भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 721–729
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 721–729
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५ ९ २ नाट्यशास्त्र .१८६ १८ १८७ १२ १८८ ७ १ ९ २ १८ १ ९ ८ ९ २१२ ४ २१२ ८ २१२ २ २१३ 6 २२३ ९ २२३ २४ २२४ १५ २४ २३ • २२६ ८ २२८ ७ २२ ९ ५ २३७ १६ २४० १ २४६ २३ २४८ 99 २४८ २१ २५४ २२ २६४ २१ २६५ ३० २६५ १२ २६६ १ ९ अशुद्ध इस ध्रुवा का प्रत्येक पाद एकादशाक्षर का " पादैद्रुतलयान्वितैः । तत्रपि वामवेधस्तु लगता है तथा यह शब्दा क्रिया के...
सूत्रधारगुणाकृति ।
प्रश्नान्पञ्चभिधत्स्व नः ॥१ ॥
नाट्यै नाट्यविचक्षणैः । कारिका चैव निरुक्तं चैव रसाभावविकल्पनम् ॥ ४ ॥
आहार्यः सःत्विकस्था । आन्तरिक भावों के सभिव्यंजक स्वेद तथा सावि अभिन्य का विवरण... नाट्यधर्मी का लक्षण ना ० शा ० अध्य १४ में इस व्युपत्ति के अनुसार तावदादावभिव्याख्यामः । या यामिकाया उत्पत्त ननु प्रभदादिभिः कारणैः .. " वैधुर्याभावे कतं न ' ' परब्रह्मास्वोदस विधेन भोगेन परं... भट्टलोल्लट पक्षानभ्युपगमादेव नाभ्युपगत ( रसा? ) त्मनः प्रतीतयो यथः- अज्जवि हरिणो एतद्गुणप्रधानभावाकृत एव च तया परमुपहन्नभीष्ट वियोगसन्तप्त " तयाकान्तः किञ्चि " कर्तव्यान्तरविषये स्योत्सा हादेर खण्डनात् । शुद्ध इस ध्रुवा का प्रत्येक पाद त्रिष्टुप् छन्द में एकादशाक्षर का पादैर्दुतलयान्वितैः । यत्रापि वामवेधस्तु लगता है तथा यह सशब्दा क्रिया के...
सूत्रधारगुणाकृतिः ।
प्रश्नान् पञ्चाभिधत्स्व नः ॥ १ ॥
नाट्ये नाट्यविचक्षणैः । कारिकाञ्चैव निरूक्तं चैव रसभावविकल्पनम् ॥ ४ ॥
अहार्यः सात्विकस्तथा । आन्तरिक भावों के अभिव्यञ्जक स्वेद तथा सात्विक अभिनय का विवरण... नाट्यधर्मी का लक्षण ना ० शा ० अध्या ० १ | १४ में इस व्युत्पत्ति के अनुसार तावदादावभिव्याख्यास्यामः । स्थाय्यात्मिकाया उत्पत्तौ ननु प्रमदादिभिः कारणैः .. " वैधुर्याभावे कथं न ' ' परब्रह्मास्वादसविधेन भोगेन परं भट्टलोल्लटपक्षानभ्युपगमादेव नाभ्युपगत ( रसा? ) मानः प्रतीतयो यथाः - अज्जवि हरिणो एतद्गुणप्रधानभावकृत एव च तया परमुपहसन्नभीष्ट वियोग-सन्तप्त.. तयाक्रान्तः किञ्चि " कर्तव्यान्तरविषयस्योत्साहा-देर खण्डनात् ।
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नाव्यशास्त्र - प्रथमभाग शुद्धिपत्र ५ ९ ३ पृष्ठ पङ्गि २६६ २१ २७० १८ २७१ १० २७२ १३ २७४ २३ २७७ २५ २७ ९ ३. २८२ 6 २८२ २० २८४ 6 २८६ ९ २८६ १०. २८ ९ २० २८ ९ २१ २ ९ ३ ५ २ ९ ३ ८ २ ९ ४ ३ २ ९ ६ ८ २ ९ ६ २३ ३०० २० ३०० २२ ३०१ ५ ३०१ १ ९ ३०३ २७ अशुद्ध यथाह पातञ्जले स्थायिविलण एव रसः । स्थायिप्रतितीरनुमिति रूपा पूर्णीभविष्यद्वसास्वादाङ्गुरी. भावेनानुमान " नन्नेवं रसोऽप्रमेयः स्यात्? वाङ्मरूपी महार्णवा को आत्तमात्तमित्याद्यर्पितानु-भावर्गस्तु भिर्द्वर्व्य अनौषधिभिश्च पाडवादयो.. कषायेभ्यो मिश्रेभ्यश्चः विलक्षणः...
कल्पव्यञ्जननितो मन्तव्यः ।
भक्तं भक्तिविदो जनाः ॥३३ ॥
स्थायिभावस्तथा बुधा । शुद्ध यथाह पतञ्जलिः स्थायिविलक्षण एव रसः । तेन स्थायिप्रतीतिरनुमितिरूपा पूर्णभविष्यद्वसास्वादाङ्कुरीभावेना--नुमान " नन्वेवं रसोऽप्रमेयः स्यात्? वाङ्मयरूपी महार्णव को आत्तमात्तमित्याद्यर्पितानुभाव-वर्गस्तु भिर्दव्यैव्य अनौषधिभिश्व पाडवादयो कषायेभ्यो मिश्रेभ्यश्च विलक्षणः...
कल्पव्यञ्जनजनितो मन्तव्यः ।
भक्तं भक्तविदो जनाः ॥ ३३ ॥
स्थायिभावस्तथा बुधाः । तथा अनुकरण रस है ' इस ) का अनुकरण रस है ' इस ) क्या रसों में भावों की रससंवितमूलक काव्य के द्वारा में दिभावादि की प्रतीति ( इति ) अतएव अब इन रसों की हास्यः प्रथमदैवतः । शिव के कीड़ा करने वाले गणों... रख इये हैं... यथा अपने उज्ज्वल सुधार कहलाता है । फलाप्राप्ति की अवस्था तक रहने... परन्तु भोग अभाव में प्रियजन के प्रति... क्या रसों से भावों की रससंविन्मूलक काव्य के द्वारा में विभावादि की प्रतीति ( वृत्ति ) अतएव अब इन रसों की हास्यः प्रमथ दैवतः । शिव के साथ क्रीड़ा करने वाले गणों... रखे गये हैं.. तथा अपने उज्ज्वल शृङ्गार कहलाता है । फलप्राप्ति की अवस्था तक रहने... परन्तु भोग के अभाव में प्रियजन के प्रति ३८ ना ० शा ० प्र ०
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५ ९ ४ नाट्यशास्त्र पृष्ठ पङ्कि ३०५ २१ ३०७ २ ९ ३१० ९ ३१३ ६ ३१३ २६ ३१४ ५ ३१७ ३१७ १८ ३२० १० ३२३ २८ ३२५ ४ 201 ३२५ २२ ३२६ २ ३२७ १४ ३२७ २१ ३२ ९ २ अशुद्ध आदि इष्टजन से नायक नायिका की उत्तम-प्रकृति.. इसी बात को सूचित करने के मूल में ' अन्य ' पद का भरतमुनि ने भी ' यहामा-भिनवेशित्व ( ना ० शा ० २४।२०७ ) एक दूसरे से पार्थक्य रहते हैं । के चकार का सांकेतिक अर्थ है । योग्य होते हैं अतएव रतिरूप ही ' पुरुष ' है । विकृतवेष अलंकार ठिढ़ाई, विदूषक हास्यजनक वेष के द्वारा हास्यात्मक ( को ) ही प्रदर्शित अधमानामहसितं एवसात्मसमुत्थश्च द्विविध-श्चिप्रकृतिकः षड्भेदो " मुँह का उत्तर जाना विभवनाश आदि होने पर भी उत्तम प्रकृति... इससे निर्वेद, ग्लानि चिन्ता ' मोह का अर्थ जडता है । रस से अन्य यहाँ भी आकशब्दका प्रयोग ( मूल में )... तथा उद्भुत प्रकृति के मनुष्यों से... शुद्ध आदि इष्टजन ये नायक नायिका की उत्तम. प्रकृति.. इसी बात को सूचित करने के लिये मूल में ' अन्त्य ' पद का भरतमुनि ने भी ' यलामा-भिनिवेशित्व ( ना ० शा ० २४।२०७ ) एक दूसरे से पार्थक्य रखते हैं । के चकार का सांकेतिक अर्थ है । भोग्य होते हैं अतएव रतिरूप ही ' पुरुष ' है । विकृतवेष अलंकार दिठाई विदूषक हास्य जनक अपने वेष के द्वारा हास्य ( को ) ही प्रदर्शित... अधमानामपहसितं एवमात्मसमुत्थश्चद्विविध-स्त्रिप्रकृतिकः षड्भेदो... मुँह का उतर जाना ये विभवनाश आदि होने पर भी उत्तमप्रकृति... इसमें निर्वेद, ग्लानि, चिन्ता... मोह का अर्थ जडता है । इससे अन्य " " यहाँ भी आत्मशब्द का प्रयोग ( मूलमें )... तथा उद्धत प्रकृति के मनुष्यों
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नाट्यशास्त्र - प्रथमभाग शुद्धिपत्र ५ ९ ५ पृष्ठ पङ्कि ३३१ ८ ३३२ ३३५ १३ ३३५ २१ ३३ ९ २३ ३४० ७ C १ ९ ३४१ ३ ३४२ २५ ३४३ १३ 1333 ३४३ १ ९ ३४४ ८ ३४५ ३ ३४६ २६ ३४८ ७ ३४ ९ ३ ३४ ९ 8 अशुद्ध इसी कारण ताडनादग्रस्त पुरुष में... इत्यादि से अपना प्रस्तुत करता है कि... व्यापार का औचित्य सूचित पीता है । इसीलिये. ' प्रसङ्ग में अनुमित के आधार पर कार्य को ' उपकर्मक्रियात्मकः " के द्वारा क्रोधावेश में आकर उपकर्म अर्थात् प्रथम आर्या में दिये गये गुरु तथा नृत्य इत्यादि मुँह का उत्तर जाना तथा स्वरभेद " भीत एवास्मि भर्तृः ( २० १७ ) एतत्स्वभावजं स्यात् सत्व-समुत्थं तथैव यहाँ ' नृत्य ' पद से भय के स्वाभाविक... सर्वाङ्गसंहारमुख विकूणनो नेखन - निष्ठीवनो.. अत्यन्त अप्रिय ( अग्रह्य ) होती है, प्रतिपादक भिन्न आर्याएँ हैं कुलाभिगमनसम्भा विमान मायेन्द्र २ एभिस्तर्थविशेष तथा शोधकृतभेद से तीन प्रकार का बीभत्स रस चोभज, शुद्ध तथा उद्वेगी मूल तथा कीडे आदि सड़ी वस्तुओं के... शुद्ध इसी कारण ताडनादिग्रस्त पुरुष में.. इत्यादि से अपना मत प्रस्तुत करता है कि... व्यापार का औचित्य सूचित होता है । इसीलिये. " प्रसङ्ग में अनुमिति के आधार पर कार्य को ' उग्रकर्मक्रियात्मकः ' के द्वारा... • क्रोधावेश में आकर उग्रकर्म अर्थात्.. प्रथम आर्या में दिये गये गुरु तथा नृप इत्यादि मुँह का उतर जाना तथा स्वर-भेद " भीत एवास्मि भर्तुः ( २०१७ ) एतत्स्वभावजं स्यात् सत्वसमुत्थं तथैव.. यहाँ ' नित्य ' पद से भय के स्वाभाविक ' सर्वाङ्गसंहारमुखविकूणनो ल्लेखन-निष्ठीवनौ... अत्यन्त अप्रिय ( अग्राह्य ) होती है, प्रतिपादक निम्न आर्याएँ है. " कुलाभिगमन सभाविमान-२ एभिस्त्वर्थविशेष तथा शोककृत भेद से तीन प्रकार का बीभत्सरस क्षोभण, शुद्ध तथा उद्वेगी मल तथा कीडे आदि सड़ी वस्तुओं के...
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५ ९ ६ पङ्कि ३४ ९ ५ ३४ ९ १३ ३५० २२ ३५५ २ ९ ३५६ १० ३५ ९ १७ ३६५३ ३६५ १ ९ ३६५ २३ ३६ ९ १ ९ ३७१ १५ ३७२ २८ ३८० २ ३८० ५ ३८१ २ ३८१ १८ ३८४ २३ ३८८ २३ ३ ९ ० १५ ३ ९ ० २२ नाट्यशास्त्र अशुद्ध वस्तु के देखने से ' क्षोभण ' ॥ ७८-८२ ॥ area को चोभज अर्थात् अशुद्ध समझना " कारणरूप से प्रतीति नहीं होते । स्थायीभाव रूप में स्थित निश्चित नहीं... एक दूसरे मत के अनुसार पाकरस के आस्वाद " इत्यप्रापातिलभ्य सर्व.. वने दुष्प्रार्थिनि यत् मनीषिगण के लिये लक्षणों में युक्त नवरसों का उज्ज्वल - मूत्र के समान इन भावों के बीच समान रूप से प्रतीति आन्त-शुद्ध वस्तु के देखने से ' क्षोभण ' ॥ ७८-८२ ॥ बीभत्सों को क्षोभण अर्थात् अशुद्ध समझना कारणरूप से प्रतीत नहीं होते । स्थायीभाव रूप में स्थिति निश्चित नहीं... एक दूसरे मत के अनुसार पानक-रस के आस्वाद. " इत्यप्रार्थितलभ्य सर्व वने दुष्प्रा-पार्थिनि यत् मनीषिगण के लिये लक्षणों से युक्त ' नवरसों ' का उज्ज्वलसूत्र के समान इन भावों के बीच... समानरूप से प्रतीत आन्तरिक रिक अवस्था के भेद से.. अवस्था के भेद से... ' वागङ्ग ' इत्यदि से दिखलाई है जिसे संग्रह कहने के लिये... आस्वादन के योग चित्रवृत्ति विशेष.. श्लतु माल्यानुलेपनाभरण यह ऋतु माल्य, चन्द्रलेपन भार्ग्यामौ - र्यादिभिर्विभावः नदिभिर्विभावः समु गुरुजन के प्रति होनेवाले उसको विनयच्छन्न परिकीर्तनादिभिर्विभवैः समु... वि - अभि इत्येतानुपसर्गौ सग्रहाभिहितांस्त्रयत्रिंश-द्वयभिचारि.. ' वागङ्ग ' इत्यादि से दिखलाई है जिसे संग्रह करने के लिये... आस्वादन के योग्य चित्तवृत्ति विशेष... ऋतुमाल्यानुलेपनाभरण ' ' यह ऋतुमाल्य चन्दन लेपन भाग्यमौख्यदिभिर्विभावैः नादिभिर्विभावैः समु " गुरुजन के प्रति होनेवाले क्रोध में उसको विनयच्छन्न-| परिकीर्तनादिभिर्विभावैः समु वि - अभि इत्येतावुपसर्गौ सङ्ग्रहाभिहिताँत्रयस्त्रिंशद्वयभि-चारि
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पृष्ठ पङ्कि ३ ९ ५ १ ९ ३ ९ ६ २२ ३२ ९ १५ ४०० ८ ४०४ 9 ४०४ ७ ४०४ २१ 20 ४०५ २४ ४०६ 202 नाट्यशास्त्र - प्रथमभाग शुद्धिपत्र ५ ९ ७ अशुद्ध प्रथम ( आत्वसमुत्था शङ्का ) स च त्रिविधः पश्चविध भावश्व । गमनैस्तयाभिनयः प्रयो-क्तव्यः अहारवर्जितानां आर्ये भवतः -कम्पेभ्रूक्षेपश्चाभिनेतव्या ॥ समुद्भवा धृतिः सद्भिः पश्चात्तापेन वीडित इति नाम रागद्वेषमात्सर्या शुद्ध प्रथम ( आत्मसमुत्था शङ्का ) गमनैस्तस्याभिनयः प्रयोक्तव्यः आहारवर्जितानां अत्रायें भवतः-कम्पैक्षेपैश्वाभिनेतव्या ॥ समुद्भवा धृतिः सद्भिः पश्चात्तापेन युतो व्रीडित इति नाम रागद्वेषमात्सर्याम ४०६ १२ ४०६ II ४०८ १६ ४० ९ १३ ४१२ ७ ४१२ १० ४१२ १२ ४१३ 9 ४१४ १६ ४१५ ७ ४१६ १३ ४१६ १५ ४१६ १८ ४१ ९ १ ९ तस्याश्च पाक्यारुण्य आनार्या भवति सर्वाङ्गसपिडनप्रधावन " भुकाने, धुएँ को झाड़ने, " येत्सहान्वेषणोपायचिन्ति नोत्साह कार्य के समान न होने चित्त में मलिन होने सम्पत्ति ले राजा के द्वारा क्षति पहुँचाने दौर्बल्यावमाच्छ्रमा निःश्वसितोत्कम्पितधाव-वेद सम्मोहनोस्वप्नायिता-सुप्त भाव निद्रा से उत्पन्न होता है । ( निद्राभि-भव ) यह इन्द्रियों के द्वारा अपने ' आदि विभावों में ' सुप्त ' उत्पन्न होता है । सम्भूतभवहित्थं भयात्म-कम् । तस्याश्च वाक्पारुष्य " अत्रार्या भवति सर्वाङ्गसपिण्डनप्रधावन " झुकाने, धुएँ को झाड़ने,... येत् सहायान्वेषणोपायचिन्तनो-त्साह " कार्य के समाप्त न होने चित्त के मलिन होने सम्पत्ति के राजा द्वारा क्षति पहुँचाने " दौर्बल्यात् क्लमाच्छृमा ं ' ' निःश्वसितो कम्पितधावन - पतन-स्वेद ' ' सम्मोहनोत्स्वप्नायितादिभिरनु-भावे... सुप्त भाव गहरी निद्रा से उत्पन्न होता है ( निद्राभिभव ) । इन्द्रियों के द्वारा अपने आदि विभावों से ' सुप्त ' उत्पन्न होता है । सम्भूतमवहित्थं भयात्मकम् ।
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५ ९ ८ पृष्ठ पङ्कि ४२० ७ ४२१ ११ ४२१ १३ ४२२ २७ ४२३ ६ ४२३ ९ ४२५ १ ९ ४२६ १ ९ ४२८ १२ ४३० १६ ४३० १७ ४३१ ८ ४३१ २३ ४३३ 9 ४३४ १७ ४३५ ५ ४३८ ९ नाट्यशास्त्र अशुद्ध निर्भर्त्सनादिभिरभाव-रभिनयेत् । तस्यः ज्वरादयो विशेषाः । ज्वरन्तु द्विविधः... निकुञ्जनाभिलाषरोमाञ्च... और यह शरीर दोनों के कारण गाली देने ( उत्कृष्ट ) तथा ( बेसिर पैर की बातें ) टुटे हुए सरावले प्रख्यात नायक ने वध का निषेध ही भरत गले की ढल जाना विचार विमर्श आदि से उत्पन्न.. इमे स्कम्भः स्वेदोऽथ आदि में ' स्वेद ' उत्पन्न क्लेश ( क्लम ) तथा घास ( ताप ) से... स्वरभेदोऽभिनेतव्यौ विस्ययश्च वितर्कश्व ग्लानत्रमेव च ( या विभिन्न रसों का शुद्ध निर्भर्त्सनादिभिरनुभावैरभिनयेतां तस्याः ज्वरादयो विशेषाः । ज्वरस्तु द्विविधः... " निकुञ्चनाभिलाषरोमाञ्च और यह शरीर होने के कारण गाली देने ( उत्कुष्ट ) तथा ( बेसिर पैर की बातें ) टूटे हुए सरावले प्रख्यात नायक के वध का निषेध ही भरत गले का ढल जाना विचार विमर्श आदि से उत्पन्न.. इमे स्तम्भः स्वेदोऽथ आदि से ' स्वेद ' उत्पन्न क्लेश ( क्लम ) तथा घाम ( ताप ) से... स्वरभेदोऽभिनेतव्यो विस्मयश्व वितर्कश्व ग्लान्यस्त्रमेव च ( या विचित्रता रसों का प्रदर्शन ) नहीं करती... प्रदर्शन ) विराम उत्पन्न विराग उत्पन्न करती.. इसी तरह इन्हें ठीक तरह से ४३ ९ १२ जो ठीक तरह समझता जो है वह अतिशय है वह अतिशय समझता -०००००-
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नवीन प्रकाशित दुर्लभ ग्रन्थ १ श्रीमङ्गगवडीला ( गीता ) मधुसूदन सरस्वती कृत संस्कृत दो दा . बनास देव कुल हिन्दी टोका ( १ ९ ८२ ) राज संस्करण कार्डबोर्ड संस्करण १००-०० ९ नामलिङ्गानुशासनम् नाम अमरकोश: ( कोश ) । अमर वह २५०-०० कृत । दीक्षित ( रामाधव ) कृत ' समाधी ' ( वाक्यसुधा ) संस्कृत टीका तथा हरगोविन्दशानी कृत ' मणिप्रभा ' ( प्रकाश ) हि ० टीकाहि । राज संस्करण २५०-०० कार्डबोर्ड संस्करण १५०-०० १. काव्यप्रदीपः । ज ० म ० श्रीगोविन्दप्रणीतः । बेद्यमान कृत टीका । पं दुर्गाप्रसाद तथा बासुदेव काम शामी पणशीकर सम्पादित-1548 ) १०-०० • सूबेदवृत्तिः 1 स्थायी हरिप्रसाद वैदिकमुनि विरचित । ( १ ९ ७१ ) १५०-०० * इरविजयम् । राजानकार रिक्ति । राजानक अलक कुल टीका सहित 1 दुर्गाप्रसार एवं काशिनाथ पाण्डुरज परव ( १ ९ ८१ ) १००-०० १ चम्पूरामायण । राजाभोज कृ तक लक्ष्मण सूरि कृत खण्ड रामचन्द्रमुपेन्द्र कृत टीका । मासुदेव लक्ष्मण शाको वशीकर सम्मारित । ( १ ९ ८२ ) ४०-०० • भामिनीविलासः ( काव्य लगाव कृत: राधेश्याम मिश्र कृत ' प्रकाश ' हिन्दी टीका जम्योति विकास प्रस्ताविक विकास २५-०० संपूर्ण ६०-०० 4 कामसूत्र ( काशन ) । पात्स्यायन मुनि कृत । शोध कृत ' जनक ' संस्कृत । देवदत्त शाकी कृत हिन्दी टीकादि ( १ ९ ८१ ) १५०-०० ९ नारदसंहिता ( ज्योतिष ) । नारद महामुनि कृत । श्रन्वर, विमला हिन्दी व्याख्या, ब्ल्याकार- राम जन्म मिश्र १ ९ ८ ९ ) ६०-० १. नाट्यशास्त्रम् ( नाव्य ) । भरतमुनि कृत । संकाय शर्मा एवं बलदेव उपाध्याय संशोधित १ ९ ८२ ) सम्पूर्ण ६००-०० ११ योगसूत्रम् । ( योग ) पताकि कृत । पोजराज कृत ' राजमार्तण्ड'-भवागणेश कृत ' प्रोषिका'- नागोजि भट्ट कृष ' इति ' रामानन्द यति कुल- ' मभिप्रमा ' अनन्त देव कृत ' चन्द्रिका ' लया सदाशिवेन्द्र सरस्वत कृत ' यो सुबाकर ' ठोका । विस्तृत हिन्दी भूमिका डा ० महाप्रभुका ( १ ९ ८२ ) ५०-०० प्रतिस्थान- नौवस्था संस्कृत संस्थान, मो ० ० ११३६ वाराणसी -१
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चौरवम्भा संस्कृत संस्थान भारतीय सांस्कृतिक साहित्य के प्रकाशक तथा प्रचारक पो ० आ ० चौखम्भा, पो ० बा ० नं ० ११३ ९ जड़ाव भवन, के. ३७/११६, गोपाल मन्दिर लेन वाराणसी - २२१००१ ( भारत )