भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 361–370
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 361–370
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२७२ नाट्यशास्त्रम् इसका प्रयोग किया जाना चाहिए । स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, आवेग, सम्भ्रम, प्रहर्ष, हैं । चपलता, उन्माद, धृति, जड़ता, मूर्च्छा आदि इसके व्याभिचारी भाव आर्याछन्द में अद्भुत रस के विभाव, अनुभाव-- अत्रानुवंश्ये आर्ये भवतः—
यत्त्वतिशयार्थयुक्तं वाक्यं शिल्पं च कर्मरूपं वा ।
तत्सर्वमद्भुतरसे विभावरूपं हि विज्ञयम् ॥ ७५ ॥
इसके विषय में दो आर्याएं प्रचलित हैं- अतिशयता से युक्त जो भी वाणी, शिल्प क्रिया अथवा कर्मरूप हो उन सभी को अद्भुत रस में विभाव स्थानीय जानना चाहिए ॥ ७५ ॥
। स्पर्शग्रहोल्लुकसनैर्हाहाकारैश्च साधुवादैश्च ॥ ७६ ॥ वेपथुगद्गदवचनैः स्वेदाद्यैरभिनयस्तस्य साधुवाद, कम्प, स्पर्श', ग्रहण, शरीर को ऊपर उछालने, हाहा शब्द करने,
॥ ७६ ॥ गद्गद वाणी एवं स्वेदादि के द्वारा उसका अभिनय करना चाहिए
श्रृंगार हास्य तथा रौद्र रस के तीन प्रकार- शृङ्गारं त्रिविधं विद्याद्वाङनैपथ्यक्रियात्मकम् । अङ्गनैपथ्यवाक्यैश्च हास्यरौद्री त्रिधा स्मृतौ ॥ ७७ ॥
वाणी, नेपथ्य एवं क्रिया भेद से शृंगार रस के तीन भेद होते हैं । अङ्ग- नेपथ्य एवं वाक्य के भेद से हास्य तथा रौद्ररस के भी तीन प्रकार होते हैं ॥ ७७ ॥
करुण रस के तीन प्रकार- धर्मोपघातजश्चैव तथार्थापत्रयोद्भवः । तथाशोककृतश्चैव करुणस्त्रिविधःस्मृतः ॥ ७८ ॥
धर्मोपघातज, असंचयोद्भव शोककृत के भेद से करुणरस के तीन प्रकार होते १. स्पर्श का अभिनय आँखों को कुचित करके भौहों को आक्षिप्त रखते हुए एवं गालों को कन्धे से सटाकर करना चाहिये । किञ्चिदाकुञ्चिते नेत्रे कृत्वा भ्रक्षेपमेव च । तथां सगण्डयोः स्पर्शात् स्पर्शमेवं विनिर्दिशेत् ॥ ( ना. शा. २४.८३ ) के कथनानुसार इस सम्पूर्ण आर्या में बहुवचन के प्रयोग द्वार २. अभिनवगुप्त विभिन्न पुरुषों की प्रकृतिगत भिन्नता को प्रदर्शित किया गया है ।
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षष्ठोऽध्यायः २७३ हैं" ॥ ७८ ॥
वीर रस के तीन प्रकार- दानवीरं धर्मवीरं युद्धवीरं तथैव च ।
रसं वीरमपि प्राह ब्रह्मा त्रिविधमेव हि ॥ ७ ९ ॥
ब्रह्मा ने वीर रस के तीन भेद बताए हैं - दानवीर, धर्मवीर एवं युद्धवीर ॥ ७९ ॥
भयानक रस के तीन प्रकार- व्याजाच्चैवापराधाच्च वित्रासितकमेव च ।
पुनर्भयानकञ्चैव विद्यात् त्रिविधमेव हि ॥ ८० ॥
कृत्रिम, अपराध एवं ज्ञान द्वारा उत्पन्न होने के आधार पर भयानक रस के तीन प्रकार होते हैं ॥ ८० ॥
बीभत्स रस के तीन प्रकार-
बीभत्सः क्षोभजः शुद्ध उद्वेगी स्यात् द्वितीयकः ।
विष्ठामिभिरुद्वेगी क्षोभजो रुधिरादिजः ॥ ८१ ॥
बीभत्स रस क्षोभज, शुद्ध तथा उद्वेगी के भेद से तीन प्रकार का होता है । विष्ठा एवं कीड़ों आदि के दर्शन उद्घोगी तथा रुधिरादि दर्शन से क्षाभज वीभत्स होता हैं ' ॥ ८१ ॥
१. उत्तम जन में धर्मोपघात करुण की संभावना होती है । धर्महानि तो श्रेष्ठ नहीं होती पर उसका मूलभाव धर्मरक्षण होता है जो श्रेष्ठभाव होता है अतः धर्मोप- धात की गणना उत्तम हेतुओं में की जा सकती है । धर्म से यहाँ अग्निहोत्रादि कार्यों का सम्पादन समझना चाहिए । शोक से स्वजननाश से उत्पन्न करुण समझना चाहिए | २. रुधिरादि के दर्शन से उत्पन्न होने वाला वीभत्स रस क्षोभ से उत्पन्न होने के कारण क्षोभज एवं शुद्ध कहलाता है ( रुधिरान्त्रादिदर्शनाद्यो वीभत्सः क्षोभणत्वा- बुद्ध: ) । विष्ठादि के दर्शन से उत्पन्न होने वाला बीभत्स उद्योगज होने से उगी कहा जाता है । अशुद्ध भावों से उत्पन्न होने के कारण इसे अशुद्ध कहते हैं । ( यस्तु विष्ठादिभ्यः स उद्योगी हृदयं चलयति सोऽशुद्धः । अशुद्धविभावकत्वात् ) इस विषय में भट्टतोत इन दोनों वीभत्सों को अशुद्ध मानते हैं । जो राग द्वेष का विरोधी एवं मोक्ष का साधक हो उसे ही शुद्ध वीभत्स मानना चाहिए । बीभत्स १८ ना०
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२७४ नाट्यशास्त्रम् अद्भुत रस के दो प्रकार—
दिव्यश्चानन्दजश्चैव द्विधा ख्यातोऽद्भृतो रसः ।
दिव्यदर्शनजो दिव्यो हर्षादानन्दजः स्मृतः ॥ ८२ ॥
॥ इत्यद्भुतरसप्रकरणम् ॥
दिव्य एवं आनन्दज के भेद से अद्भुत रस के दो भेद प्रसिद्ध हैं । अलौकिक पदार्थ के दर्शन से ' दिव्य' एवं प्रसन्नता से उत्पन्न 'आनन्दज ' अद्भुत रस माना जाता है ॥ ८२ ॥
अथ शान्तरसविचारः शान्त रस के स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव तथा संचारीभाव - [ अथ शान्तो नाम शमस्थायीभावात्मको मोक्षप्रवर्तकः । स तु तत्त्वज्ञान-वैराग्याशयशुद्धयादिभिर्विभावःधारणोपासन सर्वभूतदयालिङ्गग्रहणादिभिरनुभावैरभिनयःसमुत्पद्यते । तस्य यमनियमाध्यात्मध्यान-प्रयोक्तव्यः । निर्वेदस्मृतिधृतिसर्वाश्रमशौचस्तम्भ रोमाञ्चादयः । व्यभिचारिणश्चास्य आत्रार्याः श्लोकाश्च भवन्ति- [ शान्तरस ' का स्थायी भाव ' शम' होता है तथा यह मोक्ष का प्रवर्तक होता । यह तत्त्व के बोध, वैराग्य, चित्तशुद्धि आदि विभावों से उत्पन्न होता है । ,; यम, नियम आध्यात्म, ध्यान, धारणा, उपासना समस्त प्राणियों अनुभावों द्वारा इसका अभिनय करना चाहिए । निर्वेद पर, स्मृतिदया,, धृतिलिंग, ग्रहण आदि शौच, स्तम्भ, रोमांच आदि इसके व्यभिचारिभाव हैं । स्थायी भाव जुगुप्सा है जो योगांग होने से मोक्ष में उपयोगी है। शौच से कासम्बन्ध होने से वीभत्स का स्थायीभाव जुगुप्सा भी मोक्ष साधन है । अतः उक्त दो भेदों के अलावा बीभत्स का यह तीसरा भेद भी हो जाता है । कारिका में जो 'द्वितीयकः' पद आया है इससे मोक्षोपयोगी वीभत्स को दुर्लभता होने से उसकी हीनता का संकेत किया गया है । १. नव रस वादियों के मत में भरतमुनि ने भी नवम रस को स्वीकार करते न मानने वालों के हुए उसके लक्षण का प्रतिपादन किया है । शान्त रस की सत्ता को स्थायी भाव व मत में एक तो शम एवं शान्त शब्द पर्याय हैं । अतः इनमें से एक । दूसरे भावों की दूसरे को रस मानना ठीक नहीं है ( शमशान्तयोः पर्यायत्वात् ) संख्या उनचास मानी गयी है । शम को भाव मानने पर संख्या वृद्धि होने लगेगी ( एकोनपञ्चाशद् भावा इति संख्या त्यागाच्च ) । तीसरा तर्क यह है कि ऋतु किन्तु तप स्वध्या- माला आदि विभाव र रस के कारण रूप प्रतीत होते हैं ।
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षष्ठोऽध्यायः २७५ यादि शान्त में कारणरूप नहीं प्रतीत होते ( तपोऽध्ययनादयस्तु न शान्तरूप शमस्य हेतवः ) । इस पूर्वपक्ष का उत्तर यह है कि मोक्ष भी चतुर्थ पुरुषार्थ के रूप में प्रसिद्ध है । चौथी बात यह है कि किसी भी प्रकार की चेष्टा के अभाव का नाम शम जिसका अभिनय असम्भव है । निवा एवं मूर्च्छा को व्यापारहीन माना जाता है किन्तु इसमें भी लेटने, गिरने या श्वास प्रश्वास रूप चेष्टा तो रहती ही है । पांचवीं युक्ति है कि शान्तरस में धृति को व्यभिचारिभाव माना गया है । पर धृति का जन्म तो विषयास्वादन के फलस्वरूप होता है तो उसकी शान्तरस में उपस्थिति तर्कसंगत नहीं । छठा तर्क यह है कि शान्तरस में व्यक्ति निस्पृह रहता है तो फिर मोक्षरूप फल की प्राप्ति हेतु उसका प्रयास भी सम्भव नहीं है । सातवाँ तर्क यह है कि यद्यपि शान्तरस को सुख- दुःख से परे माना जाता है पर ऐसा देखा जाता है कि शान्तरस के साधक तत्त्वज्ञान पा लेने पर भी दूसरों के दुःख से दुःखी होते हैं । इन तर्कों के द्वारा शान्तरस की सत्ता को निर्मूल सिद्ध करने वाले पूर्वपक्ष का खण्डन करते हुए शान्तरसवादियों का कथन है कि धर्मादि पुरुषार्थत्रय के समकक्ष ही चौथे पुरुषार्थ मोक्ष की भी सत्ता है । जिस प्रकार काम आदि उपयुक्त रति आदि चित्तवृत्तियों से शृङ्गार आदि का रसास्वादन किया जाता है उसी प्रकार मोक्ष के उपयुक्त शम चित्तवृत्ति से शान्तरस का आस्वादन किया जाता है । यही शम रूप चित्तवृत्ति शान्तरस का स्थायी भाव है । ( शान्त रस का स्थायिभाव तत्वज्ञान से उत्पन्न निर्वेद है तत्व- ज्ञानोत्थितो निर्वेद इति केचित् ) । भरतमुनि ने निर्वेद की गणना व्याभिचारि- भावों में की है । पर उसे स्थायी भाव इस प्रकार मान सकते हैं कि भरतमुनि ने -बीभत्स रस के स्थायीभाव जुगुप्सा के शृंगार में व्यभिचारोभाव में निषेध करते हुए समस्त स्थायीभावों का अपने रस में स्थायीभावत्व तथा अपने से भिन्न रसों में व्यभिचारिभावत्व स्वीकार करने की अनुमति दी है । यदि कोई भाव स्थायी है। तो वही व्यभिचारी भी हो सकता है । अतः तत्त्वज्ञान से उत्पन्न होने वाला निर्वेद भी स्थायी एवं व्यभिचारी होकर भी शान्त रस का स्थायीभाव बन सकता है । अभिनव का मत है कि शान्तरस का स्थायी भाव निर्वेद नहीं ( तस्मान्न निर्वेद: स्थायीति ) । प्रश्न उठता है फिर शान्तरस का स्थायी भाव कौन है ( कस्तत्र स्थायी )? अभिनव का कथन है कि ज्ञान आनन्द आदि धर्मो से युक्त और परिकल्पित विषयो भोग आदि से रहित आत्मा ही यहाँ स्थायी है ( तेनात्मैव ज्ञानानन्दादि विशुद्ध
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२७६ नाट्यशास्त्रम् 1 मोक्षाध्यात्मसमुत्थस्तत्त्वज्ञानार्थहेतुसंयुक्तः नैःश्रेयसोपदिष्टः शान्तरसो नाम सम्भवति ॥ मोक्ष तथा आत्मा विषयक चिन्तन से उत्पन्न, तत्वज्ञान के विषयरूप हेतुओं से संयुक्त और मोक्ष का उपदेश देने वाला शान्तरस होता है । 1 बुद्धीन्द्रियकर्मेन्द्रियसंरोधाध्यात्मसंस्थितोपेतः सर्वप्राणिसुखहितः शान्तरसो नाम विज्ञेयः ॥ ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों की क्रियाओं के संरोध से स्वात्म की अवस्थिति से संयुक्त कराने वाला तथा सभी लोगों के सुख के कारण भूत रस को शान्त रस समझना चाहिए । धर्मोपयोगी परिकल्पित विषयोपभोगरहितोऽत्र स्थायी ) । यहाँ पर यह उल्लेखनीय है. कि यद्यपि शान्तरस में आत्मा को स्थायी नहीं माना जा सकता; क्योंकि आत्मा के सत्य स्वरूप का ज्ञान ( साक्षात्कार ) समधिकाल में ही होता है । अन्य रसों में आत्मा का साक्षात्कार नहीं होता । जहाँ तक शान्तरस के पृथक् अस्तित्व का प्रश्न है तो इसकी अलग सत्ता मानना ही उचित है क्योंकि शान्तरस का आस्वाद रत्यादि के आस्वाद से विलक्षण ही होता है । प्रश्न उठता है कि इस शान्तरस का आस्वादन किस प्रकार होता है? इसका उत्तर है कि जैसे सूत्र से मणियाँ पिरोई होने पर बीच बीच में सूत्र भासित हो जाता है उसी प्रकार उत्साह एवं रत्यादि से आत्मा के आच्छादित रहने पर भी समय रत्यादि रूप बीच बीच में आत्मा का स्वरूप भासित होता रहता है । उस उपरञ्जकों के उस रूप में रहने पर भी यह आत्मरूप एक बार भी प्रकाशित होकर विषयोन्मुखता आदि दुःखों से रहित एवं परमानन्द की प्राप्ति के साथ अभिन्नरूप से काव्य तथा नाटक आदि के द्वारा समान रूप से प्रतीत होते हुए हृदय को भी उस अन्तर्मुखी अवस्था भेद से लोकोत्तर आनन्द का प्रापक होकर प्रकार का आन्दमय बना देता है । इस प्रकार रसों की संख्या नौ ही है- [ एवं ते नवैव रसाः ] न इससे कम, न इससे अधिक । अर्थात् शान्तरस की असत्ता या वात्सल्य रस अथवा भक्ति रस की सता को अभिनव ने स्वीकार किया है । उनका स्पष्ट कथन है कि आर्द्रता स्थायिभाव से युक्त स्नेह नामक दशम रस को मानना उचित नहीं है [ आर्द्रतास्थायिकः स्नेही रस इति त्वत् ] । भक्ति रस की भी अलग सत्ता नहीं । उसका भी रति आदि में अन्तर्भाव सम्भव है [ एवं भक्तावपि वाच्यमिति ] ।
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षष्ठोऽध्यायः २७७
न यत्र दुःखं न सुखं न द्वेषो नापि मत्सरः ।
समः सर्वेषु भूतेषु स शान्तः प्रथितो रसः ॥
जहाँ दुःख, सुख, ईर्ष्या, मात्सर्य आदि कोई भी भाव नहीं होता, तथा जो सभी भावों में एक रूप होता है वह शान्त रस के नाम से प्रसिद्ध है ।
भावा विकारा रत्याद्याः शान्तस्तु प्रकृतिर्मतः ।
विकारः प्रकृतेर्जातः पुनस्तत्रैव लीयते ॥
रत्यादि भाव विकार हैं । शान्त रस सबकी प्रकृति है । अन्य सभी भाव विकार होने से प्रकृति से उत्पन्न होते हैं व इसी में विलीन हो जाते हैं ।
स्वं स्वं निमित्तमासाद्य शान्ताद्भावः प्रवर्तते ।
पुनर्निमित्तापाये च शान्त एवोपलीयते ॥
अपने अपने निमित्त कारणों को पाकर भाव शान्त रस से जन्म लेते हैं और उन उन निमित्तों के न रहने पर वे पुनः शान्त रस में विलीन हो जाते उपसंहार- एवं नव रसा दृष्टा नाट्यज्ञैर्लक्षणान्विताः । ] इस तरह नाट्य के ज्ञाताओं ने लक्षणों से युक्त नौ रसों का अवलोकन किया है । ]
एवमेते रसा ज्ञेयास्त्वष्टौ लक्षणलक्षिताः ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि भावानामपि लक्षणम् ॥ ८३ ॥
॥ इति भारतीये नाट्यशास्त्रे रसाध्यायः षष्ठः ॥
अतः इस प्रकार के लक्षणों से वर्णित इन आठ रसों को जानना चाहिए । इसके आगे अब हम भावों के लक्षण बतायेंगे । || इस प्रकार भरमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र की ' नाट्यप्रदीप ' नामक हिन्दी व्याख्या का रस विषयक षष्ठ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥
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अथ सप्तमोऽध्यायः भाव का लक्षण- व्याख्यास्यामः । अत्राह- भावा इति कस्मात्? किं भावानिदानीं भवन्तीति भावाः, किं वा भावयन्तीति भावाः? उच्यते- वागङ्गसत्त्वो-पेतान् काव्यार्थान् भावयन्तीति भावा इति । अब हम भावों की व्याख्या करेंगे । यहाँ प्रश्न उठता है कि इन्हें भाव क्यों कहते हैं? ये क्या हैं? और किसे भावित करते हैं? इसका उत्तर है कि वाणी, अंग एवं सात्विक भावों से युक्त काव्यार्थ को भावित कराने के कारण इन्हें भाव कहा जाता है । भू इति करणे धातुस्तथा च भवितं वासितं कृतमित्यनर्थान्तरम् । च प्रसिद्धम् । अहो ह्यनेन गन्धेन रसेन वा सर्वमेव भावितमिति । लोकेऽपि तच्च व्याप्त्यर्थम् । "भू" धातु से करण (हेतु ) के अर्थ में "भाव" शब्द की निष्पत्ति होती है । समानार्थक शब्द "भाव " "वासित", एवं 'कृत ' हैं । लौकिक प्रयोग में भी ऐसा कहा सुना जाता इसके है कि इस गन्ध अथवा इससे यह सब भावित हो रहा है । इस स्थान पर "भावल" का तात्पर्य व्याप्त होने से है ।
श्लोकाश्चात्र- विभावेनाहृतो योऽर्थो ह्यनुभावैस्तु गम्यते ।
स भाव इति संज्ञितः ॥ १ ॥ वागङ्गसत्त्वाभिनयैः
इस विषय में निम्न श्लोक प्राप्त हैं- द्वारा समुपस्थित होकर जो अर्थ' वाणी, अंग एवं सात्विक अभिनय विभावों १. प्रस्तुत श्लोक में अर्थ शब्द का शब्दार्थ अभीष्ट नहीं है । प्रधानतः प्रति- होकर भावित करवाने वाले को अर्थ कहा गया है । काव्य के अर्थ रूप रस को पाद्यभावित कराना ही यहाँ अभीष्ट है । यह अलौकिक अर्थरूप आस्वादन स्थायी एवं व्याभिचारि आदि भावों से निष्पन्न किया जाता है । २. यद्यपि अभिनय का चतुर्थ प्रकार भी होता है जिसे आहार्य अभिनय कहते हैं तथापि चित्तवृत्तिरूप भावों को भावित कराने में वह इतना आवश्यक नहीं है । इसी कारण अभिनय के तीन ही भेदों का यहाँ उल्लेख हुआ है ।
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सप्तमोऽध्यायः २७९ के माध्यम से अनुभावों द्वारा बोधगम्य होता है हैं ॥ १ ॥
वागङ्गमुखरागेण सत्त्वेनाभिनयेन । उसे भाव' कहतेच । " कवेरन्तर्गतं भावं भावयन्भाव " उच्यते ॥ २ ॥
वाचिक, आंगिक एवं मुख, के प्रसाधन (आहार्य' ) एवं सात्विक अभिनय के द्वारा कवि के अव्यक्त भावों को भावित (व्यक्तं ) करने वाला भाव कहा है ॥ २ ॥
नानाभिनयसंबद्धान् भावयन्ति सानिमान् । यस्मात्तस्मादमी भावा विज्ञेया नाट्ययोक्तृभिः ॥ ३ ॥
अनेक प्रकार के अभिनयसम्पन्न रसों को भावित करने के कारण नाट्य- प्रयोक्ताजन इनको भाव मानते हैं ॥ ३ ॥
विभाव का लक्षण - अथ विभाव इति कस्मात्? उच्यते - "विभावो विज्ञानार्थः । " विभावः कारणं निमित्तं हेतुरिति पर्यायाः । विभाव्यन्तेऽनेन वागङ्गसत्त्वाभिनया इत्यतो विभावः । यथा विभावितं विज्ञातमित्यनर्थान्तरम् । १. चित्तवृत्तिरूप होने के कारण भाव की द्विविध व्युत्पत्ति संभव है - भवन्ति इति भावाः, एवं भावयन्ति इति भावाः । पहली व्युत्पत्ति से भाव की स्थिति ज्ञात होती है जिसका उत्कर्ष हो जाता है एवं द्वितीय से यह आशय निकलता है कि भाव स्थित न होकर क्रमशः विकासशील रहता है । यदि द्वितीय निष्पत्ति मानी जाए तो शंका उठती है कि व्याप्त होकर भाव क्या अनुभावन करते हैं? इसका उत्तर भरत मुनि ने प्रस्तुत श्लोक में दिया है । अभिनवगुप्त के मत में वित्तवृत्तियों को ही भाव मानने के पीछे यह तर्क है कि त्रिविध अभिनयप्रक्रिया द्वारा सम्पन्न यह अलौकिक चित्तवृत्तियाँ अपनी आत्मस्थ लौकिक अवस्था का आस्वादन न कराते हुए रसरूप का भावन कराती हैं । यहाँ भू धातु अंतर्भावित व्यर्थ है जो प्रकृति में करोति या स्थिति अर्थ की बोधक है । भूधातु से णिच् लगा कर भावित शब्द बना है । २. अभिनव के मत में मुखराग की गणना यद्यपि सात्विक भाव के अन्तर्गत - (... ) हो जाती है वागङ्गमुखरागात्मनाऽभिनयेन सत्त्वलक्षणेन चाभिनयेन फिर भी महत्त्वपूर्ण होने से विवर्ण भाव वाले मुखराग का यहाँ अभिधान किया गया है । अर्थात् मुखराग से वह अन्तरित उल्लासादि जन्य मुख पर छाई लालिमा का तात्पर्य लेते हैं, किन्तु हमारे मत में यहाँ पर लालिमा से मुख प्रसाधन रूपी अंगरागादि का बोध होता है । इसके अतिरिक्त अभिनय की अन्य तीनों श्रेणियों का इसी स्थल पर उल्लेख होने से हम इसे आहार्य अभिनय का वाचक मानना अधिक सटीक समझते हैं ।
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२८० नाट्यशास्त्रम् विभाव की क्या आवश्यकता है? इसका उत्तर है कि विभाव का प्रयोग विशेष ज्ञान के हेतु किया जाता है । विभाव, कारण; निमित्त अथवा हेतु यह सब पर्यायवाची शब्द हैं । इसके द्वारा वाचिक, आंगिक एवं सात्त्विक अभिनय का विशेष ज्ञान ( विभावन ) किया जाता है अतः इसे 'विभाव ' कहा जाता है । इसी भाँति विभावित एवं विज्ञात भी एकार्थंक पद हैं ।
अत्र श्लोक: - बहवोऽर्था विभाव्यन्ते वागङ्गभिनयाश्रयाः ।
अनेन यस्मात्तेनायं विभाव इति संज्ञितः ॥। ४ ॥
इस विषय में एक श्लोक है— क्योंकि इसके द्वारा वाक् अंग एवं अभिनय के आश्रित बहुत से अर्थ विभावित होते हैं अतः इसे विभाव ' कहा जाता है ॥ ४ ॥
अनुभाव का लक्षण - अथानुभाव इति कस्मात्? उच्यते - अनुभाव्यतेऽनेन वागङ्गसत्त्व- कृतोऽभिनय इति । अत्र श्लोकः- शब्द का क्या प्रयोजन है? इसका उत्तर है कि इसके द्वारा वाचिक आङ्गिकअनुभावएवं सात्त्विक अभिनय का अनुभावन किया जाता है ( अत: इन्हें अनुभाव कहा जाता है ) ।वागङ्गाभिनयेनेह यतस्त्वर्थोऽनुभाव्यते । शाखाङ्गोपाङ्गसंयुक्तस्त्वनुभावस्ततः स्मृतः ॥ ५ ॥
इस विषय में एक श्लोक है- क्योंकि वाचिक एवं आङ्गिक अभिनय के द्वारा यह अर्थ का अनुभावन कराता है अतः शाखा अङ्ग एवं उपयोग से संयुक्त इसको अनुभाव कहा जाता है ॥ ५ ॥
एवं ते विभावानुभावसंयुक्ता भावा इति व्याख्याताः । अतो ह्येषां भावानां सिद्धिर्भवति । तस्मादेषां भावानां विभावानुभावसंयुक्तानां लक्षण- । तत्र विभावानुभावौ लोकप्रसिद्धौ । लोक- निदर्शनान्यभिव्याख्यास्यामः १. जिसके द्वारा स्थायी एवं व्यभिचारी भावों का विभाजन अर्थात् विशेष ज्ञान कराया जाता है वह विभाव है (वागादयोऽभिनया येषां स्थायिव्यभिचारिणां ते विभाव्यन्ते विशिष्टतया ज्ञायन्ते यैस्ते विभावः ) । एक ही भाव वागाद्यभिनयसहिता के अभिनय के अनेक हेतु सम्भव हैं यथा धूप, धुआं व रोगादि से अश्रु उत्पन्न होते हैं । कारणस्वरूप विभाव के द्वारा सन्देह न रहकर निश्चय हो जाता है । अतः विभाव को ज्ञापक हेंतु माना गया है ( धर्मधूम रोगादिभ्यो वाष्पः । तद्वाष्पातिक प्रतीयताम् । विभावात्तु झडित्येव निश्चयः । अतएव........ )
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सप्तमोऽध्यायः २८१ स्वाभावानुगतत्वाच्च तयोर्लक्षणं नोच्यतेऽतिप्रसङ्गनिवृत्त्यर्थम् । इस प्रकार से विभाव एवं अनुभाव से युक्त भावों की व्याख्या की गयी है । इस भांति इन भावों की सिद्धि होती है । अब हम विभाव एवं अनुभावों से युक्त भावों के लक्षणों एवं उदाहरणों की व्याख्या करेंगे । वहाँ विभाव एवं अनुभाव अत्यन्त प्रसिद्ध है । उन दोनों के लोकमानस के वंशगत होने के कारण, अतिप्रसंग के निराकरण हेतु उन दोनों के लक्षण नहीं बताये गये । भवति चात्र श्लोकः- लोकस्वभावसंसिद्धा लोकयात्रानुगामिनः । ६ ॥ अनुभावा विभावाश्च ज्ञेयास्त्वाभिनये बुधैः ॥ इस सम्बन्ध में यह श्लोक है- लोक स्वभाव से सिद्ध होने वाले एवं लोकव्यवहार का अनुगमन करने वाले इन अनुभावों तथा विभावों को अभिनय के समय विद्वानों को जान लेना चाहिये ॥ ६ ॥
उनचास भाव- तत्राष्टौ भावाः स्थायिनः । त्रयस्त्रिंशद्व्यभिचारिणः । अष्टौ सात्त्विका इति भेदाः । एवमेते काव्यरसाभिव्यक्तिहेतव एकोनपञ्चाशद्भावाः प्रत्य- वगन्तव्याः । “ एभ्यश्च सामान्यगुणयोगेन रसा निष्पद्यन्ते " । इनमें से आठ स्थायी भाव होते हैं । तैंतीस संचारी भाव हैं एवं आठ सात्त्विक "भाव हैं', यह भावों के प्रकार हैं । इन्हीं उनचास भावों को काव्य में रसाभि- व्यक्ति का हेतु जानना चाहिये । इन्हीं के सामान्य गुणों के योग से रसों की निष्पत्ति होती है ।
स्थायी भाव का लक्षण - अत्र श्लोक: - योऽर्थो हृदयसंवादी तस्य भावो रसोद्भवः ।
शरीरं व्याप्यते तेन शुष्कं काष्ठमिवाग्निना ॥ ७ ॥
एतत्सम्बन्धी श्लोक यह है- जो अर्थ मर्मस्पर्शी हो उसका भाव रस से उद्भूत होने वाला होता है । जैसे सूखी लकड़ी में अग्नि फैल जाती है उसी प्रकार यह ( भाव ) शरीर में तत्काल व्याप्त हो जाता है ॥ ७ ॥
अत्राह - यदि कार्व्यार्थ संश्रितै विभावानुभावव्यञ्जितैरे कोनपञ्चाशद्भावः सामान्यगुणयोगेनाभिनिष्पद्यन्ते वन्ति । उच्यते -यथा हिरसास्तत्कथं'समानलक्षणास्तुल्यपाणिपादोदरशरीराःस्थायिन एव भावा रसत्वमाप्नु- समानाङ्गप्रत्यङ्गा अपि पुरुषाः कुलशीलविद्याकर्म शिल्पविचक्षगत्वाद्राः