भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 171–180
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 171–180
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५८ नाट्यशास्त्रम् इसके पश्चात इनके ऊपर आठ खम्भे रखे । इनके ऊपर विधे हुए मुँह वाले आठ हाथों के शहतीरों ( पीठ ) को रखा जाए और इन शहतीरों के मुँह एक दूसरे में लगे हुए ( विद्धास्य ' ) रहें ॥ ९ ८ ॥ तत्र स्तम्भाः प्रदातव्यास्तज्ज्ञैर्मण्डप धारणे धारणीधारणास्ते ' च शालस्त्रीभिरलङ्कृताः ॥ ९९ ॥
विज्ञशिल्पी इसकी छत को धारण करने के लिये और शहतीर को सम्हालने के लिए खड़े किये जाने वाले मजबूत खम्भों को काष्ठ पुतलियों आदि से अलंकृत करते हुए लगावें ॥ ९९ ॥
नेपथ्यगृहकश्चैव ततः कार्य प्रयत्नतः ।
द्वारञ्चैकं भवेत्तत्र ' रंगपीठ प्रवेशने ॥ १०० ॥
फिर [ रङ्गपीठ के पीछे ८ x ३२ हाथ के भूखण्ड पर ] नेपथ्यगृह की प्रयत्न पूर्वक रचना की जाए । इसमें रङ्गपीठ पर खुलने वाले एक जैसे ( दो ) द्वार रखना चाहिए ॥ १०० ॥
जनप्रवेशनं चान्यदाभिमुख्येन कारयेत् ।
रङ्गस्याभिमुखं कार्य द्वितीयं द्वारमेव तु ॥ १०१ ॥
रंगमंच के सामने वाले भाग में प्रेक्षकों के प्रवेशार्थ एक ( अन्य ) द्वार बनवाना चाहिये और नटों के प्रवेशार्थ निर्मित द्वार का रंगमंच के सम्मुख मुँह रहना चाहिये ॥ १०१ ॥
१. विद्धास्य का अर्थ है – बिधे मुख वाले या रंगमंच की ओर मुखवाले । २. शालस्त्री, शालभंजी या शालभञ्जिका स्त्रियों की प्रतिमा को कहते हैं । शास्त्री की प्रतिमा के साथ वृक्ष या लता वेष्ठित दिखलाया जाता था । ये स्तम्भों के शीर्ष ( ब्रकेट ) पर उत्कीर्ण की जाती थीं । शालभंजिका का एक अर्थ वेश्या भी है । कुछ भी हो अभिनवगुप्त द्वारा जो ' कान्ताप्रतिकृतयः काष्ठमय्यः ' अर्थ दिया गया है वही उचित है । धारणी का अर्थ है - शहतीर; क्योंकि धारण का स्तम्भ अर्थ होता है । १. धारणीधारितास्ते च - ग ० । २. प्रयोक्तृभिः - घ ० । ३. भवेत्तस्य ग ० । ४. रङ्गपीठप्रवेशनम् क ०, ग ० ।
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द्वितीयोऽध्यायः ५ ९
अष्टहस्तं तु कर्तव्यं रंगपीठं प्रमाणतः ।
चतुरस्त्रं समतलं वेदिकासमलङ्कृतम् ॥। १०२ ॥
चतुरस्र नाट्यगृह का रंगपीठ आठ हाथ का चौकोन, ( ८ ८ ) समतल और वेदिका से युक्त रंगपीठ के प्रमाणानुसार सुन्दर रूप में बनाया जाए ॥ १०२ ॥
पूर्वप्रमाण - निर्दिष्टा कर्तव्या मत्तवारणी ।
चतुःस्तम्भसमायुक्ता वेदिकायास्तु पार्श्वतः ॥ १०३ ॥
वेदिका की ( दोनों ) बाजुओं में पूर्व निर्दिष्ट प्रमाण तथा विधि के अनुसार चार खम्भों से युक्त ' मत्तवारणी ' का निर्माण किया जाए ॥ १०३ ॥
समुन्नतं समं चैव रंगशीर्ष ' तु कारयेत् ।
विकृष्टे तुन्नतं कार्यं चतुरश्रे समं तथा ॥ १०४ ॥
रंगपीठ की अपेक्षा ऊँचा और समतल बराबर भेद से ] ( दो प्रकार का रंगशीर्ष बनाया जाता है । विकृष्ट में वेदिका से ऊँचा तथा चतुरस्र में समान एवं समतल रंगशीर्ष बनाया जाए ॥ १०४ ॥
एवमेतेन विधिना चतुरथं गृहं भवेत् ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि व्यश्रगेहस्य लक्षणम् ॥। १०५ ॥
चतुरस्र नाट्यगृह की यही विधि है । अब मैं त्र्यश्र नाट्यगृह का लक्षण बतलाता हूँ ॥ १०५ ॥
त्र्य नाट्यगृह का स्वरूप-त्र्यथं त्रिकोणं कर्तव्यं नाट्यवेश्म प्रयोक्तृभिः ।
मध्ये त्रिकोणमेवास्य रंगपीठं तु कारयेत् ॥ १०६ ॥
नाट्यगृह निर्मातागण त्र्यत्र नाट्यगृह को त्रिकोणाकृति बनवाएँ और इसके बीच में बनने वाले रंगपीठ को भी त्रिकोणाकृति ही बनवाना चाहिए । १. रङ्गपीठं - ग ० । २. विकृष्टेरुन्नतं क; विकृष्टे स्तुन्नतं ख ०, विकृष्टेऽप्युन्नतं - ग ० । ३. त्र्यश्रस्य मण्डपस्यापि सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम्- -ग ० ।
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६० नाट्यशास्त्रम्
द्वारं तेनैव कोणेन कर्तव्यं तस्य वेश्मनः ।
द्वितीयञ्चैव कर्तव्यं रङ्गपीठस्य पृष्ठतः ॥ १०७ ॥
नाट्यगृह का प्रवेश द्वार इसी कोण में निर्माण करना चाहिए तथा रंगपीठ के पीछे दूसरा द्वार ( पात्रों के प्रवेश आदि के लिए जो कि नेपथ्य से हों ) भी ऐसा ही बनवाना चाहिए ॥ १०७ ॥
विधिर्यश्चतुरस्य भित्तिस्तम्भसमाश्रयः ।
स तु सर्वः प्रयोक्तव्यः व्यथस्यापि प्रथोक्तृभि ॥ १०८ ॥
भित्ति तथा स्तम्भों के विषय में जो विधि चतुरस्र नाट्यगृह के लिये कही गई वही निर्मातागण यत्र के लिये भी प्रयोग में लाएँ ' ॥ १०८ ॥
एवमेतेन विधिना कार्या नाट्यगृहा बुधैः ।
पुनरेषां प्रवक्ष्यामि पूजामेव यथाविधि ॥ १० ९ ॥
इति भारतोये नाट्यशास्त्रे प्रेक्षागृहलक्षणं नाम द्वितीयोऽध्यायः । बुद्धिमानों के द्वारा इसी प्रकार इन नाट्यगृहों की रचना की जाए । अब मैं ( अगले अध्याय में ) इनकी पूजा का विधि - विधान कहूँगा ॥ १० ९ ॥ भरत मुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र की प्रदीप व्याख्या का ' प्रेक्षागृह - लक्षण ' नामक द्वितीय अध्याय संपूर्ण ॥२ ॥
१. विकृष्ट तथा चतुरस्र नाट्यगृहों की तरह ' त्र्यत्र ' नाट्यगृह में स्तम्भों तथा भित्तियों का विधान कैसा हो, यह स्पष्ट नहीं होता । इसका आशय इतना ही है कि दोनों नाट्यगृहों की स्थिति देखकर ' व्यस्त्र ' के अनुकूल स्तम्भों तथा भित्तियों का ऐसा विधान किया जाय जो उपयुक्त हो । यह सभी शिल्पिकों पर छोड़ दिया था, ऐसा प्रतीत होता है । ' त्र्यस्र ’ नाटयगृह में मत्तवारणी नहीं होती, ऐसा कुछ विवेचक - विद्वानों का मन्तव्य है परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से ऐसा संभव नहीं लगता । ( देखिये त्र्यत्र प्रेक्षागृह का मानचित्र ) । १. द्वारमेकेन कोणेन कर्तव्य तु प्रवेशने - घ ० । २. कार्य नाट्यगृहं ग ० । ३. अतः ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि पूजामेषां यथाविधि ग ० ।
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FESTSIR 93 अथ तृतीयोऽध्यायः
सर्वलक्षणसम्पन्ने कृते नाटयगृहे शुभे ।
गावो वसेयुः सप्ताहं सह जप्यपरैर्द्विजैः ॥ १ ॥
इस प्रकार सभी लक्षणों से युक्त शुभ नाट्यगृह के निर्माण हो चुकने के उपरान्त उसमें जपकर्ता ब्राह्मणों के साथ गौएँ एक सप्ताह तक निवास करें ॥
रंगमंच की प्रतिष्ठा ( या संस्कार ) -ततोऽधिवासयेद्वेश्म रङ्गपीठं तथैव च ।
मन्त्रपूतेन तोयेन प्रोक्षिताङ्गो निशागमे ॥ २ ॥
यथास्थानान्तरगतो दीक्षितः प्रयतः शुचि ।
त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा नाट्याचार्योऽदताम्बरः ' ॥ ३ ॥
तब नाट्याचार्य रात्रि को आगमन बेला में अपने शरीर को मन्त्रोच्चारण द्वारा पवित्र जल से प्रोक्षित कर, अपने घर के अतिरिक्त अन्य स्थान पर रहकर दीक्षित, ( संयतेन्द्रिय ) और पवित्र होकर तीन रात्रि पर्यन्त उपवास रखते हुए नवीन वस्त्र धारण कर नाट्यगृह तथा रंगपीठ को देअताओं से अधिवासित करवाए ॥ २-३ ॥
नमस्कृत्य महादेवं सर्वलोकोद्भवं भवम् ।
पद्मयोनिं सुरगुरुं विष्णुभिन्द्रं गुहं तथा ॥ ४ ॥
सरस्वतीं च लक्ष्मीं च सिद्धिं मेधां धृतिं स्मृतिम् ।
सोमं सूर्य च मरुतो लोकपालांस्तथाश्विनौ ॥ ५ ॥
१. नायकोऽहत वस्त्रधृक् ख ० । २. सर्वलोकोद्भवोद्भवम् - ख ०, सर्व-लोकेश्वरं भवम् ग ० । ३. जगत्पितामहञ्चैव क, ख ० । ४. स्मृति मतिम् — घ ० । ५. सेन्दुं – ग ०!
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६२ नाट्यशास्त्रम्
मित्रमग्निं सुरान्वर्णान् ' रुद्रान्कालं कलिं तथा ।
मृत्युं च नियतं चैव कालदण्डं तथैव च ॥ ६ ॥
विष्णुप्रहरणं चैव नागराजं च वासुकिम् ।
वज्रं विद्युत्सनुद्रांश्च गन्धर्वाप्सरसो मुनीन् ॥ ७ ॥
भूतान् पिशाचान् यक्षांश्च गुह्यकांश्च महेश्वरान् ।
असुरान्नाटयविघ्नांश्च तथाऽन्यान्दैत्यराक्षसान् ॥ ८ ॥
तथा नाट्यकुमारीश्च महाग्रामण्यमेव च ।
raise गुह्यकश्चैव भूतसङ्घांस्तथैव च ॥९ ॥
एतांश्चान्यांश्च राजर्षीन्प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ।
यथास्थानान्तरगतान्समावाह्य " ततो वदेत् ॥ १० ॥
भवद्भिर्नो निशायान्तु कर्तव्यः सम्परिग्रहः ।
साहाय्यश्चैव दान्यमस्मिन्नाटये सहानुगैः ॥ ११ ॥
तब सम्पूर्ण लोकों के स्वामी भगवान् शिव, पद्म से जन्म लेने वाले ब्रह्मा जी, देवगुरु बृहस्पति, भगवान् विष्णु, इन्द्र तथा कार्तिकेय, सरस्वती, लक्ष्मी, सिद्धि, मेघा, धृति, मति, सोम ( चन्द्र ), सूर्य, मरुत, लोकपाल, अश्विनीकुमार, मित्र, अग्नि, स्त्रर, वर्ण ', रुद्रों ( एकादश रुद्रों ), काल, कलि, मृत्यु, नियति, कालदण्ड, विष्णु के प्रहरण ( सुदर्शनचक्र ), नागराज, गरुड़, वज्र, विद्युत, समुद्र, गन्धर्व, अप्सराएँ, मुनि, भूत, पिशाच, यक्ष, १. ' वर्ण शब्द का प्रयोग देवों के मध्य में होने से इसका अर्थ होगा वर्णों के नियामक अधिकारी देवगण । यहाँ वर्ण शब्द चातुर्वर्ण्य का बोधक नहीं हो सकता । २. ' यक्ष ' और गुह्यक शब्दों को महाकवि कालिदास ने अपने मेघदूत में अभिन्न मानते हुये प्रयुक्त किया है । ( दे ० पूर्व ० मेघ ० श्लो १ तथा ५ ) १. स्वरान् ख ० । २. खगेश्वरम् - ग ० । ३. महोरगान् ग ० । ४. देवर्षीन् प्रणिपत्य क ०, ख ०, घ ० । ५. यथास्थानस्थितान् देवान् निमन्त्र्यैतद्वचो वदेत्- घ ० । ६. भगवद्भिः – ख ० ।
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तृतीयोऽध्यायः ६३ गुह्यक, महासर्पगण, असुर, नाट्यविघ्नों तथा अन्य दैत्यों और राक्षसों, नाट्यकुमारियों, महाग्रामणी ' तथा अपने - अपने स्वतंत्र स्थानों पर स्थित अन्य राजर्षिगण को ( आवाहन कर हाथ जोड़कर ) प्रणाम करते हुए तथा अपने-अपने योग्य स्थान पर स्थित देवगण को आमन्त्रित करते हुए इस प्रकार निवेदन करे — हे भगवन्! आप सभी के द्वारा आज रात्रि में हम रक्षण में लिये जाएँ तथा हमारे ' नाट्यकर्म ' में आप अपने अनुचरों सहित सहायता प्रदान करें ॥ ४-११ ॥ जर्जरपूजनविधान—
सम्पूज्य सर्वानैकत्र ' कुतपं सम्प्रयुज्य च ।
जर्जराय प्रयुञ्जीत पूजां नाट्यप्रसिद्धये ॥ १२ ॥
तब सभी ( देवताओं ) का एक साथ पूजन कर वाद्यों का प्रयोग करे और तब नाट्य की सफलता ( प्रसिद्धि ) के लिये जर्जर की पूजा करे ॥ १२ ॥
त्वं महेन्द्रग्रहरण सर्वदानवसूदन ।
निर्मितस्सर्वदेवैश्च सर्वविघ्ननिवर्हणः ॥ १३ ॥
नृपस्य विजयं देहि रिपूणाञ्च पराजयम् ।
गोब्राह्मणशिवञ्चै नाट्यस्य च विवर्द्धनम् ॥ १४ ॥
हे जर्जर! तू इन्द्र का शस्त्र है एवं सभी दानवों का नाशक है । सभी देवगण द्वारा तू विघ्नों का निवारक बनाया गया है । तू हमारे राजा को विजय तथा शत्रुओं को पराजय प्रदान कर और तू गौ तथा ब्राह्मणों का हितकारी और ' नाट्यकर्म ' का संवर्द्धनकारी हो ॥ १३-१४ ॥
एवं कृत्वा यथान्यायमुपास्य नाट्यमण्डपे ।
निशायान्तु प्रभातायां पूजनं प्रक्रमेदिह ॥ १५ ॥
१. गणों का या ग्राम का मुख्यनेता । आचार्य अभिनवगुप्त ने इसका अर्थ गणपति किया हैं । ( महाग्रामणी = गणपतिः ) परन्तु यहाँ इसका अर्थ गण-मुख्य या ग्राममुख्य ही ग्राह्य है, गणपतिदेवता नहीं । १. देवताः सर्वाः ग ० । २. नृपस्य विजयं शंसख ० । ३. मुषित्वा — ग ० ।
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६४ नाट्यशास्त्रम् इस प्रकार नियमानुसार पूजन विधान सम्पन्न कर तथा रात्रि में नाट्य-मण्डप में निवास करते हुए ( रात्रि के उपरान्त ) प्रातः काल हो जाने पर बुद्धिमान नाट्याचार्य ( आमन्त्रित देवों का ) पूजनकार्य प्रारम्भ करे ॥ १५ ॥
आर्द्रायां वा मघायां वा याम्ये पूर्वेषु ' वा त्रिषु ।
आश्लेषामूलयोर्वापि कर्तव्यं रङ्गपूजनम् ॥ १६ ॥
आचार्येण तु युक्तेन शुचिना दीक्षितेन च ।
रङ्गस्योद्योतनं कार्य देवतानाञ्च पूजनम् ॥ १७ ॥
यह रंगपूजन आर्द्रा, मघा, याम्या, तीनों पूर्वा ( पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा तथा पूर्वाभाद्रपदा ) नक्षत्रों अथवा आश्लेषा या मूल नक्षत्रों के समय किया जाए । एकाग्रमन वाले, पवित्र एवं व्रत में दीक्षित नाट्याचार्य के द्वारा रंगस्थल का उद्यापन करते हुए देवताओं का पूजन करना चाहिए ।
देवगण की स्थापना -दिनान्ते दारुणे घोरे मुहूर्त्ते भूतदैवते ।
आचम्य तु यथान्यायं देवता ' वै निवेशयेत् ॥ १८ ॥
रक्ताः प्रतिसराः सूत्रं रक्तगन्धाश्च पूजिताः ।
रक्तास्सुमनसश्चैव यच्च रक्तं फलं भवेत् ॥ १ ९ ॥
यवैस्सिद्धार्थ कैर्लाजैरक्षतैः शालितण्डुलैः ।
नागपुष्पस्य चूर्णेन वितुषाभिः प्रियङ्गुभिः ॥ २० ॥
एतैर्द्रव्यैर्युतं कुर्यात् देवतानां निवेशनम् । दिन के अन्त में आने नाले घोर एवं दारुण नामक मुहूर्त मैं ( जिसके अधिदेवता भूत होते हैं ) आचार्य को नियमानुसार आचमन करते हुए देवताओं की स्थापना करनी चाहिए । इस ( दैवपूजन ) में लालरंग के ही सूत्र कंकण तथा उत्तम प्रकार का रक्तवर्ण का चन्दन, रक्तवर्ण के पुष्प तथा इसी वर्ण के फल को लेना १. पूर्वासु च त्रिषु ब ० । २. सुयुक्तेन – ग ० । ३. रङ्गस्योद्यापनं – ग ० । ४. यमदैवते —क ० । ५. दैवतानि - ० । ६. प्रतिसरास्तत्र घ ० । ७. लाज ग ० ।
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तृतीयोऽध्यायः ६५ चाहिए । जौ, सरसों, खीलें, धानों के अक्षत, नागपुष्प की जड़ तथा छिलके निकाले हुए प्रियंगु फल ( चम्पक ) – इन द्रव्यों के साथ देवताओं को आसीन करना चाहिए ॥ १८-२१ ॥ देवगणों के स्थापनार्थ मण्डल- निर्माण विधि-आलिखे मण्डलं पूर्व यथास्थानं यथाविधि ॥ २१ ॥
समन्ततश्च कर्तव्यं हस्ताः षोडश मण्डलम् ।
द्वाराणि चात्र कुर्वीत विधानेन चतुर्दिशम् ॥
मध्ये चैवात्र कर्तव्ये द्वे रेखे तिर्यगूर्ध्वगे ।
तयोः कक्ष्याविभागेन देवतानि निवेशयेत् ॥।
पद्मोपविष्टं ब्रह्माणं तस्य मध्ये निवेशयेत् ।
आदौ निवेश्यो भगवान्सार्धं भूतगणैः शिवः ॥
नारायणो महेन्द्रश्च स्कन्दा कविश्विनौ शशी सरस्वती च लक्ष्मीश्च श्रद्धा मेधा च पूर्वतः ॥
पूर्वदक्षिणतो वह्निर्निवेश्यः स्वाहया सह ।
विश्वेदेवाः सगन्धर्वा रुद्राश्च ऋषयस्तथा ॥
दक्षिणेन निवेश्यस्तु यमो मित्रश्च सानुगः ।
पितॄन्पिशाचानुरगान् गुह्यकांश्च निवेशयेत् ॥
नैर्ऋत्यां राक्षसांश्चैव भूतानि च निवेशयेत् ।
पश्चिमायां समुद्रांश्च वरुणं यादसां पतिम् ॥
वायव्यां वै दिशि तथा सप्त वायून्निवेशयेत् ।
तत्रैव विनिवेश्यस्तु गरुडः पक्षिभिः सह ॥
२२ ॥
२३ ॥
२४ ॥
।
२५ ॥
२६ ॥
२७ ॥
२८ ॥
१ ९ ॥
१. यहाँ ' प्रियंगु ' का अर्थ लतापरक नहीं है किन्तु इसका अर्थ होगा नागपुष्प का फल या उसका चूर्ण जो कि केशर जैसा होता है । १. स्कन्दः सूर्योश्विनो क, ख ० । २. सर्वगणाः ख, सर्पगणा —क ० । ३. सर्वभूतान् घ ० । ४. निवेशयेच्च तत्रैव गरुडं पक्षिभिः सह ध ० । ५ ना ० शा ० प्र ०
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६६ नाट्यशास्त्रम्
उत्तरस्यां दिशि तथा धनदं सन्निवेशयेत् ।
नाट्यस्य मातृश्व तथा यक्षानथ सगुह्यकान् ॥
तथैवोत्तरपूर्वायां नन्दिनं च गणेश्वरान् ।
ब्रह्मर्षिभूतसंघांश्च यथाभागं निवेशयेत् ॥
सर्व प्रथम इन देवगणों के बैठाने के लिए यथास्थान बनाना चाहिये । यह मण्डल १६ हाथ ' ( बालिस्त ) ३० ॥ ३१ ॥ विधिपूर्वक मण्डल लंबा - चौड़ा होना चाहिए तथा विधानपूर्वक इसमें चारों ओर द्वार रखे जाने चाहिए; इसके मध्य में दो तिरछी रेखाएँ पूर्व पश्चिम तथा उत्तर दक्षिण जाने वाली बनाई जानी चाहिए; तथा इन रेखाओं से निर्मित कोष्ठकों ( कोठों, कक्ष्यों ) में विभागपूर्वक देवगण की स्थापना की जाए । इस मण्डल के मध्यभाग कमल पर आसीन ब्रह्मा को स्थापित करे फिर सर्व प्रथम भूतगणों के साथ भगवान शिव को पूर्व दिशा में स्थापित करे । ( फिर ) इसी दिशा में नारायण, महेन्द्र, कार्तिकेय, सूर्य, अश्विनी कुमार, चन्द्रमा, सरस्वती, लक्ष्मी, श्रद्धा तथा मेघा की स्थापना करे । दक्षिणपूर्व दिशा ( कोण ) में स्वाहा के साथ अग्नि, विश्वेदेवा, गन्धर्व, रुद्र तथा ऋषियों की स्थापना करे | दक्षिण दिशा में यम, अपने अनुचरों सहित मित्र, पितरगण, पिशाच, सर्पगण तथा गुझकों को स्थापित किया जाए । नैर्ऋत्य कोण में राक्षस तथा भूतों को स्थापित करे । पश्चिम दिशा में जल के अधिपति वरुण देव तथा समुद्रों को स्थापित करें । उत्तर पश्चिम ( वायव्य - दिशा ) में सातपवनों को तथा उन्हीं के पास पक्षियों के साथ गरुड़देव की स्थापना करे । उत्तर दिशा में कुबेर की भली भाँति १. हस्तशब्द द्वारा यहाँ ' हस्तताल ' लिया गया है । हस्तताल का लक्षण है— अंगूठे और बीच की अंगुली को विपरीत दिशाओं में फैलाने पर होने वाली दोनों सिरों की दूरी । इसे ताल या ' हस्तताल ' भी कहते हैं । यहाँ इस अर्थ के बिना स्वीकार किये मंच का विस्तार व्यवस्थित नहीं हो सकता । ( हस्तताल के लक्षण के लिये देखिये- संगीतरत्नाकर अ ० ७, पृष्ठ १०४६, आ ० आश्रम सं ०, पूना ) । १. नन्दाद्यांश्च क ० । OR TIR
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तृतीयोऽध्यायः ६७ स्थापना करे तथा वहीं मातृकाओं और गुह्यकों के साथ यज्ञों की भी स्थापना करे । इसी प्रकार उत्तरपूर्व दिशा में ( ईशान में ) नन्दी, गणेश्वर, ब्रह्मर्षि तथा भूतों के संघों की उनके यथायोग्य उचित स्थानों पर स्थापित करे ॥ २१-३१ ॥ स्तम्भे सनत्कुमारं तु दक्षिणे दक्षमेव च ग्रामण्यमुत्तरे स्तम्भे पूजार्थ ' सन्निवेशयेत् अनेनैव विधानेन यथास्थानं यथाविधि वर्णरूपान्वितास्सर्वा देवताः सन्निवेशयेत् स्थाने स्थाने यथान्यायं विनिवेश्य तु देवताः तासां प्रकुर्वीत ततः पूजनन्तु यथार्हतः ॥। ३२ ॥
।
॥ ३३ ॥
।
॥ ३४ ॥
( पूजा के लिए ) ( पूर्व दिशा के स्तम्भ में ) सनत्कुमार की, दक्षिण स्तम्भ में दक्ष की तथा उत्तर स्तम्भ में गणेश की स्थापना करे । इसी विधान के अनुसार विधिपूर्वक उचित स्थान पर सब देवताओं को अपने अपने वर्ण तथा स्वरूप के अनुसार स्थापित करे । फिर यथास्थान देवगण की स्थापना कर चुकने के उपरान्त उनका यथायोग्य पूजन प्रारम्भ करे ॥ २२-३४ ॥ देवगण का पूजन-देवताभ्यश्च दातव्यं सितमाल्यानुलेपनम् गन्धर्ववह्नि सूर्येभ्यो रक्तमाल्यानुलेपनम् गन्धं माल्यश्च धूपञ्च यथावदनुपूर्वशः दवा ततः प्रकुर्वीत बलि पूजां यथाविधि देवताओं को श्वेतवर्ण ' की मालाएँ ( पुष्प ) तथा
।
|| ३५ ॥
॥। ३६ ॥
चन्दन प्रदान करना १. ' शुभ्र ' । यहाँ पवित्र तथा श्रेष्ठवस्तु का प्रतीक मानकर प्रयुक्त किया गया ( प्रतीत होता ) है । १. पश्चिमे स्कन्दमेव च - घ ० । २. सुप्रसादानि सर्वाणि देवतानि निवेशयेत् ख ० । ३. दैवतेभ्यस्तु — ग ० । ४. बलिपूजां ग ० ।