भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 71–80

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 71–80

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१४ नाट्यशास्त्रम् कालियं भ्रमरं चैव तथा पीठमुखं मुनिम् । ॥ ३३ ॥ 11 नखकुट्टाश्मकुट्टौ च षट्पदं सोत्तमं तथा नखकुट्ट, ६२. ५७. कालिय, ५८. भ्रमर, ५ ९: पीठमुख, ६०. मुनि, ६१.

अश्मकुट्ट, ६३. षट् पद और ६४. उत्तम ॥ ३३ ॥

पादुकोपानही चैव श्रुति चाषस्वरं तथा ।

अग्निकुण्डाज्यकुण्डौ च वितण्ड्यं ताण्ड्यमेव च ॥ ३४ ॥

६५. पादुक, ६६. उपानह, ६७, श्रुति, ६८. चाषस्वर, ६ ९. अग्निकुण्ड, ७०. आज्यकुण्ड, ७१. वितण्ड्य, ७२. ताण्ड्य ॥ ३४ ॥

। कर्तराक्षं हिरण्याक्षं कुशलं दुस्सहं तथा लाजं भयानकं चैव बीभत्सं सविचक्षणम् ॥ ३५ ॥

७३. कर्तराक्ष, ७४. हिरण्याक्ष, ७५. कुशल, ७६. दुस्सह, ७७. लाज, ७८. भयानक, ७९. वीभत्स, ८०. विचक्षण ॥ ३५ ॥

पुण्ड्राक्षं पुण्ड्रनासं च असितं सितमेव च ।

विद्युज्जिह्वं महाजिह्वं शालङ्कायनमेव च ॥ ३६ ॥

८१. पुण्ड्राक्ष, ८२. पुण्ड्रनास, ८३. असित, ८४. सित, ८५. विद्युज्जिह्व, ८६. महाजिह्व, ८७. शालङ्कायन ॥ ३६ ॥

श्यामायनं माठरं च लोहिताङ्ग तथैव च ।

संवर्तकं पञ्चशिखं त्रिशिखं शिखमेव च ॥ ३७ ॥

८८. श्यामायन, ८९. माठर, ९ ०. लोहिताङ्ग, ९ १. संवर्तक, ९ २. पंचशिख, ९३. त्रिशिख, ९४. शिख ॥ ३७ ॥

शङ्खवर्णमुखं षण्डं शंकुकर्णमथापि च ।

शक्रनेमि गभस्तिं चाप्यंशुमालि शठं तथा ॥ ३८ ॥

९ ५. शङ्खवर्णमुख, ९ ६. षण्ड, ९ ७. शंकुकर्ण, ९ ८. शक्रनेमि, ९९. गभस्ति, १००. अंशुमाली, १०१. शठ ॥ ३८ ॥

विद्युतं शातजङ्घ च रौद्रं वीरमथापि च ।

पितामहाज्ञयाऽस्माभिर्लोकस्य च गुणेप्सया ॥ ३ ९ ॥

१०२. विद्युत, १०३. शातजङ्घ, १०४. रौद्र एवं १०५. वीर ( इन पुत्रों को

मैंने पढ़ाया' । ) ॥ ३ ९ ॥

१. यद्यपि "पुत्रशत " उल्लेखानुसार सौ नाम ही परिगणित होने अपेक्षित थे किन्तु भरत ने एक सौ पाँच नामों का उल्लेख किया है । संख्या का यह न्यून भेद महत्त्वपूर्ण नहीं ।

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प्रथमोऽध्यायः १५ प्रयोजितं पुत्रशतं यथाभूमिविभागशः । यो यस्मिन्कर्मणि यथायोग्यस्तस्मिन् स योजितः ॥ ४० ॥

अपने सौ पुत्रों को मैंने कार्यविभाग के अनुसार नियुक्त किया और जिस कार्य में जिस प्रकार उपयुक्त हो सकता था, उसको उसी (कार्य ) में नियुक्त किया ॥४० ॥

नाट्य की वृत्तियाँ- भारतीं सात्त्वतीं चैव वृत्तिमारभटीं तथा ।

समाश्रितः प्रयोगस्तु प्रयुक्तो वै मया द्विजाः ॥ ४१ ॥

हे ब्राह्मणो! मैंने नाटय के जिस प्रयोग का प्रयास किया वह तीन वृत्तियों'-भारती', सात्त्वती एवं आरभटी पर आश्रित है ॥ ४१ ॥

यहाँ यह शंका भी उठती है कि उल्लिखित यह सौ व्यक्ति भरत के वास्तविक पुत्र थे अथवा पुत्रवत् शिष्य थे । अभिनवगुप्त पुत्रों की संख्या व उनके नामों के विषय में मौन हैं । हमारे मत में इनमें कुछ तो भरत के औरस पुत्र हैं एवं कुछ नाट्यशास्त्र के प्रणेता एवं भरत के शिष्यगण हैं । १. वृत्ति - नाटकीय शैली को वृत्ति कहते है । वृत्ति का लक्षण देते हुए राजशेखर का कथन है- “विलासविन्यासक्रमोवृत्तिः ।" और विलास का विन्यास नृत्य, गीत वाद्य आदि के संयोगादि द्वारा चार तरह से सम्पन्न होता है । इन्हें ही चार वृत्तियाँ कहा गया है । नाट्यशास्त्र के बाइसवें अध्याय में वृत्तियों का विस्तृत विवेचन किया गया है ।

२. भारती -या वाक्प्रधाना पुरुषप्रयोज्या, स्त्री- वर्जिता संस्कृतवाक्ययुक्ता ।

स्वनामधेयैर्भरतैः प्रयुक्ता सा भारती नाम भवेत्त वृत्तिः ॥

-(ना०शा० २२-२५) नाट्य के जिस अंश में स्त्री पात्रों का अभाव होता हैं, केवल पुरुषपात्र ही होते हैं और वे संस्कृत भाषा का आश्रय लेकर प्रधानतः वाचिक अभिनय करते हैं, उस अंश में भरतों (नटों ) की उक्तियों के आधिक्य के कारण उसे "भारती " कहते हैं । अभिनवगुप्त के अनुसार भारती वाग्वृत्ति है । इसका समाश्रयण वाचिक अभिनय में होता हैं । (भारती वाग्वृत्तिः ) । ३. सात्त्वती - "या सात्त्वतेनेह गुणेन युक्ता न्यायेन वृत्तेन समन्विता च । हर्षोत्कटा संहृतशोकभावा सा सात्त्वतीनाम भवेत्त वृत्तिः ॥ ” - (ना०शा० २२-३७ ) अर्थात् सात्त्वती वृत्ति उसको कहते हैं जो सत्त्वगुणों से युक्त हो और न्यायोचित

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१६ नाट्यशास्त्रम् ब्रह्मा द्वारा कैशिकीवृत्ति की योजना- परिगृह्य प्रणम्याथ ब्रह्मा विज्ञापितो मया । अथाह मां सुरगुरुः कौशिकीमपि योजय ॥ ४२ ॥

इसके उपरान्त ब्रह्मा के पास जाकर प्रणाम करके मैंने उन्हें (स्वरचित इन तीन वृत्तियों से ) परिचित कराया । तब देवगुरु ब्रह्मा ने मुझसे कहा कि इस सूची में कैशिकीवृत्ति' को भी जोड़ लो ॥ ४२ ॥

वृत्ति से युक्त हो एवं जो हर्ष के आधिक्य तथा शोक के राहित्य को सूचित करने वाली हो । अभिनवगुप्त का कथन है कि - 'सत्' प्राख्यारूपसंवेदन को कहते हैं । संवेदन मन में होता है अतः मन- को भी सत्त्व कहते हैं । मन की वृत्ति सात्त्वती है औरऔर यह मनोव्यापार रूपा एवं सात्त्विक हैं । मनोव्यापाररूपा सात्विकी सात्त्वती ) ।

४. आरभटी— “प्रस्तावपाप्लुतल ङ्घितानि चान्यानि मायाकृतमिन्द्रजालम् ।

चित्राणि युक्तानि च यत्र नित्यं तां तादृशीमारभटीं वदन्ति ॥

-(ना०शा० २२-५७ ) नाट्य के जिस स्थल पर उठना, गिरना, उछलना लांघने की घटनाओं का उल्लेख हो, जहाँ मायारचित इन्द्रजालादि का प्रदर्शन हो एवं जहाँ पर आश्चर्यकारी घटनाओं की योजना हो, वहाँ आरभटी वृत्ति प्रयुक्त होती है । अभिनवगुप्त के मत में आरभटी कार्यवृत्ति है, जो आंगिक अभिनय में होती हैं । इसमें भट सदा आर, अर्थात् सोत्साह रहते हैं अतः यह आरभटी कहलाती है । (इयतीत्यरा भटाः सोत्साहा अनलसास्तेषामियमारभटी, कार्यवृत्ति.... ) ।

१. कैशिकी--या श्लक्ष्णनेपथ्यविशेषचित्रा स्त्रीसंयुता या बहु नृत्तगीता ।

कामोपभोगप्रभवोपचारा तां कैशिकीं वृत्तिमुदाहरन्ति ॥

-(ना० शा० २२-४७ ) अर्थात् नाट्य के जिस भाग में कृत्रिम श्रृङ्गार आदि का आयोजन होता है, स्त्री एवं नृत्य व गीत का प्राधान्य होता है, काम के उपभोगों से जन्य उपचारो पात्र वाले उस भाग में कैशिकी वृत्ति होती है । की व्याख्यानुसार कैशिकी सौन्दर्योपयोगी व्यापार को कहते हैं । केशोंअभिनवगुप्तका काम शरीर की शोभा बढ़ाना है उसी प्रकार विविधरूप नृत्य, संगीत जैसे आचरणों से नाट्य की शोभा बढ़ती है । इस भाँति ' कैश' शब्द एवं शृङ्गार

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प्रथमोऽध्यायः १७ यच्च तस्याः क्षमं द्रव्यं तद्ब्रूहि द्विजसत्तम एवं तेनास्म्यभिहितः प्रत्युक्तश्च मया प्रभुः ॥ ४३ ॥

ब्रह्मा ने मुझसे कहा- हे द्विजश्रेष्ठ! इस ( कैशिकी वृत्ति ) की योजना के लिए जो आवश्यक सामग्री है वह मुझसे बतलाओ । तब मैंने ब्रह्मा से. ( इस प्रकार) इन कहा - ॥ ४३ ॥ -ची दीयतां भगवन् द्रव्यं कैशिक्याः सम्प्रयोजकम् । नृत्ताङ्गहार संपन्ना रसभावक्रियात्मिका ॥। ४४ ॥रने दृष्टा मया भगवतो नीलकण्ठस्य नृत्यतः । कैशिकी श्लक्ष्णनैपथ्या शृङ्गाररससम्भवा ॥ ४५ ॥! ( ) न हे भगवान् आप मुझको वह पदार्थ दीजिये जो कैशिकी वृत्ति के सम्यक् र प्रयोग के लिए आवश्यक है । मैंने नीलकण्ठ भगवान् शंकर के नृत्य के समय जिस ' ( ),की कैशिकी वृत्ति का दर्शन किया था वह वृत्त के अंगहारों अंगसंचालनों से संयुक्त थी एवं उसकी प्रक्रिया में रस तथा भावों का प्रदर्शन था । उसे सुन्दर वस्त्रों की

अपेक्षा है, और वह श्रृंगार रस से उत्पन्न हुई है ॥ ४४-४५ ॥ "

अशक्या पुरुषः सा तु प्रयोक्तु स्त्रीजनादृते ।

ततोऽसृजन् महातेजा मनसाऽप्सरसो विभुः ॥ ४६ ॥

नाट्यालङ्कारचतुराः प्रादान् मह्यं प्रयोगतः । से व्युत्पन्न करके इस वृत्ति का नाम 'कैशिकी' होना उपयुक्त है । (... एवं यत्किञ्चिल्लालित्यं तत्सर्वं कैशिकीविजृम्भितम् ) । 1 श्री घोष के मत में वृत्तियों के यह चारों नाम भरत, सात्वत कैशिक एवं अर्भट इन जातियों से संबन्धित हैं । इनमें प्रथम दो जातियाँ तो अत्यधिक प्रसिद्ध हैं । अन्य दो के नाम कदाचित् काल कवलित हो गए । १. अंगहार — इसके लिए नाट्यशास्त्र के चतुर्थ अध्याय के १६-२९ श्लोक तथा १७०-२४५ श्लोक दृष्टव्य हैं । अभिनवगुप्त के मत में लास्यमय गति के साथ अंगों का समुचित स्थान पर त्रुटिरहितरूप में पहुँचना अंगहार है ( तत्र येऽङ्गहारा अङ्गानां हरणानि अत्रुटितरूप- तया समुचितस्थानप्राप्तयः, ताभिः सम्पन्ना) । २. रस एवं भावों का विशद विवेचन नाट्यशास्त्र के सप्तम अध्याय में हुआ है । वैसे यह विषय इतना विशद है कि यहाँ इसका परिचय देना उपयुक्त नहीं । २ ना०

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१८ नाट्यशास्त्रम्, ( ) स्त्रियों के बिना केवल पुरुषजन इस कैशिकी वृत्ति का सम्यक् रूप से प्रयोग प्रनहीं कर सकते । इस कारण उन महान् तेजस्वी (ब्रह्मा ) ने नाट्य के अलङ्कार में चतुर अप्सराओं की मानसी सृष्टि की । और उन्हें मुझे प्रयोग के सहायतार्थ, नि १. यहाँ यह शंका उठती है कि स्त्रीजन के बिना कैशिकी वृत्ति का प्रयोग असम्भव है, तब इसका सर्वप्रथम प्रयोग करने में शंकर किस भाँति समर्थ हुए । इसके उत्तर में कुछ लोगों का विचार है कि शंकर के साथ उमा ने इस वृत्ति का प्रयोग किया होगा । जब कि दूसरा मत यह है कि विचित्र अंगहारों ( शिखा पाशादि) से युक्त होकर स्वंय शंकर ने इसका अभिनय किया होगा । नृत्यरत चीननीलकण्ठजानकापड़ताही उल्लेखहै कि अभिनेताहै, उमा काके हृदयनहीं । में समुत्पन्नअतः अभिनवगुप्तरस के प्रभावका मतसे हीपवित्रतासमी- देव का उदय हो जाने पर पुरुष के अभिनय में भी रसाभिव्यक्ति के अनुरूप सौन्दर्य आ वि सकता है । शंकर के अभिनय में तद्रूप पवित्रता होने से उनके द्वारा कैशिकीवृत्ति का अभिनय सम्भव है । और यदि पुरुष होने मात्र से शिव स्त्रीमात्रप्रयोज्य कैशिकी वृत्ति के प्रयोग के अनधिकारी हैं तो फिर केश बन्धन करते हुए विष्णु द्वारा कैशिकी वृत्ति को उत्पन्न की२ करने की कथा भी अनर्गल हो जाएगी - विचित्रैरङ्गहारैस्तु देवो लीलासमन्वितैः । बबन्ध यः शिखापाशं कैशिकी तत्र निर्मिता ॥- (ना० शा० २०-१३ ) किन्तु यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि प्रस्तुत वर्णन में कैशिकी वृत्ति में विष्णु से समुत्पन्न_ होने का तो वर्णन है किन्तु विष्णु के पुरुष वेष से नहीं अपितु उनके मोहिनी रूप से । इस भाँति यदि, कैशिकी को शंकर द्वारा प्रयुक्त मानना है तो यह कि मानना पड़ेगा कि उसका प्रयोग शंकर ने जटाजूटधारी पुरुष वेष द्वारा नहीं, अपितु स्त्रीजनोचित विचित्र शृंगार तथा लास्यमय वेषभूषा को धारण करके किया होगा । इस विवेचन द्वारा स्पष्ट है कि यद्यपि कैशिकी वृत्ति के स्रष्टा विष्णु तथा उसके प्रि, प्रथम प्रयोक्ता शिव दोनों ही पुरुष हैं तथापि साधारण पुरुष इसके अभिनय में ता, अक्षम हैं इसके प्रयोग के लिये स्त्रियाँ ही उपयुक्त हैं । में २. अप्सराओं की ब्रह्मा द्वारा सृष्टि से यह जिज्ञासा उठती है कि इसके पहले अप्सराओं की स्थिति थी अथवा एक ओर तो स्वर्ग की कल्पना अप्सराओं के बिना अधूरी लगती है और दूसरी नहीं?ओर यह शंका होती है कि यदि पहले से कर अप्सराएँ थीं तो ब्रह्मा द्वारा अप्सराओं की उत्पत्ति की क्या संगति है?

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प्रथमोऽध्यायः १९ प्रदान किया ॥ ४६ ॥

ब्रह्मा ने जिन अप्सराओं चौबीस की मानसी सृष्टि की उनके नाम निम्नलिखित हैं- मञ्जुकेशीं सुकेशीं च मिश्रकेशीं सुलोचनाम् ॥ ४७ ॥

सौदामिनीं देवदत्तां देवसेनां मनोरमाम् ।

सुदतीं सुन्दरीं चैव विदग्धां विपुलां तथा ॥ ४८ ॥

सुमालां सन्तति चैव सुनन्दां सुमुखीं तथा । १. मंजुकेशी, २. सुकेशी, ३. मित्रकेशी, ४. सुलोचना, ५. सौदामिनी, ६. देवदत्ता, ७. देवसेना, ८. मनोरमा, ९. सुदती, १०. सुन्दरी, ११. विदग्धा, १२. विपुला, १३. सुमाला, १४. सन्तति, १५. सुनन्दा, १६. सुमुखी ॥ ४७-४९ ॥ मागधीमर्जुनीं चैव सरलां केरलां धृतीम् ॥ ४९ ॥

नन्दां सपुष्कलां चैव कलभां चैव मे ददौ । १७. मागधी, १८. अर्जुनी, १ ९. सरला, २०. केरला, २१. धृति, २२. नन्दा, २३. सुपुष्कला, एवं २४. कलभा (नामक अप्सराएँ ब्रह्मा ने मुझको प्रदान की' ॥ ४ ९ -५० ॥ ब्रह्मा द्वारा वाद्य तथा गायन के लिए स्वाति तथा नारद की नियुक्ति- स्वातिर्भाण्डनियुक्तस्तु सह शिष्यैः स्वयम्भुवा ॥ ५० ॥

नारदाद्याश्च गन्धर्वा गानयोगे नियोजिताः । स्वयंभू ब्रह्मा ने शिष्यों सहित स्वाति को बाद्ययंत्रों को बजाने के लिए नियुक्त किया तथा नारद इत्यादि गन्धर्वों को गायन ' के लिए निबद्ध किया ॥ ५०-५१ ॥ १. अप्सराओं की इस विस्तृत तालिका में उर्वशी, मेनका एवं तिलोत्तमा सदृश प्रसिद्ध तथा पौराणिक अप्सराओं की नामगणना नहीं हुई है । कदाचित् वे देव- ताओं की अधिकार -सीमा में हैं और इन चौबीस की रचना विशेष रूप से मृत्युलोक में नाटक के अभिनय के लिए हुई है । २. अभिनवगुप्त के अनुसार स्वाति एक ऋषि थे । वर्षा के समय गिरती हुई जलधारा के द्वारा नानाविध ताड़ित कमलपत्रों से उत्पन्न ध्वनियों का अनुसरण करके उन्होंने पुष्कर वाद्यों की रचना की थी । ३. अभिनवभारती में भाण्ड का अर्थ मृदङ्गादिव्वाद एवं 'गानयोगे ' पद में

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२० नाट्यशास्त्रम् एवं नाट्यमिदं सम्यग् बुद्ध्वा सर्वैः सुतैः सह ॥ ५१ ॥

स्वातिनारदसंयुक्तो वेदवेदाङ्गकारणम् । उपस्थितोऽहं ब्रह्माणं प्रयोगार्थं कृताञ्जलिः ॥ ५२ ॥

नाट्य का सम्यक् ज्ञान प्राप्त करके उसके प्रयोग के लिए मैं स्वाति इसनारदप्रकारके साथ वेद एवं वेदांग के प्रणेता एवं ब्रह्मा के सम्मुख हाथ जोड़करऔर उपस्थित हुआ ॥ ५१-५२ ॥ भरतमुनि का ब्रह्मा जी से प्रश्न- नाट्यस्य ग्रहणं प्राप्तं ब्रूहि किं करवाण्यहम् । एतत्तु वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच पितामहः ॥ ५३ ॥

(मैंने ब्रह्मा से पूछा ) मैंने नाट्य का ज्ञान प्राप्त किया अब कृपया बतलाइये कि मैं एतदर्थ और क्या करू । यह बात सुनकर पितामह ( ब्रह्मा ) ने प्रत्युत्तर दिया ॥ ५३ ॥

ब्रह्मा द्वारा भरत के प्रश्न का उत्तर—

महानयं प्रयोगस्य समयः प्रत्युपस्थितः ।

अय ध्वजमहः श्रीमान् महेन्द्रस्य प्रवर्तते॥ ५४ ॥

इन्द्रध्वज महोत्सव में इन्द्रविजयरूपक का अभिनय- अत्रेदानीमयं वेदो नाटयसंज्ञः प्रयुज्यताम् । [ इसके ] अभिनय के लिए यह अत्यन्त उपयुक्त अवसर अनायास आ गया है । अधुना महेन्द्र के ध्वजपूजन का उत्सव मनाया जा रहा है । इसी अवसर पर इस महोत्सव में ही इस नाट्य संज्ञक वेद का प्रयोग करना चाहिये ॥ ५४-५५ ॥ गान का अर्थ तन्त्र-वाद्य किया गया है । सम्भवतः नारद की वीणा के उल्लेख से गान का अर्थ तंत्र वाद्य लिया गया है । २. इन्द्रध्वज प्राचीन काल का अत्यधिक जनप्रिय उत्सव है । यह भाद्रपद की शुक्ला द्वादशी को मनाया जाता था । कुछ लोग इसे ही बसन्तोत्सव मानते । इन्द्र वैदिक आर्यों का प्रियतम देवता था, एवं पुराणों में भी इन्द्र स्वर्ग के अधिपति के रूप में अभीप्सिततम स्थान का अधिष्ठाता है । इस कारण इन्द्र से सम्बन्धित उत्सव में हर्ष, उल्लास, उत्साह एवं आहलादादि के बाहुल्य का होना अपेक्षित है और इस दृष्टि से जनमानस के रंजक नाट्य के प्रथम अवतरण के लिये इस लोकोत्सव से अधिक उपयुक्त और कौन सा अवसर हो सकता है ।

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प्रथमोऽध्यायः २१ ततस्तस्मिन् ध्वजमहे निहतासुरदानवे ॥ ५५ ॥ प्रहृष्टामर संकीर्णे महेन्द्रविजयोत्सवे । पूर्वं कृता मया नान्दी ह्याशीर्वचनसंयुता ॥ ५६ ॥

तब असुर व दानवों की पराजय के द्योतक एवं इन्द्र की विजय के प्रतीक उस ध्वजोत्सव में, जिसमें प्रफुल्लित देवता भरे हुए थे, मैंने सर्वप्रथम आशी- वादात्मक वचनों से युक्त नान्दी' का पाठ किया है ॥ ५५-५६ ॥ अष्टाङ्गपदसंयुक्ता विचित्रा वेदनिर्मिता ॥। ५७ ॥ तदन्तेऽनुकृतिर्बद्धा यथा दैत्याः सुरैर्जिताः (यह नान्दी ) आठ अंगों वाले पदों से युक्त थी एवं वेद द्वारा निर्मित थी । इसके अन्त में जिस भाँति ( के क्रिया कलापों से ) देवताओं के द्वारा असुरों पर विजय पाई गयी थी उसका अनुकरण किया गया था ॥ ५७ ॥

। संफेटविद्रवकृता च्छेद्यभेद्याहवात्मिका ॥ ५८ ॥ ततो ब्रह्मादयो देवाः प्रयोगपरितोषिताः

[असुरों पर देवों की विजय का यह अनुकरण ] दोषपूर्ण तुमुलनादयुक्त' तथा १. नान्दी - यह नाट्यशास्त्र का एक पारिभाषिक शब्द है । भरतमुनि के अनुसार इसकी परिभाषा निम्नलिखित है- आशीर्वचनसंयुक्ता नित्यं यस्मात् प्रयुज्यते । - ना० शा० ५.२४ es.p देवद्विजनृपादीनां तस्मान्नान्दीति संज्ञिता ॥ सूत्रधारः पठेत्तत्र मध्यमं स्वरमाश्रितः । नान्दी पदैर्द्वादशभिरष्टाभिर्वाप्यलङ्कृताम् ॥-ना० शा० ५.१०४ इसके अनुसार देवताओं, ब्राह्मणों व राजाओं की शुभाशंसा के पद्य नाटक के प्रारम्भ में पढ़े जाते हैं, जो सबके नन्दन के हेतु होने से नान्दीसंज्ञक होते हैं । इनमें १२ या ८ पद होते हैं और इनका पाठ मध्यम स्वर से किया जाता है । २. अष्टांगपद - घोष के अनुसार यहाँ पद के आठ अङ्ग इस प्रकार हैं । १-नाम, २ -आख्यात, ३ उपसर्ग, ४ -निपात, ५-समास, ६-तद्धित, ७-सन्धि, और ८-विभक्ति । ३. सम्फेट – ' रोषग्रथितवाक्यस्तु संफेटः परिकीर्तितः ' । - (ना० शा० १ ९.८८) अर्थात् रोषयुक्त वाक्यों के समूह को 'संफेट' कहते हैं ।

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२२ नाट्यशास्त्रम् भयकातर पलायन' से युक्त था एवं इसमें प्रभूत मारकाट और युद्ध के लिये आह्वान थे ॥ ५८ ॥

देवों द्वारा अभिनेताओं को पुरस्कार- प्रददुर्मत्सुतेभ्यस्तु सर्वोपकरणानि वै ।

प्रीतस्तु प्रथमं शक्नो दत्तवान् स्वं ध्वजं शुभम् ॥ ५ ९ ॥

[नाट्य के प्रदर्शन से संतुष्ट देवों ने ] प्रसन्नमन होकर मेरे पुत्रों को विविध वस्तुएं दीं । उनमें सबसे पहले इन्द्र ने प्रसन्न होकर अपना मंगलकारी ध्वज प्रदान किया ॥ ५ ९ ॥

ब्रह्मा कुटिलकं चैव भृङ्गारं वरुणः शुभम् ।

६० ॥ सूर्यश्छत्रं शिवस्सिद्धि वायुर्व्यजनमेव च ॥

ब्रह्मा ने अपना वक्रदण्ड' दिया, वरुण ने कमण्डलु ' दिया, सूर्य ने छत्र, शिव ने सिद्धि एवं वायु ने पंखा दिया ॥ ६० ॥

विष्णुः सिंहासनं चैव + कुबेरो मकुटं तथा ।

श्राव्यत्वं प्रेक्षणीयस्य ददौ देवी सरस्वती ॥ ६१ ॥

विष्णु ने सिंहासन, कुबेर ने मुकुट तथा देवी सरस्वती ने दृश्य-नाट्य में श्राव्यत्व ( सुने जाने का सौष्ठव ) प्रदान किया ॥ ६१ ॥

१. विद्रव - विद्रव का नाट्यशास्त्र में दो स्थलों पर उल्लेख हुआ है- नृपाग्निभयसंयुक्तः संभवो विद्रवः स्मृतः । -ना० शा० १ ९.८७ अर्थात् राजा या अग्नि के भय से पलायन करना विद्रव है । तथा गुरुव्यतिक्रमो यस्तु विज्ञेयो विद्रवस्तु सः । -ना० शा० १ ९.८ ९ अर्थात् सम्माननीय व्यक्तियों की आज्ञा का उल्लंघन करना (अनुशासन- हीनता ) विद्रव है । २. अभिनवगुप्त के मत में यहाँ ब्रह्मा ने जो कुटिलक (वक्रदण्ड ) प्रदान किया वह विदूषकोपयोगी है । नाट्यशास्त्र में कपित्थ अथवा बिल्व के दण्डकाष्ठ का उल्लेख हुआ है जो त्रिवन कहा गया है पर वहाँ उसे विदूषक के उपयोग की वस्तु नहीं बताया गया है । ३. अभिनवभारती के अनुसार कमण्डलु पारिपार्श्विक के उपयोगार्थ है । ४. अभिनवगुप्त के मत में सूर्य द्वारा प्रदत्त छत्र आतपनिवारणार्थ है ।

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प्रथमोऽध्यायः २३.

शेषा ये देवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ।

तस्मिन् सदस्यभिप्रेतान् नानाजातिगुणाश्रयान् ॥ ६२ ॥

अंशांशैर्भाषितं भावान् रसान् रूपं बलं तथा ।

दत्तवन्तः प्रहृष्टास्ते मत्सुतेभ्यो दिवौकसः ॥ ६३ ॥

इसके अतिरिक्त उस सभा में उपस्थित शेष अन्य देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस एवं नाग समूह ने अत्यधिक प्रमुदित होकर अपने-अपने अंशों से उद्भूत विविध जाति एवं विविध गुण युक्त भावों, रसों, रूप-बल तथा आभरणों को मेरे पुत्रों को प्रदान किया ॥ ६२-६३ ॥ इन्द्रविजय रूपक देखकर दैत्यों एवं दानवों का क्षुब्ध होकर नाटक में विघ्न उत्पन्न

करना-एवं प्रयोगे प्रारब्धे दैत्यदानवनाशने ।

अभवन् क्षुभिताः सर्वे दैत्या ये तत्र संगताः ॥ ६४ ॥

असुरों एवं दैत्यों के नाश का ( प्रदर्शन करने वाले ) अभिनय के प्रारम्भ होने पर वे सब दानव जो वहाँ आकर एकत्रित हुए थे— अत्यधिक क्षुब्ध हो उठे ॥ ६४ ॥

विरूपाक्षपुरोगांश्च न क्षमिष्यामहे विघ्नान्'नाटयमेतदागम्यतामितिप्रोत्साह्य तेऽब्रुवन् ॥। ६५ ॥ 'उन्होंने विरूपाक्ष ' इत्यादि विघ्नों को उकसा कर कहा कि हम इस नाट्य को सहन नहीं करेंगे अतः हमें यहाँ से चले आना चाहिये ॥ ६५ ॥

ततस्तैरसुरैः सार्द्धं विघ्ना मायामुपाश्रिताः ।

वाचश्च ष्टां स्मृतिं चैव स्तम्भयन्ति स्म नृत्यताम् ॥ ६६ ॥

तब माया का आश्रय लेकर विघ्नों ने उन असुरों के साथ मिलकर नृत्य करने वाले (नटों ) की वाणी, चेष्टा तथा स्मृति को जड़ बना दिया ॥ ६६ ॥

इन्द्र द्वारा जर्जर से विघ्नों का विनाश करना- तथा विध्वंसनं दृष्ट्वा सूत्रधारस्य देवराट् । कस्मात् प्रयोगवैषम्यमित्युक्त्वा ध्यानमाविशत् ॥ ६७ ॥

सूत्रधार' को इस प्रकार विध्वंसित होते देखकर और यह कहकर कि किस १. यों तो विरूपाक्ष का शाब्दिक अर्थ विकृत इन्द्रिय वाला एवं रूढार्थ शंकर के प्रति अभिप्रेत है, किन्तु यहाँ इस पद का प्रयोग अनिष्टकारी दुरात्मा के रूप में हुआ है । है [ सूत्रधारस्य ]. २. सूत्रधार शब्द का प्रयोग यद्यपि एकवचन में हुआ