भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 221–230
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 221–230
पृष्ठ 221
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नाट्यशास्त्र, अ ० ४ ] [ फलक १२ गृधावलीकम् । सन्नतम् । ( पृ ० १० ९, लो ० १३४ ) ( पृ ० १० ९, श्लो ० १३५ ) सूची । अर्धसूची । ( पृ ० १० ९, ० १३६ ) ( पृ ० १२०५ श्र ० १३७ ) सूचीविद्धम् । अपक्रान्तम् । ( पृ ० १०१, ० १३८ ) ( पृ ० ११०, श्लो ० १३ ९ )
पृष्ठ 222
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
फलक १ नाट्यशास्त्र, अ ० ४ ] सर्पितम् | मयूरललितम् । ( पृ ० ११०, लो ० १४० ) ( पृ ० ११०, लो ० १४१ ) हरिणप्लुतम् । प्रेङ्खोलितम । ( पृ ० ११०, ० १४३ ) ( पृ ० १११, श्लो ० १४४ ) नितम्बम् । करिहस्तम् । ( पृ ० १११, लो ० १४५ ) ( पृ ० १११, लो ० १४७ )
पृष्ठ 223
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नाट्यशास्त्र, अ ० ४ ] [ फलक १४ सिंहाकर्षितकम् । उद्वृत्तम् । ( पृ ० ११२, लो ० १५० ) ( पृ ० ११२, श्लो ० १५१ ) उपसृतकम् । अवहित्थकम् । ( पृ ० ११२, लो ० १५२ ) ( पृ ० ११३, श्रो ० १५५ ) एकाक्रीडितम् । ऊरूवृत्तम् । ( पृ ० ११३, लो ० १५७ ) ( पृ ० ११३, श्लो ० १५८ )
पृष्ठ 224
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ फलक १५ नाट्यशास्त्र, अ ० ४ ] मदस्खलितकम् । विष्णुकान्तम् । ( पृ ० ११४, श्लो ० १५ ९ ) ( पृ ० ११४, श्लो ० १६० ) विष्कम्भम् । उद्धतम् । ( पृ ० ११४, को ० १६२ ) ( पृ ० ११४, लो ० १६३ ) वृषभक्रीडितम् । लोलितम् । ( पृ ० ११५, श्लो ० १६४ ) ( पृ ० ११५, लो ० १६५ )
पृष्ठ 225
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नाट्यशास्त्र, अ ० ४ ] [ फलक १६ नागापसर्पितम् | ( पृ ० ११५, लो ० १६६ ) शकटास्यम् । गङ्गावतरणम् । ( पृ ० ११५, श्लो ० १६७ ) ( पृ ० ११६, लो ० १६८ ) [ फलक १-१६, पुरातत्त्वविभाग, भारतसरकार के सौजन्य से
पृष्ठ 226
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
यदि हाथ " सूचीमुखं " मुद्रा में यथेच्छ डोलाए, पैरों को क्रमशः ऊपर नीचे हिलता हुआ ( गतिशील ) और कोख को ' तन ' मुद्रा में रखे तो ‘ अर्धरेचित ' करण कहलाता है ॥ ७२-७३ ॥ स्वस्तिकौ चरणौ यत्र करो वक्षस्थ ' रेचितौ ॥ ७३ ॥
निकुञ्चितं तथा वक्षो वक्षस्स्वस्तिकमेव तत् । यदि दोनों पैर परस्पर ' स्वस्तिक ' दशा में रखे । दोनों हाथ ' रेचित ' करते हुए उन्हें ' वक्षःस्थल ' तक ( झुकाते हुए ) लाए, फिर वक्षःस्थल भी झुकाले तो ( यह ) ' वक्षःस्वस्तिक ' करण कहलाता है ॥ ७३-७४ ॥ अश्ञ्चितेन तु पादेन रेचितौ तु करौ यदा ॥ ७४ ॥
उम्मत्तं करणं तत्तु विज्ञेयं नृत्तकोविदैः । यदि ( दोनों ) पैर अंचित और ( दोनों ) हाथ ' रेचित ' दशा में हों तो नृत्यशास्त्र के विज्ञाता इसे ' उन्मत्त ' करण कहते है ॥ ७४-७५ ॥ हस्ताभ्यामथ पादाभ्यां भवतः स्वस्तिकौ यदा ॥ ७५ ॥
तत्स्वस्तिकमिति प्रोक्तं करणं करणार्थिभिः । यदि दोनों हाथ और पैर ' स्वस्तिक ' मुद्रा में हों तो करण के अभिनेता इने ' स्वस्तिक ' करण जाने ॥ ७५-७६ ॥ विक्षिप्ताक्षिप्तबाहुभ्यां स्वस्तिकौ चरणौ यदा ॥ ७६ ॥
अपक्रान्तार्धसूचिभ्यां तत् पृष्ठस्वस्तिकं भवेत् । यदि दोनों बाहु ऊपर ( विक्षेप ) तथा नीचे की ओर झटके के साथ ( आक्षेप ) ' स्वस्तिक ' मुद्रा में किये जाएँ, तथा दोनों पैर ' अपक्रान्ता ' और ' अर्धसूची ' चारियों के साथ ' स्वस्तिक ' बनाएँ तो वह ' पृष्ठस्वस्तिक ' करण कहलाता है ॥ ७६-७७ ॥ पार्श्वयोरतश्चैव यत्र श्लिष्टः करो भवेत् ॥ ७७ ॥
स्वस्तिको हस्तपादाभ्यां तद्दिक्स्वस्तिकमुच्यते । १. ' अपविद्ध ' का अभिनवगुप्त द्वारा किया हुआ अर्थ ' सूचीमुख ' है । १. वक्षसि - घ ० । २. नटयकोविदैः -- क; नृत्यकोविदैः —ख ० । ३. उभाभ्यां हस्तपादाभ्यां घ ० । ४. श्लिष्टकृतो —क; श्लिष्टः कृतो — ग; श्लिष्टः गतो - घ ० । ७ ना ० शा ० प्र ०
पृष्ठ 227
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
९ ८ नाटयशास्त्रम् यदि कोख तथा सामने की ओर स्पर्शकर घूमते हुए दोनों हाथ - पैर ' स्वस्तिक ' मुद्रा में रहें तो ' दिक्स्वस्तिक ' करण कहलाता है ॥ ७७-७८ ॥ अलातं चरणं कृत्वा व्यंसयेद्दक्षिणं करम् ॥ ७८ ॥
' ऊर्ध्वजानुक्रमश्चैव अलातकमिति स्मृतम् । यदि ' आलात ' चारी करते हुए सीधे हाथ को कन्धे के बराबर से नीचे उतारे, फिर ' ऊर्ध्वजानु ' चारी को ( क्रमशः दोनों हाथ पैरों से ) सम्पादित करे तो ‘ आलात ' करण कहलाता है ॥ ७८-७९ ॥ स्वस्तिकापसृतः पादः करौ नाभिकटिस्थितौ ॥ ७ ९ ॥ पार्श्व मुद्वाहितं चैव करणं तत्कटीसमम् । यदि पैर ‘ स्वस्तिक ' करण के पश्चात् पृथक् रखे, दोनों हाथ नाभि तथा कटि पर रखे और कोख ‘ उद्वाहित ' चेष्टा में रखे हो तो ' कटीसम ' करण कहलाता है ॥ ७ ९ -८० ॥ हस्तो हृदि भवेद्वामः सव्यश्चाक्षिप्तरेचितः ॥ ८० ॥
रेचितश्चापविद्धश्च तत् स्यादाक्षिप्तरेचितम् । यदि बायाँ हाथ हृदय पर और सीधा ' रेचित ' मुद्रा युक्त कर ऊपर तथा कोनों में उछाला जाए । फिर दोनों हाथ ' रेचित ' तथा ' अपविद्ध ' ( चक्राकार ) मुद्रा में रखे तो ' आक्षिप्तरेचित ' करण कहलाता है ॥ ८०-८१ ॥ विक्षिप्तं हस्तपादन्तु तस्यैवाक्षेपणं पुनः ॥ ८१ ॥
यत्र तत्करणं ज्ञेयं विक्षिप्ताक्षिप्तकं द्विजाः । यदि हाथ और पैर ऊपर उछाले जाएँ ( विक्षिप्त ) तथा फिर उन्हें नीचे पटका जाए ( आक्षिप्त ) तो हे मुनियों! ' विक्षिप्ताक्षिप्तक ' करण कहलाता है ॥ ८१-८२ ॥ स्वस्तिकौ चरणौ कृत्वा करिहस्तञ्च दक्षिणम् ॥ ८२ ॥
वक्षःस्थाने तथा वाममर्धस्वस्तिकमादिशेत् । यदि दोनों पैर ' स्वस्तिक ', सीधा हाथ ' करिहस्त ' ( मुद्रा में ) और बायाँ हाथ वक्षःस्थल पर ( कटकामुख मुद्रा में ) स्थित रहे तो ' अर्ध-स्वस्तिक ' करण कहलाता है । १. कर्ध्वजानुक्रमं कुर्याद् - ख ० । R
पृष्ठ 228
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुर्थोऽध्यायः ९९ व्यावृत्त परिवृत्तस्तु स एव तु करो यदा ॥ ८३ ॥
अश्चितो नासिकाग्रे तु तदश्चितमुदाहृतम् । यदि ‘ अर्धस्वस्तिक ' करण की अवस्था में ' करिहस्त ' मुद्रा वाला हाथ क्रमशः व्यावृत्त ( चक्राकार घुमाव में ) तथा परिवृत्त ( दूसरी ओर घुमाते हुए ) रखा जाए और फिर उसे ' नासिका ' के अग्रभाग की ओर झुका लिया जाए तो ‘ अंचित ' करण कहलाता है ॥ ८३-८४ ॥ कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य त्रयस्त्रमुरु ' विवर्तयेत् ॥ ८४ ॥
कटिजानु विवृत्तं ' च भुजङ्गत्रासितं भवेत् । यदि ' कुंचित ' मुद्रा के पैरों को ऊपर उछाला जाए, उसको तिरछा घुमा दिया जाय और कटि और जंघा भी उसी कम से घुमाव लें तो ' भुजंगत्रासित ' करण होता है ॥ ८४-८५ ॥ कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य जानु मूर्ध्वं प्रसारयेत् ॥ ८५ ॥
प्रयोगवशगौ हस्तावूर्ध्वजानु प्रकीर्तितम् । यदि ' कुंचित ' पाद को ऊपर उछाला जाए, जानु ( घुटने ) को ऊपर की ओर ( छाती के बराबर ) फैलाया जाए तथा दोनों हाथ नृत्य के प्रयोग के ( ताल, नाद आदि के ) अनुकूल रखे जाएँ तो ' उर्ध्वजानु ' करण होता है ॥ ८५-८६ ॥ करणं वृश्चिकं कृत्वा करं पार्श्वे निकुञ्श्चयेत् ॥ ८६ ॥
नासाग्रे दक्षिणं चैव ज्ञेयं तद्धि निकुञ्चितम् । यदि ' वृश्चिक ' करण में पैरों को रखकर हाथ को कोख की ओर झुका ले ( या सिकुड़ा ले ) तथा सीधे हाथ को नाक की नोक के अग्रभाग पर झुका कर रखे तो ' निचित ' करण होता है । ८६-८७ ॥ वामदक्षिणपादाभ्यां घूर्णमानोपसर्पणैः ॥ ८७ ॥
उद्वेष्टितापविद्धैश्च हस्तैर्मत्तल्ल्युदाहृतम् । यदि बाएँ तथा सीधे पैरों के द्वारा एक चक्करदार घुमाव लेकर फिर उसे पृथ्वी पर पटका जाए, दोनों नृत्य करते हुए हाथ उद्वेष्टित और अपविद्ध १. कटिजानू विवत्तौ च ख ०; कटिजानु निवृत्तौ च घ ० । २. जानुस्तनसमं न्यसेत् – ब ०; जानुहस्तं समं न्यसेत् — घ ० । ७
पृष्ठ 229
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०० नाट्यशास्त्रम् गति ( हलचल ) को प्रदर्शित करें तो वह ' मत्तल्ली ' है ॥ ८७-८८ ॥ स्खलितापसृतौ पादौ वामहस्तश्च रेचितः सम्यहस्तः कटिस्थः स्यादर्धमत्तल्लि तरस्मृतम् ' यदि पैरों को ' स्खलित ' करण में पीछे की ओर हटा हाथ को ' रेचित ' करे और दाहिना हाथ कटि पर रख ले करण होता है । रेचितो ' दक्षिणो हस्तः पादः सव्यो निकुट्टितः दोला चैव भवेद्वामस्तद्वेचितनिकुट्टितम् यदि सीधा हाथ ' रेचित ', दाहिना पैर उद्घट्टित और मुद्रा में रखा जाए तो ' रेचित निकुट्टित - ' करण कहलाता है कार्यौ नाभितटे हस्तौ प्राङ्मुखौ खटकामुखौ ॥ सूचीविद्धावपक्रान्तौ पादौ पादापविद्धके । करण कहलाता ॥ ८८ ॥
। लिया जाए, बाए तो ' अर्द्धमत्तली ” ॥ ८ ९ ॥ । बायाँ हाथ ' दोला ’ ॥ ८ ९ - ९ ० ॥ ९ ० ॥ यदि दोनों हाथ ' कटकामुख ' मुद्रा में नाभी के समीप हथेलियों को सामने की ओर करते हुए रखे जाएँ और दोनों पैर ' सूची ' ( सूचीविद्ध ) तथा ' अपक्रान्ता ' चारी से युक्त हों तो ' पादापविद्धक ' करण कहलाता है ॥९ ० - ९ १ ॥ अपविद्वो भवेद्धस्तः सूचीपादस्तथैव च ॥ ९ १ ॥ तथा त्रिकं विवृत्तं च वलितं नाम तद्भवेत् । यदि हाथ ‘ अपविद्ध ' मुद्रा में, पैर ' सूची ' चारी में ( तथा ' भ्रमरी ' चारी में ) और त्रिक ( अपने अधोभाग सहित पीठ के भाग ) को घुमा दिया जाय तो ' वलित ' करण हो जाता है ॥ ९ १ - ९ २ ॥ ' वर्तिताघूर्णितः सव्यो हस्तो वामश्च दोलितः ॥ ९ २ ॥ स्वस्तिकापसृतः पादः करणं घूर्णितं तु तत् । यदि दाहिना हाथ ‘ वलित ' ( करिहस्त ) मुद्रा में घुमाया जाए और १. मत्तल्लिमादिशेत् — ग ० । २. कुश्चितो — क ० । ३. रेचकनिकुट्टितम् — ग ० । ४. वर्तितो घूर्णितः घ ० । ५. हि तत् - क ० ।
पृष्ठ 230
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुर्थोऽध्यायः १०१ बायाँ हाथ ' दोला ' मुद्रा में घुमाए, दोनों पैर ' स्वस्तिक ' दशा में रखकर परस्पर एक दूसरे से दूर ( अपसृत ) कर लिये जाएँ तो ' घूर्णित ' नामक करण कहलाता है ॥ ९ २ - ९ ३ ॥ भवेामो ' दक्षिणापवर्तितः । ॥ ९ ३ ॥ बहुशः कुट्टितः पादो ज्ञेयं तल्ललितं बुधैः । यदि बायाँ हाथ ‘ करिहस्त ’ मुद्रा में और सीधा हाथ अपवर्तित ( दशा ) में एक ओर घुमाया जाए और दोनों पैर ऊपर नीचे कई बार पटके जाएँ तो ' ललित ' करण जानना चाहिये ॥ ९ ३ - ९ ४ ॥ ऊर्ध्वजानु विधायाथ तस्योपरि लतां न्यसेत् ॥ ९ ४ ॥ दण्डपक्षं तु तत्प्रोक्तं करणं नृत्तवेदिभिः । यदि ' ऊर्ध्वजानु ' चारी को प्रदर्शित कर दोनों ' लता ' मुद्राओं वाले हाथों को घुटने पर रखे तो नृत्तवेत्ताजन इस करण को ' ' कहते हैं ॥ ९ ४ - ९ ५ ॥ भुजङ्गत्रासितं कृत्वा यत्रोभावपि रेचितो ॥ ९ ५ ॥ वामपार्श्व स्थितौ हस्तौ भुजङ्गत्रस्तरेचितम् । यदि ' भुजंगत्रासित ' चारी को प्रदर्शित कर दोनों हाथों को ' रेचित ' मुद्रा में रख उन्हें बाएँ कोख की तो ' भुजंग - त्रस्त रेचित ' कहते हैं ॥ ९ ५ - ९ ६ ॥ त्रिकं सुवलितं कृत्वा लतारेचितकौ करौ ॥ ९ ६ ॥ नूपुरश्च ' तथा पादः करणे नू पुरे न्यसेत् । यदि ' त्रिक ' को आकर्षक पद्धति से ( ' भ्रमरी चारी ' की दशा में ) घुमाया जाए, दोनों हाथ ' लता ' तथा ' रेचित ' मुद्रा से युक्त हों और पैरों द्वारा ' नूपुरपादचारी ' का प्रदर्शन हो तो उसे ' नूपुर ' करण कहते हैं ॥९६-२७ ॥ रेचितौ हस्तपादौ च ' कटी ग्रीवा च रेचिता ॥ ६७ ॥
वैशाखस्थान के नैतद्भवेद्वैशाखरेचितम् ' यदि हाथ और पैर ' रेचित ' मुद्रा में तथा इसी प्रकार कटि और ग्रीवा १. दक्षिणश्च विवर्तितः घ ० । २. ऊध्वं जानु निधायाथ ग ० । ३. नूपुरं च तथा पादं घ ० । ४. कटिग्रीवौ च रेचितो – ०५ ।