भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 331–340
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 331–340
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२४२ नाट्यशास्त्रम् इसीलिए किसी भी दूसरे विशेष से असंपृक्त ( अनुपहित ) रहने के कारण वह रसना अर्थात् अस्वाद का विषय बनती हुई न तो लौकिक प्रतीति है, न मिथ्या है, न अनिर्वचनीय, न किसी लौकिक प्रतीति के समान है और न ही किसी का आरो-पण रूप । कहने के लिए (लोल्लट के मत से ) वह उपचय रूप अवस्था हो सकती हैं क्योंकि देश और काल के नियंत्रण से वह मुक्त है; वह अनुकरणरूप भी हो सकती है क्योंकि भावों का अनुगामिरूप से पुनर्प्रस्तुतीकरण होता है । विज्ञानवाद का सहारा लेकर ( प्रवृत्ति और आलयविज्ञान की मौलिक एकता के कारण? — अभिनवभारती का यह अंश अस्पष्ट है ) यह भिन्न घटकों का संघात या विषय- सामग्री भी कही जा सकती है । चाहे जिस दृष्टि से देखें, हर तरह रसनामयी विघ्नरहित प्रतीति से ग्राह्य भाव ही रस है । यहाँ विघ्न को दूर करने वाले हैं विभाव, अनुभाव इत्यादि । लौकिक व्यवहार में भी सारे विघ्नों से मुक्त चेतना ही चत्मकार, निर्वेश, रसना, आस्वादन, भोग समापत्ति, लय और विश्रान्ति इत्यादि शब्दों से पुकारी जाती है । इस प्रत्यक्ष प्रतीति में सात प्रकार के विघ्न हैं - ( १ ) सम्भावना के अभाव के कारण ज्ञान के विषय रूप में पदार्थ की अयोग्यता, ( २ ) नियमतः आत्मसंबद्ध या पर- संबद्ध रूप से प्रतीत होने वाले देश विशेष और कालविशेष में लीन होना, [ ३ ] अपने सुख दुःख के वश में होना, [ ४ ] प्रतीति के उपाय में दोष का होना, [ ५ ] स्फुटता या प्रामा-णिकता का अभाव, [ ६ ] किसी प्रधानतत्व का अभाव और [ ७ ] संदेह का उपस्थित होना । इन्हें हम अब क्रम से लेते हैं— [ १ ] संवेद्य को संभव न मानता हुआ जो संवेद्य में ही अपनी मति को ठीक से नहीं बैठा पाता, वहाँ कैसे टिकेगा - यह पहला विघ्न है । इसको हटाने का उपाय है संसार की सामान्य वस्तुओं के सम्बन्ध में होने वाला हृदयसंवाद; और जब असाधारण घटनाओं का चित्रण करना होता है, तब उपाय है रामादि नामक प्रख्यात चरित्रों का आश्रयण, जिनका नाम ही चिरन्तन काल से चली आती हुई अविच्छिन्न कीर्ति से उत्पन्न हमारी चेतना में [ अर्थात् हमारे सांस्कृतिक अवचेतन में ] गहरे पैठे विश्वास को उभारने में समर्थ है । यही कारण है कि अलोकसामान्य व्यक्ति के उत्कर्ष के विषय में ज्ञान करना [ युति ] और शिक्षा देना [ उपदेश ] जिनके दो प्रयोजन हैं- ऐसे नाटक [ और महाकाव्य ] इत्यादि को लेकर [ आगे आठवें अध्याय में ] यह नियमपूर्वक विधान किया जाएगा कि इनकी विषयवस्तु प्रख्यात होनी चाहिए । प्रहसनादि में ऐसा नहीं होता । यह बात अपने मौके पर कही जाएगी, अतः इस विषय में यहीं रुकना ठीक रहेगा ।
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षष्ठोऽध्यायः २४३ [२] एक प्रधान विघ्न जो नियमतः घटित होता है वह है सामाजिक के द्वारा एकमात्र अपने में रहने वाली ( स्वगत ) सुख और दुःख की चेतनाओं के आस्वादन में मुख्य संवेदन से भिन्न दूसरे संवेदन का उदय । होता यह है कि यथा संभव सामाजिक के इस भय से कि सुख की अनुभूति कहीं बीत न जाए या इस व्यग्रता से कि ये सुख की अनुभूति बनी रहें, या इस इच्छा से कि सुख की ऐसी अनुभूतियाँ और भी होती रहें, या इस कामना से कि यह दुःख की अनुभूति छोड़ हूँ या इसको पूरी तरह से कह सकू या छिपा सकूँ या अन्य किसी प्रकार से एक दूसरे संवेदन का उद्गम ही बड़ा भारी विघ्न बन जाता है । इसी प्रकार दूसरे में रहने वाले ( परगत ) सुख, दुःख, की संवेदना होने पर सामाजिक के मन में नियमतः सुख, दुःख, मोह और उदासीनता रूप [ मुख्य संवेदन से भिन्न ] अन्य संवेदनों के उदय की संभावना से अनिवार्यतः विघ्न पैदा हो जाता है । इस विघ्न को दूर करने का उपाय है भाषागत भेद, ( नर्तकियों के ) लास्य के अङ्ग, रंगपीठ, मण्डप में पायी जाने वाली, कक्ष्या रूप लोक में अप्राप्य नाधर्मियों के ग्रहणपूर्वक मुखौटे;प्रसाधन इत्यादि के प्रयोग के द्वारा नट का अपने स्वरूप को छिपाने के भिन्न प्रकारों का आश्रयण । यह बात दर्शकों को पूर्वरङ्ग में [ देखिए ना. शा. ५.१६५-६६ "पूर्वरङ्ग को बहुत फैलाना नहीं चाहिए" ] और प्रस्तावना के समय [ देखिए ना. शा. ' नटी या विदूषक " इत्यादि ] ही स्पष्ट हो जाती है । उपर्युक्त तत्त्वों की उपस्थिति में इस प्रकार की प्रतीति नहीं होने पाती - इसी का, यहीं, पर इस समय सुख या दुःख है — क्योंकि एक ओर नट के वास्तविक स्वरूप का गोपन होता है और दूसरी ओर आरोपित चरित्र में सामाजिक की चेतना के पूरी तौर पर टिक न पाने के कारण [राम आदि आरोपित चरित्र के ) वास्तविक रूप में सामाजिक की चेतना विश्रान्त नहीं हो पाती । इन सब बातों का परिणाम यह होता है कि यहाँ पर दोनों के वास्तविक स्वरूप का गोपन होता है—नट का और नट द्वारा अभिनीयमान चरित्र का । यद्यपि अभिनीयमान चरित्र नट और अनुकार्य दोनों का गोपन करता है । इसका अर्थ यह नहीं है कि वह है ही नहीं; क्योंकि उसका अस्तित्व -, सामाजिक की चेतना का एक तथ्य एक प्रदत्त है । जैसे कि यह कहना सही है। कि आसीन पाठ्य, पुष्पगंडिका जैसे लास्य के प्रकार सामान्यतः संसार में नहीं देखे जाते किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी किसी भी प्रकार से सत्ता नहीं है; क्योंकि किसी न किसी रूप में उनकी संभावना है । बात यह है कि मुनि ने संबद्ध और प्रासंगिक सामग्री का यह जमावड़ा साधारणीभाव की सिद्धि द्वारा रसवर्णा में उपयोगी के रूप में किया है । इसलिए लास्य इत्यादि का रहस्य भी
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२४४ नाट्यशास्त्रम् वहीं पर [ १ ९ वें अध्याय में ] स्पष्ट होगा । अतः इस समय इस दिशा में हमें प्रयास नहीं करना चाहिए । यहाँ तो हमने अपने में या दूसरे में नियतरूप से रहने वाले देश, काल इत्यादि के प्रतीति रूप विघ्न के निराकरण के उपाय का प्रतिपादन किया है । ३. जो अपने ही सुख या दुःख के वशीभूत है वह दूसरी वस्तु में चित्त कैसे लगा पाएगा । अतः इस विघ्न के निवारण के लिए उचित समय और अवसरों पर प्रयोग के लिए गेय और वाद्य संगीत, सुसज्जित मण्डप, विदग्धगणिका रूप उपायों का आश्रय लिया गया है । ऊपर वर्णित साधारण्य की महिमा से शब्दादि विषय वाले ये सारे पदार्थ ऐसे हैं जो सारे प्रमाताओं के द्वारा भोगे जाने योग्य हैं और इस प्रकार से [ सारी वस्तु स्थिति ] को रंग देते हैं [ उपरंजन ] कि साधारणतः हृदयहीन प्रमाता भी सहृदय बन जाता है । शब्द और रूप विषयों की इस उपरंजकता की दृष्टि से ही काव्य को ' दृश्य या श्रव्य' [ ना० शा० १.११ ] कहा गया है । और क्या, अगर प्रतीति के साधनों का ही अभाव है तो मानी हुई बात है कि प्रतीति का भी अभाव रहेगा । ५. [ शाब्दबोध या अनुमान जैसी ] अस्फुट प्रतीति के जनक शब्द या हेतु के होने पर भी बुद्धि पूरी तरह से उन पर टिक नहीं पाती; क्योंकि स्फुट प्रतीति रूफ प्रत्यक्ष के अनुरूप बोध की आकांक्षा ऐसे स्थलों पर बनीं ही रहती है । जैसा कि न्याय सूत्र में वात्स्यायन ने कहा है “और यह सारी प्रमा प्रत्यक्ष पर निर्भर है " [ न्या. सू. भा. १ ] क्योंकि यह बात सुनिश्चित है कि जिस पदार्थ का प्रत्यक्ष से हुआ है उसको सैकड़ों आगम या अनुमान प्रमाणों से उसका भिन्न रूप का [ अन्यथाभाव ] ज्ञान नहीं हो सकता । यहाँ तक कि अलातचक्र जैसे [ भ्रान्त- प्रत्यक्ष के ] स्थलों पर भी दूसरे प्रत्यक्ष से ही भ्रान्ति का निश्चय होता है [ कि यह अग्नि का चक्का नहीं बल्कि मशाल है ] । यही संसार का क्रम है । इस कारण से इन दोनों विघ्नों का नाश करने के लिए लोकधर्मयों [ यथातथ्य प्रस्तुती-करण ], वृत्तियों [ कौशिकी, सात्वती, आरभटी और भारती नामक शैलियाँ ] और प्रवृत्तियों [ स्थानीय प्रयोग ] से उपस्कृत चारों प्रकार के अभिनयों का आश्रय लिया जाता है । सच पूछिए तो अभिनय एक ऐसा व्यापार है जो शब्द और लिङ्ग के व्यापार से भिन्न है और प्रत्यक्ष के व्यापार के समान है । इसका विस्तार में निश्चय आगे चल कर होगा । ६. गौण पदार्थ में किसकी बुद्धि टिकती है? क्योंकि अप्रधान वस्तु का ज्ञान दूसरी प्रधान वस्तु के पीछे भागते रहने के कारण आत्मनिर्भर या अपने में पर्यवसित
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षष्ठोऽध्यायः २४५ नहीं होता । रस के सन्दर्भ में यह अप्रधानता विभावों और अनुभावों- [जो जड हैं ] - में और व्यभिचारियों -जो चेतन होने पर भी नियमतः दूसरे [ स्थायीभाव ] का मुँह जोहते रहते हैं - में पायी जाती है अतः इनसे भिन्न स्थायी ही उस प्रकार की चर्वणा का विषय है । इन स्थायिभावों में कुछ स्थायी पुरुषार्थपरक हैं; अतः वे ही प्रधान है । जैसे रति [ श्रृङ्गार का स्थायिभाव ] काम और उससे संबद्ध धर्म और अर्थ नामक पुरुषार्थी पर आश्रित है । क्रोध [ रौद्र का स्थायी भाव ] कोपप्रधान व्यक्तियों में पाया जाने पर भी अर्थनिष्ठ है और फिर काम और धर्म में भी पर्यवसित होता है । उत्साह [ वीर का स्थायिभाव ] धर्म, अर्थ, काम सभी तीनों में पाया जाता है -और शम [ शान्त का स्थायी भाव ] तत्त्वज्ञान से उत्पन्न निर्वेद या वैराग्य जैसा भाव मोक्ष का उपाय है । इस प्रकार इन्हीं चारों की प्रधानता है । यद्यपि आपस में ये भी एक दूसरे से गौण बनकर आते हैं, तब भी एक नाटक में एक प्रधान तो दूसरे में दूसरा । इस प्रकार रूपक भेद से बारी बारी से सभी की प्रधानता दिखाई पड़ती है । जो लोग दूर तक देखने में समर्थ हैं उनकी दृष्टि में तो एक ही रूपक में स्थलभेद से उनकी प्रधानता पृथक् दिखाई देती है । इनमें सभी रस सुखप्रधान हैं । क्योंकि अपनी ही चेतना का आस्वादन रूप घनीभूत प्रकाश का सार है आनन्द । यहाँ तक कि लौकिक जीवन में भी रति के अंतरंग क्षणों में स्त्रियाँ जब एकघन शोक की अनुभूति के आस्वादन में डूबी रहती हैं उस समय उसमें उनका हृदय रमता है क्योंकि सुख का स्वरूप ही है किसी प्रकार के व्यवधान से रहित विश्रान्ति । विश्रान्ति का न होना ही दुःख है । यही कारण है कि कपिल के अनुयायियों ने दुःख को रजोगुण की वृत्ति बताते हुए प्रकारान्तर से चञ्चलता को ही दुःख के प्राणरूप में स्वीकार किया है । इस प्रकार सारे रस आनन्दरूप हैं, किन्तु उपरञ्जक विषयों के कारण उनमें भी कहीं कहीं कड़ एपन का स्पर्श हो जाता है। जैसे वीररस में । क्योंकि उसका प्राण ही है क्लेश सहिष्णुता । इस प्रकार रति आदि स्थायीभाव प्रधान कहलाते हैं । सारे संसार में सहज ही प्राप्त होने के कारण अपने विभावों से हृदय को रंग लेने की शक्ति के कारण हास आदि की भीं प्रधानता मानी हैं । इसीलिए छोटे व्यक्तियों में हास इत्यादि अधिकता से पाए जाते हैं । छोटे दर्जे के लगभग सभी व्यक्ति हँसते हैं, दुखी होते हैं, डरते हैं और दूसरे की निन्दा में मजा लेते हैं । छोटी सी भी सुख की बात से चकित हो उठते है । रत्यादि के अंग के रूप में ये हास इत्यादि पुरुषार्थसिद्धि में भी उपयोगी होते हैं । इन्हीं की प्रधानता और अप्रधानता को लेकर रूपकों के दस भेद किए गए हैं, आगे चलकर अभिनवगुप्त द्वारा इसका स्पष्ट प्रतिपादन प्राप्त होता है ।
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२४६ नाट्यशास्त्रम् इतने ही स्थायीभाव हैं । पैदा होते ही प्राणी इतनी चित्तवृत्तियों से पूरी तरह घिर जाता है । वस्तुतः "प्राणी दुःख के स्पर्श से भागता है और सुख के आस्वादन के प्रति आकृष्ट होता है " इस उक्ति के अनुसार प्रत्येक प्राणी रमण ( रति ) की इच्छा से व्याप्त रहता हैं, अपने को दूसरे से अच्छा मानते हुए दूसरे का उपहास उड़ाता है ( हास ), अभिलषित पदार्थ से वश्चित कर दिए जाने पर दुःखी होता है ( शोक ), इस वियोग के कारणों को लेकर क्रोध के बस में हो जाता है ( क्रोध ), इन कारणों को दूर कर पाने में अक्षम होने पर उनसे डरता है ( भय ), फिर भी, उन पर कुछ न कुछ विजय तो पाना ही चाहता है ( उत्साह ), अनुचित वस्तु के विषय में विरक्ति या विमुखता उसे घेर लेती है और उसको वह अवांछनीय के रूप में मानने लगता है ( जुगुप्सा ), अपने या किसी अन्य के असाधारण कार्यों को देखने से उसे विस्मय होता है ( विस्मय ) और कुछ न कुछ त्यागने के लिए इच्छुक रहता है ( राम ) कोई भी जीवित प्राणी इन चित्तवृत्तियों की वासना अर्थात् संस्कार से रहित नहीं होता । केवल किसी की कोई चित्तवृत्ति कुछ ज्यादा और किसी की कुछ कम होती है । किसी की चित्तवृत्ति का उद्रेक सामान्य ( उचित ) विषय से हो जाता है और किसी का सामान्येतर विषय से । इस प्रकार कुछ ही चित्तवृत्तियाँ ( केवल स्थायी न कि व्यभिचारी भी ) पुरुषार्थं के साधन में उपयोगी होती हैं । अतः उन्ही का उपदेश किया जाना चाहिए ( क्योंकि काव्य या नाटक कान्तासम्मित उपदेश है ) । इन चित्तवृत्तियों के विभावों -आलंबन से ही उत्तम प्रकृति आदि के मनुष्यों का निर्णय होता है । फिर जो ये ग्लानि, शङ्का इत्यादि विशिष्ट चित्तवृत्तियाँ हैं वे यदि उनके विभाव नहीं हैं तो, जन्म ही नहीं लेती । उदाहरण के लिए रसायन का उपयोग किए हुए मुनि में ग्लानि, आलस्य, श्रम इत्यादि चित्तवृत्तियाँ उठ ही नहीं पाती, और जिसके होती भी हैं उस व्यक्ति के भी हेतु के नष्टहो जाने पर खुद भी नष्ट होती हुई संस्कार या वासना रूप में भी अपना अवशेष नहीं छोड़ती । इसके विपरीत उत्साह आदि चित्तवृत्तियाँ तो अपना कर्तव्य कर चुकने पर विलीनप्राय होती हुई भी संस्काररूप में अवश्य बनी रहती हैं, क्योंकि दूसरे करणीय के विषय में उत्साह आदि अखंडित रहते हैं । जैसा कि पतञ्जलि ( वस्तुतः यह उक्ति व्यास की है ) ने कहा भी है [ यो० सू० २.४ पर ब्या.भा. ] — “चैत्र एक स्त्री में अनुरक्त है इसका अर्थ यह नहीं है कि वह अन्य स्त्रियों में विरक्त है । " इस प्रकार स्थायिरूप चित्तवृत्ति में गुथे हुए ही ये क्षणिक भाव इसीलिए व्यभिचारि कहलाते हैं क्योंकि आविर्भाव और तिरोभाव जन्य अनन्त वैचित्र्य मक स्वरूप को यह धारण करते हैं, क्योंकि ये स्फटिक, कांच, अभ्रक, पुखराज, पन्ना,
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षष्ठोऽध्यायः २४७ नीलम इत्यादि रत्नों के समान हैं जो लाल नीले आदि रंग के तागे में पोए जाकर उनके बीच में झलकने वाले तागे के खाली अंश, [ रत्नों के योजना भेद से ] जिसकी हजारों भंगिमाएं सम्भव हैं, में अपने संस्कार जन्य वैचित्र्य का आधान न करते हुए भी उस रंगीन तागे [ और रत्नों की योजना भेद से होने वाले विरलभाव के विभिन्न रूपों ] के द्वारा [ इन रत्नों में ] किए गए उपकारों अर्थात् सौन्दर्यो को धारण करते हैं और स्वयं भिन्न भिन्न तरह के होने के कारण ये स्थायिरूप तागे को वैचित्र्य से मण्डित करते हैं अर्थात् बीच बीच में वर्तमान शुद्ध स्थायिरूप तागे को दो रत्नों के प्रतिभासन परिधि में लाकर पहले और पीछे वाले व्याभिचारीरूप रत्नों की छाया की शबलिमा से उपरंजित करते हैं । यही कारण है कि इन्हें अस्थिर या व्यभिचारी कहा जाता है! इसीलिए जब कोई यह कहता है कि "यह ग्लान है " तो तत्काल ही उसके कारण को लेकर प्रश्न उठता है " क्यों ( यह ग्लानियुक्त है )?" । इससे इस चित्तवृत्ति की अस्थायिता सूचित होती है किन्तु यह कहने पर कि " राम से बड़ा उत्साह है" कोई इसके कारण के बारे में सवाल नहीं पूछता । अतः यहाँ पर विभाव स्थायिरूप चित्तवृत्तियों को उबुद्ध करते हुए और उनके स्वरूप को अपने वैशिष्ट्य से रंगते हुए केवल रति और उत्साह इत्यादि के औचित्य या अनौचित्य को ही धारण करते हैं । ऐसा नहीं है कि विभावों के अभाव में स्थायीभावों का कोई अस्तित्व ही नहीं है; क्योंकि वासना रूप से ये चित्तवृत्तियाँ सारे प्राणियों में रहती ही हैं यह बात पहले प्रतिपादित की जा चुकी है । किन्तु व्याभिचारियों के विषय में ऐसा नहीं है । अपने विभावों के अभाव में तो उनका नाम तक नहीं रहता । आठवें अध्याय में यह बात विस्तार से समझाई गई है । इस प्रकार अप्रधानता दोष का परिहार स्थायिभावों के निरूपण द्वारा भी भरत ने इस कथन के द्वारा कर दिया है कि "अब हम स्थायिभावों को रसत्व तक पहुँचाएंगे [ ना. शा. ६.५० के बाद का गद्यांश ] जहाँ "विभावानुभाव व्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः" रूप रस के सामान्यलक्षण के अंगरूप में ही स्थायिविशेषों के स्वरूप पर विचार किया गया है । रस के सभी घटकों में विभाव, अनुभाव, और व्यभिचारी का किसी स्थायी- भाव विशेष से कोई नियत संबंध नहीं है क्योंकि आँसू [ अनुभाव ] इत्यादि आनन्द, आँख के रोग आदि से उत्पन्न होते हुए देखे जाते हैं । बाघ [ विभाव ] क्रोध को भी उत्पन्न कर सकता है और भय को भी । श्रम, चिन्ता जैसी चित्तवृत्तियाँ [ व्यभिचारी ] भय, उत्साह आदि अनेक स्थायिभावों के साथ देखी जाती हैं । किन्तु अपनी समग्रता में [ एक सामग्री के रूप में ] इनका स्थायी विशेष से विपरीत आचरण नहीं होता । उदाहरण के लिए सम्बन्धियों का विनाश
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:२४८ नाट्यशास्त्रम् जहाँ विभाव हो, विलाप और आंसुओं का गिरना जहाँ अनुभाव हो चिन्ता एवं दीनता जहाँ व्यभिचारी हो वहाँ अवश्य शोक नामक स्थायी भाव की स्थिति होगी । यही कारण है कि विभाव इत्यादि को लेकर संदेह का उदय होने पर शंका रूपी विघ्न को शान्त करने के लिए भरत ने रससूत्र में 'संयोग' का प्रयोग किया है । [ यह बात ध्यान देने की है कि यद्यपि स्थायी ही रस बनता है [ स्थायी एव. रसीभूतः ); पर रस और स्थायि एक नहीं हैं । रस स्थायी से भिन्न है । अभिनवगुप्त ने इसे लोकजीवन में व्यक्ति और काव्यजीवन में सामाजिक की भूमिकाओं की तुलना करते हुए इसे बड़े अच्छे ढंग से स्पष्ट किया 1 ] लोक व्यवहार में कार्य, कारण और सहकारिकारणरूप हेतु को देखकर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की स्थायिरूप चित्तवृत्ति का अनुमान कर लेता है । धीरे धीरे अभ्यास के इस प्रकार के अनुमान करने में कुशलता प्राप्त जाने के कारण अब नाटक के सन्दर्भ में उन्हीं उद्यान [ कारण ], कटाक्ष [ कार्य ] और धृति [ सहकारी ], जो सामाजिक की बुद्धि में संयोग, सम्यक् योग सम्बन्ध अर्थात् एकाग्रता प्राप्त कर एक सामग्री के रूप में उभरते हैं— के लौकिक संवेदनों से भिन्न और विघ्नों से रहित संवेदनात्मक आस्वादन का विषय बनता हुआ अर्थ 'रस ' कहलाता है । चवर्ण प्रक्रिया का विषय बने रहना ही [ चर्व्यमाणता ] इसका एकमात्र स्वभाव हैं । यह सिद्ध स्वभाव वाला अर्थात् परिघटित विषय रूप नहीं है । चर्वणा काल में ही इसका अस्तित्व है । इसके अतिरिक्त अन्य किसी काल में यह उपलब्ध नहीं होता । अर्थात् यह साध्य या प्रक्रिया रूप है, सिद्धरूप नहीं । इसीलिए यह स्थायी से विलक्षण है । नाट्य संदर्भ में उपयुक्त उद्यान इत्यादि लौकिक कारण भूमि या कार्यभूमि से परे हो जाते हैं और उसका एकमात्र प्रयोजन रह जाता है विभावना [ रत्यादि में आस्वादाङ्कुरण की योग्यता का लाना ], अनुभावना रत्यादि का समनन्तर रसादि रूप में भावन] और सचारण [ इस प्रकार के स्थायिभाव को सम्यक् गति प्रदान करना ] रूप व्यापारों के द्वारा सामाजिक की बुद्धि का उपरञ्जन । इसलिए कार्यकारण की लौकिक संज्ञाओं से भिन्न उन्हें विभाव, अनुभाव और व्यभिचारि जैसे लोकोत्तर व्यपदेश से संबोधित किया जाता है । इस नामकरण का उद्देश्य पूर्व कारण कार्य इत्यादि के द्वारा छोड़े हुए संस्कारों पर इनकी निर्भरता [ उपजीवन ] को बताना । ये विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी बारी- बारी से गौण या प्रधान रूप से सामाजिक की चेतना में एक विशिष्ट सम्बन्ध में अनुगुम्फित होकर एक सामग्री का निर्माण करते हैं जिसके द्वारा ही, जैसा कि हम पहले कह चुके हैं, लोकोत्तर वीतविघ्न चर्वणात्मक संवेदन की गोचरता को प्राप्त तत्त्व 'रस' कहलाता है । यह स्थायी नहीं, स्थायी से विलक्षण है । न कि जैसा शङ्कुक आदि ने कहा है कि चूँकि विभावादि के द्वारा
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षष्ठोऽध्यायः २४९ स्थायी की प्रतीति होती है और चूँकि वह आस्वादन का विषय बनता है अतः वही रस है । यदि शंकुक की बात मान ली जाए तो लौकिक स्थायीभाव को ही रस क्यों न मान लिया जाए । जिस मत में असत् अर्थात् अनुकृत स्थायी रसनीयता मानी जाती हो वहाँ वास्तविक अर्थात् लौकिक स्थायी की रसनीयता क्यों नहीं होगी? इसलिए स्थायी की प्रतीति को अनुमिति रूप कहना चाहिए, रस नहीं । यही कारण है कि रस सूत्र में भरत ने स्थायी शब्द का ग्रहण नहीं किया है, बल्कि इसका ग्रहण काँटे की तरह खटकने वाला होता । [ भरत ने 'स्थायिनः विभावा- नुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः' नहीं कहा । कहते तो अर्थ होता कि रस किसी भी अन्य व्यक्ति के स्थायी भाव की प्रतीति है । ] 'स्थायी रस बनता है ' इस प्रकार की बातें केवल औचित्य के आग्रह से कही जाती हैं । औचित्य केवल इतना है कि जो स्थायि विशेष के साथ कारण कार्य इत्यादि के रूप में प्रसिद्ध थे उन्हीं का चर्वणा में उपयोगी होने के नाते विभाव आदि के रूप में अवलम्बन लिया जाता है । इस प्रकार लौकिक चित्तवृत्ति के अनुमान में कोई रसत्व नहीं है । इसलिए लोकोत्तर चमत्कार रूप रस का आस्वादन स्मृति, अनुमान इत्यादि अपने लौकिक संवेदनों से विलक्षण है । इस बात को यों समझा जा सकता है - लौकिक अनुमान के संस्कारों से युक्त सामाजिक नाटक में किसी प्रमदा को उदासीन भाव से नहीं देखता; अपितु हृदयसंवादरूप अपनी सहृदयता के बल से अनुमान, स्मृति आदि की सीढ़ी पर चढ़े बिना ही पूरे होने वाले रसास्वाद के अंकुर के रूप में और तन्मयीभाव की उपयुक्त चर्वणा के प्राण या स्रोत के रूप में ग्रहण करता है । यह चर्वणा अतीत में किसी अन्य प्रमाण से उद्भूत नहीं हुई और न ही इस चर्वणा की निष्पत्ति में प्रत्यक्षादि लौकिक प्रमाणों का व्यापार है बल्कि लोकोत्तर विभावादि के एकमात्र संयोग की सामर्थ्य से ही इस चर्वणा का उद्रेक होता है । यह रसना [ १ ] प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, उपमान आदि लौकिक प्रमाणों से होने वाले रति आदि स्थायीभावों के बोध से भिन्न है । [२ ] इसी प्रकार योगि- प्रत्यक्ष से होने वाले दूसरे के चित्त के तटस्थ ज्ञान से भिन्न है । और [ ३] सभी विषयगत उपरागों से मुक्त, शुद्ध परमयोगी को होने वाले स्वात्मानन्द के एकघन अनुभव से भी भिन्न है । क्योंकि बोध के इन तीनों प्रकारों में क्रमशः उपार्जन रूप भिन्न-भिन्न विघ्नों के उदय के कारण, उदासीनता तथा तज्जन्य अस्फुटता के कारण और विषय स्पर्श की विवशता के अभाव अर्थात् विषयास्वाद की शून्यता के कारण सौन्दर्य का अभाव रहता है । यहाँ पर इसके विपरीत सुख दुःख के संवेदनों का केवल हमसे संबन्धित रूप में ग्रहण न होने के कारण विषय के आवेश में रहने की
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२५० नाट्यशास्त्रम् कोई विवशता नहीं है । अपना भी उल्लेख [ स्वानुप्रवेश ] होने से संवेदनों का एकमात्र दूसरे से सम्बद्धरूप में ग्रहण न होने के कारण उदासीनता और अस्फुटता नहीं पायी जाती; और अपनी रत्यादि वासना –जो उपयुक्त विभावादि के साधारणी-करण के द्वारा जगाई जा चुकी है और विभावादि के अनुरूप है - में आवेश बने रहने के कारण अन्य विघ्नों का उदय सम्भव नहीं है यह बात हम कई बार कह चुके हैं । अतः विभावादि रस की उत्पत्ति के हेतु [ कारक हेतु ] नहीं है क्योंकि तब उनका बोध समाप्त हो चुकने पर भी रसानुभव को होते रहना चाहिए । नही के रस की ज्ञप्ति के हेतु ज्ञापक हेतु ] हैं; जिनसे कि उनकी गणना प्रमाणों के बीच की जाए, क्योंकि विषयभूत किसी भी ऐसे रस का अस्तित्व नहीं है जो प्रमेय बन सके । प्रश्न यह है कि फिर ये विभावादि क्या हैं? सच बात यह है कि चर्वणा का साधक विभावादि का व्यवहार अलौकिक ही है । ऐसी वस्तु कहीं देखी भी गयी है-यदि ऐसा कोई पूछे तो लोकोत्तरता सिद्धि के हमारे अभियान में यह दूषण नहीं बल्कि भूषण हैं । पानक रस का स्वाद क्या गुड़ काली मिर्च आदि उसके घटकों में कहीं देखा गया है । उपर्युक्त बात भी ऐसी ही है । कोई कह सकता है कि तब रस ज्ञान का विषय नहीं हो सकेगा । यह कहना उचित है । वस्तुतः यह रस्यात्मक अर्थात् रस्य है प्रमेयरूप नहीं । तब सूत्र में यह कैसे कहा गया है कि रस की निष्पत्ति होती है । वस्तुतः यह निष्पत्ति रस की नहीं; अपितु रसविषयक रसना की होती है । रसविषयक रसना की निष्पत्ति से यदि एकमात्र उसी के अधीन जीवन वाले रस की निष्पत्ति भी कही जाती है तो इससे कोई दोष नहीं होता; और वह रसना न प्रमाण का व्यापार है, न कारक का । स्वयं में वह अप्रामाणिक भी नहीं कही जा सकती; क्योंकि अपने ही संवेदन से उसकी सत्ता प्रमाणित है । यह रसना निश्चय ही बोधरूपा है । किन्तु बोध की लौकिक विधाओं से विलक्षण है; क्योंकि इसके विभावादि उपाय ज्ञान के लौकिक उपायों से भिन्न हैं । अतः विभावादि के संयोग से चूँकि रसता की निष्पत्ति होती है उसी कारण से उस प्रकार की रसना के द्वारा ग्राह्य या आस्वादनीय लोकोत्तर अर्थ रस है - यह इस सूत्र का तात्पर्य है । इसे संक्षेप में यों कहा जा सकता है- मुकुट और मुखौटे इत्यादि से पहले तो यह नट है यह प्रतीति छिप जाती है । फिर, पूर्वकालीन बुद्धि के गहरे संस्कारों के कारण, काव्य के बल लाई जाती हुई भी राम की प्रतीति नट में पूरी तरह से स्थिर नहीं हो पाती । अतः सामाजिक के मन में दोनों के [ नट और राम — अनुकर्ता और अनुकार्य ] देश और काल का उन्मूलन हो जाता है । रोमाञ्च आदि लौकिक
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षष्ठोऽध्यायः २५१ को दृष्टान्तः । अत्राह -यथा हि नानाव्यञ्जनौषधिद्रव्यसंयोगाद्रस--निष्पत्तिः तथा नानाभावोपगमाद्रसनिष्पत्तिः । यथा हि-गुडादिभिर्द्रव्यं-र्व्यञ्जनैरौषधिभिश्च षाडवादयो रसा निर्वर्त्यन्ते तथा नानाभावोपगता अपि स्थायिनो भावा रसत्वमाप्नुवन्तीति । अत्राह - रस इति कः पदार्थः? उच्यते -आस्वाद्यत्वात् । भरत मुनि ने प्रश्न उठाया है कि क्या इस विषय में कोई दृष्टान्त है? जैसे नाना व्यञ्जन, औषधि एवं द्रव्यों के संयोग से पेय रस की निष्पत्ति होती है, वैसे ही नाना भावों के उपगम से ( दृश्यकाव्य में ) रस की निष्पत्ति होती है । जैसे गुड़ इत्यादि पदार्थों एवं इमली, हल्दी आदि औषधियों से युक्त व्यंजन' छः प्रकार का हो सकता है उसी भाँति अनेक भावों से युक्त स्थायी भाव “रसत्व" को प्राप्त होते हैं । भरत मुनि पुनः प्रश्न करते हैं कि यह कौन सी वस्तु है?" इसके उत्तर में होने पर भी अनेक बार रति के द्योतक के रूप में ही सामाजिक के द्वारा देखे गए हैं । अतः लौकिक देशकाल के बन्धन से मुक्त होकर वे उस रति का अवगमन कराते हैं, जिसमें उस वासना से युक्त होने के कारण सामाजिक का आत्मोल्लेख भी होता है । अतः रति का बोध न तो सामाजिक उदासीन भाव से करता है और न ही निश्चित आलम्बन के रूप में अपने से संपृक्त रूप में; जिससे कि उपार्जन आदि विघ्नों की सम्भावना हो वही नियत दूसरे व्यक्ति से सम्बद्ध रूप में जिससे दुःख, द्वेष, ईर्ष्या आदि की सम्भावना हो । अतः इस प्रकार से, साधारणीभूत प्रवाह वृत्ति वाली एक ही संविद की आस्वाद्यभूत रति शृंगार है और यह साधारणीभाव विभावादि के द्वारा उपलब्ध होता है । १ व्यंजन का अर्थ अभिनव के मत में उपसेचन पदार्थ है । तिक्त, मधुर, चुक्र, लवण, कड़वा व कसैला छः भेद व्यंजनों के होते हैं । इनमें से भिन्न स्वाद के इमली, गेहूं, काँजी, हल्दी आदि पदार्थों के संयोग से पाचक जिस षाडव रस का निर्माण करता है उसमें इनमें से किसी भी स्वाद की अलग सत्ता नहीं होती । अपितु इन सबके मिश्रण से एक अभूतपूर्व अनोखे स्वाद की ही स्थिति होती है । इसी भांति विभावादि द्वारा उत्पन्न होकर प्रत्यक्ष कल्पना को प्राप्त रूप में, लौकिक भावों की अपेक्षा से जो स्थायीभाव हैं वे अपने रसमयतारूप प्राणतत्व के साथ नाटकादि में रसत्व को प्राप्त करते हैं । २. इस प्रश्न द्वारा यहाँ सूत्र के लक्षणपद की व्याख्या के लिए प्रश्न किया गया है । रस शब्द का प्रयोग अधिकतर मधुरादि रस, पारद, विषय, सार, जल-- संस्कार, अभिनिवेश, क्वाथ, देह, धातु का सार आदि अर्थों में प्रसिद्ध है । पर इस