भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 421–430

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 421–430

पृष्ठ 421

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३३२ नाट्यशास्त्रम् अवधूत सिर का लक्षण तथा विनियोग- यदधः सकृदाक्षिप्तमवधूतं तु तच्छिरः । सदेशावाहनालोपसंज्ञादिषु तदिष्यते ॥ २८ ॥

एक बार नीचे की ओर गिराने पर शिर की संज्ञा ' अवधूत' होती है । संदेश देने, इष्टके आवाहन एवं प्रकट होने के संकेत के लिए इसका प्रयोग किया जाता है ॥ २८ ॥

अञ्चित सिर का लक्षण तथा विनियोग- किञ्चित्पावनत प्रीवं शिरो विज्ञ यमञ्चितम् ।

व्याधिते मूर्छिते मत्ते चिन्तायां हनुधारणे ॥ २ ९ ॥

गर्दन को एक ओर थोड़ा सा झुकाने से 'अश्चित' शिर कहा जाता है । बीमारी मूर्च्छा, मदहोशी एवं चिन्ता तथा परिस्थिति विशेष में चिबुक की स्थिति प्रदर्शित करने के लिये इसका प्रयोग किया जाता है ॥ २ ९ ॥ निहञ्चित सिर का लक्षण तथा विनियोग—

उत्क्षिप्तांसावसक्तं यत्कुञ्चितभ्रूलतं मनाक् ।

निहञ्चितं तु विज्ञेयं स्त्रीणामेतत्प्रयोजयेत् ॥ ३० ॥

गर्वे माने विलासे च विब्बोके किलकिञ्चिते ।

मोट्टायिते कुट्टमिते स्तम्भे माने निहञ्चितम् ॥ ३१ ॥

दोनों कन्धों को उपर की ओर उठाकर गर्दन को एक ओर झुकाने को 'निहञ्चित' शिर कहते हैं । इसका प्रयोग स्त्रियाँ करती हैं तथा प्रयोग के अवसर हैं-अभिमान, प्रणय कोप, लीला, तटस्थता, उन्मत्तता, प्रच्छन्न सुखानुभूति, झूठमूठ का क्रोध एवं जड़ता का प्रदर्शन ॥ ३०-३१ ॥ परावृत्त सिर का लक्षण तथा विनियोग- परावृत्तानुकरणात् परावृत्तमिहोच्यते । तत्स्यान्मुखापहरणे पृष्ठतः प्रेक्षणादिषु ॥ ३२ ॥

१. अलोपसंज्ञा - घोष ने इसका अर्थ समीप आना किया है । हमारे मत में अलोपसंज्ञा का तात्पर्य है किसी अप्रकट या छिपे व्यक्ति को प्रकट होने के लिए प्रेरित करना । पाठान्तर के अनुसार यहाँ "आलापे चैव तद्भवेत्" ( म ) या "आलापसंज्ञादिषु भविष्यति ” (द ) पाठ होना चाहिए । तब इसका अर्थ "संभाषण -के प्रसंग में" होगा । २. ' मत्ते सचिन्ते दुःखिते भवेत्' इति वा पाठ: ।

पृष्ठ 422

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अष्टमोऽध्यायः ३३ सिर को घुमा लेने पर परावृत्त शिर की मुद्रा बनती है । मुँह फेरने एवं देखने आदि के हेतु इसका प्रयोग किया जाता है ॥ ३२ ॥

उत्क्षिप्त सिर का लक्षण तथा विनियोग- उत्क्षिप्तं चापि विज्ञेयनुन्मुखावस्थितं शिरः । प्रांशुदिव्यार्थयोगेषु स्यादुक्षिप्तं प्रयोगतः ॥ ३३ ॥

जब मुख को ऊपर की ओर उठाया जाया है तो उसे 'उत्क्षिप्त' शिर कहते हैं ।

प्रांशु एवं देवी पदार्थों के सन्दर्भ में इसका प्रयोग किया जाता है ॥ ३३ ॥

अधोगत सिर का लक्षण तथा विनियोग- । अवाङ्मुखस्थितश्वापि बुधाः प्राहुरधोगतम् लज्जायां च प्रणामे च दुःखे चाधोगतं शिरः ॥ ३४ ॥

जब मुख नीचे की तरफ झुका हो तो उसे 'अधोगत' शिर कहते हैं । शर्म, नमस्कार एवं दुःख में इसका प्रयोग होता है ॥ ३४ ॥

लोलित सिर का लक्षण तथा विनियोग- सर्वतोभ्रमणाच्चैव शिरो ललितमुच्यते ॥। ३५ ॥ मूर्च्छाव्याधिमदावेशग्रहनिद्रादिषु स्मृतम् जब सिर चारों तरफ घूमता रहे तो उसे 'लोलित' शिर कहते हैं । बेहोशी, - बीमारी, मदहोशी तथा निद्रा आदि के समय इसका प्रयोग किया जाता है ॥ ३५ ॥

प्राकृत सिर का लक्षण तथा विनियोग- [ ऋजुस्वभावसंस्थानं प्राकृतं तु स्वभावजम् । ] [ सीधे स्वाभाविकमङ्गल्याध्ययनध्यानरूप में जो शिर रहतास्वभावजयकर्मसुहै वह 'प्राकृत' ॥सिर होता है । कल्याणप्रद पठन, भगवद्ध्यान एवं मन के दमन आदि क्रियाओं के सन्दर्भ में इसका प्रयोग किया जाता है । ]

सिर की चेष्टाओं का उपसंहार- एभ्योऽन्ये बहवो भेदा लोकाभिनयसंश्रयाः ।

ते च लोकस्वभावेन प्रयोक्तव्याः प्रयोक्तृभिः ॥ ३६ ॥

इसके अतिरिक्त भी शिर की अनेकों मुद्राएं होती हैं जो सामान्य अभिनय पर आश्रित होती हैं । अवस्था के अनुरूप उन सबका प्रयोग प्रयोक्तागण को करना चाहिए ॥ ३६ ॥

दृष्टि की चेष्टाओं का उपक्रम- त्रयोदशविधं ह्येतच्छिरः कर्म मयोदितम् ।

अतः परं प्रवक्ष्यामि दृष्टीनामपि लक्षणम् ॥ ३७ ॥

पृष्ठ 423

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३३४ नाट्यशास्त्रम् सिर की इन तेरह प्रकार की मुद्राओं को मैंने बतलाया । अब मै दृष्टि के विषय में बताऊँगा ॥ ३७ ॥

रस दृष्टियों के आठ भेद—

कान्ता भयानका हास्या करुणा चाद्भुता तथा ।

३८ ॥ रौद्री बीरा च बीभत्सा विज्ञेया रसदृष्टयः ॥

अद्भुता, ( ६ ) ( १ ) कान्ता, ( २) भयानका, ( ३ ) हास्या, ( ४ ) करुणा, ( ५ ) ॥ ३८ ॥--रौद्री, ( ७ ) वीरा एवं ( ८ ) बीभत्सा - इनको रस दृष्टि कहा जाता है

स्थायी भाव सम्बन्धी दृष्टियों के आठ भेद- स्निग्धा हृष्टा च दीना च क्रुद्धा दृप्ता भयान्विता । जुगुप्सिता विस्मिता च स्थायिभावेषु दृष्टयः ॥ ३ ९ ॥ स्निग्धा, ( २ ) स्थायी भावों में प्रयुक्त दृष्टियों के नाम इस प्रकार हैं ( १ ) जुगुप्सिता एवं हृष्टा, ( ३ ) दीना, ( ४ ) क्रुद्धा, ( ५ ) दृप्ता, ( ६ ) भयान्विता, ( ७ ) ( ८) विस्मिता ॥ ३ ९ ॥ भाव सम्बन्धी दृष्टियों के बीस भेद - सञ्चारी । शून्या च मलिना चैव श्रान्ता लज्जान्विता तथा ॥ ४० ॥ ग्लाना च शङ्किता चैव विषण्णा मुकुला तथा

। कुञ्चिता चाभितप्ता च जिह्मा सललिता तथा ॥ ४१ ॥ वितर्कितार्धमुकुला विभ्रान्ता विप्लुता तथा

आकेकरा विकोशा च त्रस्ता च मदिरा तथा ॥। ४२ ॥ षट्त्रिंशदृष्टयो ह्यतास्तासु नाट्यं प्रतिष्ठितम् ( १ ) शून्या, ( २ ) मलिना, ( ३ ) श्रान्ता, ( ४ ) लज्जान्विता, (५ ) ग्लाना, ( ६ ) शंकिता, ( ७ ) विषण्णा, ( ८ ) मुक्ता, ( ९ ) कुञ्चिता, ( १० ) अभितप्ता, ११ ) अर्धमुकुला, ( १२ ) जिह्मा, ( १३ ) ललिता, ( १४ ) वितर्किता, ( १५ ) विभ्रान्ता, ( ) विलुप्ता, ( १७ ) आकेकरा, ( १८ ) विकोशा, ( १ ९ ) त्रस्ता एवं ( २० ) मदिरा. ( १६ • इन छत्तीस दृष्टियों में नाट्य का नियोजन है ' ॥ ४०-४२ ॥ रस सम्बन्धी दृष्टियों की चेष्टाओं के वर्णन का उपक्रम - अस्यलक्षणं दृष्टिविधानस्यसंप्रवक्ष्यामि नानाभावरसाश्रयम्यथाकर्मप्रयोगतः ॥॥ ४३ ॥

दृष्टियों१.२. कीभरतआठभीमुनिरसआठदृष्टियाँद्वारासंख्याउल्लिखितआठहै । भाव रसोंदृष्टियाँकी एवंसंख्याबीसआठसञ्चारीहोने दृष्टियोंसे तत्तद्कोरसमिलाकी में प्रयुक्त होने वाली दृष्टियों की कुल संख्या छत्तीस सिद्ध होती है । - र नाट्य

पृष्ठ 424

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अष्टमोऽध्यायः ३३५ अब मैं विविध भावों एवं रसों के सन्दर्भ में कर्म तथा प्रयोगों के अनुसार इन दृष्टियों का वर्णन करूँगा ॥ ४३ ॥

कान्ता दृष्टिहर्षप्रसादजनिताका लक्षण तथा विनियोग-कान्तात्यर्थं समन्यथा ।

सभ्रूक्षेपकटाक्षा च शृङ्गारे दृष्टिरिष्यते ॥ ४४ ॥

( १ ) शृंगार रस के प्रसङ्ग में प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता के समय ' कान्ता' नामक दृष्टि का प्रयोग होता है । इसमें भवें संकुचित की जाती हैं तथा कुटिल दृष्टिपात [कटाक्ष ] का प्रयोग किया जाता है ॥ ४४ ॥

भयानक दृष्टि का लक्षण तथा विनियोग-- पोस्तनिष्टब्धपुटा स्फुरदुद्वृत्ततारका । दृष्टिर्भयान कात्यर्थं भीता ज्ञेया भयानके ॥। ४५ ॥ ( २ ) आँखों की पलकें यथासम्भव ऊपर की ओर निष्कम्प रूप से फैली हों' तथा पुतलियां भी फैली हुई हों और कुछ कुछ इधर-उधर घूम रहीं हों तो उसे ' भयानका' दृष्टि कहते हैं । अत्यधिक भयानुभूति की प्रदर्शिका इस दृष्टि का प्रयोग भयानक रस में किया जाता है ॥ ४५ ॥

हास्या दृष्टि का लक्षण तथा विनियोग- क्रमादाकुञ्चितपुटा सविभ्रान्ताल्पतारका । हास्या दृष्टिस्तु कर्तव्या कुहकाभिनयं प्रति ॥ ४६ ॥

( ३ ) ऊपर एवं नीचे वाली दोनों पलकें जब क्रमश: फड़कें तथा पुतलियाँ कुछ-कुछ डोलती रहें तो उसे हास्या दृष्टि कहा जाता है एवं अभिनय मायावी या विस्मापक ( कुहक ) के प्रसङ्ग में किया जाता है ॥ ४६ ॥

करुणा दृष्टिपतितोपुटाका लक्षण तथा विनियोग-सास्त्रा मन्युमन्थरतारका ।

नासाग्रानुगता दृष्टिः करुणा करुणे रसे ॥ ४७ ॥

( ४ ) ऊपरवाली पलक जब नीचे की ओर झुकी हुई हो, आंखों में आंसू भरे हो, ग्लानिवश पुतलियाँ स्थिर हों तथा निगाह नाक के अगले भाग पर टिकी हो तो

उसे करुणा दृष्टि कहते हैं । इसका प्रयोग करुणरस में किया जाता है ॥ ४७ ॥

अद्भुता दृष्टि का लक्षण तथा विनियोग- या त्वाकुञ्चितपक्ष्माग्रा साश्चर्योद्वृत्ततारका । सौम्या विकसितान्ता च साद्भुता दृष्टिरद्भुते ॥ ४८ ॥

१. यह स्थिति नेत्रों के भयविस्फारित होने पर सम्भव है ।

पृष्ठ 425

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३३६ नाट्यशास्त्रम् ( ५ ) जिस दृष्टि में बरौनियों के अग्रभाग कुछ मुड़े हुए रहें तथा आश्चर्यवश जिसमें नयनोंपुतलियाँ फैली-फैली सी हो जाएं तथा जी दृष्टि शान्त होती है एवं

इसका प्रयोगकी कोरे ( आश्चर्य से ) खुल जाती हैं उसे ' अद्भुता' दृष्टि कहते हैं ।

'अद्भुत' रस में किया जाता ॥ ४८ ॥

रौद्री दृष्टि का लक्षण तथा विनियोग - क्रूरा रूक्षारुणोद्वृत्ता निष्टब्धपुटतारका । भ्रुकुटीकुटिला दृष्टी रौद्री रौद्ररसे स्मृता ॥ ४ ९ ॥ दृष्टि जिसमें आँखें लाल एवं फटी-फटी सी हो उठती(हैं६ ), जिसमेंवह क्रूरपुतलियाँएव स्नेहरहितएकदम स्तब्ध हो उठती हैं एवं भृकुटि टेढ़ी हो जाती है, उसे ' रौद्री' दृष्टि कहते हैं तथा इसका प्रयोग रौद्ररस में करते हैं ॥ ४ ९ ॥

वीरा दृष्टि का लक्षण तथा विनियोग- दीप्ता विकसिता क्षुब्धा गम्भीरा समतारका ।

दृष्टिस्तु वीरा वीररसाश्रया ॥ ५० ॥

दृष्टिउत्फुल्लमध्या( उत्साह से ) चमक रही हो जिसमें आँखें पूरी खुली हों और जो आन्दोलित( ), गम्भीर एवं अकम्पित ७ जो पुतलियों से युक्त हो तथा जिसमें नेत्रप्रान्त प्रमदित प्रतीत होता हो उसे ' वीरादृष्टि' कहते हैं । यह वीररस में प्रयुक्त होती है ॥ ५० ॥

बीभत्स दृष्टि का लक्षण तथा विनियोग- । ॥ ५१ ॥ निकुञ्चितपुटापाङ्गासंश्लिष्टस्थिरपक्ष्मा च बीभत्साघूर्णोपप्लुततारकादृष्टिरिष्यते

(८ ) जिस दृष्टि में नेत्रों के कोनों की ओर पलकें सिकुड़ी हुई हो, पुतलियाँ ऊपर नीचे घूम रही हो तथा बरौनियाँ परस्पर जुड़कर एकदम निश्चल हों उसे 'बीभत्सा' दृष्टि कहते हैं ॥ ५१ ॥

शान्तादृष्टि[कानासाग्रसक्तानिमिषालक्षण- तथाधोभागचारिणी । आकेकरपुटा चैव शान्ता दृष्टिर्भवेदसौ ॥ ] [ नाक के अगले भाग को लक्ष्य करने वाली नीचे की ओर झुकी निगाह वाली तथा अर्धनिमीलित पलकों वाली दृष्टि को 'शान्ता' कहा जाता है । ] स्थायीभाव सम्बन्धी दृष्टिचेष्टाओं के वर्णन का उपक्रम - रसजा दृष्टयो अतः परं लक्षयिष्ये ह्येता' विज्ञेयास्थायिभावसमाश्रयाःलक्षणान्विताः ॥। ५२ ॥ १. 'प्रवक्ष्यामि' इति बड़ौदासंस्करणे पाठः ।

पृष्ठ 426

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अष्टमोऽध्यायः ३३७

उपर्युक्त जिन दृष्टियों के लक्षण कहे गये हैं उनका नाम ' रसजा' दृष्टि है ।

अब मैं स्थायिभावों की आश्रित दृष्टियों का विश्लेषण करूंगा ॥ ५२ ॥

स्निग्धा दृष्टि का लक्षण तथा विनियोग-- व्याकोशमध्या मधुरा स्थितताराभिलाषिणी । सानन्दभ्रूलता दृष्टिः स्निग्धेयं रतिभावजा ॥ ५३ '॥ ' १. रति नामक स्थायी भाव से उत्पन्न होने वाली दृष्टि का नाम स्निग्धा होता है । उसमें नेत्र न अधिक खुले होते हैं न कम ( मध्यम ) । वह मधुर पुतलियों वाली तथा आनन्दित भ्रूविलास सम्पन्न होती है ॥ ५३ ॥

हृष्टा दृष्टि का लक्षण तथा विनियोग- चला हसितगर्भा च विशत्तारानिमेषिणी ।

किञ्चिदाकुञ्चिता हृष्टा दृष्टिसे प्रकीर्तिता ॥ ५४ ॥

२. हास संज्ञक भाव में हृष्टा दृष्टि का प्रयोग होता है जो चंचल, हंसी से कुछ भरपूर, (पलकों के संकोचन द्वारा) पुतलियों को छिपा लेने वाली, एवं आंखों को सिकोड़ लेने वाली होती है ॥ ५४ ॥

दीना दृष्टि का लक्षण तथा विनियोग- अवस्रस्तोत्तरपुटा रुद्धतारा जलाविला ।

मन्दसञ्चारिणी दीना सा शोके दृष्टिरुच्यते ॥ ५५ ॥

३. शोक में ' दीना ' नामक दृष्टि प्रयुक्त होती है । इस दृष्टि में अश्रुपूर्ण पलकें कुछ ढलकी हुई सी होती हैं, आँखों में आँसू भरे होने से पुतलियाँ अस्पष्ट रहती हैं तथा उनकी गति बहुत ही धीमी होती है ॥ ५५ ॥

क्रुद्धा दृष्टि का लक्षण तथा विनियोग- रूक्षा स्थिरोवृत्तपुटा निष्टब्धोद्वृत्ततारका । कुटिलभृकुटी दृष्टिः क्रुद्धा क्रोधे विधीयते ॥ ५६ ॥

४. जो दृष्टि रूखी होती है एवं जिनमें पलकें फटी- फटी सी और स्तब्ध रहती है, आँखों की पुतलियों को बाहर की ओर निकालते हुए एकटक देखा जा रहा हो, भवें टेढ़ी हो जाए, उस दृष्टि का नाम 'क्रद्धा' दृष्टि होता है एवं उसका प्रयोग 'क्रोध' नामक स्थायीभाव में किया जाता है ॥ ५६ ॥

दृप्ता दृष्टि का लक्षण तथा विनियोग- संस्थिते तारके यस्याः स्थिरा विकसिता तथा ।

सत्त्वमुद्गिरती दृप्ता दृष्टिरुत्साहसम्भवा ॥ ५७ ॥

ना० २२

पृष्ठ 427

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३३८ नाट्यशास्त्रम् ५. जिसमें पुतलियाँ स्थिर रहती हैं तथा जो दृष्टि अचंचल और विस्फारित होती है तथा जिससे ओज का प्रदर्शन हो रहा हो वह दृष्टि 'उत्साह' नामक भाव से उत्पन्न होती है तथा उसका नाम 'दृप्ता' होता है ॥ ५७ ॥

भयान्विता दृष्टि का लक्षण तथा विनियोग विस्फारितोभयपुटा भयकम्पिततारका— । निष्क्रान्तमध्या दृष्टिस्तु भयभावे भयान्विता ॥ ५८ ॥

६. जिसमें दोंनों पलकें विस्तृत हों, भय से काँपती हुई पुतलियाँ आँख के मध्य में स्थिर न रहें उसे ' भयान्विता' दृष्टि कहते हैं जिसे 'भय ' में प्रयुक्त किया जाता है ॥ ५८ ॥

जुगुप्सिता दृष्टि का लक्षण तथा विनियोग- । ' संकोचितपुटाध्यामा दृष्टिर्मीलिततारका लक्षोदुद्देशात्समुद्विग्ना जुगुप्सायां जुगुप्सिता ॥ ५ ९ ॥ ७. जब दोनों पलकें सिकोड़ ली जाए, निगाहों ( के भटकने ) से पुतलियाँ छिपी जा रही हों, अपने लक्ष्य से जो बार बार हटी जा रही हों उस दृष्टि को 'जुगुप्सिता' कहते हैं तथा इसका प्रयोग 'जुगुप्सा' नामक स्थायी भाव में किया जाता है ॥ ५ ९ ॥ विस्मिता दृष्टि का लक्षण तथा विनियोग- । भृशमुद्वृत्ततारात्र नष्टोभयपुटाञ्चिता समा विकसितादृष्टिविस्मिता विस्मये स्मृता ॥ ६० ॥

८. विस्मय नामक स्थायी भाव में जो दृष्टि प्रयुक्त होती है उसमें पुतलियाँ [ आश्चर्य से ] फैल जाती हैं, दोनों आंखों की पलकें सिकुड़कर स्तब्ध हो उठती हैं, तथा आँखें विस्फारित हो जाती हैं । इस दृष्टि का नाम 'विस्मिता' होता है ॥ ६० ॥

सवारी भाव सम्बन्धी दृष्टियों के वर्णन का उपक्रम—

स्थायिभावाश्रया ह्येता विज्ञेया दृष्टयो बुधैः ।

सञ्चारिणीनां दृष्टीनां संप्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥ ६१ ॥

उपर्युक्त इन दृष्टियों को विद्वान् लोग स्थायीभाव की दृष्टियाँ मानते हैं । अब मैं सञ्चारी भावों की आश्रित दृष्टियों के लक्षण बतलाऊँगा ॥ ६१ ॥

१. 'पुटश्यामा' ' पुटन्यासा ' इति वा पुस्तकान्तरे ।

पृष्ठ 428

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अष्टमोऽध्यायः ३३ ९

शून्या दृष्टि का लक्षण- समतारा समपुटा निष्कम्पा शून्यदर्शना ।

बाह्यार्थाग्राहिणी ध्यामा शून्यादृष्टिः प्रकीर्तिता ॥ ६२ ॥

[ १ ] जब पुतलियां एवं पलकें सामान्य अवस्था में हों [ ऊपर या नीचे न हों ] स्पन्दरहित हों, दृष्टि किसी भी कार्य को लक्षित न कर रही हो, भौतिक पदार्थों का प्रत्यक्ष करने में जो असमर्थ हो उसे ' शून्या' दृष्टि कहते हैं ॥ ६२ ॥

मलिना दृष्टि का लक्षण- प्रस्पन्दमानपक्ष्मा या नात्यर्थमुकुलैः पुटैः ।

मलिनान्ता च मलिना दृष्टिर्भ्रान्ततारका ॥ ६३ ॥

[२ ] जिस दृष्टि में बरौनियाँ ६ म्पित होती है । पलकें अधिक बन्द न हों, आखें की कोरे गंदली सी हों व पुतलियाँ चंचल हों उसे 'मलिना' दृष्टि कहते ॥ ६३ ॥

श्रान्ता दृष्टि का लक्षण- श्रमात्प्रम्लापितपुटा क्षामान्ताचितलोचना ।

सन्ना पतिततारा च श्रान्ता दृष्टिः प्रकीर्तिता ॥ ६४ ॥

[ ३ ] उस दृष्टि का नाम ' श्रान्ता' दृष्टि होता है जिसमें थकावट के कारण पलकें झुकी हुई होती हैं, नेत्रों की कोरें कुछ मिची हुई रहती हैं तथा पुतलियाँ भी नीचे की ओर ढलती रहती हैं ॥ ६४ ॥

लज्जान्विता दृष्टि का लक्षण- किञ्चिदञ्चितपक्ष्माग्रा पतितोर्ध्वपुटा ह्रिया ।

त्रपाधोगततारा च दृष्टिर्लज्जान्विता तु सा ॥ ६५ ॥

[ ४ ] जब आँखों की बरौनियां कुछ कुछ झुकी हुई हों, शर्म से ऊपरी पलक झुकी जाती हो तथा व्रीडावश पुतलियाँ नीचे की ओर गिरी जाती हों तो उस दृष्टि को 'लज्जान्विता' कहते ॥ ६५ ॥

ग्लाना दृष्टि का लक्षण- म्लानभ्रूपुटपक्ष्मा या शिथिला मन्दचारिणी ।

क्रमप्रविष्टतारा च ग्लाना दृष्टिस्तु सा स्मृता ॥ ६६ ॥

[ ५ ] जब भावों, पलकों एवं बरौनियों की गति एकदम धीमी हो, वह ढलती सी हों तथा आँखों की पुतलियाँ शनैः शनैः नीचे की ओर डूबती जाती हों तो उसे 'ग्लाना' दृष्टि कहते हैं ॥ ६६ ॥

१. 'क्लम ' इति बड़ौदासंस्करणे पाठः ।

पृष्ठ 429

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३४० नाट्यशास्त्रम्

शंकिता दृष्टि का लक्षण- किञ्चञ्चला स्थिरा किञ्चिदुद्गता तिर्यगायता ।

गूढा चकिततारा च शङ्किता दृष्टिरिष्यते ॥ ६७ ॥

[ ६ ] कुछ चंचल सी और कुछ निश्छल सी, कभी बाहर की ओर घूरती हुई सी, कभी तिर्यक् विस्तारित दृष्टि जिसमें पुतलियाँ भौंचक्की तथा चकित लगें,. उसे ' शंकिता' दृष्टि कहते हैं ॥ ६७ ॥

विषादिनी दृष्टि का लक्षण- विषादविस्तीर्णपुटा पर्यस्तन्ता निमेषिणी ।

किञ्चन्निष्टब्धतारा च कार्या दृष्टिविषादिनी ॥ ६८ ॥

[ ७ ] वह उदास दृष्टि जिसमें पलकें खूब विस्तारित हों, पलकें न झपकती हों तथा पुतलियाँ लगभग स्थिर हों उसे 'विषादिनी' दृष्टि कहते हैं ॥ ६८ ॥

मुकुला दृष्टि का लक्षण- स्फुरदा श्लिष्टपमार्धा मुकुलोर्ध्वपुटाश्विचता । सुखोन्मीलिततारा च मुकुला दृष्टिरिष्यते ॥ ६ ९ ॥ [ ८ ] जब जुड़ी जुड़ी सी बरौनियाँ काँप रही हों, उपरी पलक पूरी तरह झुकी हो' तथा आनन्द से पुतलियाँ विकसित होती हो उसे ' मुकुला ' दृष्टि कहते हैं ॥ ६ ९ ॥

कुञ्चिता दृष्टिआनिकुञ्चितपक्ष्माग्राका लक्षण-- पुटैराकुञ्चितैस्तथा ।

सन्निकुचिततारा च कुञ्चिता दृष्टिरिष्यते ॥ ७० ॥

[९ ] जिस दृष्टि में बरौनियों का अगला भाग कुछ मुड़ा हुआ सा हो, तथा पलकें एवं पुतलियां सिकुड़ी हुई हों तो उसे 'कुञ्चिता' कहते हैं ॥ ७० ॥

अभितप्ता दृष्टि का का लक्षण- मन्दायमानतारा या पुटैः प्रचलितैस्तथा ।

सन्तापोपप्लुता दृष्टिरभितप्ता तु सव्यथा ॥ ७१ ॥

[ १० ] जब पलकें मन्दगति से फड़कती रहें, पुतलियों की गति अत्यन्त १. मुकुलौर्ध्वपुट – श्री घोष के अनुवाद में इसे मुकुल श्रेणी का कहा गया है । मुकुल का अनुवाद कली है । अत: पलकों के मुकुलित होने का तात्पर्य पलकों को इतना झुकाना प्रतीत होता है कि आँखे बन्द सी लगने लगें ।

पृष्ठ 430

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अष्टमोऽध्यायः ३४१ मन्थर हो, जो दृष्टि दुःख एवं पीड़ा की परिचायक हो उसका नाम 'अभितप्ता' दृष्टि होता है ॥ ७१ ॥

जिह्मा दृष्टि का लक्षण - लम्बिता कुञ्चितपुटा शनैस्तिर्यनिरीक्षणैः ।

निगूढा गूढतारा' च जिह्मा दृष्टिरुदाहृता ॥ ७२ ॥

[ ११ ] कटाक्षपात के कारण आँखों की पलकें सिकुड़ कर मुद जाएं एवं पुतलियाँ दिखाई न पड़ती हों तो उसे जिह्मा दृष्टि कहा जाता है ॥ ७२ ॥

ललिता दृष्टि का लक्षण - मधुरा कुञ्चितान्ता च सभ्रूक्षेपा च सस्मिता ।

समन्मथविकाराच दृष्टिः सा ललिता स्मृता ॥ ७३ ॥

[ १२ ] जो दृष्टि मधुर हो, जिसमें नेत्रों के प्रान्त भाग वन हों, भ्रूपात से युक्त हो, सहास्य हो, एवं जिसमें कामविकार हो उसका नाम ललिता दृष्टि होता है ॥ ७३ ॥

वितर्किता दृष्टि का लक्षण - वितद्वतितपुटा तथैवोत्फुल्लतारका । अधोमुखविकारा च दृष्टिरेषा वितर्किता ॥ ७४ ॥

[ १३ ] जिस दृष्टि में पलके जिज्ञासावश ऊपर की ओर मुड़ी हो, पुतलियाँ खूब विस्फारित हों तथा नजरें नीचे की ओर झुकी हों, उसे वितर्किता कहते है ॥ ७४ ॥

अर्धमुकुला दृष्टि का लक्षण- अर्धव्याकोशपक्ष्मा च ह्लादार्धमुकुलैः पुटैः ।

स्मृतार्धमुकुला दृष्टिः किञ्चिल्लुलिततारका ॥ ७५ ॥

[ १४ ] आँखों की बरौनियाँ आधी मुदी हो, प्रसन्नतावश पलकें आधी बन्द हो गई हों तथा पुतलियों की गति मन्द हो तो उस अवस्था का नाम ' अर्ध मुकुला' दृष्टि होता है ॥ ७५ ॥

विभ्रान्ता अनवस्थिततारादृष्टि का लक्षण- च विभ्रान्ताकुलदर्शना' ।

विस्तीर्णोत्फुल्लनेत्रा च विभ्रान्ता दृष्टिरिष्यते ॥ ७६ ॥

१. 'गूढाऽचकिततारा च' इति वा पाठः । २. 'विभ्रान्ततारका या तु विभ्रान्तपुटदर्शना ।' इति काशीसंस्करणे पाठः ।