भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 371–380

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

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२८२ नाट्यशास्त्रम् जत्वमाप्नुवन्ति तत्रैव चान्येऽल्पबुद्धयस्तेषामेवानुचरा भवन्ति तथा विभावा-नुभावव्यभिचारिणः स्थायिभावानुपाश्रिता भवन्ति । बह्वाश्रयत्वात्स्वामि-भूताः स्थायिनो भावाः । तद्वत्स्थानीयपुरुषगुणभूता अन्ये भावा-स्तान्गुणतया श्रयन्ते । स्थायिभावा रसत्वमाप्नुवन्ति । परिजनभूता व्याभिचारिणो भावाः । अत्राह - को दृष्टान्त इति । यथा नरेन्द्रो बहुजन- परिवारोऽपि स एव नाम लभते नान्यः सुमहानपि पुरुषः । तथा विभावानु- भावव्यभिचारिपरिवृतः स्थायी भावो रसनाम लभते । यहाँ प्रश्न यह उठता है कि काव्य के अर्थों पर आश्रित विभावों एवं अनुभावों द्वारा व्यञ्जित उनचास भावों के सामान्यगुणों के संयोग से रस उत्पन्न होते हैं तो फिर स्थायी भाव ही रसत्व को क्यों प्राप्त करते हैं । इसका उत्तर यह है कि जिस प्रकारव्यक्तिएक जैसेकुल-शील. हाथ, विद्यापैर, -पेटकर्मएवंएवंशरीरशिल्पऔरके वैशिष्ट्यएक जैसे सेअङ्गोपाङ्गराजत्व कोहोनेपा परलेतेभीहैं। कुछतथा दूसरे मन्दबुद्धिजन उन्हीं के सेवक हो जाते हैं उसी प्रकार विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भाव, स्थायिभाव के आश्रित हो जाते हैं । स्थायी भाव स्वामी होते हैं क्योंकि उनके ऊपर अनेक भाव आश्रित होते हैं । सेवकों की भाँति जो अन्य भाव होते हैं वह सेव्य स्थायिभाव के आश्रित होते हैं । स्थायी भाव रस की अवस्था में पहुँच जाता है । व्यभिचारी भाव उसके परिजनों के समान रहते हैं । प्रश्न उठता है कि क्या इस विषय में कोई उदाहरण है? इसका उत्तर यह है कि जैसे राजा के परिवार में अनेक लोग होने पर भी केवल राजा का ही नाम होता है, उनसे बड़े व्यक्ति का भी नहीं होता, उसी प्रकार विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारी भावों से संयुक्त स्थायी को ही रसत्व की प्राप्ति होती है ( अन्य किसी भाव को नहीं होती ) ।

भवति चात्र श्लोकः- यथा नाराणां नृपतिः शिष्याणां च यथा गुरुः ।

एवं हि सर्वभावानां भावः स्थायी महानिह ॥ ८ ॥

इस सम्बन्ध में यह श्लोक है- जिस प्रकार सब मनुष्यों में राजा एवं शिष्यों में गुरु श्रेष्ठ होते हैं उसी प्रकार समस्त भावों में स्थायी भाव सर्वश्रेष्ठ होता है ॥ ८ ॥

लक्षणं खलु पूर्वमभिहितमेषां रससंज्ञकानाम् । इदानीं भावसामान्य- लक्षण मभिधास्यामः । तत्र स्थायिभावान्वक्ष्यामः - इनमें से रस नामक भावों के लक्षण एवं दृष्टान्त पहले ही बताये जा चुके हैं । अब हम सामान्य भावों के लक्षण बतायेंगे । इनमें से पहले स्थायी भावों के विषय में बतायेंगे 1

पृष्ठ 372

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सप्तमोऽध्यायः २८३ रति स्थायी भाव का लक्षण - रतिर्नाम प्रमोदात्मिका ऋतुमाल्यानुलेपनाभरणभोजनवरभवनानुभव--प्रातिकूल्यादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तामभिनयेत्स्मितवदनमधुरकथन-भ्रूक्षेपकटाक्षादिभिरनुभावैः । रति नामक भाव आनन्दात्मक होता है तथा ऋतु माला, अङ्गराग, अलङ्कार, भोजन, सुन्दर भवन, अवैपरीत्य सुखानुभव एवं अप्रतिकूल्य आदि विभावों से उत्पन्न होता है । 1.इसका अभिनय हँसते हुए चेहरे, मीठी बोली, भ्रक्षेप एवं कटाक्षादि अनुभावों के द्वारा किया जाता है ।

अत्र श्लोक: - इष्टार्थविषयप्राप्त्या रतिरित्युपजायते ।

सौम्यत्वादभिनेया सा वाङ्माधुर्याङ्गचेष्टितैः ॥ ९ ॥

एतद्विषयक श्लोक यह है. अभीप्सित अर्थ एवं विषय की प्राप्ति से रति उत्पन्न होती है । यह सौम्य होती है । अतः इसका अभिनय मधुर वाणी एवं ललित आङ्गिक चेष्टाओं द्वारा किया जाना चाहिये ॥ ९ ॥

२-हास स्थायी भाव का लक्षण- हासो नाम विनोदात्मको भावः स च परचेष्टानुकरणकुहकासम्बद्ध-- प्रापपौरो भाग्य मौर्यादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तमभिनयेत्पूर्वोक्तैर्हसिता दिभिरनुभावैः । दूसरों लोगों की क्रिया की नकल, कुहक ( मायावी चेष्टाओं का प्रदर्शन ), अनर्गल बातचीत, बुराइयाँ ढूंढने एवं मूर्खता आदि विभावों के द्वारा हास नामक भाव की उत्पत्ति होती है । पहले कहे जा चुके हसितादि अनुभावों द्वारा इसका अभिनय किया जाना चाहिये । भवति चात्र श्लोकः- परचेष्टानुकरणाद्धासः समुपजायते । स्मितहासातिहसितैरभिनेयः स पण्डितैः ॥ १० ॥

इस विषय में एक श्लोक है- दूसरे के कामों की नकल करने से हाम उत्पन्न होता है । विद्वानों को १. पौरोभाग - अमरकोष के अनुसार दूसरे की कमियाँ ढूँढ़ने वाला पुरोभागी होता है ( दोषैकदक पुरोभागी ) । अतः पुरोभाग्य का तात्पर्य दूसरे की कमियाँ या बुराइयाँ निकालना होता है । हास के प्रसंग में यह छींटाकशी या नुक्ताचीनी द्वारा व्यंग उपहास करना हो सकता है ।

पृष्ठ 373

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२८४ नाट्यशास्त्रम् चाहिये कि स्मित, हसित एवं अतिहासित के द्वारा इसका अभिनय करें ॥ १० ॥

३–शोक स्थायी भाव का लक्षण - शोकोनाम - इष्टजनवियोगविभवनाशवधबन्धदुःखानुभवनादिभिवभावः -समुत्पद्यते । तस्यानुपात परिदेवितविलपितवैवर्ण्य स्वरभेदस्रस्तगात्रताभूमि- पतनसस्वन रुदिताक्रन्दित दीर्घनिःश्वसितजडतोन्मादमोह मरणादिभिरनुभावैर- भिनयः प्रयोक्तव्यः । प्रियजन के (विरह (मृत्यु आदि जन्य ), ऐश्वर्य का नाश, प्रिय के बध, बन्धन • एवं कष्टभोगादि विभावों के द्वारा शोक नामक रस की उत्पत्ति होती है । अश्रु- पात, पश्चात्ताप, उदासी, विलास, मुँह के फीकेपन, आवाज के रूधने, शरीर की शिथिलता, जमीन पर गिर जाने, सस्वर रोने चिल्लाने, लम्बी साँस छोड़ने, जडता, उन्माद, मोह एवं मृत्यु आदि अनुभावों द्वारा इसका अभिनय किया जाता है । रुदन के तीन भेद- रुदितमत्र त्रिविधम् — आनन्दजमातिजमीसमुद्भवं चेति । रुदन के तीन भेद होते हैं- १. हर्ष से उत्पन्न, २. कष्ट से उत्पन्न एवं ३. ईर्ष्या से उत्पन्न । भवन्ति चात्रार्या:- [ आनन्देर्व्यातिंकृतं त्रिविधं रुदितं सदा बुधैर्ज्ञेयम् । तस्य त्वभिनययोगान्विभावगतितः प्रवक्ष्यामि ॥ ] एतद्विषयक निम्न आर्यायें मिलती है- [ ज्ञानी जन को हर्ष एवं विषादजन्य रुदन के तीन भेद जानने चाहिये । उसका वर्णन मैं आगे अभिनय के प्रसंग में विभावों के संदर्भ में करूँगा । ] आनन्दजन्य शोक के लक्षण-- हर्षोत्फुल्लकपोलंरोमाञ्चगात्रमनिभृतमानन्दसमुद्भवंसानुस्मरणादपाङ्गविसृतास्रम्भवति ॥। ११ ॥ शुद्ध आनन्द से उत्पन्न रुदन में प्रसन्नता से करोल खिल जाते हैं ( बीती घटना -का ) स्मरण करते हुए आंखों की कोर से आँसू टपकने लगते हैं एवं शरीर -पुलकित होता है ॥ ११ ॥

दुःखजन्य शोक के लक्षण- पर्याप्तविमुक्तास्र सस्वनमस्वस्थगात्रगतिचेष्टम् ।

भूमिनिपातनिवर्तितविलपितमित्यातिजं भवति ॥ १२ ॥

शोकोद्भूत रुदन में अत्यधिक आँसू गिरते हैं, वह सस्वर होता है, उसमें शरीर

पृष्ठ 374

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सप्तमोऽध्यायः २८५० की अवस्था एवं क्रियाएं अस्तव्यस्त होती है एवं भूमि पर गिरकर पुनः पुनः रुदन होता है ॥ १२ ॥

ईर्ष्याजन्य शोक के लक्षण- प्रस्फुरितौष्ठकपोलं सशिरःकम्पं तथा सनिःश्वासम् ।

भ्रुकुटीकटाक्षकुटिलं स्त्रीणामीयकृतं भवति ॥ १३ ॥

स्त्रियों का वह रुदन जिसमें अधर एवं कपोल फड़कते रहते हैं, सिर कांपता रहता है, उसांसे भरी जाती है एवं भवें तथा दृष्टि वक्र हो जाती है, ईर्ष्याजन्य रुदन कहा जाता है ॥ १३ ॥

शोक के पात्रस्त्रीनीच- प्रकृतिष्वेष शोको व्यसनसम्भवः ।

धैर्येणोत्तममध्यानां नीचानां रुदितेन च ॥ १४ ॥

स्त्रियों एवं निम्नकोटि के पात्रों में ही व्यसन से उद्भुत शोक पाया जाता है ।" उत्तम एवं मध्यम पात्रों में धैर्यपूर्वक तथा अधमपात्र में रुदन के द्वारा ( यह शोक व्यक्त किया जाता है ) ॥ १४ ॥

क्रोध स्थायी क्रोधो नाम भाव-- आधर्षणाक्रुष्टका लक्षण- कलहविवादप्रतिकूलादिभिर्विभावः समु-- पद्यते । अस्य विकृष्टनासापुटोद्वृत्तनयन सन्दष्टोष्ठपुटगण्डस्फुरणा-- दिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । झपटने, गाली देने, कलह करने, लड़ने एवं वैपरीत्य आदि विभावों से क्रोध की उत्पत्ति होती है । नथुने फुलाने, आंखे फाड़ने, ओठ काटने, एवं गाल फड़कने आदि अनुभावों के द्वारा इस ( क्रोध ) का अभिनय किया जाता है । क्रोध के पाँच भेद --- रिपुजो गुरुजश्चैव प्रणयिप्रभवस्तथा भृत्यजः कृतकश्चेति क्रोधः पञ्चविधः स्मृतः ॥ १५ ॥

क्रोध पाँच प्रकार का होता है १ - रिपुज - जिसका उत्पादक शत्रु होता है । २. – गुरुज - जिसका कारण अपने से बड़ा व्यक्ति होता है । ३- प्रणयिप्रभव अर्थात् अपने प्रिय पर आने वाला ४ – भृत्यज - जिसका कारण अनुचर होता है? एवं ५ – कृतक अर्थात् जो कृत्रिम होता है ॥ १५ ॥

शत्रु विषयक क्रोध का लक्षण- अत्रार्या भवन्ति- भ्रुकुटीकुटिलोत्कटमुखःक्रुद्धः स्वभुजप्रेक्षी सन्दष्टोष्ठःशत्रौ निर्यन्त्रणंस्पृशन्करेणरुष्येत्करम् ॥। १६ ॥

पृष्ठ 375

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२८६ नाट्यशास्त्रम् इस विषय में आर्या इस प्रकार हैं- शत्रु के प्रति प्रदर्शित किए जाने वाले क्रोध में भवें टेढ़ी हो जाती हैं, मुँह भीषण' होकर उठ जाता है तथा ओठ चबाने, दोनों हाथ मलने एवं अपनी भुजाओं को परखने की क्रियायें की जाती हैं । शत्रु के प्रति प्रदर्शित क्रोध नियन्त्रणहीन होता है ॥ १६ ॥

गुरु विषयक क्रोध का लक्षण - किञ्चिदवाङ्मुखदृष्टिः सास्रस्वेदापमार्जनपरश्च ।

अव्यक्तोल्बणचेष्टो गुरौ विनययन्त्रितो रुष्येत् ॥ १७ ॥

क्रोध में मुख एवं आँखे कुछ झुक जाती हैं, बार बार आँसू तथा पसीना गुरुजजाता है, उद्धत क्रियायें प्रकट नहीं की जाती एवं क्रोध विनय से संयमित पोंछा रहता है ॥ १७ ॥

प्रिय विषयक क्रोध का लक्षण - अल्पतरप्रविचारो विकिरन्नश्रूण्यपाङ्गविक्षेपैः ।

प्रणयोपगतां प्रियां रुष्येत् ॥ १८ ॥

सभृकुटीस्फुरितोष्ठः प्रिय पर किए जाने वाले प्रणयकोप में थोड़ा इधर उधर घूमना, आँसू बहाना, नयन को कोरों से तिरछे देखना, भवें चढ़ाना एवं ओठों का फड़कना शामिल होता ॥ १८ ॥

भृत्य विषयक क्रोध का लक्षण- अथविप्रेक्षणैश्चपरिजने तु विविधैरभिनेयःरोषस्तर्जन निर्भर्त्सनाक्रूरतारहितःक्षिविस्तारैः ॥। १ ९ ॥ अनुचर पर प्रकट किये जाने वाले क्रोध में धमकाना, जलील करना', आँखे दिखाना, एवं घूरना आदि क्रियायें होती है ॥ १ ९ ॥ कृतक ( कृत्रिम ) क्रोध का लक्षण --- कारणमवेक्षमाणः प्रायेणायासलिङ्गसंयुक्तः । वीररसान्तरचारी कार्यः कृतको भवति कोपः ॥ २० ॥

१. उत्कट का अर्थ श्रीघोष के अनुसार 'मुख की भयंकरता' है । यही अर्थ उचित है । - बाबूलालशास्त्री इसे ओंठों को चबाना मानते हैं । श्रीवोष ने २. स्फुरितोष्ठ • इसका अनुवाद 'ओठ फड़काना' किया है । ३. निर्भत्सना– श्रीघोष ने इसका अनुवाद 'गाली गलौज करना' किया है । -भाव की दृष्टि से यह दोनों ही अर्थ सही हैं । किन्तु यहाँ कहने सुनने से भृत्य को नीचा दिखाने अर्थात् जलील करने का भाव अधिक उपयुक्त लगता है ।

पृष्ठ 376

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सप्तमोऽध्यायः २८७ कृतक क्रोध किसी हेतु से उत्पन्न होता है, तथा प्रायः सप्रयास ( क्रोध के ) -लक्षणों से युक्त होता है और दो रसों के बीच में विद्यमान रहता है ॥ २० ॥

उत्साह स्थायी भाव का लक्षण - उत्साहो नाम -उत्तमप्रकृतिः । स चाविषादशक्तिधैर्य शौर्यादिभिर्विभावै रुत्पद्यते । तस्य धैर्यात्यागवैशारद्यादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । उत्तम स्वभाव के लोगों में उत्साह पाया जाता है । विषाद न होने पर एवं शक्ति, धैर्य, शौर्य आदि विभावों से युक्त होने पर यह उत्पन्न होता है । स्थिरता; - त्याग एवं चतुरता आदि अनुभावों द्वारा इसका अभिनय किया जाना चाहिये । अत्र श्लोकः-असम्मोहादिभिर्व्यक्तो व्यवसायनयात्मकः । उत्साहस्त्वभिनेयः स्यादप्रमादोत्थितादिभिः ॥ २१ ॥

एतद्विषयक श्लोक है— असम्मोह आदि से उत्पन्न व्यवसाय एवं नीति से युक्त उत्साह का अभिनय अप्रमाद एवं उत्थान आदि क्रियाओं के द्वारा किया जाना चाहिये ॥ २१ ॥

भय स्थायी भाव का लक्षण - भयं नाम - स्त्रीनीचप्रकृतिकम् । गुरुराजापराधश्वापदशून्यागाराटवी-" पर्वतगहनगजाहिदर्शननिर्भर्त्सन कान्तारदुर्दिननिशान्धकारो लूकनक्तञ्चराराव- श्रवणादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तस्य प्रकम्पित करचरणहृदय कम्पनस्तम्भ-मुखशोषजिह्वापरिलेहन- स्वेदवेपथु त्रासपरित्रणान्वेषणधावनोत्क्रुष्टादिभिरनु --भावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । स्त्रियों एवं नीच पात्रों में भय उपस्थित होता है । गुरु तथा राजा के प्रति अपराध करने, जंगली जानवर. सूनसान घर, अरण्य एवं पर्वत में जाने, हाथी या साँप को देखने, तिरस्कृत होने, वन, अतिवृष्टि तथा रात्रि के अंधेरे, उल्लू व -राक्षसों के ध्वनियों के सुनने आदि विभावों से यह उत्पन्न होता है । हाथ पैरों के • काँपने, हृदय के धड़कने निश्चेष्ट होने, मुख सूखने, जीभ चाटने, पसीना पोंछने, कम्पन, त्रास, इधर उधर रक्षा हेतु स्थान तलाशने, दौड़ने और चिल्लाकर रोने आदि अनुभावों द्वारा इसका अभिनय किया जाता है ।

अत्र श्लोकाः- गुरुराजापराधेन रौद्राणां चापि दर्शनात् ।

श्रवणादपि घोराणां भयं मोहेन जायते ॥ २२ ॥

पृष्ठ 377

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२८८ नाट्यशास्त्रम् गुरुजनों एवं राजा के प्रति अपराध, रौद्रपदार्थ के दर्शन एवं भयंकर आवाज को सुनने से मोह के कारण "भय " उत्पन्न होता है ॥ २२ ॥

गात्रकम्पनवित्रासैर्वक्त्रशोषणसम्भ्रमैः ॥ २३ ॥

कर देखने आदि शरीर के कांपनेविस्फारितेक्षणैः, त्रास, मुँह सूखने कार्यमभिनेयक्रियागुणैः, हड़बड़ाने, आँखे फाड़ क्रियाओं से इसकासत्त्ववित्रासनोद्भूतंअभिनय किया जाना चाहिऐभयमुत्पद्यते। नृणाम् । स्रस्ताङ्गाक्षिनिमेषैस्तदभिनेयं तु नर्तकैः ॥ २४ ॥

सत्त्व ( प्रेतादि ) से आशंकित होने पर मनुष्यों में भय उत्पन्न होता है । नर्तकों को चाहिये कि अस्तव्यस्त अवयवों तथा पलकों को झपका कर इसका अभिनय करें ॥ २४ ॥

अत्रार्या भवति- । करचरणहृदयकम्पैर्मुखशोषणवदनलेहनस्तम्भैः ॥ २५ ॥

सम्भ्रान्तवदनवेपथुसन्त्रासकृतैरभिनयोऽस्य कम्पन से मुख के इस विषय में यह आर्या मिलती -हाथों पैरों एवं हृदय के जाने, तथा अस्त- के सूखने से जिह्वा से ओठ चाटने (बदन लेन' ) से, भौचक्के रह ॥ २५ ॥ व्यस्त शरीर के कम्पन से भय का अभिनय किया जाना चाहिये

जुगुप्सा स्थायी भाव का लक्षण- जुगुप्सा नाम–स्त्रीनीचप्रकृतिका । सा चाहृद्य दर्शनश्रवणादिभिर्विभावः समुत्पद्यते । तस्याः सर्वाङ्गसङ्कोचनिष्ठीवनमुखविकूणनहृल्लेखादिभिरनु- भावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । नामक भाव स्त्रियों एवं निम्नकोटि के पात्रों में पाया जाता है । जुगुप्सा वस्तु को देखने, सुनने या कहने आदि विभावों से उत्पन्न होता है । यह अप्रीतिकरअङ्गों को सिकोड़ने, थूकने, मुँह बनाने एवं हृदय के संकोच आदि अनुभावों समस्त से इसका अभिनय किया जाना चाहिए । भवति चात्र श्लोकः- नासाप्रच्छादनेनेह गात्रसङ्कोचनेन च । उद्वेजनैः सहल्लेखैर्जुगुप्सामभिनिर्दिशेत् ॥ २६ ॥

१. अक्षिनिमेषः - शास्त्री के मत में इसका अर्थ शंकित दृष्टि है । घोष इसका अनुवाद 'आँखों की अविचलित ' गति किया है । २. बदन लेहन का शाब्दिक अर्थ तो मुख चाटना है किन्तु इससे सूखे हुए ओठों पर बार बार जीभ फिराने की प्रक्रिया उपलक्षित होती है ।

पृष्ठ 378

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सप्तमोऽध्यायः २८९ इस विषय में यह श्लोक है - नाक को ढकने, शरीर को सिकोड़ने, उद्विग्नता तथा हृदय के संकोच द्वारा जुगुप्सा का प्रदर्शन किया जाना चाहिए ॥ २६ ॥

विस्मय स्थायी भाव का लक्षण- विस्मयो नाम- मायेन्द्रजालमानुषकर्मातिशयचित्रपुस्तशिल्पविद्यातिषया-दिभिर्विमाः समुत्पद्यते । तस्य नयनविस्तारानिमेषप्रेक्षितभ्रू- क्षेप रोमहर्षण-शिरःकम्पसाधुवादादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । माया, इन्द्रजाल, मानवकृत महान कार्य, अत्यन्त विचित्र चित्रयुक्त अथवा शिल्प आदि से अभिभूत होने आदि विभावों से विस्मय की उत्पत्ति होती है । आँखों को फाड़ने, एकटक देखने, भवें चलाने, रोंगटे खड़े होने, सिर काँपने प्रशंसा करने आदि अनुभावों के द्वारा अभिनय किया जाना चाहिये ।

भवति चात्र श्लोकः- कर्मातिशयनिर्वृत्तो विस्मयो हर्षसम्भवः ।

सिद्धिस्थाने त्वसौ साध्यः प्रहर्षपुलकादिभिः ॥ २७ ॥

एतद्विषयक यह श्लोक है- अद्भुत कार्य के सम्पादन से होने वाले हर्ष से 'विस्मय' उत्पन्न होता है । इसका अभिनय हर्ष एवं सिहरन आदि के द्वारा किया जाना चाहिये ॥ २७ ॥

एवमेते स्थायिनो भावा रससंज्ञाः प्रत्यवगन्तव्याः । इस प्रकार यह स्थायी भाव हैं जो रस के नाम से ज्ञेय होने अपेक्षित हैं । संचारी या व्यभिचारी भाव- व्याभिचारिण इदानीं व्याख्यास्यामः । अत्राह व्यभिचारिण इति कस्मात्? उच्यते -वि अभि इत्येतावुपसगौं । चर इति गत्यर्थो धातुः । विविधमाभिमुख्येन रसेषु चरन्तीति व्यभिचारिणः । वागङ्गसत्त्वोपेताः प्रयोगे रसान्नयन्तीति व्यभिचारिणः । अत्राह— कथं नयन्तीति । उच्यते -लोकसिद्धान्त एषः - यथा सूर्य इदं दिनं नक्षत्रं वा नयतीति । न च तेन बाहुभ्यां स्कन्धेन वा नीयते । किं तु लोकप्रसिद्धमेतत् । यथेदं सूर्यो नक्षत्रं दिनं वा नयतीति । एवमे व्यभिचारिण इत्यवगन्तव्याः । तानिह सङ्ग्रहाभिहितांस्त्रयस्त्रिशद् व्यभि- चारिणो भावान् वर्णयिष्यामः । इसके पश्चात् हम अब व्यभिचारी भावों की व्याख्या करेंगे । प्रश्न उठता है। कि इनका नाम व्यभिचारी भाव क्यों है? उत्तर है कि इसमें ' वि' एवं ' अभि' उपसर्ग हैं तथा गत्यर्थक ' चर्' धातु है । अतः व्यभिचारी शब्द का अर्थ १९ ना०

पृष्ठ 379

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२९० नाट्यशास्त्रम् हुआ -विविध प्रकार से जो रसों की ओर गतिशील होते हैं वे व्यभिचारी भाव हैं । दूसरा अर्थ है कि शाब्दिक, आङ्गिक एवं सात्त्विक भावों से युक्त होकर रसों तक पहुँचने के कारण यह व्यभिचारी भाव हैं । शंका होती है कि यह रस को किस प्रकार धारण करते हैं । इसका समाधान यह है कि इसे उसी भांति लोक सिद्धान्तानुसारी समझना चाहिए जिस भाँति सूर्य नक्षत्र अथवा दिवस विशेष को प्राप्त करता है । सूर्य वास्तव में किसी ( दिन या (नक्षत्र ) को हाथों से या कन्धे पर उठा कर नहीं ले जाता, किन्तु यह लोकप्रसिद्ध है। कि सूर्य ही नक्षत्र या दिन को ले जाता है' । यही बात इन व्यभिचारी भावों के सम्बन्ध में समझनी चाहिये । पूर्व संग्रह से निर्दिष्ट इन भावों की संख्या तैंतीस है । अब हम इन्हीं का वर्णन करेंगे । १. निर्वेद नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण- तत्र निर्वेदो नाम - दारिद्र्य व्याध्यवमानाधिक्षेपाक्रुष्टक्रोधताडनेष्टजन- समुत्पद्यते स्त्रीनीच कुसत्त्वानाम् । रुदितनिः वियोगतत्त्वज्ञानादिभिर्विभावैः । श्वसितोच्छ्वसितसम्प्रधारणादिभिरनुभावैस्तमभिनयेत्, गाली गलौज, क्रोधित होकर ताडना देना, प्रिय व्यक्ति से वियोग एवं, नित्य ज्ञान के साक्षात्कार गरीबी अवमानना आदि विभावों से निर्वेद का जन्म होता है । यह भाव स्त्रियों एवं नीचप्रकृति के पात्रों में पाया जाता है तथा इसका अभिनय रोने निःश्वास छोड़ने, आह भरने एवं चिन्तन ( सम्प्रधारण ) आदि के द्वारा किया जाता है । अत्र श्लोकः- दरिद्रयेष्टवियोगाद्यैः निर्वेदो नाम जायते । त्वभिनयो भवेत् ॥ २८ ॥ सम्प्रधारणनिःश्वासैस्तस्य

एतद्विषयक निम्न श्लोक है- एवं प्रियवियोग आदि से निर्वेद की उत्पत्ति होती है । चिन्ता करने दरिद्रता तथा आहें भरने आदि से इसका अभिनय किया जाना चाहिए ॥ २८ ॥

अत्रानुवंश्ये आर्ये भवतः - इष्टजनविप्रयोगाद् दारिद्रयाद् व्याधितस्तथा दुःखात् ।

दृष्ट्वा निर्वेदो नाम सम्भवति ॥ २ ९ ॥

ऋद्धि परस्य यहाँ दो अनुवंशीय आर्याएँ भी मिलती हैं- व्यक्ति के विरह, दरिद्रता, बीमारी तथा दूसरों की समृद्धि के दर्शन से इष्ट का उदय सूर्योदय से एवं अवसान सूर्यास्त से माना जाता है । इसी १. दिवस विशेष में रहने के बाद दूसरे नक्षत्र में संक्रान्त हो जाता है जिस भाँति सूर्य नक्षत्र पर आधारित रहता है ।

पृष्ठ 380

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सप्तमोऽध्यायः २९ १ उत्पन्न दुःख से निर्वेद नामक भाव का जन्म होता है ॥ २ ९ ॥

बाष्पपरिप्लुतनयनः पुनश्च निःश्वासदीनमुखनेत्रः ।

योगोव ध्यानपरो भवति हि निर्वेदवान् पुरुषः ॥ ३० ॥

निर्वेद युक्त पुरुष के लक्षण यह हैं कि उसके नेत्र अश्रुपूर्ण होते हैं आहें भरने से मुख एवं नेत्र अत्यन्त दीन हो उठते हैं तथा वह योगी की भाँति ध्यानमग्न रहता है ॥ ३० ॥

२. ग्लानि नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण - ग्लानिर्नाम – वान्तविरिक्तव्याधितपोनियमोपवासमनस्तापातिशयमदन- मद्यसेवनातिव्यायामाध्वगमनक्षुपिपासानिद्राच्छेदादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तस्याः क्षामवाक्यनयनकपोलोदर मन्दपदोत्क्षेपणवेपनानुत्साहतनुगात्र वैवर्ण्य- स्वरभेदादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । उल्टी, जुलाब, बीमारी, तपस्या, नियम, उपवास, मन के दुःख, अत्यधिक काम-परायणता, मदिरा के उपयोग, व्यायाम के आधिक्य, मार्ग पर बहुत देर चलने, भूख, प्यास, नींद टूट जाने आदि विभावों से "ग्लानि " की उत्पत्ति होती है । मन्द स्वर में बोलने, फीकी आंखों, पीले मुख, मन्दगति, कम्पन, उत्साहहीनता, शरीर तथा, मुख के रंग उतरने एवं आवाज में अन्तर पड़ने आदि अनुभावों से इसका अभिनय किया जाना चाहिए । अत्रायें भवतः-

वान्तविरिक्तव्याधिषु तपसा जरसा च जायते ग्लानिः ।

कान साभिनेया मन्द्रभ्रमणेन कम्पेन ॥ ३१ ॥

इस विषय में ये आर्याएँ हैं— उल्टी, जुलाब, बीमारी, तपस्या एवं वार्धक्य आदि से ग्लानि उत्पन्न होती है । कमजोरी, मन्दगति एवं कम्पन आदि से इसका अभिनय किया जाना चाहिए ॥ ३१ गदितैः॥ क्षामक्षामैर्नेत्रविकारैश्च दीनसञ्चारैः । श्लथभावेनाङ्गानां मुहुर्मुहुर्निर्दिशेद् ग्लानिम् ॥ ३२ ॥

मन्दस्वर में बोलने, दीनदृष्टि से युक्त नेत्रसंचार तथा अंगों की कमजोरी द्वारा पलानि का अभिनय किया जाना चाहिए ॥ ३२ ॥

३. शंका नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण - शङ्का नाम – सन्देहात्मिका स्त्रीनीचप्रभवा । चौर्याभिग्रहणनृपापराध-पापकर्म करणादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तस्या मुहुर्मुहुरवलोकनाव कुण्ठ-