भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 381–390
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 381–390
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नाट्यशास्त्रम् २९ २ मुख वै वर्ण्यस्वरभेदवे पशु शुष्कोष्ठकण्ठायाससाधर्म्या-नमुखशोषणजिह्वापरिलेहन दिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । यह स्त्री तथा नीचपात्रों में उत्पन्न, शंका का स्वरूप सन्देहमयात्मक होता है एवं अपराध करने एकं, ',,, होने वाला होता है । चोरीसे लूटइसकीया उत्पत्तिउठाईगिरीहोती राजाहै । केबारप्रतिबार देखने ढंकने मुँह,,, पाप करने आदि विभावों जाने आवाज बदल जाने कम्पन,, सूखने सूखनेजीभ, गलासे होठभर्रानेचाटनेआदिमुँखअनुभावोंके फीके सेपड़इसका अभिनय किया जाना चाहिए । ओठ शङ्का प्रायः कार्या भयानके । चौर्यादिजनिताप्रियव्यलीकजनिता तथा शृंगारिणी मता ॥ ३३ ॥
चोरी आदि के कारण होता है तो इसकी गणना भयानक शंका का उदय प्रायः का कारण नायक का प्रतिकूल रस में कीहो जानीतो इसेचाहिएशृंगार। रसजबकीइसकीकोटिउत्पत्तिमें रखना चाहिए ॥ ३३ ॥
आचरण केचिदिच्छन्ति । तच्च कुशलैरुपाधिभिरिङ्गितै- अत्राकारसंवरणमपि श्चोपलक्ष्यम् । भी शंका में सम्मिलित है । उक्त कुछ आचार्योंको केयहाँमतचतुरतापूर्णमें आकृतिचेष्टाओंको छिपानाके द्वारा प्रदर्शित करना चाहिए । आरोपगूहन अत्रार्ये भवतः - द्विविधा शङ्का कार्या ह्यात्मसमुत्था च परसमुत्था च । सा ज्ञेया दृष्टिचेष्टाभिः ॥ ३४ ॥ या तत्रात्मसमुत्था
- एतद्विषयक निम्न आर्याएं है । इनमें से शंका के दो प्रकार होते हैं । ( १ ) आत्मसमुत्था ( २ ) परसमुत्था एवं क्रियाओं द्वारा हो जाता है ॥ ३४ ॥
आत्मसमुत्था का ज्ञान दृष्टि वीक्षते च पार्श्वानि । किञ्चित्प्रवेपिताङ्गस्त्वधोमुखो शङ्कितः पुरुषः ॥ ३५ ॥ गुरुसज्जमानजिह्वः श्यामास्यः
व्यक्ति के अंग कुछ कांपते रहते हैं, मुख नीचे की ओर झुका शंका से ग्रस्त अर्थ दिया है 'चोरी' । चौर्याभिग्रहण - श्री घोष ने केवल चौर्य शब्द का इस पद का अर्थ "चोरी १. ने चौर्य एवं अभिग्रहण दोनों पदों को मिला कर को अलग अलग रखना शास्त्रीजी ग्रहण " किया हैं । हमारे विचार से इन दोनों पदों अर्थ माने हैं, १. चोरी अधिक उपयुक्त है । तदनुसार से सम्पत्ति हमने इस पद के दो भिन्न एवं २. लूट या उठाईगिरी ।
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सप्तमोऽध्यायः २९ ३ होता है, वह बगलें झाँकता रहता है, जीभ लड़खड़ाती है एवं उसका मुंह काला पड़ जाता है ॥ ३५ ॥
४-असूया नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण - असूया नाम -नानापराधद्वेषप रैश्वर्य सौभाग्यमेधाविद्यालीलादिर्भािव-भावः समुत्पद्यते । तस्याश्च परिषदि दोषप्रख्यापनगुणोपघातेर्ष्याचक्षुःप्रदाना- रभिनयः प्रयोक्तव्यः । धोमुखभ्रुकुटीक्रियावज्ञानकुत्सनादिभिरनुभावै असूया नामक व्यभिचारी भाव दूसरे लोगों के अनेक प्रकार के अपराधों का अन्वेषण तथा दूसरों के ऐश्वर्य, सौभाग्य, मेधा, विद्या और लीला आदि में दोष- दर्शनादि विभावों से उत्पन्न होता है । सभा के बीच दूसरों के दोषों का वर्णन, गुणों को छिपाना, ईर्ष्यापूर्ण दृष्टि से देखना, नीचे की ओर मुख झुका लेना, भौंहे टेढ़ी करना, अपमान करना एवं निन्दा करना आदि अनुभावों से इनका अभिनय करना चाहिए ।
अत्रार्ये भवतः - परसौभाग्येश्वरतामेधालीलासमुच्छ्रयान्दृष्ट्वा ।
उत्पद्यते ह्यसूया कृतापराधो भवेद्यश्च ॥ ३६ ॥
एतद्विषयक दो आर्या भी हैं- दूसरों के सौभाग्य, सामर्थ्य, मेधा तथा लीला आदि की उन्नति देखकर जो व्यक्ति अपराधी होता है उसके हृदय में असूया जलन की भावना उत्पन्न हो जाती है ॥ ३६ ॥
भ्रुकुटिकुटिलोत्कटमुखैः सेर्ष्याक्रोधपरिवृत्तनेत्रैश्च ॥। ३७ ॥ गुणनाशन विद्वेषैस्तत्राभिनयः प्रयोक्तव्यः भौंहे टेढ़ी करके, मुँह टेढ़ा करके, ईर्ष्या तथा क्रोध युक्त नेत्रों से देखकर गुणों की निन्दा करके एवं विद्वेष प्रकट करके असूया का अभिनय करना चाहिए ॥ ३७ ॥
५-मद नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण- मदो नाम - मद्योपयोगादुत्पद्यते । स च त्रिविधः पञ्चविधभावश्च । मद के पीने से मद (नशा ) नामक व्यभिचारी भाव की उत्पत्ति होती है । इसके तीन भेद हैं तथा पाँच प्रकार के भाव हैं ।
अत्रार्या भवन्ति- ज्ञेयस्तु मदस्त्रिविधस्तरुणो मध्यस्तथावकृष्टश्च ।
करणं पञ्चविधं स्यात्तस्याभिनयः प्रयोक्तव्यः ॥ ३८ ॥
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२९४ नाट्यशास्त्रम् इस विषय में निम्नलिखित आर्या हैं- १-तरुण २ - मध्य ३ अवकृष्ट ( अधम ) भेदों से मद तीन प्रकार का होता है । इसके करण पाँच प्रकार के होते हैं उन करणों के द्वारा ही इसका अभिनय करना चाहिए ॥ ३८ ॥
कश्चिन्मत्तो गायति रोदिति कश्चित्तथा हसति कश्चित् ।
परुषवचनाभिधायी कश्चित्कश्चित्तथा स्वपिति ॥ ३ ९ ॥
कोई मदमत्त व्यक्ति गाना गाता है, कोई रोता है, कोई हंसता है, कोई कठोर वचन या गालियां बकता है तथा कोई सो जाता । यही उसके पाँच करण (भाव ) है ॥ ३ ९ ॥
उत्तमसत्त्वः शेते हसति च गायति च मध्यमप्रकृतिः ।
परुषवचनाभिधायी रोदित्यपि चाधमप्रकृतिः ॥ ४० ॥
उत्तम प्रकृति वाला सो जाता है । मध्यम प्रकृति वाला हँसता तथा गाना गाता है तथा अधम प्रकृति वाला कठोर वचन या गालियाँ बकता है और रोता भी है ॥ ४० ॥
स्मितवचनमधुररागो हृष्टतनुः किश्चिदाकुलितवाक्यः । सुकुमाराविद्धगतिस्तरुणमदस्तूत्तमप्रकृतिः ॥ ४१ ॥
उत्तम प्रकृति वाले व्यक्ति में तरुण मद होता है । उसकी चेष्टायें हैं - मुसकरा कर बोलना, मधुर राग अलापना, प्रसन्न शरीर, कुछ कुछ आकुलता पूर्ण वाक्य बोलना, सुकुमार तथा आविद्ध [लड़खड़ाती हुई । गति ॥ ४१ ॥
स्खलिताघूर्णितनयनः स्रस्तव्याकुलितबाहुविक्षेपः ।
मध्यमप्रकृतिः ॥ ४२ ॥
कुटिलव्याविद्धगतिर्मध्यमदो मध्यम प्रकृति वाले व्यक्ति में मध्यम मद होता है । चेष्टायें हैं — नेत्रों का •,, - मिचमिचाना पुतलियों का घुमाना ढ़ीले तथा अस्तव्यस्त हाथों को इधर उधर फेंकना, टेढ़ी -मेढ़ी तथा लड़खड़ाती हुई गति ॥ ४२ ॥
नष्टस्मृतिर्हत गतिश्छदितहिक्काकफः सुबीभत्सः ।
गुरुसज्जमानजिह्वो निष्ठीवति चाधमप्रकृतिः ॥ ४३ ॥
अधम प्रकृति वाले व्यक्ति में अधम मद होता है, उसकी चेष्टायें हैं -स्मृति का नष्ट होना, गति का रुक जाना, कफ वृद्धि के कारण हिचकी लेना, वमन करना, बीभत्स रूप हो जाना, जिह्वा का भारी होना तथा तालू में चिपक जाना, एवं बार बार थूकना आदि ॥ ४३ ॥
रङ्ग पिबतः कार्या मदवृद्धिर्नाटययोगमासाद्य ।
कार्यो मदक्षयो वै यः खलु पीत्वा प्रविष्टः स्यात् ॥ ४४ ॥
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सप्तमोऽध्यायः २९५- नाट्य प्रयोग के अनुसार जो रङ्गमंच पर मदिरा पिये उसके मद की वृद्धि दिखलानी चाहिये तथा यदि मदिरा पीकर रङ्गमंच पर प्रवेश करे तो उसके मद का क्षय ( उतार ) दिखाना चाहिए ॥ ४४ ॥
सन्त्रासाच्छोकाद्वा भयात्प्रहर्षाच्च कारणोपगतात् ।
उत्क्रम्यापि हि कार्यो मदप्रणाशः क्रमात्तज्ज्ञैः ॥ ४५ ॥
नाटयतत्त्वज्ञों को त्रास, शोक, भय, हर्ष आदि कारणों से क्रमशः मद का विनाश दिखलाना चाहिए ॥ ४५ ॥
एभिर्भावविशेषैर्मंदो द्रुतं सम्प्रणाशमुपयाति ।
अभ्युदयसुखैर्वाक्यैर्यथैव शोकः क्षयं याति ॥ ४६ ॥
उपर्युक्त भय शोकादि विशेष भावों से मद उसी प्रकार अतिशीघ्र नष्ट हो जाता है जैसे कल्याणकारी सुखमय वाक्यों से शोक नष्ट हो जाता है ॥ ४६ ॥
६-श्रम नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण- श्रमो नाम -अध्वव्यायामसेवनादिभिर्विभावः समुत्पद्यते । तस्य गात्र- परिमर्दनसंवाहन निःश्वसितविजृम्भितमन्दपदोत्क्षेपणनयनवदनविकूणन सीत्का- रादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । लम्बा मार्ग पार करने या व्यायाम आदि सेवन विभावों से श्रम की उत्पत्ति होती है । शरीर के मालिश करने, उसे दबाने, निःश्वास लेना, जम्भाई लेना, धीरे- धीरे पैरों का प्रक्षेप, मुँह का सिकोड़ना एवं सीत्कार आदि अनुभावों के द्वारा इसका अभिनय करना चाहिए । अत्रार्या- निःश्वासखेदगमनैस्तस्याभिनयःनृत्ताध्वव्यायामान्नरस्य सञ्जायते प्रयोक्तव्यःश्रमो नाम ॥। ४७ ॥ इस विषय में आर्या में भी कहा गया है- नृत्य करने, मार्ग चलने, या व्यायाम आदि करने से मनुष्य को श्रम होता है । उस श्रम का अभिनय निःश्वासों तथा थकावटयुक्त चाल आदि चेष्टाओं से करना चाहिए ॥ ४७ ॥
७-आलस्य नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण - आलस्यं नाम - खेदव्याधिगर्भस्वभावश्रम सौहित्यादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते स्त्रीनीचानाम् । तदभिनयेत्सर्वकर्मानभिलापशयनासननिद्रातन्द्रासेवनादि- भिरनुभावैः । खेद, व्याधि, गर्भ, स्वभाव, श्रम, तथा अत्यन्त डटकर खा लेने आदि विभावों
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२९ ६ नाट्यशास्त्रम् तथा नीच वर्ग के व्यक्तियों में आलस्य की उत्पत्ति होती है । सभी कार्योके करने की अनिच्छा,,,से स्त्रियों लेट जाना चुपचाप बैठे रहना सोना तथा तन्द्रा आदि
अनुभावों के द्वारा उसका अभिनय करना चाहिए ।
अत्रार्या- आलस्यं त्वभिनेयं खेदोपगतं स्वभावजं चापि ॥। ४८ ॥
आहारवर्जितानामारम्भाणामनारम्भात् इस विषय में एक आर्या भी है- आहार कर लेने से उत्पन्न आलस्य को छोड़ कर श्रम से उत्पन्न अथवाअत्यधिकस्वाभाविक दोनों प्रकार के आलस्यों का अभिनय करने योग्य कर्मो को भी न करके करना चाहिए ॥ ४८ ॥
८- दैन्य नाम के व्यभिचारी भाव का लक्षण - समुत्पद्यते । तस्याधृति- दैन्यं नाम- दौर्गत्यमनस्तापादिभिर्विभावैः प्रयो- शिरोरोगगात्रगौरवान्यमनस्कतामृजापरिवर्जनादिभिरनुभावैरभिनयः , क्तव्यः ।, से दैन्य भाव की उत्पत्ति होती है । अधैर्य सिर दुर्गतिका रोगमनस्ताप, शरीर काआदिभारीपनविभावों, अन्य मनस्कता, सफाई का परित्याग आदि
अनुभावों के द्वारा उसका अभिनय करना चाहिए ।
चिन्तौत्सुक्यसमुत्था अत्रार्या- दुःखाद्या भवति दीनताभवेत्तस्यपुंसाम् ॥। ४९ ॥
सर्वमृजापरिहारैर्विविधोऽभिनयो इस विषय में एक आर्या भी है- उत्पन्न ' होता है । चिन्ता, औत्सुक्य तथा दुःख आदि से पुरुषों में ' दैन्य ' भाव विविध अनुभावों से इसका अभिनय सब प्रकार की सफाई का परित्याग करते हुए करना चाहिए ॥ ४ ९ ॥ ९-चिन्ता नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण- । चिन्ता नाम - एश्वर्यभ्रंशेष्टद्रव्यापहारदारिद्रयादिभिर्विभावैरुत्पद्यते तामभिनयेन्निःश्वसितोच्छ्वसितसन्तापध्यानाधोमुख चिन्तनतनुकार्यादिभिर- नुभावैः । १. इस श्लोक के “चिन्तोत्सुक्य समुत्था" इस पाठ की अपेक्षा पाठान्तर में में प्राप्त " द " "अ " प्रति का "चित्योद्रक समुत्थात्" यह पाठ संगत प्रतीत होता है क्योंकि दैन्य भाव की उत्पत्ति में औत्सुक्य का योग नहीं हो सकता । अतः !"चित्त के उद्रेक से उत्पन्न दुःख " यह अर्थ अत्यन्त संगत है ।
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सप्तमोऽध्यायः २९७ ऐश्वर्य के विनाश, इष्टपदार्थ के अपहरण तथा दरिद्रता आदि विभावों से चिन्ता नामक भाव की उत्पत्ति होती है । इसका अभिनय निःश्वास, उच्छ्वास, सन्ताप, ध्यान, नीचे की ओर मुख करके सोचना तथा शरीर का दुबलापन आदि अनुभावों से करना चाहिए । अत्रार्ये भवतःऐश्वर्य-भ्रंशेष्टद्रव्यक्षयजा बहुप्रकारा तु । हृदयवितर्कोपगता नृणां चिन्ता समुद्भवति ॥ ५० ॥
इस विषय में दो आर्या हैं— ऐश्वर्य के विनाश या इष्टपदार्थ के क्षय के कारण मन के विविध वितर्कों से अनेक प्रकार की चिन्ता मनुष्यों के मन में उत्पन्न होती है ॥ ५० ॥
सोच्छ्वासैर्निःश्वसितैः सन्तापैश्चैव हृदयाशून्यतया ।
अभिनेतव्या चिन्ता मृजाविहीनैरधृत्या च ॥ ५१ ॥
चिन्ता का अभिनय उछ्वास, निःश्वास, सन्ताप, शून्यहृदयता, सफाई-हीनता तथा धैर्य हीनता आदि अनुभावों से करना चाहिए ॥ ५१ ॥
१० - मोह नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण- मोहो नाम - दैवोपघातव्यसनाभिघातव्याधिभयावेगपूर्ववैरानुस्मरणादि- भिर्विभावैः समुत्पद्यते । तस्य निश्चैतन्यभ्रमणपतनाघूर्णनादर्शनादिभिरनु- भावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । दैवोपघात, ( भाग्य की मार ), व्यसनाभिघात ( विपत्ति की मार ), व्याधि, -भय, आवेग तथा पुराने वैर का स्मरण आदि विभावों से मोह नामक भाव उत्पन्न होता है । इसका अभिनय चेतना हीनता [ मूर्च्छा ], सिर घूमना, गिर पड़ना, आँखों से दिखाई न देना, चक्कर आना आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए । अत्र श्लोकस्तावदार्या च- तत्प्रतीकारशून्यस्यअस्थाने तस्करान्दृष्ट्वामोहः त्रासनैर्विविधैरपिसमुपजायते ॥। ५२ ॥ इस विषय में एक श्लोक तथा एक आर्या है— अस्थान अर्थात् अनवसर में ( जिस स्थान पर चोरों की संभावना न हो वहाँ ) चोरों को देखकर और अन्य विविध त्रासों से भी उनके प्रतीकार करने में असमर्थ मनुष्य को मोह उत्पन्न होता है ॥ ५२ ॥
व्यसनाभिघातभयपूर्ववैरसंस्मरणरोगजोसर्वेन्द्रियसम्मोहात्तस्याभिनयः प्रयोक्तव्यःमोहः ॥। ५३ ॥
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२९ ८ नाट्यशास्त्रम् मोह की उत्पत्ति विपत्तियों, आघात, भय, पुराने वैर का स्मरण तथा रोग आदि से होती है । सभी इन्द्रियों की संज्ञाहीनता का प्रदर्शन करके उसका अभिनय करना चाहिए ॥ ५३ ॥
११-स्मृति नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण - स्मृतिर्नाम- सुखदुःखकृतानां भावानामनुस्मरणम् । सा च स्वास्थ्य-जघन्यरात्रिभागनिद्राच्छेदसमान दर्शनोदाहरणचिन्ताभ्यासादिभिर्विभावैः समु- त्पद्यते । तामभिनयेच्छिरकम्पनावलोकन भ्रूसमुन्नमनादिभिरनुभावैः । सुख दुःखमय भावों के स्मरण को स्मृति कहते है । वह स्वास्थ्य, रात के पिछले पहर में नींद टूटने, समान वस्तु के दर्शन, कथन एवं अभ्यास बार बार दुहराना ) आदि विभावों से उत्पन्न होती है । उस स्मृति का अभिनय सिर को घुमाकर, इधर उधर देखकर तथा भौंहों को ऊपर उठाकर इन अनुभावों से करना चाहिए ।
अत्रायें भवतः- सुखदुःखमतिक्रान्तं तथा मतिविभावितं यथावृत्तम् ।
चिरविस्मृतं स्मरति यः स्मृतिमानिति वेदितव्योऽसौ ॥ ५४ ॥
इस विषय में दो आय हैं- बीती हुई सुख- दुःखमय चिर विस्मृत बुद्धिस्थ घटनाओं को जो याद करता है, उस स्मृति नामक भाव से युक्त पुरुष को स्मृतिमान् कहा जाता है ॥ ५४ ॥
स्वास्थ्याभ्याससमुत्था श्रुतिदर्शनसम्भवा स्मृतिनिपुणैः ।
शिरउद्वाहनकम्पैर्भूक्षेपैश्चाभिनेतव्या ॥ ५५ ॥
स्मृति की उत्पत्ति स्वास्थ्य, अभ्यास, समानवस्तु के सुनने तथा देखने आदि से होती है । चतुर लोग इसका अभिनय सिर को ऊपर उठा कर या हिला कर तथा भौंहों को चला कर करते हैं ॥ ५५ ॥
१२-धृतिर्नामधृति नामक व्यभिचारीशौर्यविज्ञानश्रुतिविभवशौचाचाभाव का लक्षण – रगुरुभक्त्यधिकमनोरथार्थ- लाभक्रीडादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तामभिनयेत् प्राप्तानां विषयाणामुप- भोगादप्राप्तातीतोपहतविनष्टानामननुशोचनादिभिरनुभावैः । वीरता, विज्ञान, श्रुति ( वेदाध्ययन ), वैभव ( ऐश्वर्य ) पवित्र आचार, गुरुभक्ति, अभिलाषा से भी अधिक धन की प्राप्ति, एवं क्रीडा आदि विभावों से धृति नामक भाव की उत्पत्ति होती है । धृति नामक भाव का अभिनय प्राप्तः
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' सप्तमोऽध्यायः २९९ विषयों का सन्तोषपूर्वक उपभोग तथा अप्राप्त, विगत, अपहृत ( अपहरण किये हुए ) और विनष्ट विषयों का चिन्तन न करना आदि अनुभावों से करना चाहिए ।
अत्रायें भवतः- विज्ञानशौचविभवश्रुतिशक्तिसमुद्भवा धृतिः सद्भिः ।
भयशोकविषादाद्यै रहिता तु सदा प्रयोक्तव्या ॥ ५६ ॥
इस विषय में दो आर्या हैं- धृति नामक भाव की उत्पत्ति विज्ञान, पवित्रता, वैभव, श्रुति ( शास्त्राध्ययन ) तथा शक्ति इन विभावों से होती है । इसका प्रयोग भय, शोक, विषाद आदि भावों से रहित करना चाहिए ॥ ५६ ॥
प्राप्तानामुपभोगः शब्दरसस्पर्शरूपगन्धानाम् । अप्राप्तैश्च न शोको यस्यां हि भवेद् धृतिः सा तु ॥ ५७ ॥
प्राप्त शब्द, रस, स्पर्श, रूप तथा गन्ध आदि विषयों का उपभोग करके तथा अप्राप्त विषयों का शोक न करके धृति का अभिनय करना चाहिए ॥ ५७ ॥
व्रीडा१३-व्रीडानामनामक- अकार्यव्यभिचारीभावकरणात्मिकाका लक्षण-। सा च गुरुव्यतिक्रमणावज्ञान- प्रतिज्ञातानिर्वहणपश्चात्तापादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तां निगूढवदनाधोमुख- विचिन्तनोर्वीलेखन - वस्त्राङ्गुलीयकस्पर्शन - नखनिकृन्तनादिभिरनुभावैरभि- नयेत् । अकर्तव्य कार्य के करने से व्रीडा ( लज्जा) होती है । उसकी उत्पत्ति गुरुजनों की आज्ञा का उल्लङ्घन, गुरुजनों का अपमान, स्वीकार की हुई बात का निर्वाह न कर सकना तथा पश्चात्ताप आदि विभावों से होती है । उसका अभिनय मुँह छिपाना, मुख नीचा करके चिन्तन करना, नाखूनों से धरती खोदना, वस्त्रों और अंगूठी आदि को छूना आदि अनुभावों से करना चाहिए ।
अत्रायें भवतः - किञ्चिदकार्यं कुर्वन्नेवं यो दृश्यते शुचिभिरन्यैः ।
पश्चात्तापेन युतो व्रीडित इति वेदितव्योऽसौ ॥ ५८ ॥
इस विषय में दो आर्या इस प्रकार हैं- जब पापहीन व्यक्ति किसी को अकार्य करते हुए देख लेते हैं तो अकार्य करने वाले के हृदय में पश्चात्तापयुक्त व्रीडा ( लज्जा ) नामक भाव की उत्पत्ति होती है ॥ ५८ ॥
लज्जानिगूढवदनो भूमिं विलिखन्नखांश्च विनिकृन्तन् ।
वस्त्राङ्गुलीयकानां संस्पर्श व्रीडितः कुर्यात् ॥ ५ ९ ॥
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३०० नाट्यशास्त्रम् ब्रीडा ( लज्जा ) नामक भाव से युक्त व्यक्ति लज्जा से अपना मुख छिपा लेता है, -नाखूनों से भूमि खोदने लगता है, नाखूनों को दातों से कतरने लगता है तथा वस्त्रों -और अंगूठी आदि पर हाथ फेरने लगता है ॥ ५ ९ ॥ १४ -चपलता नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण - चपलता नाम — रागद्वेषमात्सर्यामर्षेर्ष्याप्रतिकूलादिभिर्विभावः समु- त्पद्यते । तस्याश्च वाक्पारुष्यनिर्भर्त्सनव धबन्ध सम्प्रहारताडनादिभिरनुभावैर- -भिनयः प्रयोक्तव्यः । चपलता नामक भाव की उत्पत्ति राग, द्वेष, मात्सर्य, अमर्ष, तथा ईर्ष्या आदि प्रतिकूल विभावों से होती है । उसका अभिनय कठोर वाणी बोलना, डाँटना --फटकारना, बध करना, बन्धन में डाल देना, प्रहार करना, पीटना आदि अनुभावों -से करना चाहिए ।
अत्रार्या भवति- अविमृश्य तु यः कार्यं पुरुषो वधताडनं समारभते ।
अविनिश्चितकारित्वात्स तु खलु चपलो बुधैर्ज्ञेयः ॥ ६० ॥
इस विषय में आर्या इस प्रकार है- जो पुरुष बिना विचारे ही किसी को पीटने लगता है या किसी का बध कर देता है तो बिना विचार किये काम करने वाला वह व्यक्ति चपलता नामक भाव से युक्त होने के कारण चपल कहलाता है ॥ ६० ॥
१५ ---- हर्ष नामक व्यभिचारी भाव का लक्षण- हर्षो नाम - मनोरथलाभेष्टजनसमागमनमनः परितोषदेवगुरुराजभर्तृ- -प्रसादभोजनाच्छादनलाभोपभोगादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तमभिनयेन्नयन- वदनप्रसादप्रियभाषणालिङ्गन कण्टकितपुलकितास्रस्वेदादिभिरनुभावैः । हर्ष नामक व्यभिचारी भाव की उत्पत्ति मनोरथों का पूरा होना, इष्टजन का आगमन, मानसिक सन्तोष, देवताओं गुरुजनों तथा स्वामी का अनुग्रह, भोजन वस्त्रादि के प्राप्ति तथा उपभोग योग्य पदार्थों की प्राप्ति आदि विभावों से होती है । इसका अभिनय नेत्रों और भूख की प्रसन्नता, प्रियभाषण, प्रियजनों का आलिङ्गन, रोमाञ्च आनन्दज अश्रुपात तथा स्वेद ( पसीना निकल आना ) आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ।
अत्रार्ये भवतः- अप्राप्ये प्राप्ये वा लब्धेऽर्थे प्रियसमागमे वाऽपि ।
हृदयमनोरथलाभे हर्षः सञ्जायते पुंसाम् ॥ ६१ ॥
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सप्तमोऽध्यायः ३० इस विषय में दो आर्या इस प्रकार हैं- प्राप्त न हो सकने वाले तथा प्राप्त हो सकने वाले दोनों प्रकार के पदार्थों के प्राप्त होने पर, प्रियजनों के मिलने या मनोरथ के पूरा हो जाने पर मनुष्यों के हृदय में 'हर्ष ' नामक भाव की उत्पत्ति होती है ॥ ६१ ॥
नयनवदनप्रसादप्रियभाषालिङ्गनैश्च रोमाञ्चै । ललितैश्चाङ्गविहारैः स्वेदाद्यैरभिनयस्तस्य ॥ ६२ ॥
हर्ष नामक भाव का अभिनय नेत्रों तथा मुख की प्रसन्नता, प्रिय भाषण, प्रियजनों का आलिङ्गन, रोमाञ्च, ललित शारीरिक चेष्टाओं तथा स्वेद आदि के द्वारा करना चाहिए ॥ ६२ ॥
१६ - आवेगनामक व्यभिचारी भाव का लक्षण - आवेगो नाम - उत्पातवातवर्षाग्निकुञ्ज रोद्भ्रमणप्रियाप्रियश्रवणव्यास--नाभिघातादिभिर्विभावैः समुत्पद्यते । तत्रोत्पातकृतो नाम विद्युदुल्का- निर्घातप्रपतनचन्द्र सूर्योपराग केतुदर्शनकृतः । तमभिनयेत् सर्वाङ्गस्रस्ततावैमन- स्यमुखवैवर्ण्य विषादविस्मयादिभिः । वातकृतं पुनरवगुण्ठनाक्षिपरिमार्जन- वस्त्रसङ्ग्रह्नत्वरितगमनादिभिः । वर्षकृतं पुनः सर्वाङ्गसपिण्डनप्रधावन--च्छन्नाश्रयमार्गणादिभिः । अग्निकृतं तु धूमाकुलनेत्राऽङ्गसङ्कोचनविधू- ननातिक्रान्तापक्रान्तादिभिः । कुञ्जरोभ्रमणकृतं नाम त्वरितापसर्पण ---चञ्चलगमनभयस्तम्भवेपथुपश्चादवलोकनविस्मयादिभिः । प्रियश्रवणकृतं नामाभ्युत्थानालिङ्गनवस्त्राभरणप्रदानाश्रुपुलकितादिभिः । अप्रियश्रवण-- कृतं नाम भूमिपतनविषमविवर्तनपरिधावनविलापनाक्रन्दनादिभिः । व्यसनाभिघातजं तु सहसापसर्पणशस्त्रचर्मवर्मधारण गजतुरगरथारोहण-- सम्प्रधारणादिभिः । आवेग नामक व्यभिचारी भाव की उत्पत्ति उत्पात, प्रचण्डवायु, वर्षा, अग्नि लग जाना, मतवाले हाथी के द्वारा पीछा किया जाना, प्रिय सम्वाद का सुनना, अप्रिय संवाद का सुनना एवं व्यसनों का प्रहार आदि विभावों से होती है । १ - उत्पातकृत आवेग - बिजली गिरना, उल्कापात, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण तथा केतु नामक अमङ्गल सूचक ग्रह के देखने से उत्पन्न आवेग उत्पातकृत आवेग कहलाता है । इसका अभिनय सभी अङ्गों की अस्तव्यस्तता, वैमनस्य ( मन का दुःखी हो" जाना ), मुख का रङ्ग बदल जाना, विषाद तथा विस्मय आदि अनुभावों के द्वारा करना चाहिए ।