भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 31–40
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 31–40
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( १६ ) नाट्यशास्त्र का प्रस्तुत संस्करण नाट्यशास्त्र के आलोचनात्मक संस्करण के अभाव ने इसके अनुवाद, व्याख्यान आदि कार्यों को अनेक वर्षों तक सम्भव नहीं होने दिया था, परन्तु जब इसके विभिन्न संस्करण प्रकाश में आये तो अध्ययनकर्त्ताओं को भी प्रोत्साहन मिला और इसी के परिणामस्वरूप नाट्यशास्त्र में वर्णित तत्वों की विवेचना भी साहित्य के विविध क्षेत्रों में दिखाई दी । नाट्यशास्त्र के प्रस्तुत व्याख्यात्मक अनुवाद को भी आलोचनात्मक संस्करण के अभाव ने कई बार विघ्न उत्पन्न किया । जब इस प्रदीप व्याख्या का सन् १ ९ ४८ के लगभग उज्जैन में लेखन आरम्भ हुआ था उस समय केवल बम्बई के निर्णयसागर प्रेस तथा काशी के चौखम्भा संस्करण के साथ बड़ौदा के अभिनवभारती व्याख्या वाले संस्करण के केवल दो खण्ड ( अध्याय -१ से १८ तक ) मात्र उपलब्ध थे । इतनी सामग्री को लेकर जब कार्य आरम्भ हुआ तो सर्वप्रथम पाठों की समस्या उपस्थित थी । कुछ विवादग्रस्त स्थलों को छोड़कर जैसे - जैसे कार्य आगे बढ़ता चला तो एक व्यवस्थित पाठ के संस्करण की आवश्यकता का भी अधिकाधिक अनुभव होने लगा । तब फिर मूलपाठों को व्यवस्थित कर एक आधारभूत मूल पाठ का संस्करण तैयार करते हुए अनुवाद तथा टिप्पणियाँ आदि लिखने का कार्य आरम्भ किया गया जिसमें नाट्यशास्त्र के प्राप्य सभी संस्करण, अन्य नाट्य शास्त्रीय ग्रन्थों तथा नाट्यशास्त्र की अन्य पाण्डुलिपियों आदि का उपयोग किया गया है । नाट्यशास्त्र के पाठों के विषय में योजना इस प्रकार रखी कि जो पाठ नाट्यशास्त्र के प्रामाणिक तथ्य प्रकट करते हों उन्हें सावधानी के साथ मूलपाठ बनाते हुए विद्यमान प्रचलित पाठों को भी अपेक्षित होने पर वहीं अर्थ के साथ दे दिया जाए जिससे दोनों उचित पाठों का एक साथ वाचन संभव हो सके । इसके अतिरिक्त अवशिष्ट पाठों को पाठान्तर टिप्पणी में भी दर्शाया जाए जिससे नाट्यशास्त्र के सभी उपलब्ध पाठान्तरों का समायोजन हो जाए । विवेकाश्रित सम्पादन पद्धति एवं प्रगति-शील शोधन के इसी उपक्रम ने आगे बढ़कर इस कार्य को व्यवस्थित एवं प्रामाणिक बनाया । इस पद्धति में न तो किसी संस्करण विशिष्ट पाठों को स्थापित किया गया है और न ही किसी महत्वपूर्ण पाठ या पाठान्तर को छोड़ा ही गया है । इस पद्धति की प्रेरणा श्री ए ० ए ० मेकडालन द्वारा सम्पादित ' बृहद्देवता ' के कार्य एवं श्री जे ० ग्रोसे के सम्पादित नाट्यशास्त्र के संस्करण से प्राप्त हुई, जिसके विरुद्ध किसी गम्भीर आपत्ति का उठाया जाना हास्यास्पद कहा जाएगा । इसका अन्य कारण अर्थ - संगति भी है जिसका नाट्यशास्त्र की प्रकृति को ध्यान से देखने पर स्वयं विवेकशील जन अनुभव कर सकते हैं ।
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( १७ ) जब इस प्रकार अनुवादात्मक व्याख्यान का कार्य चल रहा था इसी बीच श्री मनोमोहन घोष का अंग्रेजी अनुवाद भी सन् १ ९ ५१ में प्रकाशित हो गया तो पुनः इसके पाठों को भी ध्यान से विचार कर यथोचित रूप में अपने संस्करण के लिए परिगृहीत करना आवश्यक हो गया । उस समय तक किसी हिन्दी व्याख्या की न तो उपलब्धि ही रही और न कहीं से इस कार्य के सम्पन्न करने का इतिवृत्त ही मिला था । निदान कुछ भागों को छोड़कर सन् १ ९५५-५६ में नाट्यशास्त्र के लगभग २८ अध्यायों का अनुवाद कार्य पूर्ण हो गया । सीमित समय के कारण यह कार्य बहुत ही धीरे - धीरे चल रहा था । इसी बीच प्रकृत लेखक का स्थानान्तर जबलपुर के भाषा शोध संस्थान में हो गया जिससे कुछ दिन के लिए नाटयशास्त्र का कार्य बन्द करना पड़ा किन्तु वहाँ के समृद्ध पुस्तकालय एवं शैक्षणिक वातावरण ने नाट्यशास्त्र के दुहराने और विस्तीर्ण टिप्पणी लेखन के कार्य को पुनः बल प्रदान किया तथा इसके साथ अन्य नाट्यशास्त्रीय संस्कृत ग्रन्थों के व्याख्यान लिखने की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा मिला । अन्य नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों तथा नाट्यशास्त्र के इस संस्करण को जब चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय के मर्मज्ञ व्यवस्थापक श्रीकृष्णदास जी गुप्त ने देखा तो वे इन सभी ग्रन्थों के प्रकाशन के लिये उद्यत हो गये । नाट्यशास्त्र को चार खण्डों में प्रकाशित करने की योजना के साथ प्रथमखण्ड का मुद्रण आरम्भ हुआ जो अनेक विघ्नों और अनेक बार स्थान परिवर्तन की बाधा के आ जाने के कारण अधिक समय तक चलता रहा और अब एक लम्बे समय के बाद वर्तमान रूप में विज्ञ समीक्षकों के समक्ष प्रस्तुत हो रहा है । नाट्यशस्त्र का रचयिता परम्परागत प्रसिद्धि के अनुसार नाट्यशास्त्र के रचयिता भरत मुनि हैं । और सभी इनके नाट्यशास्त्र - कर्तृत्व को असन्दिग्धरूप से स्वीकारते चले आ रहे हैं । मुनि भरत स्वयं एक पौराणिक व्यक्ति हैं जिनकी पहुँच देवलोक से भूतल तक वर्णित की गयी है । पुराण आदि में अनेक भरतों का उल्लेख मिलता है - यथा दशरथपुत्र भरत, दुष्यन्तपुत्र भरत, मन्धाता के प्रपोत्र भरत तथा जड़ भरत । इनमें सभी किसी राजवंश से सम्बद्ध होने या अन्य कारणों से उल्लिखित होने से नाट्यशास्त्र के लेखक भरत नहीं हो सकते । पुराणों में उल्लेख होने के कारण भरत मुनि को ऐतिहासिक व्यक्ति की अपेक्षा कल्पित व्यक्ति मानने की स्थिति अधिक बलवती नहीं है । इससे यही निष्कर्ष निक-लता है कि नाट्यशास्त्र के रचयिता मुनि भरत पृथक् अस्तित्वशाली होने के साथ - साथ कल्पित मुनि की अपेक्षा ऐतिहासिक व्यक्ति अधिक माने जाने
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( १८ ) चाहिए । नाट्यशास्त्र के अनुसार मुनि भरत ने ब्रह्मा से नाट्यवेद की उप-लब्धि की तथा अपने एक सौ पुत्रों को नाट्यवेद की शिक्षा दी जिसमें से अनेकों ने बाद में नाट्यशास्त्रविषयक ग्रन्थों की रचनाएँ की थीं । भरत ने स्वयं भी ' महेन्द्र विजय ' ( नाटक ), त्रिपुरदाह ( डिम ) तथा अमृतमन्थन ( समवकार ) नामक रूपकों के अभिनय प्रयोगों को विभिन्न अवसरों पर किया । इसके अतिरिक्त प्रेक्षागृह की रचना के सन्दर्भ में भी ' भरत ' प्रस्तुत को ही अधिक श्रेय प्राप्त है तथा इसी कारण नाट्य - मण्डप के आद्य प्रवर्तक भी भरत मुनि ही मान्य किये जाते हैं । नाट्यशास्त्र के अतिरिक्त परवर्ती नाट्यशास्त्रीय रचनाओं तथा नाटक आदि के साक्ष्यों से भी नाट्यप्रणेता एवं नाट्यशास्त्र के निर्माता के रूप में भरत मुनि का उल्लेख प्राप्त होता है! नाव्यशास्त्रीय रचनाओं से धनिक एवं धनंजय के दशरूपक, नन्दिकेश्वर के अभिनयदर्पण, शारदातनय के भाव-प्रकाशन, अभिनवगुप्तरचित नाट्यशास्त्र की अभिनवभारती टीका, सिंहभूपाल के रसार्णवसुधाकर तथा सागरनन्दी के नाटक- लक्षण - रत्नकोश आदि सभी नाट्यशास्त्रीय रचनाओं में भरत को बड़ी श्रद्धा के साथ नाट्यशास्त्राचार्य के रूप में उल्लिखित किया गया है । भरत मुनि भी महर्षि पाणिनि की तरह नाट्यविद्या के सूत्रकार के रूप में ही परम्परा से प्रसिद्ध हैं । इसी कारण का दूसरा नाम भरतसूत्र भी है । सूत्ररूप में शास्त्रीय तत्वों के नाट्यशास्त्र प्रतिपादन की प्रवृत्ति इस ग्रन्थ की मुख्य शैली है । इन कारणों से भरतमुनि ही नाटयशास्त्र के रचयिता सिद्ध होते हैं । नाट्यशास्त्र में भरत शब्द का अभिनेता, सूत्रधार आदि के लिये भी प्रयोग मिलने के कारण परवर्ती आचार्यों में अनेक भरतों के होने जी आशंका व्याप्त हो गयी तथा इनके आगे वृद्ध तथा आदि भरत जैसे विशेषण लगाये जाने लगे । आचार्य अभिनवगुप्त के समय में भी यही भावना व्याप्त थी कि नाटय-शास्त्र भरतादि प्रणीत है । आचार्य अभिनवगुप्त ने इस भावना का खण्डन कि नाटयशास्त्र का प्रथम प्रणयन सदाशिव फिर ब्रह्मा तथा अन्त में किया ने किया था । अतः इसके प्रणेता क्रमशः आचार्य सदाशिव, ब्रह्मा तथा भरतमुनि थे । भाव प्रकाशन के अनुसार नाटयशास्त्र की द्वादशसाहस्त्री संहिता की भरत आदि भरत या वृद्धभरत ने की थी जिसके कुछ गद्यांश भी उसमें उद्धृत रचना गये हैं । इनसे यही निष्कर्ष निकलता है कि आदि या वृद्ध भरत की किये रचनायें भरत के उत्तर - काल में प्रचलित हुई ( जैसे मनुस्मृति के पश्चात् वृद्ध मनु आदि ), जिनमें भरत शब्द को विशेषण लगाकर नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों को निर्देशित
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( १६ ) किया गया है । इस प्रकार यद्यपि भरत शब्द किसी वंश या जाति परम्परा के लिये चाहे प्रयुक्त हुआ हो पर इससे भरत मुनि के व्यक्तित्व में किसी प्रकार की ' क्षति नहीं हुई । हाँ, इससे इस बात का संकेत अवश्य मिलता है कि नाट्य-' शास्त्र के अनुशीलन के कारण नाट्याचार्यों तथा भरतों की एक अक्षुण्ण परम्परा प्रवहमान रही जिन्हें भरत संज्ञा प्राप्त थी । उसी प्रकार जैसे आज-कल शंकराचार्य पीठ पर अभिषिक्त व्यक्ति की शंकराचार्य संज्ञा हो जाती है । नाट्यशास्त्रीय विवरणों से भरतमुनि के भूतल पर निवास स्थान का भी यत्किंचित् आभास मिल जाता है । नाट्यशास्त्र में हिमालय पर्वत पर अवस्थित भगवान् शिव के आदेश पर तण्डु से ताण्डव का ज्ञान भरत मुनि ने प्राप्त किया था तथा उन्हीं के समक्ष त्रिपुरदाह नामक डिम ( रूपक ) को प्रस्तुत भी किया था । नाटयशास्त्र में हिमालय पर्वत के सहज एवं मनो-मोहक वर्णन के साथ शिव एवं पार्वती के ताण्डव तथा लास्य के विवरणों से यही प्रतीत होता है कि भरत मुनि का आवास ( या आश्रम ) हिमालय पर्वत के किसी क्षेत्र में रहा होगा । कुछ आलोचक हिमालय के अन्तराल में प्राप्त होने वाले वृक्षों आदि के सूक्ष्म विवरणों को काश्मीर के अधिक निकट स्थापित करते हुए भरत मुनि के निवास स्थल को काश्मीर बतलाते हैं तथा यह तर्क भी देते हैं कि इसी कारण प्रायः काश्मीर में ही नाट्यशास्त्र का परम्परागत अध्ययन सर्वाधिक होता रहा था और इसी कारण काश्मीरी विद्वानों में से ही जैसे भट्ट लोल्लट, श्रीशंकुक, भट्टनायक तथा अभिनवगुप्तपाद आदि ने ही नाट्यशास्त्र की व्याख्याएँ लिखी हैं । नाट्यशास्त्र में नाट्य के सहायक तत्वों के रूप में अलंकार, छन्दः शास्त्र तथा संगीत का भी विस्तृत विवेचन मिलता है जिसने भरतमुनि नाट्यविद्या के साथ - साथ अलंकारशास्त्र आदि के भी प्रथम आचार्य हैं यह निर्विवादरूप से सभी आलोचक स्वीकार करते हैं । नाट्यशास्त्र की रचना - शैली नाट्यशास्त्र की विषयगत विविधता एवं व्यापकता पर दृपात किया जाय तो इसमें अनेक शैलियाँ दृष्टिगत होंगी । नाट्यशास्त्र की रचना शैली तथा प्रयोगों को देखकर अनेक विद्वानों ने यह कल्पना की है कि इस ग्रन्थ में रचना के कई स्तर हैं या इसमें प्राप्य गद्य एवं पद्यमयी शैलियों में सूक्ष्म अन्तर विद्यमान है । नाट्यशास्त्र के षष्ठ तथा सप्तमाध्याय के विवेचन में गद्य के साथ पद्य का प्रयोग किया गया है और यही शैली नाट्यशास्त्र में लक्षण, छन्द, प्रवृत्ति, सङ्गीत तथा पात्र आदि के विवेचन में भी दृष्टिगत होती है ।
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( २० ) इस गद्यशैली में ( १ ) गद्य - मय सूत्ररूप में सिद्धान्त- निरूपण, ( २ ) गद्यमय भाष्य करते हुए सूत्रोक्त सिद्धान्त का व्याख्यान तथा ( ३ ) प्रतिपाद्य विषय के निरूपण में आने वाले तथ्यों का निरुक्त या व्याकरण - शैली में निर्व-चन । शास्त्रीय तत्व का निरूपण के लिए प्राचीनकाल में इसी शैली के अन्यत्र भी प्रयोग प्राप्त होते हैं तथा इस शैली की तुलना हम यास्क या पाणिनि के वृत्ति तथा भाष्य ग्रन्थों से कर सकते हैं । इससे यह भी समर्थित होता है कि नाट्यशास्त्र की विवेचना पद्धति भी इसी प्रवृत्ति के कारण प्राचीन परम्परानुकूल है । नाट्यशास्त्र में ( इसी प्रकार ) प्रधानरूप में पद्यात्मक शैली प्रयुक्त है तथा इसका अधिकांश भाग अनुष्टुप् वृत्त में है । ये सभी पद्य सूत्र या कारि-काएँ मानी जाती हैं जिनमें भरतमुनि ने अपना ग्रन्थ ग्रथित किया है । परन्तु इन कारिकाओं के अतिरिक्त अपने विचारों के समर्थन में मुनि ने यथाप्रसङ्ग अनुवंश्य आर्या, श्लोक तथा सूत्रानुविद्ध आर्याओं का उपयोग किया है । इसके अतिरिक्त विषय विवेचन - क्रम में कारिकाओं को उपजाति, आर्या आदि छन्दों में भी रखा गया है । इस प्रकार सूत्र, भाष्य, संग्रह, कारिका एवं निरुक्त जैसी सभी प्राचीन शास्त्रीय पद्धतियों का नाट्यशास्त्र में भी दर्शन होता है । अब हम क्रमशः इन तथ्यों पर विचार करते हैं । आनुवंश्य - श्लोक - आनुवंश्य श्लोक कहने से यही तत्काल प्रतीत होता कि ये श्लोक परम्परा प्राप्त श्लोक हैं । महाभारत में ' यत्रानुवंश्यं भगवान् जामदग्न्यस्तथा जगौ । विश्वामित्रस्य तां दृष्ट्वा विभूतिमतिमानवीम् । ' ( महा वनपर्व ८७-१६ ) तथा मत्स्यपुराण आदि में भी अनुवंश्य श्लोकों की परम्परा मिलती है । जिनके सम्बन्ध में महाभारत के प्रसिद्ध टीकाकार नील-कष्ठ ने ' परम्परागतमाख्यानमानुवंश्यश्लोकम् ' ( महा ० बन ० ८६।१६ पर टीका ) कहकर इन श्लोकों को परम्पराप्राप्त श्लोक निरूपित किया है । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने भी ' अत्रेतिभाष्ये अनुवंशभवो = शिष्याचार्य परम्प-रासु वर्तमानौ श्लोकाख्यो वृत्तविशेषो सूत्रार्थ संक्षेपप्रकटीकरणेन कारिकाशब्द-वाच्यो, भवन्तौ पठति । ' ( अभि ० खण्ड १ पृष्ठ २ ९ १ ) कहकर अनुवंशीय
श्लोकों को परम्परागत आख्यान श्लोक ( ही ) माना है । ये श्लोक पूर्वाचार्यो
की परम्परा से उद्धृत किये गये हैं इस विषय में कोई सन्देह नहीं रहता । इसी प्रकार सूत्रानुविद्ध श्लोकों को भी समझना चाहिए जिनमें सूत्रकारिकाओं में अनुस्यूत सिद्धान्तों का विस्तार ग्रन्थकार द्वारा इष्ट होता है । स्पष्ट है कि ये
श्लोक नाट्यशास्त्रकर्ता द्वारा निर्मित नहीं होंगे ।
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( २१ ) आनुवंशीय आर्याएँ - आनुवंश्य श्लोक के अतिरिक्त भरतमुनि ने आर्याओं को भी उद्धृत करते हुए उन्हें ' सूत्रानुविद्धे ( नुबद्धे ) आयें ' कहा है । स्पष्ट है कि ये आर्याएँ भी पूर्वाचार्यों की परम्परा से गृहीत ही होंगी, भरत-निर्मित नहीं । इनका प्रयोजन सूत्ररूप में अभिहित विषय को सरलता से हृदयङ्गम करवाना है । आचार्य अभिनवगुप्त ने इन आर्याओं को ' लक्षणार्थ पूर्वाचार्यों के द्वारा निर्मित आर्याएँ ' माना है, जिनका आचार्य भरत द्वारा केवल उचित स्थान पर समावेश मात्र किया गया है । इससे विदित होता है । कि ये आर्याएं भी भरत मुनि प्रणीत नहीं हैं । इस तथ्य से आचार्य अभिनव-गुप्त पूर्णतः परिचित थे । नाट्यशास्त्र का स्वरूप प्रथम गद्य में सूत्रशैली में हुआ था जिसका उत्त-रोत्तर विकास कारिका के रूप में हुआ । श्री डॉ ० सुशीलकुमार डे महोदय की यह धारणा अधिक मान्य नहीं की जा सकती । सम्भवतः डॉ ० डे की इसके मूल में यही भावना प्रतीत होती है कि सूत्र गद्यात्मक होता है, पद्यात्मक नहीं, परन्तु ध्यान देने की बात है कि नाट्यशास्त्र से प्राचीनतर ग्रन्थ शत-पथब्राह्मण, गृह्य तथा धर्मसूत्र जैसे ग्रन्थों में भी गद्य - पद्य मिश्रित शैली के प्रयोग प्राप्य हैं । इसलिए नाट्यशास्त्र के गद्य - पद्य विमिश्रित रूप को गद्य से पद्य तक का विकसित रूप नहीं माना जा सकता । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने भी नाट्यशास्त्र की कारिकाएँ सूत्रबद्ध मानकर इसकी गद्य - पद्य विमिश्रित शैली को प्रतिपादित करते हुए इसकी व्याख्या भी की है । अभिनवगुप्त के इसी सिद्धान्त का श्री पी ० वी ० काणे जैसे आधुनिक समीक्षक विद्वान् ने भी अनु-सरण किया है । इस सन्दर्भ में यह भी ध्यान देने की बात है कि भवभूति ने उत्तररामचरित में भरतमुनि को तौर्यत्रिक सूत्रकार कहा है । इसलिये यह असम्भव नहीं जान पड़ता कि नाट्यशास्त्र गद्य - पद्य में निर्मित होने पर सूत्रग्रन्थ न कहा जा सके । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने तो नाट्यशास्त्र को ही भरत सूत्र कहा है । इस प्रकार स्पष्ट है कि नाट्यशास्त्र अपनी शैली आदि की दृष्टि से एक सुनियोजित रचना । जैसे व्यासों की परम्परा पुराण रचना की, इसी प्रकार की भरतों की परम्परा ने नाट्यशास्त्र की रचना की, यह तर्क अधिक सङ्गत नहीं माना जायगा । इसका कारण यह है कि वाल्मीकि का व्यक्तित्व जैसे रामायण के कारण विलुप्त नहीं होता इसी तरह नाट्यशास्त्र रचयिता के रूप में भरत का व्यक्तित्व स्पष्ट रहेगा । नाट्यशास्त्र के पूर्ववर्ती आचार्य आनुवंश्य श्लोक, आर्याएँ आदि पूर्ववर्ती आचार्यों द्वारा निर्मित होने की ३ प्रस्ता ० ना ० शा ० प्र ०
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( २२ ) स्थिति वैसे ही है जैसी आचार्य पाणिनि के प्रथम आचार्य होकर अष्टध्यायी के निर्माण करने के पूर्व भी व्याकरण के अनेक आचार्यों की स्थिति का विद्य-मान होना । यही दशा नाट्यविद्या की भी समझनी चाहिए । भरतमुनि के नाट्यशास्त्रीय उल्लेखों के अतिरिक्त भी ऐसे उल्लेख प्राप्य हैं जिनसे नाट्य-शास्त्र के पूर्ववर्ती नाट्यविषयक ग्रन्थ तथा उनके प्रणेताओं का आभास मिलता है । इनमें सबसे प्राचीन उल्लेख पाणिनि की अष्टाध्यायी में है । जिससे शिला-लिन् तथा कृशाश्व के द्वारा प्रणीत नटसूत्रों का पता चलता है । ये नटसूत्र नाट्यशास्त्रविषयक लौलिक सूत्र ग्रन्थ रहे होंगे । परन्तु इन ग्रंथों के विषय में आज हम अन्धकार में हैं, अतः यह कहना कठिन है कि इनका मूल या प्रति-पाद्य क्या था तथा इनकी शैली कैसी थी । प्रो ० सिल्वा लेवी तथा हिलेब्राण्ट ने इन ग्रंथों को अभिनेताओं के लिये लिखे ग्रन्थ माना है पर बेवर तथा स्टेन-कोनों जैसे विद्वान् इन्हें नर्तक या नटों के लिए लिखित शिक्षासूत्र ग्रन्थ मानते हैं । प्रो ० श्री ए ० वी ० कीथ ने इन दोनों के मतों को मान्य किया । श्री कोनो आदि विद्वानों का यह भी अनुमान है कि भरत ने नाट्यशास्त्र के निर्माण होने पर इन ग्रन्थों का अन्तर्भाव नाट्यशास्त्र में हो जाने के कारण लोप हो गया, जैसे पाणिनि के पूर्ववर्ती वैयाकरणों के ग्रन्थों का अष्टाध्यायी में अन्तर्भाव होकर लोप हो गया था । नटसूत्र के स्वरूप विवेचन के प्रसङ्ग में इन पाश्चात्य विद्वानों ने नट शब्द से बाजीगरी का जो आशय लिया वह बहुत सतही है, क्योंकि नट शब्द की निष्पत्ति नट् धातु से हुई है जिसका अर्थ अभिनय होता है । इसी नट के कर्मों को बतलाने वाला शब्द ' नाट्य ' है । अतः यह मानना कि ये किन्हीं नटविद्या के या बाजीगरी के शिक्षा ग्रन्थ होंगे, अनुभव से परे की कल्पना है । नटसूत्रकार शैलालक ऋग्वेद का चरण ग्रभ्थ था । कात्यायन ने इस चरण के अध्येता को शैलाला शब्द से सम्बोधित किया है । पाणिनि सूत्र की प्रसिद्ध वृत्ति काशिका में इन सूत्रों की वृत्ति में लिखा है कि शिलालिन् तथा कृशाश्व द्वारा जो चरणों का विकास हुआ उसे आमना-यवत् पवित्रता प्राप्त थी । नाट्यशास्त्र को भी आम्नायवत् माना गया है । इससे यह भी प्रतीत होगा कि भरत को ये ग्रन्थ अवश्य उत्तराधिकार में शास्त्र-परम्परा से प्राप्त हुए होंगे । नाट्यशास्त्र में भी प्रसङ्गवश अनेक आचार्यों का उल्लेख मिलता है, जो इन आचार्यों की भरत पूर्वस्थिति का निदर्शक है । इस सन्दर्भ में शब्द लक्षण के प्रसङ्ग में पूर्वाचार्य, गान्धर्व के प्रसङ्ग में स्वाति, छन्द निरूपण के प्रसङ्ग में गुह, ध्रुवाओं के निरूपण के प्रसङ्ग में नारद, अङ्गहार तथा करण के प्रसङ्ग में तण्डु तथा नन्दी और मानवीय गुणों के प्रसङ्ग में बृहस्पति का आचार्य
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( २३ ) के रूप में उल्लेख मिलता है । इसके अतिरिक्त नाट्योत्पत्ति के प्रसङ्ग में भरत ने अपने एक सौ पुत्रों का उल्लेख किया है जिनमें नाट्यप्रयोक्ता तथा शास्त्र-प्रणेता पुत्रों का भी उल्लेख है । इन पुत्रों में कोहल, दत्तिल, अश्मकुट्ट, बाद-रायण और शातकर्णी आचार्य के रूप में विदित होते हैं । इनमें कोहल के विषय में यह भविष्यवाणी भी की गई है कि वह नाट्यशास्त्र के अवशिष्ट तत्वों पर अपना शास्त्रग्रंथ रचेगा तथा यह भी कि शांडिल्य, धूतिल तथा वात्स्य दारा मनुष्यों की बुद्धि के विकास के लिये नाट्यशास्त्र पर और भी ग्रन्थ लिखे जायेंगे । अब क्रमशः इन आचार्यों के विषय में ज्ञात सामग्री के आधार पर नीचे थोड़ा परिचय दिया जा रहा है । भरतमुनि के समकालीन नाट्यशास्त्रकार आचार्य कोहल - नाट्यशास्त्र में उल्लिखित भरतपुत्रों में सर्वप्रथम कोहल ' आते हैं. जो सर्वाधिक सम्मानप्राप्त आचार्य हैं तथा अग्रगण्य भी । नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में भरतपुत्रों में कोहल का साधारण उल्लेख मिलता है किन्तु १. आचार्य अभिनव की तर्कना तथा नाट्यशास्श में कोहल के उत्तरा-धिकारी होने के उल्लेख से जो निष्कर्ष निकलता है उससे यह प्रतीत होता है । कि नाट्यशास्त्र की रचना के समय भरत अतिवृद्ध हो चुके थे तथा इसी कारण उन्हें मुनि संज्ञा भी मिली थी । किन्तु उस समय उनके पुत्र कोहल युवा थे तथा अपने पिता द्वारा अध्यापित नाट्यवेद में प्रगाढ़रुचि एवं दक्षता के कारण इस शास्त्र पर अपने निश्चित दृष्टिकोण को स्वतन्त्र भी रखते होंगे जो भरत मुनि से मत विभेद लिये हुए था तथा जिनका अभिनव ने यत्र - तत्र उल्लेख भी किया है । यदि इन तथ्यों को ध्यान में रखा जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि जब भरत मुनि का वर्तमान ग्रंथ भरतसूत्र समाप्ति पर था तभी भरत अतिवृद्ध हो चुके थे । निरन्तर लेखन में अशक्ति के कारण नाट्यशास्त्र के अवशिष्ट विषयों पर जो कि अभी तक प्रतिपादित विषय से कम महत्व के नहीं थे — लिखने में असमर्थ से हो गये थे । किन्तु इस समय तक कोहल ने नाट्यविद्या के आचार्य के नाट्यशास्त्र के अवशिष्ट विश्वास था । इस समय रखता था । इस कारण की भविष्यवाणी के साथ ने नाट्यशास्त्र के शेषांश ग्रंथों के रूप में प्राप्त है । रूप में पर्याप्त ख्याति प्राप्त कर ली थी तथा इसकी विषयों पर लिखने की क्षमता का भी मुनि को कोहल स्वयं भी शेष विषयों पर लिखने की योग्यता भरत ने अपने ग्रन्थ को अपने पुत्र द्वारा शेषांश पूर्ति ही पूर्ण कर दिया होगा । इसके बाद आचार्य कोहल का प्रणयन किया, जो आज उनके नाम से पृथक्
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( २४ ) के अन्तिम अध्याय में कोहल आचार्य के रूप में भरत के उत्तरा-नाट्यशास्त्र निरूपित किये गये हैं । आचार्य कोहल ने सङ्गीत, नृत्य तथा अभि-धिकारी नय से सम्बद्ध स्वतन्त्र ग्रंथों की रचना की थी । आचार्य अभिनवगुप्त ने अनेक स्थानों पर कोहल के मत का उल्लेख किया है तथा कोहल को आचार्य भरत भी माना है । इसी कारण अनेक प्रसङ्गों में आचार्य अभि-का समसामयिक ने कोहल का मत उद्धृत किया है । इसके अतिरिक्त भावप्रकाशन नवगुप्तपाद ने, हेमचन्द्राचार्य ने काव्यानुशासन में, नाट्यदर्पण सूत्र में में शारदातनय ने रूपकों के संख्यावर्द्धन का कर्त्ता कोहल को माना है, जिसने रामचन्द्र - गुणचन्द्र को प्रवर्तित किया । रसार्णवसुधाकर में भरत-नाटिका, सट्टक जैसे नाट्यभेद के रूप में उल्लेख मुनि के साथ कोहल, दत्तिल आदि का स्वतन्त्र नाट्याचार्य किया गया है । राजशेखर ने बालरामायण नाटक में कोहलाचार्य को नाट्य-प्रयोक्ता के रूप में प्रस्तुत किया है । इन सब विवरणों से स्पष्ट हैं कि कोहल भरत मुनि की परम्परा के सर्वाधिक प्रशंसित आचार्य एवं नाट्यप्रयोक्ता रहे होंगे । यद्यपि भरत मुनि के पुत्र होने से भरत के समकालीन कोहलाचार्य को भी माना जाना चाहिये तथापि नाट्यशास्त्र के सम्पादक म ० म ० रामकृष्ण इनका समय ईस्वी पूर्व तीसरी शती मानते हैं । कोहल ने नाट्य के कवि तथा नृत्य एवं सङ्गीत पर अधिकृतरूप से अनेक रचनाएँ की विविध अङ्गों सम्प्रति उद्धरण प्राप्य हैं । सङ्गीत ग्रन्थों में कोहलविषयक विवरण थीं जिनके उद्धरण, शार्ङ्गदेव के सङ्गीत - रत्नाकर एवं उसकी सिंह-तथा उनके विस्तृत की टीकाओं में प्राप्त होते हैं । पार्श्वदेव के संगीत-भूपाल तथा कल्लिनाथ का सङ्गीतशास्त्र के आचार्य के समयसार में कोहल के साथ दत्तिल आचार्य रूप में भी उल्लेख प्राप्त होता है । मद्रास के शासकीय हस्तलिखित ग्रन्थागार कोहलप्रोक्त ग्रन्थ का तेरहवाँ अध्याय विद्यमान है । इसका नाम है ' कोहल-में रहस्य ' । यह ग्रन्थ खण्डित है किन्तु इसमें कोहल का भरतपुत्र के रूप में उल्लेख किया गया है । इसके अतिरिक्त कोहलाचार्य प्रणीत ' कोहलमतम् ' नामक अन्य ग्रन्थ भी मिलता है, जो बहुत अल्प मात्रा में है । इसमें पुष्पा-का केवल स्वरूप मात्र बतलाया गया है । एक अन्य ग्रंथ है - ' कोहली-ञ्जलि लन्दन के इण्डिया आफिस संग्रहालय में विद्यमान है । यह ग्रंथ यम्; ' यह ग्रन्थ के ये सभी ग्रन्थ अपूर्ण तथा अप्रका तालपत्र पर लिखित है । आचार्य कोहल शित हैं । नन्दी या नन्दिन् – नन्दी या तण्डु जिनका अन्य अभिधान नन्दिकेश्वर भी है, भरतमुनि के ताण्डव शिक्षक के रूप में नाट्यशास्त्र में उल्लिखित किये किंचित् भरत पूर्ववर्ती माने जा सकते हैं । आचार्य अभिनव-गये हैं । अतएव का ही नाम या पर्याय माना है । गुप्त ने तण्डु शब्द नन्दी या नन्दिकेश्वर
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( २५ ) इससे स्पष्ट है कि नन्दी ही तण्डु थे, जिनने भरत को उस ताण्डवनृत्य का शिक्षण दिया था जो उन्हें शिव से साक्षात् प्राप्त हुआ था । नन्दी के सुप्रसिद्ध ग्रंथ अभिनयदर्पण से इन्हें नाट्यशास्त्र के आचार्य मानने में कोई कठिनाई नहीं रह गई । नन्दिकेश्वर के अन्य ग्रंथों में ' नन्दिभरतोक्त संकर हस्ताध्याय ' नामक ग्रन्थ हस्तलिखित रूप में अपूर्ण प्राप्त होता है । भरत के नाट्यशास्त्र की पुष्पिका में नन्दिभरतप्रणीतं सङ्गीतपुस्तकम् लिखा मिलता है जो भरत के शिष्य होने या नन्दिमत प्रतिपादित करने वाले ग्रंथ में नाट्यशास्त्र को संकेतित करता प्रतीत होता है । इस प्रकार नन्दिकेश्वर का भी नाट्य शास्त्र के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान इससे स्पष्ट है । तुम्बुरु - रेचक, करण, अङ्गहार तथा सङ्गीत के प्रसङ्ग में तुम्बुरु का नाट्यशास्त्र में उल्लेख मिलता है, जो तुम्बुरु को भी नन्दी की तरह भरतमुनि का समकालीन आचार्य सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है । तुम्बुरु नृत्य - संगीत के प्रसिद्ध आचार्य थे तथा प्रत्येक सङ्गीत के अवसर पर इनका सहयोग प्राप्त रहने का उल्लेख पुराणों में प्राप्त होता है । इस प्रकार इनका व्यक्तित्व पौराणिक है यह स्पष्ट है, परन्तु इनके किसी ग्रन्थ या उद्धरणों की प्राप्ति आज तक नहीं हुई । काश्यप 1 — कोहल के समान काश्यप मुनि भी भरताचार्य के समकालीन संगीत तथा नाट्यशास्त्रकार थे । आचार्य अभिनवगुप्त इन्हें भरत के समान प्रतिष्ठित आचार्य मानते थे । इनने काश्यप का लम्बा उद्धरण अभिनवभारती में दिया है जिसमें जातियों तथा रागों के विषय में शास्त्रकारों के मतों का निदर्शन करवाया गया है । इससे हमें ज्ञात होता कि भिन्न कैशिक, टक्क, सौवीर तथा मालव कैशिक जैसे रागों का क्या स्वरूप है । इस प्रकार भरत-मुनि के समकालीन शास्त्रकारों को रागों का ज्ञान था, यह इससे स्पष्ट हो जाता है । दत्तिल - दत्तिल या दन्तिल भी भरतमुनि के समकालीन शास्त्रकार थे । ` दत्तिल नाट्यविद्या तथा सङ्गीत के प्रामाणिक ग्रंथकार थे । आचार्य अभिनव-गुप्त ने इनका उल्लेख सङ्गीतकलाप्रतिपादक नाट्यशास्त्र अध्याय २८ की व्याख्या में किया है । भरतमुनि के शतपुत्रों में कोहल के बाद दत्तिल का ही क्रम आता है । नृत्तकला के विषय में ' दत्तिल कोहलीयम् ' नामक एक अप्रका शित पाण्डुलिपि तञ्जोर ग्रन्थागार में विद्यमान है जिसमें नृत्यकला का विशद निरूपण है । रसावर्णवसुधाकर आदि ग्रन्थों में दत्तिल का नामोल्लेख मिलता है । म ० म ० रामकृष्ण कवि ने इसके एक अन्य ग्रन्थ गान्धर्व - वेदसार का भी उल्लेख किया है । दत्तिलम् इनका सुप्रसिद्ध एवं सर्वविदित प्राप्य ग्रन्थ है ही ।