भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 81–90

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 81–90

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२४ नाट्यशास्त्रम् कारण से अभिनय में यह बिघ्न हो रहा है, देवराज इन्द्र [ कारण जानने के लिये ] ध्यानावस्थित हो गए ॥ ६७ ॥

सहेतरैःअथापश्यत् सदोसूत्रधारंविघ्नैः समन्तात्नष्टसंज्ञ परिवारितम्जडीकृतम् ॥। ६८ ॥ ध्यान में इन्द्र ने सभाभवन के चतुर्दिक् विघ्नों से घिरा हुआ तथा अन्य [ अभिनेताओं ] के साथ सूत्रधार को चेतनारहित एवं निश्चेष्ट पड़े हुए देखा ॥ ६८ ॥

उत्थाय त्वरितं शक्रः गृहीत्वा ध्वजमुत्तमम् । सर्व रत्नोज्ज्वलतनुः किञ्चिदुद्वृत्तलोचनः ॥ ६९ ॥ रंगपीठगतान् विघ्नानसुरांश्चैव देवराट् । जर्जरीकृतदेहांस्तानकरोज्जर्ज रेण सः ॥ ७० ॥

इसके पश्चात् समस्त रत्नों से अधिक कान्तियुक्त शरीर वाले और कुछ ऊपर की ओर चढ़ी आँखों वाले इन्द्र ने उठकर, अपने ध्वज को [हाथ में ] लेकर रंगमञ्च पर उपस्थित समस्त विघ्नों तथा [ उनके प्रेरक ] असुरों के शरीरों को जर्जर ' से [ पीट पीटकर ] जर्जरित कर दिया ॥ ६ ९-७० ॥ तथापि अभिनवभारती के अनुसार यहाँ तात्पर्य अकेले सूत्रधार से न होकर सपरिवार सूत्रधार से है । वैसे सूत्रधार शब्द नाट्य का एक पारिभाषिक शब्द है । नाट्य के संचालक को 'सूत्रधार' कहते हैं । यह नान्दी के पश्चात् रङ्गमञ्च पर प्रवेश करता है एवं नाट्य के कार्य के कारणभूत बीज का संकेत देने वाला नट होता है । अपने साथियों के साथ सूत्रधार के विध्वंसित होने का उल्लेख इस तथ्य का परिचायक ही हुआ ।है कि दैत्यों द्वारा किया गया यह विघ्न, प्रस्तावना के बीच में १. जर्जर- अभिनवभारती में इसे यङ्लुगन्त ( जृ धातु ) से णिच् प्रत्यय व फिर अच् प्रत्यय करके निष्पन्न बताया गया है । इन्द्र ने अपने ध्वज से विघ्नों को जर्जरित कर दिया अतः ध्वज का नाम ही जर्जर पड़ गया । इस उपाख्यान से यह तथ्य प्रदर्शित किया गया है कि नाट्य-प्रयोग में बाधक तत्वों को इसी प्रकार जर्जरित कर देना चाहिए । 'जर्जर' भी नाट्य के पारिभाषिक शब्दों में से एक है । इसके निर्माण एवं पूजाविधि की नाट्यशास्त्र में विवेचना हुई है । संक्षेप में १०८ अंगुल लम्बा, पाँच पर्व एवं चार ग्रन्थियुक्त बाँस ही 'जर्जर' के लिए श्रेष्ठ है ।

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प्रथमोऽध्यायः २५ देवगणों द्वारा इन्द्रध्वज का जर्जर नामकरण- निहतेषु च सर्वेषु विघ्नेषु सह दानवैः । संप्रहृष्य ततो वाक्यमाहुः सर्वे दिवौकसः । ७१ ॥ दैत्यों के सहित विघ्नों के इस प्रकार नष्ट हो जाने पर अत्यधिक प्रसन्न होकर सभी देवतागण मुझसे इस प्रकार कहने लगे ॥ ७१ ॥

अहो प्रहरणं दिव्यमिदमासादितं त्वया ।

७२ ॥ जर्जरीकृतसर्वाङ्गा येनैते दानवाः कृताः ॥

आपको यह दिव्यास्त्र प्राप्त हो गया, जिसके द्वारा इन दानवों के समस्त अंग जीर्णशीर्ण कर दिये गये ॥ ७२ ॥

यस्मादनेन ते विघ्नाः सासुरा जर्जरीकृताः ।

तस्माज् जर्जर एवेति नामतोऽयं भविष्यति ॥ ७३ ॥

क्योंकि आपने इस (ध्वज ) के द्वारा असुरों के साथ सम्पूर्ण विघ्नों को ( मार- मार कर ) जर्जर कर दिया इसलिए भविष्य में इसकी संज्ञा 'जर्जर' होगी ॥ ७३ ॥

शेषा ये चैव हिंसार्थमुपयास्यन्ति हिंसकाः ।

दृष्ट्वैव जर्जरं तेऽपि गमिष्यन्त्येवमेव तु ॥ ७४ ॥

जो गण बच गए हैं, वे भी भविष्य में यदि कभी विघ्न डालने आयेंगे तो वे भी 'जर्जर ' को देखकर इसी प्रकार चले जायेंगे ॥ ७४ ॥

एवमेवास्त्विति ततः शक्रः प्रोवाच तान् सुरान् ।

७५ ॥ रक्षाभूतश्च सर्वेषां भविष्यत्येष जर्जरः ॥

तब इन्द्र ने देवताओं से कहा— 'ऐसा ही हो ' यह जर्जर सब [ अभिनेताओं ] का रक्षक सिद्ध होगा ॥ ७५ ॥

जर्जर के वर्णन के तत्काल बाद ही भरतमुनि द्वारा 'नाट्यवेश्म' का प्रकरण प्रारम्भ किया गया है । इससे यह ध्वनित होता है कि नाट्यागार के अभाव में उस काल तक नाटक खुले आकाश के नीचे खेले जाते होंगे । ऐसी स्थिति में उद्दण्ड दर्शकों को अनुशासन बद्ध रखने के लिए जर्जर की व्यवस्था की गयी होगी । किन्तु सुनिर्मित नाट्यालयों के आविर्भाव के पश्चात् जर्जर की उपस्थिति उपादेय न होकर रूढ़ रीतिमात्र रह गई । नाट्यशास्त्र में २७.३ ९ में कहा गया है कि प्राश्निक जर्जर मोक्ष के बाद कार्य आरम्भ करें । इससे अनुमान किया जा सकता है कि रूढ़ रीति के रूप में जर्जर रङ्गमश्व के सामने स्थित रखता होगा व इसको हटाने पर नाट्यरङ्ग की सूचना मिलती होगी ।

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२६ नाट्यशास्त्रम्

विघ्नों का पुनः आक्रमण- प्रयोगे प्रस्तुते ह्येवं स्फीते शक्रमहे पुनः ।

त्रास सञ्जनयन्ति स्म विघ्नाः शेषास्तु नृत्यताम् ॥ ७६ ॥

इस प्रकार इन्द्र के महोत्सव के अवसर पर नाट्याभिनय के पुनः प्रयोग किये जाने पर अवशिष्ट विघ्न अभिनय करने वालों को कष्ट देने लगे ॥ ७६ ॥

भरतमुनि द्वारा ब्रह्मा से विघ्नों के निवारण के विषय में प्रश्न- तेषां व्यवसितं दैत्यानां विप्रकारजम् । दृष्ट्वाउपस्थितोऽहं ब्रह्माणं सुतैः सर्वैः समन्वितः ॥ ७७ ॥

उन दैत्यों की इस प्रकार के विघ्नकारक व्यापार को देखकर मैं [ भरतमुनि ] • अपने सब पुत्रों के साथ ब्रह्मा के पास गया ॥ ७७ ॥

निश्चिताअस्य रक्षाविधिभगवन् विघ्नासम्यगाज्ञापयनाट्यस्यास्य विनाशनेसुरेश्वर । ॥ ७८ ॥

[भरत ने ब्रह्मा से कहा ] हे भगवन्! यह विघ्न इस नाट्य का विनाश करने के लिये दृढप्रतिज्ञ है । अतः हे सुरेश्वर! आप इसको बचाने का उपाय भलीभाँति बताइये ॥ ७८ ॥

ततश्च विश्वकर्माणं ब्रह्मोवाच प्रयत्नतः ।

कुरु लक्षणसम्पन्नं नाट्य वेश्म महामते ॥ ७९ ॥

तब [ मेरी प्रार्थना सुनकर ] ब्रह्मा ने वास्तुकलाविद् विश्वकर्मा से कहा कि हे कुशाग्रबुद्धि वाले! तुम प्रयासपूर्वक एक सर्वलक्षणसम्पन्न नाट्यशाला की रचना करो ॥ ७९ ॥

ब्रह्मा द्वारा विघ्ननिवारण के लिये विश्वकर्मा द्वारा नाट्यशाला का निर्माण

करवाना-ततोऽचिरेण कालेन विश्वकर्मा महच्छुभम् ।

सर्वलक्षणसम्पन्नं कृत्वा नाट्यगृहं तु सः ॥ ८० ॥

प्रोक्तवान्सज्ज नाट्यगृहंद्रुहिणं गत्वा देवसभायां तददेक्षितुमर्हसितु कृताञ्जलिः ॥। ८१ ॥ तब विश्वकर्मा ने तत्काल एक अत्यन्त मंगलमय व सुलक्षणयुक्त नाट्यगृह की रचना करके ब्रह्मा के पास जाकर हाथ जोड़कर सभा में कहा कि हे देव! नाट्यगृह सुसज्जित कर दिया गया है, आप उसे देख लीजिए ॥ ८०-८१ ॥

ततः सह महेन्द्रेण सुरैः सर्वैश्व सेतरैः ।

आगतस्त्वरितो द्रष्टुं द्रुहिणो नाट्य मण्डपम् ॥। ८२ ॥

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प्रथमोऽध्यायः २७ इसके पश्चात् इन्द्र एवं अन्यान्य देवताओं के साथ ब्रह्मा तुरन्त ही नाट्यमण्डप को देखने गये ॥ ८२ ॥

नाट्यगृह की रक्षा के लिए देवगणों की नियुक्ति—

दृष्ट्वा नाट्यगृहं ब्रह्मा प्राह सर्वान् सुरांस्ततः ।

अंशभागैर्भवद्भिस्तु रक्ष्योऽयं नाट्यमण्डपः ॥ ८३ ॥

नाट्यगृह का निरीक्षण करके ब्रह्मा ने सब देवताओं से कहा कि आप सब लोग इस नाट्यमण्डप के एक एक भाग की रक्षा करें ॥। ८३ ॥

रक्षणे मण्डपस्याऽथ विनियुक्तस्तु चन्द्रमाः ।

लोकपालास्तथा दिक्षु विदिक्ष्वपि च मारुताः ॥। ८४ ॥

इस नाट्यगृह के मण्डप की [ सामान्य ] रक्षा के लिये विशेषरूप से चन्द्रमा को नियुक्त किया गया । [चारों दिशाओं के ] दिक्पालों में जो जिस दिशा का स्वामी था उसे उस दिशा का रक्षक बनाया गया और विदिशाओं में मरुद्गणों की नियुक्ति हुई ॥ ८४ ॥

नेपथ्यभूमौ मित्रस्तु निक्षिप्तो वरुणोऽम्बरे ।

वह्निर्भाण्डे - सर्वदिवौकसः ॥ ८५ ॥

नेपथ्यभूमि की रक्षा का भार मित्र को दिया एवं आकाश की रक्षा के निमित्त वरुण को रखा । रङ्गवेदिका [ स्टेज ] की रक्षा के लिए अग्नि एवं वाद्यों की रक्षार्थ मेघों को नियुक्त किया गया ॥ ८५ ॥

वर्णाश्चत्वार एवाथ स्तम्भेषु विनियोजिताः ।

आदित्याश्चैव रुद्राश्च स्थिताः स्तम्भान्तरेष्वथ ॥ ८६ ॥

चारो वर्णो ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ) के अधिष्ठाता देवताओं की नियुक्ति १. यहाँ तात्पर्य यह है कि विघ्नों से रक्षा के निमित्त नाट्यमण्डप के कई भाग कल्पित कर दिये जायँ एवं प्रत्येक अंश की रक्षा का भार एक देवता ले लें । २. ईशान - आग्नेय- नैर्ऋ त्य एवं वायव्य यह दिशायें अथवा उपदिशायें हैं । अभिनवभारती के उल्लेख के अनुसार उपदिशाओं ( एवं दिशाओं ) में मरुत की नियुक्ति आतपदोषनिवारणार्थ हुई है । कुछ व्याख्याकारों के अनुसार इससे प्रेक्षा- गृह में गवाक्ष बनाने का संकेत मिलता है । ३. वर्णाश्चत्वारः - वर्ण से यहाँ श्वेत लोहितादि वर्णं ( रंग ) का अर्थ लेकर ब्राह्मणादि चतुर्वर्ण का अर्थ लिया गया है । द्वितीय अध्याय में स्तम्भों को स्पष्टतया इन्हीं चारों वर्णों से सम्बन्धित बताया जाने में यही अर्थ प्रासंगिक प्रतीत होता है ।

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२८ नाट्यशास्त्रम् स्तम्भों के लिये हुई । स्तम्भों के बीच के भाग के रक्षण के लिए आदित्य एवं रुद्र नियोजित हुए ॥ ८६ ॥

धारणीष्वथ भूतानि शालास्वप्सरसस्तथा ।

सर्ववेश्मसु यक्षिण्यो महीपृष्ठे महोदधिः ॥ ८७ ॥

धन्नियों की रक्षार्थ पञ्चमहाभूतों के अधिष्ठाता देवता ( पृथिवी, जल, अग्नि, आकाश, वायु ), दुमंजिले के कक्षों की रक्षार्थ अप्सराए एवं अन्य समस्त गृहों की रक्षार्थ यक्षिणियाँ और भूमि के फर्श की रक्षार्थ समुद्र को नियुक्त किया गया ॥ ८७ ॥

द्वारशालानियुक्तौ तु कृतान्तः काल एव च ।

स्थापितो द्वारपत्रेषु नागमुख्यौ महाबलौ ॥ ८८ ॥

देहली में यमराज एवं काल ( समय ) की नियुक्ति हुई तथा कपाटों की रक्षा के लिए परमशक्तिशाली दोनों नागराज' लगाये गये ॥ ८८ ॥

देहल्यां यमदण्डस्तु शूलं तस्योपरि स्थितम् ।

द्वारपालौ स्थितौ चोभौ नियतिर्मृत्युरेव च ॥ ८९ ॥

देहली ( दरवाजे की नीचे की लकड़ी-चौखट ) पर यमदण्ड और उस (द्वार) -के ऊपर त्रिशूल स्थित हुआ । नियति (भवितव्यता ) एवं मृत्यु को द्वारपाल बनाया गया ॥ ८९ ॥

पार्श्वे च रङ्गपीठस्य महेन्द्रः स्थितवान् स्वयम् ॥ ९९ ॥

स्थापिता मत्तवारण्यां विद्युदुदैत्यनिषूदनी । रङ्गपीठ के बगल में स्वयं महेन्द्र स्थित हुए तथा मत्तवारणी में दैत्यों का संहार करने वाली विद्यत को स्थापित किया गया ॥ ९ ० ॥ १. धारणीषु - अभिनवभारती में इसकी व्याख्या की गई है— 'स्तम्भद्वय- मध्यारमानि' अर्थात् दो स्तम्भों के बीच रखे गये पत्थर । प्रेक्षागृह के विभिन्न अंशों की चर्चा करते हुए स्तम्भों एवं स्तम्भों के मध्यवर्ती भाग के उल्लेख के क्रम में यहाँ धारणीषु का अर्थ 'धन्नी अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है, न कि प्रेक्षक के बैठने का स्थान', (जैसा कि श्री घोष का अभिमत है । ) २. दोनों नागों का तात्पर्य अभिनवगुप्त के मत में अनन्त एवं गुलिक से है । श्री घोष के अनुसार यह अनन्त एवं वासुकि के परिचायक हैं । यों तो यहाँ नाग का अर्थ 'गज' भी हो सकता है । किन्तु परम्परा रक्षक के रूप में सर्प की धारणा -के ही प्रचलित होने के कारण यहाँ नाग का अर्थ सर्पराजद्वय से ही है ।

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प्रथमोऽध्यायः २९

स्तम्भेषु मत्तवारण्याः स्थापिताः परिपालने ।

भूतयक्षपिशाचाश्च गुह्यकारच महाबलाः ॥ ९ १ ॥

मत्तवारणी ' के स्तम्भों की रक्षा के लिए भूत, यक्ष, पिशाच एवं शक्तिशाली गुह्यकों को नियत किया गया ॥ ९ १ ॥

जर्जरे तु विनिक्षिप्तं वज्र दैत्यनिबर्हणम् ।

तत्पर्वसु " विनिक्षिप्ताः सुरेन्द्रा ह्यमितौजसः ॥ ९ २ ॥

जर्जर (इन्द्र के ध्वज ) की रक्षा के लिये दैत्यों का संहारक बज्र नियुक्त किया गया एवं उसके पोरों पर अपरिमित पराक्रम वाले देवों को ( निम्नरूप से ) स्था- पित किया गया ॥ ९ २ ॥

शिरःपर्वस्थितो ब्रह्मा द्वितीये शङ्करस्तथा ।

तृतीये च स्थितो विष्णुश्चतुर्थे स्कन्द एव च ॥ ९ ३ ॥

जर्जर की शीर्षस्थ (प्रथम) पोर पर ब्रह्मा, दूसरी पर शंकर, तीसरी पर विष्णु एवं चतुर्थ पर स्कन्द स्थित हुये ॥ ९ ३ ॥ । पञ्चमे च महानागाः शेषवासुकितक्षकाः एवं विघ्नविनाशाय स्थापिता जर्जरे सुराः ॥ ९ ४ ॥ और इसी प्रकार विघ्नशमन के लिए देवताओं ने (जर्जर के ) पाँचवें पोर पर शेष, वासुकि एवं तक्षक आदि महानागों को स्थापित किया ॥ ९ ४ ॥

रङ्गपीठस्य मध्ये तु स्वयं ब्रह्मा प्रतिष्ठितः ।

इष्ट्यर्थं रङ्गमध्ये तु क्रियते पुष्पमोक्षणम् ॥ ९ ५ ॥

रङ्गपीठ ( स्टेज ) के मध्य में ब्रह्मा स्वयं स्थित हुए । यही कारण है कि पूजा के लिए स्थित रङ्गपीठ के मध्यभाग में पुष्प अर्पण किये जाते हैं ॥ ९ ५ ॥

पातालवासिनो ये च यक्षगुह्यकपन्नगाः ।

अधस्ताद्रङ्गपीठस्य रक्षणे ते नियोजिताः ॥ ९ ६ ॥

१. मत्तवारणी - नाट्यशास्त्र का यह अत्यधिक विवादास्पद शब्द है । वास्तुकला की दृष्टि से इसके अनेक अर्थ हैं— ( १ ) बरामदा ( २ ) मत्त ( ३ ) हाथियों की पंक्ति ( ४ ) छोटा कमरा ( ५ ) कटहरा एवं ( ६ ) पार्श्व आदि । मत्तवारिणी के विशेष परिचय के लिए द्वितीय अध्याय द्रष्टव्य है । २. स्तम्भेषु - इनकी संख्या चार 1. यद्यपि यहाँ इसका निर्देश नहीं है । तथापि इनके रक्षक भूतादि की संख्या चार होने से यही ध्वनि निकलती है और आगे मत्तवारणी के चार स्तम्भों का स्पष्ट उल्लेख हुआ भी है ।

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३० नाट्यशास्त्रम् और जो पाताल में रहने वाले यक्ष, गुह्यक तथा रक्षा के लिए नागलोक हैं, उन्हें भूमि के अन्दर की ओर से रङ्गपीठ की रक्षा के लिए नियोजित किया गया ॥ ९ ६ ॥

नायकं रक्षतीन्द्रस्तु नायिकां च सरस्वती ।

विदूषकमथौङ्कारः शेषास्तु प्रकृतीर्हरः ॥ ९ ७ ॥

[नाट्य के ] नायक की रक्षा इन्द्र करते हैं एवं नायिका की सरस्वती । विदूषक की रक्षा ओङ्कार करता है एवं बचे हुए ( अन्य अभिनेताओं ) की रक्षा शंकर करते हैं ॥ ९ ७ ॥

यान्येतानि नियुक्तानि दैवतानीह रक्षणे ।

एतान्येवाधिदेवानि भविष्यन्तीत्युवाच सः ॥ ९८ ॥

यहाँ (नाट्यगृह की ) रक्षा में जो-जो देवता नियुक्त किये गये हैं, वह उस उस भाग के अधिष्ठातृ देवता होंगे ॥ ९८ ॥

। एतस्मिन्नन्तरे देवैः सर्वैरुक्तः पितामहः साम्ना तावदिमे विघ्नाः स्थाप्यन्तां वचसा त्वया ॥ ९९ ॥

इसी बीच में सब देवताओं ने पितामह से यह कहा कि पहले आप शान्तिपूर्वक, वचनों द्वारा ही इन विघ्नों को रोकिये ॥ ९९ ॥

देवताओं का ब्रह्माजी से अनुरोध- पूर्वं साम प्रयोक्तव्यं द्वितीयं दानमेव च ।

१०० ॥ तयोरुपरि भेदस्तु ततो दण्डः प्रयुज्यते ॥

[नीतिशास्त्र के अनुसार व्यवहार में ] पहले साम ( शान्तिपूर्ण उपाय) का प्रयोग करना चाहिए, इसके बाद दान ( धनप्रयोग ) का, और तब भेद (फूट डालने ) का । इन सबके बाद ( अन्त में ही ) दण्ड (सजा ) का प्रयोग करना अपेक्षित है ॥ १०० ॥

देवानां वचनं श्रुत्वा ब्रह्मा विघ्नानुवाच ह ।

कस्माद्भवन्तो नाट्यस्य विनाशाय समुत्थिताः ॥ १०१ ॥

देवताओं के कथन को सुनकर ब्रह्मा ने विघ्नों से पूछा कि आप नाट्य के विनाश के लिए क्यों उद्यत हुए हैं? ॥ १०१ ॥

ब्रह्मा का विघ्नों से प्रश्न- ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा विरूपाक्षोऽब्रवीद्विचः ।

दैत्यविघ्नगणैः सार्धं सामपूर्वमिदं ततः ॥ १०२ ॥

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प्रथमोऽध्यायः ३१ ब्रह्मा की बात सुनकर दैत्यों एवं विघ्नों के साथ विरूपाक्ष शान्तिपूर्वक यह कहने लगा ॥ १०२ ॥

विघ्ननायक विरुपाक्ष का ब्रह्माजी को उत्तर- योऽयं भगवता सृष्टो नाट्यवेदः सुरेच्छया । प्रत्यादेशोऽयमस्माकं सुरार्थं भवता कृतः ॥ १०३ ॥

देवताओं की इच्छा से जो आपने इस नाट्यवेद की रचना की है, वह हमारे तिरस्कार के लिए एवं देवताओं के (हर्ष के लिए है ॥ १०३ ॥

तन्नैतदेवं कर्तव्यं त्वया लोकपितामह ।

यथा देवास्तथा दैत्यास्त्वत्तः सर्वे विनिर्गताः ॥ १०४ ॥

हे लोकों के पितामह! आपको ऐसा नहीं करना चाहिये था क्योंकि जैसे देवता आपसे उत्पन्न हैं उसी प्रकार दैत्य भी आप से ही उत्पन्न हुए हैं ॥ १०४ ॥

विध्नानां वचनं श्रुत्वा ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ।

अलं वो मन्युना दैत्या विषादं त्यजतानघाः ॥ १०५ ॥

विरूपाक्ष की बात सुनकर ब्रह्मा बोले कि हे दैत्यों आप लोग नाराज न हों, तथा इस खेद का त्याग कर दें ॥ १०५ ॥

ब्रह्मा द्वारा विरूपाक्ष तथा विघ्नों को समझाना - भवतां देवतानां च शुभाशुभविकल्पकः । कर्मभावान्वयापेक्षी नाट्यवेदो मया कृतः ॥ १०६ ॥

मैंने जिस नाट्यवेद की संरचना की है वह आपके एवं देवताओं के दोनों ही के कल्याण एवं अकल्याण का विकल्प' करने वाला तथा दोनों ही के कर्मभाव एवं वंशादि को प्रकाशित करने वाला है' ॥ १०६ ॥

१. विकल्प – यहाँ विकल्प के दो अर्थ हो सकते हैं - ( १ ) विशेष कल्पना, ( २ ) विविध कल्पना । दोनों का अभिप्राय एक ही है कि इस नाट्य के कथानक में ऐसी वस्तुएँ प्राप्य हैं जिनमें देवों एवं दैत्यों दोनों के शुभाशुभ कर्मों को काल्प- निक चित्रण है । अर्थात् देवों एवं दैत्यों की विविध परिस्थितियों में कल्पना करके यह प्रदर्शित किया गया है कि उस विशेष स्थिति में उनके कर्म एवं भाव कैसे होंगे । यह सम्पूर्ण विचार काल्पनिक होंगे अतः उनके सम्बन्ध में दैत्यों को क्रोध नहीं करना चाहिये । २. कर्मभावान्व यापेक्षी -यह नाट्य के स्वरूप की विशेषता का परि- चायक शब्द है । अभिनवभारती के अनुसार कर्मधर्म (दान-स्नानादि ) एवं अधर्म (हिंसा, स्नेयादि) रूप है । भाव स्वार्थता परार्थता रूप है । तथा अन्वय के द्वारा

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३२ नाट्यशास्त्रम्

ब्रह्मा द्वारा नाट्य की प्रशंसा- नैकान्ततोऽत्र भवतां देवानां चानुभावनम् ।

त्रैलोक्यस्यास्य सर्वस्य नाट्यं भावानुकीर्तनम् ॥ १०७ ॥

यहाँ (नाट्य में ) न तो केवल आप दैत्य लोगों का भाव (चरित्रानुकरण ) हुआ है और न केवल देवताओं का । नाट्य में तो सम्पूर्ण तीनों लोकों के भावों का अनुकरण होता है ॥ १०७ ॥

व्यक्ति के निवास स्थानादि तथा वंशादि का द्योतन होता है । कर्मभाव एवं अन्वय यह तीनों ही नाट्य में अपेक्षित होते हैं । किसी विशेष देश एव काल में किसी भाव विशेष के अन्तर्गत किसी स्थान विशेष के वासी एवं वेशविशेषोद्भव व्यक्ति द्वारा आचरित विशेष कर्मों एवं उनसे प्राप्य शुभाशुभ फलों का अभिन- चित्रण नाट्य में होता है । प्रबुद्ध प्रेक्षक इससे 'करणीय' एवं 'अकरणीय ' यात्मक कृत्यों की संगति स्वयं बैठाता है । १. भावानुकीर्तन — रत्यादिक स्थायी भावों को आङ्गिक, वाचिक, सात्त्विक एवं आहार्य - चतुर्विध अभिनय द्वारा फिर से प्रदर्शित करना 'भावानुकीर्तन' पद का शाब्दिक अर्थ है । अभिनवगुप्त ने इस शब्द की गम्भीरता को समझा है और इससे निहित अनेक गूढार्थों को प्रकाशित किया है । नाट्य में रामादि कार्यों का अनुकरण होता है । प्रश्न उठता है कि भूतकाल में स्थित रामादि के रत्यादि स्थायी भावों का अनुकरण कैसे सम्भव है? नाट्या- वलोचन के समय यही अनुभूति होती है कि यह सब क्रियाएँ वर्तमान में हो रही हैं । यदि यह माने कि नट रामादि से साक्षात्कार की यह अनुभूति आती है तो फिर दूसरे की चेष्टा का अनुकरण करने मात्र की नाट्य संज्ञा हो जायेगी । नाट्य अनुकरण कदापि नहीं है । तब भावानुकीर्तन का अर्थ क्या है? ज्ञान के दशरूप हैं- ( १ ) तात्त्विक, ( २ ) सादृश्यात्मक, ( ३ ) भ्रान्त, ( ४ ) मिथ्या ( ५ ) आध्यव- सायिक, ( ६ ) उत्प्रेक्ष्यमाण, (७ ) प्रतिकृतिरूप, ( ८) अनुकरणात्मक ( ९ ) इन्द्रजाल- वत् तात्कालिक निर्माण, ( १० ) मायवात् । •नाटक में रामादि की प्रतीति इनमें से किसी भी ज्ञान के अन्तर्गत नहीं आती । नाटक में तो जो ज्ञान होता है यह लोकोत्तर तथा सब प्रकार के ज्ञानों से परे (साधारणीकृत, अतएव अलौकिक ) होता है । रामादि विषयक ज्ञान होने पर और तद्र प संस्कार के निरन्तर बने रहने से नट राम के ज्ञान एवं संस्कारयुक्त होकर,

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प्रथमोऽध्यायः ३३

क्वचिद्धर्मः क्वचित्क्रीडा क्वचिदर्थः क्वचिच्छ्रमः ।

क्वचिद्धास्यं क्वचिद्युद्धं क्वचित्कामः क्वचिद्वधः ॥ १०८ ॥

कहीं धर्म, कहीं ( विस्मयादि ) क्रीड़ा, कहीं अर्थ ( राजनीति एवं कहीं युद्ध, कहीं काम एवं कहीं वध प्रदर्शित किया जाता है ) ॥ १०८ ॥

धर्मो धर्मप्रवृत्तानां कामः कामोपसेविनाम् ।

निग्रहो दुर्विनीतानां विनीतानां दमक्रिया ॥ १०९ ॥

धर्मपरायण व्यक्तियों के धर्म का, कामोपसेवी के काम का एवं उद्दण्ड जनों के निग्रह का तथा विनीत व्यक्तियों की ( इन्द्रिय ) दमन की प्रवृत्ति का इसमें वर्णन है ॥ १० ९ ॥ अलौकिक रामादि के चरित में अपने स्वरूप को प्रविष्ट कर देता है अर्थात्, रामादि से तादात्म्य स्थापित कर लेता है । तब वह संसार को भी उसी दृष्टि से देखता है जैसा कि रामादि को देखना उचित है । जिससे सामाजिक को नाटक में 'वर्तमानता' की अनुभूति होती है । हमारे विचार से यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि नाट्य में रामादि के विशेष रूप का ग्रहण नहीं होता, साधारणीकृतरूप का ग्रहण होता है । नट राम के स्वरूप से अपना साधारणीकरण करता है एवं प्रेक्षक नट द्वारा साधा- रणीकृत राम के रूप से अपना तादात्म्य स्थापित करके रस का आनन्द लेता है । नाट्य अनुकरण रूप कदापि नहीं, दूसरों की चेष्टा से तो हास उत्पन्न होता है ( परचेष्टानुकरणाद्धासः समुपजायते - ना० शा० ७-१० ) । नाट्य का अनुकरण- रूप होना इस कारण भी अनुपयुक्त है कि न तो विभावों का अनुकरण होना सम्भव है (एतेन प्रमदादिविभावानामनुकरणं पराकृतम् — अभि० भा ० । ) और न अनुभावों का [न च चित्तवृत्तीनां शोक-क्रोधादिरूपाणाम् । अभि० भा० ) अतः नाट्य अनुव्यवसाय विशेष का कार्य है [ तेनानुव्यवसायविशेषविषयीकार्यं नाट्यम्] । नाट्य में नट अनुकार्य के सुख दुःख आदि भावों का अभिनयात्मक अनुकरण करता है और उस समय साधारणीकरण के व्यापार द्वारा नट प्रदर्शित अनुकार्यगत विभावानुभाव व्यभिचारिभावों का स्वगत में विलयन हो जाता है । फलस्वरूप प्रेक्षक वेद्यान्तर- स्पर्शशून्य होकर चिदानन्द के प्रकाश से विभोर होकर ब्रह्मानन्द सहोदर रस का आस्वादन करने लगता है । यही भावानुकीर्तन नाट्य है । क्योंकि नाट्य अनुकरण नहीं है अतः शंका का स्वतः समाधान हो जाता है कि "लोक में कोई अनुकार्य सब अवस्थाओं में गीतवाद्यादि से युक्त नहीं पाया जाता फिर नाट्य में गीत वाद्य का बाहुल्य क्यों होता है । " वस्तुतः यह विषय अत्यन्त क्लिष्ट एवं विस्तृत है, जिसकी विशद विवेचना भरतमुनि ने आगे की है । ३ ना०