भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 301–310

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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१७२ नाट्यशास्त्रम्

पाँच डग भरकर आगे आना ब्रह्मदेव के पूजनार्थ किया जाता है ।

अब इन पाँचों डगों के क्रमशः स्थापन का विधान बतलाता हूँ ॥ ६ ९ -७० ॥

' त्रितालान्तरविष्कम्भ मुत्क्षिपेच्चरणं शनैः ।

पार्श्वोस्थानोत्थितं चैव तन्मध्ये पातयेत्पुनः ॥ ७१ ॥

वे अपने पैर तीन ' ताल के अन्तर से धीरे - धीरे ऊपर की ओर उठाएँ — जो कि प्रत्येक की अपने दिशा की ओर ( बगल की ओर ) हो-तथा उन्हें ( इस प्रकार उठाने के बाद ) फिर उसी अन्तर से भूमि पर टिकाए ॥ ७१ ॥

एवं पञ्चपदी कृत्वा सूत्रधारः सहेतरैः ।

सूचीं वामपदं दद्याद्विक्षेपं दक्षिणेन च ॥ ७२ ॥

( कथित विधानानुसार ) इस प्रकार पाँच डगों को भरकर अपने साथियों सहित सूत्रधार ' सूची ' चारी का प्रदर्शन करे जो कि बाएँ पैर से हो, फिर दाहिने पैर द्वारा ' विक्षेप ' का प्रदर्शन करें ॥ ७२ ॥

पुष्पाञ्जल्यपवर्गश्च कार्यो ब्राह्मेऽथ मण्डले ।

रङ्गपीठस्य मध्ये तु स्वयं ब्रह्मा प्रतिष्ठतः ॥ ७३ ॥

( फिर ) सूत्रधार ' ब्राह्ममंडल ' ( ब्रह्मा द्वारा अधिष्ठित प्रदेश या रंगमंच के मध्यभाग ) पर पुष्पाञ्जलि अर्पित करे । क्योंकि रंगपीठ के मध्यभाग में स्त्रयं ब्रह्मदेव स्थित रहते हैं ॥ ७३ ॥

ततः सललितैर्हस्तैरभिवन्द्य पितामहम् ।

1915 वन्दनान्यथ ' कार्याणि त्रीणि हस्तेन भूतले ॥ ७४ ॥

कालप्रकर्षहेतोश्च पातानां प्रविभागतः । १. ताल – एक कालविभाग । ताल का विशेष विवरण ३१ वें अध्याय में देखिये । ताल दूरी को भी कहते हैं जिसका प्रमाण है मध्यमा उंगली की नोक से कलाई तक की लंबाई की जो एक बालिश्त होता है । १. त्रिकाला ग ० । २. विष्णुपदी - ख ० । ३. गत्वा ग ० । ४. सहेतरः - ख ० । ५. श्लोकार्धमेतत् क ० पुस्तके नास्ति । ६. अभिवन्द्यः पितामहः घ ० । ७. अभिवादनानि कार्याणि घ ० ।

पृष्ठ 302

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पञ्चमोऽध्यायः १७३ फिर वह ब्रह्मा की विनीत भाव व ललित ' हस्त मुद्रा से वन्दना करे । यह वन्दना पृथ्वी पर हाथों को तीन बार स्पर्श करते हुए की जाए और इस समय ( उसके ) पाद- विक्षेप काल का विभाग बतलाते हुए रखे जाएँ ॥ सूत्रधारप्रवेशाद्यो वन्दनाभिनयानुगः ॥ ७५ ॥

द्वितीयः परिवर्तस्तु कार्यो मध्यलयाश्रितः । इस प्रकार ( इस ) द्वितीय परिवर्त को मध्यमलय में प्रयुक्त करे जो सूत्र-धार के प्रवेश से आरंभ होता है तथा ब्रह्म - देव की वन्दना पर समाप्त होता है । ( तथा जिसमें वन्दना तथा ललित मुद्रा का उपयोग किया गया है )!! तृतीय वरिवर्त-ततः परं तृतीये तु मण्डलस्य ' प्रदक्षिणम् भवेदाचमनं चैव जर्जरग्रहणं तथा उत्थाय मण्डलात्तूर्ण दक्षिणं पदमुद्धरेत् वैधं तेनैव कुर्वीत विक्षेपं वामकेन च पुनश्च दक्षिणं पादं पार्श्वसंस्थं समुद्धरेत् ततश्च वामवेधस्तु विक्षेपो दक्षिणस्य च इत्यनेन प्रकारेण सम्यक्कृत्वा प्रदक्षिणम् भृङ्गारभृतमाहूय शौचञ्चापि समाचरेत् यथान्यायं तु कर्तव्या तेन ह्याचमनक्रिया आत्मप्रोक्षणमेवाद्भिः कर्तव्यं तु यथाक्रमम् ॥ ७६ ॥

॥ ७७ ॥

॥ ७८ ॥

॥ ७ ९ ॥

॥। ८० ॥

। १. ललित हस्तचेष्टा नृत्तहस्त का प्रकार है जिसमें दो अलपल्लव हाथ को मस्तक पर संचालित किया जाता है । ( ललित का लक्षण ना ० शा ० ६।२०६ पर भी द्रष्टव्य । ) २. पादविक्षेप चरण का रखना, गिराना या झुकाना । अर्थात् सूत्रधार के द्वारा पृथ्वी पर अपने चरणों को तालमात्रा के प्रमाण से विभाजित करते हुए रखना । १. अतः - ग ० । २. मण्डपस्य — ग ० । ३. तेनैव वेधं - ग ० । ४. विधानेन - घ ० । ५. भृङ्गारधारग ०, घ ० ।

पृष्ठ 303

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१७४ नाट्यशास्त्रम् फिर तीसरे परिवर्त में सूत्रधार ' ब्राह्ममण्डल ' की प्रदक्षिणा करे, आचमन करे और ‘ जर्जर ' का ग्रहण करे । ( जिसका विधान इस प्रकार है ) सर्वप्रथम वह ब्रह्मा के को उठाए, उसी से सूची का, फिर दाहिने पैर को पैर से सूची प्रदर्शन करे प्रकार विधानानुसार कर पारिपार्श्वक को बुलाकर को स्पर्श करते हुए ) स्वयं मण्डल से शीघ्रता से उठकर अपने दाहिने पैर का ' ( वेध ) प्रदर्शन करे तथा बाएँ पैर से ' विक्षेप ' ( अपनी ) कोख की ओर ' उठाए और बाएँ और फिर दाहिने पैर द्वारा ' विक्षेप ' का । इस चुकने पर सूत्रधार भृङ्गार धारण करने वाले एक उस भृङ्गार ( पात्र ) के जल से ( हाथ - पैरों को पवित्र करे और फिर विधानानुसार आचमन कर उसी जल का अपने ऊपर प्रोक्षण करे ॥ ७६-८० ॥ प्रयत्नकृतसूत्रधारेण यत्नतः ॥ ८१ ॥

सन्निपातसमं ग्राह्यो जर्जरो विघ्नजर्जरः ।

प्रदक्षिणाद्यो विज्ञेयो जर्जरग्रहणान्तकः ॥ ८२ ॥

तृतीयः परिवर्तस्तु विज्ञेयो वै द्रुते लये । इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक पवित्र होकर सूत्रधार प्रयत्न पूर्वक उस १. यहाँ वामवेध का अर्थ ' सूची ' चारी किया गया है । सूचीचारी का लक्षण ना ० शा ० ११।३४ पर द्रष्टव्य । वेध का अर्थ अभिनवगुप्ताचार्य ने दूसरे पैर को एड़ी के पीछे पटकना लिया है ( वेधमिति द्वितीयपादपाष्णिपृष्ठे पात-नम् अ ० भा ० Vol. I. २३१ ) । २. दाहिने पैर को कोख है । पार्श्वक्रान्ता का लक्षण ऊपर उठाया जाकर जानु को एक पार्श्व में एड़ी पर पटकते ३. आचार्य अभिनगुप्त प्रदक्षिणा के अवसर पर तथा स्थित रहना चाहिये । की ओर उठाना पार्श्वक्रान्ता चारी हो जाता ना ० शा ० ११।३२ पर है जिसके अनुसार पैर वक्षःस्थल के बराबर रखते हैं और फिर उसे हैं । का मत है कि श्रृंगारधारी पारिपाश्विक को परिवर्त के अवसर पर चुपचाप ( तूष्णींभावेन ) १. सन्निपाते समं ब ० ।

पृष्ठ 304

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पञ्चमोऽध्यायः १७५ ' जर्जर ' का ग्रहण करे जो कि विघ्नों को जर्जरित कर देता है । यह ' जर्जर ' ग्रहण तृतीय परिवर्त के अन्तिम सन्निपात ' के प्रारंभ में ही कर लेना चाहिए । सूत्रधार द्वारा ( ब्राह्ममण्डल की ) प्रदक्षिणा से प्रारंभ जर्जर ग्रहण किया जाने वाला यह तृतीय परिवर्त ' द्रुतलय ' में किया जाए ॥ ८१-८२ ॥ मिक चतुर्थ परिवर्त— ' गृहीत्वा जर्जरं स्वष्ट ' कला जप्यं प्रयोजयेत् ॥ ८३ ॥

वामवेधं ततः कुर्याद् विक्षेपं दक्षिणस्य च ।

ततः पञ्चपदोञ्चैव गच्छेत्तु कुतुपोन्मुखः ॥ ८४ ॥

[ वामवेधस्तु तत्रापि विक्षेपो दक्षिणस्य तु । ] क जर्जरग्रहणाद्योऽयं कुतपाभिमुखान्तकः ॥ ८५ ॥ To

चतुर्थः परिवर्तस्तु कार्यो द्रुतलये पुनः । जर्जर ग्रहण करने के पश्चात् वह आठ कला तक ( मन्त्र का ) जप करे और फिर बाएँ पैर को आगे चढ़ाकर ' सूची ' ( चारी ) का प्रदर्शन करे और ( इसके पश्चात् ) दाहिने पैर से वही विक्षेप प्रदर्शित करे ( अथवा दाहिने पैर द्वारा विक्षेप का प्रदर्शन करे ) फिर संगीत वाद्यों के स्थान की ओर पाँच डग चले और इसके पश्चात् [ वह पुनः बाएँ पैर से सूची और दाहिने से विक्षेप को प्रदर्शित करे । ] यह चतुर्थ परिवर्त जर्जर ग्रहण से प्ररंभ होकर कुतपों के अखिमुख जाने तक किया जाता है तथा इसमें ' द्रुतलय ' रहती है ॥ ८३-८५ ॥ १. अर्थात् जिस समय सूत्रधार तृतीय परिवर्त को सम्पन्न करे उस समय उसी के साथ उत्थापनी ध्रुवा का ( तीसरा परिवर्त ) गान चलता है जिसे द्रुतलय में करना चाहिए और इस तीसरे परिवर्त का अन्तिम सन्निपात जर्जर-ग्रहण के समय चलना चाहिये । २. कला – तालमान के अनुसार पाँच निमेष का काल लघु या एक मात्रा के बराबर होता है और दो लघु या मात्राओं की एक ' कला ' होती है । १. चाष्टी - ख ०; ग ० । २. पद्यार्थमेतत् ख पु ० गपुस्तके च नास्ति । ३. विज्ञेयो वै द्रुते लये – घ ० ।

पृष्ठ 305

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१७६ नाट्यशास्त्रम् शु करपादनिपातास्तु भवन्त्यत्र तु षोडश ॥ ८६ ॥

त्र्यथे द्वादशपातास्तु ' भवन्ति करपादयोः ' ।

वन्दनान्यथ कार्याणि त्रीणि हस्तेन भूतले ॥ ८७ ॥

आत्मप्रोक्षणमद्भिश्च व्यथेनैव विधीयते । ॥

एवमुत्थापनं कार्य ततस्तु परिवर्ननम् ॥ ८८ ॥

इस चतुरर्थ परिवर्त में हाथ तथा पैरों का हलन चलन सोलह निपात का होता है तथा व्यश्र के हलन चलन में बारह निपात माने गये हैं । फिर वह पृथ्वी का स्पर्श करते हुए तीन बार वेदना करें । इसके ( तृतीय परिर्वत के ) पूर्व में यह ( प्रोक्षणादि ) कार्य नहीं किया जाता है । इस प्रकार ' उत्थापना ' ध्रुवा हो जाने पर फिर ' परिवर्तनी ' ध्रुवा का आरंभ करना चाहिए ॥८६-८८ ॥

परिवर्तनी ध्रुवा -चतुर ' लये मध्ये सन्निपातैरथाष्टभिः ।

यस्यां लघूनि सर्वाणि केवलं नैधनं गुरु ॥ ८८ ॥

भवेदतिजगत्यान्तु सा ध्रुवा परिवर्तनी ।

वार्तिकेन तु मार्गेण वाहेनानुगतेन च ॥ ८ ९ ॥

ललितैः पादविन्यासैर्वन्द्याद्देवान् यथादिशम् ।

द्विकलं पादपतनं पादचार्या गतं भवेत् ॥ ९ ० ॥

एकैकस्यां दिशि तथा सन्निपातद्वयं भवेत् ।

वामपादेन वेधस्तु कर्तव्यो नृत्तयोक्तृभिः ।

द्वितालान्तरविष्कम्भो ' विक्षेपो दक्षिणस्य च ॥ ९९ ॥

यह परिवर्तनी ध्रुवा चतुरस्रताल, मध्यलय तथा आठ सन्निपातों से युक्त होती है । इसमें अतिजगती -जाति ( एकादशाक्षर जाति का छन्द ) १. तु द्वादशपदा - ग ० । २. करपादजाः – ग ० । ३. चतुरस्रे - ग ० । ४. निधनं ग ० । ५. वामकेन - ग ० । ६. वन्द्या देवाग ० । ७. पादचय विधीयते - ग ० । ८. विष्टम्भोग ० ।

पृष्ठ 306

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पञ्चमोऽध्यायः १७७ रहती है, अन्तिम वर्ण गुरु होता है तथा चारों पादों में शेष सभी वर्ण लघु रहते हैं । ( इस परिवर्तनी ध्रुवा की गान - वेला में ) सूत्रधार वार्तिक - मार्ग ' से वाद्य ध्वनि तथा ताल के अनुसार ललित - पाद विन्यास करते हुए यथाक्रम दिशाओं को नमस्कार करे । इस उपर्युक्त पादविन्यास ( पादचारी ) में सूत्रधार का प्रत्येक डग दो कला के प्रमाण वाला होना चाहिए तथा प्रत्येक दिशा की ओर रखा गया गति का समय दो सन्निपात का ( प्रमाणवाला ) होता है । नृत्त के संयोजक विद्वान् इसके पश्चात् बाएँ द्वारा सूची का प्रयोग करे तथा दाहिने पैर से विक्षेप का जो कि दो ताल के अन्तर रखी जानी चाहिए ॥ ८८ - ९ १ ॥ दिग्वन्दन-ततः पञ्चपदीं गच्छेदतिक्रान्तैः पदैरथ ततोऽभिवादनं कुर्याद्देवतानां यथादिशम् वन्देत प्रथमं पूर्वी दिशं शकाधिदैवताम् द्वितीयां दक्षिणामाशां वन्देत यमदैवताम् वन्देत पश्चिमामाशां ततो वरुणदेवताम् चतुर्थीमुत्तरामाशां वन्देत धनदाश्रयाम् ( वह ) फिर ' अतिकान्ता " चारी में पाँच डग दिशाओं के अनुसार देवगण का अभिवादन करे । जी हिल । ि ॥ ९ २ ॥

॥ ९ ३ ॥

॥। ९ ४ ॥

भरे और यथा क्रम वह सर्वप्रथम इन्द्र से अधिष्ठित पूर्व दिशा का अभिवादन करे फिर दूसरी दिशा ( दक्षिण ) का - जो कि यमदेव के द्वारा अधिष्ठित है — अभिवादन करे । इसके पश्चात् वह वरुण देव की दिशा ( पश्चिम ) का अभिवादन करे तथा चौथी बार कुबेर से अधिष्ठित उत्तर दिशा की वन्दना करे ॥९ २ - ९ ४ ॥ १. वार्तिकमागं - तीन मार्गों में अन्यतम मार्ग जिसमें एक पदभाग ( कला ) का चार मात्राओं से निर्माण होता हो [ परिवर्तिनी ध्रुवा के सम्पा दन काल में वाद्यवादन के साथ सूत्रधार को डग भरना होता है यह इस विवरण से स्पष्ट ही है । २. अतिक्रान्ताचारी का स्वरूप ना ० शा ० १०१३० पर द्रष्टव्य । १२ ना ० शा ० प्र ०

पृष्ठ 307

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१७८ नाट्यशास्त्रम्

दिशां तु वन्दनं कृत्वा वामवेधं प्रयोजयेत् ।

दक्षिणेन च कर्तव्यं विक्षेपपरिवर्तनम् ॥ ९ ५ ॥

दिशाओं की वन्दना के पश्चात् यह बाएँ पैर से सूची ( वेध ) का तथा दाहिने से विक्षेप का प्रदर्शन करें और फिर उसी पैर से एक परिवर्तन ( गोल घुमाव ) ले ले ॥ ९ ५ ॥

प्राङ्मुखस्तु ततः कुर्यात्पुरुष स्त्रीनपुंसकैः ।

त्रिपद्या ' सूत्रभृदु ' द्रब्रह्मोपेन्द्राभिवादनम् ॥ ९ ६ ॥

फिर वह पूर्व दिशा की ओर मुख करे और पुरुष, स्त्री तथा नपुंसक लक्षणों वाले चरणों से क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव की वन्दना करे ॥ ९ ३ ॥

दक्षिणं तु पदं पुंसो वामं स्त्रीणां प्रकीर्तितम् । 1577

पुनर्दक्षिणमेव स्यान्नाभ्युत्क्षिप्तं नपुंसकम् ॥ ९ ७ ॥

वन्देत पौरुषेणेशं स्त्रीपदेन जनार्दनम् ।

नपुंसकपा तथैवाम्बुज सम्भवम् ॥ ९ ८ ॥

दाहिना पैर पुरुष - पाद, बायाँ हाथ स्त्री - पाद तथा जो पैर अधिक ऊँचा न उठाया जाए वह दाहिना पैर नपुंसक - पाद कहलाता है ॥ ९ ७ ॥ पुरुष - पाद द्वारा शिव को, पाद से विष्णु की और नपुंसकपाद से ब्रह्मा की वन्दना की जाती है ॥ ९ ८ ॥ [ यस्यां लघूनि कार्याणि केवलं नैघनं गुरु । पादे स्वतिजगत्यां हि सा ध्रुवा परिवर्तनी ॥ ] [ जिस अतिजगती छन्द के पाद में केवल अन्त गुरु और शेष लघु रहे उसे परिवर्तनी ध्रुवा समझना चाहिये ] १. त्रिपाद्याग ०, त्रिपदः - घ ० । २. सूत्रधृक् — ग ० ३. वन्दनम् — ग ० । ४. स्त्रीपदमुच्यते - ख । ५. दक्षिणन्तु पदं ज्ञेयं – ग ० । ६. पचमेतत् क पुस्तकें नास्ति ।

पृष्ठ 308

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पञ्चमोऽध्यायः चतुर्थपात्र प्रवेश -परिवर्तनमेवं स्यात्तस्यान्ते प्रविशेत्ततः 1 चतुर्थकारः पुष्पाणि प्रगृह्य विधिपूर्वकम् ॥ ' परिवर्तिनी ध्रुवा ' इसी प्रकार सम्पन्न की जाएं तथा जाने पर फिर एक चौथा - पात्र ( चतुर्थकारः ) पुष्पांजलि प्रवेश करे ॥ ९९ ॥

यथावत्तेन कर्तव्यं पूजनं जर्जरस्य तु ।

कुतपस्य च सर्वस्य सूत्रधारस्य चैव हि ॥

१७ ९ ९९ ॥ उसके समाप्त हो लिए हुए मंच पर १०० ॥ ( फिर ) वह जर्जर का विधिवत् पूजन करे तथा सभी वाद्य और सूत्रधार का भी पूजन करे ॥ १०० ॥

तस्य भाण्डसमः ' कार्यस्तज्ज्ञैः गति परिक्रमः ।

न तत्र गानं कर्त्तव्यं तत्र स्तोभ - क्रिया भवेत् ॥ १०१ ॥

पूजा के समय इसकी वाद्यानुसारी गति रखी जाए । ( अवनद्ध वाद्या-सारी का तात्पर्य यह है कि वह ताल के अनुसार गति रखे ) । इस समय किसी गीत का गान न किया जाए केवल वाद्यवादन ही रहे और गान भी केवल अर्थहीन अक्षरों ( ' स्तोभाक्षरों ) का ही ( यथा थिल्लाना आदि का ) होना चाहिए ॥ १०१ ॥

अवकृष्टा ध्रुवा - गान—

चतुर्थकारः " पूजान्तु स कृत्वान्तर्हितो भवेत् ।

ततो गेयावकृष्टा तु चतुरस्ना स्थिता ध्रुवा ॥ १०२ ॥

इस प्रकार पूजा सम्पन्न कर चुकने पर वह चतुर्थपात्र रंगमंच से १. स्तोभाक्षर या स्तोभक्रिया का अर्थ होता है शुष्काक्षरों का गान । १. चतुष्प्रकार - ग ० । २. भाण्डस्यैव ग ० । ३. गतः ग ० । ४. गीति ग ० । ५. चतुष्प्रकारपूजां तु निष्क्रामेत् सम्प्रयुज्य हि ।

पृष्ठ 309

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१८० नाट्यशास्त्रम् प्रस्थान करे । तदन्तर ' अवकृष्टा " ध्रुवा का चतुरस्रताल तथा विलम्बित ( स्थित ) लय में गान किया जावे ॥ १०२ ॥

गुरुप्राया तु सा कार्या तथा चैवावपाणिका ।

स्थायिवर्णाश्रयोपेता कलाष्टक - विनिर्मिता ॥ १०३ ॥

इस ' अवकृष्टा ' ध्रुवा में सभी वर्ण गुरु होते हैं तथा यह स्थायी ( स्थिर तथा सम स्वर का स्थायी वर्ण अभिधान है जो ना ० शा ० वर्णों बतलाया गया है ) पर आश्रित रहती है । यह आठ कलाओं २ ९ ।१ ९ पर ( २ + ६ = ८ ) से निर्मित तथा अवपाणिक ( द्विकला तथा चंचत्पुट ताल से युक्त होती है ॥ १०३ ॥

चतुर्थ ' पञ्चमश्चैव सप्तमं चाष्टमं तथा ।

लघूनि पादे पान्तु सावकृष्टा ध्रुवा स्मृता ॥ १०४ ॥

ध्रुवा गीत चार पादों तथा दस अक्षरों वाली ( पंक्ति जाति की ) अवकृष्टा होती हैं, जिसमें चतुर्थ, पंचम, सप्तम तथा अष्टम वर्ण लघु होता है ॥ १०४ क

नान्दी-सूत्रधार पठेत्तत्र मध्यमं स्वरमाश्रितः ।

नान्दी पदैर्द्वादशभिरष्टाभिर्वाप्यलङ्कृताम् ॥ १०५ ॥।

पश्चात् सूत्रधार मध्यम स्वर से नान्दी पाठ करे । यह नान्दी इसके आठ या बारह पद वाली होनी चाहिए ॥ १०५ ॥

१. ध्रुवाओं का विशेष स्वरूप ना ० शा ० ३२।१५४-१५ पर देखिये । २. स्थायीवर्ण का लक्षण ना ० शा ० २ ९ ।१६ पर भी देखिये । ३. अवपाणि या अवरपाणि ताल का एक प्रकार होता है । ४. नान्दी के ' पद ' के विषय में अनेक व्याख्याएँ हैं जिनमें कुछ विद्वान्

श्लोक या पद्य के अवयव सुबन्त या तिङन्त को, दूसरे श्लोक - पाद को तथा

अन्य विद्वान उनके अवान्तर स्वरूप वाक्य को पाद शब्द से अभिहित करते हैं । १. श्लोकोऽयं गँ - पुस्तके नास्ति । २. पठेन्नान्दीं ग ० ।

पृष्ठ 310

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पञ्चमोऽध्यायः १८१ नान्दी का उदाहरण: -WBE IPH

नमोऽस्तु सर्वदेवेभ्यो द्विजातिभ्यः शुभं तथा ।

जितं सोमेन वै राज्ञा शिवं ' गोब्राह्मणाय च ॥ १०६ ॥

देवताओं को नमस्कार हो, ब्राह्मणों का कल्याण हो, सोम ( रूप ) राजा की विजय हो तथा गो ब्राह्मणों - का शुभ हो ।

ब्रह्मोत्तरं तथैवास्तु हृता ब्रह्मद्विषस्तथा ।

प्रशास्त्विमां महाराजः पृथिवीं च ससागरांम् ॥ १०७ ॥

ब्राह्मणों की निरन्तर ( विद्याओं में ) उन्नति हो, ब्राह्मणों के शत्रुओं का क्षय हो तथा हमारे महाराज सागरों से घिरी पृथ्वी पर शासन करें ॥ १०७ ॥

राष्ट्र ' प्रवर्धतां चैव रङ्गस्याशा ' समृद्धयतु ।

EIT प्रेक्षाकर्तुर्महान्धर्मो भवतु ब्रह्मभावितः । १०८ ॥

यह राज्य सदा फले फूले और उन्नति करे, इस रंगमंच की आशाओं को ( संभावनाओं, योजनाओं, प्रयोगों इत्यादि की ) समृद्धि हो तथा इस प्रेक्षा - कारक ' ( अपनी ओर से समस्त व्यय कर जनरंजनार्थ नाट्य का आयोजन करने वाले ) सज्जन को वेदों में वर्णित धर्म की प्राप्ति हो ॥ १०८ ॥

काव्य कर्तुर्यशश्चास्तु धर्मश्चापि प्रवर्धताम् ।

इज्यया चानया नित्यं प्रीयन्तां देवता इति ॥। १० ९ ॥

१. प्रेक्षाकार या प्रेक्षाकर्तृ शब्द का अर्थ है अर्थपति जो खेल या नाटक पर होने वाली सारी अर्थव्यवस्था को बहन कर सामान्य जनता के मनोरंज-नार्थ नाटक करवाते हैं । यह अर्थपति ही कर सकते हैं अतएव उनका भी यहाँ निवेश मंगलकामना हेतु किया गया है । प्रेक्षाकर्तृ का दूसरा अर्थ है ' प्रेक्षां करोति कारयति अथवा प्रेक्षायाः कारः कर्तृ वा ' तदनुसार नाट्यप्रदर्शन को निर्देशन आदि द्वारा प्रस्तुत करने वाला सूत्रधार भी प्रेक्षाकार हो सकता है । जिसकी यहाँ मंगलकामना इष्ट है । १. आरोग्यं भोग एव च ० ग ० । २. राज्यं ग ० । ३. रङ्गश्वायं समृध्यताम् — ग ० ।