भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 611–620

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 611–620

पृष्ठ 611

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नाट्यशास्त्रम् ५२० / प्रतीक अध्याय श्लोक करि पृष्ठ ३९ १ ९/ २०१० गरुडपक्ष नृत्तहस्त SSIF ११ ९ ४।१३१5 गरुडप्लुतक करण 2SIF ७।६७ गद्य युक्त____ ३०३, ३०४ गर्व व्यभिचारी भाव P &F -गान ( ध्रुवा ) के ५ भेद ६।२ ९ उ० २२७१८१ ५४७ उ०351 गीतक का फल -गीतियों के ४ भेद Yelop ५।१७४ के बाद प्रक्षिप्त २१०२८६ ७.१७ P गुरुज क्रोध १२१ ४।१३५ SPP गृध्रावलीन करण ग्रीवा कर्म के ९ भेद १८ १६७ पू० १६८ उ० ३५६१४७ ४।२४८ श्लोक के बाद ग्रीवा रेचक प्रक्षिप्त ३३ ९ ग्लाना संचारिभावदृष्टि-लक्षण ८६६ ३४३ लाना संचारिभावदृष्टि -विनियोग ८८७ उ २२३ ६।१८ ME SFTPS ग्लानि संचारीभाव 1312 २९ १ -७।३१-३२ गद्य युक्त २२६ ६।२८ पू० घ घन आतोद्य लक्षण ३५१ ८०१३५ पू० घूर्ण गण्डक १०८ ४ ९३ पू घूर्णित करण ११३ ४११४ पू० ११० च चक्रमण्डल करण ४।१०० पू० चतुर करण ३४८ ८११ ९ ० चतुर भ्र कर्म -लक्षण ३४ ९ - चतुर कर्म विनियोग ८१२४ / ६३ २८५-८८६२ EEP चतुरश्र नाटय मंडप ३८८ ९1१८४ चतुरश्र नृत्तहस्त ३७३ ९।९ ३ चतुर असंयुतहस्त लक्षण ३७३-३७४ चतुर असंयुतहस्त-विनियोग ९/ ९४० १०० ५।१२७ की टिप्पणी १९७ PE चतुरश्राधबा का उदाहरण २०० चतुरश्रा पूर्वरंगविधि का उपसंहार ५1१३७ ल २२३ ६।१ ९ चपलता संचारीभाव ७६० गद्य सहित ३०० PP ८०९७ ० ३४५ -चलननेत्र तासकमंलक्षण

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वर्णक्रमगत विषयानुपूर्वी ५२१ 35 प्रतीक अध्याय/ श्लोक ककिए पृष्ठ SP चलननेत्रताराकर्म- विनियोग ८1१०० पू० ३४५. १६ चारियाँ ( आकाशीय ) 90199-१३ ४।११२४ १६ चारियाँ ( भौमी ) ४ १०1८-१० ४१० PP चारियों के विनियोग १०1५-७ ४० ९ - ४१०-399 चारी का फल ५/५२ पू० १८१६१ चारी का लक्षण ५।२७ पू० १७७-, १०1१ १1३० ४०८-४०९ चाष गतिचारी ( भौमी ) ४ १०1१८ ४१२ चित्र पूर्वरंग की गीति ५1१५५ चित्रपूर्वरंग विधि ५।१४ ९.१५४ १२०२-२०३ चिन्ता भाव के अनुभाव ७1५१ २ ९७ PP चिन्ता भाव के लक्षण ७।५०-५१ गद्य युक्त २ ९६.९७ चिबुककर्म के ७ भेद 7212 ८। १४४०१४५ पू० ३५३OP चिबुककर्मों के लक्षण. ८।१४५ उ०- १४७० ३५३ चिबुकसमं विनियोस ८।१४७ उ०-१५० ३५४ छ छिन्न कटिकर्म लक्षण ४ ९ ।२५४ उ० ३९९ छिन्न कटिकर्म विनियोग ९१२४८० ३ ९९. छिन्न करण ४।१०५ उ० १०६ ११२ छिन्न चिबुककर्म-लक्षण ८।१४६ पू० ३५३ छिन्नकर्म विनियोग ३५४ ८ उ० 221 छेदन हस्तकर्म ९।१६८१८६ पू० ३८५ ज जंघा कर्म के ५ भेद 9917 ९।२५७ उ०-२५८ पू० ४०१ जंघाकर्म विनियोग ९।२६३ उ०-२६४ ४०३ जडता संचारी भाव ४४ ७/६६ गद्य युक्त ३०३421 जनित करण 5-618 ४।१५४ उ०- १५५ पू० १२७ - XP Y ६११ जर्जर पूजन ३।७३-८१ ८२-८३ जर्जरपूजन का फल Paply ५।५१ उ० १८१ YE जलाभ्युक्षण विधान Yo Pis ३।८४-८५ ८४ जिह्मा संचारिभाव दृष्टि लक्षण ८।७२ ३४१ जिह्मा संचारिभाव दृष्टि विनियोग ८1९० पू० ३४४, ७।२६ गद्य सहित २२३, २८८४ जुगुप्सा स्थायी भाव 28PS ६।१७

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५२२ नाट्यशास्त्रम् पृष्ठ SP प्रतीक / STAR अध्याय श्लोक ३३८ २४ जुगुप्सिता रसभाव दृष्टि का लक्षण ८।५९ प्र०, द्वि० तृ० ३३८ जुगुप्सिता रसभाव दृष्टि विनियोग ( ८१५९ ० ३१ १४९ झ झष पिण्डी ( कामदेव की ) ४।२५५ पू० ३ डोलापाद करण ४।१२० उ० १२१, पू० ११५ ६।२७ उ० २२६ त तत आतोद्य २ ९ ३ ७।३८ पू० P तरुण मद OP OFIP ९ ।१६७ च० ३८५ POP ०४ तर्जन हस्तकर्म ४ ६१ उ०, ६२ पू० १८ fx तलपुष्पपुट करण PioP ३८८ ९।१८६ तलमुख वृत्तहस्त ० तलविलसित करण ४।११६ उ०, ११७ ११४ तलस घटित करण ४।१५३ उ०, १५४ पू० १२६ तलसम्फोटित करण ४।१२ ९ उ०, १३० ११ ९ ९।१६८ प्र० ३८५ ताडन हस्तकर्म ४।२५ ९ उ०- २६१५० १५० ६ ताण्डव नृत्य की उत्पत्ति १५२ ताण्डव नृत्य का प्रयोग ॥ ४।२६७-२६८ पू० नाण्ड नृत्य का विषय 12 ४।२६८ उ०—२६९ पू० १५२ ९ ।१२२, १२४, १२५ ३८७ ताम्रचूड अस युतहस्त लक्षण ९ १२३, १२६ ३८७ ताम्रचूड संयुक्तहस्त· विनियोग कर्म के ९ भेद PIS ८1 ९ ५ ३०- ९८ ३४४-४५ ८ ९९ -१०१ ३४५ तारा नेत्रताराकर्म- विनियोग ताक्ष्यं पिण्डी ( विष्णु की) ४२५४ उ० १५ ९ ९।२२०३ ९ ५ तिर्यक् हस्तकरण तोदन हस्तक ९।१६६०३८५ ४।९४ उ०- ९ ५ पू० १०८ द दण्डपक्ष करण ९।२०२ ३ ९ १ दण्डपक्ष नृत्तहस्त ४।१४२ उ०—१४३ पू० १२३ दण्डपाद करण दण्डकरेचित करण ४।१०१ उ ० - १०२ पू० ११० दर्शन प्रकार के ८ भेद ८।१०४, १०४ पू० ३४६ ३४६ ६ दर्शन प्रकारों के लक्षण 1 ८1१०३-१०७ २८।१४७ उ० ३५३ -दष्ट चिबुककर्म का लक्षण ८१४ ९ ०३५४ दष्ट चिबुककम विनियोग

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वर्णक्रमगत विषयानुपूर्वी ५२३ प्रतीक कर / अध्याय श्लोक कलिए पृष्ठ १४ दारुकर्म विधि २१६८ ÷ ६ ९ हिन्दी हि ५५ दिक्स्वस्तिक करण109 1-32P1 ४७७ उ० - ७८ पू० १०४ PP दीना स्थायिभाव दृष्टि-लक्षण,, ८ ५५ प्र० द्वि० तृ० ३३७ 998 दीना स्थायिभाव दृष्टि-विनियोग -दीपिक -प्रदीपन विधि ८1५५० ३३७ SEE ३।९० - ९१ ८६298 दृप्ता स्थायिभाव दृष्टि के लक्षण,, दृप्ता स्थायिभाव दृष्टि -विनियोग ८५७ प्र० द्वि० तृ० ३३७ PEP ८५७ च०. ३३७ दृष्टि के ३६ भेद ८1३८-४२ RPI ३३४ आठ दृष्टि भेद ( रस सम्बन्धी) +REPSTE ३३४ आठ दृष्टि भेद (स्थायिभाव सम्बन्धी) ८०३८८१३ ९ ३३४ ४ बीस दृष्टि भेद (सचारिभाव सम्बन्धी) ८| ४०-४२ ३३४ देवों ( मण्डप-रक्षक ) की सूची ३४- ९ कार ६८ दैन्य सञ्चारी भाव ६।१८२२२ 2P1S3 दोल संयुत हस्त लक्षण ९।१४८३८२ 3090 दोल संयुक्त हस्त -विनियोग ९।१४९ ३८२ धर्मी के २ भेद 15P ६।२४ पू० २२४ धारा पिण्डी ( गंगा की ) ४।२५६ पू० १४ ९ धुत शिरः कर्म -लक्षण ८२२ २३० धुत शिर का विनियोग II ८।२३ ३३१ PP धूनन हस्तकर्म ९ १६७ तृ ३८५ धृति सञ्चारी भाव ७ ५६-५७ गद्य युक्त २९९ P-FP ध्रुवा के ५ भेद ५।१७४ के बाद प्रक्षिप्त 25177 २०८ ६।२ ९ PPI २२७ १६ ९ प्र०न ध्रुनतबागानग्रीवाकर्मके-लक्षणपांच प्रकार ८। ३५७ नत ग्रीवाकर्म -विनियोग ८१६ ९ ५०३५७ नत जंघा कर्म लक्षण. ९।२६००४०२ PSP मत जंघा-विनियोग ९।२६३५०४०३ नत पार्श्वकर्म लक्षण Pop ९।२३४०३ ९७ P &P नत पाश्र्वकर्म विनियोग ९ ।२३ ९ ३ ९८ FP नन नासाकर्म लक्षण ८१२८०३५० १३ नत नाताकर्म -विनियोग ८1१३००३५०

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नाट्यशास्त्र ५२४ प्रतीक / अध्याय श्लोक पृष्ठ ४।२५६ उ० १४९. नदी पिण्डी (वरुण की) 15 २०३ ५।१५६-१५७ - नर्तकी - निष्क्रमण १५६: ४।२८४ ३९२ नलिनीपद्मकोश नृत्तहस्त लक्षण 16 ३२८ ८1१२ नाट्य प्रयोग के ६ अङ्ग ३२९. नाट्य के ६ उपांग नागापसर्पित करण ४।१६६ उ०- १६७ पू० १३१. ३२-३८ १।१०७-१२५ नाट्यप्रशंसा ४०. नाटघमण्डप के तीन भेद २।७ ४०. १२: ८-१० नाट्यमण्डप के तीन प्रमाण नाट्यमण्डप निर्माण के 191 २।३२-३३ पू० ४८ प्रारम्भिक कृत्य. नाट्यमण्डप प्रारम्भ का मुहूर्त २।४२ उ०-४३ पू० ६८/५०६ ९ नाट्यमंडप के देवों की सूची ३।४-१० ७२ ७४ ३१२३-३२ नाट्यमंडप में देवों के स्थान नाट्यमण्डप के देवों के बलि पदार्थ ३.३७-४६ ७५-७७- २४ नाट्यमंडप के देवों के बलि ३।४७-७१ ७७.८१ प्रदान के मंत्र ८५. ३८७ १६ नाट्यमाताओं की प्रार्थना ११ नाट्यवेद के अधिकारी १।२० ६. ११८-१२ 27 नाटयवेद की उत्पत्ति १२-१५ १।२५-४० ( नाट्यवेद के श्रोता १८-१९ FIF ६।११ नाट्यवेद का निर्माण १३ ३५०. PS ८।१२८-५२९ नाताकर्म के ६ भेद 2781 नासाकर्मविनियोग ८।१३० १३२ ३५०-५११७५: १०४ नान्दी का लक्षण ५.२४ ५।४ ९ उ० १८१ ६० नान्दी का फल. निकुश्चित करण ४।८६ उ ० ८७ पू० १०६ 29912 ९ निकुट्टक करण पू० १०१ SFPIS ४।६४।१४५उ०-७०उ०-१४६ पू० १२३ नितम्ब करण नितम्ब नृत्तहस्त ९।१३ पू० उ० ३६१-३९०-

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वर्णक्रमगत विषयानुपूर्वी ५२५ I प्रतीक / अध्याय श्लोक पृष्ठ निद्रा संचारीभाव SPPIS ६।१ ९ ७७१ २२३ १४ ७२ गद्य सहित ३०५-३०६ 3XP निमेष नेत्रपुटकर्म का लक्षण ८1१०८० ३४७ 926 निमेषनेत्रपुटकर्म विनियोग ८११२० ३४७ II निर्भुग्न उर:कर्म-लक्षण ९ ।२२६ 315P ३ ९ ६ Pop निर्भुग्न उरका विनियोग ९.२२७-२२८ ३ ९ ६ निर्भुग्न मुखकमं-लक्षण ८ १.२ पू० ३५४ १४ निर्भुग्न मुखकर्म- विनियोग ८।१५४ उ० ३५४ 2P निर्वेद संचारी भाव ६।१८; ७।२८-३० २२३ 989 गद्य सहित २९ ० - ९ १ FYP निवर्तन ( विवर्तन ) ऊरूकर्म-लक्षण ९ ।२५३ उ० ४०० ( - निवर्तन विवर्तन ऊरूकर्म विनियोग ९।२५६ पू० ४०१ निवृत्त कटिकर्म -लक्षण PIBFIF९।२४६ पू० ३ ९९INSE निवृत्त कटिकर्म विनियोग ९.२४ ९ प्र० ३ ९९ FUP निवेश करण ४।१५७ १२७ SP निषेध हस्तमुद्रा ९।९ ४ ९ -९ ४७ ३८ ९ P निषेध हस्तमुद्रा विनियोग ९।१४२-१४३ ३८१ १४६-१४७ pep निष्क्रम नेत्रताराकर्म- लक्षण ८ ९८ तृ० ३४५ PSP निष्क्रम नेत्रताराकर्म-विनियोग 41१०० ३४५ निशुम्भत (निस्तम्भित ) करण निहंचित शिर का लक्षण ४।१२५ १० ११७ ८३० ३३२ 24 निहंचित शिर का विनियोग ८।३१ ३३२ PEE नूपुर करण ४१ ९७ १०९ नृत्त अभिनय -वस्तु ८.१५ च० ३२ ९ $ 19 नृत्त की उपयोगिता ४/ २६४-६६ १५६ नृत्त मातृका लक्षण ४।३१ ९४ नृत्तहस्तों के २९ भेद ९1११-१६. ३६१ नेत्रताराकर्म के ९ भेद ८1 ९ ६ - ९८ ३४५ 768 नेत्रताराकर्म विनियोग ८ ९९-१०१ ३४५ नेत्रपुट कर्मों के ९ भेद ८1१०८-१११ ३४७ ३४ ना०

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नाट्यशास्त्रम् १२६ अध्याय /श्लोक पृष्ठ प्रतीक ३४७-३४८ ८।११२-११५० ४९ २०३५६ नेत्रपुटकर्म विनियोग ' नेपथ्यगृहनिर्माण १८६ ५।६ ९ -७१ प पंचपदी गमनविधि ९1१८ ३६२ पताक असंयुक्तहस्त लक्षण ३६२ ९।१ ९ -२७ पू० पताक असंयुक्त हस्त -विनियोग ३७१ ९।७९३०-८० पू० 929 पद्मकोशक असंयुक्तहस्त लक्षण ९१८० उ-८३ ३७१-३७२ असंयुतहस्त विनियोग पद्मकोशक ४।२५४ उ ० १४९ पद्मपिण्डी (ब्रह्मा की ) १४९ ४।२५३ उ० पिण्डी (नन्दी की ) २९ २ पट्टसी ७३४ शंका १४२ ४२२१० २२३ पू० परसमुत्थ स विकसक ८३२ पृ० ३३२ Pay परावृत्तपरावृत्त अंगहारशिर का लक्षण एकीकी ३३२ ८।३२ उ० 225 शिर का विनियोग ३८५ परावृत्त ९।१६६ तृ० 227 परिग्रह हस्तकर्म ५।१ ९ उ० १७३ esp परिघट्टना का लक्षण १८० ५४६ पू० 735 परिघटना का फल १४० ४।२१२ उ० २१४ पू ० PS8 परिच्छिन्न अंगहार ८५ -३।८३ परिमार्जन विधान का ४५/२३ १७५ परिवर्तन का लक्षण ५।४९ पू० १८१ OFF PYE परिवर्तन का फल १ ॥ १८९ - ९० SPE epp परिवर्तनी धवा की प्रयोगविधि५८८.९५।८८-८९ पू० १८९ SPE परिवर्तिनी ध्रुवालक्षण ९।२१८ ३ ९४ PYE परिवर्तित हस्तकरण २११ ५।१७४ के बाद प्रक्षिप्त परिवर्तिनीधवा की PYE उपोहन विधि २१२ प्रक्षिप्त परिवर्तिनी धवा का उदाहरण ३३१ ८।२५ पू० परिवाहित शिर का लक्षण १८२६ ३३१ YE PPE शिर का विनियोग १२० परिवाहित ४।१३२ उ० १३३ पू० SPE परिवृत्त करण ४०२ ९।२६२ पू० 928 परिवृत्तजंघाकर्म-लक्षण ४०३ ९।२६४ उ० परिवृत्त जंधा -विनियोग IF

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वक्रमगत विषयानुपूर्वी ५२७ प्रतीक अध्याय/श्लोक पृष्ठ पू० १४१ परिवृत्तरेचित अंगहार PRIS ४।२१४-२१८ पर्यस्तक अङ्गहार ४।१७७ उ०-१७९ पू० १३३ पल्लब नृत्तहस्त ९।१ ९६५० ३९ ० वक्षप्रद्योतक नृत्तहस्त ९ २०१० ३९ १ पक्षवंचितक नृत्तहस्त ९॥२०० ३ ९ १ पातन नेत्रताराकर्म लक्षण ८१ ९७ द्वि० ३४५ पातनत्रताराकर्म विनियोग पातन कर्म -लक्षण ८1१०१८1११८ प्रपू०० ३४८३४५ पातन भ्र कर्म विनियोग ८।१२३ पू० ३४ ९ पादकर्म के ५ भेद ९ ।२६५ उ०-२६६ पू० ४०३ -पादरेचक ४।२४८ के बाद प्रक्षिप्त १४७ की चतुर्थपंक्ति ४ ९० उ०- ९ १ पू० १०७ पादापविद्धककरण ४ पार्श्वकर्म के ५ भेद ९१२३४ ३९७ I 25 पार्श्वकर्म विनियोग ९।२३ ९ -२४० ३ ९८ पार्श्वक्रान्तकरण लक्षण ४।१२३ उ०- १२४ पू० ११६ पार्श्वग ९1१८१ ३८८ पार्श्वग हस्तप्रचार ९।१६ ९ ३८५ पार्श्वच्छेद अङ्गहार ४।२२५ उ० २२७ पू० १४३ पार्श्वजानु करण ४।१३३ उ०- १३४ पू० १२० पार्श्वनिकुट्टक करण ४।१० ९ उ०- ११० पू० ११३ SPE पार्श्वमण्डली नृत्तहस्त ९ २०३ उ० ३९ १ पाव सन्देशहस्त ९ ।१११ ३७६ पार्श्व सन्दंशहस्त - विनियोग ९1११६ ३७७ पार्श्वस्वस्तिक अङ्गहार ४।१ ९९ उ०-२०२० १३८ पास पिण्डी ( यमराज की) ४।२५६ द्वि० १४ ९ पिण्डी बन्धों के नामकरण ४।२५२ उ०-२५३ पू० १४८ पिण्डी बन्धों के नाम ४।२५३ उ०-२५८ १४९ पिण्डीबन्धों के चार प्रकार ४१२८७ उ०- २८८ पू० १५७ पिण्डीबन्ध की निरुक्ति ४।२८८ उ०- २९९ ० १५७ पिहित नेत्रपुटकर्म - लक्षण ८1१११ ० ३४७

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नाट्यशास्त्रम् ५२८ अध्याय/श्लोक पृष्ठ REP प्रतीक ३४८ ८।११४ उ०- ११५ पू० ३८२PP पिहित नेत्रपुटकर्म विनियोग ९।१५० पुष्पपुट संयुतहस्त लक्षण ३८२ पुष्पपुट संयुक्तहस्त -विनियोग ९।१५१ ९ ।२४१ ० ३ ९८ पूर्णउदरकर्म का लक्षण ३९८ पूर्णउदर कर्म - विनियोग ९ ।२४३ पू० १६ ५॥७ १६ ९ पूर्वरंग नामकरण: १७० ५1८-११ पूर्वरंग के १ ९ अंग १८२ १७४ ५/५४ पूर्वरंग का उपसंहार २०८ ५/१७० २०७ फ पूर्वरंग का माहात्म्य २०७ ५।१७१-१७२ पूर्वरंग (विधिहीन ) जन्मदोष २१५ ५] प्रक्षिप्त पूर्वरंग ध्रुवाओं का उपसंहार १०३ ४।७६ उ०.७७ पू० पृष्ठस्वस्तिक करण ३९ ५ ९.२२० उ० पृष्ठानुसारी हस्तकरण ३९ ६ ९।२२ ९ प्रकम्पित उर:कर्म का लक्षण 394 ३ ९ ६ ९ ।२३० प्रकम्पित उर:कर्म विनियोग ३९९ ९।२४७ पू० प्रकम्पित कटिकर्म- लक्षण ३९९ ९।२४ ९ ३० प्रकम्पित कटिकर्म विनियोग २८६ ७1१८ I प्रणयिजक्रोध ७१ ९४ ३१७ ३१८ प्रलय सात्त्विकभाव ७।९९ ० प्रलयसात्त्विक के विभाव ३१ ९ ७१०७ प्रलय सात्त्विक के अनुभाव ३४६ ८।१०६ च० प्रलोकित दर्शन प्रकार ३४५ ८९७ च० प्रवेशन ( संप्रवेशन) ताराकर्म- लक्षण ३४५ उ० प्रवेशन ( संप्रवेशन ) -विनियोग ३५५ ८।१००८।१६० उ० 889 प्रसन्न मुखराग १२५ ४।१४८ उ०- १४ ९ पू० प्रसर्पित करण ३९७ Sup ९।२३७ पू० प्रसारित पार्श्वकर्म ३९८ १४ ९।२३९ ० IIII प्रसारित पार्श्वकर्मविनियोग ३ ९५ ९।२२१ प्रसारित हस्तकरण exp ३४७ प्रसूत नेत्रपुटकर्म -लक्षण ८०११०० OVE

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वर्णक्रमगत विषयानुपूर्वी ५२९ प्रतीक अध्याय/श्लोक करि प्रसृत नेत्रपुट कर्म- विनियोग ८| ११३ द्वि० ३४७ प्रस्तावक का निष्क्रमण ५।१६० उ०- १६१ पू० २०४ प्रस्तावना प्रयोग ५।१६१ के बाद प्रक्षिप्त २०५ १६५ १६६ उ० २०६ प्राकृत नेत्रताराकर्म-लक्षण ८१९ ८ तृ० ३४५ प्राकृत नेत्रताराकर्म-विनियोग ८1१०१ तृ० ३४५ ३०१६ 'प्रियश्रवणकृत आवेग भाव का लक्षण ७/६२ के बाद गद्य खोलित करण का लक्षण ४।१४४ उ०- १४५ पू० १२३ ८।१३४ च० ३५१ -फ फुल्ल गण्डकर्म लक्षण फुल्ल गण्डकर्म विनियोग ८०१३६ च० ३५२ बलि विधि ३४७-७१ ७७.८१ बहिगत ५।३०-४१ १७८-८० बीभत्स रस के अनुभाव ६।७४ २७१ बीभत्स रस भेद ६१८१ २७३ बीभत्स रस के लक्षण ६।७२ के बाद गद्य २७० बीभत्स रस के विभाव ६।७३ २७० ३२२ बीभत्स रस के व्यभिचारीभाव ७।११६ ३३६ बीभत्स रसदृष्टि लक्षण ८.५१ २८७-८८ भय भाव का लक्षण ७।२२-२५ गद्य युक्त २७० भयानक रस के अनुभाव ६।७०७२ २७३ भयानक रस के ३ भेद ६/८० २६९ भयानक रस का लक्षण ६।६८ के बाद गद्य २६ ९ भयानक रस के विभाव ६/ ६ ९ ३२१-३२२ भयानक रस के व्यभिचारी भाव ७।११५ ३३५ भयानका रसदृष्टि का लक्षण ८।४५ प्र ० द्वि० तृ० ३३५ भयानका रसदृष्टिविनियोग ८।४५ च० ३३८ अयान्विता स्थायिभाव दृष्टि लक्षण ८1५८द्वि तृप्र० ३३८ - अयान्विता स्थायिभाव दृष्टि विनियोग ८1५८ च० १३-१४ भरत के १०५ पुत्रों के नाम १२६-३९