भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 21–30

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 21–30

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( ६ ) द्वादशाध्याय में मण्डलों का लक्षण, संख्या तथा प्रयोग आदि का विशद निरूपण किया गया है । त्रयोदशाध्याय में गति प्रचार का निरूपण है । इसमें रसादि के अवसरों एवं अवस्थाओं के अनुकूल पात्रों की गति के विवरण बतलाये गये हैं । इसमें नाट्यप्रयोग के आरंभ में प्रस्तुत होने वाली ध्रुवाओं के गान के ( आरम्भ में ) समय होने वाली पात्रों ( को प्रवेश करते समय ) की गति से लेकर देव, राजा, मध्यवर्ग के स्त्रीपुरुष, निम्न वर्ग के लोगों की गति में लगने वाले समय, रौद्र, बीभत्स, वीर आदि रसों को प्रस्तुत करते समय की भङ्गिमाएँ तथा शीतार्त्त, संन्यासी, मदमत्त तथा उन्मत्त पात्रों के परिचालन के प्रकार तथा गतियों के अभिनय करने का विवरण दिया गया. चतुर्दशाध्याय में रंगमंच पर विद्यमान गृह, उपवन, वन, जल, स्थल आदि प्रदेश को संकेतित करने के निश्चय, समय के अंगानुसारी विभाजन तथा एक वर्ष या एक मास में घटित घटनाओं के लिए नये अंक की योजना; देश, वेषभूषा, आधार आदि पर निर्भर चार प्रकार की प्रवृत्तियों का निरूपण, सुकुमार तथा आविद्ध नामक दो प्रकार के नाटय प्रयोगों का वर्णन तथा अन्त में लोकधर्मी तथा नाट्य धर्मी नामक दो नाट्य विधाओं का निरू-पण है । पंचदशाऽध्याय से वाचिकाभिनय आरम्भ होता है । इसमें आरम्भ के अक्षरों पर आधारित वाणी का नाट्य के वाचिक अभिनय में उपयोग बतलाते हुए अक्षरों के स्वर- व्यञ्जनात्मा विभेद बतलाकर उनके स्थान, प्रयत्न आदि का विवरण दिया गया है । फिर शब्दों की संज्ञा, क्रिया, उपसर्ग, संधियाँ आदि विभेद बतलाकर नाटक में की जानेवाली भाषाओं का शब्द भेद द्वारा विवेचन किया गया है । इसके उपरान्त नाट्य के संवादमय वाचिक अभिनय में प्रयुक्त किये जाने वाले एक से लेकर छब्बीस अक्षरों तक के छन्दों का ( प्रत्येक के भेदोपभेद एवं ) उदाहरण देते हुए निरूपण किया गया है । अन्त में गुरु, लघु तथा यति मात्रा आदि छन्दः शास्त्र के पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या दी गयी है । में भी इसी क्रम में आगे बढ़कर वाचिकाभिनय में उपयोगी षोडषाध्याय वृत्तों का सोदाहरण निरूपण है । अन्त में सम तथा विषम वृत्त बतलाकर आर्या के प्रभेदों का विवरण दिया गया है । सत्रहवें अध्याय में अभिनय के अन्तर्गत काव्य के छत्तीस लक्षणों का विवरण है । इसके उपरान्त उपमा, रूपक, दीपक तथा यमक नामक काव्य के अलंकार का निरूपण करते हुए गुण तथा दोषों का भी निरूपण दिया गया है ।

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( ७ ) अठारहवें अध्याय में नाटकोपयोगी भाषाओं का विवरण देते हुए संस्कृत, " प्राकृत तथा अपभ्रष्ट या देशी शब्द रूपों के उच्चारण भेद द्वारा होने वाले परिवर्तनों का विवरण देकर भाषा एवं विभाषाओं का वर्णन दिया गया है । इनके बोलने के नियम, विराम तथा काकु का प्रयोग तथा देशभेद से प्राकृ-• तादि भाषाओं के ओकारबहुला आदि भेद होना दिखलाया गया है । उन्नीसवें अध्याय में उच्च, मध्य तथा निम्न वर्ग के पात्रों के सम्बोधन करने की विविध प्रणालियों का निरूपण है । इसके अतिरिक्त इन वर्गों के पात्रों के नामकरण के उपाय बतलाते हुए गद्य पाठ्य के गुण; स्वर, व्यञ्जनों के उच्चारण - स्थान, स्वरों के उदात्त आदि प्रकार, काकु के विभेद तथा स्वरों के उच्च, मन्द, दीप्त, भद्र एवं नीच, द्रुत तथा विलम्बित जैसे अलंकारों का विवरण दिया गया है । बीसवें अध्याय में रूपकों के विभेद बतलाते हुए नाट्यशास्त्र के मुख्य विषय का आरम्भ किया गया है । इसमें दस - रूपकों के लक्षण बतलाते हुए उनके वैशिट्य को प्रतिपादित किया गया है । इनके अंगभूत अंक, प्रवेशक, विष्कम्भक, चूलिका आदि का निरूपण करते हुए रूपकों के अन्य संघटक अंगों की चर्चा की गयी है । इक्कीसवें अध्याय में नाटक की कथावस्तु के आधिकारिक तथा प्रासंगिक -भेदों का निरूपण, पंच संधियाँ, पाँच अवस्थाएँ, पाँच अर्थप्रकृतियाँ तथा -सन्ध्यन्तर का विवरण देकर सन्धियों के सभी अंगों के लक्षण बतलाये गये हैं । अर्थोपक्षेपकों के द्वारा कथावस्तु के सूच्य रूप को निरूपित करते हुए उनके पाँच प्रकारों का लक्षण सहित निरूपण किया गया है तथा अन्त में सभी विद्या, शिल्प तथा कला आदि के नाटकोपयोगी होने की बात को दोहराया गया है । बाइसवें अध्याय में नाटकोपयोगी वृत्तियों का निरूपण किया गया है । ये वृत्तियाँ हैं - भारती, सात्वती, कैशिकी तथा आरभटी । वृत्तियों की उत्पत्ति के प्रसंग में विष्णु भगवान के द्वारा मधुकैटभ दैत्यों से युद्ध करने तथा उसमें चारों वृत्तियों के प्रयोग की पौराणिक कथा को लेकर चारों वेदों से चारों वृत्तियों के उत्पन्न होने का विवरण देकर इन वृत्तियों के भेद - प्रभेद तथा -लक्षण बतलाकर विभिन्न रसों में योजना का विवरण दिया गया है । तेईसवें अध्याय में आहार्याभिनय का वर्णन है । आहार्याभिनय नेपथ्य या वेषभूषा पर अवलम्बित होता है, अत एव इसमें आभूषण के स्वरूप के साथ वेषभूषा के प्रदर्शन के विविध उपायों का विववरण दिया गया है । नेपथ्य के चार प्रकार बतलाकर अलंकारों के विवरण देते हुए विभिन्न देशों के निवासी स्त्री - पुरुषों के द्वारा व्यवहार में लिये जाने वाले आपादमस्तक धारण करने

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( = ) एवं उपकरणों यथा - तिलक, अंजन, दन्त एवं ओष्ठराग आदि योग्य अलंकारों के विवरण दिये गये हैं । अंगरचना के प्रकरण में विविध उपकरणों की सजावट राजा, श्रेष्ठि, शक, यवन, शूद्र आदि ) को प्रकट करने पात्रों के जातीय रूप ( जैसे उनके शरीर के अनुरूप रंग में रंगना तथा तदनुसार मूँछ, दाढ़ी आदि के लिए गयी है । सजीव - नेपथ्य का वर्णन तथा उसके की निर्माण विधि बतलायी पशु, पक्षी, सर्प आदि को अन्तर्गत नाट्यमंच पर प्रस्तुत होने वाले विविध प्रस्तुत करने की विधियों का वर्णन किया गया है । अध्याय में सामान्य - अभिनय का निरूपण है । इसमें पात्रों की चौबीसवें प्रकृति का वर्णन है । इसी प्रकार स्त्रियों के उत्तम, मध्यम तथा अधम अयत्नज अलंकारों के अन्तर्गत भाव, हाव तथा हेला का स्वरूप बतलाकर अलंकारों को बतलाया गया है । इसके बाद वाक्याभिनय इनके स्वभावज अभिनय के आलाप, प्रलाप आदि विभेदों को का निरूपण करते हुए वाचिक के अभिनय की बतलाया गया है । इसी प्रकार दर्शन, स्पर्शन आदि क्रियाओं का वर्णन कर उचित तथा अनुचित घटनाओं के मंच पर प्रदर्शित करने विधि गये हैं । विभिन्न स्त्री जातियों के स्वभावादि के आश्रय से के नियम बतलाये दस दशाओं का वर्णन किया गया विभेद बतलाकर अभिलाषा, स्मृति आदि में दूतीप्रेषण आदि का विधान बतलाने के बाद नायिकाओं है तथा कामावस्था किया गया है । इससे अतिरिक्त प्रणय, के अवस्थागत आठ प्रकारों का निरूपण ईर्ष्या की दशा में होने वाले उचित सम्बोधन आदि का यहाँ रोचक क्रोध तथा विवरण दिया गया है । पच्चीसवें अध्याय में वैशिकपुरुष का लक्षण बतलाकर उसके सहजगुणों सम्पादित गुणों का विस्तार से निरूपण किया गया है । इसके मित्र तथा आदि का भी सांगोपांग विवरण देकर स्त्रियों के यौवन को चार तथा दूती के प्रकारों तथा स्त्री को वश में करने के उपायों का अबस्थाओं, प्रेमियों विधिवत् निरूपण किया गया है । छब्बीसवाँ अध्याय चित्राभिनय का है । इसमें सामान्य अभिनय के अन्त-गंत जिन आंगिक आदि अभिनयों का वर्णन छूट गया था ऐसे विशिष्ट अभि-नयों का विवरण दिया गया है । इसके अन्तर्गत आकाश, रात्रि, सायंकाल, अंधकार आदि का प्रदर्शन करने के लिये अभिनयविधि के विवरण देते हुए हर्ष, आदि भाव प्रकट करने की विधियाँ विशिष्टरूप से निर्दिष्ट की गई हैं । शोक आकाशभाषित जैसे सूच्य कथावस्तु के प्रकारों का तात्पर्य प्रकट करते हुए वृद्ध तथा बालकों के सम्भाषण की विधि, आसन्नमृत्यु पात्र के मंच पर प्रस्तुत करने अभिनयों के सम्पन्न करने की विधि निरूपित की गई है । तथा अन्य अनुक्त

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( & ) सत्ताइसवाँ अध्याय सिद्धिव्यञ्जकाध्याय है । इसमें नाट्य प्रदर्शन में होने वाली देवी तथा मानुषी सिद्धि का सांगोपांग निरूपण करते हुए उनमें होने वाले विघ्नों का विवरण दिया गया है । इसी प्रसंग में नाटक प्रदर्शन के निर्णायक या परीक्षकों की विभिन्न श्रेणियों तथा उनकी योग्यता का विस्तार से निरूपण है । अट्ठाइसवें अध्याय से लेकर चौतीसवें अध्याय तक संगीतशास्त्र का विषय प्रतिपादित किया गया है । इस क्रम में अट्ठाइसवें अध्याय में चार प्रकार के वाद्यों का विस्तार से विवरण दिया गया है । स्वरों के सात प्रकार बतलाते हुए उनके वादी आदि चार विभेद निर्दाशत किये गये हैं । इसके अतिरिक्त स्वर ग्राम, मूच्र्छना, श्रुतियों तथा जातियों का विशद विवरण प्रस्तुत किया गया है । उन्तीसवें अध्याय में जातियों के रसाश्रित प्रयोग का विवरण है । वर्ण तथा अलंकारों का स्थायी आदि वर्णों पर आश्रित स्वरूप बतलाया गया है । तथा वीणाओं के स्वरूप आदि पर चर्चा की गयी है । तीसवें अध्याय में बाँसुरी के स्वरूप का विवेचन तथा उसकी वादनविधि बतलाई गयी है । इकतीसवें अध्याय में ताल और लय का सांगोपांग वर्णन करते हुए अव-नद्धवाद्यों का निरूपण किया गया है । इसके अतिरिक्त गीत के समय - निय मन हेतु ताल विधान को विस्तार से निरूपित करते हुए कुछ गौण नाट्य-प्रयोगों का सलक्षण विवरण दिया गया है । बत्तीसवाँ अध्याय ' ध्रुवाध्याय ' है । इसमें पात्रों के प्रदेश आदि अवस्थाओं में गायी जाने वाली ध्रुवाओं का विवरण है । ध्रुवाओं के अधिकांश प्राकृत-भाषा में तथा कुछ संस्कृत भाषा में होने से मुख्यतः ध्रुवाओं की भाषा प्राकृत ( शौरशैनी ) रखने का विवरण दिया गया है । इन ध्रुवाओं के सोदाहरण लक्षणों का प्रतिपादन तथा गायक, वादक तथा बाँसुरीवादक के गुण तथा उनकी योग्यता का निरूपण भी दिया गया है । इसके उपरान्त संगीत के आचार्य तथा शिष्य की योग्यता के विवरण एवं स्वभावतः स्त्री के द्वारा गायन और पुरुषों के द्वारा वादन करने का निर्देश दिया गया है । तैंतीसवां अध्याय ' वाद्याध्याय ' है, जिसमें मृदङ्ग आदि अवनद्धवाद्यों का विवेचन है । इसी में स्वाति तथा नारद के द्वारा अवनद्धवाद्य के प्रवर्तन का आख्यानात्मक विवरण दिया गया है तथा किस अवसर पर किस प्रकार के वाद्यों का वादन किया जाए इसका शिक्षण भी है । वाद्यों के अन्तर्गत मृदङ्ग, पणव, दर्दर आदि वाद्यों के निर्माण तथा वादन आदि का विवरण है. तथा वाद्यों के अधिदेवताओं का भी वर्णन दिया गया है ।

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( १० ) चौतीसवें अध्याय में पुरुष एवं स्त्रियों की त्रिविध प्रकृति का निरूपण करने के साथ ही चार प्रकार के नायकों का सलक्षण वर्णन दिया गया है । नायक परिवार के अन्तर्गत स्त्रियों की विभिन्न श्रेणियों में महादेवी, देवी, नर्तकी, परिचारिका आदि पात्रों का भी स्वरूप बतलाया गया है । नृप, सेनापति पुरोहित मंत्रीगण, सचिव, प्राड्विवाक तथा कुमार का सलक्षण निरूपण है । पैंतीसवाँ अध्याय ' भूमिका पात्र विकल्पाध्याय ' है । इसमें नाट्यमण्डली के सदस्यों का विभाजन करते समय उनकी व्यक्तिगत विशेषाओं को दर्शाया गया है । सुकुमार तथा आविद्ध नामक दो नाट्य प्रयोगों का विवरण देकर सूत्रधार, पारिपाश्विक, अभिनेता, विट, शकार, विदूषक, चेट जैसे पुरुष-पात्रों तथा नायिका, गणिका आदि स्त्रीपात्रों के स्वरूप का विवरण प्रस्तुत किया गया है । छत्तीसवाँ अध्याय अन्तिम है । इस अध्याय में मुनियों ने भरतमुनि से पृथ्वी पर नाट्य के अवतरित होने के विषय में पुनः जिज्ञासा की? मुनि ने इसके उत्तर में दो आख्यान प्रस्तुत किये । प्रथम में भरतपुत्रों के द्वारा मुनि-जनों के उपहासकारी नाट्य से रुष्ट होकर ऋषियों से शप्त हो जाने की तथा दूसरे में इसी कारण राजा नहुष की प्रार्थना पर स्वर्गस्थ नाट्य की भूतल पर अवतरणा होने की कथा है । नाट्यशास्त्र के जिन संस्करणों में ३७ अध्याय है उनमें नहुष की कथा अर्थात् द्वितीय आख्यान ३७ वें अध्याय में रखा गया है । नाट्यशास्त्र के उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि नाट्यशास्त्र अपने विस्तीर्ण क्षेत्र के कारण अपने उत्तरकाल में निर्मित सभी नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों से विशिष्ट बना रहा । इसका कारण है नाट्य से सम्बन्धित सभी विद्याओं का सलक्षण निरूपण करते हुए इसका विश्वकोष के रूप में प्रथित होना! इसमें रूपकों में प्रयुक्त होने वाले अभिनय के ( वाचिक ) छन्दों से लेकर सात्विक, आंगिक तथा आहार्य अभिनय, रूपकों के संघठक तत्वों आदि का सांगोपांग विवरण तथा उनमें प्रयुक्त होने वाले गीत तथा सङ्गीत के उप-करण, वाद्य आदि के विषय में सूक्ष्मतम विवरण दिया गया है । इस प्रकार कला के सूक्ष्म एवं व्यापक विवेचन वाला विश्व में एकमात्र ग्रन्थ होने का भी नाट्यशास्त्र को ही गौरव प्राप्त है । विदेशी एवं भारतीय विद्वानों द्वारा नाट्यशास्त्र पर कार्य जब से श्री विलियम जोन्स के द्वारा सन् १७८ ९ में कालिदास के सुप्रसिद्ध नाटक अभिज्ञानशाकुन्तल का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित हुआ तभी से पश्चिमी

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( ११ ) विद्वानों ने भारतीय रङ्गमञ्च की प्रकृति और उसके उद्गम के विषय में रुचि लेना आरम्भ कर दिया । इसका परिणाम भी थोड़ा आशाजनक बना और इसके बाद सन् १८२६ में श्री एच ० ए ० विल्सन ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ' सेलेक्ट स्पेसीमेन आफ दी हिन्दू थिएटर ' ( Select Specimen of the Hindu Theatre ) में भरतमुनि के नाटयशास्त्र की चर्चा करते हुए लिखा है कि अनेक संस्कृतनाटकों तथा नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों में जिस भरतमुनिप्रोक्त नाट्यविद्या के सूत्र ग्रन्थ के उद्धरण प्राप्त होते हैं, वह ग्रन्थ सम्प्रति न तो प्राप्त है और न ही उसके देखने का अवसर प्राप्त है । इस प्रकार योरोपीय विद्वानों में श्री विल्सन के इस विचार से नाट्यशास्त्र के विषय में निराशा व्याप्त हो चली थी । इसके वाद लगभग चालीस वर्ष तक इस ग्रन्थ के विषय में ( अर्थात् सन् १८६५ ई ० तक ) कोई बात नहीं हुई जब तक श्री एल ० हाल के द्वारा सम्पादित दशरूपक का प्रकाशन ( १८६५ में ) नहीं हुआ । धनञ्जयप्रणीत दशरूपक यद्यपि नाट्यशास्त्र का मध्यकालीन ग्रन्थ था फिर भी नाट्य शास्त्रीय लक्षण - ग्रन्थों में सर्वप्रथम उसी का प्रकाशक सम्भव था । इस ग्रन्थ के प्रकाशन में पर्याप्त समय लगा, परन्तु जब यह ग्रन्थ प्रकाशित होने ही वाला था कि श्री हाल को नाट्यशास्त्र की एक त्रुटिपूर्ण पाण्डुलिपि प्राप्त हो गयी । यह आशा की प्रथम किरण थी । हाल ने उसी पाण्डुलिपि के आधार पर दशरूपक के साथ ' परिशिष्ट ' के रूप में नाट्यशास्त्र के अध्याय १८ से २० तथा ३४ अध्यायों को प्रकाशित कर दिया । इस दशरूपक के प्रकाशन के बाद हाल महोदय ने नाट्यशास्त्र के प्रकाशन का भी विचार किया किन्तु आगे जाकर किसी प्रामाणिक तथा समग्र पाण्डुलिपि के न मिलने के कारण उन्हें निराश होकर इस विचार को छोड़ देना पड़ा । इस प्रकार नाट्यशास्त्र के प्रकाशन का प्रथम प्रयास विफल ही रहा । नाट्यशास्त्र के कुछ अध्यायों के प्रकाशन तथा पाण्डुलिपि की प्राप्ति की श्री हाल की खोज ने उस निराशावादी भावना को नष्ट कर दिया था जो श्री विल्सन के समय से व्याप्त थी । अत एव अनेक विद्वान् उत्साहपूर्वक नाट्यशास्त्र की पाण्डुलिपियाँ खोजने में लग गये । कुछ ही वर्षों बाद जर्मन विद्वान् हँमान ने नाट्यशास्त्र की एक और पाण्डुलिपि प्राप्त की तथा नाट्यशास्त्र पर एक परिचयात्मक लेख भी ( सन् १८७४ ई ० में ) प्रकाशित करवाया । इस निबन्ध के प्रकाशन से विद्वानों में और भी अधिक नाट्यशास्त्रविषयक अभिरुचि उत्पन्न हुई तथा नाट्यशास्त्र के अध्ययन एवं अनुसन्धान को बल मिला । हमान के इस लेख के प्रकाशन के बाद फ्रांसीसी विद्वान् श्री पी ० रेग्नों और उन्हीं के शिष्य श्री जे ० ब्रासेट ने नाट्यशास्त्र के अनुसन्धान को और

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( १२ ) आगे बढ़ाया । श्री पी ० रेग्नों ने सन् १८८० में नाटयशास्त्र चे सत्रहवें अध्याय को तथा सन् १८८४ में पन्द्रहवें ( आंशिक ), सोलहवें तथा छठे और सातवें अध्याय को सम्पादित कर प्रकाशित करवाया । ( इस प्रकार नाट्यशास्त्र के अभी तक कुल आठ अध्याय ही प्रकाशित हो पाये थे ) इसके पश्चात् श्री रेग्नों के ही एक शिष्य श्री जे ० ग्रासेट ने अट्ठाइसवें अध्याय को सम्पादित कर प्रकाशित करवाया जिसमें भारतीय सङ्गीत के सामान्य सिद्धान्तों का विवेचन था । फिर सन् १८ ९ ० में भी ग्रासेट ने नाट्यशास्त्र की विभिन्न पाण्डुलिपियों के आधार पर नाट्यशास्त्र का अध्याय एक से चौदह तक तुलनात्मक संस्करण तैयार कर प्रकाशित करवाया जो पाश्चात्य गवेषणापूर्ण सम्पादन पद्धति का एक आदर्शग्रन्थ होकर अपना महत्व आज भी तथैव आस्थापित कर रहा है । जब विदेश में श्री पी ० रेग्नों तथा जे ० ग्रासे अपने नाट्यशास्त्र के सम्पा दन की योजना बना रहे थे तभी भारत में भी इस महान् ग्रन्थ की पाण्डु-लिपियाँ प्राप्त करने तथा उनके आधार पर एक संस्करण बनाने की योजना ( भारत के ) दो संस्कृत विद्वान् बना रहे थे । ये थे श्री शिवदत्त दाधीच तथा पाण्डुरङ्ग परव जिसने समग्र नाट्यशास्त्र की दो पाण्डुलिपियाँ प्राप्त कर उनके आधार पर इस ग्रन्थ का सम्पादन किया और निर्णय सागर प्रेस बम्बई से सन् १८ ९ ४ में सर्वप्रथम प्रकाशन हुआ । यह कार्य श्री ग्रासेट के अपूर्ण के तुलनात्मक संस्करण के प्रकाशन के भी चार वर्ष पूर्व ही नाट्यशास्त्र भारत में हो गया था तथा यह समग्र नाट्यशास्त्र का प्रकाशन भी था । इसी समय फ्रान्स के प्रथितयशस्क विद्वान् प्रो ० सिल्वालेनी ने इस मूल ग्रन्थ के १५ से २२ अध्याय तथा ३४ वें अध्याय ( जिसका प्रकाशन श्री ' हाल ने अपने ' दशरूपक ' के परिशिष्ट में किया था, उन्हीं अंशों ) का आधार लेकर भारतीय रङ्गमंच के स्वरूप एवं प्रकृति पर एक विवेचनात्मक ग्रन्थ की रचना की । इस ग्रन्थ का नाम था ' थिएटर इण्डियन् ' जिसका प्रकाशन १८६० में हुआ और जो श्री रेग्नों के प्रकाशित नाट्यशास्त्र से भी पूर्ववर्ती ग्रंथ लेखन का प्रयास था । इस ग्रंथ में नाटक के साहित्यिक रूप के अध्य-यन पर विशेष ध्यान दिया गया था और प्रथम बार यहाँ धनञ्जय के दशरूपक तथा विश्वनाथ कविराज के साहित्यदर्पण जैसे परवर्ती नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों के वचनों की नाट्यशास्त्र के आधार पर प्रमाणिकता की समीक्षा की गयी थी । यह किसी नाट्य शास्त्रीय ग्रन्थ के सम्पादन या अनुवाद से भिन्न कार्य था किंतु इस कार्य ने नाट्यशास्त्र के महत्व की ओर विद्वानों के ध्यान अवश्य करने में पर्याप्त सफलता अर्जित की तथा प्राचीन भारतीय नाट्यविद्या आकृष्ट

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( १३ ) के इतिहास को प्रथम लक्ष्यबिन्दु तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण योग दिया । प्रो ० लेबी के उपरान्त जिसने भी नाट्यशास्त्र पर अपने विवेचन या समीक्षायें लिखीं उसने किसी न किसी अंश में लेवी के ग्रन्थ का आधार अवश्य लिया । इस समय तक नाट्यशास्त्र के अधिक आकर्षक न रहने में बाधा थी तो इस ग्रन्थ के मूलपाठ की दुरूहता, क्योंकि इसके आशय को हृदयगंम करने के लिए किसी एक समग्र व्याख्यान का अभाव था । यह अभाव अधिक वर्षों तक नहीं रहा और नाट्यशास्त्र के बम्बई संस्करण के लगभग बीस वर्ष के अन्दर ही मद्रास शासन द्वारा हस्तलिखित ग्रन्थों आदि की खोज के लिए संस्कृत के कुछ प्रतिष्ठित विद्वानों का एक अन्वेषक दल नियुक्त किया गया । इसमें तत्कालीन प्रसिद्ध विद्वानों के अतिरिक्त म. म. रामकृष्ण कवि भी थे, जो इस दल के मुख्य व्यवस्थापक भी थे । यह व्यवस्था तब की गयी कि जब शासन को यह विदित हुआ कि अनेक महत्वपूर्ण, हस्तलिखित संस्कृत ग्रन्थ मलावार के पुस्तकालयों तथा स्वतन्त्र व्यक्तियों के संग्रह में विद्यमान हैं । सन् १६१५ ई ० में इस विद्वत्समुदाय ने मलावार के पुस्तकालयों में विद्यमान ग्रन्थों में नाट्यशास्त्र की अभिनवगुप्तविरचित अभिनवभारती व्याख्या प्राप्त कर ली । इनमें तीन ताड़पत्र पर लिखित ग्रन्थों में अभिनवभारती टीका के अध्याय १ से ३१ तक प्राप्त हुए । इन ग्रन्थों को अनुशीलनार्थ मद्रास शासन के हस्त-लिखित पुस्तकालय द्वारा मंगवाया गया । इसी व्याख्या की दूसरी प्रति भी त्रावणकोर के राजकीय हस्तलिखित ग्रन्थागार में मिल गयी । इस समाचार से अनेक विद्वान् इन ग्रन्थों की ओर आकृष्ट हुए तो इन ग्रन्थों की प्रतिलिपियाँ करवाकर उन सभी विद्वानों को भेजा गया जो इन्हें अवलोकन करने के इच्छुक थे । इन सभी प्रतियों में नाट्यशास्त्र के सप्तम और अष्टम अध्याय की टीका नहीं थी । इसके अतिरिक्त पंचमाध्याय के अन्तिम भाग भी दोनों प्रतियों में एक ही स्थान पर अपूर्ण थे । किन्तु षष्ठाध्याय का अन्तिम भाग शान्त रस - विवेचन दोनों प्रतियों में समान रूप से विद्यमान था । दोनों प्रतियाँ किसी एक ही मूल प्रति के आधार पर तैयार की गई थीं यह दोनों के मिलान से निश्चित हुआ । अभिनव भारती की प्राप्ति से नाटयशास्त्र के अध्येताओं को नवीन प्रोत्साहन प्राप्त हुआ तथा श्री म. म. रामकृष्ण कवि ने सन् १ ९ २६ में बड़ौदा से इसी व्याख्या के साथ मूल नाट्यशास्त्र का परिश्रम से सम्पादन कर सप्तमाध्याय तक का प्रथम खण्ड फिर क्रमशः सन् १ ९ ३६ में अध्याय ८ से १८ तक का दूसरा खण्ड, सन् १ ९ ५४ में अध्याय १ ९ से २७ तक का तृतीय खण्ड तथा सन् १ ९ ६४ में अध्याय २८ से ३७ तक का चतुर्थ खण्ड प्रकाशित हुआ । नाट्यशास्त्र के चतुर्थखण्ड के प्रकाशन के कुछ समय पूर्व ही दुर्भाग्यवश म. म. रामकृष्ण कवि की मृत्यु हो गयी जिससे नाट्यशास्त्र के विषय में कवि जी द्वारा इष्ट विस्तीर्ण भूमिका तथा अव्याख्यात अध्यायों पर

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( १४ ) उनके द्वारा निर्मित व्याख्या से अध्येताओं को वंचित हो जाना पड़ा । इसके अतिरिक्त इनके द्वारा संगृहीत नाट्यशास्त्र पर प्राप्त वार्तिक आदि का एक विशिष्ट संग्रह भी अन्तिम खण्ड में परिशिष्ट के रूप में दिये जाने की योजना थी । हन्त! यह सभी रह गया । अब नाट्यविद्या को इन कार्यों के लिए किसी अन्य प्रतिभा की प्रतीक्षा है, जिससे कदाचित् भविष्य में यह अभाव पूर्ण हो सकेगा । बड़ौदा से प्रकाशित नाट्यशास्त्र के इस संस्करण में परिश्रमपूर्वक सभी पाठभेदों को लेकर भूमिका आदि के साथ पर्याप्त महत्वपूर्ण सामग्री दी गयी थी । जब पुनः नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग का नवीन संस्करण श्री रामास्वामी शास्त्रीद्वारा सम्पादित होकर प्रकाशित हुआ तो इसमें इन्होंने कवि द्वारा निश्चित दो पाठों के परम्परागत अन्तर को अधिकांश रूप में स्वीकार नहीं किया । इन्होंने नाट्यशास्त्र के मूलपाठों के निश्चय में अभिनवभारती के आधार को भी प्रमाणरूप में कम ही स्वीकृत किया । इनका तर्क था कि आचार्य अभिनवगुप्त के समय तक नाट्यशास्त्र में पर्याप्त प्रक्षिप्तांश मिल चुका था । जिसे स्वयं अभिनवगुप्त ने ही साम्प्रदायिक पाठों की चर्चा के द्वारा स्वीकार किया है । बड़ौदा से प्रकाशित अभिनवभारती व्याख्या सहित नाट्यशास्त्र के प्रथम खण्ड के तीन वर्ष पश्चात् ही सन् १ ९ २ ९ में काशी संस्कृत ग्रंथमाला से श्री प्रो ० बटुकनाथ शर्मा तथा प्रो ० बलदेव उपाध्याय के द्वारा सम्पादित नाट्य-शास्त्र का एक संस्करण प्रकाशित हुआ । इस संस्करण को सरस्वती - भवन पुस्तकालय, काशी में विद्यमान दो पूर्ण हस्तलिखित प्रतियों के आधार पर सम्पादित किया गया था । वह मूल पाठ बम्बई तथा बड़ौदा संस्करणों से न केवल भिन्न ही था किन्तु यह नाट्य शास्त्र की दीर्घपाठ परम्परा का अनुसारी होने से महत्वपूर्ण भी था । काशी संस्करण के पाठों की भारतीय तथा विदेशी विद्वानों ने यद्यपि पर्याप्त आलोचना की, तथापि इसे इन ( सभी ) कारणों से पर्याप्त महत्व भी प्राप्त हुआ । सम्प्रति काशी संस्करण के विषय में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि इसका अध्यायक्रम तथा पाठ कदाचित् मूल नाट्य-शास्त्र के पाठों से अधिक सामीप्य लिये हुए माना जाए तो कुछ अनुचित न होगा । इसके पश्चात् बम्बई के निर्णयसागर प्रेस से नाट्यशास्त्र का भी द्वितीय संस्करण सन् १ ९ ४३ में प्रकाशित हुआ जिसमें बड़ौदा के अभिनव-भारती संस्करण के दो खण्डों के तथा जे ० ग्रासे के संस्करण के पाठान्तरों का संग्रह भी जोड़ा गया था । इसी बीच नाट्यशास्त्र के विभिन्न भाषाओं में अनुवाद तथा व्याख्यान लिखने के भी प्रयत्न आरंभ हुए । सर्वप्रथम प्रो ० भानु ने नाट्यशास्त्र के आरम्भिक कुछ आचार्यों का मराठी में भाषान्तर किया । सन् १ ९ ४० के

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( १५ ) लगभग ' वसुमती ' बंगाली मासिक पत्रिका में नाट्यशास्त्र के अध्यायों का बंगला भाषा में धारावाहिक रूप से अनुवाद प्रकाशित होता रहा जो तीन अध्यायों से आगे अपना विकास नहीं कर पाया । इधर डॉ ० मनोमोहन घोष ने नाट्यशास्त्र के अध्याय १ से २७ तक के अंश का स्वयं विनिश्चित पाठों, अनेक नवीन प्राप्त पाण्डुलिपियों तथा पूर्वसंस्करणों के आधार पर अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित करवाया । कलकत्ता की रायल एशियाशिक सोसाइटी द्वारा सन् १ ९ ५१ में इसका यह प्रथम खण्ड प्रकाशित हुआ और इसी क्रम में सन् १ ९ ६१ में इसके आगे के समग्र अंश को प्रकाशित कर नाट्यशास्त्र का समग्र अनुवाद करने का यश प्राप्त किया । इसमें श्री घोष ने नाट्यशास्त्र की अर्थ संगति पर पर्याप्त मनोयोग लगाया तथा अनेक पाठों पर स्वतंत्र विचार भी प्रस्तुत किये । डॉ ० घोष ने अपने अंग्रेजी अनुवाद के लिए जो मूल पाठ तैयार किया था उसका द्वितीय खण्ड ( अध्याय १८ से ३६ ) तथा अग्रेजी अनुवाद भी वहीं से प्रकाशित करवाया । इसी बीच हिन्दी भाषा में भी नाट्यशास्त्र के व्याख्यान ( तथा अनुवाद करने ) की प्रकृति के फलस्वरूप कुछ प्रयास प्रारम्भ हो गये थे । काशी से चौखम्भासंस्कृत पुस्तकालय द्वारा नाट्यशास्त्र के दो अध्यायों का श्रीरामगोविन्द शुक्ल द्वारा हिन्दी में शाब्दिक अनुवाद का सन् १ ९५३-५४ में प्रकाशन हुआ जिसमें बिना नाट्यशास्त्र की विषय गरिमा पर विचार किये हुए एक त्वरित् अनुवाद प्रस्तुत किया गया था । परीक्ष्य छात्रों की आवश्यकता को दृष्टि में रखकर श्री भोलानाथ तिवारी ने भी नाट्यशास्त्र के प्रथम तीन अध्यायों का एक सटिप्पण संस्करण प्रकाशित करवाया । श्री प्रॉ ० कृष्णदत्त वाजपेयी ( सागर विश्वविद्यालय ) द्वारा नाट्यशास्त्र के प्रथम सात अध्यायों का संक्षिप्त भूमिका के साथ एक सामान्य साब्दिक अनुवाद लखनऊ से सन् १ ९ ६० में प्रकाशित किया गया । मोतीलाल बनारसी दास के यहाँ से सन् १ ९ ६४ में डॉ ॰ रघुवंश द्वारा अनूदित तथा एक उपयोगी भूमिका तथा टिप्पणी ( बड़ौदा संस्करण के पाठों पर आधृत मूल पाठ ) आदि के साथ एक संस्करण प्रका-शित हुआ । नाट्यशास्त्र के प्रथम दो तथा षष्ठ अध्याय का अभिनवगुप्त विरचित अभिनवभारती टीका के व्याख्यान के साथ हिन्दी अनुवाद आचार्य विश्वेश्वर सिद्धान्त शिरोमणि द्वारा किया गया जिसका प्रकाशन सन् १ ९ ६० में दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा हुआ । नाट्यशास्त्र के शोधपूर्ण संस्करणों में अभिनवभारती के हिन्दी व्याख्यान के साथ - साथ प्रकाशित यह संस्करण सर्वो-त्तम उपलब्धि माना जाएगा । इसके अतिरिक्त श्री डॉ ० ब्रजमोहन चतुर्वेदी का नाट्यशास्त्र के प्रथम द्वितीय अध्याय की हिन्दी व्याख्या तथा विशिष्ट भूमिका के साथ सन् १ ९ ६७ में दिल्ली से और एक संस्करण निकल गया है ।