भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 451–460

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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३६२ नाट्यशास्त्रम् असंयुक्त हस्त मुद्राओं के लक्षण- प्रसारिताः समाः सर्वाः यस्याङ्गुल्यो भवन्ति हि । ॥ कुञ्चितश्च तथाङ्गुष्ठः स पताक इति स्मृतः ॥ १८ ॥

१ -पताक - जब अंगुलियाँ बराबर फैली हुई हों तथा अंगूठा झुका हुआ हो तो उसे पताक ' चेष्टा' कहते हैं ॥ १८ ॥

एष प्रहारपाते प्रतापने नोदने प्रहर्षे च ।

'गर्वेऽप्यहमिति तज्ज्ञ' ललाटदेशोत्थितः कार्यः ॥ १ ९ ॥

•एषोऽग्निवर्षधारानिरूपणे पुष्पवृष्टिपतने च ।

11 संयुतकरणः कार्यः प्रविरलचलिताङ्गुलिर्हस्तः ॥ २० ॥

स्वस्तिक विच्युतिकरणात्पल्लवपुष्पोपहारशष्पाणि ।

विरचितमुर्वीसंस्थं यद्द्रव्यं तच्च निर्देश्यम् ॥ २१ ॥

स्वस्तिक विच्युतिकरणात्पुनरेवाधोमुखेन कर्त्तव्यम् ।

संवृतविवृतं पाल्यं छन्नं निबिडं च गोप्यं च ॥ २२ ॥

अस्यैव चाङ्गुलीभिस्त्वधोमुखप्रस्थितोत्थितचलाभिः । वायूमिवेगवेलाक्षोभश्चौषश्च कर्त्तव्यः ॥ २३ ॥

उत्साहनंपक्षोत्क्षेपाभिनयंबहु तथा महाजनप्रांशुपुष्करप्रहतम्रेचक करणेन कुर्वीत ॥ । २४ ॥

परिघृष्टतलस्थेन तु धौतं मृदितं प्रमुष्टपिष्टे च ।

पुनरेव शैलधारणमुद्घाटनमेव चाभिनयेत् ॥ २५ ॥

प्रहार करने, भीषण गर्मी, आनन्दित होने तथा अभिमानवश अहंमन्यता के प्रदर्शनार्थं माथे तक उठा कर पताक हस्त का प्रयोग किया जाता है । पताक मुद्रा में ही जब अंगुलियां अलग होकर चंचल रहती हैं एवं दोनों हाथ मिल जाते हैं तो उससे अग्नि प्रकोप, वर्षा तथा पुष्पवृष्टि का अभिनय किया जाता है । इसी हस्तमुद्रा के स्वस्तिक स्थिति' से अलग होने पर छिछले पानी के तालाब ( पल्लव ), फूलों के उपहार, घास तथा जमीन पर बनी हुई कोई भी वस्तु को संकेतित किया जाता है । इन्हीं पताका हस्तों की अंगुलियों के निम्नाभिमुख होने पर किसी ढँकी, खुली, रक्षित, बन्द, सघन या गुप्त वस्तु को अभिव्यक्त किया जाता है । इसी हस्त-मुद्रा की अंगुलियों नीचे की ओर झुकी एवं ऊपर-नीचे चलित होने पर लहरों के आवेग, सागर तट से लहरों के टकराने एवं जलप्लावन को प्रदर्शित किया जाता है । इसी हाथ को रेचक करने से उत्साह, भीड़ का आलोड़न एवं पंखों से १. ना० शा० के चतुर्थ अध्याय में वर्णित एक करण ।

पृष्ठ 452

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नवमोऽध्यायः ३६३० ऊपर उड़ने का अभिनय होता है । इसी मुद्रा के दोनों हाथों के रगड़ने से किसी वस्तु का धोना, दबाना, गूंथना और पसीना, पर्वत का उठाना या उखाड़ना, प्रदर्शित किया जाता है ॥ १ ९.२५ ॥

दशाख्याश्च शताख्याश्च सहस्राख्यास्तथैव च ।

पताकाभ्यां तु हस्ताभ्यामभिनेयः प्रयोक्तृभिः ॥ २६ ॥

एवमेष प्रयोक्तव्यः स्त्रीपुंसाभिनये करः ।

अतः परं प्रवक्ष्यामि त्रिपताकस्य लक्षणम् ॥ २७ ॥

( इस प्रकार प्रयोक्तागण को पताका हाथों से दस, सौ, या बारह हजार प्रकार के अभिनय प्रस्तुत करने चाहिए । ) स्त्री एवं पुरुष को अभिव्यक्त करने के लिए भी इसी हस्त का प्रयोग होता है । अब त्रिपताक हस्त का लक्षण बतलाऊँगा ॥ २६-२७ ॥

पताके तु यदा वक्राऽनामिका त्वङ्गुलिर्भवेत् ।

त्रिपातकः स विज्ञेयः कर्म चास्य निबोधत ॥ २८ ॥

२-त्रिपताक - पताक हस्त मुद्रा में ही जब तीसरी अंगुली मुड़ी होती है तो उसे 'त्रिपताक' हस्त कहा जाता ॥ २८ ॥

आवाहनमवतरणं विसर्जनं वारणं प्रवेशश्च ।

उन्नामनं प्रणामो निदर्शनं विविधवचनं च ॥ २ ९ ॥

उष्णीषमुकुटधामङ्गल्यद्रव्याणां रणनासास्यश्रोत्रसंवरणम्स्पर्शः शिरसोऽथ सन्निवेशश्च॥। ३० ॥

अस्यैव चाङ्गुलीभ्यामधोमुख प्रस्थितोत्थितचलाभ्याम् ।

लघुखगपतनस्रोतोभुजगभूमरादिकान् कुर्यात् ॥ ३१ ॥

अश्रुप्रमार्जनं तिलकविरचनं रोचनालभनकं च ।

त्रिपताकानामिकयोः स्पर्शनमलकस्य कर्तव्यम् ॥ ३२ ॥

आवाहन, अवतरण, अलग करने ( विसर्जन ) निषेध ( वारण ), आने, किसी वस्तु को उठाने, प्रणाम करने, तुलना करने, विकल्प बताने, मांगलिक वस्तुओं को छूने या सिर पर धारण करने, पगड़ी या मुकुट पहनने एवं नाक, मुख व कान को ढँकने में इस मुद्रा का प्रयोग किया जाता है । इसी स्थिति में यदि अंगुलियाँ निम्नाभिमुख हो एवं ऊपर नीचे चलित हो रही हो तो इससे छोटे पक्षियों के उड़ने, जलस्रोत, सर्प एवं भ्रमर आदि का प्रदर्शन किया जाता है । त्रिपताक १. अभिनवभारती में इन सभी निर्दिष्ट परिस्थितियों में पताक हस्त-मुद्रा के विनियोग का विस्तृत वर्णन दिया गया है ।

पृष्ठ 453

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-३६४ नाट्यशास्त्रम् हस्त की अनामिका अंगुली से आँसू पोंछने, तिलक या रोचना' लगाने एवं अलकों -को छूने काअभिनय किया जाता है ॥ २ ९ -३२ ॥ स्वस्तिको त्रिपताकौ तु गुरूणां पादवन्दने ॥। ३३ ॥ परस्पराग्रसंश्लिष्टो कार्याबुद्वाहदर्शने । विच्युतौ चलितावस्थौ कर्तव्यौ नृपदर्शने तिर्यक्स्वस्तिकसम्बद्धौ स्यातां तो ग्रहदर्शने ॥ ३४ ॥

तपस्विदर्शने कार्यावृधव चापि पराङ्मुखौ । ॥। ३५ ॥ परस्पराभिमुखो च कर्तव्यौ द्वारदर्शने उत्तानाधोमुखौ कार्यावग्रे वक्त्रस्य संस्थितौ ॥। ३६ ॥ वडवानलसङ्ग्रामे मकराणां च दर्शने । अभिनेयास्त्वनेनैव वानरप्लवनोर्मयः पवनश्च स्त्रियश्चैव नाट्ये नाट्यविचक्षणैः ॥ ३७ ॥

। सम्मुख प्रसृताङ्गुष्ठः कार्यो बालेन्दुदर्शने पराङ्मुखस्तु कर्तव्यो याने नृणां प्रवोक्तृभिः ॥ ३८ ॥

दोनों त्रिपताक हस्तों को स्वस्तिक करण में अवस्थित करके गुरुजन के चरण -स्पर्श का अभिनय किया जाता है । इस प्रकार के दो हाथों के अग्रभाग को -परस्पर मिला कर विवाह बन्धन का प्रदर्शन किया जाता है तथा अलग करके स्थिति भेद रखने के द्वारा राजा के दर्शन का अभिनय किया जाता है । इन्हीं हाथों के तिर्यक स्थिति में स्वस्तिक करण में रहने से ग्रहदर्शन दिखाया जाता है । दोनों त्रिपताक हस्तों को उल्टा करके उपर उठाने से तपस्वी का अभिनय होता है । •इन्हीं को एक दूसरे के सामने रखने से द्वार को प्रदर्शित किया जाता है । बड़वाग्नि, -युद्ध एवं मगर का अभिनय करने के लिए दोनों त्रिपताक निम्नाभिमुख हस्तों को मुख के सामने रखते हुए फैलाया जाता है । इसी के द्वारा बानरों के कूदने, वायु एवं लहरों की गति का प्रदर्शन किया जाता है । इसी मुद्रा में स्थित हाथ को सामने की ओर फैला कर बाल चन्द्रमा का प्रदर्शन किया जाता है एवं इसी को पीछे की ओर ले जाकर राजा के प्रयाण को अभिनीत किया जाता है ॥ ३३-३८ ॥

त्रिपताके यदा हस्ते भवेत्पृष्ठावलोकिनी ।

तर्जनी मध्यमायाश्च तदासौ कर्तरीमुखः ॥ ३ ९ ॥

१. अभिनवगुप्त के मत में रोचना से चन्दनादि का तात्पर्य है ( रोचना चन्दनादिना ) । श्री घोष ने रोचना को गोरोचना मानते हुए गोमूत्र से बने एक पीले द्रव्य के रूप में इसका उल्लेख किया ।

पृष्ठ 454

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नवमोऽध्यायः ३६५३ ३ — कर्तरीमुख — त्रिपताक हस्त की पहली ( तर्जनी ) और दूसरी ( मध्यमा)" अंगुली को पीछे की ओर झुकाने से ' कर्तरीमुख' हस्त होता है ॥ ३ ९ ॥

पथि चरणरचनरञ्जनरङ्गणकरणान्यधोमुखेनैव ।

ऊर्ध्वमुखेन तु कुर्याद्दष्ट शृङ्ग च लेख्यञ्च ॥ ४० ॥

पतनमरणव्यतिक्रमपरिवृत्तवितर्कितं तथा न्यस्तम् ।

भिन्नवलितेन कुर्यात् कर्तर्यास्याङ्गुलिमुखेन ॥। ४१ ॥

संयुतकरणो वा स्यादसंयुतो वा प्रयुज्यते तज्ज्ञैः ।

रुरुचमरमहिष सुरगजवृषगोपुरशैलशिखरेषु ॥ ४२ ॥

जब यह हाथ निम्नाभिमुख होता है तो इससे मार्ग प्रदर्शन एवं चरणों के अलंकरण या रंजन को अभिव्यक्त किया जाता है । इसकी अंगुलियों के ऊपर की ओर रखने से काटने, सींग तथा लेख को अभिव्यक्त करते हैं । जब अंगुलियाँ विपरीत दिशा में गतिशील होती हैं तो उससे नीचे गिरने, मरण, व्यतिक्रम, फिर से अपनी जगह वापस लौटने ( परिवृत्ति ), वितर्क एवं न्यास का प्रदर्शन किया जाता है । इस प्रकार के एक अथवा संयुक्त हस्तों से हिरन, चमर, बारह- सिंहा, भैंसा, ऐरावत, बैल, गोपुर तथा पर्वत की चोटियों का अभिनय किया जाता है ॥ ४०-४२ ॥

यस्याङ्गुल्यस्तु विनताः सहाङ्गुष्ठेन चापवत् ।

सोऽर्धचन्द्र इति ख्यातः करः कर्मास्य वक्ष्यते ॥ ४३ ॥

एतेन बालतरवः शशिलेखाकम्बु कलशवलयानि ।

निर्घाटनमायस्तं मध्यौपम्यं च पीनं च ॥ ४४ ॥

रशनाजघनकटीनामाननतलपत्रकुण्डलादीनाम् ।

४५ ॥ कर्तव्यो नारीणामभिनययोगोऽर्धचन्द्रेण ॥

४ — अर्धचन्द्र --जिस हाथ की अंगुलियाँ अंगूठे के साथ धनुष की तरह झुकी रहती हैं उसे 'अर्धचन्द्र' हस्त कहते हैं । इसके द्वारा प्रदर्शित कर्मो की व्याख्या आगे की गई है । इस (अर्धचन्द्र हस्त ) से छोटे छोटे पेड़, चन्द्रमा की लेखा, शंख, कलश, वलय, जबर्दस्ती निकालना ( निर्घाट ), प्रयास, कमर की उपमा एवं स्थूलता को अभिव्यक्त किया जाता है । इसी से करधनी, जघन, कटि, मुख, कपोलादि पर आलेखित रचना (तलपत्र ) एवं कुण्डल आदि का भी प्रदर्शन किया जाता है ॥ ४३-४५ ॥

आद्या धनुर्नता कार्या कुञ्चितोऽङ्गुष्ठकस्तथा ।

शेषाभिन्नोर्ध्ववलिता ह्यरालेऽङ्गुलयः करे ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 455

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३६६ नाट्यशास्त्रम् ५- अराल - जब हाथ की छोटी अंगुली धनुष के समान झुकी हो, अंगूठा मुड़ा हुआ हो तथा शेष सब अंगुलियाँ अलग अलग होकर ऊर्ध्वमुखी रहती हैं तो उसे " अराल' हस्त कहते हैं ॥ ४६ ॥

एतेन सत्त्वशौण्डीर्यवीर्य कान्तिधृतिदिव्यगाम्भीर्यम् । तिर आशीर्वादाश्च तथा भावा हितसंज्ञकाः कार्याः ॥ ४७ ॥

एतेन पुनः स्त्रीणां केशानां सङ्ग्रहस्तथोत्कर्षः ।

सर्वाङ्गिकं तथैव च निर्वर्णनमात्मनः कार्यम् ॥ ४८ ॥

कौतुकविवाहयोगः प्रदक्षिणेनैव सम्प्रयोगं च ।

अङ्गुल्यग्रस्वस्तिकयोगान्परिमण्डलेनैव ॥ ४ ९ ॥

प्रादक्षिण्यं परिमण्डलं च कुर्यान्महाजनं चैव ।

यच्च महीतलरचितं द्रव्यं तच्चाभिनेयं स्यात् ॥ ५० ॥

आह्वानं च निवारणनिर्माणे चाप्यनेकवचः । स्वेदस्य चापनयने गन्धाघ्राणे शुभ्रः शुभे चैष ॥ ५१ ॥ -का

त्रिपताकहस्तजानि तु पूर्वं यान्यभिहितानि कर्माणि ॥। तानि त्वरालयोगात्स्त्रीभिः सम्यक्प्रयोज्यानि ॥ ५२ इससे सत्त्व, शौर्य, वीर्यं कान्ति, धैर्य, दिव्यता, गम्भीरता, आशीर्वाद एवं अन्य मंगलकारी भावों को अभिव्यक्त करना चाहिए । अराल हस्त से स्त्रियों के केश न्तो -बंन्धन एवं अपने शरीर के निरीक्षण का अभिनय किया जाता है । जब दोनों अल हस्त एक दूसरे के चतुर्दिक घूम रहे हों व उनकी अंगुलियाँ स्वस्तिक रूप में मिल रही हों तो उससे कौतुक, पाणिग्रहण, एवं प्रदक्षिणा का अभिनय किया,, जाता है । इन्हीं मुद्राओं से प्रदक्षिणा करने चारों ओर से घेरने जनसमुदाय एवं च,,, जमीन पर वस्तुओं के सजाने का प्रदर्शन करते हैं । पुकारने निषेध करने उखाड़ने इसक- अनेक बातों को कहने, पसीना पोंछने एवं गंध लेने के प्रसंग में सामान्यतया 'त्रिपताक' हस्त का प्रयोग अपेक्षित होने पर भी इन परिस्थितियों में स्त्रियों को - अराल हस्त मुद्रा का प्रयोग करना चाहिए ॥ ४७-५२ ॥ अरालस्य यदा वक्रानामिका त्वङ्जुलिर्भवेत् । शुकतुण्डस्तु स करः कर्म चास्य निबोधत ॥ ५३ ॥ -के थ

-शरी ६-शुष्कतुण्ड – अराल हस्त मुद्रा में यदि अनामिका को टेढ़ा कर दिया जाए तो उसे 'शुकतुण्ड' हस्त कहते हैं । के म - " - १. कौतुक कौतुकं विवाहात् पूर्वभावी वधूवरयोदाचारः अन्तर्विवाहः में अर्थ " - प्रसिद्धः अभिनवभारती जाता

पृष्ठ 456

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नवमोऽध्यायः ३६७

एतेन त्वभिनेयं नाहं न त्वं न कृत्यमिति चार्थे ।

आवाहने विसर्गे धिगिति च वचने सावज्ञम् ॥ ५४ ॥

इससे " मैं नहीं " " तुम नहीं " "यह करणीय नहीं " हैं, अवाहन विसर्जन एवं, तिरस्कारपूर्वक धिक्कारने के भाव प्रदर्शित किए जाते हैं ॥ ५४ ॥

अङ्गुल्यो यस्य हस्तस्य तलमध्येऽग्रसंस्थिताः ।

तासामुपरि चाङ्गुष्ठः स मुष्टिरिति संज्ञितः ॥ ५५ ॥

७- मुष्टि - जिस हाथ की अंगुलियाँ हथेली के बीच में हों और उनके ऊपर अंगूठा रखा हो तो उसे ' मुष्टि' हस्त कहते हैं ॥ ५५ ॥

एष प्रहारे व्यायामे निर्गमे पीडने तथा ।

संवाहनेऽसियष्टीनां ग्र तथा ॥ ५६ ॥

मारने, कसरत करने, निकलने, दबाने', संवादन', तलवार की मूंठ व भाले -का डण्डा पकड़ने की क्रियाएं इस मुद्रा से प्रदर्शित की जाती हैं ॥ ५६ ॥

अस्यैव च यदा मुष्टेरूर्वोऽङ्गुष्ठः प्रयुज्यते ।

हस्तः स शिखरो नाम तदा ज्ञेयः प्रयोक्तृभिः ॥ ५७ ॥

८-शिखर - मुष्टि हस्त मुद्रा में ही जब अंगूठा ऊपर की ओर उठा हुआ हो तो इसे शिखर मुद्रा कहते हैं ॥ ५७ ॥

रश्मिकुशाङ्कुशधनुषां तोमरशक्तिप्रमोक्षणे चैव । अधरोष्ठपादरञ्जनमलकस्योत्क्षेपणे चैव ॥ ५८ ॥ लगाम, कुश, अंकुश, धनुष लेने, तोमर या शक्ति फेंकने, नीचे या ऊपर ओठ

व चरण रंगने तथा केशों को ऊपर की ओर उठाने के भावों का अभिनय करने में इसका प्रयोग होता है ॥ ५८ ॥

अस्यैव शिखराख्यस्य द्व्यङ्गुष्ठकनिपीडिता ।

यदा प्रदेशिनी वक्रा स कपित्थस्तदा स्मृतः ॥ ५ ९ ॥

१. पीडन - अभिनवगुप्त के अनुसार इसका अर्थ दूध दुहने के समय गाय आदि के थनों को दबाना है ( स्तनपीडने महिष्यादि दोहने ) हमारे विचार में यह -शरीर को दबाने का बोधक है । आगामी पद से भी यह विचार पुष्ट होता है । २. संवाहन - अभिनवभारती में इसे "मृत्पीडन " माना गया है । श्री घोष के मत में यह सिर धोने का वाचक है । किन्तु इसे देह चाँपेन या मुक्की लगाने: जातामें अर्थहैमें । भी ले सकते हैं जैसा कि थके शरीर को आराम देने के लिए किया

पृष्ठ 457

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नाट्यशास्त्रम् ३६८ - शिखर हस्त की पहली अंगुली ( प्रदेशिनी ) को टेढ़ा करके ९- कपित्थ जाता है तो उसे ' कपित्थ' हस्त कहते हैं ॥ ५ ९ ॥ जब अंगूठे से दबाया 1 असिचापचक्रतोमरकुन्तगदाशक्तिवज्रवर्गाणि तु कार्य पथ्यञ्च सत्यञ्च ॥ ६० ॥ शस्त्राण्यभिनेयानि

, चक्र, तोमर, कुन्त, गदा, शक्ति, वज्र, जैसे शस्त्रों का तथा,उचिततलवारव सत्य धनुषकार्यों के निर्देशन का अभिनय इससे सम्पन्न होता है ॥ ६० ॥

उत्क्षिप्तवक्रा तु यदानामिका सकनीयसी ।

अस्यैव तु कपित्थस्य तदासौ खटकामुखः ॥ ६० ॥

( हस्त मुद्रा ) की तीसरी ( अनामिका ) और चौथी - ' खटकामुख' (कनिष्ठ१०-) अंगुलियाँखटकामुखजब ऊपरकपित्थकी ओर उठी व झुकी रहती हैं तो उस हस्त कहा जाता है ॥ ६० ॥

होत्रं हव्यं छत्रं प्रग्रहपरिकर्षणं व्यजनकं च ॥। ६१ ॥ आदर्शधारणं खण्डनं तथा पेषणं चैव मुक्ताप्रालम्बसङ्ग्रहं चैव ॥। ६२ ॥ आयतदण्डग्रहणंस्रग्दामपुष्पमालावस्त्रान्तालम्बनं चैव 1 मन्थनशरावकर्षणपुष्पापचयप्रतोदकार्याणि ॥ ६३ ॥ कार्यं च

अङ्कुशरज्ज्वाकर्षणस्त्रीदर्शनमेव पकड़ने, कूटने- पकड़ने, पंखा हाँकने, आइना ',,, होत्र एवं हव्य छत्र लगाम माला पिरोने फूलों आदि,,, पीसने विपुलाकार दण्डके कोकोनेधारणपकड़नेकरने, मन्थनमोतियों, बाणकीनिकालने, फूल, अंकुश लगाने,. केलगामहार पहननेखींचने वस्त्रोंतथा स्त्री दर्शन आदि इसी हस्त मुद्रा से प्रदर्शित किये जाते हैं ॥ ६१-६३ ॥ संप्रसारिता । खटकारूपे यदा हस्ते तर्जनी नाम तदा ज्ञेयः प्रयोक्तृभिः ॥ ६४ ॥

हस्तस्सूचीमुखो क्रम के अनुसार इस श्लोक की संख्या ६१ होनी चाहिए किन्तु नाट्यशास्त्र १. संस्करण में यहां साठ की ही संख्या पुनरावृत्ति की गयी है । ( के बड़ौदा के अनुसार होत्र स्रवादि के उठाने को स्र गादि- ) उत्तानेन२. )अभिनवगुप्ततथा हव्य आज्यादिकी व्याख्याके देने को ( हव्यमाज्याद्यामुखेन कहते हैं । स्थल पर प्रयुक्त खण्डन शब्द का!( अभिनवगुप्त के अनुसार ) अर्थ ताड़पत्र आदि३.से पंखा झलना है । इस अर्थ को अनुपयुक्त बताते हुए श्रीघोष ने इसका अर्थ 'अलंकृत चित्र बनाना' किया है । हमने खण्ड धातु से सम्बन्धित करके इसका अर्थ टुकड़े- टुकड़े करना अर्थात् कुब्बा किया है ।

पृष्ठ 458

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नवमोऽध्यायः ३६ ९ ११ - सूचीमुख - खटकामुख हस्त की पहली ( तर्जनी ) अंगुली तब खूब फैली हुई होती है तो उसे सूचीमुख' नामक हस्तमुद्रा कहते हैं ॥ ६४ ॥

अस्य विविधान्प्रयोगान्वक्ष्यामि समासतः प्रदेशिन्याः ।

ऊर्ध्व-नत-लोल- कम्पितविजृम्भितोद्वाहितचलायाः ॥ ६५ ॥

इस मुद्रा में प्रदेशिनी ( अंगूठे के पास की ) अंगुली के उठी हुई, झुकी हुई, चञ्चल, काँपती हुई, टेढ़ी करके फैलाई हुई, ऊपर जाती हुई आदि अनेक स्थितियों में जो प्रयोग किये जाते हैं उन्हें मैं आगे बतलाऊंगा ॥ ६५ ॥

चक्रं तटित्पताकामञ्जर्यः कर्णचूलिकाश्चैव ।

कुटिलगतयश्च सर्वे निर्देश्यास्साधुवादाश्च ॥ ६६ ॥

बालोरगबल्यवधूमदीपवल्लीलताशिखण्डाश्च 1 परिपतनवक्र मण्डलमभिनेयान्यूर्ध्वलोलितया 110 11

भूयश्चोर्ध्वविरचिता तारा घोणैकदण्डयष्टिषु च ।

विनता च तथा कार्या दंष्ट्रिषु च तथास्ययोगेन ॥ ६८ ॥

पुनरपि मण्डलगतया सर्वग्रहणं तथैव लोकस्य ।

प्रणतोन्नते च कार्ये ह्याद्ये दीर्घे च दिवसे च ॥ ६ ९ ॥

वदनाभ्याशे कुञ्चितविजृम्भिता वाक्यरूपणे कार्या ।

श्रवणाभ्याशे वक्रा विजृम्भणे वाक्यरूपणावसरे ॥ ७० ॥

मेति वदेति च योज्या प्रसारितोत्कम्पितोत्ताना । कार्या प्रकम्पिता रोषदर्शने स्वेदरूपणे चैव1 ॥ ७१ ॥ कुन्तलकुण्डलाङ्गदगण्डाश्रयसंश्रयेऽभिनये

गर्वेऽहमिति ललाटे रिपुनिर्देशे तथैव च क्रोधे ॥ ७२ ॥

कोऽसाविति निर्देशे च कण्डूर्णकयने चैव । चक्र, विद्युत, पताका, मंजरी, कर्णपूर, असमगति, एवं वाहवाहीं ( साधुवाद ) कर प्रदर्शन करने में प्रदेशिनी ऊपर उठी हुई एवं चञ्चल स्थिति में होती है । इसी से बाल सर्प, बल्लरियाँ, धूम्र, दीप, लता, काकपक्ष, नीचे गिरना, वक्रता तथा मण्डल का अभिनय भी होता है । जब प्रदेशिनी ऊपर उठी हो तो उससे तारा- दर्शन नासिका, एक की संख्या, लाठी एवं दण्ड को प्रदर्शित किया जाता है । इस अंगुली १. “ सूच्याकारमेवास्य मुखम्" अभिनवगुप्त की इस व्याख्या के अनुसार सुई के समान आकृति होने से इसका नाम सूचीमुख होता है । २. यहाँ प्रयुक्त विजृम्भता पद का तात्पर्य अभिनवगुप्त ने ' विजृम्भिता कुश्चिता प्रसारिता' बताया है जिसका हमने भी अनुसरण किया है । श्रीघोष ने उसका अनुवाद 'ऊपर नीचे चलाना ' किया है । २४ ना०

पृष्ठ 459

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३७० नाट्यशास्त्रम् को झुकाकर मुख से मिलाने पर किसी दांतों वाले जीव का प्रदर्शन किया जाता है । इसी हस्त को गोलाकार घुमाने से किसी का सब कुछ ले लेने का अभिनय किया जाता हैं । प्रदेशिनी अंगुली की बारी- बारी से ऊपर उठाने व नीचे गिराने के द्वारा चिन्ता तथा दिन गिनने का बोध कराया जाता है । इसी अंगुली को मोड़कर मुख के सामने ऊपर नीचे घुमाने से वाक्य तथा वचनों की अभिव्यक्ति की जाती है । 'नहीं' तथा 'कहो' के भाव को प्रदर्शित करने के लिए प्रदेशिनी अंगुली फैली हुई, काँपती तथा ऊपर नीचे हिलती रहती है । क्रोध के प्रदर्शन, पसीना पोंछने, केश कुण्डल तथा अंगद के प्रदर्शन तथा कपोल की सज्जा, अभिमानवश 'मैं हूँ' कहने, 'यह कौन है' ऐसा प्रश्न करने तथा कान खुजलाने के अभिनय में प्रदे-शिनी को माथे के समीप ले जाना चाहिये ॥ ६६-७३ ॥ संयुक्ता संयोगे कार्या विश्लेषिता वियोगे च ॥ ७३ । संयोग को प्रदर्शित करने के लिए इन ( सूचीमुख ) हस्तों को संयुक्त एवं वियोग बताने के लिए वियुक्त होना चाहिए ॥ ७३ ॥

कलहे स्वस्तिकयुक्ता परस्परोत्पीडिता बन्धे ।

द्वाभ्यां तु वामपार्श्वे दक्षिणतो दिननिशावसानानि ॥ ७४ ॥

अभिमुखपराङ्मुखीभ्यां विश्लिष्टाभ्यां प्रयुञ्जीत । कलह की अभिव्यक्ति के लिए इन हाथों को स्वस्तिक स्थिति में होना चाहिए एवं बन्धन को प्रदर्शित करने के लिए एक दूसरे से दबाना चाहिए । जब परस्परा- भिमुख एवं असंयुक्त दोनों मुख हाथ बायीं ओर हो तो वे दिवस के अवसान का तथा दायीं ओर हों तो रात के अन्त का निर्देश करते हैं ॥ ७४-७५ ॥ द्वाभ्यां प्रदर्शयेन्नित्यं सम्पूर्णं चन्द्रमण्डलम् ॥ ७५ ॥

श्लिष्टा ललाटे शक्रस्य कार्या हघुत्तानसंश्रया । ( इन दोनों हाथों से सदा सम्पूर्ण चन्द्रमण्डल का अभिनय किया जाना चाहिए । उपर उठा कर ललाट पर रखने से शक्र का प्रदर्शन होता है । )' ॥ ७५-७६ ॥ परिमण्डलं भ्रमितया मण्डलमादर्शयेच्च चन्द्रस्य ॥ ७६ ॥

हरनयने च ललाटे शक्रस्य च तिर्यगुत्ताना । हाथों को गोलाकार घुमाने से चन्द्रमा के मण्डल का, मस्तक पर रखने से १. यह श्लोक भी प्रक्षिप्त माने जाने के बावजूद श्लोकों की क्रम संख्या में सम्मिलित है ।

पृष्ठ 460

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नवमोऽध्यायः ३७१ शिव के नेत्र का तथा तिरछा उठाने से इन्द्र के नेत्र का प्रदर्शन करना चाहिए ॥ ७६-७७ ॥ पुनरपि च भ्रमिताग्रा रूपशिलावर्तयन्त्रशैलेषु ॥ ७७ ॥

परिवेषणे तथैव हि कार्या चाधोमुखी नित्यम् ।

श्लिष्टा ललाटपट्टेष्वधोमुखी शम्भुरूपणे कार्या ॥ ७८ ॥

शक्रस्याप्युत्ताना तज्ज्ञैस्तिर्यस्थता कार्या । ( आगे की ओर घुमा कर इस हाथ से किसी वस्तु की आकृति, शिला, भंवर, यान्त्रिक कौशल तथा पर्वत का अभिनय किया जाता है । इसी के निम्नाभिमुख रखने से खाना परसने की अभिव्यक्ति की जाती है । शिव की आकृति बताने के लिए इन हाथों को नीचे की ओर झुके ललाट के पास रखना चाहिए तथा शक्र का अभिनय करने के लिए हाथों को उठाकर तिरछा रखना चाहिए । )" ॥ ७७-७९ ॥ यस्याङ्गुल्यस्तु विरलाः सहाङ्गुष्ठेन कुञ्चिताः ॥ ७ ९ ॥ ऊर्ध्वा ह्यसङ्गताग्राश्च स भवेत्पद्मकोशकः । १२- पद्मकोश - जिस हस्त मुद्रा में अंगूठे के साथ सभी अंगुलियाँ अलग- अलग फैली रहती हैं और उनके अलग भाग ऊपर उठ कर मुड़ जाते हैं उसे पद्मकोश कहते हैं ॥ ७९-८० ॥ बिल्वकपित्थफलानां ग्रहणं कुचदर्शनं च नारीणाम् ॥ ८० ॥ 15 ग्रहणे ह्यामिषलाभे भवन्ति ताः कुञ्चिताग्रास्तु । बहुजातिबीजपूरकमामिषखण्डं च निर्देश्यम् ॥ ८१ ॥

बेल, कैथे आदि फलों को पकड़ने तथा स्त्रियों के वक्ष को प्रदर्शित करने के 'लिए इसका प्रयोग होता है । किन्तु इनको लेने या मांस मिलने का प्रदर्शन करने के समय इस हस्त का अग्रभाग कुचित कर लिया जाता है । ( इसी से मांस खण्ड

का बोध भी कराया जाता है । ) ॥ ८०-८१ ॥

देवार्चनबलिहरणे समुद्गके साग्रपिण्डदाने च । कार्यः पुष्पप्रकरश्च पद्मकोशेन हस्तेन ॥ ८२ ॥ हाथ को इस पद्मकोश मुद्रा से ही देवपूजन, बलि देने, पिटारी ( समुद्गक ),

'पिण्डदान तथा फूलों के गुच्छे का अभिनय किया जाता है ॥ ८२ ॥

१. इन प्रसंगों को भी बड़ौदा संस्करण में प्रक्षिप्त माना गया है किन्तु क्रम संख्या के अन्तर्गत रखा गया है । २. इन प्रसंगों को भी बड़ौदा संस्करण में प्रक्षिप्त माना गया है किन्तु क्रम संख्या के अन्तर्गत रखा गया है ।