भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 471–480

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 471–480

पृष्ठ 471

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३८० नाट्यशास्त्रम् अधिक कुछ नहीं किया जा सकता आदि कथनों का प्रदर्शन सिया जाता है ॥ १३२-१३३ ॥ अंगुल्यो यस्य हस्तस्य ह्यन्योन्यान्तरनिस्सृताः ॥ १३३ ॥

स कर्कट इति ज्ञेयः करः कर्म च वक्ष्यते ।

एष मदनाङ्गमर्दे सुप्तोत्थितजृम्भणे बृहद्देहे ॥। १३४ ॥

हनुधारणे च योज्यः शङ्खग्रहणेऽर्थंतत्त्वज्ञैः । ३- कर्कट हस्त- दोनों हाथों की अंगुलियों के एक दूसरे में फंसे होने की संज्ञा कर्केट हस्त' होती है । इसके कर्म को आगे कहा जाएगा । इसके द्वारा काम- क्रीड़ा के प्रसंग में मर्दन, जाग कर जंभाई लेने, अंगड़ाई लेने अंगुली पर ठोढ़ी -टिकाने एवं शंखमणिबन्धनग्रहण का विन्यस्तावरालौअभिनय किया जाता है स्त्रीप्रयोजितौ॥ १३३-१३५ ॥ ॥ १३५ ॥

उत्तानो वामपार्श्वस्थौ स्वस्तिकः परिकीर्तितः । ४-स्वस्तिक हस्त — दोनों अराल हस्तों को उलट कर कलाई पर मिलाने

को स्वस्तिक हस्त कहते हैं । इसका प्रयोग स्त्रियां ही करती हैं ॥ १३५-१३६ ॥

स्वस्तिकविच्युतिकरणाद् दिशो घनाः खं वनं समुद्राश्च ॥ १३६ ॥

ऋतवो मही तथौंषं विस्तीर्णं वाभिनेयं स्यात् । स्वस्तिक स्थिति से हाथों के अलग होने के द्वारा दिशाओं, आकाश, वन, सागर, ऋतु, पृथ्वी तथा इसी प्रकार की अन्य विस्तृत वस्तुओं का अभिनय किया जाता है ॥ १३६-१३७खटकः ॥ खटकेन्यस्तः खटकावर्धमानकः ॥ १३७ ॥ शृङ्गारार्थेषु योक्तव्यः प्रणामकरणे तथा ।

कुमुदोत्पलवृन्तेषु कर्तव्यश्छत्रधारणे ॥ इति ॥। १३८ ॥ ' ५ -खटकावर्धमानक हस्त - जब एकखटका मुख हस्त के ऊपर दूसरा खटका- मुख हस्त रखा जाता है तो उसे 'खटकावर्धमानक' हस्त कहते हैं । इसका प्रयोग शृङ्गारिक चेष्टाओं एवं प्रणाम के प्रसंग में किया जाता हैं । ( कुमुद तथा उत्पल की डंठल तथा छत्र को पकड़ने का अभिनय करने में भी इस हस्त का प्रयोग होता है ) ॥ १३७-१३८ ॥ १. अभिनवगुप्त का कथन है कि एक दूसरे के सम्मुख डंक उठाए हुए ककंटों की भांति अंगुलियों की स्थिति होने से इसका नाम कर्कट होता है ( अन्योन्य- सम्मुखकर्कट दंष्ट्राद्वयाकारेण अंगुलीनामत्रावस्थानात् कर्कटः ) ।

पृष्ठ 472

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नवमोऽध्यायः ३८१ ता अरालौ तु विपर्यस्तावत्तानौ वर्धमानको । उत्सङ्ग इति विज्ञेयः स्पर्शस्य ग्रहणे करः ॥ १३ ९ ॥ ६ - उत्संगहस्त -- जब दो अराल हस्त विपरीत दिशा में उलटे व झुके हों तो उसे ' उत्संग' हस्त कहते हैं । इससे हाथ के स्पर्श का प्रदर्शन किया जाता ॥ १३ ९ ॥ सनिष्पेषकृते चैव रोषामर्षकृतेऽपि च । की निष्पीडितः पुनश्चैव स्त्रीणामीयकृते भवेत् ॥ १४० ॥ कठिनता से किए जाने वाले कार्य रोष अमर्ष तथा स्त्रियों की ईष्या का

म- प्रदर्शन तथा निचोड़ने की क्रिया का, अभिनय इस हस्त द्वारा किया जाता है ॥ १४० ॥

मुकुलं तु यदा हस्तं कपित्थः परिवेष्टयेत् ।

स मन्तव्यस्तदा हस्तो निषधो नाम नामतः ॥ १४१ ॥

ने ७-निषध हस्त- जब कपित्थ के द्वारा मुकुल हस्त को परिवेष्टित कर लिया जाए तो निषध हस्त कहते हैं ॥ १४१ ॥

संग्रहपरिग्रहौ धारणं च समयश्च सत्यवचनं च । सक्षेपः सक्षिप्तं निपीडितेनाभिनेतव्यम् ॥ १४२ ॥,, ',, ( ),,,बन इसके द्वारा संग्रह स्वीकार धारण करना नियम समय सत्य भाषण तात्पर्य एवं कहीं रखी चीज आदि का अभिनय किया है ॥ १४२ ॥

[ शिखरस्तु यदा हस्तो मृगशीर्षेण पीडितः ।

निषेधो नाम विज्ञेयः स भयार्ते विधीयते ॥ १४३ ॥

गृहीत्वा वामहस्तेन कूर्पराभ्यन्तरे भुजम् ।

दक्षिणं चापि वामस्य कूर्पराभ्यन्तरे न्यसेत् ॥ १४४ ॥

स चापि दक्षिणो हस्तः सम्यङ्मुष्टिकृतो भवेत् ।

FT-ग इत्येष निषधो हस्तः कर्म चास्य निबोधत ॥ १४५ ॥

। एतेन धैर्यमदगर्वसौष्ठवौत्सुक्यविक्रमाटोपाः भी ॥ १४६ ॥ अभिमानावष्टम्भस्तम्भस्थैर्यादयः कार्याः

१. अभिनय के अनुसार शास्त्रार्थं का समुचित ग्रहण संग्रह है ( सम्यक् ग्रहां )टों शास्त्रार्थादिः हमने अन्य अर्थ भी अभिनव की ही मान्यतानुसार किए हैं । यथा.न्य- परिग्रहः स्वीकारः समयो नियमः संक्षेपस्तात्पर्यम् संक्षिप्त तु सम्यक् क्षिप्त क्वचित्स्थातिमित्यर्थः ।

पृष्ठ 473

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३८२ नाट्यशास्त्रम् अथवा-ज्ञेयो वै निषधो नाम हंसपक्षी पराङ्मुखी । प्रयोक्तव्योऽभिघट्टने ॥ १४७ ॥ ]

जालवातायनादीनां हस्त' को मृगशीर्ष हस्त के द्वारा दबाया जाता है तो ' निषध' नामक ( जब शिखर किया जाता । बायें हाथ से दाहिनी -हस्तबांह केकहतेभुजदण्डहैं जोकोभयभीत, तथा बंधीहोने मुट्ठीपर प्रयुक्तवाले दाहिने हाथ से बायें भुजदण्ड को पकड़ा हस्त कहा जाता है । इसके द्वारा धैर्य, मद, गर्व, सौष्ठव-, जाएउत्सुकतातो, उसेपराक्रमनिषेध, अवहेलना, अहंकार, अभिमान स्तम्भ तथा स्थिरता आदि का •अभिनय किया जाता है । अथवा- हस्त उलटे होने पर निषेध हस्त की अवस्थिति होती है । जाल वातायन आदि के अभिघट्टन ) दोनों हंसपक्ष के प्रसंग में यह प्रयुक्त होता है ॥। १४३-१४७ ॥

अंसो प्रशिथिलो मुक्तौ पताको तु प्रलम्बिती ।

यदा भवेतां करणे स दोल इति संज्ञितः ॥ १४८ ॥

८-दोल हस्त -दोनों कन्धे जब शिथिल एवं मुक्त हों तथा दोनों पताका हस्त नीचे लटक रहे हों तो उसे 'दोल' हस्त कहते हैं ॥ १४८ ॥

तथैव चावेगे । सम्भ्रमविषादमूच्छितमदाभिघाते ॥ १४ ९ ॥ व्याधिप्लुते च शस्त्रक्षते च कार्योऽभिनययोगः स्थिति, आवेग, द्वारा हड़बड़ाहट ( सम्भ्रम ) विषाद, मुच्छ, मद की इसके -बीमारी तथा घाव का प्रदर्शन किया जाता है ।1 । यस्तु सर्पशिराः प्रोक्तस्तस्याङ्गुलिनिरन्तरः ॥ १५० ॥ द्वितीयः पार्श्वसंश्लिष्टः स तु पुष्पपुटः स्मृतः

सर्पशिरा हस्त की अंगुलियाँ एक दूसरे से मिली हों ' ' एवं एक९-पुष्पपुटहाथ दूसरेहस्त-हाथ जबके पार्श्व में जुड़ा हुआ हो तो उसे पुष्पपुट हस्त की संज्ञा दी जाती है ॥ १५० ॥

नानाविधानि युक्तानि ।

धान्यफलपुष्पसदृशान्यनेनच तोयानयनापनयने च ॥ १५१ ॥

ग्राह्याण्युपनेयानि वस्तुओं को ग्रहण करने एवं देने के लिए तथा, जल लानेअनाजएवं फलले, जानेफूल एवंकी प्रक्रियाअन्य का प्रदर्शन करने के लिए इस मुद्रा का प्रयोग किया जाता है ॥ १५१ ॥

परिभाषाएं बड़ौदा संस्करण में मिलती हैं । १. शिखर हस्त की यह अतिरिक्त

पृष्ठ 474

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नवमोऽध्यायः ३८३

पताकी तु यदा हस्तावूर्ध्वाङ्गुष्ठावधोमुखौ ।

उपर्युपरि विन्यस्तौ तदासौ मकरः स्मृतः ॥ १५२ ॥

१० मकर हस्त - जब दोनों हाथ पताका मुद्रा में ऊपर उठे हों व उनके अंगूठे नीचे की ओर झुके हुए तथा एक दूसरे के ऊपर अवस्थित हों तो उसे मकर हस्त कहते हैं ॥ १५२ ॥

सिंहन्यालद्वीपिप्रदर्शनं नक्रमकरमत्स्यानाम् ।

ये चान्ये क्रव्यादा अभिनेयास्तेऽथंयोगेन ॥ १५३ ॥

इस मुद्रा से सिंह, सर्प, बाघ, घड़ियाल, मगर मछली एवं कच्चा मांस खाने वाले अन्य जन्तुओं का प्रदर्शन किया जाता है ' ॥ १५३ ॥

कूर्परांसोचितो हस्तौ यदास्तां सर्पशीर्षकौ ।

गजदन्तः स तु करः कर्म चास्य निबोधत ॥ १५४ ॥

११- गजदन्त हस्त -जब दो सर्पशिरा हस्त एक दूसरे को कोहनी एवं कंधे के मध्यभाग पर स्पर्श कर रहे हों तो उसे 'गजदन्त ' कहा जाता है । इसके द्वारा परिलक्षित क्रियायें भी जानिए ॥ १५४ ॥

एष च वधूवराणामुद्वाहे चातिभारयोगे च ।.. स्तम्भग्रहणे च तथा शैलशिलोत्पाटने चैव ॥ १५५ ॥

बधू तथा वर को ले जाने, अत्यधिक भार उठाने, स्तम्भों को पकड़ने एवं पर्वत की शिलाओं को उखाड़ने का प्रदर्शन करने में इस हस्त मुद्रा का प्रयोग किया जाता है ॥ १५५ ॥

शुकतुण्डौ करौ कृत्वा वक्षस्यभिमुखाञ्चितौ ।

शनैरधोमुखाविद्धौ सोऽवहित्य इति स्मृतः ॥ १५६ ॥

१२. अवहित्थ हस्त - जब शुकतुण्ड हाथ एक दूसरे से वक्षप्रदेश पर मिलते हैं और फिर आबद्ध रूप में क्रमशः नीचे की ओर झुकते जाते हैं तो उसे ' अवहित्य ' -मुद्रा कहते हैं ॥ १५६ ॥

दौर्बल्ये निःश्वसिते गात्राणां दर्शने तनुत्वे च ।

उत्कण्ठिते च तज्ज्ञ रभिनययोगस्तु कर्तव्यः ॥ १५७ ॥

दुर्बलता, निःश्वास, पारीर के प्रदर्शन, [ शरीर की ] कृशता एवं उत्कण्ठित होने का अभिनय इससे किया जाता है ॥ १५७ ॥

१. प्रो० घोष के अनुवाद में सिंह, बाघ, हाथी अर्थ दिया गया है किन्तु कच्चा मांस खाने वाले जन्तुओं की श्रेणी में हाथी की गणना करना उपयुक्त नहीं प्रतीत होता ।

पृष्ठ 475

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३८४ नाट्यशास्त्रम्

ज्ञयो व वर्धमानस्तु हंसपक्षी पराङ्मुखौ ।

जालवातायनादीनां प्रयोक्तव्यो विघाटने ॥ १५८ ॥

१३ - वर्धमानहस्त – हंसपक्ष हस्तों का मुख एक दूसरे से विपरीत दिशा में ( पराङ्मुख ) होने पर उत्पन्न हुई स्थिति को 'वर्धमान' कहा जाता है । इसके द्वारा खिड़की, झरोखा आदि के खोलने का अभिनय किया जाता हैं ॥ १५८ ॥

सङ्ग्रहपरिग्रहोद्धारणं च समयं च सत्यवचनं च ।

सङ्क्षेपः संक्षिप्तं निपीडितेनाभिनेतव्यम् ॥ १५ ९ ॥

( एक हाथ से दूसरे हाथ को दबाने पर संग्रहण, परिग्रहण, धारण, प्रतिज्ञा, सत्यवचन एवं संक्षेप का प्रदर्शन किया जाता है ॥ १५ ९ ॥ ) संयुक्त हस्त मुद्राओं को उपसंहार- उक्ता येते द्विविधास्त्वसंयुताः संयुताश्च सङ्क्षेपात् । अभिनयकरास्तु ये त्विह तेऽन्यत्राप्यर्थतः साध्याः ॥ १६० ॥

असंयुत एवं संयुत इन दोनों प्रकारों के अभिनय में उपयुक्त जिन हस्तों क यहाँ संक्षेप में वर्णन किया गया है उनका प्रयोग इन्हीं नियमों के अनुसार अन्यत्र भी किया जाना चाहिए ॥ १६० ॥

अन्यैरप्युक्तम्- आकृत्यास्वयं वितचेष्टया चिह्नर्जात्याकर्तव्य हस्ताभिनयनंविज्ञाय वस्तुतःबुधैः ॥। १६१ ॥ ( आकृति, व्यापार, विशेषता एवं जाति के आधार पर स्वयं विचार करके विद्वानों को यथायोग्य हस्ताभिनय का प्रयोग करना चाहिए ॥ १६१ ॥

नास्ति कश्चिदहस्तस्तु नाटयेऽर्थोऽभिनयं प्रति ।

यस्य यदृश्यते रूपं बहुशस्तन्मयोदितम् ॥ १६२ ॥

कोई हस्ताभिनय ऐसा नहीं होता जिससे नाट्य' में कोई भाव न प्रदर्शित किया जाता हो । अतः जिस भावाभिव्यक्ति के लिए जिस मुद्रा का सामान्यतया प्रयोग किया जाता है उसी को मैंने बताया है ॥ १६२ ॥

हस्त कर्मों का उपक्रम - अन्ये चाप्यर्थसंयुक्ता लौकिका ये करास्त्विह ।

छन्दतस्ते प्रयोक्तव्या रसभावविचेष्टितैः ॥ १६३ ॥

१. अभिनव के विचारानुसार नाट्य से यहाँ नाट्य के विभागादि का तात्पर्य है ( नाट्यमिह तदुपयोगिनो विभागादयः ) ।

पृष्ठ 476

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. नवमोऽध्यायः ३८५ यहाँ पर वर्णित हस्तमुद्राएँ लोक परम्परा में व्यवहृत होती हैं उनका प्रयोग भी रसों एवं भावों के उपयुक्त चेष्टानुरूप ही किया जाना चाहिए ॥ १६३ ॥

देशं कालं प्रयोगं चाप्यर्थयुक्तिमवेक्ष्य च ।

हस्ता ह्येते प्रयोक्तव्या नृणां स्त्रीणां विशेषतः ॥ १६४ ॥

स्थान, समय एवं प्रयोग को ध्यान में रखते हुए स्त्रियों तथा पुरुषों को इन मुद्राओं का प्रयोग करना चाहिए ॥ १६४ ॥

सर्वेषामेव हस्तानां यानि कर्माणि सन्ति वै ।

तान्यहं संप्रवक्ष्यामि रसभावकृतानि तु ॥ १६५ ॥

अब मैं ( नाट्यप्रदर्श के अवसर पर ) रस तथा भावों के संदर्भ में हाथ की चेष्टाओं को बतलाऊँगा ॥ १६५ ॥

हस्त कर्मों के बीस भेदों के नाम- उत्कर्षणं विकर्षणं तथा व्याकर्षणं पुनः ।

परिग्रहो निग्रहवाह्नानं तोदनमेव च ॥ १६६ ॥

संश्लेषश्च वियोगश्च रक्षणं मोक्षणं तथा ॥। १६७ ॥ विक्षेपधून चैव विसर्गस्तर्जनं तथा छेदनं भेदनं चैव स्फोटन मोटन तथा । ताडन चेति विज्ञेयं तज्ज्ञ: कर्म करान्प्रति ॥ १६८ ॥

१. उत्कर्षण ( ऊपर खींचना ), २. विकर्षण ( जोर से खींचना ), ३. व्याक-र्षण ( बाहर निकालना ), ४. परिग्रह ( किसी वस्तु को लेना ), ५. निग्रह, ६. आह्वान ( आवाहन ), ७. तोदन' (व्यथित करना ), ८. संश्लेश ( मिलना ), ९. वियोग ( अलग होना ), १०. रक्षण बचाना, ११. मोक्षण ( छुड़ाना ), १२. विक्षेप (फेंकना ), १३. धुनन ( कँपाना ), १४. विसर्ग ( छोड़ना ) १५. तर्जन ( मना करना ), १६. छेदन ( काटना ), १७. भेदन ( अन्दर घुसाना ), १८. स्फोटन ( खोलना ), एवं १ ९. मोटन ( मूँदना ) तथा २०. ताडन आदि हस्त की क्रियायें मानी गयीं हैं ॥ १६६-१६८ ॥ हाथों की तीन सामान्य प्रक्रियायें - उत्तानः पार्श्वगश्चैव तथाधोमुख एव च ॥। १६ ९ ॥ हस्तप्रचारस्त्रिविधो नाट्यतत्त्वसमाश्रयः १. 'तोदनं ताडनं' - अभिनव भारती । २. 'स्फोटनं विकासनं, मोटनं सङ्कोचनं ' - अभि० भा० । २५ ना०

पृष्ठ 477

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३८६ नाट्यशास्त्रम् ( हाथ की क्रियायें सामान्यतः तीन प्रकार की होती हैं - ऊपर की ओर, नीचे की ओर तथा पार्श्व की ओर जाने वाली ॥ १६ ९ ॥ )

हस्ताभिनयसर्वेविधि-हस्तप्रचाराश्च प्रयोगेषु यथाविधि ।

नेत्रभ्रूमुखरागाद्यैः कर्तव्या व्यञ्जिता बुधैः ॥ १७० ॥

इन सभी हस्त प्रयोगों के अभिनय के समय नेत्र, भ्रू एवं मुख की चेष्टाओं का भी प्रयोग करते हुए इन्हें और अधिक अभिव्यक्त करना चाहिए ॥ १७० ॥

करणं कर्म स्थानं प्रचारयुक्ति क्रियां च समवेक्ष्य । कार्यतज्ज्ञ कोपचारेण ॥। १७१ ॥ हस्ताभिनयः अभिनेताओं को यह चाहिए कि करण, कार्य, स्थान एवं क्रिया का भलीभाँति निरीक्षण करके तदनुरूप लोकपरम्परा के अनुसार हस्तक्रिया का प्रयोग करें ॥ १७१ ॥

उत्तमानां कराः कार्या ललाटक्षेत्रचारिणः ।

मध्यानामधमानामधोगताः ॥ १७२ ॥

वक्षस्स्थाश्चैव H ( समाज के ) उत्तम व्यक्तियों की हस्त क्रियाएं प्रायः मस्तक के समीप; मध्य वर्गीय लोगों की वक्षःस्थल के समीप एवं निम्नस्तरीय व्यक्तियों का हस्त संचालन शरीर के अधोभाग में होना चाहिए ॥ १७२ ॥

ज्येष्ठे स्वल्पप्रचाराः स्युर्मध्ये कुर्वीत मध्यमैः ।

अधमेषु प्रकीर्णाश्च हस्ताः कार्याः प्रयोक्तृभिः ॥ १७३ ॥

उच्च वर्गीय पात्रों को हाथ के द्वारा बहुत कम अभिनय करना चाहिए, मध्यम- वर्गीय पात्रों का हस्ताभिनय न अत्यन्त अधिक होना चाहिए न अत्यन्त न्यून एवं पात्रों को स्वच्छन्दतया हाथों द्वारा अभिनय करना चाहिए' ॥ १७३ ॥

निम्नवर्गीय

श्लोक की व्याख्या अभिनवगुप्त ने भिन्न ढंग से की है । यहां

१. इस, सम्पूर्ण को उन्होंने हमारे समान पात्रपरक न प्रयुक्त ज्येष्ठनाट्यमध्यमपरकएवंमानाअधमहै विशेषणों। तदनुसार ज्येष्ठ शब्द नाटकवाची, मध्यम भाषा मानकरआदि वाची एवं अधम नृत्तकाव्यवाची है । ज्येष्ठे नाटकादौ चतुर्वर्गपायोपदेशिनि हस्ताभिनयो, मध्यमे तु रञ्जनाफले भाणकादौ मध्यमः, - प्रत्यक्षताप्राधान्यादल्पो अधमे तु नृत्तकाव्ये षिङ्गकादौ च प्रकीर्ण इति प्रत्यक्षे हि तत्राकाशभाषितप्रधान्यात् उत्तमादि जनों से किए गए हस्तकृयाओं का केचित् । पूर्व प्रसंग के अनुसार यहाँ वर्गीकरण किया जा रहा था । अतः इस प्रसंग को भी हमें व्यक्ति अर्थात् पात्रपरक मानना ही समीचीन जान पड़ा ।

पृष्ठ 478

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नवमोऽध्यायः ३८७ लक्षणव्यञ्जिता हस्ताः कार्यास्तूत्तममध्यमैः । केकिसी एक लोकक्रियास्वभावेन नीचैरप्यर्थ संश्रयाः ॥ १७४ ॥

इस प्रकार के लक्षणों द्वारा जो हस्तमुद्राओं का प्रयोग बताया गया है उसे लोकपरम्परा का निर्वाह करते हुए उत्तम मध्यम एवं नीच जनों को व्यवहार में लाना चाहिए ॥ १७४ ॥

अथवान्यादृशं प्राप्य प्रयोगं कालमेव च । PSIF विपरीताश्रया हस्ताः प्रयोक्तव्या बुधैर्न वा ॥ १७५ ॥

इन हस्त चेष्टाओं का प्रयोग करते समय विद्वानों को चाहिए कि वह अवसर एवं परिस्थिति का सदा ध्यान रखें । कुछ ऐसी परिस्थितियां हैं जिनका अभिनय करते समय हाथ का प्रयोग नहीं किया जाता ॥ १७५ ॥

हस्ताभिनय का निषेध - । विषण्णे मूर्च्छिते होते जुगुप्साशोकपीडिते ग्लाने स्वप्ने विहस्ते च निश्चेष्टे तन्द्रिते जडे ॥ १७६ ॥

। व्याधिग्रस्ते जरा च भयार्त्ते शीतविप्लुते मत्ते प्रमत्ते चोन्मत्ते चिन्तायां तपसि स्थिते ॥ १७७ ॥

। हिमवर्ष बद्धे वारिणाप्लवसंश्रिते स्वप्नायिते च सम्भ्रान्ते नतसंस्फोटने तथा ॥ १७८ ॥

नतथाहस्ताभिनयःकाकु विशेषश्चकार्यः कार्यःनानार्थसत्त्वसमाश्रयःरसभावकः ॥। १७ ९ ॥ विषण्णता, मूर्च्छा, लज्जा, जुगुप्सा, शोकाकुलता, ग्लानि, स्वप्न, हस्तहीनता, क्रियाशून्यता, अर्धनिद्रा, जड़ता, बीमारी, बुढ़ापा, भय, सर्दी, मत्त, प्रमत्त एवं उन्मत्त अवस्थाएं, चिन्ता, तपःस्थिति, बर्फ से गलने, बन्धन, बाढ़ से घिरने, स्वप्न देखने, सम्भ्रान्त होने एवं नाखून काटने आदि स्थितियों में हाथ की क्रियाओं का प्रयोग नहीं किया जाता है । ( विभिन्न अर्थो तथा भावों को अभिव्यक्त करने में समर्थ काकुविशेष का भी प्रयोग नहीं किया जाता ) । हस्त अभिनय विधि- यत्रवाचिकाभिनयव्यग्रावुभौ हस्तौकुर्याद्तत्तद्दृष्टिविलोकनैःविरामै रर्थ दर्शकैः ॥। १८० ॥ वाचिक अभिनय करते समय अभिनेता को अपनी दृष्टि उसी स्थल पर केन्द्रित करनी चाहिए जिस ओर उनके हाथों की चेष्टाएं केन्द्रित हैं । हाथों से

पृष्ठ 479

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३८८ नाट्यशास्त्रम् अभिनय करते समय बीच बीच में विराम भी देना चाहिए जिससे हस्ताभिनय का अर्थ सुबोध हो सके ॥ १८० ॥

अङ्गसचालन के तीन भेद- । उत्तानः पार्श्वगश्चैव तथाधोमुख एव च ॥ १४१ ॥ प्रचारस्त्रिविधोऽङ्गनां नाट्यनृत्तसमाश्रयः नाट्य एवं नृत्त के अन्तर्गत अङ्गों का संचालन तीन प्रकार का माना जाता है- ( १ ) ऊर्ध्वमुखी ( उत्तान ), ( २ ) अगल बगल किया जाने वाला ( पार्श्वग ),

एवं ( ३) निम्नाभिमुखी ( अधोमुख ) ॥ १८१ ॥

हस्तप्रचार के पाँच भेद- अन्ये तु—

उत्तानो वर्तुलस्त्रयश्रः स्थितोऽधोमुख एव च ।

पञ्च प्रचारा हस्तस्य नाट्यनृत्तसमाश्रयाः ॥ इति ॥ १८२ ॥

कुछ अन्य विचारकों के मत में ( १ ) उत्तान, ( २ ) वर्तुल, ( ३ ) व्यश्र, ( ४) स्थित एवं (५ ) अधोमुख यह पाँच प्रकार की हस्तमुद्राएं नाट्य एवं नृत्त में होती हैं ॥ १८२ ॥

एवं ज्ञयाः करा ह्येते नानाभिनयसंश्रयाः ।

अतः ऊर्ध्व प्रवक्ष्यामि करान्नृत्तसमाश्रयान् ॥ १८३ ॥

इस प्रकार अनेकों अभिनयों के आधार रूप इन करों को जानना चाहिए । अक इसके बाद में नृत्त समाश्रित हस्तों का वर्णन करूगा ॥ १८३ ॥

नृत्त हस्त- वक्षसोष्टाङ्गुलस्थौसमानकूर्परांसौ तु तुचतुरस्रौप्राङ्मुखौ खटकामुखौप्रकीर्तितौ ॥| १८४ ॥ १. चतुरस्र - जब दोनों खटकामुख हस्त वक्ष के आठ अंगुल ऊपर स्थित हों तथा कन्धे व कोहनियाँ समानान्तर हो तो उसे चतुरस्र हस्त कहा जाता है ॥ १८४ ॥

हंसपक्षकृतौ हस्तौ व्यावृत्तौ तालवृन्तवत् ।

उद्वृत्ताविति विज्ञ यावथवा तालवृन्तकौ ॥। १८५ ॥

२. उद्वृत्त - जब हंसपक्ष मुद्रा में स्थित दोनों हाथों को तालवृन्त की भाँति उलट दिया जाएचतुरस्रस्थितौतो उसे उद्वृत्तहस्तौअथवा ताल हंसवृत्तकपक्षकृतौहस्त कहातथाजाता। है ॥ १८५ ॥

तिर्यस्थितौ चाभिमुखो ज्ञेयौ तलमुखाविति ॥। १८६ ॥

पृष्ठ 480

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नवमोऽध्यायः ३८९. ३. तलमुख -चतुरश्र मुद्रा में तथा हंसपक्ष अवस्थिति में स्थित दोनों हाथ तिरछे तथा एक दूसरे के अभिमुख हो तो उन्हें तलमुख हस्त कहा जाता है ॥ १८६ ॥

तावेव मणिबन्धान्ते स्वस्तिकाकृतिसंस्थितौ ।

स्वस्तिकाविति विख्यातौ विच्युतौ विप्रकीर्णको ॥ १८७ ॥

४. स्वस्तिक---जब तलमुख मुद्रा में स्थित दोनों हाथ एक दूसरे को कलाई से काटे तो उसे 'स्वस्तिक ' हस्त कहते हैं ॥ १८७ ॥

अलपल्लवसंस्थानावूर्ध्वास्यो पद्मकोशकौ । अरालखटकाख्यौ चाप्यरालखटकामुखी ॥ १८८ ॥ ५. विप्रकीर्णक -स्वस्तिकमुद्रा में हाथ के रहने के बाद जब वह पुनः वियुक्त

हो जाते हैं तो उन्हें विप्रकीर्णक हस्त कहा जाता है । ६. अरालखटकामुख -दोनों अलपल्लव हस्तों की हथेलियाँ ऊपर की ओर उठकर पद्मकोश हस्तमुद्रा में स्थित हो जाए तो उसे अरालखटकामुख हस्त कहते हैं ॥ १८८ ॥

अन्ये तु- तथैव मणिबन्धान्ते ह्यरालौ विच्युतावुभौ ।

ज्ञ प्रयोक्तृभिर्नित्यमरालखटका विति । इति ॥ १८९ ॥

एक दूसरे मतानुसार जब दोनों अराल हस्त कलाई से अलग अलग हो जाएं तो उसे अरालखटक हस्त कहा जाता है ॥ १८ ९ ॥ । भुजांसकूर्पराग्रैस्तु कुटिलावतो करौ ॥ १ ९ ० ॥ पराङ्मुखतलाविद्धौ ज्ञयावाविद्धवक्रकौ ७. आविद्धवक्रक – दोनों हाथ, भुजा, कन्धे एवं कोहनी से मुड़ कर तिरछे हो जाए तथा हथेलियाँ भी मुड़कर पीछे की ओर घुमी हुई हो तो उसे आविद्धवक्रक हस्त कहते हैं ॥ १ ९ ० ॥

हस्तौ तु सर्पशिरसो मध्यमाङ्गुष्ठकौ यदा ।

तिर्यक्प्रसारितास्यौ च सदा सूचीमुखी स्मृतौ ॥ १ ९ १ ॥

८. सूचीमुख - सर्वशिर मुद्रा में अवस्थित दोनों हाथों की बीच की अगुलियों को जब अंगूठे स्पर्श कर रहे हों एवं उनके अग्रभाग तिरछे फैले हों तो उसे 'सूची-मुख' हस्त की संज्ञा दी जाती है ॥ १ ९ १ ॥ अन्ये- सर्पशीर्षौ यदा हस्तो भवेतां स्वस्तिकस्थितौ ।