भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 151–160
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 151–160
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३८ नाट्यशास्त्रम् ( जूं का अण्डा ), जूं, जौ, अंगुली, हस्त तथा दण्ड ये नौ नाप के उत्तरोत्तर बढ़ते हुए परिमाण हैं । आठ अणुओं का एक रज होता है, आठ रजों का एक बाल, आठ बालों की एक लीख तथा आठ लीखों से एक जूं होती है । आठ जूं से एक जो तथा आठ जौ का एक अंगुल होता है । चौबीस अंगुल का एक हाथ तथा चार हाथ का एक दण्ड कहलाता है । इसी प्रमाण विधि के अनुसार अब मैं प्रेक्षगृहों के आकार ( प्रमाण ) का निश्चय करता हूँ ॥ १५–१९ ॥ मनुष्यों के लिए निर्मित प्रेक्षागृह का स्वरूप-चतुःषष्टिकरान्कुर्याद्दीर्घत्वेन तु मण्डपम् । द्वात्रिंशेन तु विस्तारं मर्त्यानां यो भवेदिह ॥ इस पृथ्वी पर मनुष्यों के लिए जो नाट्यगृह निर्माण लम्बाई ६४ हाथ तथा चौड़ाई ३२ हाथ रखनी चाहिए ॥ विस्तीर्ण प्रेक्षागृह की अनुपयोगिता-अत ऊर्ध्वं न कर्तव्यः कर्तृभिर्नाटथमण्डपः यस्मादव्यक्तभावं हि तत्र नाटयं व्रजेदिति ॥ २० ॥ किया जाए उसकी २० ॥
।
२१ ॥
निर्मातागण इससे बड़ा नाट्यगृह निर्माण न करें क्योंकि प्रेक्षागृहों के अधिक विस्तीर्ण होने पर उनमें उच्चारित किये जाने वाले स्वरयुक्त पाठ्य ( संवाद, गीत ) तथा प्रस्तुत किया जाने वाला नाट्याभिनय अस्पष्ट होने लगेगा ॥ २१ ॥
मण्डपे विप्रकृष्टे तु पाठ्यमुच्चारितस्वरम् ।
अनिस्सरणधर्मत्वाद्विस्वरत्वं भृशं व्रजेत् ॥ २२ ॥
यश्चाप्यस्यगतो भावो नानादृष्टिसमन्वितः ।
स वेश्मनः प्रकृष्टत्वाद् व्रजेदव्यक्ततां पराम् ॥ २३ ॥
१. यो भवेदिह ख । द्वात्रिंशतश्च विस्तारान् मर्त्यानां योजयेदिह-ग ० घ ० । २. भवेदिति - ग ० । ३. मुच्चरित - घ ० । ४. अनभिव्यक्तवर्णत्वात् — ग ० । ५. व्रजेदिति क ० । ६. यश्च लास्यगतो ग ०; यस्य लास्य - ख ० घ ० । ७. भाव सृष्टिरसाश्रय-- ग ०, भावदृष्टिसमन्वितः घ ० ।
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द्वितीयोऽध्यायः ३ ९
प्रेक्षागृहाणां सर्वेषां तस्मान्मध्यममिष्यते ।
यस्मात्पाठ्यश्च ' गेयश्च तत्र श्रव्यतरं भवेत् ॥ २४ ॥
( प्रेक्षागृह के लम्बे होने पर ) कथोपकथन तथा गीतों में वर्णों के ठीक तरह से ( स्फुटरूप में ) उच्चारण ( प्रकट ) न होने से अतिशय बेसुरापन ( विस्वरता ) हो जाएगा और अभिनेताओं के मुखों पर स्थित नाना दृष्टियों से समन्वित भाव भी ( प्रेक्षागृह के विस्तीर्ण होने के कारण ) अस्पष्ट हो जाएँगे । इसलिए सभी प्रेक्षागृहों में मध्यम परिमाण वाला प्रेक्षागृह ही ठीक है, जिनमें संवाद, वाद्य तथा गीत सुखपूर्वक सुने जा सकें ॥ २२ -- २४ ॥
देवानां मानसी सृष्टिर्गृहेषूपवनेषु च ।
यत्तभावाभिनिष्पन्नाः ३ सर्वे भावा हि मानुषाः ॥। २५ ॥
तस्माद्देवकृतैर्भावैर्न विस्पर्धेत मानुषः । ( सब प्रकार के ) गृहों तथा उपवन की देवताओं द्वारा मानसी सृष्टि की जाती है किन्तु मनुष्यों द्वारा सब रचनाओं को प्रयत्नपूर्वक ( परिश्रम से ) निर्माण करना होता है । अतएव मनुष्य को देवताओं की रचना शक्ति से विशेष स्पर्धा नहीं करनी चाहिए ॥ २५-२६ ॥ मानुषस्य तु गेहस्य सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥ २६ ॥
भूमेर्विभागं पूर्वन्तु परीक्षेत प्रयोजकः ।
ततो वास्तुप्रमाणेन प्रारभेत शुभेच्छया । २७ ॥
समा स्थिरा तु कठिना कृष्णा गौरी व या भवेत् । १. देवों तथा मनुष्यों का अन्तर बतलाने का उद्देश्य यह है कि मनुष्यों की दृष्टि तथा कर्णेन्द्रिय शक्ति ( श्रवणशक्ति ) सीमित है और यह भी कि आगे के ( सभी ) वर्णन मनुष्यों के लिए ही किए गए हैं । १. वाद्यञ्च – ग ० । २. सुखं ग ० । ३. यत्नभावाद् विनिष्पन्नाः - ग, ख ० । ४. मनुष्यस्य ग ० ५. प्रमाणश्च ग ० । ६. कृष्णा गौरी च घ ० ।
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४० नाट्यशास्त्रम् भूमिस्तत्रैव ' कर्तव्यः कर्तृभिर्नाट्य मण्डपः ॥ २८ ॥
प्रथमं शोधनं कृत्वा लाङ्गलेन समुत्कृषेत् ।
अस्थि कीलकपालानि तृणगुल्मांश्च शोधयेत् ॥ २ ९ ॥
शोधयित्वा वसुमतीं प्रमाणं निर्दिशेत्ततः । अब मैं मनुष्यों के नाट्यगृह का लक्षण कहता हूँ । नाट्यगृह निर्माण करवाने वाले ( शिल्पी ) को सर्वप्रथम पृथ्वी के भाग की ( जिस पर नाट्यगृह बनवाया जाए ) परीक्षा करनी चाहिए । तथा वास्तुशास्त्र ' के प्रमाणानुसार शुभभावना से युक्त हो कार्य प्रारम्भ करे । जो भूमि समतल, स्थिर, कड़ी हो एवं जिसका रंग काला या गौर वर्ण ( सफेद या भूरा ) हो उसी भूमि पर निर्मातागण नाट्यमण्डप का निर्माण करवाएँ । सर्वप्रथम उस भूमि का शोधन करे फिर उसको हल चलावा कर जुतवा दे और उसमें स्थित हड्डी, कीलें, खपड़े, घास ( जो कि भूमि में ही बढ़ रहा हो ) तथा झाड़ियों को भी साफ कर दे । इस प्रकार भूमि का शोधन कर फिर प्रमाण का ( नाप आदि का ) निर्देश करे ॥ २६-३० ॥ ( निर्माण हेतु ) शुभ नक्षत्र— श्रीयुत्तराणि सौम्यश्च विशाखापि च रेवती ॥ ३० ॥
हस्ततिष्यानुराधाश्च प्रशस्ता नाट्यकर्मणि । नाट्यगृह के निर्माण में शुभ नक्षत्र हैं - तीन उत्तरा शब्द युक्त नक्षत्र ( अर्थात् उत्तराषाढ़ा, उत्तराफाल्गुनी तथा उत्तरा भाद्रपद ), मृगशिरा ( सौम्य ), विशाखा, रेवती, हस्त, तिष्य तथा अनुराधा ॥ ३०-३१ ॥ १. प्राचीन काल में भवन निर्माण शास्त्र अथवा वास्तुशास्त्र पर अधिक साहित्य उपलब्ध था । विश्वकर्मा इसके दूसरे आद्य प्रवर्तक थे तथा मयासुर आदि अनेक विद्वान् तथा शिल्पकार इसके निर्माता थे । सम्प्रति ' मानसारवास्तुसार ' वास्तुशास्त्र का सर्वश्रेष्ठ संस्कृत ग्रन्थ है । इसमें भी प्रेक्षागृह का वर्णन ( किया गया ) है जो लगभग नाट्यशास्त्र जैसा ही है या उससे भी अस्पष्ट । १. तत्र तु ग ० । २. अयं श्लोकः क ख पुस्तके प्रक्षिप्तः समुपलभ्यते ।
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द्वितीयोऽध्यायः ४१ रज्जु - ग्रहण - -पुष्यनक्षत्र योगेन ' शुक्लं सूत्रं प्रसारयेत् ॥ ३१ ॥
कार्पासं बाल्बज वापि मौखं वाल्कलमेव च ।
सूत्रं बुधैस्तु कर्तव्यं यस्य च्छेदो न विद्यते ॥ ३२ ॥
अर्धच्छिन्ने भवेत्सूत्रे स्वामिनो मरणं ध्रुवम् त्रिभागच्छिन्नया ' रज्ज्वा राष्ट्रकोपो विधीयते छिन्नायां तु चतुर्भागे प्रयोक्तुर्नाश उच्यते हस्तात्प्रभ्रष्टया वापि कश्चित्त्वपचयो भवेत् तस्मान्नित्यं प्रयत्नेन रज्जुग्रहणमिष्यते कार्य चैव प्रयत्नेन मानं नाटयगृहस्य तु मुहूर्तेनानुकूलेन तिथ्या " सुकरणेन च ब्राह्मणांस्तर्पयित्वा तु पुण्याहं वाचयेत्ततः
।
॥ ३३ ॥
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॥ ३४ ॥
॥। ३५ ॥
॥। ३६ ॥
शान्तितोयं ततो दत्त्वा ततः सूत्रं प्रसारयेत् । पुष्य नक्षत्र ( के योग ) में श्वेत वर्ण के सूत्र ' को ( मापने वाली ) सफेद डोरी को ) विस्तीर्ण करे । यह सूत्र कपास, ऊन, मूंज या किसी वृक्ष की छाल से निर्मित होना चाहिए । बुद्धिमान् पुरुषों द्वारा ( इस ) डोरी को ऐसी बनानी चाहिए कि वह टूटने न पाए । क्योंकि डोरी के बीच ( भाग ) से टूटने पर नाट्यगृह निर्माता या राज्य के स्वामी की निश्चित मृत्यु हो जाती है । १. ' सूत्र ' बनाने का जो विधान यहाँ दिया गया है मानसार वास्तुशास्त्र में भी प्रायः वही मिलता है । इससे चूने में डुबोकर निशान बनाए जाते थे और तब नींव की खुदाई की जाती थी । आज भी ऐसा ही होता है । १. योगे तु – क ०, ग ० । २. बादरं ग ० । ३. वाल्कलं मौजमेव च - ग ० ४. विभाग - क ०; त्रिभागेक ० । ५. तिथ्या च करणेन च घ ० । ६. तत्र सूत्रं - घ ० ।
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४२ नाट्यशास्त्रम् यदि रस्सी तिहाई भाग से टूट जाए तो राष्ट्रविप्लव ' होता है । चौथे भाग से टूट ' जाने पर प्रयोक्ता ' ( अभिनय के प्रबन्धक या प्रस्तुत कर्ता ) का नाश कहा गया है । यदि यह डोरी ( भूमि मापन के समय ) हाथ से खिसक कर गिर या टूट जाए तो भी कोई न कोई हानि अवश्य होती है । अतएव रस्सी को सदा बड़ी सावधानी से ( मापने के लिए ) ग्रहण करना चाहिए । अतः नाट्यगृह हेतु रज्जु से माप पयत्नपूर्वक की जानी चाहिए । इसके लिए मुहूर्त और तिथि अनुकूल चाहिए और करण भी शुभ होना चाहिए तथा ऐसा होने पर फिर ब्राह्मणों को तृप्त कर ( भोजन, दक्षिणा आदि देकर ) पुण्याहवाचन करवाए । तदुपरान्त शान्ति का जल ( छिड़क या ) छोड़ते हुए सूत्र को धारण करे और उसे फैलाए ॥ ३१-३७ ॥ नाट्यगृह की भूमि योजना — चतुष्षष्टिकरान्कृत्वा द्विधा कुर्यात्पुनश्च तान् ॥
पृष्ठतो यो भवेद्भागो द्विधो भूतस्य तस्य तु ।
तस्यार्धेन विभागेन रङ्गशीर्ष प्रकल्पयेत् ॥
पश्चिमे च विभागेऽथ नेपध्यगृहमादिशेत् । ( विकृष्ट तथा मध्यम - परिमाण के प्रेक्षागृह की रचना ३७ ॥ ३८ ॥। के लिए ) चौसठ १. ' राष्ट्रकोप ' या राष्ट्रविप्लव का अर्थ है राजनैतिक परिवर्तन या उथलपुथल । प्रयोक्ता का अर्थ है अभिनयनिर्देशक या नाट्याचार्य । २. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार एक मुहूर्त ४८ मिनट का कालांश होता है । चान्द्र तिथि के अर्धभाग को करण कहते हैं जो ११ होते हैं । इन्हें प्रत्येक मुहूर्त के देखते समय विचारना होता है । ( देखिये सूर्यसिद्धान्त २।६७, ६८ ) । ३. ' मध्य विकृष्ट ' नाट्यगृह की रचना का यह क्रम है कि इसकी लंबाई ६४ तथा चौड़ाई ३२ हाथ है । दो भागों में बाँट कर पिछले भाग को जो कि १६ हाथ का ही हाथ के दो भागों में विभक्त किया जाए जिसमें पिछला भाग नेपथ्यगृह का तथा अगला भाग रंगपीठ और रंगशीर्ष हो जाता | नेपथ्यगृह १. द्विधाभूतो भवेच्च यः - ग ० । २. सममर्ध – क ० । ३. तु पुनर्भागे - ग ० ।
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द्वितीयोऽध्यायः ४३ हाथ ( लंबी ) भूमि को नाप कर उसे दो भागों में विभक्त करे । इनमें जो पीछे का आधा भाग है उसे दो भागों में पुनः बाँट कर उसके अगले पर ' रंगपीठ ' और ' रंगशीर्ष ' का निर्माण करे तथा शेष पिछले आधे भाग पर ( जो रंग - शीर्ष के पीछे है ) ' नेपथ्य गृह ' को बनवाना चाहिए ॥ ३७-३६ ॥ आधारशिला स्थापन हेतु उत्सव विधान-विभज्य भागान्विधिवद्यथावदनुपूर्वशः ॥ ३ ९
शुभे नक्षत्रयोगे च मण्डपस्य निवेशनम् ।
शङ्खदुन्दुभिनर्घोषैर्मृदङ्गपणवादिभिः ॥ ४०
सर्वातोद्यैः प्रणुदितैः स्थापनं कार्यमेव तु I उत्सार्याणि त्वनिष्टानि पाषण्ड्याश्रमिणस्तथा
काषायवसनाश्चैव विकलाश्चैव ये नराः ।
॥
॥
॥ ४१ ॥
इस प्रकार पूर्व कथित विधि के अनुसार भूमि के भागों को यथावत् विभाजन कर शुभ नक्षत्र तथा योग में शंख दुन्दुभि आदि मंगल वाद्यों के नाद घोष के साथ तथा मृदंग, पणव ' आदि बाजों को वृन्दवादन सहित बजवाते हुए नाट्य - मण्डप ( नाट्यगृह ) की आधारशिला स्थापित करनी चाहिए । और इस मंगलमय उत्सव के अवसर पर अनिष्टकारी जो भी ( पदार्थ या मनुष्य ) हों उन्हें तथा पाषण्डर, संन्यासी, काषायवस्त्रधारी तथा विकलांग मनुष्यों को भी ( उस समय ) इस स्थान से हटा देना चाहिए ॥ ३ ९ -४२ ॥ अभिनेताओं के विश्राम तथा सज्जा के उपयोगार्थं बनाया जाता था ( प्रेक्षागृह का रेखाचित्र देखने पर यह स्पष्ट हो जाएगा ) विशेष विवेचन के लिए भूमिका तथा परिशिष्ट भी द्रष्टव्य । १. अवनद्ध वाद्य का एक प्रकार । २. यहाँ ' पाखण्ड का बुरा कार्य नहीं किन्तु किसी अन्य समाज या संघ में अन्तर्भुक्त व्यक्ति है । पीछे चलकर इसका अर्थ ढोंगी हो गया । १. विकल्प्य - ख ० । २. सर्वातोद्यनिनादैव घ ० । ३. पाषण्डाश्रमि - ग ।
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४४ नाट्यशास्त्रम् i निशायाञ्च बलिः कार्यो नानाभोजनसंयुतः गन्धपुष्पफलोपेतो दिशो दश समाश्रितः पूर्वेण शुक्लान्नयुतो नीलानो ' दक्षिणेन च ॥ पश्चिमेन बलिः पीतो रक्तश्चैवोत्तरेण तु यादर्श ' दिशि यस्यान्तु दैवतं परिकल्पितम् तादृशस्तत्र दातव्यो बलिर्मन्त्रपुरस्कृतः ॥ ४२ ॥
।
४३ ॥
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॥ ४४ ॥
। ( नींव रखने के दिन ) रात्रि में अनेक प्रकार के भोजनों से युक्त, गन्ध, पुष्प और फलों से समन्त्रित दशों दिशाओं में ( उनके अधिष्ठाता रक्षक, देवताओं के हेतु ) बलि देना चाहिए । पूर्व दिशा में की, दक्षिण में नीले, पश्चिम में पीले तथा उत्तर में दी जानी चाहिए । जिस दिशा का जो देवता अधिदेव गया है उस दिशा में वैसी ही मन्त्रों के सहित चाहिए ॥ ४२-४५ ॥ स्थापने ब्राह्मणेभ्यश्च दातव्यं घृतपायसम् मधुपर्कस्तथा राज्ञे कर्तृभ्यश्च गुडौदनम् नक्षत्रेण तु कर्त्तव्यं मूलेन स्थापनं बुधैः शुक्ल ( सफेद ) अन्न लाल अन्न की बलि के रूप में बतलाया बलि प्रदान करना ॥ ४५ ॥
।
॥ ४६ ॥
मुहूर्त्तनानुकूलेन तिथ्या सुकरणेन च । गृह स्थापना के ( उत्सव के ) समय ब्राह्मणों को वृतयुक्त पायस ( खीर ), राजा को मधुपर्क तथा ( अभिनयादि समस्त ) कार्य करने वाले व्यक्तियों को गुड धानी दी जानी चाहिए । १. ' घृत ' का तात्पर्य मक्खन है । ' मधुपर्क ' दही में शहद मिलाकर श्रद्धा-विधिपूर्वक राजा आदि को दिया जाता था ( दे ० आश्व ० गृ ० सूत्र अ ० १ तथा मनुस्मृति अ ० २ ) और यह वैदिक काल से आज तक एक परम्परागत सदाचार के रूप में प्रचलित है । ( १ ) दही, ( २ ) घृत, ( ३ ) जल ( ४ ) मधु तथा ( ५ ) शक्कर मिलाई जाती है । १. नीलाभो दक्षिणेन च - घ ० २. यस्यां यच्चाधिदैवं तु दिशि सम्परिकीर्तितम् - घ ० । ३. तिथ्यानुकरणेन च --क ० ।
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द्वितीयोऽध्यायः ४५ बुद्धिमान जन इस मण्डप की स्थापना मूल नक्षत्र में अनुकूल मुहूर्त तिथि तथा शुभ करण में करें ॥ ४५-४७ ॥ भित्ति तथा स्तम्भों का निर्माण-एवन्तु स्थापनं कृत्वा भित्तिकर्मप्रयोजयेत् ॥ भित्तिकर्मणि निर्वृत्ते स्तम्भानां स्थापनं ततः ( पूर्व प्रतिपादित विधि से ) बाह्य मंडप की इस फिर भित्ति ' कर्म ( दीवारें बनाने का कार्य ) प्रारम्भ करे जाने पर खम्भों की स्थापना की जाए ॥ ४७-४८ ॥ तिथिनक्षत्रयोगेन शुभेन करणेन च ४७ ॥॥ प्रकार स्थापना कर और उसके पूर्ण हो ॥ ४८ ॥
स्तम्भानां स्थापन कार्य रोहिण्या श्रवणेन वा ।
आचार्येण सुयुक्तेन त्रिरात्रोपोषितेन च ॥ ४ ९ ॥
स्तम्भानां स्थापनं कार्य प्राप्ते सूर्योदये शुभे । इन स्तम्भों की स्थापना शुभ तिथि, नक्षत्र, योग तथा ( शुभ ) करण में की जानी चाहिए । इनकी स्थापना के समय रोहिणी या श्रवण नक्षत्र होना चाहिए । एकाग्रचित नाट्याचार्य तीन दिन उपवास रखने के पश्चात् सूर्योदय की शुभ वेला में स्तम्भों की स्थापन - विधि ( पूर्ण ) करे ॥ ४८-५० ॥ [ चन्दनन्तु भवेत् ब्राह्मं क्षात्रं खादिरमेव च । धावाख्यं वैश्यवर्ण स्याच्छूद्रं सर्वद्रुमैस्स्मृतम् । ] ( प्रक्षिप्त ) ब्राह्मण स्तम्भ चन्दन का, क्षत्रिय स्तम्भ खैर ( खदिर ) का, वैश्य स्तम्भ धव ( धाय ) का तथा अन्य सभी वृक्षों का शूद्र स्तम्भ होता है । १. ये दीवार ईटों की बनाई जाती थीं, क्योंकि दर्शकों के उपवेशन स्थल ईंटों से बनाए जाने का नाट्यशास्त्र में निर्देश मिलता है ( अतएव मिट्टी तथा ईटों से दीवार बनाई जाती थी ऐसा मानना उचित है ) संभवतः भित्तियाँ १८ हाथ ऊँची बनानी होती थीं क्योंकि इससे कम होने पर विवरण से संगति नहीं बैठती ।
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४६ नाट्यशास्त्रम् प्रथमे ब्राह्मणस्तम्भे सर्पिस्सर्षप संस्कृतः ॥ सर्वशुक्लो विधिःकार्यो दद्यात् पायसमेव च ततश्च क्षत्रियस्तम्भे वस्त्रमाल्यानुलेपनम् ॥ सर्व रक्तं प्रदाव्यं द्विजेभ्यश्च गुडौदनम् वैश्यस्तम्भे विधिः कार्यो दिग्भागे पश्चिमोत्तरे सर्व पीतं प्रदातव्यं द्विजेभ्यश्च घृतौदनम् शूद्रस्तम्भे विधिः कार्यः सम्यक्पूर्वोत्तराश्रये ५० ॥
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५१ ॥
॥। ५२ ॥
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॥ ५३ ॥
नीलप्रायं प्रयत्नेन कृसरं च द्विजाशनम् । ( ईशान कोण में ) सर्वप्रथम स्थापित किये जाने वाले ब्राह्मणस्तम्भ का घी और सरसों से संस्कार करे । इसकी स्थापना के अवसर पर पूजा की समग्र विधि श्वेत वर्ण वस्तुओं से सम्पन्न की जानी चाहिए तथा ब्राह्मणों को भोजन में पायस ( खीर ) प्रदान करना चाहिए । और ( आग्नेय कोण में ) क्षत्रिय स्तम्भ की स्थापना के अवसर पर वस्त्र, पुष्प और चन्दन सभी रक्त वर्ण के चढ़ाए जाने चाहिए तथा ब्राह्मणों को भोजन में गुड़ चीनी प्रदान करना चाहिए । ( नैऋत्य दिशा में ) वैश्य स्तम्भ की स्थापना नाट्यगृह के पश्चिमोत्तर दिग्भाग में करना चाहिये । इसकी स्थापना के समय सभी पूजन सामग्री पीले रंग वाली वस्तुओं की रखनी चाहिये तथा ब्राह्मणों को भोजन में घृत और भात दिया जाना चाहिये पूर्वोत्तर ( वायव्य ) कोण में स्थापित किये जाने वाले शूद्र स्तम्भ की सभी विधियाँ प्रयत्नपूर्वक नीले वर्ण की सामग्री द्वारा सम्पन्न की जानी चाहिए तथा ब्राह्मणों को भोजन के रूप में कृसर ' ( खिचड़ी ) देनी चाहिये ॥ ५४-५४ ॥ १. तिल मिश्रित चावलों की खिचड़ी को कृसर कहते हैं जो दूध में पकाई जाए । १. सर्पिस्सर्षप संस्कृते - ग ० । २. प्रदातव्य - ग ० । ३. कृसरा - ख ० ।
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द्वितीयोऽध्यायः पूर्वे तु ' ब्राह्मणस्तम्भे शुक्लमाल्यानुलेपने ॥
निक्षिपेत्कनकं 13 मूल कर्णाभरणसंश्रयम् ।
ताम्र चाधः प्रदातव्यं स्तम्भे क्षत्रियसंज्ञके ॥।
वैश्यस्तम्भस्य मूले तु रजतं सम्प्रदापयेत् ।
शूद्रस्तम्भस्य मूले तु दद्यादायसमेव च ॥
शेषेष्वपि च निक्षेण्यं स्तम्भमूलेषु काञ्चनम् । ४७ ५४ ॥ ५५ ॥ ५६ ॥ पहले ब्राह्मण स्तम्भ नीचे ( मूल में ) - जो कि सफेद वस्त्र, पुष्प तथा चन्दन से युक्त है— कान के आभूषण के लिये प्रर्याप्त सोना डाला जाए । क्षत्रिय स्तम्भ के नीचे तांबा तथा वैश्य स्तम्भ के नीचे चाँदी डालना चाहिए । शूद्र स्तम्भ के मूल में लोहा तथा शेष स्तम्भों के मूल में सोना डालना चाहिए ॥ ५६-५७ ॥ स्वस्तिपुण्याहघोषेण जयशब्देन चैव हि ॥
स्तम्भानां स्थापन कार्य पुष्पमालापुरस्कृतम् ।
रत्नदानैः सगोदानैर्वस्त्रदानैरनल्पकैः ॥
ब्राह्मणांस्तर्पयित्वा तु स्तम्भानुत्थापयेत्ततः ।
अचलं चाप्यकम्पञ्च तथैवावलितं पुनः ॥
स्तम्भस्योत्थापने सम्यग्दोषा होते प्रकीर्तिताः ।
अवृष्टिरुक्ता चलने वलने मृत्युतो भयम् ॥
५७ ॥
ग ५८ ॥ ५ ९ ॥ ६० ॥ १. इन स्तम्भों में की गई रंगों की व्यवस्था विविध वर्णों की सूचक है । यथा ब्राह्मण स्तम्भ का श्वेत वर्ण सात्विकता और ज्ञान का, क्षत्रिय का लाल वर्ण शौर्य तथा राजसवृत्ति का, वैश्य का पीतवर्ण सुवर्ण तथा धनसम्पत्ति का तथा शूद्रों का नीलवर्ण तामस वृत्ति का बोधक है । १. पूर्वोक्त क; पूर्वे च ० ख ० । २. कण्ठाभरण— क ० । ३. सर्वेष्वेव तु; शेषेष्वेव च –क ० । ४. पर्णमाला - ग ० । ५. स्तम्भमु ग ० । ६. वाचलितं - ग ० । ७. मृतितो घ ० ।