रायेण ताण्डव विधिर्देवस्तुत्याश्रयो भवेत् ॥ २६८ ॥ सुकुमारप्रयोगश्च शृङ्गाररससम्भवः ।
प्रायः ताण्डव [ नृत्य ] का प्रयोग देवताओं की वन्दना के लिया है । श्रृंगार रस १. प्रतिक्षेपों का लक्षण नाट्यशास्त्र में अनुपलब्ध है । ( इदं भरतमुनिना न क्वचित्लक्षितम् । ) अग्निपुराण के आधार पर अभिनव ने इसे अतिशय स्तुति से युक्त गीत विशेष का नाम माना है । [ प्रचुर स्तुतियुक्तो गतिविशेषः प्रतिक्षेपः । ] 'अभिनवगुप्त ने अन्य आचार्यों का मत भी उद्धृत किया है । तदनुसार इसका अर्थ गीत के अर्थ में अङ्गों के विक्षेप से किए जाने वाले वैचित्र्य आश्रित नृत्य से लिया गया है । अ ० १, पृ ० १७ ९ अन्ये तु गीतान्ते प्रयोज्या छन्दकादय एव नृत्तवैचि- त्र्याश्रया यथारुचि प्रतिक्षिप्यमाणांगकाः प्रतिक्षेपाः ] नाट्यशास्त्र में वाद्ययन्त्रों को क्षेप प्रतिक्षेप से बजाए जाने का कथन है । [ ना० शा० ४-३०० ] जिसके आधार पर यहाँ प्रतिक्षेप का अर्थ होगा कि वाद्ययन्त्रों के प्रतिक्षेप द्वारा नृत्त को सम्यक् रूपेण विभाजित किया जा सकता है । २. अभिनवगुप्त ने जिस पाठ को आधार मान कर व्याख्या की है तदनुसार यहाँ "सन्तोषपूर्वक " पाठ होना चाहिए था । श्री घोष ने इसी पाठ को अधिक उचित भी माना है । तब इस श्लोक के पूर्वार्ध का अर्थ होगा -"भगवान् शङ्कर ने संतोषपूर्वक तण्डु को बतलाया'
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चतुर्थोऽध्यायः १५३ से उद्भूत [ भावों के प्रयोग की दशा में ] ताण्डव का प्रयोग सुकुमार रूप में भी होता है ॥ २६८-२६९ ॥ वर्धमानक लक्षण - तस्यवर्धमानतण्डुप्रयुक्तस्यकमासाद्य ताण्डवस्यसंप्रवक्ष्यामि विधिक्रियाम्लक्षणम् ॥ । २६ ९ ॥ अब मैं वर्धमानक के सन्दर्भ में तण्डुमुनि से कहे गये 'ताण्डव' नृत्त के लक्षण बतलाऊँगा ॥ २६ ९ -२७० ॥ कलानां वृद्धिमासाद्य यक्षराणां च वर्धनात् ॥ २७० ॥
। लयस्य वर्धनाच्चापि वर्धमानकमुच्यते (क्योंकि) यह कला को बढ़ाता है ', अक्षर की वृद्धि करता है एवं लय में योग प्रदान करता है' अतः इसे 'वर्धमानक " कहा जाता है ॥ २७०-२७१ ॥ वर्धमानक प्रयोग विधि- कृत्वा कुतपविन्यासं यथावद् द्विजसत्तमाः! ॥ २७१ ॥
आसारितप्रयोगस्तु ततः कार्यः प्रयोक्तृभिः । हे द्विजोत्तम गण! बाद्ययंत्रों" को यथा स्थान व्यवस्थित करके ताट्यप्रयोक्ताओं को आसारित का प्रयोग करना चाहिए ॥ २७१-२७२ ॥ तत्र तूपोहनं कृत्वा तन्त्रीगानसमन्वितम् ॥ २७२ ॥
कार्यः प्रवेशो नर्तक्या भाण्डवाद्यसमन्वितः । १. समय के ८ पल के विभाग को यहाँ कला माना गया है । चार मात्रा का एक कल होता है । सत्तर कलों की कनिष्ठा, तैंतीस की मध्यम और पैंसठ की ज्येष्ठ कला होती है । इन कलाओं की लय एवं संख्या दोनों माध्यमों से वृद्धि होती है ( कलानां लयद्वारेण संख्याद्वारेण च वृद्धिः । ) २. समय के मात्रा काल की वृद्धि होने से अक्षर की भी वृद्धि होती है । अभिनव- गुप्त का विचार है कि जैसे जैसे कला एवं अक्षरों की वृद्धि होती है, वैसे ही नर्त- कियों की भी वृद्धि होती है । इस प्रकार प्रथम आसरितवृत्त में एक, द्वितीय आसारित में दो एवं आगे भी इसी तरह वृद्धिशील नर्तकियां होती है । ३. समय की वृद्धि से लय में भी वृद्धि हो जाती है । ४. वृद्धि होते जाने के कारण इसकी संज्ञा वर्धमानक है । जैसा कि अभिनवगुप्त की स्पष्टोक्ति है - अतो वृद्धियोगाद्वर्धमानकम्? ” ५. कुतप - 'चतुविधमातोद्यं कुतपम्' अभिनव की इस व्याख्या के अनुसार आतोद्य वाद्य की संज्ञा कुतप है ।
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१५४ नाट्यशास्त्रम् इसके बाद तंत्र वाद्य पर गान ' के साथ उपोहन' का प्रयोग करने के उपरान्त पुष्कर वाद्य के वादन के साथ नर्तकी का ( रंगमंच पर ) प्रवेश होना चाहिए ॥। २७२-२७३ ॥ विशुद्धकरणायां तु जात्यां वाद्यं प्रयोजयेत् ॥ २७३ ॥
गत्या वाद्यानुसारिण्या तस्याश्चारीं प्रयोजयेत् । इस समय विशुद्धकरणों और जातियों से युक्त वाद्यसंगीत का प्रयोजन करना चाहिए और फिर वाद्य ( के ताल ) के अनुकूल गति से चारों का प्रयोग किया जाना चाहिए ॥ २७३-२७४ ॥ नर्तकी का प्रवेश वैशाखस्थान के नेह सर्वरेचकचारिणी ॥। २७४ ॥ पुष्पाञ्जलिधरा भूत्वा प्रविशेद्रङ्गमण्डपम् । वैशाखस्थान में सभी ( चतुविध ) रेचकों का प्रयोग करते हुए अंजलि में पुष्प लेकर नर्तकी को रङ्गमण्डप पर प्रवेश करना चाहिए ॥ २७४-२७५ ॥ प्रणम्यपुष्पाञ्जलिदेवताभ्यश्चविसृज्याथ रङ्गपीठंततोऽभिनयमाचरेत्परीत्य च ॥। २७५ ॥ अञ्जलि से पुष्प गिराते हुए रङ्गपीठ पर चारों ओर घूमकर देवताओं को प्रणाम करते हुए अभिनय को प्रारम्भ करना चाहिए ॥ २७५-२७६ ॥ १. गान - सुषिर वाद्य ( वंशी ) तथा आतोद्य ( तारयुक्त बाजे ) के प्रयोग के साथ स्वरयुक्त गाने को गान कहते हैं ( अभिगानं सुषिरातोद्यम्, गीयते यतः स्थान-स्वरादिति गानम्, तेन घनावनद्धातोस्यात्र निरासः ) २. उपोहन - अभिनवगुप्त के मत में कनिष्ठासारित में पञ्चकलों के अन्तर्गत शुष्काक्षर के प्रयोग को उपोहन कहा जाता है । ( उपोहनं शुष्काक्षरं कनिष्ठासारिते पञ्चकलम् । ). ३ एकाक्षरं विशुद्धायां वाद्यं स्यात्सर्वमार्गकम् । द्ध, द्ध, खो खो, णा णादि या विहितवाक्या । सा शुद्धा विज्ञेया मध्यस्त्रीणां समा जातिः ॥ ( ना० ३४-१३६-१३८ ) नाट्यशास्त्र के इस उद्धरण के अनुरूप यहाँ एकाक्षर प्रयोग का संकेत है जिसके अनुसार द्ध खो, णा एवं रुन्दहि प्रयोक्तव्य है । ४. अभिनव के अनुसार यहाँ तलपुष्पपुट करण का प्रयोग किया जाना अपेक्षित है ।
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चतुर्थोऽध्यायः १५५ गीतयुक्त अभिनय में वाद्ययंत्र प्रयोग का निषेध-- यत्राभिनेयं गीतं स्यात्तत्र वाद्यं न योजयेत् ॥ २७६ ॥
अङ्गहारप्रयोगे तु भाण्डवाद्यं विधीयते । जब गीत के साथ अभिनय प्रदर्शित किया जा रहा हो तो उसके साथ वाद्य यन्त्रों का उपयोग नहीं करना चाहिए, किन्तु अङ्गहारों के प्रयोग के समय भाण्ड वाद्य का उपयोग किया जाना चाहिए ॥ २७६-२७७ ॥ ताण्डव में प्रयुक्त वाद्ययंत्र का लक्षण - समं रक्त विभक्त च स्फुटं शुद्धप्रहारजम् ॥ २७७ ॥
नृताङ्गग्राहि वाद्यज्ञैर्वाद्यं योज्यं तु ताण्डवे । ताण्डव में जिस वाद्य का प्रयोग किया जाय उसे सम, रक्त, विभक्त, स्फुट, तथा नृत्त के विभागों का अनुसरण करने वाला होना चाहिए ॥ २७७-२७८ ॥ नर्तकी का निष्क्रमण तथा अन्य नर्तकियों का प्रवेश- प्रयुज्य गीतवाद्ये तु निष्क्रामन्नर्तकी ततः ॥ २७८ ॥
अनेनैव विधानेन प्रविशन्त्यपराः पृथक् । इस प्रकार गीत एवं वाद्य का प्रयोग करने के बाद नर्तकी को निकल जाना चाहिए । फिर इसी प्रकार अन्य नर्तकियों को अलग से प्रवेश करना चाहिए ॥ २७८-२७९ ॥ पर्यस्तक व पिण्डीबन्ध के प्रयोग के बाद नर्तकियों का निष्क्रमण - अन्याश्चानुक्रमेणाथ पिण्डीं बध्नन्ति याः स्त्रियः ॥ २७ ९ ॥
तावत्पर्यस्तकः कार्यो यावत्पिण्डी न बध्यते ।
पिण्डों बध्वा ततः सर्वा निष्क्रामेयुः स्त्रियस्तु ताः ॥ २८० ॥
यह नर्तकियाँ जव तक क्रम से ' पिण्डी बन्ध की रचना न करें तब तक १. रक्त - अभिनवगुप्त की व्याख्या के अनुसार अक्षर, अङ्गताल, लय, मात्रा काल आदि के सम प्रयोग, एवं स्वरों के द्विधा ऊच्चारणस्थान से रक्त नामक प्रयोग किया जाता है- " अक्षराङ्गताललययतिपाणिग्रहन्यास विकृतमष्टविधकालदेशसम- तात्मकं साम्यं पुष्काराध्याये च वक्ष्यते । तत्र षोढा तालकृतम् । द्विधा स्वरोच्चारण- स्थानदेशकृतम् । तद्योगात् समरक्तभावः शब्दस्य हृद्यस्वरूपता ।" ( पृ० १६८ ) २. अभिनवगुप्त ने यहाँ हट कर रङ्गमश्व पर ही अलग चले जाने का अर्थ लिया है, सर्वथा चले जाने का नहीं ( सा तु निष्क्रामेदपसरेत् । न तु सर्वथैव निर्गच्छेत् । ) ३. अनुक्रम - अभिनवगुप्त के मत में यहाँ कनिष्ठा आदि चारों भेदों का ही तात्पर्य है ।
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१५६ नाट्यशास्त्रम् पर्यस्तक' का सम्पादन किया जाना चाहिए । पिण्डीबन्ध के प्रयोग के बाद सभी नर्तकियों को निष्क्रमण कर जाना चाहिए ॥ २७ ९-२८० ॥ पिण्डीबन्धों के प्रयोग के समय वाद्ययंत्र वादन- विधि- पिण्डीबन्धेषुपर्यस्तकप्रमाणेनवाद्यं तु चित्रौघकरणान्वितम्कर्तव्यमिह वादकैः ॥॥ २८१ ॥ इन पिण्डी बन्धों के प्रयोग के अवसर पर वादकों को पर्यस्तक के समय प्रयुक्त
वाद्यवादन की भाँति अनेक तरह के ओघ तथा करणों से युक्त वाद्यों का वादन करना चाहिए ॥ २८१ ॥
उपोहन तथा आसारित गायन - तत्रोप भूयः कार्यं पूर्ववदेव हि । ततश्चासारितं भूयो गायनं तु प्रयोजयेत् ॥ २८२ ॥
इसके पश्चात् पहले की ही तरह फिर से उपोहन का प्रयोग करना चाहिए और इसी तरह आसारित गायन का भी प्रयोग करना चाहिए ॥ २८२ ॥
नर्तकी द्वारा द्वितीय आसारित गान का अभिनय- पूर्वेणैव विधानेन प्रविशेच्चापि नर्तकी । गीतकार्थं त्वभिनयेद् द्वितीयासारितस्य तु ॥ २८३ ॥
पूर्वोक्त विधान के ही अनुरूप नर्तकी का प्रवेश होना चाहिए और उसे द्वितीय आसारित गान के अर्थ का अभिनय करना चाहिए ॥ २८३ ॥
नृत्त प्रदर्शन तथा नर्तकी निष्क्रमण
तदेव च पुनर्वस्तु नृत्तेनापि प्रदर्शयेत् ।
आसारित समाप्ते तु निष्क्रामेन्नर्तकी ततः ॥ २८४ ॥
पूर्ववत् ही नृत्त के द्वारा पुनः वस्तु को प्रदर्शित करना चाहिए और इस १. पर्यस्तक — अभिनव के अनुसार विशेष अङ्गविक्षेप का नाम पर्यस्तक है । ( महावाक्यानुसारादेकथन एव वाहिन्यात्मकोङ्गविक्षेपो यत्र प्रयोगे स पर्यस्तक: ) । अथवा जिस अवस्था में अभिनय नहीं किया जाता उस दशा को पर्यस्तक कहते हैं-( अभिनयशून्यामाङ्गिकविधिः पर्यस्तकः । ) २. अभिनवसम्मतोऽयं पाठः । 'अथोपवाहनम्' अथवा 'तत्रैवोपोहनम्' इति वा पाठ: । ३. वस्तु से यहाँ पर श्री घोष ने पदवस्तु का अभिप्राय लिया है ।
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चतुर्थोऽध्यायः १५७ प्रकार आसारित को पूर्ण करके नर्तकी को निकल जाना चाहिए ॥ २८४ ॥
अन्य नर्तकियों का प्रवेश तथा आसारित गीत का अभिनय-- पूर्ववत्प्रविन्त्यन्याः प्रयोगः स्यात्स एव हि । एवं पदे पदे कार्यो विधिरासारितस्य तु ॥ २८५ ॥
तब पहले की ही तरह अन्य नर्तकियां प्रविष्ट होती हैं और वही प्रयोग पुनः प्रदर्शित किया जाता है । इस भाँति एक एक पद पर आसारित प्रयोग की विधि का अनुकरण करना चाहिए' ॥ २८५ ॥
गायन विधि- भाण्डवाद्यकृते चैव तथा गानकृतेऽपि च ।
एका तु प्रथमं योज्या द्वे द्वितीयं तथैव च ॥ २८६ ॥
तिस्रो वस्तु तृतीयं तु चतस्रस्तु चतुर्थकम् । वाद्यवादन एवं गीत के गायन में गीत का प्रथम पाद एक बार, दूसरा पाद दो बार, तीसरा तीन बार और चौथा चार बार गाया जाता है ॥ २८६-२८७ ॥ पिण्डी के चार प्रकार- पिण्डीनां विधयश्चैव चत्वारः सम्प्रकीर्तिताः ॥ २८७ ॥
पिण्डी शृङ्खलिका चैव लताबन्धोऽथ भेद्यकः । पिण्डी के चार प्रकार कहे गये हैं - पिण्डी, शृङ्खलिका, लताबन्ध तथा भेद्यक ॥ २८७-२८८ ॥ पिण्डी बन्ध के चारों नामों की निरुक्तियाँ- पिण्डीबन्धस्तु पिण्डत्वाद् गुल्मः शृङ्खलिका भवेत् ॥ २८८ ॥
जालोपनद्धा च लता सनृत्तो भेद्यकः स्मृतः । पिण्डी या पिण्डीबन्ध नाम इस कारण है कि यह पिण्डीभूत होता है, गुच्छे (गुल्म ) होने से शृङ्खलिका, जाल में फँसे होने से लताबन्ध, और एक अलग नर्तकी के द्वारा नृत्य में प्रयुक्त होने से भेद्यक कही जाती है' ॥ २८८-२८९ ॥ १. अर्थात् प्रत्येक बार नर्तकी ही पहले की भांति प्रवेश, नृत्य एवं निष्क्रमण नहीं करती अपितु वादक एवं गायकगण भी पूर्वविहित विधि का यथावत् अनुकरण-करते हैं । २. अपरेनृ त्तभेदास्तु गुल्मशृङ्खलिका लताः । भेद्यकश्चेति चत्वारः कथ्यन्ते च मनीषिभिः ।
गुल्मः संभूय यन्नृत्तं शृङ्खलान्योन्यबन्धनी ।
एकैकस्य बहिः संघान्नृत्तं यत्स च भेद्यकः ॥
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१1८ नाट्यशास्त्रम् तीनों आसारितों के पिण्डीबन्ध - पिण्डीबन्धः कनिष्ठे तु शृङ्खला तु लयान्तरे ॥ २८ ९ ॥ मध्यमे च लताबन्धो ज्येष्ठे चैवाथ भेद्यकः । कनिष्ठ आसारित में पिण्डीबन्ध का, (लय के ) अन्तर में शृङ्खला का मध्य (आसारित ) में लताबन्ध का और ज्येष्ठ आसारित में भेद्यक का प्रयोग किया जाता है ॥ २८ ९-२ ९ ० ॥ पिण्डी के उद्गम के दो प्रकार- पिण्डीनां विविधा योनिर्यन्त्रं भद्रासनं तथा ॥ २ ९ ० ॥
शिक्षायोगस्तथा चैव प्रयोक्तव्यः प्रयोक्तृभिः ।
एवं प्रयोगः कर्तव्यो वर्धमाने तपोधनाः ॥ २ ९ १ ॥
पिण्डी का उद्गम दो प्रकार से होता है- एक यन्त्र तथा दूसरा भद्रासन । परस्पराङ्गवेष्टेन यन्नृत्तं सा लता मता । पिण्डीबन्धश्च गुल्मश्च पर्यायाविति केचन । -भाव-प्रकाश पृ ० २४६ प्रस्तुत व्याख्या के अनुसार जब नर्तकियाँ सामूहिक रूप से नृत्य करती हैं तो पिण्डी, एक दूसरे का हाथ पकड़ कर गुल्म रूप में नृत्य करने पर शृङ्खलिका, बाहों में बाहें फंसा कर नृत्य करने पर लताबन्ध और अलग अलग बिखर कर नृत्य करने पर भेद्यक नामक पिण्डोबन्ध होते हैं । भरत ने पिण्डीबन्ध का जो निरूपण किया है यह इससे काफी भिन्न है । अभिनवगुप्त ने सजातीय एवं विजातीय के भेद से इन पिण्डीबन्धों के दो प्रकार माने हैं । इनमें से सजातीय वे हैं जो एक नाल में बँधे कमलों के समान होते हैं और विजातीय वे हैं जो उस कमल की भांति हैं जिसकी नाल को हंस ने ग्रहण कर+ ( ) लिया है पिण्डीबन्धद्वयप्रकारः सजातीयो वा विजातीयौ वा । १. लय के अन्तर से श्री घोष ने संक्रमण का तात्पर्य लिया है । २. अभिनवगुप्त का कहना है कि पिण्डीभेद आधार-भेद से सम्पन्न होता है । -अर्थात् कनिष्ठ आसारित में शुद्ध पिण्डीबन्ध का इसी में लय का भेद होने पर शृङ्खला का, मध्यम आसारित में लताबन्ध का और ज्येष्ठ आसारित में भेद्यक -पिण्डीबन्ध का प्रयोग किया जाता है । ३. श्रीघोष के विचार में यह श्लोक अस्पष्ट है । यन्त्र एवं भद्रासन की अभिनव -गुप्त कृत व्याख्याएँ उन्हें सन्तुष्ट नहीं कर पातीं । अभिनव ने भूमि देह आकाश -आदि आधारखण्डलक के अनुसन्धान को यन्त्र माना है ( यत्र पुत्रकादीनां यथा पृथ-
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चतुर्थोऽध्यायः १५९ प्रयोक्तागणों को शिक्षाग्रहण करके इनका प्रयोग करना चाहिए । हे तपस्वियो! इसी प्रकार प्रयोक्ताओं द्वारा वर्धमानक का भी प्रयोग किया जाना चाहिए ॥ २ ९ ० २ ९ १ । गीतों तथा छन्दकों की प्रयोग विधि-
गीतानां छन्दकानां च भूयो वक्ष्याम्यहं विधिम् ।
यानि वस्तुनिबद्धानि चाङ्गकृतानि तु ॥ २ ९ २ ॥
गीतानि तेषां वक्ष्यामि प्रयोगं नृत्तवाद्ययोः । तत्रावतरणं कार्यं नर्तक्याः सार्वभाण्डिकम् ॥ २ ९ ३ ॥ ' अब मैं फिरक्षेपप्रतिक्षेपकृतंसे गीतों तथा छन्दकों की प्रयोगभाण्डोपोहनसंस्कृतम्विधि बताऊँगा । जो। गीत विषय वस्तु से निबद्ध हैं और जो अङ्गों से युक्त हैं उनके तथा उनके साथ प्रयुक्त वाद्यों व वृत्तों के प्रयोग को बतलाऊंगा । गीत तथा नृत्त के प्रयोग के समय नर्तकी प्रवेश करती है, भाण्ड एवं अवनद्ध वाद्य बजाए जाते हैं तथा क्षेप प्रतिक्षेप के साथ भाण्डवाद्य का वादन किया जाता है ॥ २ ९२-२९ ४ ॥ प्रथमं त्वभिनेयं स्याद् गीतके सर्ववस्तुकम् ॥ २ ९ ४ ॥ तदेव च पुनर्वस्तु नृत्तेनापि प्रदर्शयेत् । *भूताङ्गानामनुसन्धिस्तथेव भूमिदेहाकाराद्याधारखण्डलकाद्यनुसन्धनं यन्त्रम् । ) भद्रासन से अभिनव ने भूमि आदि पर आसन का तात्पर्यं लिया है (भद्रं स्फुट. मेवेत्यस्थासनं स्थानं भूम्यादौ स्फुटमेव दर्शनादित्येकभेदसंग्रहः ) । डा० रघुवंश ने यन्त्र तथा भद्रासन की जो व्याख्या दी है तदनुसार यन्त्र से यहाँ विविध प्रकार के वाद्यों का तात्पर्य है तथा भद्रासन से पैरों के द्वारा ताल देने की स्थितियों का संकेत है । यही विश्लेषण हमें भी समीचीन प्रतीत होता है । १. 'तन्त्रीगानसमन्वितम्' इति वा पाठः । २. प्रथम वस्तु से उपोहन करके क्षेत्र का और द्वितीय वस्तु से प्रत्युपोहन करके प्रतिक्षेप का प्रयोग किया जाता है । जैसा कि अभिनव का कथन है – “ ये क्षेपः प्रथम वस्त्वादावुपोहनानि ये च प्रतिक्षेपाः द्वितीयवस्त्वादिषु प्रत्युपोहनानि........। ” अभिनव ने अन्यमत उद्धृत किया है । तदनुसार अन्तर्भूत पृथक्कालात्मक गीत की वस्तु को तन्त्री के माध्यम से क्षेपप्रतिक्षेप विधि द्वारा व्यंजित करना चाहिए । फिर भाण्डवाद्यों के प्रयोग के साथ नर्तकी का आगमन होता है । डा० रघुवंश ने अन्य मत उद्धृत किया है जिसके अनुसार पहले वस्तु में आक्षिप्तिका तथा पोहन का प्रयोग होता है, फिर नर्तकी का प्रवेश होता है ।
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१६० नाट्यशास्त्रम् सर्वप्रथम गीत की समस्त विषयवस्तु को ( मुद्राओं द्वारा ) अभिनीत किया जाना चाहिए, तदनन्तर फिर उसी विषयवस्तु को नृत्त के माध्यम से प्रदर्शित करना चाहिए ॥ २ ९४-२९ ५ ॥ यो विधिः पूर्वमुक्तस्तु नृत्ताभिनयवादिते ॥ २ ९ ५ ॥
आसारितविधौ स स्याद् गीतानां वस्तु केष्वषि ।
एवं वस्तुनिबन्धानां गीतकानां विधिः स्मृतः ॥ २ ९ ६ ॥
नृत्त, अभिनय तथा वाद्यवादन की जो विधि पहले कही जा चुकी है उसी का प्रयोग आसारित ' के अन्तर्गत गीतों की वस्तु के सम्बन्ध में भी होगा । इस प्रकार यह ( विषय ) वस्तु से निवद्ध गीतों की प्रयोगविधि की विवेचना की गयी है ॥ २ ९५-२९ ६ ॥ अङ्गों में निबद्ध गीतों की प्रयोग विधि- शृणुताङ्गनिबद्धानां गीतानामपि लक्षणम् । य एव वस्तुकविधिर्नृ ताभिनयवादिते ॥ २ ९ ७ ॥ तमेवाङ्गनिबद्धेषु योजयेत् । अब अंगों में निबद्ध गीतों के प्रयोग की विधि को भी सुनें । जो विधि वस्तु के साथ नृत्त अभिनय एवं वादन में प्रयुक्त होती हैं, उसी का उपयोग अंगों में निबद्ध छन्दक' में कियावाद्यंजाना चाहिएगुर्वक्षरकृतं॥ २ ९७-२९ ८तथाल्पाक्षरमेव॥ च ॥ २ ९ ८ ॥ मुखे सोपोहने कुर्याद्वर्णानां विप्रकर्षतः । मुख तथा उपोहन ' के प्रयोग में वाद्यों का वादन गुरु तथा अल्प अक्षरों के भेद- १. अभिनवगुप की व्याख्या के अनुसार आसारित में संख्या के नियम से नर्तकियों की संख्या बढ़ती जाती है । पहले एक नर्तकी का अभिप्राय होता है । उसी प्रकार गीतक के प्रयोग में भी वस्तु की संख्या के अनुसार नृत्त होता है । २. डा० रघुवंश ने छन्दक को गीत का ही प्रसङ्ग माना है । इसका अर्थ आङ्गिक संचलन अर्थात् नृत्त के समानान्तर चलने वाले गीतों के प्रयोग में भी किया गया है । ३. नाट्य सन्धि के प्रथम भेद का नाम मुख सन्धि है । अथवा छन्दक के प्रारम्भिक प्रयोग को भी मुख कहा जा सकता है । स्थायी स्वर के आधार पर आगे के स्वरों की स्थापना उपोहन के प्रयोग में की जाती है । डा० रघुवंश के मत में यहाँ मुख का उल्लेख 'वस्तु ' के सन्दर्भ और 'उपोहन' के गान के सन्दर्भ हुआ है ।
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चतुर्थोऽध्यायः १६१ प्रदर्शन के साथ ऐसे बजाना चाहिये कि वर्णों का व्यवधान स्पष्ट हो जाए' ॥ २ ९८-२९९ ॥ यदा गीतिवशादङ्ग भूयो भूयो निवर्तते ॥ २ ९९ ॥ तत्राद्यमभिनेयं स्याच्छेषं नृत्तेन योजयेत् । जब गीत के प्रयोगकाल में उसके कुछ भाग की बार बार आवृत्ति' हो तो उसके प्रथम ( अभिहित ) भाग का अभिनय मुद्राओं द्वारा करे और शेष भाग का प्रदर्शन नृत्त के माध्यम से करना चाहिए ॥ २ ९९-३०० ॥ यदा गीतिवशादङ्ग भूयो भूयो निवर्तते ॥ ३०० ॥
त्रिपाणिलयसंयुक्त तत्र वाद्यं प्रयोजयेत् ।
यथा लयस्तथा वाद्यं कर्तव्यमिह वादकैः ॥ ३०१ ॥
जब गीत के प्रयोग के समय उसके कुछ अङ्गों की पुनरावृत्ति की जाए तो उसके साथ तीन प्रकार के पाणि तथा त्रिविध लय के प्रयोग से संयुक्त वाद्यों का वादन किया जाना चाहिए । इस समय वादकों द्वारा वाद्यों को लय के अनुसार रखना चाहिए ॥ ३००-३०१ ॥ १. अभिनवभारती के अनुसार घिधि, ढन्, त्रन् जैसे गुरु अक्षर भी शीघ्रता से प्रयुक्त होने पर अनेक संख्यक हो सकते हैं । यथा एक कला में ही 'त्थीत्थी- त्थीत्थन् धृत् दत्थकुदहि' यह सम्पूर्ण अक्षर प्रयुक्त किये जाते हैं । २. अभिनवगुप्त के मत में छन्दक गीत के मुख्य अङ्ग बार- बार दुहराए जाते हैं । गीत की मागधी आदि रीतियों में प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय आदि पाद भागों में ऐसे ही अङ्गों को दुहराया जाता है ( संगीतरत्नाकर, स्वराध्याय, पृ० २८० ) । ३. पाणि को ताल कहा गया है । इसके तीन भेद हैं- समपाणि, उपरिपाणि तथा अर्धपाणि । 'समपाणिरुपरिपाणिरर्धपाणिश्चेति'-- ना० शा० ३१-३२९ संगीत व नृत्त के साथ समपाणि ताल, बाद में अर्धपाणि ताल तथा पहले उपरिपाणि ताल का प्रयोग होता है । ४. छन्द अक्षर एवं पादों की समता का नाम लय है । जैसा कि अभिनव-गुप्त की स्पष्टोक्ति है— 'छन्दोक्ष रपदानां साम्यं लयः । ' इसके तीन भेद हैं- द्रुत, मध्यम एवं विलम्बित । - ( ना० शा० ३१.३२६ ) ताल के बाद जो विश्राम किया जाता है, वस्तुतः वही लय है । ११ ना०