भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 281–290

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

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१ ९ २ नाट्यशास्त्रम्

अवकृष्टा ध्रुवा की विधि- चतुर्थकारः पूजां तु स कृत्वान्तर्हितो भवेत् ।

ततो गेयावकृष्टा तु चतुरश्रा स्थिता ध्रुवा ॥ १०२ ॥

के पश्चात् चतुर्थकार को निष्क्रमण कर जाना चाहिए । इसके ( ' )पश्चात्पूजाअवकृष्टाकरने ध्रुवा का गायन चतुरस्र ताल तथा विलम्बित स्थिति लय में किया जाना चाहिए ॥ १०२ ॥ । गुरुप्राया तु सा कार्या तथा चैवावपाणिका

कलाष्टकविनिर्मिता ॥ १०३ ॥

स्थायिवर्णाश्रयोपेता में समस्त वर्णं गुरु होते हैं, यह अवपाणिक ताल' से युक्त होती है, स्थायी वर्णों पर आश्रित अवकृष्टा ध्रुवा होती है तथा आठ कलाओं से बनी होती है ॥ १०३ ॥

[ चतुर्थ पञ्चमं चैव सप्तमं चाष्टमं तथा । लघूनि पादे पङ्क्त्यान्तु सावकृष्टा ध्रुवा स्मृता ॥ ] ( जिस ध्रुवा पाद में चतुर्थ, पंचम, सप्तम तथा अष्टम वर्ण लघु होता है उसे अवकृष्टा ध्रुवा कहा जाता है )

नान्दी पाठ विधि- पठेत्तत्र मध्यमं स्वरमाश्रितः ।

नान्दींसूत्रधारः पदैर्द्वादशभिरष्टभिर्वाऽप्यलङ्कृताम् ॥ १०४ ॥।

इस के पश्चात् सूत्रधार को मध्यम स्वर में आठ या बारह पद से युक्त नान्दी का पाठ करना चाहिए ॥ १०४ ॥

१. ' चतुष्प्रकारपूजां तु' इति वा पाठः । २. अभिनव ने स्थित को विलम्बित लय का परिचायक माना है ( स्थितेति विलम्बितलया ) । ३. 'चैवार्धपाणिका' इति वा पाठ: । ४. अवपाणि अथवा अवरपाणि ताल का एक प्रभेद है । ५. “स्थिताः स्वराः समा यत्र स्थायी वर्णः सः " ( ना० शा० २ ९ -१ ९ ) लक्षण के अनुसार जिस वर्ण में स्वर सम रूप में स्थित रहते हैं उसे स्थायी वर्ण - इस अवकृष्टा ध्रुवा का प्राण सम स्थित स्वर है । ६. अभिनवभारती के अनुसार कहते हैं । तदनुसार आठ कलाओं में द्विकला की दो कलाओं एवं चंचत्पुट की छः कलाओं का परिगणन किया जाता है । ७. नान्दी में पाद से क्या तात्पर्य है इस विषय में अनेक मतभेद हैं, जिसके लिए श्रीघोष ने लेवी पृ ० १३२-१३३, २२५-२६ का सन्दर्भ दिया है । श्रीघोष ने यह

पृष्ठ 282

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पञ्चमोऽध्यायः १९ ३ नान्दी श्लोक -

नमोऽस्तु सर्वदेवेभ्यो द्विजातिभ्यः शुभं तथा ।

जित सोमेन वै राज्ञा शिवं गोब्राह्मणाय च ॥ १०५ ॥

समस्त देवताओं को प्रणाम है, ब्राह्मणों का कल्याण हो, सोमरूपी राजा की जय हो एवं गो जाति तथा ब्राह्मणों का मङ्गल हो ॥ १०५ ॥

ब्रह्मोत्तरं तथैवास्तु हता ब्रह्मद्विषस्तथा ।

प्रशास्त्विमां महाराजः पृथिवीं च ससागराम् ॥ १०६ ॥

ब्राह्मणों की निरन्तर उन्नति हो, ब्रह्मद्वेषी लोगों का नाश हो तथा हमारे महाराज सागरपर्यंन्त फैली इस पृथ्वी का शासन करें ॥ १०६ ॥

प्रेक्षाराष्ट्रकर्तुर्महान्धर्मोप्रवर्धतां चैव भवतुरङ्गस्याशाब्रह्मभाषितःसमृद्धयतु ॥। १०७ ॥ राष्ट्र की उन्नति हो, उस रङ्ग' की आशाएं समृद्ध हों, प्रेक्षाकारक' को वेदोक्त धर्म की प्राप्ति हो ॥ १०७ ॥

काव्य कर्तुर्यंशश्चास्तु धर्मश्चापि प्रवर्धताम् ।

इज्यया चानया नित्यं प्रीयन्तां देवता इति ॥ १०८ ॥

इस ( दृश्य ) काव्य ( अर्थात् नाटक ) के रचयिता को ख्याति मिले तथा उसका धर्म भी बढ़े और इस काव्यमय- यज्ञ से देवतागण भी सदा प्रसन्न होते रहें ॥ १०८ ॥

नान्दीपदान्तरेष्वेषु मार्येति नित्यशः । वदेतां सम्यगुक्ताभिर्वाग्भिस्तो पारिपारिवकौ ॥ १० ९ ॥ भी उल्लेख किया है कि शाकुन्तल की टीका करते हुए ( पृ०-६ ) राघवभट्ट ने पदविषयक अभिनवगुप्त का यह अभिमत उद्धृत किया है-' पदानि श्लोकावयव-भूतानि तिङन्तानि सुबन्तानि वा श्लोकतुरीयांशानि वा अवान्तररूपाणि वा आचार्यस्वरमस्त्ववान्तरवाकेष्वेव पदत्वम् । ' इस व्याख्या के अनुसार पद से श्लोक के अवयवभूत सुबन्त या तिङन्त, दूसरा श्लोक पद, या अवान्तरस्वरूप वाक्य का अभिप्राय हो सकता है । १. अभिनवगुप्त के विचार में रङ्ग से यहाँ अभिनेताओं आदि ( नटकुशी-लवर्गस्य ) का अभिप्राय है । २. प्रेक्षाकारक से यहाँ नाट्य की अर्थव्यवस्था के उत्तरदायी साहूकार या नाट्य को प्रस्तुत करने वाले नाट्यपति या सूत्रधार से हो सकता है । १३ ना०

पृष्ठ 283

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१ ९ ४ नाट्यशास्त्रम् उपर्युक्त प्रकार की नान्दी के पदों के पाठ के उपरान्त दोनों पारिपारिवकों सुष्ठु वाणी में "ऐसा ही हों" कहना चाहिए ॥ १० ९ ॥ एवंततश्शुष्कावकृष्टानान्दी विधातव्यास्याज्जर्जयथावल्लक्षणान्वितारश्लोक दर्शिका ॥। ११० ॥ इस प्रकार लक्षणों से युक्त नान्दी का सम्पादन करना चाहिए । तत्पश्चात् जर्जर की स्तुतिपरक शुष्कावकृष्टा ध्रुवा का गायन किया जाना चाहिए ॥ ११० ॥

शुष्कवकृष्टाधवा का लक्षण- शुष्कावकृष्टानवगुर्वक्ष राण्यादौतु भवेत्कलाषड्लघूनिह्यष्टौ प्रमाणतःगुरुत्रयम् ॥। १११ ॥ यथा- दिग्ले दिग्ले दिग्ले दिग्ले जम्बुकपालितकते तेजाः । यदि आरम्भ में नौ वर्ण गुरु हों, फिर छ: वर्ण लघु हों और अन्त में पुनः तीन वर्ण गुरु हों तथा ( समयगत परिणाम ) आठ कला का हो तो उसे 'शुष्काव- जम्बुकपलितकते कृष्टा ध्रुवा' कहते हैं । यथा- दिग्ले दिग्ले झण्टुझण्टु तेजाः ॥ १११-११२ ॥ देवता राजा या ब्राह्मणों की स्तुति से युक्त श्लोक पाठ- कृत्वा शुष्कावकृष्टां तु यथावद्विजसत्तमाः ॥ ११२ ॥

। ततः श्लोकं पठेदेकं गम्भीरस्वरसंयुतम् देवस्तोत्रं पुरस्कृत्य यस्य पूजा प्रवर्तते ॥ ११३ ॥

राज्ञो वा यत्र भक्तिः स्यादथ वा ब्राह्मणस्स्तवम् । हे श्रेष्ठ ब्राह्मणजन! शुष्कावकुष्टा ध्रुवा के गान के पश्चात् उस ( सूत्रधार ) को गम्भीर स्वर से एक श्लोक का पाठ करना चाहिए । यह श्लोक उस देवता की स्तुति पर हो जो नाट्य का इष्टदेव हो या प्रजावत्सल राजा अथवा ब्राह्मण की स्तुति में प्रयुक्त श्लोक पढ़ना चाहिए ॥ ११२-११४ ॥ जर्जर श्लोक पाठ- गदित्वा जर्जरश्लोकं रङ्गद्वारे च यत्स्मृतम् ॥ ११४ ॥

पठेदन्यं पुनः श्लोकं जर्जरस्य विनाशनम् । इस भाँति रङ्गद्वार में जर्जर श्लोक के पाठ के उपरान्त उसे जर्जर के यश को प्रकाशित करने वाले एक अन्य श्लोक का पाठ करना चाहिए' ॥ ११४-११५ ॥ १. अभिनवगुप्त के मत में देवता की स्तुतिपरक श्लोक के पश्चात् जर्जर श्लोक, तब विष्णुस्तुति कृद्रङ्गद्वारश्लोक एवं फिर जर्जरश्लोक का पाठ किया जाता है ।

पृष्ठ 284

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पञ्चमोऽध्यायः १ ९ ५ चारी प्रयोग- जर्जरं नमयित्वा तु ततश्चारीं प्रयोजयेत् ॥ ११५ ॥

पारिपारिवकयोश्च स्यात्पश्चिमेनापसर्पणम् । इसके पश्चात् जर्जर को प्रणाम करके चारी का प्रयोग किया जाना चाहिए । उस समय पारिपारिवकों को पश्चिम दिशा की ओर से निकल जाना चाहिए ॥ ११५-११६ ॥ अता ध्रुवा का प्रयोग- अड्डिता चात्र कर्त्तव्या ध्रुवा मध्यलयान्विता ॥ ११६ ॥

चतुभिः सन्निपातैश्च चतुरश्रा प्रमाणतः । अब मध्य लय, चतुरश्र ताल एवं चार सन्निपातों से युक्त अड्डिता ध्रुवा' का प्रयोग किया जाना चाहिए ॥ ११६-११७ ॥ अड्डिता ध्रुवा का लक्षण— आद्यन्त्यं चतुर्थं च पञ्चमं च तथा गुरु ॥ ११७ ॥

यस्यां ह्रस्वानि शेषाणि सा ज्ञेया त्वड्डिता बुधैः । यदि ( बारह वर्णों में से ) प्रथम, पंचम तथा अन्तिम वर्ण गुरु हों तथा शेष ह्रस्व हों तो उसे विद्वज्जन ' अडिता ध्रुवा' कहते हैं ॥ ११७-११८ ॥ ( देवतास्तोत्रमिति श्लोकः । ततो जर्जरश्लोकः । ततो विष्णुस्तुतिकृद्र ङ्गद्वार-श्लोकः ततो जर्जरश्लोक इति) । श्री घोष ने रङ्गद्वार का अर्थ नाट्यप्रयोग की शुरुआत माना है । रङ्गद्वार को पूर्वरङ्ग अथवा वास्तविक नाट्यप्रयोग की पूर्व दशा मानना हमें भी अभिप्रेत है । १. अभिनवगुप्त के मत में कुछ आचार्य अड्डिता ध्रुवा का प्रयोग रंगद्वार में चारी के साथ किया जाना मानते हैं एवं अन्य आचार्य रंगद्वार के सान्निध्य के कारण रंगद्वार में अवकृष्टा का प्रयोग मानते हैं ( रङ्गद्वारे चार्या चेति केचित् । अन्ये तु सन्निधानाद्रङ्गद्वारेऽवकृष्टेवेत्याहुः । अध्रुवमेव रङ्गद्वारमित्येके ) अर्थात् भरत के मत में अड्डिता जाति है ( अड्डिता जातिरिति ) । अभिनवगुप्त ने अड्डिता का यह लक्षण भी दिया है जिसके अनुसार वह एक वृत्त सिद्ध होती है ।

आद्यं चतुर्थं दशममष्टमेकादशे तथा ।

गुरूणि दोधके या स्यादडिता नाम सा स्मृता ॥

अर्थात् दोधकवृत्त के पाद में जब पहला, चौथा, आठवीं, दसवीं और ग्यारहवाँ वर्ण गुरु एवं अन्य लघु रहें तो उसे ' अड्डिता ध्रुवा' मानना चाहिए ।

पृष्ठ 285

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१ ९ ६ नाट्यशास्त्रम् अडिता धवा का इतिहास- अस्याः प्रयोगं वक्ष्यामि यथा पूर्व महेश्वरः ॥ ११८ ॥

सहोमया क्रीडितवान्नानाभावविचेष्टितैः । भूतकाल में भगवान् शिव ने उमा के साथ अनेक भावों व चेष्टाओं के द्वारा क्रीड़ा करते हुए इस ध्रुवा का जिस रूप में प्रयोग किया था वह मैं बतलाऊँगा ॥ ११८-११९ ॥ जर्जरग्रहण, पंचपदीगमन, आर्यापाठ, चारी, महाचारी- कृत्वाऽवहित्थं स्थानं तु वामं चाधोमुखं भुजम् ॥ ११ ९ ॥ । चतुरश्रमुरः कार्यमश्वितश्चापि मस्तकः ॥ १२० ॥ नाभिप्रदेशे विन्यस्य जर्जरं च तुलाधृतम्

। वामपल्लवहस्तेन पादैस्तालान्त रोत्थितैः ॥ १२१ ॥ गच्छेत्पश्वपदीं चैत्र सविलासाङ्गचेष्टितैः

। वामवेधस्तु कर्तव्यो विक्षेपो दक्षिणस्य च ॥ १२२ ॥ शृङ्गाररससंयुक्तां पठेदार्यां विचक्षणः

चारीश्लोकं गदित्वा तु कृत्वा च परिवर्तनम् ।

तैरेव च पदैः कार्यं पश्चिमेनापसर्पणम् ॥ १२३ ॥

। पारिपारिवकहस्ते तु न्यस्य जर्जरमुत्तमम् ॥ १२४ ॥ महाचारीं ततश्चैव प्रयुञ्जीत यथाविधि

सबसे पहले सूत्रधार को अवहित्य स्थान' का प्रयोग करना चाहिए और बायीं भुजा को निम्नाभिमुख करके वक्षःस्थल को चतुरश्र तथा मस्तक को अश्चित रखते हुए नाभिप्रदेश पर जर्जर को संतुलित रखते हुए आगे की ओर पाँच कदम चलना चाहिए । इसके बाद बाए हाथ को पल्लव चेष्टा में रखना चाहिए । तथा चलने के समय एक ताल के अन्तर से प्रत्येक कदम रखते हुए अपने अङ्गों को विलासमय चेष्टा में रखना चाहिए । तदुपरान्त बायें पैर से सूची का व दाहिने पैर १. अभिनवगुप्त के मत में अविहत्यस्थान स्त्री स्थानक होता है । पूर्वो विरचितत्स्यश्रस्तदन्योऽपसृतः समः । पादस्तालान्तरन्यस्तस्त्रिकमीषत्समुन्नतम् ॥ ना० शा० १२-१६८

पाणिताख्यो यत्रैकस्तदन्यस्तु नितम्बगः ।

अवहित्थं समाख्यातं स्थानमागमभूषणैः । ना०शा० ॥ १२-१६९ -१७० ॥

अवहित्य स्थान में लताहस्त को अधोमुख स्थापित करने का उद्देश्य जर्जर को नाभिप्रदेश पर संतुलित करना है ।

पृष्ठ 286

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पञ्चमोऽध्यायः १ ९७ से विक्षेप का प्रयोग करना चाहिए । उसके बाद बुद्धिमान सूत्रधार को शृंगार रस से युक्त एक आर्या का पाठ करना चाहिए । फिर चारी श्लोक का पाठ करके और गोलाकार घूम कर ( पूर्वकथित जो विधि यहाँ तक आने की बताई गई थी ) उन्हीं कदमों से पीछे की ओर वापिस चला जाए । इसके बाद पारिपाश्विक के हाथ में उत्तम जर्जर को देकर उसे यथाक्रम महाचारी का प्रयोग करना चाहिए ॥ ११ ९ -१२४ ॥ महाचारी लक्षण - । चतुरश्रा ध्रुवा तंत्र तथा द्रुतलयान्विता चतुभिस्सन्निपातैश्च कला ह्यष्टी प्रमाणतः ॥ १२५ ॥

आद्यं चतुर्थमन्त्यं च सप्तमं दशमं गुरु ।

लघु शेषं 'ध्रुवायोगे त्रैष्टुभे चरणे तथा ॥ १२६ ॥

( महाचारी में ) चतुरश्र ताल एवं द्रुतलय से युक्त ध्रुवा गीत होता है । इसमें चार सन्निपातों के साथ आठ कलाएँ होती हैं । ( इसके ग्यारह वर्णों में से ) पहला, चौथा, सातवीं, दसवाँ तथा अन्तिम ( ग्यारहवां ) वर्णं गुरु, एवं शेष वर्ण लघु होते हैं । इस ध्रुवा का प्रत्येक पाद एकादशाक्षर होता है ॥ १२५-१२६ ॥ महाचारी का श्लोक- यथा— ) पादतलाहतिपातितशैलं क्षोभितभूतसमग्रसमुद्रम् । ताण्डवनृत्तमिदं प्रलयान्ते पातु जगत्सुखदायि हरस्य ॥ १२७ ॥

( जैसे - ) प्रलय के उपरान्त शिव का ताण्डवनृत्य आपकी रक्षा करे जिसमें चरण तल के प्रहार से पर्वत टूट कर गिर गए हैं और जलस्थित समस्त प्राणियों के साथ सागर विक्षुब्ध हो गया है' । १. 'ध्रुवापादे चतुर्विंशति के भवेत्' इति बड़ोदासंस्कणे पाठः । २. यह श्लोक चतुरस्रा ध्रुवा के उदाहरणरूप में प्रस्तुत किया गया है । प्रत्येक पाद में लघु गुरु का क्रम निर्दिष्टरूपेण है । यथा 'पादतलाहतिपातितशैलम्' में पहला वर्ण ण, चौथा वर्ण ला, सातवां वा एवं दसवां शे तथा ग्यारहवां लं गुरु हैं एवं दूसरा वर्ण द, तीसरा त, पांचवां ह, छठा ति, आठवां ति एवं नवां वर्णं त लघु हैं । इसको अधिक सूचारु रूप से व्यक्त करने का साधन निम्नलिखित है- पादतलाहतिपातितशैलम् । SIISIISIISS

पृष्ठ 287

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१९८ नाट्यशास्त्रम् भाण्डवाद्याभिमुखीकरणविधि- । भाण्डोन्मुखेन कर्तव्यं पादविक्षेपणं ततः ॥ १२८ ॥ सूचीं कृत्वा पुनः कुर्याद्विक्षेपपरिवर्तनम्

इसके पश्चात् भाण्डवाद्य की ओर अभिमुख होकर ( सूत्रधार को ) पदन्यास करके जाना चाहिए और फिर सूची चारी का प्रयोग करके विक्षेप एवं तत्पश्चात् गोल चक्कर ( परिवर्तन ) का सम्पादन करना चाहिए ॥ १२८ ॥

। अतिक्रान्तैः सललितः पादैर्द्र तलयान्वितैः ॥ १२९ ॥ त्रितालान्तरमुत्क्षेपैर्गच्छेत्पञ्चपदीं ततः

। तत्रापि वामवेधस्तु विक्षेपो दक्षिणस्य च तैरेव च पदैः कार्यं प्राङ्मुखेनापसर्पणम् ॥ १३० ॥

। पुनः पदानि त्रीण्येव गच्छेत्प्राङ्मुख एव तु ततश्च वामवेधः स्याद्विक्षेपो दक्षिणस्य च ॥ १३१ ॥

अतिक्रान्तचारी में द्रुतलय से युक्त एवं ( ललित चरणों द्वारा ) तीन ताल के अन्तर से उठते हुए पाँच कदम चलना चाहिए और फिर बायें पैर से सूची (वेध ) चारी एवं दक्षिण पद से विक्षेप का प्रयोग करे । इसके बाद फिर इन्हीं पदों से सामने की ओर मुख रखते हुए पीछे की ओर चले । तत्पश्चात् पुनः सामने की ओर तीन कदम आगे रखे और फिर से बायें पैर से सूची का एवं दाहिने पैर से विक्षेप का प्रयोग करे ॥ १२ ९ -१३१ ॥

रौद्र रस युक्त श्लोक का पाठ- ततो रौद्ररसं श्लोकं पादसंहरणं पठेत् ।

तस्यान्ते तु त्रिपद्याथ व्याहरेत् पारिपाश्विकौ ॥ १३२ ॥

इसके पश्चात् एक रौद्ररस के पादसंकुलित' श्लोक का पाठ करना चाहिए । उसके समाप्त होने पर तीन कदम आगे चलकर दोनों पारिपारिवकों से बात करनी चाहिए ॥ १३२ ॥

१. अभिवनगुप्त के मत में परस्पर संकुलित होने का अभिप्राय है कि समासों के बाहुल्य के कारण पाद अलग अलग न रहकर गुम्फित हो गए हों ( यथा पादानां च संहरणं समासयोजन यैक्यं यत्रेत्योजः प्रधानत्वं दर्शितम् ) । श्री घोष ने इससे पैर को एक साथ रखने का अर्थ लिया है किन्तु यह इस प्रसंग में अनुपयुक्त प्रतीत होता है ।

पृष्ठ 288

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पचमोऽध्यायः १९९

नर्कुटक गान तथा त्रिगत - तयोरागमने कार्यं गानं नर्कुटकं बुधैः ।

तथा च भारतीभेदे त्रिगतं सम्प्रयोजयेत् ॥ १३३ ॥

उन दोनों (पारिपारिवकों ) के आने के समय सुविज्ञों को नर्कुटक ध्रुवा' का गान करना चाहिए तथा भारतीवृत्ति में त्रिगत' सम्पादन करवाना चाहिए ॥ १३३ ॥

विदूषक के कार्य -- विदूषकस्त्वेकपदां सूत्रधारस्मितावहाम् । असम्बद्धकथाप्रायां कुर्यात् कथनिकां ततः ॥ १३४ ॥

विदूषक को ऐसी कथनिका का प्रयोग करना चाहिए जिससे सूत्रधार मुसकुराने लगे और जो अनर्गल बातों से युक्त हो ॥ १३४ ॥

[ वितण्डां गण्डसंयुक्ता तालिकाच प्रयोजयेत् । कस्तिष्ठतिपारिपाश्विकजितंसञ्जल्पोकेनेत्यादिकाव्यविदूषकविरूपितःप्ररूपिणीम् ॥। स्थापितः सूत्रधारेण त्रिगतं सम्प्रयुज्यते ॥ ] [ इस बातचीत को विवादात्मक, उलझन भरी, तथा पहेलियों से युक्त होना चाहिए । कौन है? कौन जीता? आदि नाटक ( काव्य ) की गति को बढ़ाने वाले प्रश्न उसमें होने चाहिए । पारिपाश्विक द्वारा प्रयुक्त संगत कथन को भी विदूषक द्वारा असंगत सिद्ध किया जाना चाहिए और फिर सूत्रधार को उन्हीं कथनों को प्रतिष्ठित करना चाहिए । इन तीनों ( पारिपाश्विक, विदूषक और सूत्रधार ) के वार्तालाप को त्रिगत कहते हैं । ]

प्ररोचना का पाठ- प्ररोचना च कर्तव्या सिद्धेनोपनिमन्त्रणम् ।

रङ्गसिद्धौ पुनः कार्यः काव्यवस्तुनिरूपणम् ॥ १३५ ॥

१. नर्कुटक ध्रुवा का विशेष परिचय ना०शा० में आगे दिया गया है । इसको सूत्रधार एवं दोनों पारिपाश्विक मिलकर गाते हैं । अथवा यह तीनों गतिशील रहते हैं एवं गायक नर्कुटक वा का प्रयोग करते हैं । अष्टी नकुटकानां तु विज्ञेया मूलजातयः । रथोद्धता बुदबुदकम्' इत्यादि ( ना०शा ०३२.२८० ) तदन्यतम वोपलक्षितं गानं नकुटकम् । २. त्रिगत से तीनों नटों अर्थात् सूत्रधार एवं दोनों पारिपारिवकों के सम्भाषण का तात्पर्य है ।

पृष्ठ 289

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२०० नाट्यशास्त्रम् इसके बाद सूत्रधार को आह्वानमयी प्ररोचना का पाठ करना चाहिए तथा नाट्य की सफलता के हेतु प्रस्तूयमान नाटक की विषयवस्तु का निरूपण करना चाहिए ॥ १३५ ॥

तीनों पात्रों का निष्क्रमण- सर्वमेव विधि कृत्वा सूचीवेधकृतं रथ । पादैरनाविद्धगतै निष्क्रामेयुः समं त्रयः ॥ १३६ । इस सम्पूर्ण प्रक्रिया का सम्पादन करके सूचीचारी का प्रयोग करने के बाद इन तीनों ही पात्रों को चाहिए कि आविद्ध चारी को छोड़कर अन्य किसी भी चारी में निष्क्रमण कर जाएं ॥ १३६ ॥

चतुरश्र पूर्वरंग विधि का उपसंहार- एवमेष प्रयोक्तव्यः पूर्व रङ्गो यथाविधिः ।

चतुरश्रो द्विजश्रेष्ठास्त्रयश्र चापि निबोधत ॥ १३७ ॥

इस प्रकार इस चतुरश्र पूर्वरंग विधि का प्रयोग करना चाहिए । हे ऋषियो! आप लोग अब त्र्यश्र पूर्वरंग विधि को भी जान लीजिए ॥ १३७ ॥

त्र्यश्र पूर्वरंग विधि- अयमेव प्रयोगः स्यादङ्गान्येतानि चैव हि ।

तालप्रमाण सङ्क्षिप्तं केवलं तु विशेषकृत् ॥ १३८ ॥

( त्र्यश्र पूर्वरंग में भी ) यहीं ( चतुरश्र के समान ) प्रयोग विधि होती है । तथा इतने ही अङ्ग होते हैं । केवल ताल के प्रमाणों को संक्षिप्त करना ही इसकी विशिष्टता है ॥ १३८ ॥

त्र्यश्र के सन्निपात- शम्या तु द्विकला कार्या तालो हयेककलस्तथा ।

पुनश्च ककला शम्या सन्निपातः कलाद्वयम् ॥ १३ ९ ॥

उसमें शम्या' दो कला की सम्पन्न की जाती है, तथा ताल एक कला' के प्रमाण की होती है, तब फिर से एक कला की शम्या एवं दो कला के प्रमाण का सन्निपात होता है ॥ १३ ९ ॥ १. दाहिने हाथ से ताली बजाने की क्रिया को शम्या कहा जाता है । इसको एक हाथ से सम्पन्न होने वाली क्रिया माना जाता है । २. कला उस शब्द युक्त क्रिया की संज्ञा है जो गुरुमात्रा के काल से सम्पन्न की जाती है । भरत के अनुसार पाँच निमेष के समय को लघु ताल कहते हैं । दो लघु ताल का एक गुरु ताल होता है । अतः कला का समय प्रमाण दस निमेष है ।

पृष्ठ 290

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पन्चमोऽध्यायः २०१

त्र्यश्र के कला, ताल एवं लय आदि- अनेन हि प्रमाणेन कलाताललयान्वितः ।

कर्तव्यः पूर्वरङ्गस्तु त्र्यश्रोऽप्युत्थापनादिकः ॥। १४० ॥

कला, ताल एवं लय के सन्दर्भ में इसी ( चतुरश्र पूर्वरङ्ग में वर्णित ) प्रमाण के अनुरूप ही उत्थापनादि के साथ व्यश्र पूर्वरङ्ग का सम्पादन करना चाहिए ॥ १४० ॥

त्र्यश्र पूर्वरंग की उत्थापनी ध्रुवा के छन्द का लक्षण - आद्य चतुर्थं दशममष्टमं नैधनं गुरु । यस्यास्तु जागते पादे सा त्र्यश्रोत्यापिनी ध्रुवा ॥ १४१ ॥

त्र्य पूर्वरङ्ग में प्रयुक्त की जाने वाली उत्थापनी ध्रुवा में ( बारह अक्षरों से युक्त ) जगती छन्द के प्रथम, चतुर्थ, अष्टम, दशम तथा अन्तिम वर्ण गुरु होते हैं ॥ १४१ ॥

वाद्य, गतिप्रचारवाद्य' ध्रुवागतिप्रचारव-ताल आदि- ध्रुवातालस्तथैव च ।

संक्षिप्तान्येव कार्याणि त्र्यश्रे नृत्तप्रवेदिभिः ॥ १४२ ॥

नृत्यज्ञ जनों को इस त्र्यश्र पूर्वरंग के वाद्य, गतिप्रचार, ध्रुवा एवं ताल को संक्षेप में ही प्रयुक्त करना चाहिए ॥ १४२ ॥

आंगिक व्यापार - वाद्यगीतप्रमाणेन कुर्यादङ्गविचेष्टितम् । विस्तीर्णमथ सङ्क्षिप्तं द्विप्रमाणविनिर्मितम् ॥ १४३ ॥

वाद्यसंगीत एवं कण्ठसंगीत के अनुरूप ही विस्तृत अथवा संक्षिप्त दोनों प्रकार का आंगिक व्यापार किया जाना चाहिए ॥ १४३ ॥

हस्तपाद संचालन—

हस्तपादप्रचारस्तु द्विकलः परिकीर्तितः ।

चतुरश्रे परिक्रान्ते पाताः स्युः षोडशैव तु ॥ १४४ ॥

त्र्य द्वादश पातास्तु भवन्ति करपादयोः । एतत्प्रमाणं विज्ञेयमुभयोः पूर्वरङ्गयोः ॥ १४५ ॥

इसमें हाथों एवं चरणों का संचालन दो कलाओं तक होता है । चतुरश्र पूर्वरंग के परिक्रान्त में हस्तपाद का संचालन सोलह बार होता है । पर त्र्यश्रपूर्व रंग में बारह बार होता है । इस प्रकार इन दोनों पूर्वरंगों में ( हस्तपादसंचालन का ) प्रमाण जानना चाहिए ॥ १४४-१४५ ॥