भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 141–150
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 141–150
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३० नाट्यशास्त्रम् और यही नाट्य श्रुति, स्मृति, सदाचार तथा शेष ( बचे हुए ) अर्थों की कल्पना करने वाला तथा लोकरंजनकारी होगा ॥ १२३ ॥
रंग तथा रंग देवताओं का पूजा -
विधान-एतस्मिन्नन्तरे देवान् सर्वानाह पितामहः ।
क्रियतामद्य विधिवद् यजनं नाटयमण्डपे । १२४ ॥
इसके उपरान्त ब्रह्माजी सभी देवताओं से बोले - आप आज इस नाट्यमण्डप में विधिवत् यज्ञ कीजिये ॥ १२४ ॥
बलिप्रदानैर्होमैश्च मन्त्रौषधिसमन्वितैः ।
' भोज्यैर्भक्ष्यैश्च पानैश्च बलिः समुपकल्प्यताम् ॥
मन्त्र तथा औषधि आदि के, बलि ' प्रदान के तथा साथ इस यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिये तथा भक्ष्य पेय पदार्थों से बलि दी जाए ॥ १२५ ॥
मर्त्यलोकगताः सर्वे शुभां पूजामवाप्स्यथ ।
अपूजयित्वा रङ्गन्तु नैव प्रेक्षां प्रवर्तयेत् ॥ १२६
१२५ ॥
होम आदि के , भोज्य तथा ॥ यही पूजा भविष्य में नाटक के आरंभ के समय मृत्युलोक में आप लोग प्राप्त करेंगे । रंगपूजन किये बिना प्रेक्षा ( खेल, नाटक ) का आरंभ नहीं करना चाहिये ॥ १२६ ॥
अपूजयित्वा रङ्गन्तु यः प्रेक्षां कल्पयिष्यति ।
निष्फलं तस्य तज्ज्ञानं तिर्यग्योनिश्च यास्यति ॥ १२७ ॥
१. बलि = पूजन तथा उसमें अर्पित की जाने वाली सामग्री । २. भोज्य का अर्थ है खाने के वे पदार्थ जो कड़े हों तथा भक्ष्य का अर्थ है कोमल पदार्थ । ( खरविशदम् अभ्यवहार्यं भक्ष्यम्, खरभ्रष्टमत्स्यादिविशदं मोदकादि भोज्यम् अभि ० गु ० ) १. नाट्यविधि ग ० । १२. जय भक्ष्यंश्व - घ ० । ३. प्रेक्षा प्रवर्तते ग ० । ४. तस्य तन्निष्फलं ज्ञानं ग ० ।
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प्रथमोऽध्यायः ३१ जो बिना रंग पूजन किये ही ' प्रेक्षा ' का प्रारंभ करेगा उसका ज्ञान निष्फल होगा तथा वह पशुयोनि को भी प्राप्त करेगा ॥ १२७ ॥
यज्ञेन सम्मितं ह्येतद्रङ्गदैवतपूजनम् ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कर्तव्यं नाट्ययोक्तृभिः ॥ १२८ ॥
रंग देवताओं का यह पूजन वैदिकयज्ञ के समान है, अतएव ' नाट्य ' की संयोजना करने वालों, नाट्याचार्य ( या अर्थपति आदि ) को यह पूजन प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए ॥ १२८ ॥
नर्तकोऽर्थपतिर्वापि यः पूजान्न करिष्यति न कारयिष्यत्यन्यैर्वा प्राप्नोत्यपचयन्तु सः जो नट या उसका सहायक राजा या आश्रयदाता ( जो भी हो ) रंग की पूजा ( का विधान ) नहीं करेगा से पूजन नहीं करवाएगा तो वह अवनति ( पतन, करेगा ॥ १२ ९ ॥
।
॥ १२ ९ ॥
श्रेष्ठी ( अर्थपति ' ) या दूसरे व्यक्तियों हानि ) को प्राप्त
यथाविधि यथाशास्त्रं यस्तु पूजां करिष्यति ।
स लप्स्यते शुभानर्थान् स्वर्गलोकञ्च यास्यति ॥ १३० ॥
जो व्यक्ति विधिविधान तथा शास्त्रों के अनुसार रंग देवताओं की १. प्राचीनकाल में ये अर्थपति धन द्वारा अभिनेताओं के तथा रंगमंच के निर्माण, नाट्यप्रदर्शन आदि में सहायता किया करते थे ( प्राचीन काल में -व्यवसाय की दृष्टि से श्रेष्ठिजन के नाट्यप्रदर्शन में प्रवृत्त होने का विवरण कम मिलता है ) । अर्थपति नाट्यमण्डलियों की उपलब्धि का प्रयत्न तथा उनके द्वारा प्रस्तुत नाट्यप्रदर्शन में पर्याप्त अर्थव्यय करते थे । १. रङ्गपूजनम् - ग ० । २. कारयिष्यति वा चैव - ग ० । ३. प्राप्स्यत्यपचयं घ ० । ४. यथा दृष्टं - क ० ।
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३२ नाट्यशास्त्रम् अर्चना करेगा वह शुभ अर्थों की ( धन, वस्तु आदि इष्ट पदार्थों की ) तथा स्वर्ग की प्राप्ति भी करेगा ॥ १३० ॥
एवमुक्त्वा ' तु भगवान् द्रुहिणः सह दैवतैः ।
रङ्गपूजाङ्कुरुष्वेति मामेवं संमबोधयत् ॥ १३१ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे नाट्योत्पत्तिर्नाम प्रथमोध्यायः । ब्रह्माजी ने इस प्रकार कह कर मुझे तथा देवताओं को इसी विधान तथा प्रकारों से रंग की पूजा करने को प्रेरित किया ॥ १३१ ॥
भरत मुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र की प्रदीप व्याख्या का ‘ नाट्योत्पत्ति ' नामक प्रथम अध्याय सम्पूर्ण ॥ १ ॥
०६ १. एवं भवत्विति प्राह - ग ० ।
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BES TREATIS 30 I
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( FRONT ELEVATION ) सम्मुख दृश्य विकृष्ट प्रेक्षागृह ] पश्चिम नेपथ्य गृह पुरुष स्त्री पात्र पात्र कक्ष कक्ष रंगशीर्ष ८ २२ रंगपीठ ( रंगमंच ) म. म.बा. ८४१६ दक्षिण प्रेक्षागार प्रेक्षागार रंगपीठ CCROSS SECTION ) पृष्ठ दृश्य प्रेक्षाधार चतुरस्र प्रेक्षागृह या + उत्तर रंग शीर्ष [ म. वा. रंगपीठ म. वा. प्रेक्षागार भरत भगव ( SIDE ELEVATION ) अथ पार्श्व दृश्य भवि रंग- रंग नेपथ्य मीठ शीर्ष ( LONG SECTION आभ्यन्तर दृश्य ) भरतम मंच ' पर हो उस रंगपीठ की जाए त का पूजन वि इहा तरंगम क्योंकि ' नाट्यगृह ' की कृपा कर निया नाट्यगृह रंगशीर्ष रंगपीठ लक्ष पूर्व ४८ ' प्राचीन भारतीय त्र्यस्त्र प्रेक्षागृह प्रेक्षागृह १. इस है । क्रिया का बोधक ह शब्द का ' नरैः ' शब्द १. प्रत ३ ना ०
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अथ द्वितीयोऽध्यायः प्रेक्षागृह के विषय में मुनियों का प्रश्न
भरतस्य वचः श्रुत्वा पप्रच्छुर्मुनयस्ततः ।
भगवन् श्रोतुमिच्छामो यजनं रङ्गसंश्रयम् ॥ १ ॥
अथ वा याः क्रियास्तत्र लक्षणं यश्च पूजनम् ।
भविष्यद्भिर्नरैः कार्यं कथं तन्नाट्यवेश्मनि ॥ २ ॥
भरत मुनि के वचनों को सुन पुनः मुनिगण बोले -भगवन्! हम ' रंग मंच ' पर होने वाले पूजन आदि का विधान सुनना चाहते हैं । अथवा उस रंगपीठ की भविष्य में मनुष्यों द्वारा किस प्रकार रचना ( क्रियाएँ ' ) की जाए तथा इसके लक्षण, आकार, परिमाण तथा अधिकारी देवताओं का पूजन विधान क्या होगा इसे भी बतलाइये ॥ १-२ ॥
इहादिर्नाट्ययोगस्य नाट्यमण्डप ' एव हि ।
तस्मात्तस्यैव तावत्त्वं लक्षणं वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥
क्योंकि नाट्य का प्रारम्भिक तत्त्व रंगमंच है अतएव आप सर्वप्रथम ' नाट्यगृह ' के लक्षण ( आकार, परिमाण, स्वरूप आदि ) ही बतलाने की कृपा करें ॥ ३ ॥
नाट्यगृह प्रकार
तेषां तु वचनं श्रुत्वा मुनीनां भरतोऽब्रवीत् ।
लक्षणं पूजनं चैव श्रूयतां नाट्यवेश्मनः ॥ ४ ॥
१. इस कारिका में क्रिया तथा यजन शब्दों के क्रमशः रखने का विशेष हेतु है । क्रिया शब्द ' नाट्यमंडप ' की रचना तथा लक्षण शब्द उसके विशेष आकार का बोधक है । भूतकाल के व्यक्तियों को बतलाना व्यर्थ है अतएव ' भविष्यद्भः ' शब्द का तथा देवगण के लिये संकल्पमात्र से सब कार्य सिद्ध हो जाने के कारण, ' नरः ' शब्द का प्रयोग किया गया है । १. प्रत्यूचुः ग ० । २. कीर्तितो नाट्यमण्डपः च ० । ३ ना ० शा ० प्र ०
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३४ नाट्यशास्त्रम् मुनिगण की बात सुन भरत मुनि बोले - पहिले आप ' नाट्यगृह ' का लक्षण ( आकार आदि ) तथा पूजन - विधान ( दोनों ) सुनिये ॥ दिव्यानां मानसी सृष्टिर्गृहेषूपवनेषु च ।
यथाभावाभिनिर्वर्त्याः सर्वे भावास्तु मानुषा ।
नराणां यत्नतः कार्या लक्षणाभिहिता क्रिया ॥ ५
श्रूयतां तद्यथा यत्र कर्तव्यो नाट्यमण्डपः ।
तस्य वास्तु च पूजा च तथा योज्या ' प्रयत्नतः ॥ ६
इह प्रेक्षागृहं दृष्ट्वा धीमता विश्वकर्मणा ।
त्रिविधः सन्निवेशश्च शास्त्रतः परिकल्पितः ॥ ७
विकृष्टश्चतुरश्रश्च यश्चैव तु मण्डपः । तेषां त्रीणि प्रमाणानि ज्येष्ठं मध्यं तथाऽवरम् । ८ देवताओं ' को गृह तथा उपवन निर्माण में मानसी ४ ॥ ॥ ॥ ॥ ॥ शक्ति प्राप्त है ( अर्थात् देवगण अपने इच्छानुसार गृह तथा उपवन का निर्माण ( मन के द्वारा ही ) कर लेते हैं अतः उनके लिए निर्माण विधि आवश्यक नहीं है ) किन्तु मनुष्यों के लिये तो सभी शास्त्र के नियमों से युक्त होकर ही सम्पन्न होने वाले कार्य हुआ करते हैं ( इसलिये मनुष्यों को तो लक्षणानुसार ही नाट्यगृह का निर्माण करना चाहिये ) । ( अतएव ) अब आप नाट्यगृह के स्थान, उसका निर्माण - प्रकार प्रमाण आदि ) तथा पूजन - विधान को — जो कि प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये - सुनिये । १. यह श्लोक आगे भी आया है तथा वहीं अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है । इससे यह भी सूचित होता है कि नाट्य गृहों की अधिक आवश्यकता मनुष्यों के लिये ही है, देवगण के लिये नहीं और इनका स्वरूप बतलाना भी इसी कारण आवश्यक है । १. देवानां ख ० । २. च वास्तुषु ग ० । ३. प्रेक्षागृहाणान्तु — ग ० । शाह 8
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द्वितीयोऽध्यायः ३५ बुद्धिमान विश्वकर्मा ने ' नाट्यगृह ' के विषय में विचार कर उसके शास्त्रानुसार तीन प्रकार बतलाए हैं जिनके नाम हैं ( १ ) विकृष्ट, ( २ ) चतुरस्र तथा ( ३ ) त्र्यत्र । इनके माप ( परिमाण होते हैं - ( १ ) ज्येष्ठ ( बड़ा ), ( २ ) मध्य ( मझला ) सबसे छोटा ॥ ५-८ ॥ प्रमाणमेषां निर्दिष्टं हस्तदण्डसमाश्रयम् शतं चाष्टौ चतुःषष्टिर्हस्ता ' द्वात्रिंशदेव च ॥ अष्टाधिकं शतं ज्येष्ठं चतुःषष्टिस्तु मध्यमम् कनीयस्तु तथा वेश्म हस्ता ' द्वात्रिंशदिष्यते ॥ देवानां तु भवेज्ज्येष्ठं नृपाणां मध्यमं भवेत् शेषाणां प्रकृतीनां तु कनीयः संविधीयते ) तीन प्रकार के तथा ( ३ ) अवर
।
९ ॥
।
१० ॥
॥। ११ ॥
प्रेक्षागृहाणां सर्वेषां प्रशस्तं मध्यमं स्मृतम् ।
-तत्र पाठ्यं च गेयं च सुखश्राव्यन्तरं भवेत् ॥ १२ ॥
प्रेक्षागृहाणां सर्वेषां त्रिप्रकारो विधिः स्मृतः ।
विकृष्टश्चतुरस्रश्च त्र्यनचैव प्रयोक्तृभिः ॥ १३ ॥
इन नाट्यगृहों का परिमाण हाथ ' तथा दण्ड के आधार पर निश्चित किया जाता है । इनके माप हैं इक सौ आठ, चौसठ तथा बत्तीस हाथ की एक भुजा । एक सौ आठ हाथ वाला प्रेक्षागृह ज्येष्ठ, चौसठ हाथ वाला मध्य तथा बत्तीस हाथ वाला कनिष्ठ होता है । देवताओं का नाट्यगृह, २ १. हस्त और दण्ड के लक्षण इसी अध्याय ( २।१६।१ ९ ) में हैं । २. कुछ लोगों का मत है कि विकृष्ट, चतुरस्र तथा त्र्यस्त्र ही क्रमशः ज्येष्ठ, १. द्वात्रिंशच्चेति निश्चितम् ग ० । २. द्वात्रिंशत्करमिष्यते ग ० । ३. भवनं ज्येष्ठ ४. प्रेक्षागृहाणां सर्वेषामित्यारभ्य नाट्यवेदप्रयोक्तृभि-रित्यन्तं पद्यत्रयं ग ० पुस्तके नास्ति ।
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३६ नाट्यशास्त्रम् ज्येष्ठ, राजाओं का मध्यम तथा शेष सामान्य प्रजाजन के लिए अवर नाट्यगृह का संविधान किया जाना चाहिए । इन सभी प्रेक्षागृहों में मध्यम परिमाण का प्रेक्षागृह प्रशस्त होता है क्योंकि उसमें पाठ्य तथा गीत को सुखपूर्वक सुना जा सकता है । इस प्रकार प्रेक्षागृहों के विकृष्ट, चतुरस्र तथा व्यस्र नामक ये तीन प्रकार बतलाये गये ॥ ९ -१३ ॥ मध्यम तथा अवर होते हैं । अन्य लोगों का कहना है कि प्रत्येक के तीन तीन भेद होते हैं और इस प्रकार नौ भेंद होंगे । अभिनवगुप्ताचार्य ने भी इसी व्यवस्था को उचित माना है । ( एतान्येव त्रीणि ज्येष्ठादीनि इति केचित्, अन्ये तु प्रत्येकं त्रित्वमिति नवैतेऽत्र भेदा इत्याहुः, एतदेव युक्तम् - अ ० भा ० Vol. I. पृ ० ४६ ) इसके हस्त तथा दण्ड के अनुसार भेदों की कल्पना कर लेने पर १८ भेद हो जाते हैं । ये निम्न प्रकार से बनते हैं । यथा: -( १ ) हस्तप्रमाण ज्येष्ठ ( २ ) हस्तप्रमाण ज्येष्ठ चतुरस्र ( ३ ) हस्त-प्रमाण ज्येष्ठ त्र्यत्र ( ४ ) हस्तप्रमाण मध्य विकृष्ट ( ५ ) हस्तप्रमाण मध्य चतुरस्र ( ६ ) हस्तप्रमाण मध्य त्र्यत्र ( ७ ) हस्तप्रमाण अवर विकृष्ट ( ८ ) हस्तप्रमाण अवर चतुरस्र ( हस्तप्रमाण अवर त्र्यत्र । ( १ ) दण्डप्रमण ज्येष्ठ विकृष्ट ( २ ) दण्डप्रमाण ज्येष्ठ चतुरस्र ( ३ ) दण्ड-प्रमाण ज्येष्ठ त्र्यत्र ( ४ ) दण्डप्रमाण मध्य विकृष्ट ( ५ ) दण्डप्रमाण मध्य चतुरस्र ( ६ ) दण्डप्रमाण मध्य त्र्यत्र ( ७ ) दण्डप्रमाण अवर विकृष्ट ( ८ ) दण्ड-प्रमाण अवर चतुरस्र ( 8 ) दण्डप्रमाण अवर त्र्यत्र । इन सभी नाट्यगृहों में मध्यम नाट्यगृह श्रेष्ठ होता है । इसका कारण है अभिनय की स्वाभिकता की रक्षा । अभिनवगुप्ताचार्य ने बतलाया है कि देवता, भूपति तथा प्रजा का जो यहाँ वर्णन किया है वे पात्र रूप में हैं, प्रेक्षक रूप में नहीं । पर प्रेक्षक के रूप में भी उन्हें यहाँ मानना उचित है क्योंकि ये नाट्य-गृह उन्हें प्रेक्षक मान कर तथा उनकी सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए बनाए गए हैं । यूनान के बड़े मंचों में जो असुविधाएँ होती थीं वे इन मंत्रों में कदा-चित् नहीं हो पाती थीं, यह सहज ही अनुमान भी किया जा सकता है ।
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द्वितीयोऽध्यायः ३७ नाट्यगृह के तीन परिमाण ( माप )
कनीयस्तु स्मृतं त्र्यस्त्रं चतुरस्त्रं तु मध्यमम् ।
ज्येष्ठं विकृष्टं विशेयं नाट्यवेदप्रयोक्तृभिः ॥ १४ ॥
यत्र सबसे छोटा और चतुरस्र मध्यम आकारवाला होता है तथा नाट्य वेद के विज्ञाता एवं प्रयोक्ताजन ' विकृष्ट ' ( ज्येष्ठ आकार वाला समझें ॥ १४ ॥
प्रेक्षागृहों के प्रमाण तथा लक्षण-प्रमाणं यच्च निर्दिष्टं लक्षणं विश्वकर्मणा ।
प्रेक्षागृहाणां सर्वेषां तश्चैव हि निबोधत ॥
अणू रजश्च लिक्षा यूका ' यवस्तथा ।
अंगुलञ्च तथा हस्तो दण्डश्चैव प्रकीर्तितः ॥
अणवोऽष्टौ रजः प्रोक्तं तान्यष्टौ बाल उच्यते ।
बालास्त्वष्टौ भवेल्लिक्षा यूका लिक्षाष्टकं भवेत् ॥
यूकास्त्वष्टौ यवो ज्ञेयो यवास्त्वष्टौ तथाङ्गुलम् ।
अङ्गुलानि तथा हस्तश्चतुर्विंशतिरुच्यते ॥
चतुर्हस्तो भवेद्दण्डो निर्दिष्टस्तु प्रमाणतः ।
अनेनैव प्रमाणेन वक्ष्याम्येषां विनिर्णयम् ॥
विश्वकर्मा ने ( सभी प्रकार के ) इन प्रेक्षागृहों के ) को सबसे बड़े १५ ॥ १६ ॥ १७ ॥ १८ ॥ १ ९ ॥ जो लक्षण तथा प्रमाण ' निर्दिष्ट किए हैं इन्हें भी अब आप जानिये । अणु, रज, बाल, लीख १. यहाँ जो माप तौल का प्रमाण बतलाया गया है वही ( प्रायः ) प्राचीन काल में प्रचलित था । कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी यही प्रमाण मिलता है । ( द्रव्य - अ ० शा ० २।१० ) पाणिनि की अष्टाध्यायी में भी इसी प्रकार का मापतौल का प्रमाण बतलाया गया है । द्रष्टव्य -डॉ ० वासुदेवशरण अग्रवाल, पाणिनिकालीन भारतवर्ष ( अष्टाध्यायी ५।४।८६ पर ) १. यवः प्रोक्तः — ग ० ।