भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 321–330

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 321–330

पृष्ठ 321

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२३२ नाट्यशास्त्रम् वह यह है, इस प्रकार की प्रतीति होती है । शंकुक स्पष्ट कहते हैं कि रसानुभव-काल में होने वाला ज्ञान न तो सन्देह रूप है, न वास्तविक तत्त्व रूप, और न भ्रान्ति रूप है । वह यह है यह चेतना होती है न कि यह वही है । इस प्रकार परस्पर विरुद्ध ज्ञानों के सम्मिश्रण न होने के कारण विरुद्ध भावो के संप्लव या सेंकर से रहित इस विलक्षण रसानुभव, जो साक्षात् अनुभव का विषय है, का किसी भी युक्ति से खण्डन नहीं किया जा सकता । आचार्य भट्टतोत के मत में यह मत तर्कसंगत नहीं है । क्योंकि यदि रस को अनुकरण रूप माना जाए तो यह स्पष्ट नहीं होता कि ऐसा सामाजिक के [ अ ] अभिप्राय से कहा गया है या [ब ] नट के अभिप्राय से अथवा [ स ] वस्तु तथ्य के विवेचक व्याख्याताओं के अभिप्राय से [द ] अथवा भरतमुनि के अभिप्राय से । आचार्य भट्टतीत के अनुसार इसमें पहला पक्ष असंगत है । क्योंकि जो किसी प्रमाण से गृहीत होता हो वही अनुकरण कहा जाता है । जैसे कि यदि कोई यह कहे कि 'वह इस भाँति सुरापान करता है और स्वयं दुग्धपान करे तो यहाँ प्रत्यक्ष-रूपेण दूध का पीना देखा जाता है । पर यहाँ अभिनय के अन्तर्गत रस के सन्दर्भ में नट में ऐसी कौन सी वस्तु है जो प्रमाण रूप में उपलब्ध होने के कारण अनुकार्य के अनुकरण रूप में प्रतीत होती है, यह विवेचनीय है । नट का शरीर, उसके मुख पर लगा हुआ प्रतिशीर्षक [ मुखौटा ] आदि अथवा रोमांच, गद्गद आदि अथवा भुजाक्षेप, अङ्गों का वर्तन आदि या भ्रूक्षेप, कटाक्ष आदि रत्यादि चित्तवृत्तिरूप स्थायीभाव के अनुकरणरूप में किसी को प्रतीत नहीं हो सकते । यहाँ नट का शरीर इत्यादि जड है और बाह्यपक्ष आदि इन्द्रियों के विषय हैं जब कि रति आदि स्थायी भाव जड़ नहीं हैं और अन्तःकरण के विषय हैं । इसी प्रकार मुखौटे आदि का अधिकरण शरीर है जबकि रति का अधिकरण मन है इस कारण स्थायी भाव और दृश्यमान सामग्री में बहुत अन्तर है । अतः ये स्थायी भाव के अनुकरण किसी भी तरह नहीं हो सकते । दूसरी बात यह है कि मुख्य [ अनुकार्य ] तथा अमुख्य [ अनुकरण ] का अवलोकन करने पर ही प्रतीत होता है कि अमुख्य मुख्य का अनु-करण है । किन्तु यहाँ रामगत रति, जो कि मुख्य अनुकार्य रूप है, उसका किसी सामाजिक ने पहले साक्षात्कार नही किया अतः नट राम का अनुकरण करता है यह मत उपयुक्त नहीं प्रतीत होता । यदि माना जाए कि नटगत चित्तवृत्ति ही प्रतीति का विषय बनकर या अगात होकर रति का अनुकरणरूप शृंगार रस है तो फिर प्रश्न उठता है कि उसकी प्रतीति किस रूप से होगी । यदि यह माना जाए कि विभाव, अनुभावों तथा व्यभिचारिभावों के हेतुओं से विभावादि कारणों से कार्यरूप, अनुभावादि कार्यों से कारणरूप तथा

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षष्ठोऽध्यायः २३३ व्यभिचारि के सहकारी रूप से जो लौकिक चित्तवृत्ति साक्षात्कार को प्राप्त होती है उसी रूप में प्रेक्षक को नट की चित्तवृत्ति का प्रतिभान होता है और यही रत्यादि की प्रतीति रस है । ऐसा मानने पर रति रूप में ही उसका ग्रहण होगा न कि रति की अनुकृति के रूप में । इस प्रकार रति को अनुकरण रूप कहने वाली वचन भङ्गिमा टिक नहीं पाती । पुनश्च अनुकार्य में जो आलम्बन व उद्दीपन रूप विभाव होते हैं वे वास्तविक होते हैं किन्तु यहाँ प्रयोगकर्ता नट में वास्तविक नहीं हैं । यही दोनों में वैशिष्ट्य है । यदि ऐसा मान भी लें कि वे विभावादि उस नट गत रति के विभाव (कारण ) अनुभाव ( कार्य ) तथा व्यभिचारिभाव ( सहकारी ) न होते हुए भी काव्य शिक्षा तथा अभ्यासादि के कारण परिकल्पित किए जाकर, कृत्रिम होने पर भी सामाजिकों के द्वारा विभावादि के रूप में उनका ग्रहण क्या कृत्रिम रूप में किया जाता है या नहीं । यदि उनका ग्रहण कृत्रिम रूप में होता है तो उन कृत्रिम साधनों से वास्तविक रति का ज्ञान होना असम्भव है । यदि शंकुक की ओर से यह तर्क रखा जाए कि कृत्रिम साधनों से प्रतीयमान रति ही अनुकरणात्मक [ रत्यादि की ] वृद्धि का कारण होती है तो यह तर्क भी उपयुक्त नही है । जो कारण लोकविख्यात हैं उनसे भिन्न कारणों से उत्पन्न कार्यों में उनका ज्ञान होने पर उस विषय के विशेषज्ञ व्यक्ति के द्वारा दूसरी वस्तु का प्रसिद्ध कारणों को छोड़कर सम्यक् अनुमान करना उचित हो सकता है । किन्तु साधारण पुरुष तो उसी प्रसिद्ध कारण का अनुमान करते हैं; जैसे कि विच्छू को देखकर उसके कारणरूप में गोबर का ही अनुमान किया जाता है । इससे भिन्न वृश्चिक रूप कारण के ज्ञान की संज्ञा मिथ्याज्ञान ही होगी । जहाँ कहीं लिंग का मिथ्या ज्ञान होता है [ तथा कोहरे में धुए का ] वहाँ भी साध्य के आभास रूप अन्य वस्तु का अनुभव मानना उचित नहीं है । क्योंकि कोहरे के धूमवत् प्रतीयमान होने पर भी धुएं का बिल्कुल अनुकरण सा लगने पर भी उससे अग्नि का अनुकरण करने वाली किसी अन्य कृत्रिम वस्तु का अनुमान करना उचित नहीं होगा । क्योंकि धूम के समान प्रतीत होने वाले कोहरे से अग्नि की भाँति प्रतीत होना उचित न होगा । पूर्वपक्षी की शंका है कि अभिनेता यद्यापि क्रोधित नहीं होता किन्तु क्रोधित सा प्रतीत होता है । अतः रत्यादि के अनुकरण को रस मानना उपयुक्त है । इस शंका का समाधान करते हुए आचार्य अभिनवगुप्त का कथन है कि यह ठीक है कि नट क्रोधित जैसा प्रतीत होता है । क्रोधित व्यक्ति के साथ यह सादृश्य भृकुटि

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२३४ नाट्यशास्त्रम् आदि के द्वारा परिलक्षित होता है, किन्तु यह ज्ञान उसी प्रकार का है जैसे गवय के साथ गाय का सादृश्य मुखादि के द्वारा होता है । किन्तु इससे अनुकरणात्मकता की तो सिद्धि नहीं होती । सामाजिक को राम के सादृश्य की तो वास्तव में प्रतीति ही नहीं होती और सामाजिक नट के केवल अनुभव आदि को ही ग्रहण नहीं करता है अपितु चित्तवृत्ति का भी ग्रहण करता है, अर्थात् नट के विषय में उसकी प्रतीति भावशून्य नहीं होती । अतः रस रत्यादि के अनुकरण का प्रतिभास है, यह कहना ठीक नहीं है । यदि यह कहा जाए कि नट को देख कर यह प्रतीति होती है कि " यह राम है" तो इस प्रतिपत्ति के उत्तरकाल में बाधक का अभाव होने से उसकी तात्त्विक प्रतीति माननी चाहिए और यदि बाधक है तो उसे मिथ्या ज्ञान मानना चाहिए । सच पूछिए तो बाधक का उदय हो या न हो, यह मिथ्या ज्ञान होगा क्योंकि रामोऽयम् के द्वारा संबद्ध व्यक्ति नट है, राम नहीं । इसे यों भी कह सकते हैं शंकुक जब सहानुभूति को अनुकरणात्मक मानते हैं तो इसका निहितार्थ यही है कि वह अवास्तविक है । अतः शंकुक का विरुद्धबुद्धिसंभेदात् रत्यादि कथन भी असंगत है । अन्य अभिनेता में भी राम होने का ज्ञान होता है । अतः यह सिद्ध होना है कि रामत्व एक सामान्य गुण है । जबकि अनुकरण हमेशा विशेष का होता है. सामान्य का नहीं । शंकुक का यह कथन कि "काव्य से विभावों का अनुसन्धान किया जाता है " भी ठीक से समझ में नहीं आता । क्योंकि किसी नट को आत्मीयतया ऐसा भान नहीं होता है कि "यह मेरी सीता है" । यदि ऐसा मानें कि काव्य के द्वारा विभावादि को सामाजिक की प्रतीति के योग्य बनाया जाता है और इसी कार्य को अनुसन्धान कहा जाता है तो यह अनुसन्धान विभावादि की अपेक्षा स्थायी भाव के सन्दर्भ में अधिक उचित होगा । क्योंकि इसी स्थायीभाव की प्रधानता के कारण सामाजिकों को यह प्रतिपत्ति होती है कि राम में यह रत्यादि स्थायीभाव है । अतः रत्यादि के अनुकरण को रस न मानना ही अधिक उचित है । आचार्य शंकुक ने वाक् एवं वाचिक का भेद प्रदर्शित करते हुए अभिनय की विशेषज्ञता का जो परिचय दिया है उसकी विवेचना अभिनवगुप्ताचार्य ने नाट्य- शास्त्र के आगामी चौदहवें अध्याय में की है । अतः यह मानना ठीक नहीं है कि सामाजिक की प्रतीति के अनुसार "स्थायीभाव के अनुकरण को रस कहते हैं ” । नट को भी ऐसी प्रतिपत्ति नहीं होती कि मैं राम की चित्तवृत्तियो का अनुकरण कर रहा हूँ । यदि सदृशकरण की संज्ञा अनुकरण है तो जिसे मूल अनुकार्य का ज्ञान नहीं हुआ वह उसका अनुकरण कर ही नहीं सकता और यदि पश्चात्-

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षष्ठोऽध्यायः २३५ करण को अनुकरण माना जाए तो वैसी अनुकरणात्मकता लोक में अतिव्याप्त हो जाएगी क्योंकि लोक में वह रति राम आदि के बाद देखी जा रही है । अतः लौकिक रत्यादि को देखने पर भी रस की अनुरति मानी जाएगी । यह मानने पर कि किसी खास व्यक्ति का अनुकरण न करके उत्तम प्रकृति का अनुकरण किया जाता है । अर्थात् नट द्वारा अपने शोक से उत्तम प्रकृति के शोक का अनुकरण किया जाता है तो वह साध्य कौन सा है जिससे अनुकरण किया जाता है । यदि यह मानें कि जब नट शोक का अनुकरण करता है तो उसे वास्तव में शोक नहीं होता अपितु वह अश्रुपात आदि से शोक का अनुकरण करता है, तो अश्रुपात इत्यादि से शोक का अनुकरण संभव नही प्रतीत होता क्योंकि जैसा कि हम पहले कह चुके हैं, अश्रुपात इत्यादि अनुभाव और शोक रूप स्थायी भाव एक दूसरे से अत्यन्त विलक्षण हैं । अस्तु, इतना तो हो ही सकता है कि नट ऐसी कल्पना कर लेता हो कि "मैं आदर्श व्यक्ति के शोकगत अनुभावों का अनुकरण कर रहा हूँ" तो प्रश्न उठेगा कि कि किस आदर्श व्यक्ति का नट अनुकरण कर रहा । जिस किसी के भी शोक का अनुकरण मानना ठीक नहीं क्योंकि विशिष्ट स्वरूप के बिना उसे बुद्धि में बैठाना सम्भव नहीं होगा । जो मेरो ( नट की ) भाँति रुदन करता है उसका मैं अनुकरण करता । ' ऐसा मानना व्यर्थ है क्योंकि अनुकार्य की प्रतीति में नट का अपना स्वरूप भी समाविष्ट हो जाने से अनुकार्य और अनुकर्ता का भाव विगलित हो जाता है । नट शिक्षावश और अपने विभावों की स्मृति के कारण चित्तवृत्ति के साधारणी- भाव के द्वारा होने वाले हृदय के सम्वाद से केवल अनुभावों को प्रदर्शित करते हुए उचित काकुध्वनि से काव्य पाठ करते हुए तदनुरूप चेष्टा करता है— शंकुक का यह कथन सिर्फ उतने मात्र की प्रतीति कराता है न कि किसी प्रकार के अनुकरण का ज्ञान । क्योंकि स्त्री के वेष के अनुकरण की भाँति राम के व्यापारों का अनुकरण नहीं हो सकता, यह हमने पहले अध्याय में ही प्रदर्शित किया है । वस्तुवृत्त के अनुसार भी उन स्थायीभावों का अनुकरण नहीं हो सकता क्योंकि जो स्थायीभाव बाद में प्रतीत होते हैं उनका वस्तुवृत्तत्व ( अर्थात् वास्तविक घटि- तता) कैसे सिद्ध होगा? वास्तविक वस्तुवृत्तत्व की व्याख्या आगे अपने सिद्धान्त निरूपण के प्रसङ्ग में की जाएगी । भरत मुनि ने भी कहीं पर ऐसा नहीं कहा कि रस स्थायीभाव का अनुकरण है । भरतमुनि ने ऐसा कोई संकेत भी नहीं दिया जिससे स्थायी भाव के अनुकरण:

पृष्ठ 325

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२३६ नाट्यशास्त्रम् को रस माना जा सके । इसकी अपेक्षा अभिनय की परिपुष्टता के निमित्त ध्रुवा, गान, तालवैचित्र्य और लास्यांगों का निरूपण विपरीत पक्ष का समर्थक प्रतीत होता है क्योंकि लौकिक जीवन की किसी बात का वे अनुकरण नहीं करते हैं । नाट्य--शास्त्र के सन्ध्यङ्गाध्याय ( १ ९ वें अध्याय के अन्त ) में अपनी व्याख्या में अभिनवगुप्त ने इस बात को विस्तार से समझाया है । प्रथम अध्याय में नाट्य को जो सप्तद्वीप -का अनुकरण ( सप्तद्वीपानुकरणं नाट्यमेतद् भविष्यति ) बताया गया है उसे स्थायीभाव के अनुकरणरूप न मानकर दूसरे ढंग से ( अर्थात् अनुकीर्तन अनुव्यवसाय के रूप में ) भी समझा जा सकता है और अब यदि स्थायीभाव का अनुकरण मान भी लिया जाए तो कान्ता आदि के वेश अथवा गति के अनुकरण की भाँति 'रस ' •इस दूसरे नाम की क्या आवश्यकता रहेगी । और जो यह कहा जाए कि जैसे चित्र में हरिताल आदि रंगों को तूलिका से मिलाने से ( संयुज्यमानः ) गौ आदि की प्रतीति होती है । उसी भाँति विभावादि को मिलाकर रस की अभिव्यक्ति हो जाती है तथा उसका नाम भी विभा--वादि से भिन्न ' रस ' हो जाता है । यहाँ संयुज्यमान का अर्थ अभिव्यज्यमान मानना उचित नहीं है । दीपक के आलोक में जैसे वास्तविक गौ व्यक्त होती है वैसी सिंदुरादि रङ्गों से नहीं होती, अपितु गौ के सदृश अङ्गों की रचना स्पष्ट होती है । गौ के अङ्गों के सन्निवेश के समान सन्निवेशविशेष रूप में सिन्दुरादि स्थित होकर यह भान कराते हैं कि यह आकृति गो सदृश है । किन्तु इस प्रकार विभावादि समूह रति के समान ( सदृश ) हैं । यह बोध किसी भी ज्ञान से नहीं होता है । क्योंकि काव्यात्मकवर्णना, जो एक -तरह से अनुभाव या भौतिक उपकरण सामग्री का काम करती है । रति, शोक जैसी मानस वृत्ति, जो कि वस्तुतः अपनी प्रकृति में आध्यात्मिक है, का अनुकरण नहीं कर सकती । अतः रत्यादि स्थायीभावों के अनुकरण को रस मानने वाला यह मत युक्तियुक्त नहीं है । जिन लोगों ने भरत के 'सुखप्रायेषु सम्पन्न: ( ६.४६ ) श्लोक को ठीक से नहीं -समझा है उनका कहना है कि रस, जो सुखदुःखात्मक होता है, विषय सामग्री का -बाह्य संघात मात्र है जिसमें सुख- दुःख उत्पन्न करने की क्षमता है । यह मत सांख्य से मिलता है । सांख्य की दृष्टि में संसार के सभी पदार्थ त्रिगुणात्मक होने से रस भी सुख -दुःख एवं मोहस्वभाव वाला माना जाएगा । तथा इस सामग्री में विभाव दाल के स्थानीय हैं तथा अनुभाव एवं व्यभिचारिभाव छौंक के सदृश हैं । विभाव, •अनुभाव, व्यभिचारिभाव आदि सामग्री से उत्पन्न आन्तरिक शोक या मोहादि -स्थायीभाव हैं । इससे रस और स्थायी भाव के पारमार्थिक भेद का अपलाप हो

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षष्ठोऽध्यायः २३७ जाता है और इस मत के पोषकों को भरत के कथन 'स्थायिभावों को रसना तक ले जायेंगे' ( ‘ स्थायिभाववान् रसत्वम् उपनेष्यामः' ना० शा० छठा अध्याय ) में लक्षणा माननी पड़ती है । कठिनाई यह है कि स्थायी की प्रतीति भिन्न है और रस की भिन्न । स्थायी और रस यदि एक हैं । उनमें केवल औपचारिक भेद है तो रस और स्थायी के प्रतीति वैषम्य को वे लोग कैसे समझायेंगे । भट्टनायक का मत भरत के रस सूत्र की व्याख्या सहृदयदर्पण के रचयिता भट्टनायक नामक एक अन्य व्याख्याकार ने भी की है । इनका मत मुख्यतः वेदान्त और योग की कतिपय दार्शनिक मान्यताओं पर आधारित हैं । उनके मत में रस न तो प्रतीत होता है, न उत्पन्न और न अभिव्यक्त । सामाजिक द्वारा अपने में रस की प्रतीति मानने पर करुण रस के अनुभव काल में सामाजिक को दुःख की प्रतीति होनी चाहिए किन्तु ऐसी स्थिति असंगत होगी । शोक की कारणभूत सीतारूपी विभाव के अनुपस्थित रहने से, अपनी पत्नी आदि की नाट्य प्रसंग में स्मृति न होने से, जब देवतादि विभाव हों तो उनमें साधारणीकरण के अयोग्य होने से तथा हनुमानादि विभावों द्वारा समुद्र लङ्घनादि के समान किये गए कार्यों का साधारणी-करण असम्भव होने से सामाजिक को स्वगत रूप में रस की प्रतीति नहीं होती । रसप्रतीति को यदि परगत अर्थात् सामाजिक से भिन्न किसी अन्य में परिनिष्ठित माना जाए तो सामाजिक उदासीन हो जायेगा । किसी भी नाट्यप्रयोग का आस्वादन करते हुए रत्यादि से युक्त राम का स्मरण सम्भव नहीं है क्योंकि उसका पहले ज्ञान नहीं हुआ है । शब्द और अनुमान आदि प्रमाणों से भी उसकी प्रतीति मानना उचित नहीं है क्योंकि ऐसी स्थिति में, यदि रस शब्द या अनुमान से उत्पन्न हो सके तो, संसार में लौकिकप्रत्यक्ष से रसानुभव मानना उचित होगा, जब कि लौकिक अनुभव में ऐसा देखने को नहीं मिलता, उल्टे प्रत्यक्ष रूप में, रत्यादि में रत नायक नायिका को देखने पर रस के स्थान पर रसिक की अपनी मनःस्थिति और अवस्था के लज्जा या जुगुप्सा आदि वृत्तियों के उदय होने से मन की तन्मयता भङ्ग होगी फलतः रसबोध की संभावना दुष्कर हो जायगी । अतः अनुभव या स्मृति आदि के रूप में रस की प्रतीति मानना तर्क संगत नहीं है । यही सब दोष तब भी आयेंगे जब जब रस की प्रतीति को उत्पत्तिरूप माना जाए । इसी प्रकार रस को प्रतीति को यदि अभिव्यक्तिरूप माना जाए तो इसका सीधा सा अर्थ होगा कि शक्तितया या बीजतया पहले से अवस्थित पदार्थ की अभि- व्यक्ति । ऐसी अवस्था में रसार्जन में तारतम्य मानना पड़ेगा । दूसरे शब्दों में

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२३८ नाट्यशास्त्रम् हम शंकुक की मन्दतर, मन्दतम, मध्यस्थ आदि अनन्त स्थितियों की आपत्ति का पुनरभिधान कर रहे हैं । रसानुभूति को चाहे प्रतीतिरूप माना जाए, चाहे उत्पत्तिरूप और चाहे अभिव्यक्तिरूप, उसे स्वगत अथवा परगत मानने पर सभी स्थितियों में ऊपर वाले दोष समान रूप से आ खड़े होंगे । अर्थात् स्वगत मानने पर करुण रस के अनुभव काल में सामाजिक दुःखी और परगत मानने पर - तटस्थ अथवा उदासीन ही रहेगा । इस कारण से काव्य में दोष शून्यता तथा गुणालङ्कार की उपस्थिति एवं नाटक में चतुविध अभिनय के माध्यम से शब्दों द्वारा अर्जित एक विशेष सामर्थ्य जिसे भावकत्व व्यापार कहा गया है और जो अभिधा से भिन्न उसका दूसरा अंश है, के द्वारा रस का भावन ( विषयान्तर परिहारपूर्वक चित्र में बार-बार निवेशन ) किया जाता है । इस भावकत्व व्यापार के दो कृत्य हैं एक तो अपनी चेतना को ढँक लेने वाले घनीभूत मोह्, जो रसानुभव में एक प्रकार का बाधक है, का निवारण और दूसरे विभावादि का साधारणीकरण । इस भावकत्व व्यापार के द्वारा भावित किया जाता हुआ रस स्मृति, अनुभव एवं प्रतीति आदि से विलक्षण भोग - जो सहृदय के विशिष्टसामर्थ्य का प्रतीक है— के द्वारा भोगा जाता है । सहृदयगत यह भोग या भुक्ति सामाजिक की वह विशिष्ट मनःस्थिति है जिसका रजस, और तमस, अभिनिवेशवैचित्र्य के कारण पर्यायशः द्रुति, विस्तार या विकास के रूप में उन्मेष होता है और जो सत्त्व के उद्रेक के बल से प्रकाश और तज्जन्य आनन्द से युक्त • आत्मसंवत् में एक प्रकार की विश्रान्ति है । इस भुक्ति की तुलना परब्रह्म के आस्वादन से ही सम्भव है । यदि लोचनकार के शब्दों में कहा जाए तो भट्टनायक तीन प्रकार के व्यापारों का आश्रय लेकर रसभुक्तिता का विवेचन करते हैं जिनमें अभिधा का सम्बन्ध है बाच्य से, भावना का सम्बन्ध है रस से और भोगीकरण का -सम्बन्ध है सहृदय 1 अभिनवगुप्त के विचार से भट्टनायक चूंकि भट्टलोल्लट का खण्डन करते हैं । -इसीलिए वह मान्य है, ऐसा नहीं है । भट्टनायक द्वारा प्रस्तुत पूर्वपक्ष तो उठ ही नहीं पाता । अतः उसमें दोष दिखाने की आवश्यकता रह नहीं जाती । फिर भी भट्टनायक जब यह कहते हैं कि रस की प्रतीति में ही भोग होता है तो प्रतीति इत्यादि से भिन्न संसार में और भी कोई भोग होता है, यह हमें नहीं मालूम । भुक्ति को यदि रसना या ( या आस्वादन ) रूप माना जाए तो वह भी एक प्रकार की प्रतीति ही है । केवल साधन को विलक्षणता (विभाव इत्यादि ) को देखते -हुए उसका नाम बदल दिया गया जान पड़ता है -जैसे साधनभेद से होने वाली प्रमा को हम दर्शन, अनुमिति, श्रुति और उपमिति इत्यादि कह बैठते हैं । निष्पत्ति

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षष्ठोऽध्यायः २३ ९ अर्थात् उत्पत्ति और अभिव्यक्ति इन दोनों को न मानने पर रस को या तो असत् होना पड़ेगा या नित्य । इसके अलावा उसकी तीसरी गति तो हो नहीं सकती और जिसकी प्रतीति न होती हो ऐसी कोई वस्तु व्यवहार के योग्य नहीं होती । (इसके विपरीत रस का तो हमें व्यवहार में अनुभव होता है । ) यदि यह कहा जाए कि रस की प्रतीति का अर्थ है भोगीकरण और उसका -स्वरूप है द्रुति या विस्तार या विकास, जिसे रसना का नाम दिया जाता है । तो भी इतने ही से कुछ नहीं होता । जितने रस हैं उतने ही रसनामयी प्रतीतियाँ हैं जिनका स्वभाव भोगीकरण है । उनमें भी सत्त्व, रजस, तमस के अभिनिवेश-वैचित्र्य के फलस्वरूप उनके पारस्परिक अङ्गाङ्गिभेद के आधार पर अनन्त भेदों की कल्पना करनी पड़ेगी । अतः तीन भेदों से ही (द्रुति, विस्तार, विकास ) सीमा बाँधने से क्या लाभ? संक्षेप में भट्टनायक की मान्यता है कि अभिधा, भावना एवं भोगीकृतिरूप काव्यगत तीन व्यापार माने गये हैं । अभिधा के द्वारा शब्दार्थ और अलंकार पहले वाच्यरूप में उपस्थित होते हैं, इसके पश्चात् भावना व्यापार से साधारणीकरण द्वारा जो काव्यार्थ भावित किया जाता है उसका सहृदय सामाजिक भोगीकरण के रूप में आस्वादन करता है । अभिनवगुप्त का मन्तव्य है कि भट्टनायक भी प्रकारान्तर से ध्वनि के माध्यम से अभिव्यक्त संवेदनात्मक रस के ही पक्षधर हैं जो कि अभिनवगुप्त का अपना सिद्धान्त है । इसीलिए उनकी दृष्टि में भरतमुनि जब यह कहते हैं कि काव्य से रस भावित होते हैं तो यहाँ पर भावन का अर्थ यदि भट्टनायक विभावादि से उत्पन्न चर्वणात्मक आस्वाद रूप प्रतीति का विषय बन पाने से लेते हैं तो अभिनव--गुप्त को कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि स्वयं भट्टनायक ने अन्यत्र स्पष्ट कहा है कि "दूसरे की प्रतीति का विषय बनता हुआ आस्वादनात्मक अनुभवरूप रस ही काव्यार्थ कहा जाता है जिसका एक नाम संवेदन भी है ।" यहाँ पर व्यङ्गय शब्द से रस की व्यज्यमानता लक्षित होती है और अनुभव शब्द से उसके विषय का पता चलता है । इस प्रकार रस वस्तुतः क्या है इसकी गवेषणा करने अभिनवगुप्त निकल पड़ते हैं । अभिनवगुप्त का मत रस की व्याख्या - रस के वास्तविक एवं परिशुद्ध रूप की परिचर्चा करते हुए अभिनवगुप्त का मत है कि स्वयं भरत के अनुसार रस कोई नई या अपूर्व वस्तु नहीं है

पृष्ठ 329

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२४० नाट्यशास्त्रम् [न त्वपूर्वं किञ्चित्] | सप्तम अध्याय के प्रारम्भ में भरत कहते हैं कि भावों का काम है काव्यार्थों का भावन करना । यही काव्यार्थ रस है । जैसे कि ब्राह्मण ग्रन्थों में आए हुए स्तुतिपरक अर्थवाद वाक्यों (जैसे 'वनस्पतियाँ रात भर रहीं' या 'प्रजापति ने अपनी चर्बी की अग्नि में आहुति दी' इत्यादि) में सुनते ही अधिकारी (किसी अर्थिता या आकांक्षा से जो याग में प्रवृत्त हुआ है) व्यक्ति को सामने की क्रिया में अत्यन्त रुचि के कारण पहले तो सामान्य अभिधेयार्थ की ही प्रतीति होती है, पर उसके ठीक बाद उपात्तकाल (भूतकाल ) के तिरस्कार द्वारा 'बैठू', ' आहूति दूँ' (वर्तमान काल ) इस प्रकार की प्रतीति होती है जो अर्थसंक्रमणरूपा है । इसी को भिन्न-भिन्न दर्शनों में प्रतिभा ( वेदान्ती, प्रत्यभिज्ञावादी ) भावना ( कौमारिल ), विधि या नियोग (प्रभाकर ) जैसे भिन्न -भिन्न नामों से पुकारा गया है । ठीक इसी प्रकार काव्या- से अतिरिक्त प्रतीतित्मक शब्द से भी अधिकारी व्यक्ति को साधारण वाक्यार्थबोध या बोध होता है । यहाँ पर काव्य के क्षेत्र में अधिकारी है विमल प्रतिभा से युक्त हृदय वालह व्यक्ति अर्थात् सहृदय । ऐसे व्यक्ति में "यह सामने हिरन कितनी सुन्दरता से अपनी ग्रीवा मोड़कर देख रहा है" ( अभि ० शाकु ० १.२ ), " नील अलकों में लगे कणिकार पुष्पों को गिराती उमा ( कुमार. ३.६२ ) और "शिव कुछ " ( कुमार ० के समान एक ऐसी ३.६७ ) इन वाक्यों से वाक्यार्थबोध के मानस साक्षात्कार प्रतीति उत्पन्न होती है जिसमें उन वाक्यों द्वारा लाए गए देश, काल इत्यादि का पूर्णत: उन्मूलन होता हैं । इस प्रतीति में जो मृग का छौना भासित होता है उसक कोई विशेष या निजीरूप न होने के कारण केवल "डरा हुआ " और फिर सामा- जिक को डराने वाले मृग के वास्तविक न होने के कारण (क्योंकि यहाँ मृग तो अभिनेतामात्र है ) देश और काल से पूरी तरह से अनालिङ्गित केवल भय की ही प्रतीति होती है । भय का यह प्रत्यक्ष भय के साधारण प्रत्ययों ( जैसे मैं डरा हुआ हूँ, यह शत्रु, मित्र, उदासीन — डरा हुआ है ) से विलक्षण है क्योंकि वे सुख- दुःख के द्वारा उत्पन्न ग्रहण और त्यागरूप दूसरी प्रतीतियों के नियमतः उदय के कारण विघ्नों से भरे हुए हैं, जब कि यह भय निर्विघ्न प्रतीति का विषय बनता हुआ साक्षात् हृदय में घुसता हुआ सा आँखों के सामने नाचता हुआ सा भयानक रस ही है 1। इस प्रकार के भय में सामाजिक की आत्मा न तो पूर्ण तौर पर तिरस्कृत रहती है और न ही विशेष रूप से उद्रिक्त । और न ' पर' अर्थात् अभिनीयमान पात्र या नट न तो पूर्णतः पृष्ठभूमि में रहता है और न चेतना पर अच्छी तरह से छाया रहता है । फलतः भय की यह साधारण या सामान्य अवस्था (साधारण्य ) सीमित नहीं हैं

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भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १, पृष्ठ 330 का मूल पृष्ठ
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षष्ठोऽध्यायः २४१ बल्कि व्यापक है - वैसे ही जैसा कि धुआँ और आग । सच पूछिए तो भय और कम्प, व्याप्ति ग्रहण के समय होता है । अन्तर यही है कि यहाँ पर इसकी ( भय की ) साक्षात्कारकल्पता का पोषण नटादि सामग्री के द्वारा होता है ( रसानुभव इन्द्रि यार्थसन्निकर्ष के अभाव में साक्षात्कार रूप नहीं है । फिर भी वह साक्षात्कार जैसा होता है । अतः साक्षात्कारात्मकता का अंश नटादि सामग्री से आता है ) । इस नटादि सामग्री में वास्तविक और काव्यापित दोनों प्रकार के देश, काल, प्रमाता रूप नियमन के हेतुओं का एक दूसरे के अत्यन्त प्रतिबन्धक या प्रतिरोधक होने के कारण अन्ततः उनका उन्मूलन हो जाने पर वही साधरणीभूत भाव ही नितान्त पुष्ट हो पाता है । इसीलिए सभी सामाजिकों की एकघनतया प्रतीति रस का और भी परिपोषण करती है; क्योंकि अनादि वासना के द्वारा सबमें वासनागत मैत्री या संवाद ( पारस्परिक समकोटिक औन्मुख्य ) तो रहता ही है । इस विघ्नरहित प्रतीति को चमत्कार कहते हैं और इससे उत्पन्न कम्प, पुलक, शरीर का साह्लाद हिलना इत्यादि विकार भी चमत्कार कहलाते हैं । उदाहरण के लिए इस प्राकृत गाथा को देखा जा सकता है " आज भी विष्णु चमत्कृत हैं कि समुद्रमन्थन के समय चन्द्रकला की कान्ति वाले लक्ष्मी के कोमल अवयव मेरुपर्वत से पिच क्यों नहीं गए? " इसी प्रकार चमत्कार उस प्रकार के भोग में पूर्ण मज्जन ( भोगावेश ) का नाम भी है जिसकी तृप्ति कभी समाप्त नहीं होती और इस कारण से जिसका प्रवाह अविच्छिन्न बना रहता है । चमत्कार का वास्तविक अर्थ है भोगते हुए - अर्थात् अद्भुत आनन्द की क्रिया में सराबोर व्यक्ति की क्रिया ( शाब्दिक तौर पर भोजन से पूर्ण तृप्ति होने पर चटखारी लेने का नाम है 'चमत्' -कार ) । यह साक्षात्का- रात्मक मानसिक अध्यवसाय या इच्छा या साक्षात्कारमयी स्मृति के रूप में उभर सकता है । क्योंकि, जैसा कि कालिदास ने कहा है, “एक प्राणी सुखी होने पर बहुधा रम्य पदार्थों को देखकर या मधुर शब्दों को सुनकर कुछ उत्कंठित ( उतावला ) सा हो उठता है । उस समय निश्चय ही, पहले से न जानने के कारण, वह मन से पूर्वजन्म के उन संपर्कों का स्मरण करता है जो वासना रूप से उसके अवचेतन में आकर जम गए हैं ( शाकु. ५ ) "यहाँ पर स्मरण करता है ( स्मरतीति ) पद से जो स्मृति दिखाई गई है वह तार्किकों या नैयायिकों द्वारा अभ्युद्गत स्मृति से भिन्न है क्योंकि स्मृति के लिए पदार्थ का पूर्व अनुभव आवश्यक है और यहाँ पर उस पदार्थ का पूर्व अनुभव हुआ नहीं है । अपितु अपनी प्रकृति में यह एक प्रकार का साक्षात्कार है । जिसका दूसरा नाम प्रतिभान ( या प्रातिभ दर्शन ) है । क्योंकि यह प्रतीति निरन्तर अस्वा- दात्मक प्रतीति है जिसमें रति ही ( या अन्य कोई स्थायी भाव ) भान होती है । १६ ना०