भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 411–420
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 411–420
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३२२ नाट्यशास्त्रम् ११५ ॥ त्रासश्च मरणञ्चैव वैवर्ण्यं च भयानके ॥ ७ -स्वेद एवं १- वेपथु २ स्वरभेद ३-रोमांच ४-गद्गद ५-स्तम्भ ६-मरण ८-वैवर्ण्यये आठ भाव भयानक रस में होते हैं ॥ ११५ ॥
७- बीभत्स रस के सात भाव- अपस्मारस्तथोन्मादो विषादो मद एव च ।
मृत्युर्व्याधिर्भयं चैव भावा बीभत्ससंश्रयाः ॥ ११६ ॥
१- अपस्मार २ उन्माद ३-विषाद ४- मद ५- मरण ६- व्याधि एवं ७ भय - ये सात भाव बीभत्स रस में होते हैं ॥ ११६ ॥
८-अद्भुत रस के नौ भाव-
स्तम्भः स्वेदश्च मोहश्च रोमाञ्चो विस्मयस्तथा ।
आवेगो जडता हर्षो मूर्च्छाचैवाद्भुताश्रयाः ॥। ११७ ॥
१-स्तम्भ २-स्वेद ३- मोह ४- रोमांच ५- विस्मय ६ आवेग ७-जडता ८-हर्ष एवं ९-मूर्च्छा - ये नो भाव अद्भुत रस में होते हैं ॥ ११७ ॥
सात्त्विक भावों के प्रयोग-
ये त्वेते सात्त्विका भावा नानाभिनयसंश्रिताः ।
रसेष्वेतेषु सर्वेषु ते ज्ञेया नाटययोक्तृभिः ॥ ११८ ॥
अनेक प्रकार के अभिनयों से सम्बन्धित जिन आठ सात्त्विक भावों का वर्णन किया गया है नाट्य प्रयोक्ताओं को उनका प्रयोग सभी रसों में करना चाहिए ॥ ११८ ॥
न ह्यकरसजं काव्यं किञ्चिदस्ति प्रयोगतः ।
भावो वापि रसो वापि प्रवृत्तिर्वृत्तिरेव च ॥ ११ ९ ॥
प्रयोग के अनुसार ऐसा कोई काव्य, भाव, रस, प्रवृत्ति या वृत्ति नहीं है जिसका केवल एक ही रस से सम्बन्ध हो ॥ ११ ९ ॥
स्थायी रस- [ बहुनां समवेतानां रूपं यस्य भवेद्बहु ।
स मन्तव्यो रसः स्थायी शेषाः संचारिणो मताः ॥
[ जहाँ पर अनेक रस हों, वहाँ जिस रस की प्रधानता हो, उसी को 'स्थायी' रस तथा शेष को ' संचारी' रस मानना चाहिये । संचारी रस- दीपयन्तः प्रवर्तन्ते ये पुनः स्थायिनं रसम् ।
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सप्तमोऽध्यायः ३२३ ते तु संचारिणो ज्ञेयास्ते हि स्थायित्वमागताः ॥ जो रस स्थायी रस को उद्दीप्त करते हुये प्रवृत्त हों, उन्हें स्थायी होने पर भी संचारी रस मानना चाहिए' । स्थायी रस- । विभावानुभावयुतो ह्यङ्गवस्तुसमाश्रयः संचारिभिस्तु संयुक्तः स्थाय्येव तु रसो भवेत् ॥ विभाव, अनुभाव और संचारी आदि अङ्गों से युक्त रस को स्थायी रस कहते हैं ।
स्थायी सत्त्वातिरेकेण प्रयोक्तव्यः प्रयोक्तृभिः ।
सञ्चार्याकारमात्रेण स्थायी यस्मादवस्थितः ॥
स्थायी रस का प्रयोग सत्त्व की अधिकता के साथ करना चाहिये तथा संचारी का प्रयोग केवल एक झलक दिखाकर ही करना चाहिये क्योंकि स्थायी रस ही TESस्थिर रस होता है । सात्त्विक भावों का प्रयोग-
ये त्वेते सात्त्विका भावा नानाभिनययोजिताः ।
रसेष्वेतेषु सर्वेषु ते ज्ञेया नाट्यकोविदैः ॥
अनेक अभिनयों से युक्त इन सात्त्विक भावों का प्रयोग नाट्यप्रयोक्ताओं को सभी रसों में करना चाहिए । काव्य में अनेक रसों, भात्रों तथा वृत्तियों का प्रयोग- न ह्येकरसजं काव्यं नैकभावैकवृत्तिकम् । विमर्दे रागमायाति प्रयुक्तं हि प्रयत्नतः ॥ भावा वाऽपि रसा वाऽपि प्रवृत्तिर्वृत्तिरेव वा । एक रस, एक भाव या एक वृत्ति से ही काव्य की पूर्णता नहीं मानी जाती अनेक रसों भावों या वृत्तियों के समन्वय से ही प्रयोग किया हुआ काव्य रागजनक होता है । १. त प्रति में "ते तु सञ्चारिणो ज्ञेयाः " के स्थान पर "तेन सञ्चारिणो ज्ञेयाः" यह पाठान्तर प्राप्त होता है । इसका अर्थ है "उन रसों को संचारी रस नहीं समझना चाहिए । ' श्री मधुसूदन शास्त्री ने इसी पाठ को मूल पाठ मानकर अर्थ किया है । किन्तु यह पाठान्तर संगत नहीं प्रतीत होता, क्योंकि स्थायी रस एक ही होता है और स्थायी रस को उद्दीप्त करने वाला संचारी होता है, स्थायी नहीं ।
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३२४ नाट्यशास्त्रम् रसों के भेद- बीभत्साद्भुतशान्तानां त्रैविध्यं नात्र कथ्यते ॥ षण्णां रसानां त्रैविध्यं नानाभावरसान्वितम् । इस प्रकरण में बीभत्स अद्भुत तथा शान्त इन तीन रसों के तीन तीन भेद नहीं कहे गये हैं । शेष छः रसों के अनेक भावों और रसों से युक्त तीन तीन भेद कहे.
गये हैं ।
सात्त्विक भावों का प्रयोग- सत्त्वप्रयोजितो ह्यर्थः प्रयोगोऽत्र विराजते ॥
विदित्वा हि विराजन्ते लोके चित्रं हि दुर्लभम् ॥ ] जिस प्रयोग में सत्त्वमूलक रस का प्रयोग होता है वही प्रयोग सुशोभित माना जाता है । क्योंकि रस विदित हो जाने पर ही सुशोभित होते हैं । लोक में चित्र ( अनेक रसों, भावों आदि से मिश्रित ) प्रयोग ' दुर्लभ है । ] व्यभिचारी भावों का प्रयोग-
नानाभावार्थसम्पन्नाः स्थायिसत्त्वाभिचारिणः ।
पुष्पावकीर्णाःकर्तव्याः काव्येषु हि रसा बुधैः ॥ १२० ॥
विद्वान् नाट्य प्रयोक्ताओं को नाटकों में स्थायी सात्त्विक तथा व्यभिचारी १. पूर्वोक्त "ये त्वेते सात्त्विका भावा नानाभिनययोजिताः । ” । पृ ०३२३ रसेष्वेतेषु सर्वेषु ते ज्ञेया नाट्यकोविदैः इस श्लोक के स्थान पर टिप्पणी में- "चित्राणि न विरज्यन्ते लोके चित्रं हि दुर्लभम् । यत्नतः ॥ विमर्दे रागमायाति प्रयुक्तमपि यह श्लोक प्राप्त होता है । इस श्लोक का अर्थ है— चित्र ( अनेक रसों तथा भावों से मिश्रित ) दर्शकों के मन में विराग नहीं उत्पन्न करते । अनेक रसों भावों आदि के विमर्द मिश्रण से यत्नपूर्वक प्रयुक्त प्रयोग ही दर्शकों के लिये रागजनक होते हैं । वस्तुतः प्रस्तुत श्लोक की यह आधी पंक्ति उपर्युक्त श्लोक का ही पूर्वार्ध है। तथा इसमें "विदित्वा हि विराजन्त" के स्थान पर "चित्राणि न विराजन्ते " पाठ होना चाहिए ।
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सप्तमोऽध्यायः ३२५ भावों का प्रयोग विविध पुष्पों के समूह के समान अनेक प्रकार के भावों आदि मे मिश्रित करना चाहिए ॥ १२० ॥
रसों तथा भावों की तीन अवस्थायें -
एवं रसाश्च भावाश्च व्यवस्था नाटके स्मृताः ।
य एवमेताञ्जानाति स गच्छेत्सिद्धिमुत्तमाम् ॥ १२१ ॥
इस प्रकार नाटकों में रसों तथा भावों की तीन अवस्थायें ( विभाव, अनुभाव और संचारी भाव ) बतलाई गई हैं । जो नाट्य प्रयोक्ता इनको जान लेता है उसी को उत्तम (सिद्धि ) सफलता प्राप्त होती है ॥ १२१ ॥
॥ इति श्रीभारतीये नाट्यशास्त्रे भावव्यञ्जको' नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
---- । इस प्रकार भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र की ' नाट्यप्रदीप ' नामक हिन्दी व्याख्या में भावव्यंजक नामक सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७ ॥
-0- १- 'भावविकल्पो नाम' इति वा पाठ: ।
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अथ अष्टमोऽध्यायः ऋषियों का प्रश्न- ऋषय ऊचुः
भावानां च रसानां च समुत्थानं यथाक्रमम् ।
त्वत्प्रसादाच्छू तं सर्वमिच्छामो वेदितुं पुनः ॥ १ ॥
ऋषियों ने कहा- भावों एवं रस की उत्पत्ति के विषय में हे मुनि! आपकी अनुकम्पा से हमें इस सुने हुए विषय से सम्बन्धित सभीज्ञान हुआ है । अब हम आपकी कृपा से तथ्यों को जानना चाहते हैं ॥ १ ॥
नाट्ये कतिविधः कार्यस्तज्ज्ञैरभिनयक्रमः । कतिभेदश्व कीर्तितः ॥ २ ॥ कथं वाभिनयो ह्येष
में अभिनय का क्या स्थान ( क्रम ) ' है? नाट्य प्रयोक्ताओं के अनुसार नाट्य?? इसका प्रयोग किस भाँति किया जाना चाहिए इसके कितने भेद हैं ॥ २ ॥ सर्वमेतद्यथातत्त्वं कथयस्व महामुने । यो यथाभिनयो यस्मिन् योक्तव्यः सिद्धिमिच्छता ॥ ३ ॥
ऋषिगण भरत मुनि से प्रश्न करते हैं- हे मुनिश्रेष्ठ! आप कृपया हम लोगों को विस्तार पूर्वक बताइए कि ( नाट्य की ) सफलता चाहने वाले को किस प्रकार से अभिनय का प्रयोग करना चाहिए ॥ ३ ॥
भरत मुनि का उत्तर— तेषां तद्वचनं श्रुत्वा मुनीनां भरतो. मुनिः । पुनर्वाक्यं चतुरोभिनयान् प्रति ॥ ४ ॥ प्रत्युवाच
१. अभिनयक्रम - श्री घोष के अनुवाद में क्रम का तात्पर्य भेद ( प्रकार ) है । आगे आने वाले भेद शब्द का अनुवाद उन्होंने 'उपभेद ' किया है । इस अनुवाद से तात्पर्यार्थ में तो कोई अन्तर नहीं पड़ता । किन्तु हमारा विचार है कि क्रम का तात्पर्य यदि आदेश या उत्तराधिकार माना जाए, एवं तदनुसार नाट्य में 'अभि- नय क्रम ' का अर्थ ' नाट्य में अभिनय का स्थान' किया जाए तो वह अधिक उपयुक्त होगा ।
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अष्टमोऽध्यायः ३२७ उन मुनियों के कथन को सुनकर भरत मुनि ने अभिनय के चार भेदों के विषय में बतलाया ॥ ४ ॥
अभिनय की निरुक्ति तथा लक्षण- अहं वः कथयिष्यामि निखिलेन तपोधनाः ।
यस्मादभिनयो ह्येष विधिवत्समुदाहृतः ॥ ५ ॥
हे मुनियो! मैं आप लोगों को विस्तारपूर्वक समझाऊँगा जिससे कि ( चतुर्विध ) अभिनय के विषय में आप अवगत हो सकें ॥ ५ ॥
यदुक्तं चत्वारोऽभिनया इति तान् वर्णयिष्यामः । अत्राह अभिनय इति कस्मात्? अत्रोच्यते - अभीत्युपसर्गः । 'णीञ' इति प्रापणार्थको धातुः । अस्याभिनीत्येवं व्यवस्थितस्य एरजित्यच्प्रत्ययान्तस्याभिनय इत्येवं रूपं सिद्धम् । एतच्च धात्वर्थवचनेनावधार्यम् ' । हम चारों प्रकार के अभिनय के विषय में आपको बतायेंगे । यहाँ प्रश्न उठता है कि इसको अभिनय क्यों कहते हैं? इसका उत्तर है कि इसमें अभि उपसर्ग पूर्वक प्राप्त्यर्थंक "नी" धातु का प्रयोग हुआ है तथा इसमें अच् प्रत्यय जुड़ा हुआ है जिससे अभिनय शब्द बनता है । अतः इसका अर्थ बताते समय धातु के अर्थ को ध्यान में रखना होता है ।
अत्र श्लोको- अभिपूर्वस्तु णीञ धातुराभिमुख्यार्थनिर्णये ।
यस्मात्प्रयोगं नयति तस्मादभिनयः स्मृतः ॥ ६ ॥
एतद्विषयक दो श्लोक हैं- यहाँ पर अभिमुख्यार्थ निर्णय में अभि उपसर्ग पूर्वक 'नी' धातु का प्रयोग हुआ है । अतः इसे अभिनय की संज्ञा इस कारण कहा जाता है क्योंकि यह ( नाट्य ) के प्रयोग का वहन करता है ॥ ६ ॥
विभावयति यस्माच्च नानार्थान् हि प्रयोगतः ।
शाखाङ्गोपाङ्ग संयुक्तस्तस्मादभिनयः स्मृतः ॥ ७ ॥
अभिनय नाम की सार्थकता इसमें है कि ( नाट्य के ) प्रयोग के समय शाखा, अंग एवं उपाङ्ग के साथ वह विभिन्न अर्थों को प्रकाशित करता है ॥ ७ ॥
१. 'धात्वनुवचनेनावधार्यं भवति' इति वा पाठः । २. यस्मात् पदार्थान्नयति' इति वा पाठः ।
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३२८ नाट्यशास्त्रम् अभिनय के चार भेद- चतुर्विधश्चैषअनेकभेदबहुलं भवेन्नाट्यस्याभिनयोनाट्यमस्मिन्प्रतिष्ठितम्द्विजाः ॥। ८ ॥ हे मुनियों! नाट्य के अभिनय के चार भेद होते हैं इसी ( अभिनय ) पर नाट्य के अनेकों भेद प्रभेद आश्रित हैं ॥ ८ ॥
आङ्गिको वाचिकश्चैव ह्याहार्यः सात्त्विकस्तथा ॥। ९ ॥ ज्ञेयस्त्वभिनयो विप्राश्चतुर्धा परिकीर्तितः हे ब्राह्मणो! अभिनय के चार प्रकार माने गये हैं ( १ ) आंगिक ( २ ) वाचिक ( ३ ) आहार्य एवं ( ४ ) सात्त्विक ॥ ९ ॥
सात्त्विकः पूर्वमुक्तस्तु भावैश्च सहितो मया । ॥ १० ॥ अङ्गाभिनयमेवातो गदतो मे निबोधत
भावों के साथ सात्त्विक अभिनय का वर्णन मैं पहले कर चुका हूँ । अब मैं शारीरिकमुद्राओं से सम्बन्धित आंगिक अभिनय के विषय में कहूँगा ॥ १० ॥
आङ्गिक अभिनय के तीन उपभेद- त्रिविधस्त्वाङ्गिको ज्ञेयः शारीरो मुखजस्तथा ।
तथा चेष्टाकृतश्चैव शाखाङ्गोपाङ्गसंयुतः ॥ ११ ॥
आङ्गिक अभिनय के तीन उपभेद होते हैं ( १ ) शारीरिक ( २ ) मुख से किया जाने वाला एवं ( ३ ) चेष्टा से किया जाने वाला अभिनय । शाखा, अंग एवं उपांगों का समावेश इसी के अन्तर्गत होता है ॥ ११ ॥
नाट्य प्रयोग सम्बन्धी छः अंग- शिरोहस्तकटी वक्षःपार्श्वपादसमन्वितः अङ्गप्रत्यङ्गसंयुक्तः षडङ्गो नाट्यसंग्रहः ॥ १२ ॥
नाट्यप्रयोग मूलरूप में छ: अङ्गों एवं उपाङ्गों से सम्बन्धित है । जिनके नाम हैं- सिर, हाथ, कटि, वक्ष:स्थल, पार्श्व एवं पैर ॥ १२ ॥
१. अस्मिन् - श्री घोष के अनुसार इस पद से नाट्य प्रयोग का संकेत है । मेरे विचार में अस्मिन् को अभिनय का बोधक होना चाहिए, क्योंकि प्रथम पंक्ति में नाट्यस्य प्रयोग में षष्ठी विभक्ति तथा अभिनय में प्रथमा विभक्ति है । अभिनय पद के कर्ता कारक में होने से दूसरी पंक्ति में आ रहे सर्वनाम अस्मिन् को अभिनय का ही निर्देशक मानना उचित प्रतीत होता है । आगामी श्लोक में भी अभिनय के भेदों का ही वर्णन किया गया है । इस प्रकार दोनों ओर अभिनय के प्रसंग के मध्य आ रहे ' अस्मिन्' पद को अभिनय का ही वाचक मानना सटीक प्रतीत होता है ।
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अष्टमोऽध्यायः ३२ ९ नाट्य प्रयोग सम्बन्धी छः उपाङ्ग - । तस्य शिरोहस्तोरः पार्श्वकटीपादतः षडङ्गानि ॥ १३ ॥ नेत्रनासाधारकपोलचिबुकान्युपाङ्गानि ६
सिर, हाथ, वक्ष, पार्श्व, कटि एवं पैर - यह छः मुख्य अंग है एवं नेत्र, भवें, नासिका, ओठ, गाल एवं ठोढ़ी -यह छः गौण या उपाङ्ग हैं ॥ १३ ॥
नाट्याभिनय सम्बन्धी तीन वस्तुएँ— अस्य शाखा च नृत्तं च तथैवाङ्कुर एव च ॥। १४ ॥ वस्तून्यभिनयस्येह विज्ञेयानि प्रयोक्तृभिः नाट्य प्रयोक्ताओं को शाखा, वृत्त एवं अंकुर को अभिनय की तीन वस्तुए" मानना चाहिए ॥ १४ ॥
शाखा, अंकुर तथा नृत्त वस्तुओं का लक्षण- आङ्गिकस्तु भवेच्छाखा ह्यङ्कुरः सूचना भवेत् । अङ्गहारविनिष्पन्नं नृत्तं तु करणाश्रयम् ॥ १५ ॥
आंगिक मुद्राओं को ' शाखा ' कहते हैं, एवं आङ्गिक मुद्राओं के पश्चात् होने वाली मुद्रा को 'अंकुर ' कहते हैं एवं करणों पर आधारित तथा अङ्गहारों से समन्वित अभिनय को 'नृत्त' कहते हैं ॥ १५ ॥
सिर की चेष्टाओं का उपक्रम - मुखजेऽभिनये विप्रा नानाभावरसाश्रये । शिरसः प्रथमं कर्म गदतो मे निबोधत ॥ १६ ॥
हे मुनियो! सर्व प्रथम आप लोग विविध भावों एवं रसों से युक्त एवं मुख से किए जाने वाले अभिनय से समन्वित सिर की चेष्टाओं के विषय में जानिए ॥ १६ ॥
सिर की चेष्टाओं के तेरह भेदों के नाम- आकम्पितं कम्पितं च धुतं विधुतमेव च । परिवाहितमाधूतमवधूतं तथाश्वितम् ॥ १७ ॥
१. वस्तूनि - यहाँ पर श्री घोष के मत में वस्तु का अर्थ विधाएं है जो उचित भी जान पड़ता है । शाखा एवं अकुर सम्बन्धी शाङ्ग देव के मत को भी घोष महोदय ने उद्धृत किया है जिसके अनुसार शाखा का तात्पर्य करवर्तना से है एवं अंकुर का अर्थ है -पूर्व वाक्य के आधार पर की गई करवर्तना ।
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३३० नाट्यशास्त्रम्
निहञ्चितं परावृत्तमुत्क्षिप्तं चाप्यधोगतम् ।
लोलितं चेति विज्ञेयं त्रयोदशविधं शिरः ॥ १८ ॥
सिर की चेष्टाओं की संख्या तेरह है-- ( १ ) आकम्पित ( २ ) कम्पित, ( ३ ) धुत, ( ४ ) विधुत ( ५ ) परिवाहित, ( ६ ) उवाहित ( आधूत ), (७ ) अवधूत, ( ८ ) अश्वित, ( ९ ) निहञ्चित, ( १२ ) परावृत्त ( ११ ) उत्क्षिप्त, ( १२ ) अधोगत, एवं ( १३ ) लोलित ॥ १७-१८ ॥ आकम्पित तथा कम्पित सिर का लक्षण - शनैराकम्पनादूर्ध्वमधश्चाकम्पितं भवेत् । JLX द्रुतं तदेव बहुशः कम्पितं कम्पितं शिरः ॥ १ ९ ॥ सिर को धीरे धीरे ऊपर एवं नीचे गतिशील करने को 'आकम्पित' कहते हैं । यही गति जब शीघ्रतापूर्वक एवं अत्यधिक मात्रा में की जाती है तो उसे ' कम्पित" कहते हैं ॥ १ ९ ॥ बहुवलितं[ ऋजुस्थितस्य यच्चचोर्ध्वाधःक्षेपादाकम्पितंतत्कम्पितमिहोच्यतेभवेत् ॥। ] ( सीधे स्थित रहने वाले एवं नीचे ऊपर की ओर हिलने वाले सिर को 'आकम्पित' कहते हैं । जब इसे अधिक मात्रा में गतिशील किया जाता है तो उसे कम्पित कहा जाता है । ) आकम्पित सिर का विनियोग- । संज्ञोपलम्भप्रश्नेषु स्वभावाभाषणे तथा ॥ २० ॥ निर्देशावाहने चैव भवेदाकम्पितं शिरः
परिचय देने, शिकायत करने तथा प्रश्न पूछने तथा साधारण ढंग से बात कहने में एवं आज्ञा देने के समय आकम्पित शिर का प्रयोग किया जाता है ॥ २० ॥
कम्पित सिर का विनियोग- रोषे वितर्के विज्ञाने प्रतिज्ञानेऽथ तर्जने ।
प्रश्नातिशयवाक्येषु शिरः कम्पितमिष्यते ॥ २१ ॥
क्रोध, तर्क, बात को समझाने, बात पर दृढ़ होने, निवारण करने, अधिक बात चीत के समय प्रश्न पूछने आदि में कम्पित शिर का प्रयोग किया जाता है ॥ २१ ॥
धृत तथा विधुत सिर का लक्षण- शिरसो रेचनं सम्यक्छनैस्तद्धतमिष्यते । द्रुतमारेचनादेतद्विधुतं तु भवेच्छिरः ॥ २२ ॥
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अष्टमोऽध्यायः ३३१* सिर के धीमे धीमे घुमाने की संज्ञा धुत तथा जल्दी जल्दी घुमाने की संज्ञा विधुत है ॥ २२ ॥
धुत सिर का विनियोग- अनीप्सिते विषादे च विस्मये प्रत्यये तथा ।
पाश्र्वावलोकने शून्ये प्रतिषेधे धुतं शिरः ॥ २३ ॥
अनिच्छा, दुःख, आश्चर्य, विश्वास, पार्श्व में दृष्टिपात, एकान्त एवं निषेध के प्रसङ्ग में धुत शिर का प्रयोग किया जाता है ॥ २३ ॥
विधुत सिर का विनियोग—
शीतग्रस्ते भयार्त्ते च त्रासिते ज्वरिते तथा ।
पीतमात्रे तथा मद्ये विधुतं तु भवेच्छिरः ॥ २४ ॥
सर्दी के प्रकोप, डर, कष्ट, ज्वर एवं मद्यपान की प्रारम्भिक अवस्था क प्रदर्शन करने के लिए विधुत शिर का प्रयोग होता है ॥ २४ ॥
परिवाहित तथा आधूत सिर का लक्षण —
पर्यायशः पार्श्वगतं शिरः स्यात्परिवाहितम् ।
आधूतमुच्यते तिर्यक्कृदुद्वाहितं तु यत् ॥ २५ ॥
जब सिर को क्रम से दोनों पावों की तरफ ले जाया जाए तो उसे परिवाहित शिर कहते हैं और केवल एक बार ऊपर की तरफ ले जाने पर 'आधत' सिर कहा जाता है ॥ २५ ॥
परिवाहित सिर का विनियोग- साधने विस्मये हर्षे स्मृते चामर्षिते तथा ।
विचारे विहृते चैव लीलायां परिवाहितम् ॥ २६ ॥
कार्य सम्पादन, आश्चर्य, हर्ष, स्मरण, चिढ़, सोचने, त्रिहार एवं विलास के प्रदर्शन के समय परिवाहित सिर का प्रयोग किया जाता है ॥ २६ ॥
आधूत सिरगर्वेच्छादर्शनेका विनियोग.चैव पार्श्वस्थोर्ध्वनिरीक्षणे ।. आधूत तु शिरो ज्ञेयमात्मसम्भावनादिषु ॥ २७ ॥
अभिमान, अभीष्ट प्रदर्शन, उपर की ओर बगल में देखने ' एवं आत्मपरीक्षणादि के अवसर पर आधूत शिर का प्रयोग होता ॥ २७ ॥
१. पार्श्वस्थोर्ध्वनिरीक्षणे -घाष इसे 'ऊपर ऊँचे देखना' कहते हैं । किन्तु इससे पार्श्व का अर्थ ध्वनित नहीं हो पाता ।