भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 481–490
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 481–490
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३९ ० नाट्यशास्त्रम् मध्यप्रसारिताङ्गुष्ठौ ज्ञेयौ सूचीमुखौ तदा ॥ १ ९ २ ॥ दोनों सर्पशीर्ष हस्तों की एक दूसरे मतानुसार जब स्वस्तिक अवस्थिति में मध्यमा अंगुली अंगूठे का स्पर्श कर रही हो तो उसे सूचीमुख हस्त कहते हैं ॥ १ ९ २ ॥ द्रुतभ्रमौ । रेचितौ चापि विज्ञेयो हंसपक्षौ संज्ञितौ ॥ १ ९ ३ ॥ प्रसारितोत्तानतलौ रेचिताविति ऊर्ध्वमुखी हों तथा उन्हें ९. रेचित - दोनों हंसपक्ष हस्तों की हथेलियाँ उसे रेचित हस्त कहा अत्यन्त शीघ्रता पूर्वक हिलाया जा रहा हो तो जाता ॥ १ ९ ३ ॥ चतुरस्रो भवेद्वामः सव्यहस्तश्च रेचितः । ' विज्ञेय नृत्ततत्त्वज्ञ रर्धरेचितसंज्ञितौ ॥ १ ९ ४ ॥ १०. अर्धरेचित- जब बायाँ हाथ चतुरस्रमुद्रा में एवं दाहिना हाथ रेचित मुद्रा में अवस्थित हो तो वह अर्धरेचित हस्तमुद्रा होती है ॥ १ ९ ४ ॥
अञ्चिती कूर्परांसौ तु त्रिपताकौ करौ कृतौ ।
किञ्चित्तिर्यग्गतावेतौ स्मृतावृत्तानवञ्चितौ ॥ १ ९ ५ ॥
११. उत्तानवञ्चित - त्रिपाताक मुद्रा में स्थित दोनों हाथों को थोड़ा सा तिरछा मोड़ दिया जाता है तथा कन्धे एवं कोहनी को घुमाया जाता है तो वह उत्तानवञ्चित हस्त कहा जाता है ॥ १ ९ ५ ॥
मणिबन्धनमुक्तौ तु पताकौ पल्लवी स्मृतौ ।
नितम्बाविति कीर्तितौ ॥। १ ९ ६ ॥
बाहुशीर्षाद्विनिष्क्रान्तौ १२. पल्लव - दोनों पताका हस्त के कलाई से जुड़े होने की संज्ञा पल्लव होती है । १३. नितम्ब - दोनों पताका हस्तों को कन्धे से ( नितम्ब तक' ) बाहर फैलाने की संज्ञा नितम्ब हस्त है ॥ १ ९ ६ ॥
केशदेशाद्विनिष्क्रान्तौ परिपार्श्वोत्थितौ तथा ।
विज्ञेयौ केशबन्धी तु करावाचार्यसंमतौ ॥ १ ९ ७ ॥
१. अभिनवभारती के अनुसार कन्धे से बाहों का निष्क्रमण नितम्ब पर्यन्त होता है क्योंकि इस हस्तमुद्रा की संज्ञा से यही ध्वनित होता है- "स्कन्धक्षेत्राद् विचित्रत्वे- पर्यायत्वेन निष्क्रान्ती पताको, नाम्ना क्षेत्रस्याक्षेपात् नितम्बक्षेत्रे नोत्तानत्वाधोमुखत्व । तथैव पर्यायेण वर्तमानौ नितम्बी ।
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नवमोऽध्यायः ३९ १ १४. केशबन्ध — केशों से हटाकर दोनों हाथों को जब पार्श्वभाग में स्थापित कर दिया जाए तो उसे केशबन्ध मुद्रा कहते हैं ॥ १ ९ ७ ॥
तिर्यक्प्रसारितौ चैव पार्श्वसंस्थौ तथैव च ।
लताख्यौ च केरौ ज्ञेयो नृत्ताभिनयनं प्रति ॥ १ ९ ८ ॥
१५. लता - नृत्त एवं अभिनय के समय दोनों हाथों को पार्श्वों की तरफ तिरछे फैलाने को लता हस्त कहा जाता है ॥ १ ९ ८ ॥
समुन्नतो लताहस्तः पावात्पार्श्व विलोलितः ।
त्रिपताकोऽपरः कर्णे करिहस्तः प्रकीर्तितः ॥ १ ९९ ॥
१६. करिहस्त - जब लता हस्त को ऊपर उठा कर एक पार्श्व तक हिलाया जाए एवं दूसरा हाथ त्रिपताका मुद्रा के कान पर स्थित हो तो उसे करिहस्त कहा जाता है ॥ १ ९९ ॥
कटिशीर्षनिविष्ठौ द्वौं त्रिपताकौं यदा करौ ।
पक्षवञ्चितको हस्तौ तदा ज्ञेयौ प्रयोक्तृभिः ॥ २०० ॥
१७. पक्ष वञ्चितक —एक त्रिपताक हस्त के कटि पर एवं दूसरे के सिर पर स्थित होने को पक्षवश्चित हस्तक कहा जाता है ॥ २० ॥
तावेव तु परावृतौ पक्षप्रद्योतकौ स्मृतौ । अधोमुखतलाविद्धौ गरुडपक्षकौ ॥ २०१ ॥
१८. पक्षप्रद्योतक - इन्हीं ( पक्षवञ्चितक ) हस्तों की स्थिति बदल देने पर' पक्षप्रद्योतक हस्त मुद्रा बन जाती है । १ ९. गरुडपक्ष - नीचे की ओर हथेली रखते हुए नितम्ब क्षेत्र से हाथों को झट से ऊपर ले जाने को गरुड पक्ष हस्त कहा जाता है ॥ २०१ ॥
1. हंसपक्षकृत हस्ती व्यावृत्तपरिवर्तितौ । तथा प्रसारितभुजौ दण्डपक्षाविति स्मृतौ ॥। २०२ ॥ २०. दण्डपक्ष - दोनों हंसपक्ष हस्तों को बारी बारी से घुमा कर दण्ड की भाँति प्रसारित कर देने को दण्डपक्ष हस्त कहते हैं ॥ २०२ ॥
तावेवऊर्ध्वमण्डलिनौपार्श्वविन्यस्तौ हस्तावूर्ध्वपार्श्वमण्डलिनौदेशविवर्तनात्स्मृतौ ॥। २०३ ॥ २१. ऊर्ध्वमण्डली -शरीर के ऊपरी भाग के समीप दोनों हाथों के चक्राकार १. इसका तात्पर्य यह निकलता है कि कटिस्थित हाथ को शीर्ष पर एवं शीर्षस्थित हाथ को कटि पर रखा जाए ।
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३ ९ २ नाट्यशास्त्रम् घूमने की संज्ञा ऊध्वंमण्डलीय हस्त होती है । २२. पार्श्वमण्डली - इन्हीं हाथों की गति एक पार्श्व में होने पर उसे पार्श्वमण्डली हस्त कहते हैं ॥ २०३ ॥
उद्वेष्टितो भवेदेको द्वितीयश्चापवेष्टितः ।
भ्रामितावुरस: स्थाने ह्य रोमण्डलिनौ स्मृतौ ॥ २०४ ॥
२३. उरोमण्डली - जब एक हाथ को ऊपर व दूसरे हाथ को नीचे रख कर वक्षःस्थल के समीम हाथों को गतिशील किया जाय तो उसे उरोमण्डली हस्त मुद्रा कहते हैं ॥ २०४ ॥
अलपल्लवकारालावुरोऽर्धभ्रमणक्रमात् पाश्ववर्तश्च विज्ञ यावुरःपाश्र्वार्धमण्डलौ ॥ २०५ ॥ २४. उरः पाश्र्वार्धमण्डली - अलपल्लव एवं अराल हस्तों को बारी बारी
से पक्ष एवं पार्श्व में गतिशील करने को उर पाश्वर्धमण्डली हस्त कहा जाता है ॥ २०५ ॥
हस्तौ तु मणिबन्धान्ते कुञ्चितावञ्चितौ यदा ।
खटकाख्यौ कृतौ स्यातां मुष्टिकस्वस्तिकौ तदा ॥ २०६ ॥
२५. मुष्टिकस्वस्तिक —दोनों खटकामुख हस्तों को कलाई से मोड़ कर घुमाने को मुष्टिकस्वस्तिक हस्त कहा जाता है ॥ २०६ ॥
पद्मकोशौ यदा हस्तो व्यावृत्तपरिवर्तितौ ।
नलिनीपद्मकोशौ तु तदा ज्ञेयौ प्रयोक्तृभिः ॥ २०७ ॥
२६. नलिनीपद्मकोश -जब पद्मकोश हस्तों को क्रमशः व्यावृत एवं परिवर्तित करणों में गतिमान किया जाता है तो उसकी संज्ञा नलिनीपद्मकोश होती है ॥ २०७ ॥
१. अभिनवगुप्त के विचार में पार्श्वमण्डली हस्त में ऊर्ध्वमण्डल हाथों का पताकाकृत करके एक दूसरे के सम्मुख रखा जाता है । ( ऊर्ध्व मण्डलावेव पार्श्वगतो पताकाकृतौ परस्परम्मुखौ ) । एक दूसरे मतानुसार पार्श्वमण्डल हस्त में हाथों को ऊर्ध्वमण्डल की भांति ही चक्राकार घुमाया जाता है । केवल उसकी स्थिति ऊर्ध्वभाग में न होकर पार्श्वभाग में होती है - " अन्ये तु निवर्चन समर्थनाशयेन स्वपाश्र्व एवाविद्धभुजभ्रमणवर्तनात्मक- मनयो रूपमाहुः " -अभि० भा० । प्रो० घोष भी हाथों की ऊर्ध्वमण्डलवत गति पार्श्व में मानते हैं ।
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नवमोऽध्यायः ३९ ३ करावद्वेष्टिता च प्रविधायालपल्लवौ । ऊर्ध्वप्रसारिताविद्धौ कर्तव्यावुल्बणाविति ॥ २०८ ॥
२७. अलपल्लव – जब दोनों हाथों को उद्वेष्टित करण में गतिशील किया जाता है तो वह अलपल्लव हस्त मुद्रा होती है । २८. उल्बण - दोनों हाथों को ऊपर की ओर फैला कर गतिशील करने को उल्बण हस्त कहते हैं ॥ २०८ ॥
पल्लवौ च शिरोदेशं संप्राप्तौ ललितौ स्मृतौ ।
कूर्परस्वस्तिकगतौ लताख्यौ वलिताविति । २० ९ ॥
२ ९. ललित - दोनों अलपल्लव हस्तों को सिर पर ले जाना ललित हस्ता कहा जाता है । ३०. वलित -दोनों लता हस्त एक दूसरे को कोहनी से क्रास करें तो उसे वलित हस्त कहा जाता है ॥ २० ९ ॥ नृत्तहस्तों का उपसंहार—
करणे तु प्रयोक्तव्या नृत्तहस्ता विशेषतः ।
तथार्थाभिनये चैव पताकाद्याः प्रयोक्तृभिः ॥ २१० ॥
नृत्त हस्तों का उपयोग विशेषतः करणों के प्रयोग के अवसर पर किया जाता है । यथा अभिनेता द्वारा पताका आदि हस्तों का प्रयोग अर्थ की अभिव्यक्ति के निमित्त किया जाता है ॥ २१० ॥
सङ्करोऽपि भवेत्तेषां प्रयोगोऽर्थवशात्पुनः ।
प्राधान्येन पुनस्संज्ञा नाट्ये नृत्ते करेष्विह ॥ २११ ॥
किन्तु किसी किसी समय अर्थ की सशक्ततर अभिव्यक्ति के लिए उन ( हाथों ) के प्रयोगों के अवसर आपस में बदल जाते हैं । ऐसे अवसर पर नाट्य एवं नृत्त में उनके प्रयोग की प्रधानता के आधार पर ही उनका नामकरण किया जाता है ॥ २११ ॥
हस्तकरणों का उपक्रम - वियुतास्संयुताश्चैव नृत्तहस्ताः प्रकीर्तिताः ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि करान्करणसंश्रयान् ॥ २१२ ॥
इस प्रकार अबतक मैंने वियुक्त एवं संयुक्त हस्तों का वर्णन किया है । इसके पश्चात् अब मैं करणों के आश्रित हस्तों का विश्लेषण करूंगा ॥ २१२ ॥
सर्वेषामेव हस्तानां नाट्यहस्तनिदेशिभिः ।
विज्ञातव्यं प्रयत्नेन करणं तु चतुर्विधम् ॥ २१३ ॥
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३९ ४ नाट्यशास्त्रम् के निर्देशकों को जानना चाहिये कि इन समस्त हस्तमुद्राओं का नाट्यहस्तों वर्गीकरण चार प्रकार के करणों में किया जा सकता है ॥ २१३ ॥
हस्तकरणों के चार भेदों के नाम- अथावेष्टितमेकं स्यादुद्वेष्टितमथापरम् । व्यावर्तितं तृतीयं तु चतुर्थं परिवर्तितम् ॥ २१४ ॥
प्रकार यह हैं - ( १ ) आवेष्टित, ( ३ ) उद्वेष्टित, ( ३ ) करणों के चतुविध व्यावर्तित ( ४ ) परिवर्तित ॥ २१४ ॥
आवेष्ट्यन्ते यदाङ्गुल्यस्तर्जन्याद्या यथाक्रमम् ।
अभ्यन्तरेण करणं तदावेष्टितमुच्यते ॥ २१५ ॥
- तर्जनी से प्रारम्भ करके क्रमश: सभी अंगुलियाँ अन्दर की १ - आवेष्टित ओर मुड़ती जाती हैं तो उसे आवेष्टित करण कहते हैं ॥ २१५ ॥
उद्वेष्टयन्ते यदाङ्गुल्यस्तर्जन्याद्याकरणं विप्रास्तदुद्वेष्टितमुच्यतेबहिर्मुखम् ।॥ २१६ ॥ क्रमशः
२- उद्वेष्टित - तर्जनी से प्रारम्भ करके क्रमशः सभी अंगुलियाँ जब बाहर की ओर खींचती जाती हैं तो उसे उद्वेष्टित करण कहा जाता है ॥ २१६ ॥
आवर्त्यन्ते कनिष्ठाद्या अङ्गुल्योऽभ्यन्तरेण तु ।
यथाक्रमेण करणं तद्वयावर्तितमुच्यते ॥ २१७ ॥
३- व्यावर्तित - जब कनिष्ठिका से प्रारम्भ करके क्रमशः सभी अंगुलियाँ मुड़ती हैं तो उसका नाम व्यावर्तित करण होता है ॥ २१७ ॥
उद्वर्त्यन्ते अन्दर की ओर कनिष्ठाद्या बाह्यतः क्रमशो यदा । करणं विप्रास्तदुक्तं परिवर्तितम् ॥ २१८ ॥
FF FO अङ्गुल्यः- कनिष्ठिका अंगुली से प्रारम्भ करके समस्त अंगुलियों के क्रमशः४-बाहरपरिवर्तित-की ओर खींचते जाने का नाम परिवर्तित करण कहा जाता है ॥ २१८ ॥
योगे च पाणिभिर्वर्तनाश्रयैः । हस्तकरणोंनृभिनयका उपसंहार- करणानि प्रयोजयेत् ॥ २१ ९ ॥ मुख नेत्रयुक्तानि की हस्त मुद्राओं का प्रयोग करतेनृत्तसमयएवं मुखनाट्य, भावोंके अवसरएवं नेत्रोंपरकाविभिन्नतथा भावाभिव्यक्तिप्रकार पूर्ण करणों का भी प्रयोग करना चाहिए ॥ २१ ९ ॥
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नवमोऽध्यायः ३९५
हाथ के दस करणों के नाम- तिर्यक्तथोर्ध्वसंस्थो ह्यधोमुखश्चाश्वितोऽपविद्धस्तु ।
मण्डलगतिस्तथा स्वस्तिकश्च पृष्ठानुसारी च ॥ २२० ॥
उद्वेष्टितः प्रसारित इत्येते वै स्मृताः प्रकारास्तु ।
बाह्वोरिति करणगता विज्ञेया नर्तकै नित्यम् ॥ २२१ ॥
( १ ) तिर्यक, ( २ ) ऊर्ध्वसंस्थ, ( ३ ) अधोमुख, ( ४ ) अश्चित, ( ५ ) अपविद्ध, ( ६ ) मण्डलगति, ( ७ ) स्वस्तिक, ( ८ ) पृष्ठानुचारी, ( ९ ) उद्वेष्टित, एवं ( १० )> प्रसारित – इन दस बाहुओं के करणों के विषय में नर्तकों को जानना चाहिये ॥ २२०-२२१ ॥ हृदय उदर तथा पार्श्व की चेष्टाओं के वर्णन का उपक्रम -
हस्तानां करणविधिर्मया समासेन निगदितो विप्राः ।
अत ऊर्ध्वं व्याख्यास्ये हृदयोदरपार्श्वकर्माणि ॥। २२२ ॥
हे द्विजों! इस प्रकार मैंने बाहुओं के करणों के विषय में बताया है । अब मैं हृदय, उदर एवं पाश्र्वों की गतियों के विषय में बताऊँगा ॥ २२२ ॥
उरः चेष्टाओं के पाँच भेदों के नाम- आभुग्नमथ निर्भुग्नं तथा चैव प्रकम्पितम् ।
उद्वाहितं समं चैव हथुरः पञ्चविधं स्मृतम् ॥ २२३ ॥
( १ ) आभुग्न, ( २ ) निर्भुग्न, ( ३ ) प्रकम्पित, ( ४ ) उद्वाहित एवं ( ५ ) सम, यह पाँच प्रकार की उरः चेष्टाएँ मानी जाती हैं ॥ २२३ ॥
आभुग्न का लक्षण
निम्नमुन्नतपृष्ठं च व्याभुग्नांसं श्लथं क्वचित् ।
आभुग्नं तदुरो ज्ञेयं कर्म चास्य निबोधत ॥ २२४ ॥
जब वक्ष दबा हुआ, पीठ ऊँची तथा कंधे कुछ झुके हुए एवं ढीले हों तो उसे आभुग्न उरः चेष्टा कहते हैं ॥ २२४ ॥
आभुग्न का विनियोग- सम्भ्रमविषादमूर्च्छाशोकभयव्याधिहृदयशल्येषु ।
कार्यं शीतस्पर्शे वर्षे लज्जान्वितेऽर्थंवशात् ॥ २२५ ॥
सम्भ्रम, विषाद, मूर्च्छा, शोक, बीमारी, हृदय विदीर्ण होने, ठंडी चीज को छूने, वर्षा तथा किसी के लज्जित होने में इसका प्रयोग किया जाता है ॥ २२५ ॥
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३ ९ ६ नाट्यशास्त्रम्
निर्भुग्न का लक्षण - स्तब्धं निम्नपृष्ठं च निर्भुग्नांसं समुन्नतम् ।
उरो निर्भुग्नमेतद्धि कर्म चास्य निबोधत ॥ २२६ ॥
निर्भुग्न चेष्टा में वक्षःस्थल सीधा, पीठ पीछे की तरफ झुकी तथा कन्धे बिना
झुके हुए तने रहते हैं । अब इसके कर्म को जानिये ॥ २२६ ॥
निर्भुग्न का विनियोग—
स्तम्भे मानग्रहणे विस्मयदृष्टे च सत्यवचने च ।
अहमिति च दर्पवचने गर्वोत्सेके च कर्तव्यम् ॥ २२७ ॥
इसका प्रयोग स्तम्भ, मान, आश्चर्य से देखने, सत्य कहने, 'यह मैं हूँ' इस •प्रकार की गर्वोक्ति कहने एवं अभिमान की अतिशयता का प्रदर्शन करने में किया जाता है ॥ २२७ ॥
अत्र केचित् - क्षेपकोऽयम्- । दीर्घनिःश्वसिते चैव जृम्भणे मोटने तथा बिब्बोके च पुनः स्त्रीणां तद्विज्ञेयं प्रयोक्तृभिः ॥ २२८ ॥
( ठंडी साँस छोड़ने, जम्भाई लेने, एवं स्त्रियों के मोटन तथा बिब्बोक नामक -विलास लीलाओं के अवसर पर भी नाट्यप्रयोक्ताओं के अनुसार निर्भुग्न उर का प्रयोग होता है ॥ २२८ ॥ )
प्रकम्पित का लक्षण- यत्र निरन्तरकृतैः कृतम् ।
प्रकम्पितं च तज्ज्ञेयमुरो नाट्यप्रयोक्तृभिः ॥ २२९ ॥
( नाट्य प्रयोक्ता गणों के अनुसार ) लगातार ऊपर उठने ( व नीचे बैठने ) •वाले वक्ष को प्रकम्पित उर माना जाता है ॥ २२ ९ ॥
प्रकम्पित का विनियोग- हसितरुदितेषु कार्यं श्रमे भये श्वासकासयोश्चैव ।
हिक्के दुःखे च तथा नाट्यज्ञ रर्थयोगेन ॥ २३० ॥
हँसने, रोने, परिश्रम, भय, साँस के प्रकोप, हिचकी एवं दुःख के अवसर पर इसका प्रयोग किया जाता है ॥ २३० ॥
उद्वाहित का लक्षण तथा विनियोग - उद्वाहितं तूर्ध्वकृतमुरो ज्ञयं प्रयोक्तृभिः ।
दीर्घोच्छ्वासोन्नतालोके जृम्भणादिषु चेष्यते ॥ २३१ ॥
ऊपर उठे हुए उर को प्रयोक्तागण 'उहाहित' नाम से जानते हैं । इसमें लम्बी
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नवमोऽध्यायः ३ ९७ साँसें लेने, ऊपर देखने एवं जम्भाई लेने का अभिनय किया जाता है ॥ २३१ ॥
सम का लक्षण तथा विनियोग- सर्वैरेवाङ्गविन्यासैश्चतुरस्रकृतैः कृतम् । उरः समं तु विज्ञेयं स्वस्थं सौष्ठवसंयुतम् ॥ २३२ ॥
समस्त अङ्ग चतुरस्र स्थिति में हों तथा वक्षःस्थल सामान्य अवस्था में स्वस्थ एवं सौन्दर्यमय स्थिति में रहें तो वह वक्ष की सम अवस्था मानी जाती है ॥ २३२ ॥
उदर चेष्टाओं का उपसंहार- एतदुक्तं मया सम्यगुरसस्तु विकल्पनम् ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि पार्श्वयोरिह लक्षणम् ॥ २३३ ॥
इस भांति मैंने उर की समस्त चेष्टाओं का वर्णन किया । अब मैं पार्श्व की विभिन्न स्थितियों की व्याख्या करूँगा ॥ २३३ ॥
पार्श्वचेष्टाओंनतं के पाँचसमुन्नतंभेदों के नाम-चैव प्रसारितविवर्तिते ।
तथापसृतमेवं तु पार्श्वयोः कर्म पञ्चधा ॥ २३४ ॥
पांच प्रकार की पार्श्वचेष्टाएँ होती हैं -- ( १ ) नत, ( २ ) समुन्नत, ( ३ ) प्रसा-- रित, ( ४ ) विवर्तित, ( ५ ) अपसृत ॥ २३४ ॥
कटी भवेत्तु व्याभुग्ना पार्श्वोमाभुग्नमेव च ।
तथैवापसृतांसं च किञ्चित्पावनतं स्मृतम् ॥ २३५ ॥
१ - नत ( लक्षण)) -- जब कटि कुछ झुकी हो, एक पार्श्व कुछ तिरछा हो एवं एक कंधा कुछ चौड़ाया हुआ हो तो वह नत पार्श्व चेष्टा होती है ॥ २३३ ॥
नतस्यैवापरंकटिपार्श्वभुजायायुन्नतपार्श्व विपरीतंरुम्नतं तु युक्तितःभवेत् ॥। २३६ ॥ २- उन्नत (लक्षण) - नत चेष्टा में जो पार्श्व, झुक जाता है, उसी का विपरीत पार्श्व, कटि एवं कंधा जब ऊपर उठ जाता है तो उसे उन्नत पार्श्व चेष्टा कहते हैं ॥ २३६ ॥
आयामनादुभयतः पार्श्वयोः स्यात्प्रसारितम् ।
परिवर्तात् त्रिकस्यापि विवर्तितमिहेष्यते ॥ २३७ ॥
३- प्रसारित (लक्षण ) - दोनों पाश्वों को फैलाना प्रसारित चेष्टा होता है । ४ - विवर्तित (लक्षण ) - त्रिक के घुमाने से विवर्तित पार्श्व की स्थिति उत्पन्न होती है ॥ २३७ ॥
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नाट्यशास्त्रम् ३९८ पुनः । क विवर्तनापनयाद्भवेदपसृतं निबोधत ॥। २३८ ॥ पार्श्वलक्षणमित्युक्तं विनियोगं कर ) पुनः त्रिक को घुमा ५ - अपसृत (लक्षण ) - विवर्तित चेष्टा से ( कहा जाता है । इस प्रकार -सामान्य स्थिति में पाश्चों के आने को अपसृत पार्श्व की गतियों के विषय में बताया है । अब मैं इनके प्रयोगस्थलों की -मैंने पार्श्व विवेचना करूँगा ॥ २३८ ॥
पार्श्व चेष्टाओं के विनियोग- चापसर्पणे । उपसर्पे नतं कार्यमुन्नतं २३ ९ ॥ प्रसारितं प्रहर्षादौ परिवृत्ते विवर्तितम् ॥ त्वपसृतं पार्श्वमर्थवशाद्भवेत् । २४० ॥ विनिवृत्तेएतानि पार्श्वकर्माणि जठरस्य निबोधत ॥ उन्नत, उल्लास के समीप जाने की क्रिया में नत, पीछे हटने के प्रयास में किसी की क्रिया में विवर्तित तथा पूर्व स्थिति में वापस, के प्रदर्शन में प्रसारित घूमने है । इन पाश्वं चेष्टाओं के जाने के प्रयास में उपसूतअब पार्श्वआप कालोगप्रयोगजठरकियाअर्थात्जातापेट की चेष्टाओं के विषय में वर्णन के पश्चात् जानिये ॥ २३ ९ -२४० ॥ उदर चेष्टाओं के तीन भेदों के नाम तथा लक्षण - । क्षामं खल्वं च पूर्ण च सम्प्रोक्तमुदरं त्रिधा तनु क्षामं नतं खल्वं पूर्णमाध्मातमुच्यते ॥ २४१ ॥
एवं ( ३ ) पर्ण । का कहा जाता है - ( १ ) क्षाम, ( २ ) खल्वं उदर तीन प्रकार को, खल्ब धंसे हुए पेट को एवं पूर्ण भरे हुए पेट को कहा इनमें से क्षाम दुर्बल पेट जाता है ॥ २४१ ॥
उदर चेष्टाओं के विनियोग- क्षामं हास्येऽथ रुदिते निःश्वासे जृम्भणे भवेत् ।
व्याधिते तपसि श्रान्ते क्षुधार्ते खल्वमिष्यते ॥ २४२ ॥
पूर्णमुच्छ्वसिते स्थूले व्याधितात्यशनादिषु । , निःश्वास एवं जंभाई लेने की स्थिति में क्षाम, उदर, वीमारी, हास्य, रुदन , थकावट एवं भूख से व्याकुलता के प्रदर्शन में खल्ब जठर तथा उच्छ्वास -लेने, मोटेपन, बीमारी तपस्या और अधिक भोजन का अभिनय करने में पूर्ण जठर का -प्रयोग किया जाता है ॥ २४२-२४३ ॥
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नवमोऽध्यायः ३९९ उदर चेष्टाओं के चार भेदों के नाम -1 -- अन्ये तु क क्षामं खल्वं समं पूर्णमुदरं इत्येतदुदरस्योक्तं कर्मकट्या स्याच्चतुर्विधम्'निबोधत ॥ । २४३ ॥ 2015 एक अन्य मतानुसार उदर के चारों प्रकारों के नाम यह हैं - ( १ ) क्षाम, ( २ ) खल्व, ( ३ ) सम तथा ( ४ ) पूर्ण । अभी तक उदर की चेष्टाओं का वर्णन किया गया । अब आप लोग कटि की चेष्टाओं को जानिए ॥ २४३-२४४ ॥ कटिचेष्टाओं के पाँच भेदों के नाम- छिन्ना चैव निवृत्ता च रेचिता कम्पिता तथा ॥ २४४ ॥ - उद्वाहिता चेति कटी नाट्ये नृत्ते च पञ्चधा । नाट्य एवं नृत्त में पाँच प्रकार की कटि चेष्टाएं मानी गई हैं- ( १ ) छिन्ना,
(२ ) निवृत्ता, ( ३ ) रेचित, ( ४ ) कम्पिता एवं ( ५ ) उद्वाहिता ॥ २४४-२४५ ॥ कटि चेष्टाओं के लक्षण- कटी मध्यस्य वलनाच्छिन्ना सम्परिकीर्तिता ॥ २४५ ॥
पराङ्मुखस्याभिमुखी निवृत्ता स्यान्निवर्तिता ।
सर्वतो भ्रमणाच्चापि विज्ञेया रेचिता कटी ॥ २४६ ॥
तिर्यग्गतागता क्षिप्रं कटी ज्ञेया प्रकम्पिता ॥। २४७ ॥ नितम्बपार्श्वोद्वहनाच्छनैरुद्वाहिता कटी बीच से कटि घुमाने को छिन्ना कटि चेष्टा कहा जाता है । पीछे से सामने की ओर कटि को घुमानानिवर्तित, सभी ओर कटि को घुमाना रेचित, तिरछे होकर शीघ्रगति करने पर प्रकम्पिता एवं धीरे धीरे नितम्बों के पार्श्व भागों को उठाने में द्वाहिता कटि चेष्टा का प्रयोग किया जाता है ॥ २४५-२४७ ॥ कटि चेष्टाओं का विनियोग - पुनश्वासां प्रवक्ष्यामि विनियोगप्रयोजनम् । छिन्ना व्यायामसम्भ्रान्तव्यावृत्त प्रेक्षणादिषु ॥ २४८ ॥ FESE TFSIR
निवृत्ता वर्तने चैव रेचिता भ्रमणादिषु ।
कुब्ज· वामन-नीचानां गतौ कार्या प्रकम्पिता ॥ २४९ ॥
स्थूलेष्वृद्वाहिता योज्या स्त्रीणां लीलागतेषु च । अब मैं इन कटिचेष्टाओं को प्रयुक्त करने के उपयुक्त की चर्चा करूँगा ।