भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 231–240
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 231–240
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१०२ नाट्यशास्त्रम् भी रेचित दशा में हो एवं शेष ( सम्पूर्ण ) अंग ' वैशाखस्थान में रहें तो इस करण को ‘ वैशाखरेचित ' कहते है ॥ ९ ७ - ९ ८ ॥ आक्षिप्तः स्वस्तिकः पादः करौ चोद्वेष्टितौ तथा ॥ ९ ८ ॥ त्रिकस्य वलनाञ्चैव ' ज्ञेयं भ्रमरकं तु तत् । यदि ' स्वस्तिक ' पादों को ' आक्षिप्त ' चारी में रखकर हाथों को ' उद्वेष्टित ' अवस्था में रखें ( चक्राकार घुमाते हुए ) और त्रिक को चारों ओर ( भ्रमरी चारी के अनुसार ) घुमाए तो ' भ्रमरक ' करण हो जाता है ॥९ ८ - ९९ ॥ अश्चितः स्यात्करो वामः सव्यश्चतुर एव च ॥ ९९ ॥
दक्षिणः कुट्टितः पादः चतुरं तत् प्रकीर्तितम् । यदि बायाँ हाथ ' अंचित ' मुद्रा में, दायाँ हाथ ' चतुर ' में और दायीं पैर ' कुट्टित ' ( उद्घट्टित ) मुद्रा में हों तो ' चतुर ' करण हो जाता है ॥ भुजङ्गत्रासितः पादो दक्षिणो रेचितः करः ॥ १०० ॥
लताख्यश्च करो वामो भुजङ्गाञ्चितकं भवेत् । यदि पैर ' भुजंगत्रासित ' चारी में, दाहिना हाथ ' रेचित ' मुद्रा में तथा बायाँ हाथ ' लता ' मुद्रा में रहे तो ' भुजंगाञ्चित ' ( नामक ) करण होता है ॥ विक्षिप्तं हस्तपादं तु समन्ताद्यत्र दण्डवत् ॥ १०१ ॥
रेच्यते तद्धि करणं ज्ञेयं दण्डकरेचितम् । यदि हाथ और पैरों को सीधे दण्ड के समान चारों ओर झटके से सीधा करे फिर हाथ और पैरों को ' रेचित ' मुद्रा में रख ले तो ' दण्डक-रेचितक ' करण कहलाता है ॥ १०१-१०२ ॥ वृश्चिकं चरणं कृत्वा द्वावप्यथ निकुट्टितौ ॥ १०२ ॥
विधातव्यौ करौ तत्तु ज्ञेयं वृश्चिककुट्टितम् । यदि ' वृश्विक ' करण प्रदर्शित कर दोनों हाथों को ' निकुट्टित ' ( क्रिया से सम्पन्न ) करे तो ' वृश्चिक - कुट्टित ' करण होता है । १०२-१०३ ॥ १. वलनं चैव ख ० । २. करणं - क ० । ३. तद्धि -० ।
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सूची ' कृत्वापविद्धं च दक्षिणं चरणं न्यसेत् ॥ रेचिता च कटिर्यत्र कटिभ्रान्तं तदुच्यते । यदि पैर ' सूची ' चारी में करके बायाँ पैर ' अपविद्ध ' कटि ' रेचित ' ( चारों ओर घूमती हुई ) रखी जाय तो कहलाता है ॥ १०३-१०४ ॥ अश्चितः पृष्ठतः पादः कुश्चितोर्ध्वतलाङ्गुलिः ॥ लताख्यश्च करो वामस्तल्लतावृश्चिकं भवेत् । यदि एक पैर ' अंचित ' मुद्रा में पीछे की ओर १०३ हरि १०३ ॥ मुद्रा में रखे तथा ' कटिभ्रान्त ' करण १०४ ॥ घुमाया रखा जाए तथा बायाँ हाथ ' लता ' मुद्रा से युक्त हो और उसका पंजा और अंगुलियाँ सिकुड़ी हुई और ऊपर की ओर रखी जाएँ तो वह ' लतावृश्चिक ' करण होता है ॥ १०४-१०५ ॥ अलपद्मः कटीदेशे छिन्ना पर्यायशः कटी ॥ १०५ ॥
डाला वैशाखस्थानके नेह तच्छिन्नं करणं भवेत् । यदि ‘ अलपद्म ' मुद्रावाले हाथ कटि पर रखे जाएँ, कटि ' च्छिन्न ' मुद्रा में रहे और क्रमशः इस मुद्रा में स्थित नर्तक शेष अंगको ' वैशाखस्थान ' में रखे तो ' छिन्न ' करण कहलाता है ॥ १०५-१०६ ॥ वृश्चिकं चरणं कृत्वा स्वस्तिकौ च करावुभौ ॥ १०६ ॥
रेचितौ ' विप्रकीर्णौ च करौ वृश्चिकरेचितम् । यदि ‘ वृश्चिक ' चरण को प्रदर्शित कर दोनों हाथों को ' स्वस्तिक ' मुद्रा में रख कर ' रेचित ' और विप्रकीर्ण करे तो वह करण ' वृश्चिकरेचित ' कहलाता है ॥ १०६-१०७ ॥ बाहुशीर्षाञ्चितौ हस्तौ पादः पृष्ठाञ्चितस्तथा ॥ १०७ ॥
दूरसन्नतपृष्ठं च वृश्चिकं तत्पकीर्तितम् । यदि दोनों हाथ झुके हुए और कन्धों पर रखें हो, पैर झुका हुआ और १. दत्वा ख ० । २. रेचितापसृती चैव ग ०, घ ०
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१०४ fet नाट्यशास्त्रम् पीठ के पीछे की ओर घूमते हुए रखा जाए और पीठ ' न ' ( झुकी हुई ) मुद्रा में हो तो उस करुण को ' वृश्चिक ' कहते हैं ॥ १०७-१०८ ॥ आली स्थानके ' यत्र करौ वक्षसि रेचितौ ॥ १०८ ॥
ऊर्ध्वाधो विप्रकीर्णौ च व्यंसित करणं तु तत् । यदि ‘ आलीढस्थान ' के प्रदर्शन के साथ दोनों हाथों को वक्षस्थल पर ' रेचित ' मुद्रा में रखे जो ऊपर और नीचे को ओर हिलते हुए ( ' विप्रकीर्ण ' मुद्रा में ) रहें तो वह करण ' व्यंसित ' कहलाता है ॥ १०८-१०९ ॥ हस्तौ तु स्वस्तिक पार्श्वे तथा पादो निकुट्टितः ॥ १० ९ ॥ यंत्र तत्करणं ज्ञेयं बुधैः पार्श्वनिकुट्टितम् । यदि ‘ स्वस्तिक ' मुद्रावाले दोनों हाथ दोनों बाजू ( कोख में ) रखे जाएँ एवं पैर ‘ निकुट्टित ' हो तो बुधजन उसे ' पार्श्वनिकुट्टित ' जाने ॥ १० ९ -११० ॥ वृश्चिकं चरणं कृत्वा पादस्याङ्गुष्ठकेन तु । ११० ॥ कुर्याल्ललाटतिलकन्तु तत् । यदि ‘ वृश्चिक ' चरण के प्रदर्शन के बाद पैर के अंगूठे को ललाट तक लेजाकर उससे तिलक अंकित करने का भाव प्रदर्शित करे तो उसे ‘ ललाटतिलक ' करण जानों ॥ ११०-१११ ॥ पृष्ठतः कुञ्चितं कृत्वा व्यतिक्रान्तक्रमं ततः ॥ १११ ॥
आक्षिप्तौ च करौ कार्यों क्रान्तके करणे द्विजाः । यदि एक पैर को ‘ कुंचित ' कर पीछे की ओर तथा ' अतिक्रान्ता ' चारी में चारों ओर घुमाते हुए रखे और दोनों हाथों को नीचे की ओर पटके ( आक्षिप्त ) ( या झटके से फेकें ) तो वह करण कान्तक ' ' कहलाता है ॥ १११-११२ ॥ आद्यः पादो ” नतः कार्यः सव्यहस्तश्च कुश्चितः ॥ ११२ ॥
उत्तानो वामपार्श्वस्थ स्तत्कुञ्चितमुदाहृतम् । यदि पैर को पहले झुकाकर ' अचित ' मुद्रा में दाहिने हाथ को कुंचित १. वालीढ स्थानक — ख ० । २. तद्विदुर्बुधाः प ० । ३. निकुट्टकम् – घ ० । ४. कुर्यादतिक्रान्तं समन्ततः- ग ० । ५. पादोऽतिः ०६. पार्श्वश्व घ ० ।
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चतुर्थोऽध्यायः १०५ रखे जो बायीं कोख पर ऊपर की ओर पंजे वाला होकर रखा जाय तो वह ' कु ' चित ' करण कहलाता है ॥ ११२-११३ ॥ लम्बिताभ्यां बाहुभ्यां यद्गात्रेणानतेन च ॥ अभ्यन्तरापविद्धः स्यात्तज्ज्ञेयं चक्रमण्डलम् । यदि अपविद्ध ( अड्डिता ) चारी के अन्दर शरीर को भूलती हुई भुजाओं से युक्त रखे तो वह करण ' चक्रमंडल ' स्वस्तिकापसृतौ पादावपविद्धक्रमौ यदा ॥ उरोमण्डलको हस्तावुरोमण्डलकन्तु तत् । यदि ' स्वस्तिक ' दशा में दोनों पैर आगे बढ़ा कर फिर ११३ ॥ झुका कर सीधी कहलाता है ॥ ११४ ॥ ' अपविद्ध ' चारी का प्रयोग करे और दोनों हाथों को ' उरोमण्डल ' मुद्रा में रखे तो ' उरोमण्डल ' करण कहलाता है ॥ ११४-११५ ॥ आक्षिप्तं हस्तपादं च क्रियते यत्र वेगतः ॥ ११५ ॥
आक्षिप्तं नाम करणं विज्ञेयं तद् द्विजोत्तमाः । यदि वेग से हाथ और पैरों को झटका - पटका जाए तो हे मुनियों वह ' आक्षिप्त ' करण बहलाता है ॥ ११५-११६ ॥ ऊर्ध्वाङ्गुलितलः पादः पार्श्वे णोर्ध्वं प्रसारितः ॥ ११६ ॥
प्रकुर्यादश्चिततलौ हस्तौ 19 तलविलासिते । यदि पैर अपने तलवे और अंगुलियों सहित ऊपर की ओर एक ओर ( पार्श्व ) से फैलाया जाए ( या उठाया जाए ) और हाथों के दोनों तले ( पंजे ) सिकुड़े हुए रखे जाएँ तो ' तलविलसित ' करण होगा ॥११६-११७ ॥ पृष्ठतः प्रसृतः पादो द्वौ तालावर्द्धमेव च ॥ ११७ ॥
तस्यैव चानुगो हस्तः पुरतस्त्वर्गलं तु तत् । यदि पैर पीछे की ओर हटाकर ढाई ताल तक ( २ ॥ ताल तक ) रखे तथा हाथ भी पैर के अनुसार सामने की ओर घूमते हुए रखे जाएँ तो अ ' ' करण जानों ॥ ११७-११८ ॥ १. अभ्यन्तरापविद्धा ग ० २. द्विजर्षभाः घ ० ३. तलावूर्द्धमेव च ० ४. तस्यैवानुगतो हस्तः घ ० ।
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१०६ नाट्यशास्त्रम् विक्षिप्तं हस्तपादं च पृष्ठतः पाश्र्वतोऽपि वा ॥ ११८ ॥
एक मार्गगतं यत्र तद्विक्षिप्तमुदाहृतम् । यदि हाथ तथा पैरों को पीछे तथा दोनों बगलों की ओर एक साथ एक दूसरे का अनुसरण करते हुए ( झटके से ) फेकें तो उसे ' विक्षिप्त ' करण जानों ॥ ११ ९ -१२० ॥ प्रसार्य कुञ्चितं पादं पुनरावर्तयेत् द्रुतम् ॥ ११ ९ ॥ प्रयोगवशगौ हस्तौ तदावर्त मुदाहृतम् । यछि ' कु ंचित ' पाद को फैला कर शीघ्रता से लौटा ले और दोनों हाथों को प्रयोग के अनुसार रखते तेज गति से घुमाव ले तो ' आवर्त '
करण जानो ।
कुचितं पादमुक्षिप्य पार्श्वात्पार्श्व ' तु दोलयेत् ॥ १२० ॥
प्रयोगवशगौ हस्तौ दोलापादं तदुच्यते । यदि ' कुचित ' पाद को ऊपर उठाकर दोनों ओर क्रमशः झुलाए और दोनों हाथों को ( यदि ) इसी प्रक्रिया के अनुसार गतिशील रखे तो ' दोलापद ' करण जानों ॥ १२०-१२१ ॥ आक्षिप्तं हस्तपादञ्च त्रिकञ्चैव विवर्तयेत् ॥ १२१ ॥
रेचितौ च तथा हस्तौ विवृत्त करणे द्विजाः । ' हे मुनिजन, यदि दोनों हाथ और पैरों को बाहर की ओर उछाला देकर ' त्रिक ' को एक गोल चक्कर देते हुए हाथों को ' रेचित ' मुद्रा में रखे तो
उसे ' विवृत्त ' करण जानों ॥। १२१-१२२ ॥
सूचीविद्धं विधायाथ त्रिकन्तु विनिवर्तयेत् ॥ १२२ ॥
करौ तु रेचितौ कार्यों विनिवृत्ते द्विजोत्तमाः । यदि ' सूचीविध ' चारी का प्रयोग करने के उपरान्त त्रिक की एक गोल
घुमाव दे और हाथों के ' रेचित ' मुद्रा में रखे तो उसे ' विनिवृत्त ' करण जानों ।
पार्श्वकान्तक्रमकृत्वा " पुरस्तादथ पातयेत् ॥ १२३ ॥
प्रयोगवशगौ हस्तौ पार्श्व क्रान्तन्तदुच्यते । १. तोऽथवा ग ० । २. तदावृत्त - घ ० । ३. दोलपादं - ग ० । ४. त्रिकन्तु विनिवर्तितम् ख ०; विवर्तितम् — ग ० । ५. पार्श्वजानुक्रमं – ग ० । ६. पार्श्वक्रान्तमुदाहृतम् – घ ० ।
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चतुर्थोऽध्यायः १०७ यदि ' पार्श्वकान्त ' चारी का प्रयोग कर पैरों को आगे की ओर ( भूमि पर ) पटके तथा हाथों को नृत्य - प्रयोग के अनुसार सामाने की ओर संचलित करे तो उसे ' पार्श्वक्रान्त ' करण कहते हैं ॥ १२३-१२४ ॥ पृष्ठतः कुञ्चितः पादो वक्षश्चैव समुन्नतम् ॥ १२४ ॥
तिलके च करः स्थाप्यस्तन्निस्तम्भितमुच्यते । यदि एक पैर पीछे की ओर सिकुड़ाकर ले जाए तथा छाती को ऊँची उठाकर रखे । हाथ को तिलक लगाने की चेष्टा में ललाट प्रदेश तक ले जाए तो उसे ' निस्तम्भित ' करण कहते हैं ॥ १२४-१२५ ॥ पृष्ठतो वलितम्पादं शिरोघृष्टम्प्रसारयेत् ॥ १२५ ॥
सर्वतो ' मण्डलाविद्धं विद्युद्भ्रान्तन्तदुच्यते । यदि पैर को पीछे की ओर घुमाकर मस्तक से लगते हुए रखे, दोनों हाथों को ' मंडलाविद्ध ' दशा में संचालित करे तो विद्युद्भ्रान्त ' करण कहलाता है ॥ १२५-१२६ ॥ अतिकान्तक्रमकृत्वा पुरस्तात् सम्प्रसारयेत् ॥ १२६ ॥
प्रयोगवशगी हस्तावतिक्रान्ते प्रकीर्तितौ । यदि ' अतिक्रान्त ' चारी का प्रदर्शन करने के उपरान्त दोनों हाथों को नृत्य - प्रयोग के अनुसार सम्मुख फैला दे तो ' अतिक्रान्त ' करण जानों ॥ आक्षिप्तं हस्तपादञ्च त्रिकञ्चैव विवर्तितम् ॥ १२७ ॥
द्वितीयो रेचितो हस्तो विवर्तितकमेव तत् । यदि एक हाथ और पैर को ऊपर की ओर उछाला देकर त्रिक को एक गोल घुमाव दे और दूसरे हाथ को ' रेचित ' मुद्रा में रखे तो ' विवर्तित क ’ करण कहलाता है ॥ १२७-१२८ ॥ कर्णेऽञ्चितः करो वामो लताहस्तश्च दक्षिणः ॥ १२८ ॥
दोलापादस्तथा चैव गजक्रीडितकं भवेत् । यदि बायाँ हाथ बायें कान के समीप सिकुड़ा कर ले जाए और सीधा १. कुञ्चितो पादौ – घ ० २. निसुम्भित - ०; निशुम्भित – घ ० । ३. हस्तौ च मण्डलाविद्धी - ग ० । ४. पुनश्च रेचयेद्धस्तं ग ० । ५. गजक्रीडितके – ग ० ।
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नाट्यशास्त्रम्... हाथ ‘ लता ' मुद्रा में और पैरों को ‘ दोलापाद ' ' चारी में रखे तो ' राजक्रीडितक ’ करण होता है ॥ १२८-१२९. P द्रुतमुत्क्षिप्य चरणं पुरस्तादथ पातयेत् ॥ १२ ९ ॥ तलसंस्फोटितौ हस्तौ तलसंस्फोटिते मतौ क यदि एक पैर को जल्दी से ऊपर उठाकर सम्मुख पटके, दोनों हाथों को ' तल संस्फोटित ' मुद्रा में रखे तो वह ' तलसंस्फोटित ' करण कहलाता है ॥ पादः " तारेचितकौ करौ ॥ १३० ॥
समुन्नतं शिरश्चैव गरुडप्लुतकं भवेत् । यदि पैर पीछे की ओर फैलाकर दोनों हाथों ( दायें - बाएँ ) क्रमशः ' लता ' तथा ' रेचित ' मुद्रा में रखे और मस्तक को ऊपर तान ले तो ' गरुडप्लुतक ' करण कहलाता है ॥ १३०-१३१ ॥ सूचीपादो ' नतं पाश्र्व मेको वक्षः स्थितः करः ॥ १३१ ॥
द्वितीयश्वाश्चितो गण्डे गण्डसूची तदुच्यते । यदि पैर ' सूची ' में, कोख झुकी हुई, एक हाथ वक्षःस्थल पर और दूसरा ' अंचित ' मुद्रा में कपोल प्रदेश का स्पर्श करते हुए हो तो ' गण्डसूची ' करण कहते हैं ॥ १३१-१३२ ॥ ऊर्ध्वापवेष्टितो ' हस्तौ सूचीपादो विवर्तितः ॥ १३२ ॥
परिवृत्तत्रिकं चैव परिवृत्तं तदुच्यते । यदि दोनों हाथ ' अपवेष्टित ' मुद्रा में ऊपर उठाए जाएँ, पैर ' सूची ' और त्रिक को ' भ्रमरी चारी ' के लक्षण में घुमाया जाए तो ' परिवृत्त ' करण कहलाता है ॥ १३२-१३३ ॥ एकः समस्थितः पाद ऊरुपृष्ठे स्थितोऽपरः ॥ १३३ ॥
मुष्टिहस्तश्च वक्षःस्थः पार्श्व जानु तदुच्यते । यदि एक पैर ' समपाद ' चारी में और दूसरा उसी के उरु भाग पर १. स्मृती- - ग ० । २. समुन्नतमुरश्चैव- घ ० । ३. सूचीपादोन्नतं ख ०; ग ० । ४. ऊर्ध्वावचेष्टिती ग ०; ऊर्ध्वाववेष्टितो - थ ० । ५. ऊरुपार्श्वस्थितः परः ग ०; ऊरुपार्श्वे स्थितोऽपरः घ ० ।
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चतुर्थोऽध्यायः १० ९ ( पीछे की ओर ) रखा हो तथा ' मुष्टि ' मुद्रा में एक हाथ वक्ष स्थल पर रखे तो ‘ पार्श्वजानु ' करण कहते हैं ॥ १३३-१३४ ॥ पृष्ठप्रसारितः पादः किश्चिदश्चितजानुकः ॥ १३४ ॥
यत्र प्रसारितौ बाहू तत्स्याद् गृधावलीकनम् । यदि एक पैर पीछे की ओर फैला कर ( उसके ) घुटने को थोड़ा झुकाया जाए तथा दोनों हाथों को सामने फैलावे तो उसे ' गृध्रावली नक ' करण कहते हैं ॥ १३४-१३५ ॥ उत्प्लुत्य चरणौ कार्यावग्रतः स्वस्तिकस्थितौ ॥ १३५ ॥
सन्नतौ च तथा हस्तौ सन्नतं तदुदाहृतम् । यदि एक उछाल लेकर दोनों पैरों को स्वस्तिक बना सामने की ओर रखे और दोनों हाथ ‘ सनत ' ( दोला ) मुद्रा में रखे तो उसे ' सनत ' करण कहते हैं ॥ १३५-१३६ ॥ कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य कुर्यादप्रस्थितं भुवि ॥ १३६ ॥
प्रयोगवशगौ हस्तौ सा ' सूची परिकीर्तिता । यदि ' कुंचित ' पाद को उठाकर उसे आगे की ओर ( भूमि पर ) रख दे और दोनों हाथों को नृत्य - प्रयोग के अनुसार ( ताललय के अनुसार ) रखे तो ' सूची ' करण कहते हैं ॥ १३६-१३७ ॥ अलपद्मः? शिरोहस्तः ” सूचीपादश्च दक्षिणः ॥ १३७ ॥
यत्र तत्करणं ज्ञेयमर्धसूचिति नामतः । यदि अलपद्म मुद्रा वाले हाथ को सिर तक ले जाए और सीधा पैर ' सूची ' को प्रदर्शित करे तो ' अर्धसूची ' करण जानें ॥। १३७–१३८ ॥ पादच्यां यदा पादी द्वितीयस्तु प्रविध्यते ॥ १३८ ॥
कटिवक्षः स्थितौ हस्तौ सूचीविद्धं तदुच्यते । यदि एक पैर ' सूची ' करण बतलाए हुए दूसरे पैर की एड़ी से सटा हो १. तत्सूचि - ग ० । २. वामः पादः शिरोदेशे - ग ० । ३. शिरोद्देशे - घ ० ४. पादी - ग ० । ५. प्रपीडयते - घ ० । ६. देश ख ० ।
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११० नाट्यशास्त्रम् दोनों हाथ कमशः कटि तथा वक्षःस्थल पर स्थापित किये जाएँ तो उसे ' सूचीविद्ध ' करण जानों ॥ १३८-१३६ ॥ कृत्वोवलितं पादमपक्रान्तकमं न्यसेत् ॥ १३ ९ ॥ प्रयोगवशगौ हस्तावपक्रान्तं तदुच्यते । यदि जंघा ( उरु ) को ‘ वलित ' करने के उपरान्त चरणों से ' अपक्रान्त ' चारी का प्रदर्शन किया जाए तथा दोनों हाथों को नृत्य - प्रयोग के अनुसार रखे तो ' अपक्रान्त ' करण कहते हैं ॥ १३ ९ -१४० ॥ वृश्चिकं चरणं कृत्वा रेचितौ च तथा करौ ॥ १४० ॥
तथा त्रिकं विवृत्तं च मयूरललितं भवेत् । यदि ' वृश्चिक ' करण को प्रदर्शित कर, दोनों हाथों को ' रेचित ' तथा त्रिक को ( भ्रमरी चारी के लक्षणानुसार ) एक गोल घुमाव दे तो ' मयूरललित ' करण जानो ॥ १४०-१४१ ॥ आञ्चितापसृतौ पादौ शिरश्च परिवाद्दितम् ॥ १४१ ॥
रेचितौ च तथा ' हस्तौ तत्सर्पितमुदाहृतम् । यदि ‘ अंचित ' दशा में दोनों पैरों को हटाया जाए, मस्तक ' परिवाहित ’ मुद्रा में तथा दोनों हाथ ' रेचित ' मुद्रा में रखे तो ' सर्पित ' करण कहलाता है ॥ नूपुरं चरणं कृत्वा दण्डपादं प्रसारयेत् ॥ १४२ ॥
क्षिप्राविद्धकरं चैव दण्डपादं तदुच्यते । यदि चरण ' नूपुर ' चारी के बाद ' दण्डपाद ' चारी का प्रदर्शन करे, हाथ को शीघ्रता से ' आविद्ध ' में प्रदर्शित करता चले तो ' दण्डपाद ' करण कहलाता है ॥ १४२-१४३ ॥ अतिक्रान्तक्रमं कृत्वा समुत्प्लुत्य निपातयेत् ॥ १४३ ॥
जङ्घाञ्चितोपरि क्षिप्ता तद्विद्याद्धरिणप्लुतम् । यदि अतिकान्त चारी को प्रदर्शित कर एक उछाल ले फिर ठहर १. करणं - ग ० । २. अन्तरापसृती क ०, ख ० । ३. करो यत्र - घ ० । ४. क्षिप्तविद्ध - ख ०; क्षिप्रविद्ध ग ०, घ ० । ५. अतिक्रान्तं क्रमं - घ ० । ६. निवर्तयेत् — ग ० ।
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999 जाए और फिर एक जंघा सिकुड़ा ( अंचित ) कर ऊपर उछाली जाए तो उसे ' हरिणप्लुत ' करण कहते हैं ॥ १४३-१४४ ॥ दोलापादक्रमं कृत्वा समुत्प्लुत्य निपातयेत् ॥ १४४ ॥
परिवृत्तं त्रिकं चैव ' तस्प्रेङ्कोलितमुच्यते । यदि दोलापादचारी का प्रदर्शन कर एक उछाल लेकर चरण को नीचे पटके और त्रिकको एक घुमाव ( भ्रमरी चारी के लक्षणानुसार ) दे दे और फिर स्थिर हो जाए तो ' खोलित ' करण कहते हैं ॥ १४४-१४५ ॥ भुजावूर्ध्वविनिष्क्रान्तौ हस्तौ चाभिमुखाङ्गुली ॥ १४५ ॥
बद्धा चारी तथा चैव नितम्बे करणे भवेत् । यदि दोनों भुजाओं को सिर के ऊपर उठाए और हाथों की अंगुलियों को सामने की ओर रखते हुए ' बद्धा ' चारी को पैरों से प्रदर्शित करे तो " नितम्ब ' करण जानो ॥ १४५-१४६ ॥ दोला पादक्रमं कृत्वा हस्तौ तदनुगावुभौ । १४६ ॥ रेचितौ घूर्णितौ वापि स्खलितं करणं भवेत् । यदि पैरों से ‘ दोलापाद ' चारी का प्रदर्शन कर ' रेचित ' मुद्रावाले हाथों का नाट्यप्रयोग के अनुसार चारी ओर घुमा दे तो ' स्खलित ' करण कहते हैं ॥ एको वक्षः स्थितो हस्तः प्रोद्वेष्टिततलोऽपरः ॥ १४७ ॥
अश्चितश्चरणश्चैव प्रयोज्यः करिहस्तके । यदि बायाँ हाथ वक्षःस्थल पर ( और ) दूसरे ( दाहिने ) हाथ की हथेली प्रोद्वेष्टित ( क्रिया वाली ) हो तथा पैर ' अंचित ' मुद्रा में रखा जाए तो वह करण ' करिहस्त ' कहलाता है ॥ १४७-१४८ ॥ एकस्तु रेचितो हस्तो लताख्यस्तु तथा परः ॥ १४८ ॥
प्रसर्पिततली ' पादौ प्रसर्पितकमेव तत् । यदि एक हाथ रेचित दूसरा लता मुद्रा में और पैर ' तलसं चर १. चैतत् तत्प्रेङ्खो- - घ ० । २. वामो वक्षः स्थितो- ग ० । ३. लतास्यश्व - घ ० । ४. संसर्पिततली - ग ० ।