भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 391–400

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 391–400

पृष्ठ 391

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३०२ नाट्यशास्त्रम् २-वातकृत आवेग - वातकृत आवेग का अभिनय वायु से विपरीत दिशा की ओर मुख करना, आंखों को मलना, वस्त्र से मुख या अंगों को छिपाना तथा वायु -से बचने के लिये तीव्रगति से दौड़ना आदि अनुभावों से करना चाहिए । ३ -वर्षाकृत आवेग -- वर्षाकृत आवेग का अभिनय सभी अङ्गों को सिकोड़ना, -दौड़ना, तथा आच्छादित आश्रय की खोज आदि अनुभावों से किया जाता है । ४- अग्निकृत आवेग - अग्निकृत आवेग का अभिनय धुएं से आँखों की -आकुलता, अङ्गों का संकोचन, कम्पन, अतिक्रमण एवं अपक्रमण आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । ५-कुञ्जरोभ्रमण कृत आवेग – हाथी द्वारा पीछा किये जाने से उत्पन्न आवेग -का अभिनय तेजी से भागना, चंचल गति से चलना, भय, स्तम्भ ( अङ्गों की -जडता )' कम्पन पीछे की ओर बार बार घूम- घूम कर देखना तथा विस्मय आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । ६-प्रियश्रवण कृत आवेग - प्रिय सम्वाद के सुनने से उत्पन्न आवेग का -अभिनय प्रसन्नता पूर्वक स्वागत करना, आलिङ्गन, वस्त्रों और आभूषणों का दान, •आनन्द के आँसू बहाना तथा रोमांच आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । ७-अप्रिय श्रवणकृत आवेग - अप्रिय संवाद के सुनने से उत्पन्न आवेग का अभिनय शोक से पृथ्वी पर गिर पड़ना, विषमस्थल में लोटना-पोटना, दौड़ना, विलाप तथा तीव्र स्वर से क्रन्दन आदि अनुभावों के द्वारा किया जाना चाहिए । ८-विपत्तिकृत आवेग- राज्य की प्रजा पर अचानक महायुद्धादि के आ पड़ने -से उत्पन्न व्यसन कृत ( विपत्ति की मार रूप) आवेग का अभिनय अचानक भागना, शस्त्रों ढाल, कवच आदि का धारण करना, हाथी घोड़ा रथ आदि पर चढना तथा संप्रधारण ( कर्तव्य अकर्तव्य का विचार ) आदि अनुभावों के द्वारा किया जाता है । एवमष्टविकल्पोऽयमावेगः सम्भ्रमात्मकः । स्थैर्येणोत्तममध्यानां नीचानां चापसर्पणः ॥ ६३ ॥

इस प्रकार भय से उत्पन्न आवेग आठ प्रकार का होता है । उत्तम तथा मध्यम * प्रकृति वाले व्यक्ति इन आवेगों का सामना धैर्यपूर्वक करते हैं तथा नीच प्रकृति वाले व्यक्ति घबड़ाकर भाग खड़े होते हैं ॥ ६३ ॥

अत्रार्ये भवतः - अप्रियनिवेदनाद्वा सहसा ह्यवधारितारिवचनस्य ।

शस्त्राक्षेपात् श्रासादावेगो नाम सम्भवति ॥ ६४ ॥

इस विषय में दो आर्या इस प्रकार हैं- अचानक शत्रु के वचन को सुनकर निश्चय कर लेने वाले व्यक्ति को किसी

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सप्तमोऽध्यायः ३०३ व्यक्ति के द्वारा अप्रिय सम्वाद को सुनकर शस्त्रों के प्रहार एवं भय आदि से आवेग की उत्पत्ति होती है ॥ ६४ ॥

सहसारिदर्शनाच्चेत्प्रहरणपरिघट्टनैःअप्रियनिवेदनाद्यो विषादभावाश्रयोऽनुभावोऽस्यकार्यः ॥। ६५ ॥ अप्रिय सम्वाद को सुनने से उत्पन्न आवेग का अभिनय विषाद के प्रदर्शन द्वारा करना चाहिये तथा अचानक शत्रु का सामना हो जाने से उत्पन्न आवेग का अभिनय शस्त्रों के संचालन आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ॥ ६५ ॥

१७ - जडता जडता नाम नामक- सर्वकार्याप्रतिपत्तिःव्यभिचारी भाव का। लक्षणइष्टानिष्टश्रवणदर्शनव्याध्यादि-- भिर्विभावैः समुत्पद्यते । तामभिनयेदकथनाभिभाषणतूष्णीम्भावाप्रति- भाऽनिमेषनिरीक्षणपरवशत्वादिभिरनुभावैः । सभी कार्यों के प्रति कर्तव्य विमूढता को जडता कहते हैं । जडता नामक -भाव की उत्पति इष्ट व्यक्ति के अनिष्ट संवाद को सुनने तथा देखने से और व्याधि आदि विभावों से होती है । इसका अभिनय प्रत्युत्तर में कुछ भी न बोलना, बोलना बन्द कर देना, हतप्रभ हो जाना, एकटक देखना तथा अङ्गों की परवशता आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । अत्रार्या भवति-

इष्टं वाऽनिष्टं वा सुखदुःखे वा न वेत्ति यो मोहात् ।

तूष्णीकः परवशगो भवति स जडसंज्ञितः पुरुषः ॥ ६६ ॥

इस विषय में एक आर्या है- जो व्यक्ति मोहवश सुख-दुःख या इष्ट अनिष्ट को नहीं समझ पाता तथा परवश के समान चुप हो जाता है उसे जडता नामक भाव से युक्त जडपुरुष -समझना चाहिए ॥ ६६ ॥

१८-गर्व नामक गव नाम व्यभिचारी- ऐश्वर्य भावकुलरूपयौवनविद्याबलधनलाभादिभिर्विभावैःका लक्षण- । समुत्पद्यते । तस्यासूयावज्ञाधर्षणानुत्तरदानासम्भाषणाङ्गावलोकन विभ्रमाप- हसन-वाक्पारुष्य-गुरुव्यतिक्रमणाधिक्षेप. वचनविच्छेदादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । ऐश्वर्य, कुल, रूप, यौवन, विद्या, बल तथा अर्थलाभ आदि विभावों से गर्व नामक भाव की उत्पत्ति होती है । उसका अभिनय असूया, अवज्ञा, आर्धषणा ( तिरस्कार ),

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३०४ नाट्यशास्त्रम् उत्तर न देना, मौन रहना, अपने अङ्गों को गर्वपूर्वक देखना, शृङ्गार चेष्टा, उपहास कटुवचन कहना, गुरुजनों की आज्ञा का उल्लङ्घन, अधिक्षेप ( आक्षेप या -, ) गालीकरना गलौज तथा बात को बीच में ही काट देना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ।

अत्रार्या भवति-विद्यावाप्ते रूपादैश्वर्यादथ धनागमाद्वापि ।

गर्वः खलु नीचानां दृष्ट्यङ्गविचारणैः कार्यः ॥ ६७ ॥

विद्या, रूप, ऐश्वर्य तथा धन आदि की प्राप्ति से नीच प्रकृति वाले व्यक्तियों के हृदय में गर्व नामक भाव की उत्पत्ति होती है । उसका अभिनय तिरस्कार या गर्वपूर्ण दृष्टि तथा अङ्गविकारों के द्वारा करना चाहिए ॥ ६७ ॥

१ ९-विषाद नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण- विषादो नाम - कार्यानिस्तरण दैवव्यापत्तिसमुत्थः । तमभिनयेत्सहा- वैमनस्य - निःश्वसितादिभिरनुभावैरुत्तम - मध्यमानाम् । अधमानां तु विपरिधावनालोकनमु यान्वेषणोपायचिन्तनोत्साहविघात खशोषण सृक्वप रिलेहना- निद्रानिःश्वसितध्यानादिभिरनुभावैः । अभीष्ट कार्य के पूरा न हो सकने पर या देवी आपत्ति आ पड़ने पर विषाद नामक भाव की उत्पत्ति होती है । इसका अभिनय सहायकों की खोज करना, , उत्साह का नष्ट हो जाना, वैमनस्य ( मन दुःखी हो जाना ), नि: - उपायश्वासें लेनासोचनाआदि अनुभावों के द्वारा उत्तम तथा मध्यम प्रकृति वाले व्यक्तियों को करना चाहिए । अधम प्रकृति वाले व्यक्तियों को इसका अभिनय इधर- उधर सूख जाना, ओष्ठप्रान्त ( सृक ) पर जीभ भागना- दौड़ना, इधर- उधर देखना, मुख तथा ध्यानमग्न सा हो जाना आदि अनु- फिराना, निद्रा न आना, निश्वासें लेना भावों द्वारा करना चाहिए । अत्रार्या श्लोकौ- चौर्याभिग्रहण राजदोषाद्वा । कार्यानिस्तरणाद्वा दैवादर्थविपत्तेर्भवति विषादः सदा पुंसाम् ॥ ६८ ॥

इस विषय में एक आर्या तथा एक श्लोक है- सकने, चोरी में पकड़े जाने, राजा के प्रति किसी अभीष्ट कार्य के पूरा न हो धन हानि आदि विभावों से विषाद नामक अपराध करने, देवी आपत्ति पड़ने या

भाव की उत्पत्तिवैचित्र्योपायचिन्ताभ्यांहोती है ॥ ६८ ॥ कार्य उत्तममध्ययोः ।

निद्रानिःश्वसितध्यानैरधमानां तु योजयेत् ॥ ६९ ॥

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सप्तमोऽध्यायः ३०५ उत्तम तथा मध्यम प्रकृति वालों को इसका अभिनय वैचित्य ( चित्त का अन्य-मनस्क हो जाना ) या उपाय चिन्तन आदि अनुभावों के द्वारा तथा अधम प्रकृति वालों को इसका अभिनय निद्रा, निःश्वास तथा ध्यानमग्न सा हो जाना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ॥ ६ ९ ॥ २०-- औत्सुक्य नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण - औत्सुक्यं नाम - इष्टजनवियोगानुस्मरणोद्यानदर्शनादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । यस्य दीर्घनिःश्वसिताधोमुख विचिन्तननिद्रातन्द्राशयनाभिला-वादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । इष्टजनों को वियोग, इष्टजनों का बार-बार स्मरण तथा वाटिका की शोभा का देखना आदि विभावों से औत्सुक्य नामक भाव की उत्पत्ति होती है । इसका अभिनय दीर्घनिःश्वास, नीचामुख करके सोंचना, निद्रा, तन्द्रा तथा सोने की अभि-लाषा आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । आत्रार्या भवति - चिन्तानिद्रातन्द्रागात्रगुरुत्वैरभिनयोऽस्यइष्टजनस्य वियोगादौत्सुक्यं जायते ह्यनुस्मृत्या ॥। ७० ॥ इस विषय में एक आर्या है- इष्टजनों के वियोग या इष्टजनों के बार-बार स्मरण करने से औत्सुक्य नामक भाव की उत्पत्ति होती है । इसका अभिनय चिन्ता, निन्द्रा, तन्द्रा तथा शरीर का भारीपन आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ॥ ७० ॥

२१ -निद्रा नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण- निद्रा नाम - दौर्बल्यश्रमक्लममदालस्यचिन्ताऽत्याहा रस्वभावादिभिर्वि-भावैः समुत्पद्यते । तामभिनयेद्वदनगौरवशरीरावलोकन नेत्रघूर्णनगात्रविजृ-म्भणमान्योच्छ्वसितसन्नगात्रताऽक्षिनिमीलनादिभिरनुभावैः । दुर्बलता, श्रम, क्लान्ति, मद, आलस्य, चिन्ता, अधिक आहार तथा स्वभाव आदि विभावों से निद्रा नामक भाव की उत्पत्ति होती है । इसका अभिनय शरीर का भारीपन, अङ्गों को देखना, आँखों की पुतलियों का घुमाना, अँगड़ाई लेना, मन्द चेष्टा, उच्छ्वास, अङ्गों की शून्यता तथा आँखें बन्द कर लेना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ।

अत्रायें भवतः- आलस्याद्दौर्बल्यात्क्लमाच्छ्रमाच्चिन्तनात्स्वभावाच्च ।

रात्री जागरणादपि निद्रा पुरुषस्य सम्भवति ॥ ७१ ॥

२० ना०

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.३०६ नाट्यशास्त्रम् इस विषय में दो आर्या हैं- व्यक्ति में आलस्य, दुर्बलता, क्लान्ति, श्रम, चिन्ता, रात्रिजागरण तथा स्वभावतः निद्रा नामक भाव की उत्पत्ति होती है ॥ ७१ ॥

तां मुखगौरवगात्रप्रतिलोलननयनमीलनजडत्वैः । जृम्भणगात्रविमर्देरनुभावैरभिनयेत् प्राज्ञः ॥ ७२ ॥

प्राज्ञजन को निद्रा नामक भाव का अभिनय मुख गौरव ( मुँह लटका लेना ) अङ्गों का हिलना- डुलना, आँखें बन्द करना, जडता, जमुहाई तथा शरीर टूटना आदि अनुभावों से करना चाहिये ॥ ७२ ॥

२२- अपस्मार नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण - अपस्मारो नाम -देवयक्षना गब्रह्मराक्षसभूतप्रेत पिशाचग्रहणानुस्मरणो- च्छिष्टशून्यागारसेवनाशुचिकालान्तरापरिपतनव्याध्यादिभिर्विभावैः समु- त्पद्यते । तस्य स्फुरितनिःश्वसितोत्कम्पितधावनपतनस्वेदस्तम्भनवदनफेन- जिह्वापरिलेहनादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । अपस्मार ( मिर्गी ) नामक भाव की उत्पत्ति देवता यक्ष, नाग, ब्रह्मराक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच आदि के पकड़ लेने, इनके स्मरण करने, जूडा खाने, सूने भवनों में रहने, अपवित्र अवस्था में बहुत समय तक रहने ' तथा व्याधि आदि विभावों से होती है । अपस्मार नामक भाव का अभिनय अङ्गों का स्फुरण ( फड़कना ), निःश्वास लेना, काँपना, दौड़ना, गिर पड़ना, पसीना आना, अङ्गों का जड़ हो जाना, ( जकड़ जाना ), मुख से फेना निकलना, जीभ से ओठों को चाटना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । अत्रार्ये भवतः - भूतपिशाचग्रहणानुस्मरणोच्छिष्टशून्यगृहगमनात् । कालान्तरातिपातादशुचेश्च भवत्यपस्मारः ॥ ७३ ॥

इस विषय में दो आर्या हैं- भूत पिशाच आदि के द्वारा पकड़ लेने, उनकी याद करने, जूठा खाने, सूने घर १. उपर्युक्त गद्यभाग में ' कालान्तरापरिपतन ' यह शब्द अस्पष्ट तथा भ्रष्ट प्रतीत होता है । श्री मधुसूदन शास्त्री ने इसका अर्थ किया है " अशुचि अवस्था में कालान्तर का परिपतन अर्थात् चिरकाल तक अशुद्धि अवस्था में रहना'" किन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है क्योंकि शास्त्री जी ने 'परिपतन' शब्द का अर्थ किया है जबकि मूल में 'अपरिपतन' शब्द है । इसके बाद वाली आर्या संख्या ७३ में ' कालान्तरातिपादादशुचेश्च' यह पाठ प्राप्त होता है । हमने इसी पाठ को प्रामाणिक मानकर उपर्युक्त अर्थ किया है ।

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सप्तमोऽध्यायः ३०७ में जाने, तथा अपवित्र अवस्था में बहुत समय तक रहने आदि से अपस्मार ( मिर्गी) की उत्पत्ति होती है ॥ ७३ ॥

सहसा भूमौ पतनं प्रवेपनं वदनफेनमोक्षश्च । • नि संज्ञस्योत्थानं रूपाण्येतान्यपस्मारे ॥ ७४ ॥

अचानक भूमि पर गिर पड़ना, काँपना, मुँह से फेन निकलना तथा मूच्छित हो जाना इन अनुभावों के द्वारा अपस्मार नामक भाव का अभिनय करना चाहिये ॥ ७४ ॥

सुप्तं२३-नामसुप्त नामकनिद्राभिभवविषयोपगमनमोहनव्यभिचारी भाव का लक्षण- क्षितितलशयन प्रसारणानु- कर्षणादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । निद्रासमुत्थं तदुच्छ्वसितसन्नगात्राक्षिनि- मीलन सर्वेन्द्रियसम्मोहनोत्स्वप्नायितादिभिरनुभावैरभिनयेत् । सुप्त ( सो जाना ) नामक भाव की उत्पत्ति निद्रा के आक्रमण करने, विषयों का सेवन करने, विषयों से मोहित होने, पृथ्वी पर सोने, हाथ पाँव आदि फैला देने तथा इधर उधर लोटने पोटने आदि विभावों के द्वारा होती है । निद्रा से उत्पन्न उस ( सुप्त नामक भाव ) का अभिनय उच्छ्वास लेना, अङ्गों का शिथिल हो जाना, आँखें मूंद लेना, सभी इन्द्रियों का बेसुध हो जाना तथा स्वप्न देखना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिये । इस विषय में दो आर्या है- अत्रार्ये भवतःनिद्राभिभवेन्द्रियोपरमणमोहनैर्भवेत्- सुप्तम् । अक्षिनिमीलोच्छ्वसनैः स्वप्नायितजल्पितैः कार्यः ॥ ७५ ॥

सुत नामक भाव की उत्पत्ति निद्रा के आक्रमण करने इन्द्रियों के शिथिल होने तथा इन्द्रियों के संज्ञाहीन हो जाने से होती है । इसका अभिनय आँखें मूंद लेने, महरी साँसें लेने, स्वप्न देखने तथा निद्रा में बड़बड़ाने के द्वारा करना चाहिये ॥ ७५ ॥

सोच्छ्वासैसर्वेन्द्रियसम्मोहात्सुप्तंनिःश्वासैर्मन्दाक्षिनिमीलनेनस्वप्नैश्च निश्चेष्टःयुञ्जीत ॥ । ७६ ॥ सुप्त नामक भाव का अभिनय जोर से उच्छ्वास और निःश्वास लेना, धीरे- धीरे मंदना, निश्चेष्ट हो जाना, सभी इन्द्रियों का बेसुध हो जाना तथा स्वप्न देखना आँखें आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिये ॥ ७६ ॥

२४ - विबोध नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण -- विबोधो नाम ----आहारपरिणामनिद्राच्छेदस्वप्नान्त तीव्रशब्दश्रवणस्पर्श-

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३०८ नाट्यशास्त्रम् दिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तमभिनयेज्जृम्भणाक्षिपरिमर्दनशयनमोक्षणादि-भिरनुभावैः । विबोध ( जाग पड़ना ) नामक भाव की उत्पत्ति आहार का पच जाना, नींद टूट जाना, स्वप्न का समाप्त हो जाना, तीव्र शब्द का सुनना तथा किसी के स्पर्श आदि विभावों से होती है । विबोध नामक भाव का अभिनय जमुँहाई लेना, आँखें मलना, तथा शय्या त्याग देना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिये । अत्रार्या भवति- आहारविपरिणामाच्छन्दस्पर्शादिभिश्च सम्भूतः । प्रतिबोधस्त्वभियो जृम्भणवदनाक्षिपरिमर्दः ॥ ७७ ॥

इस विषय में एक आर्या है— विबोध नामक भाव की उत्पत्ति आहार के पच जाने, किसी शब्द को सुनने या किसी के स्पर्श करने आदि से होती है । इसका अभिनय जमुँहाई लेना तथा मुख और आँखों के मलने आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिये ॥ ७७ ॥

२५-अमर्ष नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण - अमर्षो नाम -- विद्यैश्वर्य शौर्य बलाधिकै रधिक्षिप्तस्यावमानितस्य वा समु त्पद्यते । तमभिनयेच्छिरः कम्पन प्रस्वेदनाधोमुखचिन्तनध्यानाध्यवसायोपाय सहायान्वेषणादिभिरनुभावैः । अपने से अधिक विद्या, ऐश्वर्य या बल वाले व्यक्तियों के द्वारा आक्षेप किए हुए या अपमानित व्यक्ति के हृदय में अमर्ष नामक भाव की उत्पत्ति होती है । इसका अभिनय सिर हिलाना, पसीना निकलना, नीचा मुख करके सोंचना, ध्यानावस्थित हो जाना, बदला लेने के लिए किसी शारीरिक चेष्टा या उपाय का प्रयोग करना तथा सहायक व्यक्ति की खोज करना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । अत्र श्लोकौ - नृणामुत्साहसंयोगादमर्षोआक्षिप्तानां सभामध्ये विद्याशौर्यबलाधिकैःनाम जायते ॥। ७८ ॥ इस विषय में दो श्लोक हैं- सभा के बीच अधिक विद्या, पराक्रम या बल वाले व्यक्तियों द्वारा आक्षेप किये जाने पर उत्साह युक्त पुरुषों के हृदय में अमर्ष नामक भाव की उत्पत्ति होती है ॥ ७८ ॥

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सप्तमोऽध्यायः ३० ९ उत्साहाध्यवसायाभ्यामधोमुख विचिन्तनैः शिरःप्रकम्पस्वेदाद्यैस्तं प्रयुञ्जीत पण्डितः ॥ ७९ ॥

अमर्ष नामक भाव का अभिनय नाट्यवेत्ता को उत्साह, अध्यवसाय, नीचा मुख करके सोंचना, सिर हिलाना तथा पसीना निकलना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिये ॥ ७९ ॥

अवहित्थं२६ – अवहित्थनाम नामक-आकारप्रच्छादनात्मकम्व्यभिचारी भाव का लक्षण। -तच्च लज्जाभयापजय-गौरवजैह्मादिभिर्विभावे समुत्पद्यते । तस्यान्यथाकथनावलोकित कथाभङ्ग- कृतकधैर्यादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । मनोभावजनित आकृति परिवर्तन के छिपाने को अवहित्य भाव कहते हैं । इसकी उत्पत्ति लज्जा, भय, पराजय, गौरव तथा कुटिलता आदि विभावों से होती है । इसका अभिनय झूठी बात बनाना, दूसरी ओर देखना, प्रस्तुत वार्तालाप को बीव में ही रोक देना तथा बनावटी धेयं आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिये ।

अत्र श्लोको भवति- धाष्टर्यजैह्मयादि सम्भूतमवहित्यं भयात्मकम् ।

तच्चागणनया कार्यं नातीवोतर भाषणम् ॥ ८० ॥

इस विषय मे एक श्लोक है- किसी प्रकार के भय के कारण अपनी चेष्टा को छिपाना अवहित्थ नामक मात्र कहलाता है, इसकी उत्पत्ति धृष्टता तथा कुटिलता आदि विभावों से होती । इसका अभिनय प्रस्तुत प्रसंग पर ध्यान न देना या उत्तर स्वरूप कुछ भी न कहना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ॥ ८० ॥

२७ – उग्रता नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण उप्रता नाम - चौर्याभिग्रहणनृपापराधासत्प्रलापादिभिर्विभावैः समु- त्पद्यते । तां च वधबन्धन ताडननिर्भर्त्सनादिभिरनुभावैरभिनयेत् । उग्रता नामक भाव की उत्पत्ति चोरी में पकड़े जाने, राजा के प्रति अपराध करने तथा गाली-गलौज बकना आदि विभावों से होती है । इसका अभिनय बध, ताडन ( मारना पीटना ), डाँटना-फटकारना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । अत्रार्या भवति - बधबन्धताडनादिभिरनुभावैरभिनयस्तस्याःचौर्याभिग्रहणवशान्नृपापराधादथोग्रता भवति ।॥ ८१ ॥

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३१०. नाट्यशास्त्रम् इस विषय में एक आर्या है- चोरी में पकड़े जाना, राजा के प्रति अपराध करना, आदि विभावों से उग्रता नामक भाव की उत्पत्ति होती है । इसका अभिनय वध, बन्धन, ताडन आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ॥ ८१ ॥

२८ - मति नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण - मतिर्नाम – नानाशास्त्रविचिन्तनोहापोहादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । ताम-भिनयेच्छिष्योपदेशार्थविकल्पनसंशयच्छेदादिभिरनुभावैः । मति ( सुबुद्धि ) नामक भाव की उत्पत्ति विविध शास्त्रों के अध्ययन, मनन एवं ऊहापोह आदि विभावों से होती है । इसका अभिनय शिष्यों को उपदेश देना, अनेक प्रकार के अर्थ करना तथा शास्त्र विषयक सन्देहों का निराकरण करना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ।

भवति चात्र श्लोक: - नानाशास्त्रार्थबोधेन मतिः संजायते नृणाम् ।

शिष्योपदेशार्थ कृतस्तस्यास्त्वभिनयो भवेत् ॥ ८२ ॥

इस विषय में एक श्लोक है— अनेक शास्त्रों के अर्थों का ज्ञान होने से मनुष्यों के हृदय में मति ( सुबुद्धि ) भाव की उत्पत्ति होती है । इसका अभिनय शिष्यों को उपदेश देना आदि. नामक अनुभावों के द्वारा किया जाता है ॥ ८२ ॥

२९ - व्याधि नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण -- व्याधिर्नाम- वातपित्तकफसन्निपातप्रभवः । तस्याः ज्वरादयो विशेषाः । ज्वरस्तु द्विविधः सशीतः सदाहश्च। तत्र सशीतो नाम - प्रवेपितसर्वाङ्गोत्कम्प- ननिकुश्वनाग्न्यभिलाषरोमाञ्चहनुवलननासाविकूणन मुखशोषण परिदेवितादि- भिरनुभावैरभिनेयः । सदाहो नाम- विक्षिप्ताङ्गकरच रगभूम्यभिलाषानु- लेपनशीताभिलाषपरिदेवन मुखशोषोत्कृष्टादिभिरनुभावैः । ये चान्ये व्याधय स्तेऽपि खलु मुखविकूणनगात्रस्तम्भस्रस्ताक्षिनिः श्वसनस्तनितोत्क्रुष्टवेपना- दिभिरनुभावैरभिनेयाः । वात, पित्त, कफ तथा सन्निपात से व्याधि की उत्पत्ति होती है । ज्वर आदि उसके विशेष भेद कहे जाते हैं । ज्वर दो प्रकार का है १ -शीतयुक्त एवं २ दाहयुक्त । १- शीतयुक्त ज्वर का अभिनय काँपना, सभी अङ्गों का हिलना, सिकुड़ जाना, आग तापने की अभिलाषा करना, ठोढ़ी का घुमाना, नाक सिकोड़ना, मुख सूखना तथा रोना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । २- दाहयुक्त ज्वर का अभिनय अङ्गों

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सप्तमोऽध्यायः ३११ तथा हाथ पैरों का इधर उधर फेंकना, भूमि पर सोने की इच्छा करना, शरीर में शीतलतादायक लेप लगाना, शीतल पदार्थों के सेवन की अभिलाषा, रोना, मुंह सूखना तथा चीखना -चिल्लाना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । इसके अतिरिक्त जो अन्य व्याधियाँ हैं उनका अभिनय भी मुँह सिकोड़ना. शरीर का स्तम्भित ( जड ) हो जाना, आंखों को कुश्चित करना, काँपना चीखना- चिल्लाना तथा रोना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिये । अत्र श्लोको भवति.- समासतस्तु व्याधीनां कर्तव्योऽभिनयो बुधैः । खस्ताङ्गगात्रविक्षेपैस्तथा मुखविकूणनैः ॥ ८३ ॥

इस विषय में एक श्लोक है- विद्वानों को संक्षेप में सभी व्याधियों का अभिनय अङ्गों की शिथिलता, अङ्गों को इधर उधर फेंकना तथा मुँह सिकोड़ना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिये ॥ ८३ ॥

३० - उन्माद नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण - उन्मादो नाम- इष्टजनवियोगविभवनाशाभिघातवातपित्तश्लेष्मप्रकोपा- दिभिर्विभावैरुत्पद्यते । तमनिमित्तहसितरुदितोत्क्रुष्टासम्बद्धप्रलापशयितोप- विष्टोत्थितप्रधावितनृत्तगीतपठितभस्मपांस्ववधूल नतृण निर्माल्यकुचेलची र घटकपालशरावाभरणधारणोपभोगं रने कैश्वा वस्थितैश्चेष्टानुकरणादिभिरनु- भावैरभिनयेत् । उन्माद ( पागलपन ) नामक भाव की उत्पत्ति इष्टजनों के वियोग, धननाश, सांघातिक चोट तथा वात- पित्त -कफ के प्रकोप आदि विभावों के द्वारा होती है । इसका अभिनय कभी बिना कारण हंसना, कभी रोना, कभी चीखना- चिल्लाना, कभी असम्बद्ध प्रलाप करना, कभी लेट जाना, कभी उठ बैठना, कभी खड़े हो जाना, कभी दौड़ने लगना, कभी नाचने लगना, कभी गाने लगना, कभी पढ़ने लगना, कभी भस्म या धूल सारे शरीर में पोत लेना, घास फूस की माला-फटे पुराने गन्दे कपड़े एवं चीर वल्कल घड़े का खपड़ा- मिट्टी का प्याला आदि को आभूषणों के समान धारण या उपभोग करना तथा अनेक प्रकार अव्यवस्थित ( ऊट -पटांग ) चेष्टाओं का अनुकरण करना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ।

अत्रायें भवतः - इष्टजनविभवनाशादभिघाताद्वातपित्तकफकोपात् ।

विविधाच्चित्तविकारादुन्मादो नाम सम्भवति ॥। ८४ ॥