भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 621–630

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 621–630

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५३० नाट्यशास्त्रम्SP / प्रतीक कल अध्याय श्लोक पृष्ठ- भाण्डवाद्य प्रयोगविधि ४३१३-३१८ १६५.१६६-eye की निरुक्ति ७ अध्याय का प्रारम्भिक गद्य २७८४० ९ भावशब्द भावों के ४ ९ भेद ७।६ के बाद गद्य २८१ भाव का लक्षण ७।१-४ ६-३४ गद्य सहित २७८-७९ २५३ २५४ भावों और रसों की पारस्परिक ६।३५-३८ उपयोगिता ५०, ६३ PYE भित्तिकर्म विधि २।४३ उ०-८८-८९ पू० ६२ POE भिक्तिलेप विधि २-८२ उ०-८५१० ३५४ भुग्न ( ) - व्याभुग्न मुखकर्म लक्षण ८।१५२ द्वि० ३५५ PRE ( ) - भुग्न व्याभुग्न मुखकर्म विनियोग ४ ९५ उ८।१५५० ९ ६ पूपू० १०८ भुजंगत्रस्तरेचित करण १०५ 505 ४।८४ उ०-८५ पू० भुजंगासित करण ११० भुजंगाश्चित करण ४६ Per भूमि -लक्षण ४७ उ०-FIBER२।२५ भूमि संस्कार ४।१०० १०१०२।२६ Seg ७।१ ९ २८६ भृत्यज क्रोध का लक्षण ३८५. भेदन हस्तकर्म ९।१६८ पू० भौमी चारियों के १६ भेद १०1८-१० पू० ४१० भोमी चारियों का विनियोग १०।२९ पू० ४१५ ३४४ भ्रमण नेत्रताराकर्म का लक्षण ८1 ९ ५ पू० भ्रमण नेत्रतारा-विनियोग ८।९९ उ० ३४५ ४-२०४ २०६ १३ ९ भ्रमण अंगहार ४/ ९९ १० ९ भ्रभरक करण ९1१०१ ३७४ भ्रमर असंयुतहस्त लक्षण भ्रमर असंयुक्तहस्त - विनियोग ९।१०२-१०३ ३७४-३७५ ३४८ उ० कुटी कर्म-लक्षण ३४ ९ भ्रूकुटी कर्म -विनियोग ८।१२३८1११८ उ० ८।११६ उ० ११७ पू० ३४८ कर्म के ७ भेद SEE ३४ ९ -५० ८। १२१ उ०-१२६ पू० कर्म विनियोग ३८३ ९।१५२ मकर संयुतहस्त लक्षण ३८३ ९ / १५३ मकर संयुतहस्त विनियोग

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वर्णक्रमगत विषयानुपूर्वी ५३१ I अध्याय /श्लोक पृष्ठ प्रतीक 919 १ मंगलाचरण मण्डपस्थापन मुहूर्त २४२०४३ पू० ५० ४८ मण्डपनिर्माणपयोगी नक्षत्र ६।२७ के प्रक्षिप्त मंडपस्थापनविधि २।३६-४० ४९ ९।२२० उ० ३ ९५PSP मंडल गति मंडलस्वस्तिक करण ४६८ १०० १०४ उ० ४० ९2v1 मंडल-लक्षण मति संचारी भाव ६।२१ ७।८२ गद्य युक्त २२३, ३१० मत्तल्लि करण ४1८८ १०६ ४१५ ( ) मत्तल्लि चारी भौमी का लक्षण १०।२८ २/६३ उ०-६७ ५४-५५ निर्माण की विधि800 मत्तवारणी PSP मत्तस्खलितक अंगहार ४।२०६ उ ० २०८ पू० १३ ९ मत्तक्रीड अंगहर ४।१ ९४-१९७ १३७ मद भाव के ५ करण ७३८ उ ० ७।३ ९ २७३, २ ९४ मद भाव की ३ प्रकृतियाँ ७/३८ पू० २९ ३ मदविलसित अंगहार ४-२०८-२१० १३ ९ मद वृद्धि के अवसर ७७४४ पू० २९ ४ मदक्षय के अवसर ७|४४ उ ० २९४ मदक्षय के हेतु ७१४५४६ २९५ मदस्खलित करण का लक्षण ४।१५९ उ० १६० पू० १२ ९ ८।९ ३ च ० ३४४ P मदिरा दृष्टिविनियोग ३४२ मदिरा संचारिभावदृष्टि तरुण [ ] मदवाली ८1८१ ३४३ मदिरासंचारिभावदृष्टि [ मध्यम ] ३४३OFF मदिरा संचारिभावदृष्टि ( अधम मदवाली ८1८२ ) मदवाली ८१८३ ९।१७२ तृ० १७३ तृ ० ३८६628 मध्यम पात्रों के कर 911 मध्यम मण्डप की प्रशंसा २०२१ ४४ मध्यम पद का लक्षण ७।४० द्वि० ४२ २९४ PER मन्दा नासाकर्म •लक्षण ८। १२८ द्वि० ३५० SPY मन्दा नासाकर्म विनियोग ८ १३१ पू० ३५१ मयूरललित करण ४।१४० उ०- १४१ पू० १२२ मरण भाव का लक्षण ७/८६ गद्य युक्त ३१२-३१३ FUE

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नाट्यशास्त्रम् ५३२ अध्याय /श्लोक पृष्ठBB प्रतीक ७१८५ के बाद गद्य ३१२ मरण भाव के दो भेद ३३ ९ मलिना संचारिभाव दृष्टि लक्षण ८।६३ मलिना संचारिभावदृष्टि-विनियोग ८८६ उ० ३४३ ५।२७ उ० १७७ महाचारी लक्षण ५।५२ उ० १८१ महाचारी-फल ९१ -९२ महादेव द्वारा नाट्य प्रशंसा ४।१२-१६ ४।२५७ उ० १४९ २०४ महापिण्डी (गणेश की) ९७ ४।५ ९ उ०-६० पू० मातृका लक्षण २।२२-२४ ४५-४६ मानुष रंगमण्डप २० ९ मार्गत्रय ध्रुवाओं की कलापें ५।१७४ के बाद प्रक्षिप्त ५/२० उ० १७४ मार्गासारित लक्षण ५।४७ पू० १८१ मार्गासारित का फच ५।१७४ के वाद प्रक्षिप्त २१० मिश्रा पूर्वरंग की गीति ९।११७ ३७७ मुकुल असंयुतहस्त लक्षण ३७७ ९।११८-११९ 699 मुकुल असंयुतहस्त-विनियोग ८/ ६९ ३४० 250 मुकुला संचारिभावदृष्टि लक्षण ३४३ - ३५४ मुकुला संचारिभाव दृष्टि विनियोग८।१५० उ०-१५१८८८ उपू०० मुखकर्म के ६ भेद ८।१५१ उ०- १५२ ३५४ मुख कर्म -लक्षण ८।१५३-१५७ उ० ३५४-३५५ 2FP मुखकर्म विनियोग ८।१५८ उ०, १५९ पू० ३५५ मुखराग के ४ भेद ] ८।१५९ उ०- १६१ ३५५ - [ ३७६ मुखराग विनियोग FSS मुख संदेशहस्त ९।१११०, ११३ – ११४ पू० ३६७ मुष्टि असंयुतहस्त का लक्षण ९.५५ ३६७ - Pis मुष्टि असंयुतहस्तविनियोग ९ ५६ ३९ २ मुष्टिकस्वस्तिक नृत्तहस्त ९०२०६ २५५ मूलरसों के ४ भेद ६।३८ के बाद गद्य २५५ ४१८ मूलरसों से उत्पन्न रस ६४३ ९ -४१ ( ) मृगप्लुता हरिणप्लुता आकाश चारी १०१४३ ३७२ 99 - मृगशीर्षक असंयुतहस्त लक्षण ९१८६ ३७२ - १ ९६- मृगशीर्षक असंयुतहस्त विनियोग ९ ८७

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वर्णक्रमगत विषयानुपूर्वी ५३३ पृष्ठ / प्रतीक अध्याय श्लोक ४२८ मोक्ष धनुःकरण - SIX १०, ९७ द्वि० ३८५ मोक्षण हस्तकर्म ( REFIV ९।१६७ द्वि० ९।१६८ द्वि० ३८५ मोटन हस्तकर्म 17 च०, ७१५२-५३ गद्ययुक्त २२३, २ ९७ मोह संचारी भाव ६।१८ ४।२५६ च० १४९य याक्षी पिण्डी ( कुबेर की) युद्ध विधान ३.९२-१३ ८६ रक्त मुखराग ८1१५ ९ पू० ३५५ रक्षण हस्तक ९ ।१६७ द्वि० ३८५ ३।९७ - ९८ ८७२४६ रंगदैवतपूजन का माहात्म्य रंगद्वार फल 1५1५१० १८१ ५।२६ १७६SPF रंगद्वार लक्षण ६।३० उ ० २२७029 रंग के ३ भेद २।३३ उ०- ३४ ४८Fes रंगशीर्ष -प्रकल्पना रंगशीर्ष-निर्माण विधि २१७१ उ०- ७४, १०० ५८, ६६ रंगपीठ निर्माण विधि २१ ९८ ६६ २।७९ उ०-८० पू० ६०PEE रंगमण्डप द्वार रंगमण्डप गवाक्ष २।८० उ०- ८१० ६० रति भाव का लक्षण ७ ९ गद्ययुक्त २८३ ६।३३ के बाद गद्य २५३255 रस की भावों से उत्पत्ति रसों के वर्ण ६।४२-४३ २५६ ६।४४-४५ २५६971 रसों के देवता के बाद गद्य, ६।३२-३३ २२८, २५२-५३PPP रस- निष्पत्ति- सूत्र १७ ३१ ६।१५ २२०#PP रसों के ८ भेद ६ रसों के तीन-तीन भेद ७।१२० के पूर्व प्रक्षिप्त ३२४ ३२२527 रस का लक्षण ६।३५-३६ तथा ७।१ ९ FYE के बाद प्रक्षिप्त ३२३ ७/ १ ९ २८५४ रिपुज क्रोध भाव का लक्षण रूदित भाव की ३ प्रकृतियाँ ७| १० के बाद गद्य २८४ रूप पिण्डी (लक्ष्मी की ) ४।२५५ च ० १४९ रेचक की निरुक्ति ४१२४८ के बाद प्रक्षिप्त १४७ १४७ रेचक के ४ भेद ३४ ४२४८-४९ १०

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५३४ नाट्यशास्त्रम् प्रतीक अध्याय /श्लोक पृष्ठ रेचित निकुट्टित करण ४।८९ उ० - ९० पू ० १०७ रेचित अंगहार लक्षण ४।२३३ उ ० – २३५ पू० १४४ रेचित कटिकर्म लक्षण ९।२४६ ४० ३ ९९ रेचित कटिकर्म विनियोग ९।२४ ९ द्वि० ३९९ रेचित ग्रीवाकर्म लक्षण ( ८।१७० तृ० ३५७ रेचित ग्रीवाकर्म विनियोग ८।१७० च० ३५७- रेचित नृत्तहस्त ९।१ ९ ३ ३९ ० ३४९ ८।१२० पू० रेचित कर्म लक्षण ८।१२५ उ० ३४९ रेचित कर्म विनियोग ३१ ९ | रोमांच सात्त्विकभाव के अनुभाव ७ १०३ ३१८ रोमांच सात्त्विक भाव के विभाव ७१ ९८ २६७ ६।६५ रौद्ररस के अनुभाव रौद्ररस के ३ भेद ६।७७ उ० २७२ रौद्ररस के लक्षण ६।६३ के बाद गद्य २६६-६७ रौद्ररस के बिभाव ६।६४ २६७- रौद्ररस भाव ७।११२ ३२१ ८\४९ प्र०, द्वि०, तृ० ३३६. रौद्री रसदृष्टि लक्षण रौद्री रसदृष्टिविनियोग- ८।४९ च० ३३६. ३३ ९ - लज्जान्विता संचारिभावदृष्टि लक्षण ८६५ ३४३ लज्जान्विता संचारिभावदृष्टि- विनियोग ८०८७ द्वि० ३९ १ लता नृत्तहस्त ९ ।१ ९ ८ १११ लतावृश्चिक करण ४ १०४ उ०- १०५ पू० ११३ – ललाटतिलक करण ४।११० उ० १११० १०८ ललित करण ४।९ ३ उ०- ९४ पू० ३ ९ ३ ललित नृत्तहस्त ९ २०९ पू० ३४१ - ललिता संचारिभावदृष्टि लक्षण ८.७३ ३४४ ललिता संचारिभावदृष्टि- विनियोग ८१ ९ ० उ० १०० लीन करण का लक्षण ४।६६ उ०- ६७ पू ३५२ ( ) लेहन लेहित चिबुककर्म का लक्षण ८।१४६ तृ० ३५४ ( ) लेहन लेहित चिबुककर्म विनियोग ८।१४९ द्वि० १३० UYP लोलित करण का लक्षण ४।१६५ उ० – १६६ पू०

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वर्णक्रमगत विषयानुपूर्वी ५३५ 32 प्रतीक अध्याय/श्लोक पृष्ठः - लोलित शिर कर्म लक्षण ८।३५ पू० ३३३० लोलित शिरः कर्म-विनियोग ८/३५ उ० ३३३ व वक्त्रपाणि का फल ५।४५ उ० १८० वक्त्रपाणि लक्षण ५।१ ९ पू० १७३. वर्तित करण ४१६२ उ०- ६३ पू० ९८ वर्तुल हस्तप्रचार ९।१८२० ३८८ वर्धमान संयुतहस्त लक्षण ९।१५८ पू० ३८४ वर्धमान संयुतहस्त-विनियोग ९।१५८ उ० – १५ ९ ३८४- वर्धमान का फल ५।४८ पू० १८१ वर्षाकृत आवेगभाव का लक्षण ७।६२ के बाद गद्य ३०१ TYE वलन ऊरूकमं-लक्षण ९/ २५२ पू० ४०० वलन ऊरूकर्म विनियोग ९।२५४ उ० ४०१ वलन नेत्रताराकर्म-लक्षण ८।९७ प्र० ३४५ DYE वलन नेत्रताराकर्म विनियोग ८ ९९ उ० ३४५. वलित करण का लक्षण ४।९ १ उ०- ९ २५० १०७ बलित ग्रीवाकर्म का लक्षण ८ १७२ प्र० ३५७/ वलित प्रीवाकर्म -विनियोग ८। १७२ द्वि० ३५७ वलित नृत्तहस्त ९ २० ९ उ० ३ ९ ३SPY वलितोरु करण का लक्षण ४।६३ उ०- ६४ पू० ९९. (अभिनय ) वस्तु के तीन भेद ८1१४ ३२ ९ वक्ष स्वस्तिक करण का लक्षण ४।७३ उ०- ७४० १०३ वाचिक अभिनय ८९ १० ३२८. वातकृत आवेग का लक्षण ७/६२ के बाद गद्य ३०१ वार्षगण्य न्याय १०१८२ उ०-८४ पू० ४२६SPE वार्षगण्य न्याय का विनियोग १०।७४ प्र ० ४२४SPE ि XPE विकूणित नासाकर्म लक्षण ८।१२ ९ प्र० ३५० विकूणित नासाकर्म विनियोग ८।१३२ उ० ३५१. विकृष्टा नासाकर्म-लक्षण ८। १२८ ० ३५०2PP विकृष्टा नासाकर्म विनियोग ८।१३१ उ० ३५१ SVE विकोशा संचारिभावदृष्टि -लक्षण ८०७९ ३४२ XV5 विकोशा संचारिभावदृष्टि ८ ९३ पू० ३४४

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५३६ नाट्यशास्त्रम् पृष्ठ120 / प्रतीक अध्याय श्लोक ४४-४५ विशाल मण्डप के दोष २०१८-२० ३८५ विकर्षण हस्तकर्म ९।१६६ द्वि० ११४ विक्षिप्त करण ४।११८ उ०- ११ ९ पू० १०५ff – विक्षिप्ताक्षितक करण ४।८१ उ० ८२ पू० २१४ विक्षिप्ता धवा की उपोहन विधि ५।१७४ के बाद प्रक्षिप्त २१५ विक्षिप्ता ध्रुवा का उदाहरण ५।१७४ के बाद प्रक्षिप्त ३८५ विक्षेप हस्तकर्म ९।१६७ तृ० १०1१९ ४१३ 'विष्यवा चारी (भोमी ) ३१५ ७ १२ गद्ययुक्त, वितर्क भाव ६।२१ ८२७४ ३४१ विकता सचारिभाव दृष्टि-लक्षण ३४४ वितकता संचारिभावदृष्टि- विनियोग उ० विताडित (वितालित, विलासित ) ८/१० 21998f80 ३४७ नेत्रपुटकर्म लक्षण 'विताडित (वितालित, विलासित) ३४८ नेत्रकर्म विनियोग ८ ११५ च० ११७ उ०—१२६५० १४३ विद्युद्भ्रान्त करण ४।१२५ उ०- २२ ९ पू० ४१८ विद्युद्भ्रान्त अंगहार ४।२२७ १०/४० विद्युद्भ्रान्ता चारी ( आकाशी ) २०७ विधिहीन पूर्वरंग जन्य दोष ५।१७१-७२ ८।१५१ च० ३५४ -विधुत मुखकर्म-लक्षण ३५४ ८1१५४६II विधुत मुखकर्म विनियोग ८२२ उ० ३३० विधुत शिरः कर्म- लक्षण ८/२४ ३३१ विधुत शिरः कर्म विनियोग ८।१४० द्वि० ३५२ विनिगूहन अधरकर्म -लक्षण ४८।१४३ प्र० ३५३ fare अधरकम विनियोग ३५४ ८1१५१ तृ० विनिवृत्त मुखकर्म- लक्षण TIFFIELD ३५४ विनिवृत्त मुखकर्म विनियोग ८।१५३ ११६ विनिवृत्त करण ४।१२२ उ०-१२३ पू० ३८९ -विप्रकीर्ण वृत्तहस्त ९ ।१८७ उ० ३४२ - विप्लुता संचारिभावदृष्टि लक्षण ८८७७ ३४४ विप्लुता - संचारिभावदृष्टि विनियोग १८ ९ २ पू०

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वर्णक्रमगत विषयानुपूर्वी ५३७ BR / प्रतीक अध्याय श्लोक पृष्ठ विबोध संचारी भाव ७७७ गद्ययुक्त३०७-३०८ विभाव का लक्षण ७१४ गद्ययुक्त २७ ९ -२८० विभ्रान्ता संचारिभाव दृष्टि लक्षण ८1७६ ३४१ विभ्रान्ता संचारिभावदृष्टि- विनियोग ८० ९ १ उ० ३४४ 1288 वियोग हस्तकर्म ९।१६७ ३८५. F विलासित (विताडित, वितालित ) नेत्रपुरक लक्षण ८ १११ च० ३४७- विलासित (विताडित, वितालित) नेत्र कर्म विनियोग 243 ८०११५ द्वि० ३४८ विलोकित दर्शन प्रकार ८।१०६ तृ० ३४६ विवर्त अधरकर्म -लक्षण ८।१३ ९ प्र० ३५२ विवर्त अधरकर्म विनियोग ८१४१ उ० ३५२ विवर्त (निवर्तन ) ऊरूकर्म- लक्षण ९/ २५३ उ० ४०० विवर्तन (निवर्तन ) ऊरूकर्म विनियोग ९।२५६ पू० ४०१ विवर्तन (निवर्तन ) ताराकर्म-लक्षण ८।९८ प्र० ३४५ ८1१०१ च० ३४५ ( ) विवर्तन निवर्तन ताराकर्म- विनियोग ११८ विवर्तित करण लक्षण ४।१२७ उ०-१२८ ३४७- विवर्तित नेत्रपुटकर्म लक्षण ८1999 तृ० ३४७- विवर्तित नेत्रपुटकर्म विनियोग ८1११२ तृ० ३९७ - विवर्तित पार्श्वक मं लक्षण ९।२३७० ३९८ विवर्तित पार्श्वक मं -विनियोग ९ २३९ च ० ३५४. 718 WOPY विवृत मुखकमं लक्षण ८।१५२ तृ० ३५५: विवृत मुखकर्म विनियोग २०१ ८।१५६ उ० ११६ PPP – विवृत्त करण लक्षण ४।१२१ उ० १२२ पू० SEE विवृत्त ग्रीवाकर्म-लक्षण ०४ ८।१७२ तृ० ३५७- DEP विवृत्त ग्रीवाकर्म विनियोग Piy ८।१७२ च० ३५७ विषपान जन्य अभिवात ४ ७।८७-८८ गद्ययुक्त ३१३-३१४- विषवेग की आठ स्थितियों ७।८७-८८ गद्ययुक्त ३१३-३१४ PVP. GIX 3153 विषाद भाव को तीन प्रकृतियाँ ७।६ ९ गद्ययुक्त ३०४ P विषाद भाव का लक्षण ७।६८-६९ मद्ययुक्त ३०४. 99% विषादिनी संचारिभावदृष्टि-लक्षण ८६८ ३४०-

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नाट्यशास्त्र ५३८ अध्याय/श्लोक पृष्ठ 83 प्रतीक - ४।१८७ उ०-८८१ ९९ ० ०पू० FIRE ३४३ विषादिनी संचारिभावदृष्टि विनियोग १३५ १३० ० विष्कम्भ अंगहार लक्षण ४।१६२ उ०—१६३० विष्कम्भ करण १३७ ४।१ ९ ४ उ०- १ ९७० अगहार लक्षण १२ ९ विष्कम्भापसृत उ०- १६१ पू० ४।१६० ३५२ विष्णुक्रान्त करण- लक्षण ८1१४० प्र० की विसर्ग अधरकर्म -लक्षण ३५२ ८। १४२ उ० -विसर्ग अधरकर्म विनियोग ३८५ ९ १६७ विसर्ग हस्तकर्म २२३, २८९ ६।१७, ७।२७ गद्ययुक्त विस्मय भाव ३३८ ८ ६० प्र०, द्वि०, तृ० स्थायिभावदृष्टि-लक्षण ३३८ विस्मिता स्थायिभाव दृष्टि- विनियोग ८६० च० २६२ विस्मिता ६५२ विहसित हास्य ६।६८ २६८ वीर रस के अनुभाव ६।७९ २७३ वीर रस के ३ भेद २६८ ६।६६ के बाद गद्य वीर रस का लक्षण २६८ ६।६७ वीररस के विभाव ३२१ ३३६ -वीररस के व्यभिचारी भाव ८०४ ९ १०७।११३-११४, द्वि०, तृ० वीरा रसदृष्टि के लक्षण ८१४९ च० ३३६ वीरसदृष्टि-विनियोग १५ १1४१ वृत्तियों के तीन प्रकार २२५ ६।२५ उ० -- २६ पू० वृत्तियों के चार प्रकार ११२ -वृश्चिक करण ४।१०६ उ०-उ०- १०८१०७ पूपू०० ११२ -वृश्चिक रेचित करण १११ ४।१०२४।१०७ उ०- १०३ पू० वृश्चिककुट्टित करण १३८ ४।२०२ उ०- २०४० -वृश्चिकासृत अगहार १३० ४।१६४ उ०-१६५० ३१७, ३१ ९ eys - वृषभक्रीडित करण ७ ९४ द्वि०, १०४ उ ० ३१७, ३१८, ९८ पू० - भाव ७१ ९४० वयं सात्त्विकभाव १४१ ४।२१८ उ०-२२१ पू० वैशाखरेचित अंगहार १० ९ ४।९७ उ० – ९ ८ प ० वैशाखरेचित करण वैशाखस्थानक-लक्षण १०।६१ उ०–६३ पू० ४२२

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वर्णक्रमगत विषयानुपूर्वी ५३ ९ उर प्रतीक asutr /श्लोक पृष्ठ वैशाखस्थानक विनियोग १०६३ उ०- ६५ पू० ४२३ 39 वैष्णव स्थानक के ४ अंग १०।९ ४ उ० – ९५ पू० ४२८ वैष्णव स्थानक का विनियोग १०।५४ पू० S III ४२१ ३३ व्यभिचारी भाव 0315 ६।१८-२१ २२३ व्यभिचारी भाव की निरुक्ति ७।२७ के बाद गद्य व्यसनाभिघातज आवेग का लक्षण ७६२ के बाद गद्य २८९ व्यंसित करण क ३०१ ४।१०८ उ०-१०९ ० कर्षणहस्तकर्म ९ ।१६६ द्वि० फु ११२ ३८५ व्याधि संचारी भाव ७८३ गद्य युक्त ३१० ३११ व्याधि संचारी भाव के भेद ७१८२ के बाद गद्य SP ३१० व्याधिभाव के अनुभाव ७१८२ के बाद, ७१८३ ३१०-३११ व्याधि भाव के विभाव ७१८२ के बाद गद्य ३१० व्याधिज मरण ७१८५ के बाद गद्य,, ८६ ३११-३१३ व्याभुग्न ( भुग्न) मुखकम-लक्षण ८/१५१ द्वि० ३५४ ( ) ३५५ याभुग्न भुग्न मुखकर्म विनियोग ८1१५५० व्यायाम का लक्षण १०१२ ४०८ ४२७ व्यायाम की विधि १०1८८ ३० - ८९ पू० – ४२ ९ व्यायाम के अनधिकारी १०।१०१ उ० १०२० ४३० – व्यायामव्यायाम कीके अधिकारीउपयोगिता १०।१०२ उ ० १०३ पू० १०।१०३ उ० ४३० व्यावर्तित हस्तकरण BYPIS ९।२१७ ३९ ४ ब्रीडा भाव का लक्षण ७।५८-५९ गद्य युक्त २९९ शकटास्य करण का लक्षण ४।१६७ उ०-१६८० १३१ शकटास्याचारी (भौमी ) लक्षण 1१०1१६ ४१२ शंका भाव के २ भेद ७।३४ SPIES २९२ शंका भाव का लक्षण ७।३२ के बाद गद्य २ ९ १ शंकिता संचारिभावदृष्टि लक्षण ८०६७८०६७ ३४० - ३४३ शंकित संचारिभावदृष्टि विनियोग ८८८ प्र ३१३ शस्त्रक्षतजन्य अभिघात ७१८६ के बाद गद्य ३२ ९ शाखा अभिनय वस्तु का लक्षण ८०१५ पू० २७४-२७७ शान्तरस का लक्षण ६।८२ के बाद गद्य से$ 59-558 BIE & SPRIC ६।८३ तक