भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 441–450

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 441–450

पृष्ठ 441

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३५२ नाट्यशास्त्रम् 'घूर्ण', काँपते हुए गालों को 'कम्पित', सिकुड़े हुए गालों को ' कुञ्चित' एवं नैसर्गिक अवस्था में स्थित गालों को ' सम ' कहते हैं ॥ १३४-१३५ ॥ कपोलों की छः चेष्टाओं का विनियोग- । गण्डयोर्लक्षणं प्रोक्त विनियोगं निबोधत क्षामं दुःखेषु कर्त्तव्यं प्रहर्षे फुल्लमेव च ॥ १३६ ॥

। घूर्णमुत्साहगर्वेषु रोषहर्षेषु कम्पितम् कुञ्चितं च सरोमाञ्च स्पर्शे शीते भये ज्वरे ॥ १३७ ॥

। प्राकृतं शेषभावेषु गण्डकर्म भवेदिति यह गालों के लक्षण कहे गये हैं । अब इनके उपयोग के विषय में जानिए - दुःख में 'क्षाम', प्रसन्नता में ' फुल्ल ' उत्साह एवं अभिमान में ' घूर्ण' क्रोध तथा प्रसन्नता में 'कम्पित' रोमान्च, स्पर्श, ठंडक, भय एवं ज्वर की अवस्था में 'कुचित' एवं शेष समस्त अवस्थाओं में 'सम' कपोल का प्रयोग करना चाहिए ॥ १३६-१३८ ॥ ॥ १३८ ॥ विवर्तनं कम्पनं च विसर्गो विनिगूहनम्

। संदष्टकं समुद्गं च षट्कर्माण्यधरस्य तु नीचे के ओठ में षड्विध कर्म होते हैं- ( १ ) विवर्तन, ( २ ) कम्पन, ( ३ ) विसर्ग, ( ४ ) विनिगूहन, ( ५ ) संदष्टक एक ( ६ ) समुद्गक ॥ १३८-१३९ ॥ ओठों की छः चेष्टाओं के नाम- ॥ १३ ९ ॥ विकूणनं विवर्त्तस्तु वेपनं कम्पनं स्मृतम्

विनिष्क्रामो विसर्गस्तु प्रवेशो विनिगूहनम् ।

संदष्टकं द्विजैर्दष्टं समुद्गः सहजोन्नतिः ॥ १४० ॥

ओठों को सिकोड़कर चोंच जैसी बनाना 'विवर्तन ', ओठों को कँपाना 'कम्पन', ओठों को फैलाना ' विसर्ग', अन्दर की ओर सिकोड़ना 'विनिगूहन' दाँत से ओठ काटना ' संदष्टक' । ओठों को साधारण ढंग से उन्नत अवस्था में रखना ' समुद्गक ' कहा जाता है ॥ १३ ९ -१४० ॥ इत्योष्ठलक्षणं प्रोक्त विनियोगं निबोधत । यह अधर के लक्षण बताए गये हैं । अब इनके विनियोग को बताया जायेगा । ओठों की छः चेष्टाओं के लक्षण- असूयावेदनावज्ञाहास्यादिषु विवर्तनम् ॥ १४१ ॥ कम्पनस्त्रीणां विलासे बिब्बोकेवेदनाशीतभयविसर्गो रंजनेरोषजवादिषुतथा ॥। १४२ ॥

पृष्ठ 442

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अष्टमोऽध्यायः ३५३ • विनिगूहनमायासे सन्दष्टं क्रोधकर्मसु । समुद्गस्त्वनुकम्पायां चुम्बने चाभिनन्दने ॥ १४३ ॥

इत्योष्ठकर्माण्युक्तानि चिबुकस्य निबोधत । डाह, पीड़ा, तिरस्कार, हास्य आदि भावों में 'विवर्तन' का पीड़ा, सर्दी, भय, क्रोध, वेग आदि में 'कम्पन ' का, स्त्रियों के साथ रमण, तटस्थता एवं ओठ रंगते समय ' विसर्ग' का प्रयास करते समय 'विनिगूहन ' का क्रोध में 'सन्दष्ट' का, दया

चुम्बन एवं अभिनन्दन के समय ' समुद्गक' अधर का प्रयोग किया जाता है ।

यह अधर की मुद्रायें बताई गयी । अब चिबुक के कर्म बताये जायेंगे ॥। १४१-१४४ ॥

चिबुक की सात चेष्टाओं के नाम- कुट्टनं खण्डनं छिन्न चुक्कितं लेहितं समम् ॥ १४४ ॥

दष्टञ्च दन्तक्रियया चिबुकन्त्विह लक्ष्यते । ( १ ) कुट्टन, ( २ ) खण्डन, ( ३ ) छिन्न, ( ४ ) चुक्कित, ( ५ ) लेहित, ( ६ ) सम एवं ( ७ ) दष्ट- यह चिबुक के कर्म हैं ॥ १४४-१४५ ॥ चिबुक की सात चेष्टाओं के लक्षण- कुट्टनं दन्तसंघर्षः संफोटः खण्डनं मुहुः ॥ १४५ ॥

छिन्नं तु गाढसंश्लेषश्चुक्कितं दूरविच्युतिः ।

लेह जिह्वया लेहः किञ्चिच्छ्लेषः समं भवेत् ॥ १४६ ॥

दन्तैर्दष्टेऽधरेदष्टमित्येषां विनियोजनम् । ऊपर नीचे के दाँतों के परस्पर भींचने को 'कुट्टन', दाँतों के पुनः पुनः रगड़ने ( किटकिटाने ) को 'खण्डन ", परस्पर बिल्कुल चिपकाने को 'छिन्न', दूर तक फैलने पर ' चुक्कित', जीभ से ओठ चाटने पर 'लेहित', कुछ कुछ अलग होने पर 'सम', दाँतों से निचला ओंठ काटने पर 'दष्ट' चिबुक होता है । अब इनके विनियोग को सुनिए ॥ १४५-१४७ ॥ १. श्रीघोष ने अपने अनुवाद में इस पूरे खण्ड को ओष्ठद्वय के सन्दर्भ में माना है । हमारे मत में जब यहाँ दाँतों का प्रसंग पहले ही से चल रहा है तो अन्तिम पद में आने वाले अधर से अन्वय की अधिक सार्थकता नहीं है । अर्थ की दृष्टि से भी ओठों का परस्पर बारम्बार मिलना तो बड़बड़ाने की क्रिया का द्योतक है जो कि यहाँ अधिक उपयुक्त नहीं लगता । इसकी अपेक्षा दाँतों का परस्पर बार- बार मिलना दाँत किटकिटाने का बोधक है और अधिक सटीक प्रतीत होता है । •आगे आने वाले इसके विनियोग को देखते हुए भी इसका संयोग ओंठ की अपेक्षा दाँतों से करना अधिक ठीक लगता है । २३ ना०

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३५४ नाट्यशास्त्रम् चिबुक कीभयशीतज्वरक्रोधग्रस्तानांसात चेष्टाओं का विनियोग- कुट्टनं भवेत् ॥ १४७ ॥ जपाध्ययनसल्लापभक्ष्ययोगे च खण्डनम् ।

छिन्नं व्याधौ भये शीते व्यायामे रुदिते मृते ॥ १४८ ॥

जृम्भणे चुक्कितं कार्यं तथा लौल्ये च लेहनम् ।

समं स्वभावभावेषु सन्दष्टं क्रोधकर्मसु ॥ १४ ९ ॥

इति दन्तोष्ठजिह्वानां करणे चिबुकक्रिया । भय, सर्दी, बुखार एवं क्रोध के प्रदर्शन के समय कुट्टन, जप, अध्ययन, सम्वाद एवं खाने के समय खण्डन, बीमारी, भय, सर्दी, कसरत, रुदन तथा मृत्यु के अवसर पर छिन्न, जंभाई लेने में चुक्कित, लालच के प्रदर्शन में लेहित, स्वाभाविक अवस्था में सम तथा क्रोध के प्रदर्शन में सन्दष्ट चिबुक का प्रयोग किया जाना चाहिये । दाँत, ओठ एवं जिह्वा के सन्दर्भ में यह चिबुक के कर्म कहे गये हैं ॥ १४७-१५० ॥ मुख की छः चेष्टाओं के नाम- विनिवृत्तं च विधुतं निर्भुग्नं भुग्नमेव च ॥। १५० ॥ विवृत्तञ्च तथोद्वाहि कर्माण्यत्रास्यजानि तु । ( १ ) विनिवृत्त, (२ ) विधुत, ( ३ ) निर्भुग्न, ( ४ ) भुग्न, ( ५ ) विवृत एवं ( ६ ) उद्वाहि- यह छः मुख की क्रियायें होती हैं ॥ १५०-१५१ ॥ मुख की छः चेष्टाओं के लक्षण- व्यावृत्तं विनिवृत्तं स्याद्विधुतं तिर्यगायतम् ॥ १५१ ॥

अवाङ्मुखत्वं निर्भुग्नं व्यार्भुग्नं किञ्चिदायतम् ।

विश्लिष्टोष्ठं च विवृत्तमुद्वाह्याक्षिप्तमेव च ॥। १५२ ॥

आयताकार खुले हुए मुख को 'विधुत' कहते है एवं खूब फाड़े हुए मुख का नाम 'विनिवृत्त ' होता है । मुख के नीचे की ओर झुके होने को 'निभुंग्न', कुछ-कुछ आयताकार खुले हुए मुख को ' भुग्न', ओठ खुले रहने पर 'विवृत ' तथा आक्षिप्त मुख को 'उद्वाही ' मुख कहा जाता है ॥ १५१-१५२ ॥ मुख की छ: चेष्टाओं का विनियोग- विनिवृत्तमसूयायामीको कृतेषु च । विधुतंअवज्ञाविहृतादौवारणेच स्त्रीणांचैव कार्यनैवमित्येवमादिषुप्रयोक्तृभिः ॥ । १५३ ॥ निर्भुग्नं चापि विज्ञेयं गम्भीरालोकनादिषु ॥ १५४ ॥

पृष्ठ 444

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अष्टमोऽध्यायः ३५५

भुग्नं लज्जान्विते योज्यं यतीनां तु स्वभावतः ।

निर्वेदोत्सुक्यचिन्तासु तथा विनयमन्त्रणे ॥ १५५ ॥

विवृतं वापि विज्ञेयं हास्यशोकभयादिषु ।

स्त्रीणामुद्वाहि लीलायां गर्वे गच्छत्यनादरे ॥ १५६ ॥

एवं नामेति कार्यञ्च कोपवाक्ये विचक्षणैः । स्त्रियों की परस्पर स्पर्धा, ईर्ष्या, क्रोध, अवमानना आदि में 'विनिवृत्त ' मुख का प्रयोग किया जाना चाहिए । निवारण एवं मना करने के संदर्भ में 'विधुत' मुख का, सुदूर अवलोकन के समय 'निर्भुग्न', शर्म, निर्वेद, अधीरता चिन्ता, विनय एवं परामर्श के अवसर पर मुनियों के लिए उचित 'भुग्न' मुख का, हँसी, दुःख एवं भय के अवसर पर 'विवृत' मुख का तथा स्त्रियों के विलास गर्व, चले जाने को कहने, अनादर तथा क्रुद्ध वचनों के सन्दर्भ में 'उद्वाहि' मुख का प्रयोग किया जाना चाहिये ॥ १५३-१५७ ॥ समसाचीकृताद्युक्तं यच्च दृष्टिविकल्पनम् ॥। १५७ ॥ तज्ज्ञ स्तदनुसारेण कार्य तदनुगं मुखम् । सम एवं साची आदि निर्दिष्ट दृष्टियों के अनुकूल तथा उस उस दृष्टि के समन्वयात्मक मुख का ही प्रयोग करना चाहिये ॥ १५७-१५८ ॥ मुखवर्ण के चार भेदों के नाम - अथातो मुखरागस्तु चतुर्धा संप्रकीर्तितः ॥ १५८ ॥

स्वाभाविकः प्रसन्नश्च रक्तः श्यामोऽर्थसंश्रयः । स्थिति के अनुसार मुख के चार प्रकार के वर्ण हो जाते हैं – ( १ ) स्वाभाविक, ( २) प्रसन्न, ( ३ ) रक्त एवं ( ४ ) श्याम ॥ १५८-१५९ ॥ मुख वर्ण के चार भेदों का विनियोग - स्वाभाविकस्तु कर्तव्यः स्वभावाभिनयाश्रयः ॥ १५ ९ ॥

मध्यस्थादिषु भावेषु मुखरागः प्रकीर्तितः ।

प्रसन्नस्त्वद् भुते कार्यो हास्यशृङ्गारयोस्तथा ॥ १६० ॥

वीररौद्रमदाद्येषु रक्तः स्यात् करुणे तथा ।

भयानके सबीभत्से श्यामं संजायते मुखम् ॥ १६१ ॥

स्वाभाविक अर्थात् सहज अवस्था का एवं रामशून्यता का अभिनय करते समय मुख का वर्ण स्वाभाविक रखना चाहिए । अद्भुत, हास्य एवं शृंगार रस के अभिनय में प्रसन्न, वीर तथा रौद्र रस एवं मध्यपान आदि के प्रदर्शन और करुण रस के प्रसंग में रक्त वर्ण तथा भयानक व बीभत्स रस के अवसर पर मुख का वर्ण श्याम हो जाता हो ॥ १५ ९ -१६१ ॥

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३५६ नाट्यशास्त्रम्

मुख वर्ण के वर्णन का उपसंहार- एवं भावरसार्थेषु मुखरागं प्रयोजयेत् ।

शाखाङ्गोपाङ्गसंयुक्तः कृतोऽप्यभिनयः शुभः ॥ १६२ ॥

मुखरागविहीनस्तु नैव शोभान्वितो भवेत् । इस प्रकार रसों तथा भाव के संदर्भ में मुख के रंग का प्रयोग करना चाहिए, [ क्योंकि ] शाखा, अङ्ग, अपाङ्गों के साथ किया हुआ अभिनय चाहे कितना भी भव्य क्यों न हो, उसमें मुखराग का योग बिना किए वह पूर्ण नहीं बनता ॥ १६२-१६३ ॥ शारीराभिनयोऽल्पोऽपि मुखरागसमन्वितः ॥ १६३ ॥

द्विगुणां लभते शोभां रात्राविव निशाकरः । यदि मुखराग से'युक्त थोड़ा- सा भी आङ्गिक अभिनय किया जाए तो उसकी शोभा उसी प्रकार द्विगुणित हो उठती है जैसे कि रात्रि में चन्द्रमा की शोभा बढ़ती है' ॥ १६३-१६४नयनाभिनयोऽपि॥ स्यान्नानाभाव रसस्फुटः ॥ १६४ ॥ मुखरागान्वितो यस्मान्नाट्यमत्र प्रतिष्ठितम् ।

विभिन्न भावों एवं रसों को स्पष्ट करने वाला नेत्र व्यापार भी मुखराग से युक्त होकर अधिक शोभित होता है क्योंकि नाट्य मुख्यतया मुखराग पर ही आधारित होतायथाहै ॥ १६४-१६५नेत्र प्रसर्पेत॥ मुखभ्रूद ष्टिसंयुतम् ॥ १६५ ॥ तथा भावरसोपेतं मुखरागं प्रयोजयेत् ।

मुख, भ्रू एवं दृष्टि की संयोजना में जिस जिस प्रकार का नेत्र व्यापार हो उसी उसी प्रकार के भाव एवं रसमय मुखराग का प्रयोग किया जाना चाहिए ॥ १६५ १६६ ॥ इत्येवं मुखरागस्तु प्रोक्तो भावरसाश्रयः ॥ १६६ ॥

अतः परं प्रवक्ष्यामि ग्रीवाकर्माणि वै द्विजाः । इस भांति भाव तथा रस के उपजीवी मुखराग की चर्चा की गई । हे विप्रों! अब मैं इसके पश्चात् ग्रीवा की भंगिमाओं का वर्णन करूँगा ॥ १६६-१६७ ॥ ग्रीवा की चेष्टाओं के नौ भेदों के नाम- समा नतोन्नता त्र्यश्रा रेचिता कुञ्चिताश्विता ॥ १६७ ॥

वलिता च निवृत्ता च ग्रीवा नवविधार्थतः । १. जैसे कि रात्रि की कालिमा चन्द्रमा के प्रकाश को और भी बढ़ा देती है. उसी प्रकार मुखराग अपूर्ण आङ्गिक अभिनय की भी शोभा बढ़ा देता है ।

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अष्टमोऽध्यायः ३५७ [ १ ] समा, [ २ ] नता, [ ३ ] उन्नता, [ ४ ] त्रयस्त्रा, [ ५ ] रेचिता, [ ६ ] कुचिता, [७] वलिता, [ ८ ] अञ्चिता, एवं [ ९ ] विवृता, यह नौ ग्रीवा की मुद्राएं हैं ॥ १६७-१६८ ॥ ग्रीवा की चेष्टाओं के लक्षण तथा विनियोग- ॥ १६८ ॥ समा स्वाभाविकी ध्यानस्वभावजपकर्मसु

। नता नतास्याऽलङ्कारबन्धे कण्ठावलम्बने ॥। १६ ९ ॥ उन्नताभ्युन्नतमुखी ग्रीवा चोर्ध्वादिदर्शने

या पार्श्वगता ज्ञेया स्कन्धभारे च दुःखिते ।

रेचिता विधुता भ्रान्ता भावे मथननृत्तयोः ॥ १७० ॥

कुञ्चिताकुञ्चिता मूर्हिन भारिते गलरक्षणे ।

अञ्चिताऽपसृतोद्वद्धकेशकर्षोर्ध्वदर्शने ॥ १७१ ॥

पार्श्वोन्मुखी स्याद्वलिता ग्रीवाभङ्ग च वीक्षिते । ॥ १७२ ॥ विवृत्ताभिमुखीभूता स्वस्थानाभिमुखादिषु

सहज अवस्था में स्थित ग्रीवा का नाम 'समा' है इसका प्रयोग ध्यान, साधारण स्थिति, एवं जप करते समय किया जाता है । मुख को झुकाने पर 'नता' ग्रीवा होती है । हार की कटिया बन्द करने एवं दूसरे के गले में बाहें डालने के समय इसका उपयोग होता है । ऊपर की ओर मुख करने पर ग्रीवा 'उन्नता' मुद्रा में होती है जैसा कि उपर देखने के समय होता है । पार्श्व की ओर मुड़ी होने पर 'त्रयस्त्रा, ग्रीवा जननी चाहिए । कन्धे पर भार ले जाने एवं शोक में इसका प्रयोग होता है । जब गर्दन जोर से हिलाई जाए या सिर्फ घुमाई भर जाए तो वह 'रेचिता' ग्रीवा कही जाती है । मंथन के प्रदर्शन एवं नृत्त के समय इसका प्रयोग होता है । सिर झुका लेने पर 'कुञ्चिता' ग्रीवा होती है । ऐसी स्थिति बोझ से दबने तथा गले की रक्षा करते समय होती है । सिर को पिछे की ओर घुमा लेने पर 'अश्विता' ग्रीवा कही जाती है । गले में फाँसी लगाने, बाल संवारने तथा एकदम ऊपर की ओर देखने में इसका प्रयोग किया जाता है । मुख को पार्श्व की तरफ घुमा लेने पर ' वलिता' ग्रीवा की स्थिति होती है । गर्दन मोड़कर देखने में इसका प्रयोग होता है । सामने की ओर मुख होने पर 'विवृत्ता' ग्रीवा होती है । अपने निवास की ओर जाने का प्रदर्शन करते समय इसका प्रयोग होता है ॥ १६८-१७२ ॥

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३५८ नाट्यशास्त्रम् ग्रीवा चेष्टाओं के वर्णन का उपसंहार- इत्यादिलोकभावार्था ग्रीवाभेदैरनेकधा । ग्रीवाकर्माणि सर्वाणि शिरःकर्मानुगानि हि ॥ १७३ ॥

शिरसः कर्मणा कर्म ग्रीवायाः संप्रवर्तते ।

इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं शीर्षोपाङ्गसमाश्रयम् ॥ १७४ ॥

अङ्गकर्माणि शेषाणि गदतो मे निबोधत ॥ १७५ ॥

॥ इति भारतीये नाट्यशास्त्रे उपाङ्गविधानं नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

सर्वसाधारण के यह ग्रीवा कर्म हैं जो सिर के व्यापार के अनुगामी हैं । ग्रीवा • के व्यापार सिर के व्यापारों का अनुकरण करते हैं तथा सिर की भंगिमाओं के ही

आधार पर ग्रीवा के कर्म प्रवर्तित होते हैं । सिर एवं उपाङ्गों के यह लक्षण हैं ।

शेष आङ्गिक कर्मों के विषय में मैं आगे बताऊँगा ॥ १७३-१७५ ॥

॥ इस प्रकार भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र की 'नाट्यप्रदीप' नामक हिन्दी व्याख्या का उपाङ्गविधान नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥

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अथ नवमोऽध्यायः अध्याय का उपक्रम - एवमेतच्छिरोकर्म लक्षणसंयुक्तमुपाङ्गानांनेत्र भ्रूनासोष्ठकपोलजम्मयोदितम् ॥ १ ॥

अभी तक मैंने सिर, आंखे, भवें, नासिका, ओठ एवं गालों से सम्बन्धित क्रियाओं के लक्षण बताए हैं ॥ १ ॥

हस्तादीनां प्रवक्ष्यामि कर्म नाट्यप्रयोजकम् ।

यथा येनाभिनेयं च गदतो मे निबोधत ॥ २ ॥

अब मैं नाट्य उपयोगी ' हस्त मुद्राओं आदि के विषय में जो बताऊँगा उसे. सुनिए ॥ २ ॥

1 लक्षणंहस्तोरः सम्प्रवक्ष्यामिपार्श्वजठरकटीजङ्घोरुपादतःविनियोगं च तत्त्वतः ॥ ३ ॥

मैं अब हाथ, वक्षःस्थल, पार्श्व, उदर, कमर, जंघा एवं चरण सम्बन्धी मुद्राओं के लक्षण तथा विनियोग के विषय में कहूँगा ॥ ३ ॥

१. इस प्रसंग में अभिनवगुप्त ने अभिनव की द्विविध इतिकर्तव्यता का उल्लेख किया है- ( १ ) लोकधर्मी एवं ( २ ) नाटयधर्मी । इसमें से प्रथम जीवन की वास्तविकता का चित्रण करती है तथा द्वितीय परम्परा से अनुप्राणित होती है । प्रथम ( लोकधर्मी ) के पुनः दो भेद हैं ( अ ) भावों की प्रदर्शिका, यथा - गर्व के अवसर पर पताका हस्त को ललाट तक उठाया जाता है ( ना० शा० ९-१ ९ ) । ( ब ) ब'हुय पदार्थ के आकार का प्रदर्शिका, यथा— कमलादि पुष्पों का प्रदर्शन करने के निमित्त पद्मकोश हस्त का प्रयोग किया जाता है । इसी भांति नाट्यधर्मी इतिकर्तव्यता के भी दो भेद होते हैं- ( १ ) अलंकारवत् शोभा बढ़ाने वाली यथा हस्त के चतुविध करणों का प्रयोग ( ना० शा० ९.२०५-२११ ) ( २ ) जनप्रचलित व्यवहार का आंशिक प्रदर्शन करने वाली, यथा एकान्तकथन ( जनान्तिक ) के अवसर पर त्रिपताका हस्त का प्रयोग करना । जो केवल नाट्य के अवसर मात्र के समय नट के ही लिए उपयोगी होती है उसे नाट्यधर्मी कहते हैं क्योंकि अन्य किसी अवसर पर उसके प्रयोग का प्रयोजन नहीं होता ( नासमयमात्ररूपा नाट्यधर्मी, समस्याकिञ्चित्करस्य कल्पने प्रयोजनाभावात् ) ।

पृष्ठ 449

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३६० नाट्यशास्त्रम्

असंयुक्त हस्तपताकस्त्रिपताकश्चकी चौबीस मुद्राओं केतथानाम-वै कर्तरीमुखः ।

अर्धचन्द्रो हयरालश्च शुकतुण्डस्तथैव च ॥। ४ ॥

मुष्टिश्च शिखराख्यश्च कपित्थः खटकामुखः ।

सूच्यास्यः पद्मकोशः सर्पशिरा मृगशीर्षकः ॥ ५ ॥

काङगुलकोऽलपद्मश्च चतुरो भूमरस्तथा । हंसस्यो हंसपक्षच संदन्शो मुकुलस्तथा ॥1 ६ ॥ ऊर्णनाभस्ताम्रचूडश्चतुर्विंशतिरीरिताः असंयुताः संयुताश्च गदतो मे निबोधत ॥ ७ ॥

( १ ) पताका, ( २ ) त्रिपताका, ( ३ ) कर्तरीमुख, ( ४ ) अर्धचन्द्र, ( ५ ) अराल, ( ६ ) शुकतुष्ड, ( ७ ) मुष्टि, ( ८ ) शिखर, ( ९ ) कपित्थ, ( १० ) कटकामुख, ( ११ ) १५ ) कालक, सूच्यास्य, ( १२ ) पद्मकोश, ( १३ ) सर्पमिरा, ( १४ ) मृगशीर्ष, ( ) हंसपक्ष, ( २१ ) ( १६ ) अलपद्म, ( १७ ) चतुर. ( १८ ) भ्रमर, ( १ ९ ) हंसास्य. ( २० सन्देश, ( २२ ) मृकुल, ( २३ ) ऊणनाभ तथा ( २४ ) ताम्रचूड - यह चौबीस मुद्राएं एक हाथ ( असंयुक्त हस्त ) से प्रदर्शित की जाती हैं ॥ ४-७ ॥ संयुक्त हस्तों की तेरह मुद्राओं के नाम- अञ्जलिश्व कपोतश्च कर्कटः स्वस्तिकस्तथा । ॥ ८ ॥ खटकावर्धमानश्च हघुत्सङ्गो निषधस्तथा

। दोल: पुष्पपुटश्चैव तथा मकर एव च ॥ ९ ॥ गजदन्तोऽवहित्थश्च वर्धमानस्तथैव च

एते तु संयुता हस्ता मया प्रोक्तास्त्रयोदश । ॥ १० ॥ नृत्तहस्तानतश्वोर्ध्वं गदतो मे निबोधत

दोनों हाथों को जोड़ने से बनी ( संयुक्त हस्त ) मुद्राओं की संख्या तेरह कही गई हैं- ( 1 ) अंजलि, ( २ ) कपोत, ( ३ ) कर्कट, ( ४ ) स्वस्तिक, ( ५ ) कटकावर्ध- मानक, ( ६ ) उत्संग, (७ ) निषध, (८ ) दोल, [ ९ ] पुष्पपुट, [ १० ] मकर, [ ११ ] गजदन्त, [ १२ ] अवहित्य एवं [ १३ ] वर्धमान ॥ ८-१० ॥ १. ' सूच्यास्यः पद्मकोशश्च तथा वै सर्पशीर्षकः' इति वा पाठः । 'मृगशीर्षः परो ज्ञेयो हस्ताभिनययोक्तृभिः' - अधिकोऽयं पाठः क्वचित् पुस्तके | २. यद्यपि यह हस्तमुद्राएं प्रायः एक ही हाथ से प्रदर्शित की जाती हैं पर कभी कभी दोनों हाथों से अलग रूप में इन मुद्राओं को दिखाया जाता है । ऐसा होने पर भी इन्हें असंयुक्त हस्त मुद्रा कहा जाता है क्योंकि इनकी मुद्रा एक ही हाथ से बन जाती है, दूसरे हाथ की अपेक्षा इनको नहीं रहती ।

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नवमोऽध्यायः ३६१

नृत्तहस्त की तीस मुद्राओं के नाम- चतुरश्रौ तथोद्वृत्तौ तथा तलमुखौ स्मृतौ ।

स्वस्तिकौ विप्रकीर्णौ चाप्यरालखटकामुखी ॥ ११ ॥

आविद्धवक्रौ सूच्यास्यो रेचितावर्धरेचितौ ।

उत्तानवञ्चितौ चैव पल्लवी च तथा करो ॥ १२ ॥

। नितम्बावपि विज्ञयौ केशबन्धौ तथैव च पक्षवञ्चितकोलताख्यौ च तथा चैवप्रोक्तौ पक्षप्रद्योतकौकरिहस्तौ तथैवतथाच ॥। १३ ॥ ज्ञेयौ गरुडपक्षी च दण्डपक्षावतः परम्' ॥ १४ ॥

ऊर्ध्वमण्डलिनौ चैव पार्श्वमण्डलिनौ तथा ।

उरोमण्डलिनौ चैव उरःपरवीर्ध मण्डलो ॥ १५ ॥

मुष्टिकस्वस्तिकौ चापि नलिनीपद्मकोशको ।

अलपल्लवोल्बणौ च ललितौ वलितौ तथा ॥ १६ ॥

अब मैं नृत्त-हस्तों के विषय में बताऊँगा । [ इनके नाम हैं- ] [ १ ] चतुरस्र [२] उद्वृत्त, [ ३ ] तलमुख, [ ४ ] स्वस्तिक, [ ५ ] विप्रकीर्ण, [ ६ ] अरालखटकामुख, [७] अविद्धवक्र, [ ८ ] सुच्यास्य, [ सूचीयुत्व ] [९ ] रेचित, [ १० ] अर्धरेचित, [ ११ ] उत्तानवञ्चित, [ १२ ] पल्लव, [ १३ ] नितम्ब, [ १४ ] केशबन्ध, [ १५ ] लता, [१६ ] करिहस्त, [ १७ ] पक्षवञ्चितक, [ १८ ] पक्षप्रद्योतक, [ १ ९ ] गरुड़पक्ष, [२० ]. दण्डपक्ष, [ २१ ] ऊर्ध्वमण्डली, [ २२ ] पार्श्वमण्डली, [ २३ ] उरोमण्डली, [ २४ ] उरः पाश्र्वार्धमण्डली, [ २५ ] मुष्टिकस्वस्तिक, [ २६ ] नलिनीपद्मकोश, [ २७ ] अलपल्लव, [ २८ ] उल्बण, [ २ ९ ] ललित एवं [ ३० ] वलित ॥ ११-१६ ॥

चतुष्षष्टिकरा ह्येते नामतोऽभिहिता मया ।

यथालक्षणमेतेषां कर्माणि च निबोधत ॥ १७ ॥

मैने चौंसठ हस्तमुद्राओं के नाम बताए हैं । अव इनके लक्षण तथा क्रियाओं के विषय में जानिए ॥ १७ ॥

१. 'हंसपक्षी तथैव च' इति वा पाठः । २. यहाँ पर श्रीघोष ने चौसठ संख्या की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए बताया है कि वस्तुतः हस्तमुद्राओं की संख्या चौसठ न होकर सरसठ ( ६७) हैं क्योंकि चौदह असंयुक्त तेरह संयुत एवं तीस नृत्त हस्त मुद्राओं का जोड़ सरसठ होता है, न कि चौसठ । उनका यह सुझाव भी है कि मूल पाठ में चतुष्षष्टिः पद के स्थान पर सप्तषष्टिः पद अपेक्षित था ।