भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 291–300
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 291–300
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१६२ नाव्यशास्त्रम् ' प्ररोचना – यदि सूत्रधार या नाट्यविशेषज्ञ द्वारा रूपक के कार्यों का हेतु तथा युक्ति की सहायता लेकर सिद्धसदृश कथन किया जाय तो ( उसे ) ' प्ररोचना ' कहते हैं ॥ २ ९ ॥ बहिर्गीत ( लक्षण, उत्पत्ति तथा कारण ) -अतः परं प्रवक्ष्यामि ह्याश्रावणविधिक्रियाम् । बहिर्गीतविधौ सम्यगुत्पत्ति कारणं ' तथा ॥ ३० ॥
अब मैं ' आश्रावण ' ( विधि ) के विषय में बतलाता हूँ जो ( कि ) ' बहिर्गीतविधि ' में होती है, साथ ही मैं इसकी उत्पत्ति तथा कारण भी बतलाता हूँ ॥ ३० ॥
चित्रदक्षिणवृत्ते तु सप्तरूपे प्रकीर्तिता । सोपोद्दने सनिर्गीते देवस्तुत्यभिनन्दिते ॥ ३१ ॥ क
नारदाद्यैस्तु गन्धर्वैः सभायां देवदानवाः ।
निर्गीतं श्राविताः सम्यग्लयतालसमन्वितम् ॥ ३२ ॥
जब नारद मुनि आदि वाद्यविशारदों और गन्धवों के द्वारा चित्र और दक्षिणमार्ग से युक्त, सप्तरूप समन्वित उपोहन क्रिया और निर्गीत के साथ देवताओं की स्तुतियों से प्रशस्त स्वरूप वाले तथा लय और १. प्ररोचना - अभिनव के अनुसार नाट्यवस्तु के फलरूप में जो सिद्ध करना इष्ट है उसको उद्देश्य के साथ व्यंजित करना ' प्ररोचना ' है । यह मुख्य वस्तु को स्थापित करने से सामाजिकों के मन में कौतूहल तथा आकर्षण ( प्रीति ) को उत्पन्न करती है । प्ररोचना का विवरण ना ० शा ० ५।१४१-१४२ पर भी द्रष्टव्य । २. चित्र, दक्षिण तथा वार्तिक ये तीन मार्ग हैं । यहाँ सप्तरूप का आशय है मद्रक आदि सात गीतों का विधान । निर्गीत अर्थात् बहिर्गीत । उपोहन से गीत की प्रवृत्ति होती है तथा वह स्थायी स्वराश्रित बनता है । इस विषय का विस्तार ना ० शा ० अध्याय ३१ पर पुनः द्रष्टव्य है । १. करणं ग ०, घ ० । २. चित्तदक्षिणवृत्ती - ग ०, घ ० । ३. प्रवर्तिते - ग ०, घ ० । Or one on 19
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पञ्चमोऽध्यायः १६३ ताल के उचित मेल से युक्त उस निर्गीत ( गीत की धुन ) को देवता और दानवों की सभा में सुनाया गया ॥ ३१-३२ ॥ दैत्य तथा राक्षसों का क्षोभ-तच्छ्रुत्वा तु सुखं ' गानं देवस्तुत्यभिनन्दितम् । अभवन्क्षुभिताः सर्वे मात्सर्यादैत्यराक्षसाः ॥ ३३ ॥ I I
तब इस सुखप्रद तथा देवों की स्तुति और अभिनन्दन से युक्त गीत को सुनकर सभी दैत्य तथा राक्षसगण क्षुब्ध हो गए ॥ ३३ ॥
सम्प्रधार्य च तेऽन्योन्यमित्यवोचन्नवस्थिताः ।
निर्गीतं तु सवादित्रमिदं गृह्णीमहे वयम् ॥ ३४ ॥
सप्तरूपेण सन्तुष्टा देवाः कर्मानुकीर्तनम् ।
वयं गृह्णीम निर्गीतं तुभ्यामोऽत्रैव सर्वदा ॥ ३५ ॥
ते तत्र तुष्टा दैत्यास्तु साधयन्ति पुनः पुनः । तब दैत्य गण परस्पर विचार करते हुए बोले - हम वाद्यों से समन्वित इस ' निर्गीत " से प्रसन्न हैं तथा इसे ही ग्रहण करेंगे । जो सप्तरूपों से युक्त ' गीत ' हैं और इन देवगणों के कर्मों के अनुवादक हैं- उनसे देवगण ही प्रसन्न हों व उन्हें श्रवण करते रहें । हम इस ' निर्गीत ' को ही ले लेते हैं और इसी से संतुष्ट हैं । इस प्रकार तुष्ट दैत्यों ने निर्गीत को ले लिया और इसकी ' साधना ' ( एवं प्रयोग ) करने लगे ॥ ३३-३६ ॥ १. निर्गीत में सार्थक शब्द नहीं होते परन्तु ताल आदि से युक्त धुन के होने से देवगण ने इसमें अपनी प्रशंसा की कल्पना की तथा प्रसन्न हो गये और देवगण के प्रतिद्वन्द्वी होने से राक्षस क्षुब्द हो गये ( यह आशय है ) । २. सप्तरूप – सप्तरूप हैं विस्तार, व्यञ्जना, आविद्ध, करण, संज्ञा, धातु तथा वाद्य । ये ( तालों के ) सात प्रभेद ही सप्तरूप है । इनका स्वरूप ना ० शा ० अ ० ३१ पर पर भी द्रष्टव्य । १. समं -- ०; शुभं -- घ ० । २. एवं ग ० । ३. च वयम् ग ० ।
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१६४ नाट्यशास्त्रम् # निर्गीत ' के निवारणार्थ देवताओं की नारद से भेंट-रुष्टञ्चापि ततो देवाः प्रत्यभाषन्त नारदम् ॥
पते तुष्यन्ति निर्गीते दानवाः सह राक्षसैः ।
प्रणश्यतु प्रयोगोऽयं कथं वा मन्यते भवान् ॥
तब देवगण इस बात से रुष्ट हो पुनः नारद मुनि से ये दानव तथा राक्षसगण केवल निगत से ही सन्तुष्ट हैं ३६ ॥ ३७ ॥ बोले – हे मुने, तथा अन्य वस्तु ( जैसे कि ' गीत ' आदि ) को नहीं चाहते । अतएव हम इस निर्गीत-प्रयोग को नष्ट करना चाहते हैं । आपका इसमें क्या विचार
नारद द्वारा देवगण को आश्वासन-देवानां वचनं श्रुत्वा नारदो वाक्यमब्रवीत् ।
धातुवाद्याश्रयकृतं निर्गीतं मा प्रणश्यतु ॥
किन्तूपोहनसंयुक्तं धातुवाद्यविभूषितम् ।
भविष्यतीदं निर्गीतं. सप्तरूपविधानतः ॥
निर्गीतेनावबद्धाश्च दैत्यदानवराक्षसाः ।
न क्षोभं न विघातञ्च करिष्यन्तीह तोषिताः ॥
है ॥ ३६-३७ ॥
३८ ॥
३ ९ ॥
४० ॥
देवताओं के इन वचनों को सुन नारद बोले— ' निर्गीत ' जो कि ( विस्तार आदि ) धातुवाद्यों के आश्रित हैं, नष्ट नहीं होना चाहिए । किन्तु यही उपोहन ( क्रिया ) तथा धातु वाद्यों से युक्त होकर सप्तरूपों को विधिवत् धारण करेगा और दैत्य तथा दानव गण इस निर्गीत ‘ ' ( के आकर्षण ) से आवद्ध रहने के कारण क्षोभ तथा विघात को ( नाट्य-प्रयोग के अवसर पर ) नहीं करने पायेंगे ॥ ३८-४० ॥ १. निर्गीत - जो केवल वाद्यों की धुन ( Tuning ) हो । २. यह निर्गीत के धातुवाद्याश्रित प्रयोग को देवगण के प्रिय गीत के सप्तरूप विधान से संयुक्त कर ' बहिगीत ' की संज्ञा दी गयी । इस प्रकार नारदमुनि ने निर्गीत तथा सप्तरूप गीतों के मिश्रण से दोनों पक्षों को प्रसन्न करने का उपक्रम किया यही प्रतीत होता है । १. बंग ० ॥ २. सप्तरूपे - ख ० । १३. बंद्धास्तु – ग ० ।
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पञ्चमोऽध्यायः १६५
एवं निर्गीतमेतत्तु ' दैत्यानां स्पर्द्धया द्विजाः ।
देवानां बहुमानेन बहिर्गीतमिति स्मृतम् ॥ ४१ ॥
हे मुनिजन, इस प्रकार यही ' निर्गीत ' जो दैत्यों के वृथाभिमान की शान्ति हेतु निर्मित किया गया जब देवगण द्वारा सम्मान अर्जित करेगा तो ‘ बहीर्गीत ' कहलाने लगेगा ॥ ४१ ॥
धातुभिश्चित्रवीणायां गुरुलध्वक्षरान्वितम् ।
वर्णालङ्कारसंयुक्तं प्रयोक्तव्यं बुधैरथ ॥ ४२ ॥
इस ( निर्गीत ) का धातुतन्तुओं से युक्त ' चित्रवीणा पर निपुण वादकों द्वारा वर्ण, अलंकारों तथा गुरु एवं लघु वर्णों ( अक्षरों ) युक्त प्रयोग किया जाए ॥ ४२ ॥
निर्गीतं गीयते यस्मादपदं वर्णयोजनात् ।
असूयया च देवानां बहिर्गीतमिदं स्मृतम् ॥ ४३ ॥
यह शब्द या पद रहित केवल निरर्थक वर्णों की योजना से गाये जाने के कारण ‘ निर्गीत ' कहलाता है और यही देवगणों की असन्तुष्टि के कारण ' बहिर्गीत ' भी कहलाता है ॥ ४३ ॥
निर्गीत ( या बहिर्गीत ) से देवगण आदि का सन्तुष्ट होना-निर्गीतं यन्मया प्रोक्तं सप्तरूपसमन्वितम् । उत्थापनादिकं यश्च तस्य कारणमुच्यते ॥ ४४ ॥
जो ' निर्गीत ' का स्वरूप सप्त - रूपों से युक्त मैंने बतलाया तथा उत्थापनादि का जो मैंने अभिधान किया; अब मैं उसका कारण बतलाता हूँ ॥ ४४ ॥
१. चित्रवीणा - ' नाटयोप रञ्जनार्था या वीणा सा ' ( अभि ० भा ० ) अर्थात् जो साततन्त्री की तथा नाट्यप्रयोग के अवसर पर परमोपयोगी हो ऐसी वीणा आजकल प्रचलित ' विचित्रवीणा ' ( जिसका दक्षिण में बहुत प्रचार है ) इसके योग्य प्राचीन स्वरूप को लिए हुए नहीं होगी, यह सहज ही कल्पना होती है । चित्रवीणा का स्वर गम्भीर होता था तथा पर्याप्त अभ्यास द्वारा ही उसमें दक्षता अर्जित की जा सकती है । क्योंकि यह अंगुली द्वारा बजायी जाती थी । जो एक तम्बूरे जैसा ही होना लगती है । १. भवन्तु — ग ० । २. बहु -ग ० । ३. मिदं ग ० ।
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१६६ नाट्यशास्त्रम् [ प्रत्याहारे ' यातुधानाः प्रीयन्ते सह 1 तुष्यम्स्यप्सरसस्तत्र कृतेऽवतरणे द्विजाः ॥ तुष्यन्त्यपि च गन्धर्वा आरम्भे सम्प्रयोजिते ॥ ]
आश्रावणायां युक्तायां दैत्यास्तुष्यन्ति नित्यशः ।
वक्त्रपाणी कृते चैव नित्यं तुष्यन्ति दानवाः ॥
परिघट्टनया तुष्टा युक्तायां रक्षसां गणः सङ्घटनक्रियायां च तुष्यन्त्यपि च गुह्यकाः मार्गासारितमासाद्य तुष्टा यक्षा भवन्ति हि गीतकेषु प्रयुक्तेषु देवास्तुष्यन्ति नित्यशः वर्धमान ' प्रयुक्ते तु रुद्रस्तुष्यति सानुगः तथा चोत्थापने युक्ते ब्रह्मा तुष्टो भवेदिह तुष्यन्ति लोकपालाश्च प्रयुक्ते परिवर्तने नान्दीप्रयोगेऽथ कृते प्रीतो भवति चन्द्रमाः युक्तायामवकृष्टायां प्रीता नागा भवन्ति हि तथा शुष्कावकृष्टायां प्रीतः पितृर्गणो भवेत् रङ्गद्वारे प्रयुक्ते तु विष्णुः प्रीतो भवेदिह जर्जरस्य प्रयोगे तु तुष्टा विघ्नविनायकाः तथा चार्य प्रयुक्तायामुमा तुष्टा भवेदिह महाचार्या प्रयुक्तायां तुष्टो भूतगणो भवेत् ४५ ॥
।
॥ ४६ ॥
॥। ४७ ॥
।
॥ ४८ ॥
॥। ४ ९ ॥
।
॥ ५० ॥
॥। ५१ ॥
॥। ५२ ॥
( प्रत्याहार के प्रयोग से राक्षसगण सप सहित प्रसन्न होते हैं, ' अवतारणा ' द्वारा अप्सराएँ प्रसन्न होती हैं तथा ' आरम्भ ' के विधिवत् प्रयोग करने से ' गन्धर्व ' प्रसन्न होते हैं ) ' आश्रावणा ' के प्रयोग से सदा १. एतत् साधंपद्यम् ग ०, ख ० – पुस्तकयोर्नास्ति । २. परिघट्टनायां - घ ० । ३. प्रीता ग ० । ४. वर्धमानप्रयुक्तेषु ग ० ॥ ५. मपकृष्टायां - गं ० ।
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पञ्चमोऽध्यायः १६७ दैत्यगण प्रसन्न होते हैं । ' वक्त्रपाणि ' के द्वारा सदा दानव तथा ' परिघट्टना ' के प्रयोग द्वारा राक्षस ( पुनः ) प्रसन्न होते हैं । संघोटन ' क्रिया के प्रयोग करने पर गुह्यक प्रसन्न होते हैं । ' मार्गांसारित ' के प्रयोग से ' यक्ष ' प्रसन्न होते हैं । गीतों के प्रयोग से देवता होते हैं । ' वर्धमान ( क ) के प्रयोग से अनुचरों सहित ' रुद्रदेव ' प्रसन्न होते हैं । ' उत्थापना ' के प्रयोग से ' ब्रह्मा ' प्रसन्न होते हैं और ' परिवर्तन ' के प्रयोग से लोकपाल आनन्दित होते हैं । ' नान्दी ' के प्रयोग से ' चन्द्रदेव ' प्रसन्न होते हैं । ' अवकृष्टा ' ( ध्रुवा ) के प्रयोग से ' नाग ' प्रसन्न होते हैं तथा ' शुष्कावकृष्टा ' ध्रुवा के प्रयोग से पितरगण प्रसन्न होते हैं । रंगद्वार ' के प्रयोग से ' विष्णु ' तथा जर्जर ( उत्सव ) के प्रयोग से विघ्नों को नष्ट करने वाला नेतृवर्ग ( विघ्नविनायकाः - विघ्नों के विनेता गणेश ) प्रसन्न हो जाते हैं । ' चारी ' के प्रयोग से उमा देवी प्रसन्न होती हैं तथा ' महाचारी ' के प्रयोग से ' भूतगण ' सन्तुष्ट हो जाते हैं ॥ ४५-५२ ॥
प्रत्याहारादि'चार्यम्तमेतद्दैवतपूजनम् ।
पूर्वरङ्गे मया ख्यातं तथा चाङ्गविकल्पनम् ॥ ५३ ॥
इस प्रकार प्रत्याहार से प्रारंभ होकर महाचारी में समाप्त ( पूर्ण ) होने वाले पूर्वरंग के विभिन्न अंग और देवताओं की पूजन विधि मैंने आपको बतलाई ||
देवस्तुष्यति ' यो येन यस्य यन्मनसः प्रियम् ।
तत्तथा पूर्वरङ्गे तु मया प्रोक्तं द्विजोत्तमाः ॥ ५४ ॥
हे मुनियों, इस पूर्वरंग की विधि का वर्णन करते समय देवताओं की जिन अंगों से तुष्टि होती है तथा देवगण जो अंग प्रिय है उन ( सभी पूर्व रंग के ) अंगों को मैंने यहाँ बतला दिया है ॥ ५५ ॥
सर्वदैवतपूजाई सर्वदैवतपूजनम् ।
धर्म्य ' यशस्यमायुष्यं पूर्वरङ्गप्रवर्तनम् ॥ ५५ ॥
१. आश्रावणादि ख ० । २. येन तुष्यति यो देवः - ख ० । ३. धन्यं क ० क कै
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१६८ नाट्यशास्त्रम् जिसमें सभी देवगण की पूजा की जाती है ऐसी पूर्वरंग की यह विधि प्रेक्षकों तथा नाट्यप्रयोक्ताओं को धर्म, यश तथा दीर्घायु को देने वाली ( होती ) हैं ॥ ५५ ॥
दैत्यदानवतुष्ट्यर्थं सर्वेषाञ्च दिवौकसाम् ।
निर्गीतानि सगीतानि पूर्वरङ्गकृतानि तु ॥ ५६ ॥
इस पूर्वरंग में विहित निर्गीत तथा संगीत का प्रयोग दैत्यों को जितना प्रसन्न करते हैं देवगण भी उससे उतने ही सन्तुष्ट हो जाते हैं ॥५६ ॥
या ' विद्या यानि शिल्पानि या गतिर्यश्च चेष्टितम् ।
लोकालोकय जगतस्तदस्मिन्नाटकाश्रये ॥ ५७ ॥
इस जगत में जो विद्याएँ, शिल्प, गतियाँ तथा चेष्टाएँ हैं तथा जो भी प्राणियों के तथा जड़ प्रकृति के स्वरूप हैं वे सभी नाट्याश्रित होकर ( इस ) पूर्वरंग में स्थित ( रहते ) हैं ॥ ५७ ॥
निर्गीतानां सगीतानां वर्धमानस्य चैव हि ।
विधाने कर्मचैव हि ॥ ५८ ॥
आपको मैं इसमें आये हुए निर्गीत, संगीत तथा वर्धमानक के लक्षण तथा प्रयोग को ध्रुवाविधान के ( अ ० २ ९, ३१ में ) समय ( ध्रुवाध्याय ३२ में नहीं ) बतलाऊँगा ॥ ५८ ॥
शुद्धपूर्वरंग में गीत - विधान-प्रयुज्य गीतकविधिं वर्धमानमथापि च ।
गीतकान्ते तचापि कार्या ह्युत्थापनी ध्रुवा ॥ ५ ९ ॥
' गीतों की विधि तथा वर्धमानक के प्रयोग पश्चात् ' उत्थापनी ' ध्रुवा का प्रयोग किया जाए ॥ ५२ ॥
१. गीत तथा वर्धमानक आदि ध्रुवा विधान के अन्तर्गत आते हैं जिनका विशद विवेचन ना ० शा ० अ ० ३१ तथा ३२ में किया गया है । १. पद्यमेतत् ख ० – पुस्तके नास्ति । २. तथैव च ग ० ।
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पञ्चमोऽध्यायः १६ ९
' उत्थापनी ध्रुवा-आदौ द्वे च चतुर्थञ्चाप्यष्टमैकादशे तथा ।
गुर्वक्षराणि जानीयात्पादे ह्येकादशाक्षरे ॥ ६०
चतुष्पदा भवेत्सा तु चतुरस्रा ' तथैव च ।
चतुर्भिस्सन्निपातैश्च त्रिलया त्रियतिस्तथा ॥ ६१
परिवर्ताश्च चत्वारः पाणयस्त्रय एव च ।
जात्या ' चैव हि विश्लोकास्तांश्च तालेन योजयेत् ॥
इस ध्रुवा के पाद में एकादश अक्षर होते हैं ( और ) ॥ ॥ ६२ ॥ उसमें आदि दो, चौथा तथा ग्यारहवाँ अक्षर गुरु होता है । इसके चार पाद होते हैं तथा इसकी चतुरस्र ताल ( चौताल ) होती है । इसमें चार सन्निपात तथा तीन प्रकार की ( द्रुत, मध्य तथा विलम्बित ) लय होती है । यह तीन यतियों ( समा, स्रोतोवहा व गोपुच्छा ) से युक्त होती है । इसमें चार परिवर्त ( पादभागादि युक्त ताल का दुहराना ) और तीन पाणि ( सम, अवर तथा उपरि पाणि ) होते हैं । इसमें जातिवृत्त ( मात्रावृत्त ) १. उत्थापनी ध्रुवा का उल्लेख तथा विवरण ' पूर्वरंग ' में उपयोगी होने से उसका लक्षण भी यहीं दे दिया गया है । इसका विशेष विवरण ध्रुवाध्याय ( ना ० अ ० ३२ ) में नहीं है । २. इस ध्रुवा का लक्षणानुसार क्रम इस प्रकार है - 551 511 15 S ३. चतुरस्रताल अर्थात् चञ्चत्पुट ताल में । सन्निपात सशब्दा क्रिया का एक भेद है जिसमें दोनों हाथों से ताली बजाकर ताल दी जाती है । ताल क्रिया के बीच में रखा गया विश्राम लय कहलाता है । लय के तीन प्रकार होते हैं- द्रुत, मध्य तथा विलम्बित । लय के प्रयोग के नियम को यति कहते हैं । यति भी तीन हैं - समा, स्रोतोवहा तथा गोपुच्छा । इनका विशेष विवरण तथा लक्षण ना ० शा ० अ ० ३११३८, ३६, ३१४, ३१।५३२-५३७ तथा ३२।१४६ पर द्रष्टव्य । ४. परिवर्त कहते हैं गानक्रिया की ( पादभाग आदि से युक्त ताल की ) आवृत्ति या दुहराने को; इसके चार प्रकार होते हैं । ५. ताल के साथ तीन ग्रह या पाणि का प्रयोग होता है जिनके नाम हैं । समपाणि ( समग्रह ), अवरपाणि ( अतीतग्रह ) तथा उपरिपाणि ( अनागतग्रह । १. चतुरस्रे – ग ० । २. जात्यां ग ०
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१७० ' नाट्यशास्त्रम् में विश्लोक ' छन्द होता है और उसी प्रकार का चतुरस्र ताल ( चौताल ) प्रयुक्त किया जाता है ॥ ५ ९ -६२ ॥
शम्या ' तु द्विकला कार्या तालो द्विकल एव च ।
पुनश्चैककला शम्या सन्निपातः कलात्रयम् ॥ ६३ ॥
इसमें होने वाली ताल की ( यथाक्रम ) जो योजना है उसमें दो कला की प्रमाणवाली शम्या, फिर दो कला की ताल, फिर एक कला की शम्या तथा अंत में तीन कला का सन्निपात होता है ॥ ६३ ॥
प्रथम प्ररिवर्त— एवमष्टकलः कार्यः सन्निपातो विचक्षणैः 1 चत्वारः सन्निपाताश्च परिवर्तस्य उच्यते ॥ ६४ इस प्रकार विज्ञातागण ( एक ) सन्निपात को आठ जानें तथा इन चार सन्निपातों से एक ' परिवर्त ' बनता है ॥
पूर्व स्थितलयः कार्यः परिवर्तो विचक्षणैः ।
॥
कलाओं वाला ६४ ॥ तृतीये सन्निपाते तु तस्य भाण्डग्रहो भवेत् ॥ ६५ ॥
नाट्यवेत्ताजन इस प्रथम परिवर्तक ( जो कि पूर्वरंग में होता है ) को विलम्बित लय तथा ( स्थितलय ) में प्रयुक्त करें तथा तीसरे सन्निपात के समय इस परिवर्त में भाण्डवाद्य ( अवनद्धवाद्य संभवतः मृदंग ) का ग्रहण ( वादन या आरम्भ ) किया जाए ॥ ६५ ॥
द्वितीय परिवर्त-एकस्मिन्परिवर्ते तु गते प्राप्ते द्वितीयके ।
कार्य मध्ये तज्ज्ञैः सूत्रधारप्रवेशनम् ॥ ६६ ॥।
१. विश्लोका वृत्त का लक्षण ना ० शा ० ३२।१४६ पर द्रष्टव्य । २. ताल, कला, सन्निपात तथा शम्या के लक्षण ना ० शा ० अध्याय ३१ । ६-११, ३५, ३६, तथा ४० पर भी द्रष्टव्य । १. शम्पा क ० । २. परिवर्तः स ख । ३. स्थितिलयः ग ० । ४. मध्यलयं - ग
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पञ्चमोऽध्यायः १७१ प्रथम ' परिवर्त ' के हो चुकने तथा द्वितीय परिवर्तन के प्रदर्शन के प्रारम्भ ( काल ) में लय को मध्यगति में प्रयुक्त करें ( तथा ) उसी समय मंच पर सूत्रधार का अपने दो ' परिपार्श्विकों के साथ प्रवेश करवाया जाय ॥
पुष्पाञ्जलिं समादाय रक्षामङ्गलसंस्कृताः ।
शुद्धवस्त्राः सुमनसस्तथा चाद्भुतदृष्टयः ॥ ६७ ॥
स्थानन्तु वैष्णवं कृत्वा सौष्ठवाङ्गपुरस्कृतम् ।
दीक्षिताः शुचवचैव प्रविशेयुः समं त्रयः ॥ ६८ ॥
ये तीनों रंगमंच पर एक साथ ही प्रवेश करें । इनकी हस्ताञ्जलियाँ पुष्पों से आपूरित हों — वे विघ्नों की समाप्ति तथा आत्मरक्षार्थ रक्षासूत्र, मंगलसूत्र तथा शुद्धवस्त्रों को धारण किये हों । उनके वस्त्र शुद्ध श्वेतवर्ण के हों । वे पुष्पों से युक्त अंजलि, अद्भुत दृष्टि ( ना ० शा ० अ ० ८ ४८ ) तथा वैष्णवस्थान ( ना ० ११।५०-५२ ) से युक्त हों, उनका शरीर ' सौष्ठव ' शाली हो और वे ( नाट्य कर्मरूपी पुण्यानुष्ठान हेतु ) दीक्षित हों ॥
भृङ्गारजर्जरधरौ भवेतां पारिपार्श्विकौ ।
मध्ये तु सूत्रभृत्ताभ्यां वृत्तः पञ्चपदीं व्रजेत् ॥ ६ ९ ॥
पदानि पञ्च गच्छेयुर्ब्रह्मणो यजनेच्छया ।
पादानाञ्चापि विक्षेपं व्याख्यास्यामि यथाक्रमम् ॥ ७० ॥
इन दो पारिपारिवकों में से एक भृङ्गार ( सोने की सुराही ) तथा दूसरा जर्जर को लिए हुए हो और इन दोनों के मध्य ‘ सूत्रधार ' हो जो इन दोनों के साथ पाँच डग भरते हुए आगे बढ़े । १. इन दो में एक पात्र विदूषक की भूमिका का ' त्रिगत ' में निर्वाह करता है । ( देखिये आगे ५।१३७ - १४१ पर भी ) २. जर्जर का विवरण ना ० शां ० ३।७३ पर भी द्रष्टव्य । १. पुष्पाञ्जली - ग ० । २. पारिपार्श्वको ख ० । ३. ख पुस्तके श्लोकास्यास्य स्थाने ' सूचीं वामपदं दद्याद् विक्षेषं दक्षि-णस्य च ' इति वर्तते ।