भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 51–60
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 51–60
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४२ नाट्यशास्त्रम् विषय श्लोक पाश्चेष्टाओं के पाँच भेद (१३९ ७ ( १ ) नतपाप चेष्टा का लक्षण २३४२३५ ( १६ ) ) (२) उन्नत पार्श्व चेष्टा का लक्षण २३६ (FF) - ( ३) प्रसारित पाद चेष्टा का लक्षण २३७ (VT) ( ४ ) विवर्तित पार्श्व चेष्टा का लक्षण २३७ ( ६३ ९ ७ ( ५ ) अपसृत पार्श्व चेष्टा का लक्षण २३८ (३४३ ९८ पार्श्व चेष्टाओं का विनियोग २३ ९-२४० ( १), उदर चेष्टाओं के तीन भेदों के नाम तथा ( 9 ) in उदर चेष्टाओं के विनियोग लक्षण २४१ एक २४२-२४३ ( १४ ),, उदर चेष्टाओं के चार भेदों के नाम २४३-२४४०३९९. कटि चेष्टाओं के पांच भेदों के नाम २४४-२४५ 11 किन्तु कु कटि चेष्टाओं के लक्षण २४५-२४७ 17 कटि चेष्टाओं का विनियोग २४८-२५० 19 ऊरू चेष्टाओं के पांच भेद २५०.२५१ ( P ) ४०० ( १ ) कम्पन ऊरू चेष्टा का लक्षण २५१ ( F) ( २ ) बलन ऊरू चेष्टा का २५२ " - ( ३ ) स्तम्भन ऊरू चेष्टा का लक्षण T (F) २५२ (४ ) उद्वर्तन ऊरू चेष्टा का लक्षण '२५३ )2( ( ५ ) निवर्तन ऊरू चेष्टा का लक्षण २५३ 39 ऊरू चेष्टाओं के विनियोग २५४-२५६ #py४०१ जंघा की पाँव चेष्टाए [ ] २५७-२५८ ४० १ आवर्तित छु। चेष्टा का लक्षण २५८-२५९ ४०२ [२ ] नत जङ्घा चेष्टा का लक्षण 150 ()); २६० [३] क्षिप्त जङ्घा चेष्टा का लक्षण २६०-२६१ 17 ३६ [ ४ ] उद्वाहित जंघा का लक्षण 1500२६१ 27 [ ] परिवृत्त जंघा का लक्षण २६२. 1150 जंघा चेष्टाओ के विनियोग 1415 २६२-२६५ ४०३ पाद चेष्टा के पांच भेद २६५-२६६ " [१ ] उद्घट्टित पाद चेष्टा का लक्षण तथा विनियोग (7.) २६६-२६८ PE 19 [२ ] सम पाद चेष्टा का लक्षण तथा विनियोग २६८-२६९ ४०४
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FRATRUSIF विषयानुक्रम ४३ 155 श्लोक पृष्ठ- विषय PP 18 19 २६९ स्थिर पाद का विनियोग चलित पाद का विनियोग २७०३ या पादचेष्टा का लक्षण तथा विनियोग -. २७० २७३ ४०५ [३] अग्रतलसंचर पाद का लक्षण तथा विनियोग २७३२७५ 33. [४ ] अंचित पादचेष्टा का लक्षण तथा विनियोग २७५-२७७ ४०५ [4] कुचित पादचेष्टा का लक्षण तथा विनियोग २७७२७ ९ ४०६ २७.९ -२८० 11 सूची पाद चेष्टा का लक्षण तथा विनियोग क २८१-२८२ P पाद चेष्टाओं के प्रयोग की विधि WEDSएकTO अध्याय का उपसंहार २८३ ४०७ g दशवाँ अध्याय- P ल क 151 ja १ ४०८. चारी का लक्षण २ व्यायाम का लक्षण टलएक शि ३ ४० ९. चारी तथा करण का लक्षण P ४ 7 खण्ड तथा मण्डल का लक्षण SP चारियों की उपयोगिता ५-७ लक ८-१० ४१० सोलह भौमी चारियों के नाम 185 186 18 सोलह आकाशीय चारियों के नाम शि ११-१३ ४११ १. समपादा चारी का लक्षण १४ २. स्थितावर्ता चारी का लक्षण wow I fie 94 ४१२ ३. शकटास्या चारी का लक्षण १६ " ४. अध्यधिका चारी का लक्षण १७ ५. पापगति चारी का लक्षण १८१८ " ६. विश्वा चारी का लक्षण १९ ४१३ 11 ७. एडकाक्रीडिता चारी का लक्षण क २० ८. बढ़ाचारी का लक्षण #ostal 1 FIRS २१ ". 33 ९ उता चारी का लक्षण २२ 31 १०. अडिता चारी का लक्षण २३ ११. उत्स्पन्दिता चारी का लक्षण २४ ४१४ १२. अनिता चारी का लक्षण WHAT IS WIT २९ " " १३. स्वन्दिता चारी का लक्षण २६
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४४FY नाट्यशास्त्रम् विषय लोक पृष्ठ १४. अपस्यन्दिता चारी का लक्षण २६ 11 LL १५. समोत्सारितमत्तल्ली चारी का लक्षण १२७ ४१५ LL १६. मत्तल्ली चारी का लक्षण 19 क 392 २८ क भौमी चारियों का उपसंहार तथा आकाशीय चारियों का उपक्रम 17 १. अतिक्रान्ता चारी का लक्षण 1 ४१५ ३० २. अपक्रान्ता चारी का लक्षण ३. पार्श्वक्रान्ता चारी का लक्षण १७३१ ४१६ ३२ TIP " ४. ऊर्ध्वजानु पारी का लक्षण ३३ ५. सूची चारी का लक्षण ३४ ६. नूपुरपादिका चारी का लक्षण 33 ३५ Teps ७. डोलापादा चारी का लक्षण ८. आक्षिप्ता चारी का लक्षण ३६३७ ४१७ ९. आविदा चारी का लक्षण WBO ३८ १०. उत्ता चारी का लक्षण ३९ PEE IFS 5019 ११. विद्युद्भ्रान्ता चारी का लक्षण ४० ४१८ 67 १२. अलाता चारी का लक्षण १३. भुजङ्गासिता चारी का ४२ " १४. लक्षण के अतिक्रान्ता चारी का लक्षण ४३ ४१८:: १५. दण्डपादाचारी का लक्षण ४४ ४१९ १६. भ्रमरी बारी का लक्षण ४५ आकाशीय चारियों का उपसंहार II ४६ चारियों की प्रयोग विधि क चिन४७-४९ 33 -शस्त्र प्रयोग सम्बन्धी चारियों के चार स्थानों के नाम क ५०-५१ ४२० १. वैष्णव स्थान का लक्षण शिक५२५३ 33 वैष्णव स्थान का विनियोग ५४.५८ ४२१ २. समपाद स्थान का लक्षण ५८.५ ९ ४२२ समपाद स्थान का विनियोग ५९.६१ ३. वैशाख स्थान का लक्षण ६१.६३ 27 बैसाख स्थान का विनियोग ६३.६५ ४२३
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PROTORSTEविषयानुक्रम ४५. विषयMap REPSIF ) श्लोक पृष्ठ ४. मण्डल स्थान का लक्षण ) ६५-६६६० ) ४२३- मण्डल स्थान का विनियोग ६६-६७ PB IBPS Jou ५. आलीढ स्थान का लक्षण ६७-६८ 11 आलीढ स्थान का विनियोग ६८.७० ४२३ ६. प्रत्यालीढ स्थान का लक्षण ४२४. प्रत्यालीढ स्थान का विनियोग ७१-७२ " शस्त्र मोक्षण संबन्धी चार न्यायों के नाम ७२-७३ ४२४ चारो न्यायों के विनियोग ७३-७४ " न्यायों की प्रयोग विधि ७४-७५ ४२५ न्याय शब्द की निरुक्ति h किन ७५-७६ १. भारत न्याय की प्रयोग विधि ७६.८० २. सात्वत न्याय की प्रयोग विधि ८१८२ ४२६ ३. वार्षगण्य न्याय की प्रयोग विधि ८२-८४ ४. कैशिक न्याय की प्रयोग विधि ८४८५ 17 चारों न्यायों की प्रयोग-विधि ८५.८६ 17 रंग मंच पर वर्जित अभिनय ८६-८७ ४२६ व्यायाम की प्रयोग विधि ८८.८९ ४२७ सौष्ठव का लक्षण तथा उपयोगिता ९० ९ १ 37 सौष्ठयांग प्रयोग विधि ९ १ - ९२ 27 सौष्ठवांग का लक्षण ९ २ - ९ ३ 37 सौष्ठवांग की उपयोगिता ९ ३-९४ ४२८ सौष्ठव सम्बन्धी चार अंग ९४- ९५ ४२८ धनुष सम्बन्धी चार करण ९५ - ९ ६ ४२८ चारों करणों के लक्षण ९ ६ - ९७ ४२८ व्यायाम करने की विधि ९७-१०० ४२ ९ आहार की उपादेयता १००१०१ " व्यायाम के अनधिकारी पुरुष १०१-१०२ व्यायाम के अधिकारी पुरुष १०२-१०३ ४३० व्यायाम की उपयोगिता १०३-१०४ 17 अध्याय का उपसंहार १०४ 27
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४६ नाट्यशास्त्रम् परिशिष्ट खण्ड- ( १ ) १०८ करणों की सूची ( नाट्यशास्त्र चतुर्थ अध्याय ) ४३१ (२ ) ३२ अंगहारों की सूची, ( नाट्यशास्त्र चतुर्थ अध्याय ) ४३५ ( ३ ) रसों के भेद, वर्ण, देवता तथा तद्गत भावों की सूची ( छठा एवं सातवां अध्याय ) ४३७ (४ ) भावों की सूची ( छठा एवं सातवाँ अध्याय ) ४४० (५ ) उपाङ्गकमों की सूची ( अष्टम अध्याय ४४५ ४४९ (६) हस्तकर्मों की सूची ( नवम अध्याय (७ ) उर, पार्श्व, उदर, कटि, ऊरु, जंघा, पादकर्मों की सूची (नवम अध्याय ) ४५३ (८) चारियों, स्थानकों तथा न्यायों को सूची BATE P ४५५ ( दशम अध्याय ) क श ४ wet-ofer to forps TRIE PAWIE BEIP XP PR क ElfEPS THE PES PES I PIESA 150s fe virals किस ि एक के क RTE श
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IFRUPEE IPPS Rang ॥
-म तथा गन्धमाल्येन देवास्तुष्यन्ति पूजिताः ।
यथानाट्यप्रयोगज्ञैस्तुष्यन्ति स्तुतिमङ्गलैः ॥
99 19.09 13 IF -ना० शा० ३७.२ ९
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एतच्छास्त्र प्रयुक्तं तु नराणां बुद्धिवधनम् ।
त्रैलोक्यक्रिययोपेत सर्वशास्त्र निदर्शनम् ॥
माङ्गल्यं ललितश्चैव ब्रह्मणो वदनोद्भवम् ।
सुपुण्यश्व पविनश्व शुभं पापविनाशनम् ॥
27.WE OTTF 15- -ना० शा० ३७.२५.२६-
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1 BE PF LING ॥ श्रीः ॥ नाट्यशास्त्रम् सटिप्पण -हिन्दीव्याख्योपेतम् प्रथमोऽध्यायः मङ्गलाचरणम्
प्रणम्य' शिरसा देवौ पितामहमहेश्वरौ ।
नाट्यशास्त्रं प्रवक्ष्यामि ब्रह्मणा यदुदाहृतम् ॥१ ॥
पितामह ' (ब्रह्मा ) एवं महेश्वर को सिर झुकाकर प्रणाम करके मैं उस नाट्य- १. ग्रन्थ की निर्विघ्न समाप्ति के लिए विधीयमान मंगलाचरण- त्रय ( नमस्कारा- त्मक, वस्तुनिर्देशात्मक एवं आशीर्वादात्मक ) में से प्रथम का प्रयोग नाट्यशास्त्र के आदि-श्लोक के रूप में हुआ है । २. पितामह शब्द का अभिधेयार्थ तो पिता का पिता है किन्तु यहाँ यह ब्रह्मा के लिये प्रयुक्त हुआ है । अंगिरा, भृगु, दक्ष एवं मरीचि आदि पितृगण माने गये हैं । ब्रह्मा उनके भी जनक होने के कारण - मानव जाति के पितामह माने गये हैं । ३. महेश्वर शब्द का तात्पर्य यहाँ किसी आश्रयदाता राजा से न होकर भगवान् शिव से है । नाट्यशास्त्र के मंगलाचरण के रूप में इन दोनों देवों की स्तुति नितान्त तर्क-सङ्गत है क्योंकि नाट्यशास्त्र का वह उद्धरण उल्लेखनीय है जिसके अनुसार इन्द्रादि देवताओं के अनुरोध पर ब्रह्मा ने ही ऋग्वेद से कथावस्तु, साम से संगीत, यजुष से अभिनय एवं अथर्व से रस लेकर नाट्यशास्त्र की रचना की थी । शिव से नाट्य-
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२ नाट्यशास्त्रम् शास्त्र' का वर्णन करूँगा' जिसे ब्रह्मा ने बतलाया था ॥ १ ॥
शास्त्र के सम्बन्ध का उद्घोष पाणिनीय शिक्षा में हुआ है, जिसमें नृत्त के अवसान पर नटराज द्वारा आनन्दप्राप्ति -बोधक ढक्का-निनाद का उल्लेख हुआ है । यद्यपि विष्णु नाट्य में उपादेय वृत्तियों के निर्माता हैं तथापि वह ब्रह्मा एवं शिव के समान नाट्य के लिए उपजीव्य नहीं हैं क्योंकि वे स्वकर्तव्यमात्रनिष्ठ हैं । ४. नमस्कार के त्रिविध रूप हैं— कायिक, वाचिक एवं मानसिक । शिरसा पद से कायिक एवं देवी पद से वाचिक तथा मानसिक प्रणाम ध्वनित होते हैं । इसके अतिरिक्त, नाट्यशास्त्र के विधान के अनुसार अभिनय चतुर्विध होता है । उसमें से आंगिक अभिनय का बोध शिरसा शब्द से और वाचिक अभिनय का बोध देवौ शब्द से होता है । इन दोनों सार्थकताओं के अतिरिक्त देवौ पद की उपयो- गिता पितामह महेश्वरौ के उपपद के रूप में भी है, क्योंकि वन्दनीय देव का नाम-स्मरण सोपपद होना उचित ही है । ""पितामहपितामह-महेश्वरीमहेश्वरी "" पद में शब्द का विशेष- क्रम छेकानुप्रास का विधान करता है । १. नाट्शास्त्र शब्द की अनेक व्युत्पत्तियों का अभिनवगुप्त ने उल्लेख किया है –' नाट्यस्य, नटवृत्तस्य शास्त्रं शासनोपायः ग्रन्थः । ' ( अभि० भा० पृ० ३) इसके अतिरिक्त नाट्यवेद एवं नाट्यशास्त्र को पर्याय मानने वाला एक अन्य मृत भी है, किन्तु यह व्याख्या तर्कसंगत नहीं है क्योंकि इस प्रकार 'नाट्यशास्त्र ' नामक ग्रन्थ का यहां पर 'करण ' होना सिद्ध होता है-'प्रवचन' नहीं । व्याख्यान और करण में परस्पर भेद है जैसा कि ' कठेन प्रोक्तम्' इस उदाहरण से स्पष्ट है । इसके अतिरिक्त यदि नाट्यवेद और नाट्यशास्त्र को अपर पर्याय मान लिया जाय दो दोनों के प्रवृत्तिनिमित्त की भी एकरूपता होना अपेक्षित है, जो कि नहीं है । 'नाट्यशास्त्र ' में कहा गया है— दृश्यं श्रव्यं च यद् भवेत्' ( १-११ ) तथा 'जग्राह पाठ्यमृग्वेदात्' [ १-१७ ] । इनसे नाट्यवेद का पार्थक्य सिद्ध होता है । इस प्रकार ग्रन्थ की असंगति और उत्तर ग्रन्थ की उपपत्ति होने के कारण उक्त व्याख्या अमान्य प्रतीत होती है ॥ ['नाट्यशास्त्र ' की व्युत्पत्ति 'नाट्यं च तच्छास्वं च ' करना ही समीचीन है ] । नाट्यशास्त्र की उत्पत्ति से सम्बन्धित प्रश्न नाट्यवेद के विषय है नाट्यवेदशास्त्र के नहीं । भट्टनायक के अनुसार परमात्मा ने जिसको निस्सार भेद के ग्रहण के लिए उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत किया, वह नाट्य है [ "ब्रह्मणा परमात्मना यदुदाहृतमविद्या- विरचितं निस्सारभेदग्रहे यदुदाहरणीकृतं तन्नाट्यं तद्वक्ष्यामि । " [ अभि० भा०, go4 ]1 २. प्रवक्ष्यामि में ' लट्' का प्रयोग वर्तमान के अर्थ में हुआ है, जो इस तथ् य
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प्रथमोऽध्यायः ३ नाट्यवेद की उत्पत्ति के विषय में मुनियों का भरत से प्रश्न-16
समाप्तजप्यं व्रतिनं स्वसुतैः परिवारितम् ।
अनध्याये कदाचित्तु भरतं नाट्यकोविदम् ॥ २ ॥
किसी समय नाट्याचार्य भरतमुनि अनध्याय के दिन व्रत धारण किए हुए थे तथा जप कार्य समाप्त करके अपने पुत्रों ( शिष्यों ) के साथ बैठे हुए थे ॥ २ ॥
. मुनयः पर्युपास्यैनमात्रेयप्रमुखाः पुरा । पप्रच्छुस्ते महात्मानो नियतेन्द्रियबुद्धयः ॥ ३ ॥
उस समय इन्द्रियों तथा बुद्धि को संयमित कर लेने वाले महात्मा आत्रेय आदि मुनिगण उन ( भरत ) के पास आए एवं पूछने लगे ॥ ३ ॥
योऽयं भगवता सम्यग्ग्रथितो वेदसम्मितः ।
नाट्यवेदः कथं ब्रह्मन्नुत्पन्नः कस्य वा कृते ॥ ४ ॥
हे ब्रह्मन्! वेदों के तुल्य तो यह आपके द्वारा निबन्धित नाट्यवेद है वह कैसे ' एवं किसके लिए उत्पन्न हुआ? ॥ ४ ॥
कत्यङ्गः किंप्रमाणश्च प्रयोगश्चास्य कीदृशः । ॥ ५ ॥ सर्वमेतद्यथातत्त्वं भगवन्वक्तुमर्हसि इसके कितने भेद हैं, इसका आकार क्या हैं तथा लोक में इसका प्रयोग किस
का परिचायक है कि ब्रह्मा के द्वारा उच्चरित नाट्यवेद को ही मुनि ने यथावतुरूप से निरूपित किया है । नाट्यवेद ब्रह्मणोदाहृत है एवं तद्विषयक शास्त्र नाट्यशास्त्र, उसी का परिपाटीबद्ध निरूपण करता है । इस प्रकार नाट्यशास्त्र का भी परम्परया ब्रह्मगोदाहृत होना सिद्ध हो जाता है । १. कथमुत्पन्नः -नाट्यशास्त्र की उत्पत्ति किस प्रयोजन से एवं किस प्रकार हुई? क्या यह प्रयोजस वेद चतुष्टय से ही नहीं सिद्ध हो सकता था? यदि यह वेद के ही समान पद- पदार्थ से युक्त है तो इसके उत्पत्ति से क्या लाभ है? २. कस्य कृते – इसका प्रादुर्भाव किसके निमित्त हुआ है? अर्थात् इस शास्त्र के पठन-पाठन तथा प्रयोग के कौन अधिकारी हैं? जो व्यक्ति वेदाध्ययन के अधिकारी हैं, वे ही या इतर जन भी? यदि वेदाधिकारी ही इसे प्रयोग में ला सकते हैं तो इसका निबन्धन निष्प्रयोजन है । ३. कत्यङ्गः नाट्य की अंगीरूप में भी कुछ स्थिति है अथवा अङ्ग समुदाय मात्र को नाट्य कहते हैं यह जिज्ञासा इस प्रश्न से जागृत होती है । ४. किं प्रमाणम्-यों तो नाट्य का ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण से होना सिद्ध ही