भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 111–120

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

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( ६६ ) पृष्ठ हास्य - भेद ( ५३-६२ ) --३० ) ३२० करुणरस ( ६३-६४ ) ३२५ रौद्ररस ( ६५-६७ ) ३२७ | वीररस ( ६८-६९ ) ३३७ भयानकरस ( ७०–७३ ) ३३ ९ | ' बीभत्सरस ( ७४-७५ ) ३४३ | अद्भुतरस ( ७६-७७ ) ३४५ रसों के सामान्यतः तीन प्रकार ( ७८-८० ) ३४७ अद्भुतरस के दो प्रभेद ( ८३ ) ३४ ९ शान्तरस ( ८३-८७ ) TR ३५० रसविशयक मन्तव्य का उपसंहार ( ८८ ) ३६६ सप्तमोऽध्याय: ( भावाध्याय ) भावस्वरूप ( १-३ ) ( 1 ) ३६७ विभाव स्वरूप ( 8 ) ३७३ अनुभाव स्वरूप ( ५ ) ३७४ भावों का त्रैविध्य ( ७ ) ३७६ स्थायी भाव लक्षण ( E ) ३७६ रति ( ९ ) ३८० हास ( १० ) ३८१ शोक ( ११-१४ ) ३८१ क्रोध ( १५-२० M ) ३८३ ( P ) उत्साह ( २१ ) ३८६ | भय ( २२-२५ ) ३८७ जुगुप्सा ( २६ ) ३८८ विस्मय ( २७ ) २८ ९ सवारी भाव - लक्षण ३६६ निर्वेद ( २८-३० ) SIPBE विचार.३ ९ १ ग्लानि ( ३१-३२ ) ३ ९ २ शङ्का ( ३३-३५ ) ३ ९ ४ असूया ( ३६-३७ ) ३ ९ ५ मद ( ३८-४६ ) ३ ९ ६ श्रम ( ४७ ) ३ ९९ आलस्य ( ४८ ) ३ ९९ दैन्य ( ४ ९ ) ४०० चिन्ता ( ५०-५१ ) ( p2 - es ) ४०१ पृष्ठ मोह ( ५२-५३ ) ४०२ स्मृति ( ५४-५५ ) ४०३ टति ( ५६-५७ ) व्रीडा ( ५८-५९ ) ( ६१ ) ४०५ चपलता ( ६० ) ( A ) ४०६ हर्ष ( ६१-६२ ) ४०७ आवेग ( ६३-६५ ) ४०८ जड़ता ( ६६ ) ( ६-०१ ) ( ४१० गर्व ( ६७ ) ४११ विषाद ( ६८-६९ ) ( E ) ४१२ औत्सुक्य ( ७० ) के -४१३ निद्रा ( ७१-७२ ) ४१४ अपस्मार ( ७३-७४ ) ४१५ सुप्त ( ७५-७६ ) ४१६ विबोध ( ७७ ) ४१७ अमर्ष ( ७८-७९ ) ४१८ अवहित्थ ( ८० ) ४१ ९ उग्रता ( ८१ ) ४२० मति ( ८२ ) ( १ ) ४२० व्याधि ( ८३ ) 7 ) ४२१ उन्माद ( ८४-८५ ) ) २२ मरण ( ८६ - ९ ० ) ( १ ) ४२४ त्रास ( ९ १ ) १०१-११ ) २४२७ वितर्क ( ९ २ ) -207 ) ४२७ सात्विकभाव ( ६३-६४ ४२६ स्वेद ( ९ ५ ) ४३१ स्तम्भ, वेपथु ( ९ ६ ) ४३१ अश्रु ( ९ ७ ) ४३१ वैवर्ण्य, रोमाञ्च ( ९ ८ ) ४३१ स्वरभङ्ग, प्रलय ( ९९ ) ४३२ सात्विक भावों का अभिनय विधान ( १११–१२६ ) ४३२ परिशिष्ट | अतिरिक्त टिप्पणियाँ ४४१ नाट्यशास्त्रकारिकाओं की ५५७ आधार एवं सन्दर्भ ग्रन्थ सूची ५८७ | शुद्धिपत्र ५८ ९ ) 3gs = Jge (! Slistiden

पृष्ठ 112

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प्रथमोऽध्यायः मंगलाचरण

प्रणम्य शिरसा देवौ पितामहमहेश्वरौ ।

नाट्यशास्त्रं प्रवक्ष्यामि ब्रह्मणा यदुदाहृतम् ' ॥ १ ॥

( प्रदीपकर्तुः मङ्गलाचरणम् )

वाणी ताण्डवमाधत्तां मज्जिह्वारङ्गमण्डपे ।

हृद्या यद्भूमिकालीला विद्या वेदपुरस्सरी ॥

( मैं ) पितामह ब्रह्मा तथा महेश्वर भगवान शंकर को प्रणाम कर. उस नाट्यशास्त्र का निरूपण करूँगा जो ब्रह्माजी के द्वारा ( वेदों से ) उत्पन्न किया गया है ॥ १ ॥

१. नाट्यशास्त्र के प्रथमप्रवक्ता होने से सर्वप्रथम ब्रह्मा की तथा ताण्डव एवं लास्य नृत्यों के प्रथम प्रवर्तक होने और तण्डु द्वारा भरत को नाट्य विद्या प्रदान करने के कारण भगवान शिव की यहाँ वंदना की गई है, जिससे ग्रन्थ की परम् तथा प्राचीनता प्रकट होती है । तथा इसमें एक समन्वित ग्रन्थ की सूचना भी मिलती है जो ग्रन्थ पहिले ब्रह्मा तथा सदाशिव भरत द्वारा पृथक् पृथक् निर्मित रहे थे ) नाट्य - शास्त्रीयग्रन्थों में शिव तथा ब्रह्मा की वन्दना एकसाथ कम ही प्राप्त होती है । २. यहाँ ' नाट्यशास्त्र ' शब्द का प्रयोग उसके मंचीय तथा साहित्यिक ( उभय ) पाश्र्वों को ध्यान में रखकर किया गया है । आचार्य अभिनवगुप्त पाद ने इस शास्त्र की महत्ता एवं उपयोगिता बतलाते हुए इसे कवि तथा प्रयोक्ताजन १. यदुदीरितम् – क ० । 10-

पृष्ठ 113

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२ नाट्यशास्त्रम् ऋषियों का भरत मुनि से प्रश्न—

समाप्तजप्यं व्रतिनं स्वसुतैः परिवारितम् ।

अनध्याये कदाचित्तं भरतं नाट्यकोविदम् ॥ २ ॥

मुनयः पर्युपास्यैनमात्रेयप्रमुखाः पुरा ।

पप्रच्छ्रुस्ते महात्मानो नियतेन्द्रियबुद्धयः ॥ ३ ॥

अति प्राचीन समय में किसी अनध्याय तिथि को जब नाट्यशास्त्र के विज्ञाता भरत मुनि जप समाप्त कर अपने पुत्रों के बीच स्थित थे; तब महात्मा तथा जितेन्द्रिय ' आत्रेय आदि मुनि गण भरत मुनि के सम्मुख उपस्थित हो उनसे विनयपूर्वक प्रश्न करने लगे ॥ २-३ ॥

योऽयं भगवता सम्यग्ग्रथितो वेदसम्मितः ।

नाट्यवेदः कथं ब्रह्मन्नुत्पन्नः कस्य वा कृते ॥ ४ ॥

कत्यङ्गः 3 किंप्रमाणश्च प्रयोगश्चास्य कीदृशः ।

सर्वमेतद्यथातत्त्वं भगवन् वक्तुमर्हसि ॥ ५ ॥

हे भगवन्,, आपने जिस वेदतुल्य ' नाट्यवेद " का निर्माण किया वह ( अभिनेता एवं निर्देशक गण ) दोनों के लिये उपदेशप्रद शास्त्र बतलाया है । ( द्रष्टव्य - ' कविप्रयोक्तुरुपदेशपरं शास्त्रमिति ' ( अ ० १, पृ ० सं ० ७, अभि ० भार ०, बड़ौदा संस्क ० ) । १. भरत मुनि के विषय में प्रस्तावना देखिये । २. आत्रेय आत्रेय नामक दो मुनियों के उल्लेख प्राप्त हैं । इनमें एक याज्ञवल्क्य ऋषि के शिष्य ( महा भा ० ) तथा दूसरे वामदेव के शिष्य ( ब्रह्म पु ० ) थे । ३. यहाँ नाट्यशास्त्र की जिज्ञासा हेतु मुनियों द्वारा ५ प्रश्न उपस्थापित किए गए हैं जिनका विवेचन ही प्रकृत ग्रन्थ का उद्देश्य है । उनका क्रमिक उत्तर देना नहीं ( और न ऐसा किया ही गया है ) । ४. नाट्यशास्त्र के लिये ' नाट्यवेद ' तथा ' नाट्यशास्त्र ' दोनों ही शब्दों के १. तु —ख ० । २. कथितो क ० । ३. कत्यंशः क ० ।

पृष्ठ 114

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प्रथमोऽध्यायः किस प्रकार उत्पन्न हुआ और किसके लिए? इसके कितने अंग हैं, इस ( वेद ) का कितना परिमाण है और इसका प्रयोग ( अभ्यास, अभिनय ) किस प्रकार किया जाता है? इन सभी बातों को आप हमें कृपा कर विस्तार-पूर्वक बतलाइये ॥ ४-५ ॥। नाट्यशास्त्र की उत्पत्ति—

तेषां तु ' वचनं श्रुत्वा मुनीनां भरतो मुनिः ।

प्रत्युवाच ततो वाक्यं नाट्यवेदकथां प्रति ॥ ६ ॥

उन मुनियों के इन वचनों को सुनकर ' नाट्यवेद ' के विषय में भरत मुनि ने तब इस प्रकार कहना प्ररम्भ किया ॥ ६ ॥

भवद्भिः शुचिभिर्भूत्वा तथाऽवहितमानसैः श्रूयतां नाट्यवेदस्य सम्भवो ब्रह्मनिर्मितः हे मुनिगण, आम ब्रह्मा के द्वारा निर्मित ( उस ) को पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर सुनिये ॥ ७ ॥

पूर्व ' कृतयुगे विप्रा वृत्ते स्वायम्भुवेऽन्तरे त्रेतायुगे सम्प्रवृत्ते मनोवैवस्वतस्य तु ॥ ग्राम्यधर्मप्रवृत्ते तु कामलोभवशङ्गते ॥ ॥ ७ ॥

‘ नाट्यवेद ' की उत्पत्ति

८ ॥

प्रयोग किये गये हैं । ' नाट्यवेद ' शब्द ' नाट्यशास्त्र ' का ही बोधक है । इस शास्त्र का वेद शब्द के साथ अभिधान इसे प्राचीनता, पवित्रता तथा प्रामाणिकता प्रदान करने के अतिरिक्त सश्रद्ध ग्रहण करने के लिये भी है । वेद शब्द को ' नाट्य ' विशेषण देने का आशय है इसका अध्येयत्व सूचित करना । जैसा कि अभिनव-गुप्ताचार्य ने कहा भी है-' अत्र तु नाट्यस्य वेदः शास्त्रमिति समासः । अन्यथा अध्यापनासम्भवात् ' ( अभि ० भारती vol. I. पृ ० ४ ) नाट्यवेद अर्थात् नाट्य सिद्धान्तों का निदर्शक ( शास्त्रीय परम्परा सम्पन्न ) आकरग्रन्थ, अन्यथा उसका अध्यापन संभव न होता । १. तद्वचनं क ० । २. संक्षेपो – क ० । ३. पुरा — क ० । ४. गेऽथ सम्प्राप्ते क ० । ५. धर्मे प्रवृत्ते- -क ० ।

पृष्ठ 115

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नाट्यशास्त्रम् ईर्ष्या क्रोधादिसम्मूढे ' लोके सुखितदुःखिते ॥ ९ ॥

देवदानवगन्धर्वयक्षरक्षोमहोरगैः ।

जम्बूद्वीपे समाक्रान्ते लोकपाल- प्रतिष्ठिते ॥ १० ॥

महेन्द्रप्रमुखैर्देवैरुक्तः किल पितामहः ।

कीडनीयकमिच्छामो दृश्यंश्रव्यश्च यद्भवेत् ॥। ११

न वेदव्यवहारोऽयं संभाव्यः शूद्रजातिषु ।

तस्मात् सृजापरं वेदं पञ्चमं सार्ववर्णिकम् ॥ १२

हे मुनिगण, अति प्राचीन काल में जब स्वायंभुव मनु के मन्वन्तर में सत्ययुग बीत चुका था तथा वैवस्वत मनु का त्रेतायुग प्रारम्भ हो चुका था । ( उस समय ) प्रजाजन के काम और लोभ के वशीभूत होकर ग्राम्य ' धर्म में प्रवृत्त होने एवं ईर्ष्या, क्रोध आदि से अभिभूत होने के कारण ( अपने अपने कर्मों के अनुसार ) सुखी और दुःखी होने पर तथा ( भूर्भुवः आदि ) लोकों में देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस सर्पाधिपतियों तथा लोकपालों की प्रतिष्ठा हो चुकने पर महेन्द्र आदि देवताओं ने पितामह ब्रह्मा जी से आकर निवेदन किया कि हे देव, ( इन सभी प्रकार के व्यक्तियों के लिए ) हम ऐसा मनोविनोद का साधन ( क्रीडनीयकम् ) चाहते हैं जो देखने ( दृयूँ ) तथा सुनने ( श्रव्य ) के योग्य हो । विधि - निषेधात्मक तथा दुर्बोध होने के कारण ) वेद का शूद्रों को सुनाना संभव नहीं है अतएव १. ग्राम्य धर्म इन्द्रिय लोलुपता । अभिनवगुप्त ने ग्राम्यधर्म शब्द का अर्थ किया है- ' ग्राम्योऽश्रुतशास्त्रार्थजनाकीर्णदेशोचितो धर्मः स्वधर्माननुपालनलक्षणः ' ( अभि ० भार ० vol. I. पृ ० १० ) अर्थात् वह धर्म जो अशास्त्रज्ञ व्यक्तियों से व्याप्त प्रदेश में हो, जहाँ अपने धर्म का पालन न किया जाता २. अभिनवगुप्त के अनुसार दृश्य का हृद्य तथा श्रव्य का अर्थ १. भिसम्भू - ग ० । २. श्राव्यश्व - क ० । ३. नव्य ( न च ) विहारोऽयं ख ० । ४. ' नेमे वेदाः यतः श्राव्याः स्त्रीशूद्राद्यास्तु जातिषु । वेदमन्यत्ततः स्रक्ष्ये सर्वश्राव्यन्तु पञ्चमम् ॥ ' इति श्लोकोऽधिकः क पुस्तके हो ) । है व्युत्पत्तिप्रद प्रक्षिप्तश्च ।

पृष्ठ 116

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प्रथमोऽध्यायः आप ( शूद्रों तथा अन्य ) सभी वर्णों के लिए उपयोगी ( एक ) पाँचवें वेद ' की और रचना कीजिये ॥ ८-१२ ॥

एवमस्त्विति तानुक्त्वा देवराजं विसृज्य च ।

सस्मार चतुरो वेदान् योगमास्थाय तत्त्ववित् ॥ १३ ॥

( तब ) देवताओं को ' एवमस्तु ' ( ऐसा ही हो ) कह और देवराज इन्द्र को बिदा कर सम्पूर्ण तत्त्वों के वेत्ता ( उन ) ब्रह्माजी ने योग ( समाधि ) में स्थित ( एकाग्रचित्त ) होकर चारों वेदों का स्मरण किया ॥ १३ ॥

धर्म्यमर्थ्य यशस्यश्च सोपदेश्यं ससङ्ग्रद्दम् ।

भविष्यतश्च लोकस्य ' सर्वकर्मानु ' दर्शकम् ॥ १४ ॥

सर्वशास्त्रार्थसम्पन्नं सर्वशिल्पप्रवर्तकम् ।

नाट्याख्यं पञ्चमं वेदं सेतिहासं करोम्यहम् ॥। १५ ॥

भगवान् ब्रह्मा ने सभी वेदों का स्मरण करते हुए संकल्प किया — मैं ' नाट्य ' नामक ऐसे पाँचवें वेद की इतिहास सहित रचना करता हूँ जो १. नाट्यवेद ' के प्रमाण, परम्पराओं और इसके पाँचवें वेद पर परिशिष्ट में विस्तार से विवेचन किया गया है । प्रारंभ से ही नाट्य एक संमिश्रितकला के रूप में ( Composite Art ) रही है जिसमें सभी कलाओं ( वास्तु, चित्र, संगति आदि ) का संयोग रहता था । २. ' इतिहास ' शब्द को भी प्राचीन काल में वेद उसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है - इति + ( इस प्रकार ) ह ( हुआ ) । अतएव स्पष्ट है कि पूर्वकालीन घटनाओं को है । इतिहास का लक्षण इस प्रकार है—

धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम् ।

इतिवृत्तकथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते ॥

अर्थात् इतिहास उसे कहते हैं जिसमें धर्म, अर्थ, काम की संज्ञा प्राप्त थी । + ( निश्चय ही ) आस इतिहास माना गया तथा मोक्ष के उपदेश १. कालस्य — क ० । २. कर्म प्रदर्शकम् — क ० । ३. प्रदर्शकम् - ग ० । ४. नाट्यसंज्ञमिमं - ग ० ।

पृष्ठ 117

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६ नाट्यशास्त्रम् धर्म और अर्थ की प्राप्ति कराने वाला ( धर्म तथा अर्थ के प्रयोजन का उपपादक या उनके अनुकूल ), यशःप्रदाता, उपदेश तथा संग्रह से युक्त, भावी जगत् के लिये सभी कार्यों का पथ - प्रदर्शक, सब शास्त्रों के अर्थों से परिपूर्ण और सभी शिल्पों को प्रदर्शित करने वाला होगा ॥ १४–१५ ॥

एवं सङ्कल्प्य भगवान् सर्वान् ' वेदाननुस्मरन् ।

नाट्यवेदं ततश्चक्रे चतुर्वेदाङ्गसम्भवम् ॥ १६ ॥

इस प्रकार का संकल्प करके भगवान् ब्रह्मा ने सभी वेदों का स्मरण करते हुए चारों वेदों के अंगों से उत्पन्न होने वाले ' नाट्य वेद ' की रचना की ॥ १६ ॥

जग्राह पाठ्यमृग्वेदात् समाभ्यो ' गीतमेव च ।

यजुर्वेदादभिनयान् रसा नाथर्वणादपि ॥ १७ ॥

तब ( नाट्य के संवाद या गद्यपद्यात्मक प्रथम अंग ) पाठ्य को ऋग्वेद से, ( नाट्य के द्वितीय अंग ) गीत को सामवेद से, ( नाट्य के तृतीय अंग ) अभिनयों को यजुर्वेद से और ( नाट्य के चतुर्थ अंग ) रसों को अथर्ववेद ( या आथर्वण ) से लिया ॥ १७ ॥

वेदोपवेदैः सम्बद्धो नाट्यवेदो महात्मना ।

एवं भगवता सृष्टो ब्रह्मणा सर्ववेदिना ॥ १८ ॥

वाली पुरानी घटित कथा हो और इसी प्रकार की साहित्यिक रचना भी इतिहास मानी जा सकती है । इतिहास का प्राचीन काल में अध्ययन पर्याप्त मनोयोग से किया जाता था और उसे पांचवां वेद भी माना जाता था । इतिहास से युक्त होने के कारण ( ही ) ' नाट्यशास्त्र ' भी पाँचवाँ वेद माना गया, जैसा कि भरत-मुनि की प्रतिज्ञा से स्पष्ट है । इतिहास को अतिरिक्त वेद मानने वाले प्रमाणों के हेतु देखिये - छान्दोग्योपनिषद् ७ ७, सुत्तनिपात 21७ ( सेल्लसुत ) कौटिल्य का अर्थशास्त्र तथा विन्टरनित्स कृत भारतीय साहित्य का इतिहास प्रथम जिल्द ( पृ ० ३१३ ) । १. सर्ववेदान् —क ० । २. सामतो क ० । ३. नृत्ताना- क ० । ४. सम्बन्धो ग ० । ५. ललितात्मकम् - ग ० ।

पृष्ठ 118

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प्रथमोऽध्यायः इस प्रकार सम्पूर्णतत्वों के वेत्ता ब्रह्माजी ने वेदों तथा उपवेदों से सम्बद्ध

( अर्थात् वेदों तथा उपवेदों से जिसके अंगों को ग्रहण किया गया है ।

ऐसे ) इस ' नाट्यवेद ' की रचना की ॥ १८ ॥

उत्पाद्य नाट्यवेदं तु ब्रह्मोवाच ' सुरेश्वरम् ।

इतिहासो मया सृष्टः स सुरेषु नियुज्यताम् ॥ १ ९ ॥

( इस प्रकार ) नाट्यवेद की उत्पत्ति के उपरान्त ब्रह्माजी देवराज इन्द्र से बोले- मेरे द्वारा यह नाट्यकथा ( काव्यकृति, इतिहास ) निर्मित कर दी गयी; अब आप देवताओं के द्वारा इसका प्रयोग करवाइए ॥ १ ९ ॥

कुशला ये विदग्धाश्च प्रगल्भाश्च जितश्रमाः ।

तेष्वयं नाट्यसंज्ञो हि वेदः संक्राम्यतां त्वया ॥ २० ॥

जो देवगण कार्य ' ( अभिनय ) में चतुर, विदग्ध, प्रौढ़ तथा श्रम को जीते हुए हों ( अथवा रंगमंचीय भय से निर्मुक्त हों और परिश्रमी हों ) उन्हीं को इस ' नाट्य वेद ' की आप शिक्षा दीजिये ( या ऐसे देवों को ही यह कृति अभिनय के प्रयोगार्थ प्रदान कीजिये ) ॥ २० ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं शक्रो ब्रह्मणा यदुदाहृतम् ” ।

प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा प्रत्युवाच पितामहम् ॥ २१ ॥

( ब्रह्माजी के द्वारा कहे गए ) इन वचनों को सुनकर देवराज इन्द्र सविनय प्रणाम कर ( युनः ) ब्रह्माजी से बोले ॥ २१ ॥

ग्रहणे धारणे ज्ञाने प्रयोगे चास्य सत्तम ।

अशक्ता भगवन् देवा अयोग्या नाट्यकर्मणि ॥ २२ ॥

१. प्रस्तुत • श्लोक में अभिनेता के चार गुण बतलाए हैं- ( १ ) कार्य-कुशलता, ( २ ) पाण्डित्य, ( ३ ) वाक्पटुता तथा ( ४ ) श्रम पर विजय पाने की क्षमता । १. ब्रह्मावोचत् - क ० । २. दृष्टः - ग ० । ३. निवेश्यताम् — क ० । ४. जितक्लमा क ० । ५. समुदाहृतम् - क ० । ६. न योग्या - घ ० ।

पृष्ठ 119

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नाटयशास्त्रम्

य इमे वेदगुह्यज्ञा ऋषयः संश्रितवता ' ।

एतेऽस्य ग्रहणे शक्ताः प्रयोगे धारणे तथा ॥ २३ ॥

हे भगवन्, इस नाट्यवेद के ग्रहण करने, धारण करने ( स्मरण करने ), ( इस विषय में ऊहापोह करते हुए ) जान लेने तथा प्रयोग ( अभिनय ) करने की देवताओं में सामर्थ्य नहीं है । अतएव ये इस ( नाट्यकर्म ) के योग्य नहीं हैं । किन्तु जो वेद के गुह्य रहस्यों के ज्ञाता और उत्तम व्रतों के पालन करने वाले ऋषिगण हैं वे ही इस नाट्य वेद के ग्रहण, धारण की ( भी ) सामर्थ्य रखते हैं ॥ २२-२३ ॥

नाट्य वेद की भरत ' उपलब्धि-श्रुत्वा तु शक्रवचनं मामाहाम्बुजसम्भवः ।

त्वं पुत्रशतसंयुक्तः प्रयोक्ताऽस्य भवानघ ॥

आज्ञापितो विदित्वाऽहं नाट्यवेदं पितामहात् पुत्रानध्यापयं योग्यान् प्रयोगं चापि तत्त्वतः तथा प्रयोग करने २४ ॥

॥ २५ ॥

इन्द्र के वचनों को सुन कमल से उत्पन्न होने वाले पितामह ब्रह्माजी मुझ ( भरत मुनि ) से कहा कि हे अनघ! ( निष्पाप एवं प्रिय मुनि! ) तुम अपने सौ पुत्रों से युक्त होकर इस ( नाट्य ) प्रयोग के कर्ता बनो । इस प्रकार पितामह ब्रह्मा से आज्ञा पाकर, उन्हीं से नाट्यवेद को प्राप्त कर मैंने इसके प्रयोगों को अपने योग्य पुत्रों को प्रयत्नपूर्वक पढ़ाया ॥ २४-२५ ॥ १. पुराणों में नाट्यशास्त्रवेत्ता भरत का नाम नहीं मिलता, केवल अपवाद रूप में ' मत्स्यपुराण ' में भरत का उल्लेख है । भरतपुत्रों के ये नाम पुराणों में उपलब्ध नहीं होते । इनमें ( कुछ के विषय में ) जो थोड़े उल्लेख प्राप्त हैं उनके आधार पर इतना विदित होता है कि कोहल, आत्रेय, शालिकर्ण ( शातकर्ण ) बादरायण, नखकुट्ट, अश्मकुट्ट आदि भी नाट्यशास्त्र के आचार्य हुए हैं । प्राचीन काल में विशाल नाट्यसाहित्य विद्यमान था जिसका कालान्तर में विनाश हो गया । इस विनाश की भी नाट्यशास्त्र में कथा विद्यमान है । १. संशितव्रताः क ० । २. एते सङ्ग्रहणे- -क ० । ३. श्रुत्वेमम् - क ० । ४. पुत्रानध्यापयामास - क ० ।

पृष्ठ 120

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प्रथमोऽध्यायः

शाण्डिल्यं चैव ' वात्स्यं व कोहल ' दत्तिलं तथा ।

' जटिलाम्बष्टको चैव तण्डुमग्निशिखं तथा ॥ २६ ॥

सैन्धवं सपुलोमानं " शावलिं विपुलं तथा ।

कपिञ्जलिं बादरिश्च यम - धूभ्रायणौ तथा ॥ २७ ॥।

जम्बुध्वजं काकजङ्घ स्वर्णकं तापसं तथा ।

कैदार " शालिकर्णश्च दीर्घगात्रञ्च शालिजम् ॥ २८ ॥

कौत्सं ताण्डायनिश्चैव पिङ्गलं चित्रकं तथा ।

बन्धुलं भल्लकश्चैव मुष्टिकं सैन्धवायनम् ॥ २ ९ ॥

तैतिल भार्गवश्चैव शुचि बहुलमेव च ।

अबुधं बुधसेनञ्च पाण्डुकर्ण सुकेरलम् ॥ ३० ॥

ऋजुकं मण्डकञ्चैव मागधं सरलश्चैव तुषारं पार्षदश्चैव विशालं शबलश्चैव कालियं भ्रमरश्चैव नखकुट्टाश्मकुट्टौ च पादुकोपानहौ चैव

शम्बरं वञ्जुलन्तथा ।

कर्ताञ्चप्रमेव च ॥ ३१ ॥

गौतमं बादरायणम् " ।

सुनाभं मेषमेव च ॥ ३२ ॥

तथा पीठमुखं मुनिम् ।

षट्पदं सोत्तमन्तथा ॥ ३३ ॥

श्रुतिं " वाषस्वरन्तथा ।

अग्निकुण्डाज्यकुण्डौ च वितण्ड्यं ताड्यमेव च ॥ ३४ ॥

१ चापि - ग ० । २. केहालं – ग ० । ३. दन्तिलं – ग ० । ४. जदुला – ग ० । ५. शाड्वलीं- - ग ० । ५. बादिरश्व- क ० । ७. कंदारिक ० । ८. तिन्तिलं – क ० । ६. सकेरलम् - ग ० । १०. तुषादं - - ग ० । ११. बादरायणिम् — ग ० । १२. सुनाली - ग ० । १३. तरुकुट्टात्मकुट्टो - -ग ० । १४. श्रुतिकं षट्स्वरंग ० । १५. विताण्डचं - ग ० ।