भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 291–300

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 291–300

पृष्ठ 291

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२०२ नाट्यशास्त्रम्

त्र्य पूर्वरंग में त्रिपदीगमन - केवलं परिवर्ते तु गमने त्रिपदी भवेत् ।

दिग्वन्दने पञ्चपदी चतुरश्रे विधीयते ॥ १४६ ॥

केवल परिवर्त की अवस्था ' में ( त्र्यश्र पूर्वरंग में ) तीन कदम आगे बढ़ाया जाता है जबकि चतुरश्र पूर्वरंग में दिग्वन्दन के समय पाँच कदम आगे बढ़ाया जाता है ॥ १४६ ॥

त्र्य पूर्वरंग का उपसंहार- आचार्यबुद्धया कर्तव्यस्त्रयश्रस्तालः प्रमाणतः ।

तस्मान्न लक्षणं प्रोक्तं पुनरुक्तं भवेद्यतः ॥ १४७ ॥

नाट्याचार्य को अपने बुद्धिकौशल से ताल के प्रमाणानुरूप त्र्यश्रपूर्वरंग का प्रयोग कर लेना चाहिए । इसी कारण इसका लक्षण नहीं कहा गया है कि यह पुनरुक्ति मात्र होता ( क्योंकि कुछ थोड़ी मी विशेषताओं को छोड़कर त्र्यश्रपूर्वरंग, चतुरश्र पूर्वरंग के ही अनुरूप होता है ) ॥ १४७ ॥

शुद्ध पूर्व रंग का उपसंहार- एवमेष प्रयोक्तव्यः पूर्वरङ्गो द्विजोत्तमाः! ।

त्र्यश्रश्व चतुरश्रश्च शुद्धो भारत्युपाश्रयः ॥ १४८ ॥

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणजन! इस प्रकार त्र्यश्र एवं चतुरश्र रूप, धारती वृत्ति पर आश्रित, शुद्ध पूर्वरंग का प्रयोग करना चाहिए ॥ १४८ ॥

चित्र पूर्वरंग विधि- एवं तावदयं शुद्धः पूर्वरङ्गो मयोदितः ।

चित्रत्वमस्य वक्ष्यामि यथाकार्य प्रयोक्तृभिः ॥ १४९ ॥

इस भाँति मैने यह शुद्ध पूर्वरंग का वर्णन किया । अब मै इस पूर्वरंग के चित्र-स्वरूप का प्रयोग किस प्रकार करना चाहिए, इसकी व्याख्या करूँगा ॥ १४ ९ ॥ वृत्ते हयुत्थापने विप्राः कृते च परिवर्तने । चतुर्थकारदत्ताभिः सुमनोभिरलङ्कृते ॥ १५० ॥ उदात्तगानैर्गन्धर्वैः परिगीते प्रमाणतः । देवदुन्दुभयश्चैव ततः ॥ १५१ ॥

हे ब्राह्मणों! उत्थापनी ध्रुवा की समाप्ति के बाद, परिवर्तन के सम्पादित १. जैसा कि पहले कहा जा चुका है, चारों दिशाओं के अधिष्ठाता देवताओं के वन्दन हेतु घूम घूम कर प्रणाम करने की प्रक्रिया का नाम परिवर्त है ।

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पञ्चमोऽध्यायः २०३ होने पर चतुर्थं पात्र के द्वारा पुष्पांजलि अर्पण के उपरान्त', तथा गन्धर्वजन द्वारा नाद करनायथोचित गीतों के गाये जाने पर देवदुन्दुभियों का तुमुल चाहिए ॥ १५०-१५१सिद्धाः ॥ कुसुममालाभिर्विकिरेयुः समन्ततः । १५२ ॥ अङ्गहारैश्च देव्यस्ता उपनृत्येयुरग्रतः ॥ पर चारों ओर (चित्र पूर्वरंग के समय ) सफेद रंग की पुष्पमालाओं को रंगमंच अङ्गहारों का बिखेरना चाहिए तथा देवियों के रूप में सुसज्जित नर्तकियों द्वारा प्रयोग करते हुए नाचना चाहिए ॥ १५२ ॥

यस्ताण्डवविधिः प्रोक्तो नृत्ते पिण्डीसमन्वितः ।

१५३ ॥ रेचकैरङ्गहारैश्च न्यासोपन्याससंयुतः ॥

नान्दीपदानां मध्ये तु एकैकस्मिन्पृथक्पृथक् ।

प्रयोक्तव्यो बुधैः सम्यक्चित्रभावमभीप्सुभिः ॥ १५४ ॥

चित्र पूर्वरंग के रूप में विधान करने के इच्छुक प्रयोक्ताओं को चाहिए कि पिण्डी बन्ध से युक्त, रेचकों एवं अंगहारों से समन्वित एवं न्यास' तथा अपन्यास' से संयुक्त जिस ताण्डव विधि का नृत्त के प्रकरण में उल्लेख हुआ है, उसका पृथक् पृथक् सम्यक् उपयोग नान्दी के एक-एक पद के मध्य में करें ॥ १५३-१५४ ॥

एवं कृत्वा यथान्यायं शुद्धं चित्र प्रयत्नतः ।

ततः परं प्रयुञ्जीत नाटकं लक्षणान्वितम् ॥ १५५ ॥

इस प्रकार अवसर के अनुकूल शुद्ध या चित्र पूर्वरङ्ग का प्रयत्नपूर्वक प्रयोग करने के उपरान्त लक्षणों से युक्त नाटक का प्रयोग करना चाहिए ॥ १५५ ॥

ततस्त्वन्तर्हिताः सर्वा भवेयुर्दिव्ययोषितः ।

निष्क्रान्तासु च सर्वासु नर्तकीषु ततः परम् ॥ १५६ ॥

पूर्वरङ्ग प्रयोक्तव्यमङ्गजातमतः परम् ।

एवं शुद्धो भवेच्चित्रः पूर्वरङ्गो विधानतः ॥ १५७ ॥

१. श्री घोष के अनुवाद के अनुसार इस अंश का अर्थ इस भाँति होगा- 'चतुर्थंकार द्वारा प्रदत्त पुष्पों से उत्थापनी ध्रुवा के अलंकरण के उपरान्त । २. जिस पर गीत वाद्य या नृत्त का एक प्रबन्ध समाप्त होता हो उसे न्यास कहते हैं । ३. जिस स्वर पर गीत वाद्य या नृत्त का मध्यभाग समाप्त हो उसे अपन्यास कहते हैं ।

पृष्ठ 293

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२०४ नाट्यशास्त्रम् इसके पश्चात् देवीरूपेण सुसज्जित उन नर्तकियों को नेपथ्य में चले जाना चाहिए और उन नर्तकियों के चले जाने पर पूर्वरङ्ग के अन्य अंगों का सम्पादन किया जाना चाहिए । इस प्रकार के विधान से शुद्ध पूर्वरङ्ग की संज्ञा 'चित्रपूर्वरङ्ग ' हो जाती है ॥ १५६-१५७ ॥ त्रिविध पूर्वरंगों में गीत वाद्य या नृत्य की अधिकता के दोष- कार्यो नातिप्रसङ्गोऽत्र नृत्तगीतविधि प्रति । गीते वाद्य च नृत्तं च प्रवृत्तेऽतिप्रसङ्गतः ॥ १५८ ॥

इन ( त्रिविध पूर्वरङ्गों' ) में अधिक गीत, वाद्य या नृत्य की अनर्गल रूप से आवश्यकता से अधिक योजना नहीं की जानी चाहिए ॥ १५८ ॥

खेदो भवेत्प्रयोक्तृणां प्रेक्षकाणां तथैव च ।

खिन्नानां रसभावेषु स्पष्टता नोपजायते ॥ १५ ९ ॥

ततः शेषप्रयोगस्तु न रागजनको भवेत् । अधिक देर संगीत चलने पर प्रयोक्तागण एवं प्रेक्षकगण दोनों थक जाएँगे और फिर खिन्न ( अभिनेताओं व दर्शकों ) को रस एवं भाव की निष्पत्ति सम्पूर्णतया नहीं हो पाएगी और आगे प्रस्तूयमान नाट्य प्रयोग में उन्हें उत्साह नहीं रहेगा ॥ १५ ९ -१६० ॥ [ लक्षणेन विना बाह्यलक्षणाद्विस्तृतं भवेत् ॥ लोकशास्त्रानुसारेण तस्मान्नाटयं प्रवर्तते ॥ ] ( मूल लक्षण का बिना अनुसरण किए बाह्य लक्षण का प्रयोग करने से व्यर्थं ही विस्तार हो जाता है । अतएव लोक एवं शास्त्र के अनुसार नाटक का प्रवर्तन करना चाहिए । ) सूत्रधार पारिपार्श्वक निष्क्रमण- त्र्यश्रं वा चतुरश्र वा शुद्धं चित्रमथापि वा ॥ १६० ॥

प्रयुज्य रङ्गान्निष्क्रामेत्सूत्रधारः सहानुगः । १. आचार्य अभिनवगुप्त ने अङ्गों की संख्या का यह क्रम बतलाया है -उत्थापन, परिवर्तन, अवकृष्टागान, नान्दीपाठ, शुष्कावकृष्टा, जर्जरश्लोक, ध्रुवा, रंगद्वार, अड्डिता, आर्यापाठ, ध्रुवा, रौद्रश्लोकपाठ, नर्कुटक, त्रिगत एवं प्ररोचना । यही अंगहारषोडश त्र्यश्रपूर्वरङ्ग में भी होते हैं और नान्दी के पादों के बीच में नृत्य भी होता है । अभिनव द्वारा गणित अंगों की संख्या १५ है । पूर्वरंग के प्रसंग में इस क्रमावलि में गीत का भी उल्लेख हुआ है । उसका आकलन यह करने पर ही षोडशांग पूरा होना सम्भव है ।

पृष्ठ 294

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पञ्चमोऽध्यायः २०५ त्र्यश्र, चतुरश्र, शुद्ध अथवा चित्र में से किसी भी भांति के पूर्व रङ्ग के सम्पादन के पश्चात् सूत्रधार को चाहिए कि अपने सहायकों के साथ चला जाये ॥ १६०- १६१ ॥ आश्रवणा, नान्दी, सूत्रधार प्रवेश, प्रस्तावना-- [ 11 देवपार्थिवरङ्गानामाशीर्वचनसंयुताम् कवेर्नामगुणोपेतां वस्तूपक्षेपरूपिकाम् । लघुवर्णपदोपेतां वृत्तैश्चित्रैरलङ्कृताम् ॥ अन्तर्यवनिकासंस्थः कुर्यादाश्रावणां ततः । आश्रावणावसाने नान्दीं कृत्वा स सूत्रधृत् ॥ पुनः प्रविश्य रङ्ग तु कुर्यात्प्रस्तावनां ततः । ] (इसके पश्चात् देवता, राजा रङ्गमंच के निमित्त आशीर्वादात्मक वचनों से युक्त, कवि ( नाटक के रचयिता ) के नाम तथा गुणों के वर्णन से समन्वित एवं नाटक की कथावस्तु के बोधक लघुवर्ण के पदों से युक्त तथा अनेक प्रकार में वृत्तों (घटनाओं या छन्दों) से युक्त आश्रवणा का प्रयोग यवनिका के अन्दर रहते हुए ही करना चाहिए । आश्रवणा के समाप्त होने पर एवं नान्दी के समापन के पश्चात् ( सूत्रधार को ). फिर से रङ्ग पर प्रवेश करके प्रस्तावना का प्रयोग करना चाहिए । ) स्थापक का प्रवेश- प्रयुज्य विधिनैवं तु पूर्वरङ्ग प्रयोगतः ॥ १६१ ॥

स्थापकः प्रविशेत्तत्र सूत्रधारगुणाकृतिः । इस भाँति यथाविधि पूर्वरंग के विधान को सम्पन्न करके सूत्रधार के प्रति- रूपवत' स्थापक को प्रवेश करना चाहिए ॥ १६१-१६२ ॥ स्थानंप्रविश्यतु वैष्णवंरङ्ग कृत्वातैरेवसौष्ठवाङ्गपुरस्कृतम्सूत्रधारपदैर्व्रजेत् ॥। १६२ ॥ १. इस पद का शाब्दिक अर्थ यह है कि स्थापक के गुण एवं आकृति सूत्रधार के समान होने चाहिए । किन्तु इसका तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि स्थापक एवं सूत्रधार की रूपसज्जा एवं शैली बिल्कुल एक दूसरे के समान होनी चाहिए । अर्थात् उसे भी सूत्रधार के समान विस्मययुक्त अद्भुत दृष्टि से युक्त होना चाहिए । अभिनवगुप्त का तो विचार है कि सूत्रधार एवं स्थापक एक ही व्यक्ति की दो संज्ञायें हैं । सूत्रधार के रूप में पूर्वरंग का प्रयोग करने के पश्चात् वही सूत्रधार स्थापक के रूप में मंच पर प्रवेश करता है । ( सूत्रधार एवं स्थापक इति सूत्रधारः पूर्वरङ्ग प्रयुज्य स्थापकः सन्प्रविशदिति न भिन्नकर्तृ कता) ।

पृष्ठ 295

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-२०६ नाट्यशास्त्रम् जिस प्रकार के चरणों को सूत्रधार ने प्रयुक्त किया था उन्हीं पदों का अनुसरण करते हुए रंगपीठ पर प्रवेश करके स्थापक को वैष्णवस्थान एवं सौष्ठव अङ्ग का आश्रय लेना चाहिए ॥ १६२-१६३ ॥ मध्यलया ध्रुवा का प्रयोग- स्थापकस्य प्रवेशे तु कर्तव्याऽर्थानुगा ध्रुवा ॥ १६३ ॥

त्र्यश्रा वा चतुरश्रा वा तज्ज्ञैर्मध्यलयान्विता । स्थापक के प्रवेश करने पर विज्ञजनों को त्र्यश्रा अथवा चतुरश्रा जिसका भी उपयोग उचित हो — उस ध्रुवा का मध्य लय में प्रयोग करना चाहिए ॥। १६३- -१६४ ॥ देव द्विज वन्दनात्मक चारी- कुर्यादनन्तरंसुवाक्यमधुरैः चारोंश्लोकैर्नानाभावरसान्वितैःदेवब्राह्मणशंसिनीम् ॥। १६४ ॥ इसके पश्चात् उसे (स्थापक को ) मधुरवाक्यों तथा विविध रसों एवं भावों से पूर्ण श्लोकों के द्वारा इष्टदेव तथा ब्राह्मणों की अभिशंसात्मक चारी का प्रयोग -करना चाहिए ॥ १६४-१६५ ॥ उद्घोषणा तथा प्रस्तावना- प्रसाद्य रङ्ग विधिवत्कवेर्नाम च कीर्तयेत् ॥ १६५ ॥

प्रस्तावनां ततः कुर्यात्काव्यप्रख्यापनाश्रयाम् । 'रंग ' ( सामाजिकों ) का यथाविधि अभिनन्दन करने के पश्चात् उसे नाट्य के प्रणेता का नाम उद्घोषित करना चाहिए और इसके बाद उसे नाट्य की कथावस्तु का स्तवन करने वाली प्रस्तावना करनी चाहिए ॥ १६५-१६६ ॥ १. अभिनवगुप्त के विचार में शोक के अवसर पर विलम्बित लय एवं रोष आदि के अवसर पर द्रुतलय का प्रयोग अपेक्षित है । इसके द्वारा सामाजिकों का • हृदय समुचित रसास्वादन की योग्यता को प्राप्त कर लेता है । २. रंग को प्रसन्न करने का अर्थ अभिनवगुप्त के मत में रंगस्थ सामाजिकों के - हृदय को प्रसन्न करना है । ३. अभिनवगुप्त के मत में पहले से ही प्रस्तावना द्वारा नाट्यवस्तु का बोध -कराने का यह उद्देश्य हो सकता है कि दर्शकों के हृदय में पहले से ही कुछ संस्कार -उत्पन्न हो जाए ( प्रथमतः एतत्प्रभृति सामाजिकाः संक्षेपेण संस्कारवन्तो भवन्ति ) ।

पृष्ठ 296

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पश्चमोऽध्यायः २०७ उद्घात्यक, रूपसज्जा तथा ज्ञापन के बाद स्थापक निष्क्रमण - १६६ ॥ उद्घात्यकादि कर्तव्यं काव्योपक्षेपणाश्रयम् ॥

दिव्ये दिव्याश्रयो भूत्वा मानुषे मानुषाश्रयः ।

दिव्यमानुषसंयोगे दिव्यो वा मानुषोऽपि वा ॥ १६७ ॥

मुखबीजानुसदृशं नानामार्गसमाश्रयम् । १६८ ॥ नानाविधैरुपक्षेप: काव्योपक्षेपणं भवेत् ॥

प्रस्ताव्यैवं तु निष्क्रामेत्काव्यप्रस्तावकस्ततः ।

एवमेष प्रयोक्तव्यः पूर्वरङ्गी यथाविधिः ॥ १६ ९ ॥

नाटक की कथावस्तु की बोधक उद्घात्यक' आदि का प्रयोग किया जाना चाहिए । दिव्य नाटक के प्रसंग में दिव्य रूप सज्जा, मानवीय नाटक होने पर मानवीय रूपसज्जा तथा दिव्य एवं मानवीय दोनों प्रकार के वृत्तों से युक्त नाटक होने पर दिव्य या मानवीय किसी एक रूप सज्जा से अलंकृत होकर उसे अनेक प्रकार से नाटक के प्रतिपाद्य मुख एवं बीज ' के अनुरूप अनेक उपक्षेपों का आश्रय लेकर ज्ञापन कराना चाहिए । इस प्रकार काव्य की प्रस्तावना करने के पश्चात् द्विज स्थापक को निष्क्रमण कर देना चाहिए । पूर्वरंग में इस विधि का प्रयोग किया जाना चाहिए ॥ १६६-१६९ ॥

विधियुक्त प्रयोग की महिमा- य इमं पूर्वरङ्ग तु विधिनैव प्रयोजयेत् ।

नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ १७० ॥

विधिपूर्वक इस पूर्वरंग का प्रयोग करने वाले व्यक्ति का कोई भी अमङ्गल नहीं होता और वह स्वर्गलोक को जाता है ॥ १७० ॥

विधिहीन प्रयोगजन्य दोष—

यश्चापि विधिमुत्सृज्य यथेष्टं संप्रयोजयेत् ।

प्राप्नोत्यपचयं घोरं तिर्यग्योनिं च गच्छति ॥ १७१ ॥

और जो भी इस विधि को छोड़कर मनमाना प्रयोग करेगा उसे घोर अवनति मिलेगी और वह तिर्यक्योनि को प्राप्त करेगा ॥ १७१ ॥

न तथाऽग्निः प्रदहति प्रभञ्जनसमीरितः ।

यथा ह्यपप्रयोगस्तु प्रयुक्तो दहति क्षणात् ॥ १७२ ॥

वायु के वेग से प्रदीप्त अग्नि भी उतनी शीघ्रता से नहीं जलती जितनी जल्दी १. यह प्रस्तावना के एक भेद का नाम है । २. मुख एवं बीज उन उन नाम की सन्धियों की संज्ञा है । नाटक की इन सन्धियों के विषय में ना० शा० के इक्कीसवें अध्याय में विशेष प्रकाश डाला गया है ।

पृष्ठ 297

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२०८ नाट्यशास्त्रम् नाट्य की विधियों का दोषपूर्ण विधान ( मनमानी करने वाले प्रयोक्ता को ) नष्ट करता है ॥ १७२ ॥

देशानुसार पूर्वरंग का प्रयोग- इत्येवावन्तिपाञ्चालदाक्षिणात्यौढमागधेः ॥ १७३ ॥ कर्तव्यः पूर्वरङ्गस्तु द्विप्रमाणविनिर्मितः

पाञ्चाल, दाक्षिणात्य, आन्ध्र एवं मगध देश के निवासियों को दो प्रमाणों वाले इस पूर्वरंग का प्रयोग करना चाहिए ॥ १७३ ॥

पूर्वरङ्ग का उपसंहार- एष वः कथितो विप्राः पूर्वरङ्गाश्रितो विधिः ॥। १७४ ॥ भूयः किं कथ्यतां सम्यङ्नाट्यवेदविधिं प्रति ॥ इति भारतीये नाट्यशास्त्रे पूर्व रङ्गप्रयोगो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

हे ब्राह्मणो! इस प्रकार आपसे पूर्व रङ्ग सम्बन्धी विधि बताई गयी । अब आफ लोगों को नाट्यवेद से सम्बन्धित अन्य किस विधि के विषय में बतलाया जाए ॥ १७४ ॥

॥ इस प्रकार भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र की 'नाट्यप्रदीप ' नामक हिन्दी व्याख्या का ' पूर्वरङ्गप्रयोग' नामक पश्चम अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥

त्रिविध पूर्वरङ्गों की ध्रुवा योजना- [ 'पुनश्चित्रे तथा मिश्रे शुद्धे चैव ब्रवीम्यहम् । यथा योज्या ध्रुवाः पञ्च तथा वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥ चित्र, मिश्र, तथा शुद्ध पूर्वरङ्ग में प्रयुक्त की जाने वाली पाँच ध्रुवाओं की किस भांति योजना करनी चाहिए वह मैं अब बताऊँगा ।

पाँच ध्रुवायें- आदावुत्थापनी कार्या परिवर्तस्तथा भवेत् ।

अवकृष्टाड्डिता चैव विक्षिप्ता चैव पञ्चमी ॥

१. दो प्रमाणों द्वारा पूर्वरंग के त्र्यश्र एवं चतुरश्र इन दोनों भेदों का संकेत है । आचार्य अभिनवगुप्त की भी यही मान्यता है -पूर्वरङ्गो द्विविधस्त्रयश्रव- चतुरश्रश्च । २. पुस्तकेष्वत्राध्यायसमाप्तिः । उपरितनो भागो न दृश्यते । ३. पुस्तकान्तरे एवायं भागो दृश्यते ।

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पञ्चमोयायः २० ९ सबसे पहले उत्थापनी धवा को निष्पन्न किया जाता है फिर परिवर्तनी, अवकृष्टा, अड्डिता एवं पाँचवीं विक्षिप्ता ध्रुवा की जाती हैं ।

एवं पञ्च ध्रुवा ज्ञेया उपोहनसमन्विताः ।

कर्तव्यास्तु प्रयत्नेन पूर्व रङ्ग प्रयोक्तृभिः ॥

उपोहन ' से युक्त इन पाँच ध्रुवाओं को जाना जाता है । पूर्वरङ्ग में प्रयोक्ताओं को इनका प्रयोग यत्नपूर्वक करना चाहिए ।

पाँचों ध्रुवाओं की उपोहन विधि- अतः परं प्रवक्ष्यामि हह्युपोहन विधिक्रियाम् ।

उत्थापनस्याष्टकलं परिवर्तस्य षट्कलम् ॥

अवकृष्टं पुनः कार्यं कलाभिः पञ्चभिर्युतम् ।

ध्रुवायामड्डितायां च चतुष्कलमथापि च ॥

क्षिप्तायां चैव विज्ञेयं कलात्रयसमन्वितम् ।

एवं हचुपोहनानां तु प्रमाणं समुदाहृतम् ॥

इसके बाद मैं उपोहन की विधि बतलाऊँगा । उत्थापनी ध्रुवा में आठ कला, परिवर्तनी में छः अवकृष्टा में पाँच, अड्डिता में चार तथा विक्षिप्ता ध्रुवा में तीन कला के प्रमाण का उपोहन विहित माना है । चित्रमार्ग के अक्षर कला एवं ताल- गुरुलाघवसंयुक्तं कलातालसमन्वितम् । पूर्व रङ्ग सदा ज्ञेयं चित्रमार्गे ह्य पोहनम् ॥ चित्रमार्ग में उपोह्न में गुरु तथा लघु अक्षर एवं कला तथा ताल का योग होता है । त्रिविध पूर्वरङ्गों में त्रिविधमार्गों के अनुसार कलाओं का प्रयोग —

चित्रे चैत्राः कला ज्ञेया मिश्र वार्तिकमाश्रिताः ।

शुद्धे दक्षिणमार्गेण प्रयोक्तव्याः प्रयोक्तृभिः ॥

प्रयोक्ताओं को चित्रपूर्वरंग में चित्र मार्ग के अनुसार मिश्र पूर्वरंग में वार्तिक-मार्ग के अनुसार तथा शुद्ध पूर्वरङ्ग में दक्षिणमार्ग के अनुसार कलाओं का प्रयोग करना चाहिये । १. वस्तु या गीत के प्रयोग में ताल के नियमन हेतु जो आलाप किया जाता है उसे उपोहन कहते हैं । १४ ना०

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२१० नाट्यशास्त्रम्

गीतियों के चार भेद- चतस्रो गीतयः कार्या मागधी ह्यर्धमागधी ।

संभाविता तथा चैव पृथुला च प्रकीर्तिता ॥

मागधी, अर्धमागधी, संभाविता एवं पृथुला इन चार गीतियों का प्रयोग किया जाना चाहिए । चित्रपूर्वरङ्ग की गीतियाँ- मागधी त्वथ कर्तव्या त्वथवा त्वर्धमागधी । पूर्वरङ्ग भवेच्चित्रे चित्रमार्गसमाश्रिता ॥ मागधी अथवा चित्रमार्ग के अनुसार होने वाले चित्र नामक पूर्वरंग में अर्धमागधी का प्रयोग किया जाना चाहिए । मिश्र पूर्व रङ्ग की गीतियाँ— । यथा मिश्रस्तु योक्तव्यः पूर्वरङ्ग भवेदिह मिश्र सम्भाविता कार्या तदा वार्तिकमाश्रिता ॥ शुद्धे च पृथुला कार्या दक्षिणं मार्गमाश्रिता । मिश्र पूर्व रङ्ग ( जो वार्तिक मार्ग के अनुसार होता है ) में सम्भाविता गीति का एवं शुद्ध पूर्वरङ्ग ( जो दक्षिणमार्ग के अनुसार होता है ) में पृथुला गीति का

प्रयोग किया जाना चाहिए' ।

उपोहन के गुरु लघु वर्ण- अतः परं प्रवक्ष्यामि गुरुलाघवतः क्रियाम् ॥

उपोहनक्रियायां तु यथायोज्यं प्रयोक्तृभिः । अब इसके पश्चात् मैं प्रयोक्ताओं द्वारा प्रयोग के अनुसार उपोहन के सम्बन्ध

में गुरु तथा लघु मात्रा विषयक क्रियाओं को बतलाऊँगा ।

उपोहन विधि के अक्षर- दिग्ले दिग्ले पुनः कार्यमन्ते झण्टुं सदा बुधैः ॥

मध्ये लघ्वक्षराणि स्युः षोडशैव तु नित्यशः ।

एवं पोहनं कृत्वा तथा वस्तु समाचरेत् ॥

आरम्भ में दिग्ले, दिग्ले तथा अन्त में झण्टु झण्टु किया जाना चाहिए एवं मध्य में सोलह लघु अकार रखे जाने चाहिए । इस प्रकार उपोहन विधि करने के पश्चात् वस्तु का समायोजन करना चाहिए । १. भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र के इक्सीसवें अध्याय में पूर्वरङ्ग के अतिरिक्त नाट्य तथा संगीत की योजना के साथ भी गीति का प्रयुक्त किया जाना स्वीकार किया है ।

पृष्ठ 300

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पचमोऽध्यायः २११ IIF उत्थापनी ध्रुवा- उत्थापन्यां प्रयोगेऽस्मिन्कलाकालसमन्वितम् ।

अक्षराणां कलायास्तु गुरुलाघवमेव च ।

पूर्वं तु कथितं यस्मात्तस्मान्नाभिहितं भवेत् ॥

उत्थापनी ध्रुवा के प्रसंग में कला एवं काल के आधार पर किया जाने वाला अक्षरों तथा कला का गुरु एवं लाघव विवेचित किया जा चुका है । अतः उसकी यहाँ विवक्षा नहीं की गई है । उत्थापनी ध्रुवा का उदाहरण श्लोक-

यथा- देवं विभुं त्रिभुवनाधिपति कैलासपर्वतगुहाभिरतम् ।

शैलेन्द्रराजतनयादयितं मूर्ध्ना नतोऽस्मि पुरनाशकरम् ॥

तीनों लोकों के स्वामी, कैलासपर्वत की गुहा में रहने वाले, पर्वतसुता पार्वती के पति, पुरन्दर भगवान् शिव को मैं शिरसा प्रणाम करता हूँ । उत्थापनी ध्रुवाका उपसंहार - एवमुत्थापनी कार्या पूर्व रङ्गप्रयोक्तृभिः । अतोऽन्यत्परिवर्ताया लक्षणं संविधीयते ॥ पूर्वरङ्ग का प्रयोग करने वाले व्यक्तियों को इसी विधि से उत्थापनी ध्रुवा का प्रयोग करना चाहिए । इसके आगे अब परिवर्तिनी ध्रुवा का स्वरूप निरूपित किया जायगा ।

परिवर्तिनी ध्रुवा का उपोहन- अस्यास्तूपोहनं कार्यं षट्कलं परिसङ्ख्यया ।

आदी दिग्ले द्विरुक्तस्तु अन्ते झण्टुं सदा भवेत् ॥

परिवर्तनी ध्रुवा छन्द के वर्ण, लय, यति, परिर्वत तथा पाणि- मध्यलघ्वक्षराण्येव द्वादशैव प्रयोजयेत् । वस्तुनोत्र प्रवक्ष्यामि गुरुलध्वक्षरक्रमम् ॥ परिवर्तिनी ध्रुवा में छः कला के परिमाण का उपोहन किया जाता है । प्रारम्भ में दो बार दिग्ले तथा अन्त में सदा झण्टु होता है तथा मध्य में बारह लघु अक्षर रखे जाते हैं । अब मैं वस्तु के गुरु व लघु अक्षरों के क्रम को बतलाऊँगा ।

द्वे चादौ चतुर्थं च अष्टमं दशमं तथा ।

चतुर्दशं पञ्चदशं पादे गुर्वक्षराणि तु ॥