भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 161–170

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 161–170

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४८ नाट्यशास्त्रम्

कम्पने परचक्रात्तु भयं भवति ' दारुणम् ।

दोषैरेतैर्विहीनं तु स्तम्भमुत्थापयेच्छिवम् ॥ ६१ ॥।

स्तम्भों का स्थापन स्वस्तिवाचन तथा पुण्याह वाचन के घोष के साथ जय शब्द को उच्चारित करते हुए करना चाहिए । स्थापन किये जाने वाले स्तम्भ पुष्पमाला से सजाना चाहिए । ब्राह्मणों को रत्नदान, गोदान तथा वस्त्रों के दान से अतिशय संतुष्ट करने के पश्चात् स्तम्भों को उठाए । इन स्तम्भों को इस प्रकार उठाए कि ये न चले, न कम्पित हों और न ही झुके या मुड़े ही । क्योंकि स्तम्भों को उठाने के समय ऐसा होना अनिष्टकारी होने के कारण दोष माना गया है | यदि स्तम्भ चलायमान हो तो अवृष्टि, मुड़ जाने पर मृत्युभय तथा स्तम्भ के कम्पित होने पर शत्रुमण्डल से दारुणभय उपस्थित हो जाता है । ( अतएव ) इन ( उपर्युक्त ) दोषों को बचाते हुए ( शिवावह ) स्तम्भ को उठाना चाहिए ॥ ५७-६१ ॥

पवित्रे ब्राह्मणस्तम्भे दातव्या दक्षिणा च गौः ।

शेषाणां भोजनं कार्य स्थापने कर्तृसंश्रयम् ॥ ६२ ॥

पवित्र ब्राह्मण स्तम्भ की स्थापना के समय गौ की दक्षिणा ( दक्षिणा के रूप में गौ ) दी जाय तथा अवषिष्ट स्तम्भों की स्थापना के समय निर्माण कर्ताओं ( शिल्पी, कर्मकारों आदि ) को भोजन करवाना चाहिए ॥ ६२ ॥

मन्त्रपूतञ्च तद्देयं नाट्याचार्येण धीमता ।

पुरोहितं नृपञ्चैव भोजयेन्मधुपायसैः ३ ॥ ६३ ॥।

कर्तृनापि तथा सर्वान् कृसरां लवणोत्तराम् ।

सर्वमेवं विधिं कृत्वा सर्वातोद्यैः प्रवादितैः ॥ ६४ ॥

अभिमन्त्रय यथान्यायं स्तम्भानुत्थापयेच्छुचिः । १. वदति -- ग ० घ ० । २. मन्त्रपूर्वं – ग ० । ३. मधुपायसम् ग ० घ ० । ४. कृसरं लवणोत्तरम् - ग ० घ ० ।

पृष्ठ 162

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द्वितीयोऽध्यायः ४ ९ मन्त्रोच्चार सहित यह भोजन बुद्धिमान नाट्याचार्य द्वारा करवाया ( या दिया ) जाना चाहिए । इस भोजन में पुरोहित तथा राजा को मधुयुक्त खीर खिलाए तथा अन्य सभी कार्यकर्ताओं को नमक से युक्त खिचड़ी का भोजन करवाना चाहिए । इस प्रकार सभी विधि - विधानों को सम्पन्न कर तथा सभी वाद्यों को बजवाते हुए पवित्र होकर अभिमन्त्रित एवं विधिवत मन्त्रोच्चारण करते हुए स्तम्भों को उठाए ॥ ६३-६५ ॥ यथाचलो ' गिरिमिवांश्च महाबलः ॥ ६५ ॥

जयावहो नरेन्द्रस्य तथा त्वमचलो भव ' । ( वह इस मन्त्र का उच्चारण कर स्तम्भों को अभिमन्त्रित करे ) जैसे सुमेरु पर्वत ' स्थिर है और हिमाचल महाबलवान् है, हे स्तम्भ, तू भी उसी

प्रकार अचल होकर राजा को विजय देने वाला बन ।

स्तम्भद्वारञ्च भित्तिश्च नेपथ्यगृहमेव च ॥ ६६ ॥

एवमुत्थापयेत्तज्ज्ञो विधिदृष्टेन कर्मणा । नाट्यगृहनिर्माण के विधानज्ञ पुरुषों के द्वारा इसी प्रकार विधिविधाना-नुसार ( शास्त्र विधि से किये जाने वाले कर्मों के साथ ) स्तम्भ, द्वार, भित्तियों तथा नेपथ्यगृह को उठाना चाहिए मत्तवारणी-रङ्गपीठस्य पार्श्वे तु कर्त्तव्या मत्तवारणी ॥ ६७ ॥

चतुःस्तम्भसमायुक्ता रङ्गपीठ प्रमाणतः ।

अध्यर्धहस्तोत्सेधेन कर्तव्या मत्तवारणी ॥ ६८ ॥

उत्सेधेन तयोस्तुल्यं कर्तव्यं रङ्गमण्डलम् ( रङ्गपीठकम् ) । १. स्तम्भों का धार्मिक विधि से स्थापन जहाँ भी हो प्रायः सर्वत्र उसकी सुमेरु से उपमा देने की परिपाटी रही है ( द्रष्टव्य - मानसारवास्तुशास्त्र १५।२१३, २१४ ) । १. गुरुमेरु ग ० । २. वह ग ० । ३. भित्तिश्व क ० । ४. पश्चात्तु — क ०, ग ० । ४ ना ० शा ० प्र ०

पृष्ठ 163

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५० नाट्यशास्त्रम् रंगपीठ ( की दोनों ) बाजू में [ दोनों ओर ] रंगपीठ के माप ( लंबाई ) के बराबर चार खम्बों से युक्त मत्तवारणी ' की रचना की जावे । इस ( मतवारणी ) की ऊँचाई डेढ़ हाथ रखी जाए और इन दोनों मत्तवारणियों के बराबर ही रंगपीठ की ऊँचाई रहे ॥ ६७-६९ ॥ तस्यां माल्यश्च धूपञ्च गन्धं वस्त्रन्तथैव च ॥ ६ ९ ॥ नानावर्णानि देयानि तथा भूतप्रियो बलिः । मत्तवारणी के निर्माण ( मुहूर्त ) के अवसर पर भूतों को इष्ट पदार्थों की बलि तथा अनेक वर्णों के पुष्प, मालाएँ, वस्त्र तथा अनेकविध धूप और सुगन्धित पदार्थ ( इत्र, तैल आदि ) अर्पण करने चाहिए ॥६९ -७० ॥

' आय ' तत्र दातव्यं स्तम्भानां कुशलैरधः ।

भोजने र कृसराश्चैव दातव्यं ब्राह्मणाशनम् ॥ ७० ॥

दक्ष शिल्पीजन इसके स्थापित किये जाने वाले खम्भों के मूल में लोहा रख दें और ब्राह्मणों को खिचड़ी का भोजन प्रदान करें ॥ ७१ ॥

एवं विधिपुरस्कारैः कर्त्तव्या मत्तवारणी ॥ ७२ ॥।

इस प्रकार विधिवत् देवताओं को वस्त्र आदि प्रदान करते हुए मत्तवारणी का निर्माण करना चाहिए ॥ ७२ ॥

रङ्गपीठ-रङ्गपीठं ततः कार्य विधिदृष्टेन कर्मणा ।

रङ्गशीर्षन्तु कर्तव्यं षड्दारुकसमन्वितम् ॥ ७३ ॥

१. मत्तवारणी रंगपीठ के दोनों ओर बनाये जाने वाले दो बरामदों की शक्ल में होती थी और इसके चारों कोनों में ४ खम्भे लगाये जाते थे । मत्तवारणी का प्रवेश और निर्गम करने वाले पात्रों के क्रमशः प्रतीक्षा और विश्राम करने में उपयोग किया जाता था तथा अन्य कार्यों में भी उपयोग होता था । मत्तवारणी के विषय में विद्वानों में मतैक्य नहीं है [ इसका विशेष विवेचन, प्रस्तावना तथा परिशिष्ट में भी द्रष्टव्य है ] इसकी ऊंचाई डेढ़ हाथ रखी जाती थी । २. ( कुछ प्रतियों में ) यह श्लोक प्रक्षिप्त है । १. आसनं क ०, पायसं ग ० । २. कुशलाय तु घ ० । ३. भोजनं कृसरा —–क ० । ४. मत्तवारुणी - ख ० । 1 OF Y OR

पृष्ठ 164

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द्वितीयोऽध्यायः ५१ कार्य द्वारद्वयञ्चात्र नेपथ्यगृहकस्य तु । इसके बाद ( वास्तु शास्त्र आदि के ) विधानानुसार ' रङ्गपीठ ' का निर्माण किया जाए । इस रंगशीर्ष को षड्दारुक ' से युक्त करते हुए बनाया जाए । इसके ( समीपवर्ती ) नेपथ्यगृह में दो दरवाजे रखने चाहिए ॥ पूरणे मृत्तिका चात्र कृष्णा देया प्रयत्नतः लाङ्गलेन ' समुत्कृष्य निर्दोष्ट तृणशर्करम् ' लाङ्गले शुद्धवर्णौ धुर्यौ योज्यौ प्रयत्नतः कर्तारः पुरुषाश्चात्र येऽङ्गदोषविवजिताः अहीनाङ्गैश्च वोढव्या मृत्तिका पीवरैर्नवैः एवंविधं प्रकर्तव्यं रङ्गशीर्ष प्रयत्नतः इस रंग शीर्ष को भरने के लिये हल से जोत ॥ ७४ ॥

॥ ७५ ॥॥

॥ ७६ ॥

। कर ढेलों, घास तथा कंकड़ों से रहित की हुई काली मिट्टी प्रयत्नपूर्वक डालनी चाहिए । हल में श्वेतवर्ण के बैल जोतने चाहिए और इस हल को जोतने वाले मनुष्य अंगहीन ( हीन या विकलांग ) नहीं होने चाहिए । यह मिट्टी सुदृढ़ तथा बलवान् मनुष्यों के द्वारा ढोई जानी चाहिएँ जो विकलांग न हों । इस प्रकार बड़े ( ध्यान तथा ) प्रयत्नपूर्वक रंगशीर्ष का निर्माण किया जाए ॥७४-७७ ॥ १. लकड़ी के २ खड़े, २ आड़े और २ तिरछे डंडे लगाकर बनाया गया चौखट षड्दारुक कहलाता है । इसे रंगशीर्ष के नीचे लगा देने से उसमें एक तो मजबूती आएगी, दूसरे शब्दों को गूंजने में सहायता मिलेगी । षड्दारुकम् की व्याख्या है: - षण्णां दारूणां समाहारः षड्दारुकम् । [ देखिये मानचित्र तथा परिशिष्ट भी ] । २. काली मिट्टी मजबूत और चिपकने वाली होने से रंगमंच मजबूत रहेगा तथा टिकाऊ भी । इसी कारण प्रयत्नपूर्वक काली मिट्टी के भराव करने का मुनि द्वारा निर्देश दिया गया । ११. लाङ्गले च – क ० । २. निलोष्ठतृणशर्करा - ग ० । ३. शब्ददोषविवर्जिताः क ० । ४. पिटकैर्नवः - क ०, पीटकैर्नवः घ ० । २५. एवं विधेश्वघ ०

पृष्ठ 165

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५२ नाट्यशास्त्रम् कूर्मपृष्टं न कर्तव्यं मत्स्यपृष्ठं तथैव च ॥ ७७ ॥

शुद्धादर्शताकारं रङ्गशीर्ष प्रशस्यते । यह रंगशीर्ष न तो कछुए की पीठ के समान ( बीच में अधिक उभरा हुआ ) और न मछली की पीठ के समान ( लंबा एवं दूर तक उभरा हुआ ) ही बनाना चाहिए । शुद्ध दर्पण के समान समतल घरातल ही श्रेष्ठ समझा जाता है ॥ ७७-७८ ॥ रत्नानि चात्र देयानि पूर्वे वज्रं विचक्षणैः ॥ ७८

वैडूर्य दक्षिणे पार्श्वे स्फटिकं पश्चिमे तथा ।

प्रवालमुत्तरे चैव मध्ये तु कनकं भवेत् ॥ ७ ९

एवं रङ्गशिरः कृत्वा दारुकर्म प्रयोजयेत् । और चतुर शिल्पीजन के द्वारा इसमे रत्नों ( को भी ) पूर्व की ओर हीरा, दक्षिण में वैदूर्य ( लहसुनिया ), पश्चिम वाला रंगशीर्ष ॥ ॥ रखना चाहिए । में स्फटिक तथा उत्तर में प्रवाल ( मूँगा ) को लगाना चाहिए । इसके मध्य भाग में सोना रखा जाए । इसी प्रकार रङ्गशीर्ष ' का निर्माण कर लेने पर फिर लकड़ी का काम आरम्भ करवाना चाहिये ॥ ७८-८० ॥ JRFVE रंगमञ्चकी शोभा दारुकर्म तथा अन्य सजावट के कार्य — ऊहप्रत्यूह संयुक्तं नानाशिल्पप्रयोजितम् ॥ ८० ॥

नानाञ्जवनोपेतं बहुव्यालोपशोभितम् ।

ससालभञ्जिकाभिश्च समन्तात्समलंकृतम् ॥ ८१ ॥

१. रंगशीर्ष तथा रंगपीठ ये दोनों प्रेक्षागृह में दो भिन्न विभाग हैं । आचार्य अभिनवगुप्त ने इन्हें पृथक् मान कर ही व्याख्या की है जो उचित होती है । ( विवेचन अन्यत्र द्रष्टव्य ) । १. शुद्धादर्शतलप्रख्यं - ख ० । २. रङ्गपीठं – घ ० । ३. वैदूयं – ख ०, ग ० । ४. प्रवर्तयेत् — ग ० । ५. भञ्जवरो- ख ०, ग ० । ६. अट्टालभञ्चिकाभिश्च – ग ०, भवेयुः चात्र विन्यस्ता विविधाः शालभ-खिकाः इति क ० पु ० अधिकम् ।

पृष्ठ 166

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द्वितीयोऽध्यायः ५३

निर्यूह कुरोपेतं नानाग्रथितवेदिकम् ।

नानाविन्याससंयुक्तं ' चित्रजालगवाक्षकम् ॥ ८२ ॥

सुपीठधारणी युक्तं कपोतालीसमाकुलम् ।

नानाकुट्टिभविन्यस्तैः स्तम्भैश्चाप्युपशोभितम् ॥ ८३ ॥।

एवं काष्ठविधिं कृत्वा भित्तिकर्म प्रयोजयेत् । यह लकड़ी का कार्य बहुत सोच विचार तथा निरीक्षण करते हुए ( ऊह प्रत्यूह ' ) किया जाए । इसमें विविध प्रकार की कारीगरी [ शिल्प ] रहनी चाहिए । इसमें अनेक तख्तों का -जो भित्ति के समान दिखाई दें— प्रयोग किया जाना चाहिए । अनेक हाथी ( या सर्प आदि ) की आकृतियाँ इनमें खुदवायी जाएँ । इनमें सुन्दर पुतलियाँ खुदवायी जाएँ, इसकी १. ऊह प्रत्यूह, निर्यूह तथा कुहर शब्द शिल्पशास्त्र के पारिभाषिक शब्द हैं । परन्तु किसी प्राचीन शास्त्रीय ग्रन्थ में काष्ठशिल्प का व्यवस्थित उल्लेख प्राप्त न होने से विश्वासपूर्वक कुछ भी कहने की स्थित संभव नहीं । यहाँ ' निर्यूहकुह रोपेतम् ' का अर्थ होगा लकड़ी के कोरों पर निर्मित खुदाई । यह शिल्पशास्त्र का एक परिभाषिक शब्द है जो उस समय प्रचलित रहा होगा । दीवार में चुनी हुई लकड़ी का बाहरी भाग भी ' निर्यूह ' कहलाता है । ( निर्यूह का अन्य अर्थ है कपोतपालिका परन्तु वह यहाँ पुनरुक्त हो जाने के कारण नहीं लिया जायगा क्योंकि ' कपोताली ' शब्द इसी वर्णन में आया है ) यदि निर्व्यूह पाठान्तर को माना जाय तो अर्थ होगा निश्चित स्वरूप वाले व्यव-स्थापित छिद्रों से युक्त । मानसार वास्तुशास्त्र में ' निर्यूह ' शब्द का अर्थ शिरोभूषण भी दिया है अभिनवगुप्त की व्याख्या इस स्थल पर विशेष प्रकाश नहीं डालती । ‘ यन्त्र ' शब्द का एक अर्थ कुंडी ( सांकल ) है । ' कपोताली ' का अर्थ है ' कपोतपालिका ' या कबूतरों की छतरी । अन्य अर्थ इसका वही है जो ‘ निर्यूह ' का है । माघ ने विर्तादिनिर्यूहविटङ्कनीडः ( ३।५५ ) में निर्यूह शब्द का प्रयोग किया है जिसका तात्पर्य भी उपर्युक्त ही प्रतीत होता है । १. निर्यूह -० । २. यन्त्रजाल - ग ० । ३. धरणी ग ० । ४. प्रवर्तयेत् — क, ग ० ।

पृष्ठ 167

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५४ नाट्यशास्त्रम् वेदिकाओं के नानाविध चित्र बाहर निकले हुए ( निर्यूह ) और भीतर खुदे हुए ( कुहर ) रहना चाहिए । इनकी रचना अनेक शैलियों से युक्त रहनी चाहिए और इनकी जालियाँ और झरोखे एक विचित्र सजावट के लिये हुए होने चाहिए । इनमें विद्यमान खम्भों के ऊपर सुन्दर तुलाएँ [ धारणी ] लगायी जाएँ जिनमें विचित्र स्वरूप वाली कबूतरों की छतरियों पंक्तिबद्ध ( रखी हुई ) दिखाई दें तथा फर्श पर खड़े किये गये खम्भों पर अनेक तरह की चित्रकारी रहनी चाहिये । इस प्रकार जब लकड़ी का कार्य और सजावट

( आदि ) पूर्ण हो जाए तो फिर दीवारों को उठाने का कार्य आरंभ किया जावे ।

स्तम्भं वा नागदन्तं वा वातायनमथापि वा ॥ ८४ ॥

कोण वा सप्रतिद्वारं द्वारविद्धं न कारयेत् । दोंवारों को उठाने के अवसर पर कोई खम्भा, खूँटी, झरोखा या खिड़की अथवा कोना किसी दरवाजे के सामने न आने पावे अथवा किसी दरवाजे के सामने दूसरा दरवाजा न रखा जावे [ या न खुलने पावे ] ॥ ८४-८५ ॥ कार्यः शैलगुहाकारो द्विभूमिर्नाटयमण्डपः ॥ ८५ ॥

मन्दवातायनोपेतो निर्वातो धीरशब्दवान् ।

तस्मान्निवातः कर्तव्यः कर्तृभिर्नाटयमण्डपः ॥ ८६ ॥

गंभीर स्वरता येन कुतपस्य भवेदिति । यह नाट्यमण्डप ( नाट्यगृह ) पर्वत की गुफा समान आकार लिये हुए और द्विभूमि ' ( पहले नीचा और फिर क्रमशः ऊँचा होने वाला या १. ' द्विभूमि ' नाट्यमण्डप का आशय है कि नाटयमण्डप दो मंजिला बनाया जाए । प्राचीन नाटकों में कुछ ऐसे दृश्य जो दो मंजिले मण्डपों पर ही अभिनीत हो सकते थे । कुछ विद्वानों के अनुसार यह ऊँचे - नीचे दो धरा-तलों के कारण द्विभूमि कहलाता है क्योंकि नेपथ्य और रंगशीर्ष का तल एक समान न हीं होता | शैल्पिक विधाओं के पर्यालोचक द्विभूमि का अर्थ दो छत करते हैं । पर द्विभूमि का अर्थ दो फर्श ' नाटयशास्त्र ' से थोड़ा मेलताल रखता १. काष्र्णायसं क ० । २. दारुविद्धं - ग ० । ३. धीरशब्दभाक् – ग ० । ४. गाम्भीर्यं सुस्वरत्वञ्च कुतपस्य भवेदिति - ग ० । ५. भविष्यति घ ० ।

पृष्ठ 168

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द्वितीयोऽध्यायः ५५ दुमंजिला ) बनाया जाए । इसमें झरोखे या खिड़कियों से हलकी - हलकी हवा आती रहनी चाहिए, यह तेज हवा से रहित ( निर्वात ) और गम्भीर शब्दों को गुँजाने वाला होना चाहिए [ अर्थात् जिसमें उच्चरित शब्द की प्रतिध्वनि होती रहे । ] । शिल्पीजन इसको निवात [ जिसमें तेज हवा न आ पाए ऐसा ] ही बनाएँ क्योंकि ऐसे मण्डप में सभी प्रकार के वाद्यों ( कुतप ) की ध्वनि में स्वरगत गाम्भीर्य बना रहता है ॥ ८५-८७ ॥ भित्तिकर्मविधिं कृत्वा भित्तिलेपं प्रदापयेत् ॥ ८७ ॥

सुधाकर्म बहिस्तस्य ' विधातव्यं प्रयत्नतः । भित्तियों को उठाने के बाद इन पर [ पिसे हुए शंख, सीप आदि को बालू में मिला कर ] चूने से लेप ( पलस्तर ) चढ़ाया जाए और इसके बाहरी भाग पर ध्यान पूर्वक चूने की पुताई की जाए ॥ ८७-८८ ॥ भित्तिष्वथ ' विलिप्तासु परिमृष्टासु सर्वतः ॥ ८८ ॥

समासु जातशोभासु चित्रकर्म प्रयोजयेत् ' । दीवारों पर पलस्तर हो जाने और ( उनकी ) घिसाई, घुटाई आदि हो जाने से चिकनी और समतल बन जाने के बाद इन भित्तियों पर चित्र रचना करवायी जाए ॥ ८८-८९ ॥ चित्रकर्मणि चालेख्याः पुरुषाः स्त्रीजनास्तथा ॥ ८ ९ ॥ लताबन्धाश्च कर्त्तव्याश्चरितञ्चात्मभोगजम् ।TUTE अंकित किये जाने वाले चित्रों में लताबन्ध ' तथा अन्य विलास क्रीडाओं वाले स्त्री पुरुषों के कार्य प्रदर्शित करने वाले चित्र रहें ॥८ ९ - ९ ० ॥ है । अभिनव गुप्त ने इस विषय में कई व्याख्याकारों के मन्तव्य उपस्थित किये हैं और इस प्रकार इस स्थल को विचारणीय कोटि में रख दिया है । निश्चय ही ' द्विभूमि ' का अर्थ ' दो फर्श ' उचित होगा । १. ' लताबन्ध ' या ' लतावेष्टन ' संभोग के प्रकार हैं । ' आत्मभोगजम् ' का अर्थ है स्त्री - पुरुषों की विलास क्रीड़ा या स्वयं के आनन्द से उत्पन्न होने वाले चरित । ( चित्रकर्म ' अजन्ता ' के चित्रों में आज भी देखा जा सकता है ) । १. तथैवस्य कुर्याद् बाह्ये प्रयत्नतः घ ० । २. भित्तिष्वपि च लिप्तासु ग ० । ०३. प्रवर्तयेत् — ग ० ।

पृष्ठ 169

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५६ नाट्यशास्त्रम् एवं विकृष्टं कर्तव्यं नाट्यवेश्म प्रयोक्तृभिः ॥ ९ ० ॥ विकृष्ट [ आयताकार ] नाट्यगृह की इसी प्रकार प्रयोक्ताजन रचना करें ॥

चतुरस्र नाट्य - गृह का स्वरूप-पुनरेव ' हि वक्ष्यामि चतुरस्रस्य लक्षणम् ।

समन्ततश्च कर्तव्या हस्ता द्वात्रिंशदेव हि ॥ ९ १ ॥

शुभभूमिविभागस्थो नाटयज्ञैर्नाटयमण्डपः । अब मैं ' चतुरस्र ' नाट्यगृह का लक्षण बतलाता हूँ - नाट्य के विज्ञाता पुरुषों के द्वारा शुद्ध भूमि पर विभाग पूर्वक अवस्थित चतुरस्र नाट्यगृह चारों ओर ( चारों भुजाओं में ) ३२ हाथ के प्रमाण का ( चौकोन ) बनाया जाना चाहिए ॥ ९ १ - ९ २ ॥ यो विधिः पूर्वमुक्तस्तु लक्षणं मङ्गलानि च ॥ ९ २ ॥ विकृष्टे तान्यशेषाणि चतुस्त्रेऽपि कारयेत् । विकृष्ट नाट्यगृह के विषय में जो विधियाँ, लक्षण तथा मांगलिक विधि विधान - बतलाए गये हैं वे सभी चतुरस्र नाट्यगृह में भी ( निर्माण आदि के अवसर पर सम्पन्न ) किये जाएँ ॥ ९ २ - ९ ३ ॥ चतुरस्त्रं समं कृत्वा सूत्रेण प्रविभज्य च ॥ ९ ३ ॥ बाह्यतः सर्वतः कार्या भित्तिः श्लिष्टेष्टका दृढ़ा । चतुरस्र नाट्यगृह के क्षेत्र का समान विभाग कर तथा उसे सूत से [ चारों और समान ३२ x ३२ हाथ ] नापते हुए उसके बाहरी भाग से सठी हुई ईटों की दृढ़ दीवार उठा दी जाए ॥ ९ ३ ॥

तत्राभ्यन्तरतः कार्याः रङ्गपीठोपरि स्थिताःः ।

दश प्रयोक्तृभिः स्तम्भाः शस्ताः मण्डपधारणे ॥ ९ ४ ॥

इसमें ( रंगपीठ में ) भीतर की ओर दिशा के विचार के अनुसार १. अतः परं प्रवक्ष्यामि ग ० । २. समन्ततस्तु कर्तव्यो - ग ० । ३. चतुरस्रस्य तान्येव कारयेन्नाट्यवेश्मनः – ग ० । ४. रङ्गपीठे तथा दिशम् - घ ० ।

पृष्ठ 170

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द्वितीयोऽध्यायः ५७ निर्माता गण दस स्तम्भों को खड़ा करें जो इस मण्डप को सम्हालने में सक्षम हों ॥ ९ ४ ॥

स्तम्भानां बाह्यतश्चापि सोपानाकृतिपीठकम् ।

इष्टका - दारुभिः कार्य प्रेक्षकाणां निवेशनम् ॥ ९ ५ ॥

स्तम्भों से बाहर की ओर प्रेक्षकों के बैठने के लिए ईटों तथा लकड़ियों द्वारा सीढ़ियों के आकार में पीठक ( आसन ) बनाना चाहिए ॥ ९ ५ ॥

हस्तप्रमाणैरुत्सेधैर्भूमिभागसमुत्थितैः ।

रङ्गपीठावलोक्यञ्च कुर्यादासनजं विधिम् ॥ ९ ६ ॥

घरातल से एक हाथ ऊपर उठती हुई सीढ़ियों जैसी दर्शकों के लिए ऐसी बैठकें बनवाई जाएँ जहाँ से रंगपीठ भलीभाँति दिखलायी दे ॥ ९ ६ ॥

पडन्यानन्तरं चैव पुनः स्तम्भान्यथादिशम् ।

विधिना स्थापयेत्तज्ज्ञो दृढान्मण्डपधारणे ॥ ९ ७ ॥

और फिर विज्ञाता शिल्पी उचित दिशाओं में ( प्रत्येक दिशाओं में ) अन्तर देते हुए मण्डप को धारण करने में समर्थ छः दृढ़ स्तम्भों को लगावे ।

अष्टौ स्तम्भान्पुनश्चैव तेषामुपरि कल्पयेत् ।

विद्धास्यमष्टहस्तं च पीठं तेषु ततो न्यसेत् ॥ ९ ८ ॥

१. मूल से इन दस स्तम्भों की स्थिति स्पष्ट नहीं होती । अभिनवभारती का विवेचन भी उलझा हुआ है । अतएव इसका तात्पर्य वैसा ही होना चाहिए जैसा कि हमारा ' मानचित्र ' है । ( इसका विशेष विवेचन प्रस्तावना में भी देखिये ) । २. ' सोपाना कृतिपीठकम् ' का आशय है आसनों की प्रथम पंक्ति पृथ्वी से ऊँची हो, फिर क्रमशः एक दूसरे से ऊँची रखी जाएँ । ये कितनी ऊँची हों इसका विवेचन नहीं मिलता है पर संभवतः ये आठ इश्व तक रखी जा सकती हैं । १. रङ्गपीठविलोक्यं च - ग ० । २. दासनिकं ग ० । ३. षडन्यान् सुन्दरान् दद्यात् ग ० । ४. धारयेत् — ग ० । ५. कारयेत् — ग ० । ६. संस्थाप्यञ्ज पुनः पीठमष्टहस्तप्रमाणतः ग ० ।