भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 101–110

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

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( = ) ) तथा आवश्यक परिष्कार एवं सुझावों को निर्देशित करने की अध्येता एवं सुधीजन से विनम्र अभ्यर्थना है उनके द्वारा प्राप्त सभी सुझाव अगले संस्करण में समाविष्ट किये जा सकेंगे । आभार प्रदर्शन नाट्यशास्त्र के मूल संस्कृत के साथ पाठान्तरादि विविध परिशिष्टों, टिप्पणियों आदि से समन्वित इस प्रदीप हिन्दी व्याख्यान के लेखन से लेकर प्रस्तुत करने के सुदीर्घकाल के अन्तराल में अनेक सुधीजनों, विद्वानों एवं साहित्यकारों से सहयोग, प्रोत्साहन एवं प्रेरणा मिली है । सर्वप्रथम नाट्य-शास्त्र के मूलपाठ के पूर्ववर्ती सभी संस्करणों के सम्पादकों की मैं अघमर्णता स्वीकार करता हूँ जिनने इस संस्करण को संवारने में आधार प्रदान किया है । इसके अतिरिक्त नाट्यशास्त्रीय वाङ्मय के उन सभी प्राचीन ग्रन्थकारों तथा अभिनव समालोचकों का भी मैं कृतज्ञ हैं जिनके ग्रन्थों के अनुशीलन ने मुझे प्रस्तुत संस्करण में अभिनवतथ्यों की अधिक मीमांसा करने में प्रवृत्त करवाया । नाट्यशास्त्र के चतुर्थाध्याय में प्रतिपादित करणों के चिदम्बरम् के नटराज मन्दिर में उत्कीर्ण प्रतिमाओं के रेखाचित्रों के ९ ६ ब्लाकों को प्रस्तुत संस्करण में प्रकाशनार्थ प्रेषित करने के कारण मैं भारत शासन देहली के शासकीय अभिलेखाधिकृत तथा दक्षिण भारतीय प्रशाखा ओटकमंड के पुरा-तात्विक सामग्री एवं अभिलेख के विशेषाधिकारी श्री डॉ ० जी ० एस ० घाई पी - एच ० डी ० का भी अतिशय कृतज्ञ हूँ । इस ग्रन्थ के लेखनकाल में अनेक मित्रों तथा विद्वानों का हार्दिक एवं व्यावहारिक सहयोग मिला है । इस क्रम में मैं डॉ ० राजबली जी पाण्डेय, ( दिवंगत कुलपति, जबलपुर विश्वविद्यालय, जबलपुर ), प्राचार्य श्री रामेश्वर शुक्ल, ' अंचल ' महाकोशल महाविद्यालय, जबलपुर, डॉ ० श्रीनाथ श्रीपाद हसूरकर, पूर्वाचार्य, संस्कृत महाविद्यालय रायपुर तथा प्राचार्य शासकीय महाविद्यालय धार, डॉ ० उदयनारायण तिवारी, अध्यक्ष - हिन्दी विभाग जबलपुर विश्वविद्यालय जबलपुर, डाँ ० रेवाप्रसाद द्विवेदी, प्राध्यापक, अध्यक्ष काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी, डॉ ० प्रभुदयालु जी अग्निहोत्री; संचालक मध्यप्रदेश रचना अकादमी, भोपाल, श्री रामेश्वर शर्मा प्राध्यापक हिन्दी विभाग, नागपुर विश्वविद्यालय, डॉ ० कृष्णबल्लभ जोशी, प्राध्यापक हिन्दी विभाग, जबलपुर - विश्वविद्यालय, जबलपुर, तथा डॉ ० राममूर्ति त्रिपाठी प्राध्यापक एवं अध्यक्ष हिन्दी विभाग, विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन का विशेषरूप से आभार व्यक्त करता है । नाट्यशास्त्र के व्याख्यान लेखन का समग्र कार्यं मध्यप्रदेश शासन की सेवा

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( 50 ) में रहते हुए करने के कारण मैं मध्यप्रदेशशासन के प्रति भी अपना विनम्र आभार प्रदर्शित करता हूँ । अन्त में काशी के विश्रुत एवं लब्धप्रतिष्ठ प्रकाशन संस्थान चौखम्बा संस्कृत संस्थान तथा उनके समस्त शाखा परिवार के प्रति सामान्यतः तथा इसके भूतपूर्व संचालक गोलोकवासी श्रीकृष्णदासजी गुप्त के प्रति विशेषतः अपना हार्दिक आभार प्रदर्शित करता हूँ जिनने प्रेमपूर्वक इस बड़े कार्य को प्रकाश-नार्थं स्वीकृत कर अनुशीलनकर्त्ता तथा साहित्यसेवियों के लिये नाट्यशास्त्र को उपलब्ध करवाया किन्तु दुःख भी है कि वे इस ग्रन्थ के प्रकाशन के पूर्व ही असमय में गोलोकवासी हो गये तथा संस्था के कर्णधार मा ० श्रीसेठ जयकृष्णदास जी गुप्त ' भी इसी बीच गोलोकवासी हो गये । मैं इस दुर्घटना से आहत - सा हूँ तथा वृन्दावनचारी से इनकी पवित्र आत्माओं को सदैव उनके नित्य विहार में समाविष्ट करने की अन्तःकरण से प्रार्थना करता हूँ । मैं चौखम्बा संस्कृत संस्थान के वर्तमान संचालक श्रीभाई मोहनदासजी गुप्त का भी आभारी हूँ जिनने अपनी संस्था के गौरवानुरूप इस ग्रन्थ को प्रस्तुत करने में तत्परता दिखाई । मैं चौखम्बा परिवार के ही श्री पं ० देवनारायण झा तथा पण्डित श्री रामचन्द्र झा व्याकरणाचार्य की भी इस प्रसंग में की गयी सहायता का आभारी हूँ । किमधिकम् -नाट्याम्नाय - नितान्ततान्तमनसा मासेतुशीताचला-क्षोणी मण्डल मध्यवर्ति विदुषामाभोगिनी चेतसाम् । जीयादुक्तिविवेकजालनिकरैः संशोधिता निस्तुलं: गम्भीरा मधुरा प्रबोधजननी व्याख्या प्रदीपाभिधा ॥ महाशिवरात्रि, सं ० २०२८ सुधीजन कृपाकांक्षी मन्दसौर बाबूलाल शुक्ल, शास्त्री

पृष्ठ 103

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पृष्ठ 104

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अभि ० द ० अभि ० भा ० अ ० भा ० का ० प्र ० काव्या ० सू ० द ० रू ० ना ० चं ० ना ० द ० सू ० ना ० शा ० ना ० शा ० सं ० भ ० को ० भा ० प्र ० भ ० अ ० भ ० भा ० म ० भा ० र ० गं ० वा ० रा ० रसा ० सु ० शृ ० प्र ० सर ० क ० सा ० द ० सं ० २० अ ० अं ० का ० सं ० चौ ० सं ० I नि ० सा ० गा ० ओ ० सी ० श्लो ० सं ० सं ० ग्रन्थ संकेत : अभिनयदर्पण | : अभिनवभारती ( नाट्यशास्त्र : अभिनवभारती ( नाट्यशास्त्र : काव्यप्रकाश । : काव्यालंकारसूत्र । : दशरूपक । : नाटकचन्द्रिका । : नाट्यदर्पणसूत्र । : नाट्यशास्त्र । : नाट्यशास्त्रसंग्रह । : भरतकोश । : भावप्रकाशन । : भरतार्णव । : भरतभाष्य । : महाभारत । : रसगङ्गाधर । : वाल्मीकिरामायण । : रसार्णवसुधाकर । : शृङ्गारप्रकाश । : सरस्वतीकण्ठाभरण । : साहित्यदर्पण । : सङ्गीतरत्नाकर । सामान्य सङ्केत : अध्याय । : अङ्क । : काशीसंस्करण | : चौखम्बा संस्करण । : द्रष्टव्य । : निर्णय सागरसंस्करण । व्याख्या ) । व्याख्या ) : गायकवाड़ ओरियेन्टल सीरीज, बड़ौदा । : श्लोक संख्या । : संख्या ।

पृष्ठ 105

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पृष्ठ 106

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( 3 ) ( 30 - ( 05-19 ) विषयानुक्रमणिका SP ( 2-2 ) ht now पृष्ठ प्रथमोध्यायः ( नाट्योत्पत्ति ) १-३२ मङ्गलाचरण एवं ग्रन्थप्रतिज्ञा ( श्लोक १ ) १ नाट्यवेद के विषय में मुनियों का प्रश्न ( २-५ ) नाट्यवेद की उत्पत्ति ( ६-१० ) ३२ ब्रह्मा द्वारा नाट्यवेद की निर्मिति ( ११-१८ ) नाट्यवेद की भरतमुनि को सम्प्राप्ति ( १ ९ -२३ ) भरतमुनि द्वारा स्वपुत्रों को नाव्य-वेद का प्रशिक्षण देना ( २४-२५ ) ८ भरत के सौ पुत्र ( २६-४० ) १० कैशिकोवृत्ति की आव श्यकता एवं योजना ( ४१-४६ ) ११ कैशिकी के हेतु ब्रह्मा द्वारा अप्सराओं का सृजन ( ४६-४७ ) १३ अप्सराओं की नामावलि ( ४७-५० ) १३ स्वाति और नारद की भरत के सहायतार्थ नियुक्ति ( ५०-५३ ) १४ भरत द्वारा इन्द्रध्वज महोत्सव के अवसर पर प्रथम नाव्य-प्रयोग प्रस्तुत करना ( ५३-५९ ) १५ संतुष्ट देवगण द्वारा अभिनेताओं को उपहार प्रदान ( ५ ९ -६३ ) १६ ( नाट्यप्रयोग को देखकर ) " दैत्यगण का क्षुब्ध होकर विघ्न उत्पन्न करना ( ६४-६८ ) १८ विघ्ननाशक जर्जर की इन्द्र को प्राप्ति ( ६ ९ -७५ ) १ ९ विघ्ननाश के लिए भरतमुनि द्वारा निवेदन ( ७६-७८ ) २० ( विघ्ननाशार्थ ) विश्वकर्मा द्वारा गणेष्ट नाट्यगृह की रचना ( ७ ९ -८३ ) २१ Import ) पृष्ठ नाट्यगृह में रक्षक देवताओं की स्थापना ( ८४-१०० ) २२ ब्रह्मा द्वारा विघ्नकर्त्ताओं को शान्त करना ( १०१-१०६ ) २५ नाट्यस्वरूप तथा नाट्यशास्त्र का निर्वचन ( १०७ - १२३ ) २६ रंग तथा रंगस्थ देवगण का पूजनविधान ( १२४-१३१ ) ३० - द्वितीयोध्याय: ( प्रेक्षागृहलक्षण ) ३३-६० मुनियों द्वारा प्रेक्षागृह के विषय में प्रश्न ( १ ) ३३ प्रेक्षागृह का स्वरूप एवं उसके विभेद ( ४-१३ ) ३३ प्रेक्षागृह के तीन प्रभेद तथा परिमाण ( १४ ) ३७ प्रेक्षागृह के लक्षण ( तथा प्रमाण ) ( १५-१९ ) ३७ मानव हेतु निर्मित प्रेक्षागृह का लक्षण ( २०-३० ) ३८ भूमिविभाग वास्तु प्रमाण ( ३० ) रज्जुग्रहण ( ३१ ) प्रेक्षागृह का भूमि विभाग ( ३७-३९ ) ४२ आधारशिलास्थापन - विधान ( ३ ९ -४७ ) ४३ भित्तिकर्म तथा स्तम्भ-स्थापन विधि ( ४७-६७ ) ४५ मत्तवारणी ( ६७-७२ ) ४ ९ रंगपीठ तथा रंगशीर्ष ( ७३-७९ ) ५० दारुकर्म तथा भित्तिकर्म, भित्ति-लेपन एवं चित्रकर्म विधान ( ८० - ९ ० ) ५२ चतुरस्र नाट्यगृह का लक्षण ( ९१-१०५ ) ५६

पृष्ठ 107

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( २ ) पृष्ठ त्र्यत्र नाट्यगृह का लक्षण ( १०६-१०९ ) ५ ९ तृतीयोध्याय: ( रंगदैवतपूजनविधि ) ६१-८२ अधिवास एवं रंगमंच की प्रतिष्ठा 95 का विधान ( १-३ ) ६१ देवगण की वन्दना ( ४-११ ) ६१ जर्जरपूजन ( १२-१५ ) ६२ पूजन का आरम्भ ( १४-१७ ) ६३ देवताओं की रंगमंच पर स्थापना-विधि ( १८-२१ ) ६४ देवगण के स्थापनार्थ मण्डलनिर्माण ( २१-३४ ) ६५ | देवगण की पूजा ( ३४-४६ ) ६७ देवगण की बलिविधि ( ४६-७४ ) ६ ९ जर्जरपूजन ( ७५-८२ ) ७६ होम विधान ( ८३-८८ ) ७७ नाट्याचार्य द्वारा कुम्भ - भेदन ( ८ ९ - ९ ० ) ७ ९ रंगप्रदीपन विधान ( ९ १ - ९ ४ ) ७ ९ रंगपूजन से श्रेयप्राप्ति तथा रंगस्थ देवगण का पूजन माहात्म्य ( ९५–१०३ ) ८० चतुर्थोऽध्याय: ( ताण्डवलक्षण ) ८३-१५० ब्रह्मा के आदेशानुसार अमृतमन्थन समवकार का भरतमुनि द्वारा प्रयोग ( १-४ ) ८३ त्रिपुरदाह डिम का शिव के सम्मुख मुनि द्वारा प्रयोग ( ५-१२ ) -८४ करण एवं अंगहारों द्वारा पूर्वरंग... की प्रसाधन विधि ( १२-१३ ) ८५ पृष्ठ अंगहार योजना - विधि ( २८-३० ) ८८ करण तथा उनके नाम ( ३०-५५ ) ८ ९ करणों की योजना विधि ( ५६-६१ ) ९ ३ करणलक्षण ( ६१-१६९ ) ९ ४ तलपुष्पपुट ( ६१-६२ ) ९ ४ वर्तित ( ६२-६३ ) ९ ४ वलितोरु ( ६३-६४ ) ९ ४ अपविद्ध ( ६४-६५ ) ९ ५ समनख ( ६५-६६ ) ९ ५ लीन ( ६६-६७ ) ९ ५ स्वस्तिकरेचित ( ६७-६८ ) ९ ५ मण्डलस्वस्तिक ( ६८-६९ ) ९ ५ निकुट्टक ( ६ ९ -७० ) ९ ६ फलक ( चित्र ) १ से १६ ९ ६ अर्धनिकुट्टक ( ७०-७१ ) ९ ६ कटिच्छिन्न ( ७१-७२ ) ९ ६ अर्धरेचितक ( ७२-७३ ) ९ ६ वक्षःस्वस्तिक ( ७३-७४ ) ९ ७ उन्मत्त ( ७४–७५ ) ९ ७ स्वस्तिक ( ७५-७६ ) ९ ७ पृष्ठस्वस्तिक ( ७६-७७ ) ९ ७ दिक्स्वस्तिक ( ७७-७८ ) ९ ८ अलात ( ७८–७९ ) ९ ८ कटीसम ( ७ ९ -८० ) ९ ८ आक्षिप्तरेचित ( ८०-८१ ) ९ ८ विक्षिप्ताक्षिप्तक ( ८१-८२ ) ९ ८ अर्धस्वस्तिक ( ८२-८३ ) ९ ८ ( ८३-८४ ). ९९ भुजङ्गत्रासित ( ८४-८५ ) ९९ ऊर्ध्वजानु ( ८५-८६ ) ९९ निकुञ्चित ( ८६-८७ ) ९९ मतह्नि ( ८७-८८ ) १०० पूर्वरंग के दो विभेद ( १४–१६ ) ८६ अर्धमत्तलि ( ८८-८९ ) १०० शिव द्वारा आदेश प्राप्त कर रेचितनिकुट्टित ( ८ ९ - ९ ० ) १०० तण्डु द्वारा भरतमुनि को पादापविद्धक ( ९ ० - ९ १ ) १०० करण एवं अङ्गहारों का वलित ( ९ १ - ९ २ ) 1973 १०० शिक्षण ( १६-१८ ) ८६ घूर्णित ( ९ २ - ९ ३ ) १०१ अंगहार ( १ ९ –२७ ) ८७ ललित ( ९ ३ - ९ ४ ) १०१

पृष्ठ 108

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( ६३ ) S दण्डपक्ष ( ९ ४ - ९ ५ ) २ ) भुजङ्गत्रस्तरेचित ( ९ ५ - ९ ६ ) ) नूपुर ( ९ ६ - ९ ७ ) वैशाखरेचित ( ९७-१८ ) अमरक ( ९ ८ - ९९ ) चतुर ( ९९ -१०० ) -१३१ ) एक भुजङ्गाचित ( १००-१०१ ) दण्डरेचितक ( १०१-१०२ ) वृश्चिककुट्टित ( १०२ - १०३ ) कटिभ्रान्त ( १०३-१०४ ) लतावृश्चिक ( १०४-१०५ ) छिन्न ( १०५-१०६ ) वृश्चिकरेचित ( १०६ - १०७ ) वृश्चिक ( १०७ - १०८ ) व्यंसित ( १०८-१०९ ) पार्श्वनिकुट्टित ( १० ९ -११० ) ललाटतिलक ( ११०–१११ ) क्रान्तक ( १११-११२ ) कुचित ( ११२-११३ ) चक्रमण्डल ( ११३-११४ ) ---उरोमण्डल ( ११४- ११५ ) आक्षिप्त ( ११५-११६ ) तलविलसित ( ११६-११७ ) अर्गल ( ११७-११८ ) विक्षिप्त ( ११८ - ११ ९ ) आवर्त्त ( ११ ९ -१२० ) डोलापाद ( १२०-१२१ ) विवृत्त ( १२१-१२२ ) विनिवृत्त ( १२२ - १२३ ) पार्श्वक्रान्त ( १२३ - १२४ ) निस्तम्भित ( १२४ - १२५ ) विद्युद्भ्रान्त ( १२५ - १२६ ) अतिक्रान्त ( १२६-१२७ ) विवर्तितक ( १२७-१२८ ) · गजक्रीडितक ( १२८-१२९ ) ` तलसंस्फोंटित ( १२ ९ -१३० ) गरुडप्लुतक ( १३०-१३१ ) गण्डसूची ( १३१-१३२ ) ( पृष्ठ | ए १०१ परिवृत्त ( १३२-१३३ ) १०१ पार्श्वजानु ( १३३ - १३४ ) १०१ गृधावलीनक ( १३४ - १३५ ) १०२ | सन्नत ( १३५-१३३ ) १०२ | सूची ( १३६ - १३७ ) १०२ अर्धसूची ( १३७ - १३८ ) १० १०२ सूचीविद्ध ( १३६-१३९ ) १०२ अपक्रान्त ( १३ ९ -१४० ) १०२ मयूरललित ( १४०-१४१ ) १०३ सर्पित ( १४१-१४२ ) १०३ दण्डपाद ( १४२-१४३ ) १०३ हरिणप्लुत १४३ - १४४ ) १०३ १०४ | प्रेङ्खोलित ( १४४-१४५ ) नितम्ब ( १४५ - १४६ ) १०४ स्खलित ( १४६-१४७ ) FA १०४ करिहस्त ( १४७-१४८ ) १०४ प्रसर्पित ( १४८ - १४ ९ ) १०४ १०५ सिंहविक्रीडित ( १४ ९ –१५० ) १०५ सिंहाकर्षित ( १५० - १५१ ) १०५ उद्वृत्त ( १५१-१५२ ) १०५ उपसृत ( १५२ - १५३ ) १०५ | तलसङ्घट्टित ( १५३-१५४ ) १०५ जनित ( १५४ - १५५ ) १०६ | अवहिरथ ( १५५-१५६ ) १०६ निवेश ( १५६ - १५७ ) -१०६ एकाक्रीडित ( १५७–१५८ ) १०६ ऊरुवृत्त ( १५८-१५९ ) १०६ मदस्खलितक ( १५ ९ -१६० ) पृष्ठ १०८ १० ९ १० ९ १० ९ १० ९ १० ९ ११० ११० ११० ११० ११० १११ १११ १११ १११ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११३ ११३ ११३ P992 ११३ ११४ १०७ विष्णुक्रान्त ( १६० - १६१ ) ०६: ११४ १०७ सम्भ्रान्त ( १६१-१६२ ) १०७ विष्कम्भ ( १६२-१६३ ) १०७ उद्घट्टित ( १६३-१६४ ) १०७ | वृषभक्रीडित ( १६४-१६५ ) - १०८ | लोलित ( १६५-१६६ ) * १०८ नागापसर्पित ( १६६-१६७ ) १०८ शकटास्य ( १६७–१६८ ) १०८ | गङ्गावतरण ( १६८-१६९ ) ११४ ११४ ११४ ११५ ११ ११५ ११५ ) = ११८

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( ६४ ) g पृष्ठ 3g पृष्ठ अङ्गहार एवं उनके लक्षण ) हस्तरेचक ( २४ ९ ) १३२ १०१ ( १७०-२४४ ) ११६-१३० ग्रीवारेचक ( २५० - २५५ ) १३३ स्थिरहस्त ( १७०-१७३ ) ) ११६ पिण्डीबन्ध - नाम तथा पर्यस्तक ( १७३ - १७५ ) ११७०० स्वरूप ( २५५-२६० ) १३४ सूचीविद्ध ( १७५-१७७ ) १ ) ११७ अपविद्ध ( १७७-१७९ ) ) ११८ आक्षिप्तक ( १७ ९ -१८१ ) ११८ उद्घट्टित ( १८१-१८३ ) १६१ ) ११ ९ विष्कम्भ ( १८४-१८७ ) १ ) ११ ९ अपराजित ( १८७ - १८ ९ ) १२० विष्कम्भापसृत ( १८ ९ -१ ९ १ ) १२० मत्ताक्रीड ( १ ९१-१९ ४ ) FIF १२१ लग स्वस्तिकरेचित ( १ ९४-१९ ६ ) १२१ पार्श्वस्वस्तिक ( १ ९६-१९९ ४ ) १२२ वृश्चिकापसृत ( १ ९९ - २०१ ) १२२ भ्रमर ( २०१-२०२ ) १२३ मत्तस्खलितक ( २०३–२०५ ) १२३ मदविलसित ( २०५–२०७ ) १२३ गतिमण्डल ( २०७-२०९ ) १२४ परिच्छिन्न ( २० ९ - २११ ) १२४ परिवृत्तकरेचित ( २११–२१५- ) १२५ वैशाखरेचित ( २१५-२१८ ) १२६ परावृत्त ( २१८-२२० ) १२६ अलातक ( २२०–२२२ ) १२६ पार्श्वच्छेद ( २२२-२२४ ) १२७ विद्युद्भ्रान्त ( २२४-२२६ ) १२७ उद्वृत्तक ( २२६-२२८ ) १२८ आलीद ( २२८-२३० ) १२८ रेचित ( २३०-२३२ ) १२ ९ आच्छुरित ( २३२-२३४ ) १२ ९ आक्षिप्तरेचित ( २३४-२३७ ) १३० सम्भ्रान्त ( २३७–२४० ) १३० अपसर्पित ( २४०-२४२ १३१ अर्धनिकुट्टक ( २४२-२४४ ) १३१ रेचक ( २४५-२४६ ) १३१ पादरेचक ( २४७ ) १३२ कटिरेचक ( २४८ )... १ ) १३२ ताण्डवोत्पति तथा उसका ० स्वरूप ( २६१-२६३ ) १३५ नृत्त का लक्षण और उसका प्रयोग ( २६३ - २७१ ) १३५ ताण्डव का वर्धमानक के साथ संयोजन एवं उसका प्रयोग-विधान ( २७१-२७३ ) १३७ आसारित प्रयोग ( २७३ - २ ९ ३ ) १३८ छन्दक ( गीतविधान एवं लक्षण ) ( २ ९४–३०७ ) -१४२ सुकुमारनृत्त ( स्वरूप एवं विधान ) ( ३०८-३०९ ) १४५ नृत के ( उपयुक्त अवसर ( ३१० - ३१८ ) १४६ अवनद्धवाद्यवादन-विधि ( ३१ ९ -३२६ ) १४८ पञ्चमोऽध्यायः ( पूर्वरङ्गविधान ) १५१-२११ मुनियों की भरतमुनि से पूर्वरङ्ग के विषय में जिज्ञासा ( १-४ ) १५१ भरतमुनि द्वारा पूर्वरङ्ग का वर्णन ( ४-६ ) १५१ पूर्वरङ्ग लक्षण ( ७ ) १५२ पूर्वरङ्ग के विभेद ( ८-१६ ) १५३ प्रत्याहार, अवतरण ( १७ ) १५५ | आरम्भ, आश्रावणा ( १८ ) १५६ वक्त्रपाणि, परिघट्टना ( १ ९ ) १५७ संघोटना, मार्गासारित ( २० ) १५७ आसारित, गीतविधि ( २१ ) १५८ उत्थापन ( २२ ) १५८ परिवर्तन ( २३ ) १५ ९

पृष्ठ 110

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( ६५ ) पृष्ठ | नान्दी ( २४ ) १५ ९ शुष्कावकृष्टा ध्रुवा ( २५ ) १६० रंगद्वार ( २६ ) १६० चारी, महाचारी ( २७ ) १६० त्रिगत ( २८ ) १६१ | प्ररोचना ( २ ९ ) १६१ बहिर्गीत ( उत्पत्ति, कारण एवं स्वरूप ) ( ३०-३२ ) १६२ दैत्य एवं राक्षसगण का क्षोभ ( ३३-३६ ) १६३ निर्गीत के निवारणार्थं देवगण की नारद मुनि से भेंट ( ३६-३७ ) १६४ नारद द्वारा देवगण को आश्वासन ( ३८-४३ ) १६४ निर्गीत से देवगण का संतोष ( ४८-५८ ) १६५ पूर्वरङ्ग ( शुद्ध तथा चतुरस्र लक्षण ( ५ ९ ) १६८ उत्थापनी ध्रुवा ( ६०-८८ ) १६ ९ परिवर्तिनी ध्रुवा ( ८८ - ९ १ ) १७६ दिग्बन्दन ( ९ २ - ९ ८ ) १७७ चतुर्थकार - प्रवेश ( ९९ - १०१ ) १७७ अवकृष्टा ध्रुवा ( १०२-१०४ ) १७ ९ नान्दी ( १०५ ) - १८० नान्दी का उदाहरण ( १०६-११० ) १८१ शुष्कावकृष्टा ध्रुवा ( १ ) ( लक्षण ) ( १११-११२ ) १८२ उदाहरण ( ११३ ) १८२ रङ्गद्वार ( ११४-११६ ) १८३ चारी ( ११७ ) १८३ अड्डिता ध्रुवा ( ११८-१२६ ) १८४ महाचारी ( १२६-१२८ ) १३६ चतुरस्ना - ध्रुवा ( १२ ९ - १३४ ) १८६ त्रिगत ( १३५-१३८ ) १८८ प्ररोचना ( १३ ९ -१४१ ) १ ९ ० त्र्यस्त्रपूर्वरङ्ग ( १४२-१५२ ) १ ९ १ चित्रपूर्वरङ्ग ( १५३-१६५ ) आश्रावणा ( १६५-१६८ ) १ ९ ७ पृष्ठ प्रस्तावना ( १६८-१७६ ) १ ९ ८ पूर्वरङ्ग का माहात्म्य ( १७७ - १८१ ) २०१ ध्रुवाओं की संयोजन विधि तथा उनके उदाहरण ( १८२-२२२ ) २०२ षष्ठोऽध्याय: ( ( रसाध्याय ) २१२ - ३६६ मुनियों द्वारा भरतमुनि से et रसविषयक प्रश्न ( १-३ ) २१२ २ भरतमुनि द्वारा प्रत्युत्तर ( तथा नाट्यशास्त्रविषयक उद्देश्य कथन ) ( ४-१५ ) २१३ रसों की संज्ञा एवं संख्या ( तथा उद्देश्य कथन ) ( १६-१७ ) २१८ स्थायीभाव ( १८ ) २२१ सवारीभाव ( १ ९ -२२ ) ) २२२ सात्विकभाव ( २३ ) एका २२३ नाट्याश्रित अभिनय के विभेद ( २४ ) २२३ धर्मी, वृत्तियाँ तथा प्रवृत्ति १३ का स्वरूप ( २५-२७ ) २२४, २२५ सिद्धि ( २७ ) २२५ स्वर ( २८ ) २२५ आतोद्य ( २८-२९ ) ( F ) २२६ ध्रुवा के विभेद ( ३० ) २२७ रंगमण्डप ( ३१ ) २२७ रसनिरूपण ( रसनिष्पत्तिसूत्र ) २२८ रस सूत्र पर आचार्य अभिनव-गुप्तपाद की मूल अभिनव 196 भारती व्याख्या तथा हिन्दी रूपान्तर २२ ९ -२८७ रस तथा भावों का सम्बन्ध ( ३५-३९ ) २८८ मूल रसों से चार रसों का उद्भव ( ४०-४२ ) २ ९ ३ | रसों का वर्ण निरूपण ( ४३-४४ ) २ ९ ३ रसों के अधिकारी देवता ( ४५-४६ ) २ ९ ६ शृङ्गाररस ( ४७-४९ ) २ ९ ८ हास्यरस ( ५०-५२ ) ३१६