भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 81–90

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 81–90

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( ६६ ) अधिक प्रसार हो सकता है क्योंकि उसमें शंका समाधान की पर्याप्त गुंजाइश होती है और इससे बौद्धिक विवरण का पर्याप्त आधार मिल जाता है । षष्ठाध्याय रसाध्याय है जिसमें नाट्यप्रसंग में ( तथा नाट्य - रस के सन्दर्भ में ) उद्विष्ट रसस्वरूप की सूत्र भाष्यरूप व्याख्या- भरतमुनि ने प्रस्तुत की है । भारतीय समीक्षाशास्त्र को भरतप्रोक्त रस सिद्धान्त एक अमूल्य देन है । यद्यपि भरतमुनि रस के आदि प्रतिष्ठाता आचार्य हैं किन्तु नाट्यशास्त्र से ऐसा संकेत भी मिलता है कि इनके पूर्व भी रस - मीमांसा की परम्परा विद्यमान थी । नाट्यशास्त्र के षष्ठ तथा सप्तम अध्याय में रस तथा भावों के विवेचन के अवसर पर भरत मुनि ने पूर्ववर्ती आचार्यों के आनुवंशश्लोक तथा आर्याएँ अपने विचारों के अनुमोदन में प्रस्तुत की है । इतना होने पर भी एक सुनिश्चित सिद्धान्त के रूप में सर्वप्रथम रस का उपस्थापन भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में ही है, जहाँ नाट्यप्रसङ्ग में रसनिरूपण किया गया है । काव्य के सन्दर्भों के साथ रससिद्धान्त की विवेचना बाद में आरम्भ हुई । भरतमुनि काव्य तथा नाट्य-के उस विभेद को जो आज माना जाता है स्वीकार ही नहीं करते थे । उनके समय में रस नाटक का धर्म था तथा चतुर्विध अभिनयों के द्वारा सहृदय सामाजिक के चित्त में रसनिष्पत्ति का सम्पादन करना नाटकों का उद्देश्य था । भरतमुनि ने नाट्य के सन्दर्भ में जैसा रस का निरूपण किया तथा इस प्रसंग में मानवीय संवेगों, प्रवृत्तियों तथा क्षणिक अनुभूतियों का जो मार्मिक विश्लेषण प्रस्तुत किया वह मानवमन के सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करने वाले आधुनिक मनोविज्ञानशास्त्र तथा उसकी सम्प्राप्त उपलब्धियों से आश्चर्यजनक समानता लिये हुये हैं । डॉ ० ए ० बी ० कीथ ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ संस्कृत नाटक में ( पृ ० ३३६ ) रस के विषय में बतलाया कि भारतीय नाट्यशास्त्र का सर्वाधिक मौलिक तथा मनोहारी प्रसङ्ग है रस के क्रमिक विकास का जिसमें सामाजिक के हृदय में रसानुभूति उत्पन्न कराना ही नाटक का उद्देश्य था । रस की प्रमुखता को बतलाते हुए मुनि ने स्वयं ही कहा कि - ' नहि रसा-' दृते कश्चिदप्यर्थः प्रवर्तते ' अर्थात् बिना रसज्ञान के किसी भी नाटयोक्त विभा-बादि को जानना कठिन होगा । नाट्यशास्त्र के मुख्य विवेच्य विषय चार हैं-रस, अभिनय, संगीत तथा नृत्य किन्तु मुनि की दृष्टि में रस इन सभी में प्रमुख है; क्योंकि अभिनय, नृत्य तथा संगीत के द्वारा रस को ही अभिव्यक्ति मिलती है तथा ये रस की अभिव्यक्ति में प्रधान या गौण रूप में सहकारी होने से साधन मात्र हैं, साध्य नहीं । यहाँ तक कि मुनि ने जिन - जिन विषयों की नाट्यशास्त्र में व्याख्या या विवरण दिये हैं उस सभी का साक्षात् या परम्प-रया रस से ही सम्बन्ध रहता है । उदाहरणार्थ- हम रंगमंच या प्रेक्षागृह को

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( ६७ ) ले लें । इस प्रसङ्ग में जब मध्यम- विकृष्ट नाट्यगृह की चर्चा करते हुए ही का वर्णन करते हैं तो इसकी उपयोगिता को इसलिये मुनि इसके आकार नाट्यगृह का आकार रस के साक्षात्कार कर-अधिक दर्शाते हैं, क्योंकि यही अधिक सक्षम है । रंगमञ्च का आकार यदि विशाल हुआ तो दर्शकों वाने में धारण कर लेगा, जो वाणी के उच्चारण तथा शारीर के लिये रस अस्पष्टता है । इस प्रकार स्पष्ट है कि भरतमुनि द्वारा अनुभावों द्वारा व्यक्त किया जाता के साधन में प्रतिपादित सभी विवेच्य विषय रस की अभिव्यक्ति नाट्यशास्त्र मात्र होकर ही प्रस्तुत किये गये हैं । अभिनवगुप्त ( अभि ० भा ० भाग १ पृष्ठ - २ ९ २ ) के मत में नाटक आचार्य रूप में ) विषय रूप रस की उद्भावना होती है, क्योंकि प्रकृति-से ( अनिवार्य प्राप्ति असंभव है । यह रस शुद्ध एकत्व रूप नहीं होता जन्य वस्तुओं में इसकी इसकी अनेकता में एकत्वस्वरूप तत्व होता है स्थायीभाव, जो रसो-है क्योंकि है एवं अन्य सभी सहकारी है । ये हैं-त्पादक तत्त्व में सबसे महत्वशाली तथा व्यभिचारीभाव । ये स्थायीभाव को उसी प्रकार महत्व-विभाव अनुभाव जैसे राजसी साज - सज्जा तथा सेवकवर्ग राजा को प्रमुखता शाली बनाते हैं हैं । इसमें जैसे केन्द्रिय स्थान राजा लेता है उसी प्रकार स्थायीभाव दिलवाते बिन्दु बनकर मुख्यता धारण करता है तथा इसी कारण ही दर्शकों का आकर्षक वाला स्थायीभाव ही रस है । यह कहा जाता है कि विभावादि से व्यक्त रसः होने स्मृतः ' ( काव्य प्र ० ४।२६ ) ( ' व्यक्तः स तं विभावाद्यैः स्थायीभावो वह परि विभावादि का स्वरूप - विभाव शब्द से आशय है नाट्यगत या अवसर जिसकी सहायता से नायक में स्थायीभाव उबुद्ध होता स्थिति स्थापित करने के कारण प्रेक्षक में भी हो । यही नायक के साथ तादात्म्य हो जाता है और इसे कारण न कहकर विभाव पद से इसलिये कहा उदित है । देश, काल तथा अवच्छिन्न वस्तु में सदा भेद रहता ही है । भी जाता को भी दो रूपों में विभक्त कर दिया एक आलम्बन इसीभेद ने विभावों या अवच्छिन्न वस्तु जो स्थायीभाव का आधार होती है तथा दूसरा विभाव — जो देश और काल के समग्र रूप के साथ प्रेरक वातावरण के उद्दीपन विभाव आश्रय के प्रभाव को तीव्रतम बनाता है । व्यावहारिक रूप में आकर वस्तु या में किसी स्थायी भाव के कार्य ( कहे जाने वाले ) तथा स्थायी भाव की जागृति जगत् उद्भूत होने वाली शारीरिक चेष्टाएं नाट्यप्रयोग में अनुभाव कहलाती है । से या गतियाँ दो प्रकार की होंगी । एक इच्छा से उत्पन्न होने वाली और ये चेष्टाएँ । इच्छा से उत्पन्न चेष्टाएँ दूसरों पर अपने भाव को दूसरी सहजन्य या स्वयमुद्भूत प्रकट करने के लिये की जाती हैं । ये स्थायीभाव के इच्छाजन्य प्रकटन के रूप में रहती हैं । जैसे - आँखों या भौंहों का परिचालन । अपनी इच्छा से जिन

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( ६८ ) शारीरिक क्रियाओं को प्रकट किया जाए वे हैं अनुभाव | इसके अतिरिक्त कुछ अन्य प्रकार की भी चेष्टाएं होती हैं, जो भावों के उदित होने या व्यक्त होने पर स्वयं ही बिना किसी इच्छा के प्रकट होती है - जैसे व्रीडा, रोमांच, स्वर-भंग, विवर्णता इत्यादि । ये स्वयमुद्भूत चेष्टाएँ सात्विकभाव कहलाती हैं । अन्तःकरण में स्थायीभाव के रहने पर ही सात्विक भावों की अभिव्यक्ति होती है । ये स्थायी भावों के अविनाभावी - लक्षण या चिह्न माने जाते हैं । भरतमुनि ने उनचास भावों का वर्णन करते हुए उन्हें रसानुभव में उपयोगी बतलाया है । इनमें आठ स्थायी भाव, तैंतीस व्यभिचारीभाव तथा आठ सात्विकभाव हैं । सात्विकभावों को अनुभाव के अन्तर्गत लिया जा सकता है किन्तु फिर भो इनकी पृथक् गणना का कारण है इनका स्थायीभाव के व्यक्त होने पर तदन्तर्गत किसी इच्छा के साथ स्वयं प्रकट होना जिससे इनके विषय में कोई संदेह न किया जा सके । व्यभिचारीभाव अस्थायी होने के कारण संचारीभाव कहे जाते हैं । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने व्यभिचारीभाव की व्याख्या करते हुए बतलाया कि इन्हें व्यभिचारीभाव कहने का कारण है - इनका विधि रसों के अनुभव में दर्शक के सम्मुख प्रत्यक्षवत् प्रकट होना । एक अन्य कारण से भी इन्हें संचारी भाव कहते हैं, क्योंकि ये विविध रसों को मानों प्रत्यक्ष रूप में दर्शकों के समक्ष उपस्थितकर देते हैं । क्योंकि जब एक उपयुक्त परिस्थिति में प्रभूत अस्थायी मानसिक अवस्थाओं का अभिनय किया जाता है तो दर्शकों के चित्त में उस स्थायीभाव के विषय में कोई आशंका नहीं रहती जिससे इनकी उत्पत्ति होती है । ये अस्थायी मानसिक दशाएँ संचारीभाव हैं । स्थायीभाव को इन उनचास भावों के अन्तर्गत प्रमुख स्थान नाट्यशास्त्र में दिया गया है । स्थायीभाव भी चित्तवृत्तिरूप होते हैं किन्तु चित्त के अन्दर स्थायिता ही इनकी प्रमुखता में हेतु है । ये भाव मनुष्य में प्रधानरूप से विद्य-मान होकर उसके चरित्र गठन में सहयोग करते हैं । यह एक स्थायी मान-सिक भावावस्था है । इसका उदय किसी विशिष्ट परिस्थिति के कारण होता है, जिसमें कर्त्ता या नायक अवस्थित रहता है । इसलिये यह भावावस्था उद्दिष्टकार्यं सभी दशाओं में एक - सी बनी रहती है तथा इसी कारण स्थायी-भाव कहलाती है । स्थायीभाव आठ हैं जिनका प्रकटन विभावों, अनुभावों तथा संचारी भावों के सहकार से होता है । इनका विशद वर्णन भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र के सप्तम अध्याय में किया है । ( इस भावाध्याय की सम्प्रति अभिनवभारती प्राप्त नहीं है । भावों का विशेष विवरण यहाँ देना आवश्यक नहीं है, केवल रस के स्वरूप को स्पष्ट करने में सहयोगी रहने से इनके विवरण को यहाँ उपस्थापित किया गया है । )

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( ६६ ) रस - निष्पत्ति - भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में रस का विवेचन सूत्र भाष्य शैली में किया है । इनका प्रसिद्ध रस- निष्पत्ति विवेचक सूत्र है- ' विभावानु-भावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः ' अर्थात् विभाव, अनुभाव और संचारी-भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है । यह इस सूत्र का शाब्दिक अनु-बाद मात्र है । इसका स्पष्टीकरण स्वयं भरतमुनि ने लौकिकरसनास्वाद से मानसिक रसास्वाद की तुलना करते हुये बतलाया कि जैसे नानाप्रकार के व्यञ्जनों से उपस्थित सुसंस्कृत भोज्य ( अन्न ) का भोक्ता आस्वादन करता है इसी प्रकार विभाव, अनुभाव तथा संचारीभावरूप अभिनय से सम्बद्ध स्थायीभावों का सहृदय प्रेक्षक मानसिक आस्वादन करता है । यह आस्वादन नाव्य से प्राप्त होता है अतएव यही नाट्य रस कहलाता है जो परमानन्द स्वरूप वाला है । इन रससूत्र की व्याख्या भट्टलोल्लट, श्रीशंकुक, भट्टनायक तथा अभिनव-गुप्तपाद जैसे आचार्यों ने अपने - अपने भिन्न दृष्टिकोण के सन्दर्भों में प्रस्तुत की । आचार्य अभिनवगुप्त ने अभिनवभारती के आरम्भ में क्रमशः इस व्याख्या-कारों के मतों का उल्लेख करते हुये उनका खण्डन किया है । आचार्य मम्मट ने अभिनवगुप्तपाद के मत का ही स्वग्रंथ काव्यप्रकाश में अनुसरण किया । रस-निष्पत्ति की प्रक्रिया एवं उसके जो स्वरूप इन आचार्यों ने निर्धारित किये तदनु-सार रसनिष्पत्तिविषयक मान्यताएं उत्पत्तिवाद या भावोपचयवाद, अनुमिति-वाद, भुक्तिवाद तथा अभिव्यक्तिवाद के नाम से परम्परा बनाते हुए प्रसिद्ध हुई । भट्टलोल्लट तथा उनका उत्पत्तिवाद - रससूत्र के व्याख्याता भट्ट-लोल्लट के सिद्धान्त को उत्पत्तिवाद या स्थायीभावोपचयवाद कहा जाता है । इनके मूल विवरण तथा उसकी पोषक युक्तियों का विस्तार से अभिनवभारती में उल्लेख मिलता है । संक्षेप में इसका आशय यह है कि ये निष्पत्ति शब्द का अर्थ उत्पत्ति लेते हैं । तदनुसार विभाव, अनुभाव आदि से उपचित स्थायी-भाव ही रसरूप में उत्पन्न हो जाता है । अर्थात् स्थायीभाव का विभावादि से संयोग जब होता है तो रस की उत्पत्ति होती है । स्थायीभाव और रस की उत्पत्ति का सम्बन्ध कार्यकारणभाव की तरह होता है । रत्यादि स्थायी चित्तवृत्तियों के रसरूप में उत्पन्न होने में विभावादि कारण होते हैं तथा अनुभाव कार्य होते हैं । अतः लौकिक कारण कार्यभाव के समान ही विभावादि के संयोग से स्थायीभाव रसरूप में उत्पन्न होता है । अनेक प्राचीन आचार्य भट्टलोल्लट के इस तर्क से सहमत थे 1 इस प्रसङ्ग में भट्टलोल्लट ने रस के बास या स्थान की भी व्याख्या की है । प्रश्न यह है कि यह रस कहाँ स्थित होता है? भट्टलोल्लट का उत्तर है कि - रस प्रधानरूप हे अनुकार्य या मूल ऐतिहासिक व्यक्ति में निवास करता है परन्तु राम आदि के अनुरूप प्रतीति करवाने के कारण वह गौणरूप से ६ प्रस्ता ० ना ० शा ० प्र ०

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( ७० ) अभिनेता में भी निवास करता है । इस गौणता का कारण है अभिनेता का मूल या अनुकार्यं व्यक्ति के साथ तादात्म्य स्थापन जिसमें यह ठीक मूल नायक के समान ही अपने अनुभावों को संगठित करने में सफल हो जाता है और इसलिये नायक के मूल भावों की उसमें जागृति हो जाती है । यह आनन्दा-नुभव दर्शकों को अभिनेता में ( अनुकार्य के रूप में ) भ्रान्ति के कारण होता है अर्थात् प्रेक्षक नट में रामादि अनुकार्य का आरोप करता है, इसी कारण भट्टलोल्लट के सिद्धान्त को आरोपवाद भी कहा जाता है । दर्शक या सामा-जिक की रसप्रतीति के दृष्टिकोण के सम्बन्ध में भट्टलोल्लट ने कोई विवरण नहीं दिया । अभिनवगुप्त ने जिस रूप में उनके मत को प्रस्तुत किया उसमें दर्शक के लिये कोई संकेत नहीं मिलता है । आचार्य मम्मट ने काव्यप्रकाश में अभिनवगुप्त के उद्दिष्ट पाठ में थोड़ा संशोधन करते हुए प्रतीयमान शब्द जोड़ दिया जो दर्शक का भी बोधक है । अन्य आचायों के मत में भट्टलोल्लट द्वारा प्रयुक्त नट शब्द उपलक्षण है जिसके द्वारा सामाजिक का भी ग्रहण हो जाता है क्योंकि सामाजिक को रसानुभूति होती ही है । मम्मट का संशोधित पाठ इस प्रकार है— मुख्यया वृत्या रामादावनुकार्ये तद्रूपतानुसन्धात् नर्तकेऽपि प्रतीयमानो रसः ( का ० प्र ० झल ० सं ० पृष्ठ ८८ ) भट्टलोल्लट का सिद्धान्त तत्त्वतः व्यावहारिक था । उनके मत में विभा वादि की अनेकता में एकता का जनक स्थायीभाव ही विषय रूप रस हो जाता है । उसे ही रसविधायक तत्त्व पुष्ट करते हैं तथा पुष्ट कर प्रभावशाली बना देते हैं । इसके अनुसार विषयरूप रस में विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भावों की अनेकता के मध्य विद्यमान स्थायीभाव की ही एकता है क्योंकि रसविधायक तत्त्व- समुदाय में स्थायीभाव एकता का उत्पादक तत्त्व होता है, जिससे सभी तत्त्व सम्बद्ध होते हैं । सामान्यतः स्थायीभाव उसको उत्पन्न करने वाले किसी कारण के आधार पर होता है, जहाँ अभिनेता अपने अभिनय-कौशल तथा नाटकीय वातावरण की सहायता के द्वारा मूल पात्र के साथ अपना तादात्म्य स्थापित कर लेता है । और वह मूलपात्र की ही भाँति आचरण करते हुये उसी भाव को उत्पन्न कर लेता है जिसे कवि ने नायक के अन्तःकरण में विद्यमान दिखलाना चाहा था । अतः पूर्वप्रतिपादित विधि के अनुसार स्थायीभाव ही विषय रूप रस हो जाता है यह स्पष्ट है । यद्यपि भट्टलोल्लट का यह मत मुख्यरूप से व्यवहारिक आधार को लेकर प्रवृत्त हुआ था किन्तु इस मत में श्रीशंकुक ने आक्षेप करते हुये उसे दोषपूर्ण बतलाया । इनका कहना है कि श्रीभट्टलोल्लट ने जिस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया उसके अनुसार दर्शक के अन्तःकरण में विद्यमान रस के कारणों को स्पष्ट नहीं किया जा सकता है क्योंकि रसविधायक तत्त्वों में प्रमुख तत्व

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( ७१ ) स्थायी भाव की प्रत्यक्षतः जब प्रतीति सम्भव नहीं है तो वह दर्शक के अन्तः करण में प्रकट कैसे होगा और जब तक स्थायीभाव की प्रतीति दर्शक को न हो तो रसोत्पत्ति कैसे सम्भव होगी । इस मत के अनुसार रङ्गमञ्च पर प्रस्तुत किये गये इतिवृत्त को प्रत्यक्ष देखकर दर्शक को कुछ समय के लिये वैसा ही अनुभव होगा जैसा सत्यरूप में घटित देखने से हो सकता था, क्योंकि दर्शक को नाटकीय नायक के अन्तः-करण में विद्यमान उस भाव की स्थिति का ज्ञान होता है जो वास्तविक न होकर कल्पित है तथा जिसको कला के प्रदर्शन द्वारा भ्रम उत्पन्न करते हुये चतुर अभिनेता ने साधा है । श्रीशंकुक ने जब भट्टलोल्लट की रस व्याख्या में रङ्गमञ्च पर प्रस्तुत किये गये रस तथा दर्शकगत रस के अर्थों को बिना किसी विभेद को स्पष्ट करते हुये पाया तो उसे सदोष सिद्धान्त दिखलाया क्योकि बिना पारस्परिक भेद के यदि इन दोनों शब्दों में रस शब्द को प्रयुक्त करेंगे तो फिर प्रदर्शनगत रस और दर्शक के अनुभवगत रस में समानता आ ही जाएगी, परन्तु इस समानता या अभेद का जब कोई स्पष्ट उल्लेख ही नहीं है । तो इनकी सिद्धि नहीं हो सकती । इसलिये यह भट्टलोल्लट के सिद्धान्त - प्रति पादन में कमी है । इसके अतिरिक्त दूसरा आक्षेप इसी सिद्धान्त पर और भी है जहाँ वे रस एवं स्थायीभाव के पारस्परिक विभेद को दिखलाते हैं । स्थायीभावों के उपचय या परिपुष्टि को भट्टलोल्लट ने रस माना था । श्रीशंकुक का इस सन्दर्भ में कहना है कि यदि परिपुष्टि या उपचय के कारण ही रस हो जाता है तो इस उपचित में असंख्या -क्रम होने से प्रत्येक स्थायीभाव के ही अनेक रूप हो जाएँगे । यदि यह मान लिया जाए कि स्थायीभाव की परिपुष्टि का अन्तिम बिन्दुभूत तत्व रस है तो ऐसी स्थिति में करुणरस का अस्तित्व नहीं रहेगा, क्योंकि करुणरस का स्थायीभाव शोक है और शोक के तो आरम्भ में ही तीव्रता रहती है एवं जिसका उत्तरोत्तर उपचय होता जाता है और ज्यों-ज्यों समय बीतता जाता है त्यों - त्यों उसका आवेग कम होता है । अतएव यह मानना कि शोक स्थायीभाव अपने अन्तिम बिन्दु पर रस हो जाता है, व्यर्थ होगा । अतः स्थायीभाव अपने चरम बिन्दु पर रस बन जाता है यह भट्ट-लोल्लट का सिद्धान्त भी युक्तिहीन है । ( द्रष्टव्य - नाट्यशास्त्र प्रस्तुत संस्करण अभिनवभारती - पृष्ठ २३१-२३२ ) । श्रीशंकुक का अनुकरण अथवा अनुमितिवाद - श्रीशंकुक ने रससूत्र की व्याख्या के प्रसङ्ग में भट्टलोल्लट की समीक्षा के बाद रसमीमांसा करते हुए अपना सिद्धान्त रसानुकरणवाद या अनुमितिवाद के आधार पर प्रतिपादित किया । इसके अनुसार रस के अनुभव का कारण नाट्यप्रदर्शन का प्रमेय रूप में प्रत्यक्ष होना है । इनने रस के दो स्वरूप बतलाये - एक तो विषयगत-रूप रस जो रङ्गमञ्च पर प्रदर्शित होता है तथा दूसरा दर्शक के अन्तःकरण में

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( ७२ ) विद्यमान अनुभवगम्यरूप रस । इसकी व्याख्या यहाँ आवश्यक है । श्रीशंकुक इस समस्या को कि दर्शक के अन्तःकरण में सर्वांगपूर्ण रस का अनुभव किस प्रकार हो, क्योंकि स्थायीभाव एक मानसिक दशा है, जिसका विषय रूप में ज्ञान अन्य रसविधायक तत्वों की भाँति प्राप्त नहीं किया जा सकता है तो इसके समाधान के लिये उनने अनुमितिवाद को आधार बनाकर इस समस्या पर अपना विचार प्रस्तुत किया । इनके अनुसार प्रत्यक्षरूप विभाव, अनुभाव, तथा व्यभिचारीभाव आदि रस विधायक तत्वों से स्थायीभाव का उसी प्रकार अनुमान होता है जैसे उठते हुए धूम को प्रत्यक्ष पर्वत के शिखर पर देखकर उसके ऊपर सघन वृक्षों में प्रच्छन्न अग्नि के अस्तित्व का अनुमान से ज्ञान किया जाता है । यह ज्ञान अनुकरण स्वरूप होता है तथा अभिनेता अपनी अभिनय निपुणता के द्वारा अनुकार्य रामादि से अपना अभिन्न बोध दर्शक को करवाता है । दर्शक का यह ज्ञान भ्रान्ति नहीं है- ( जैसा कि भट्टलोल्लट मानते हैं ) क्योंकि भ्रान्ति या आरोप क्षणस्थायी होता है । इसका स्वरूप संशय के सदृश भी नहीं है क्योंकि दर्शक के अन्तःकरण में यह सन्देह नहीं उठता कि रङ्गमश्व पर प्रदर्शित नायक अभिनेता है यह वही व्यक्ति जिसका वह अभिनय कर रहा है । इस अनुभव का स्वरूप न यथार्थ वस्तु के अनुभव के सदृश होता है और न ही मिथ्या ज्ञान की स्थिति में इसे रखा जा सकता है । यह तो चित्रतुरङ्ग के समान विलक्षण है । इसमें चित्र में अश्व की सजीव आकृति देखकर जैसे यह ज्ञान उत्पन्न होता है कि यही अश्व है, इसी प्रकार सहृदयदर्शक अभिनेता में राम आदि मूल व्यक्ति के अनुभावों आदि को देख-कर वहाँ स्थायीभाव की सत्ता का अनुमान लगा लेते हैं । यह अनुमानित स्थायीभाव मूल व्यक्ति राम के यथार्थ स्थायीभाव का अनुकृत रूप होने से तथा हृदयाकर्षक विभावादि से संवलित होने से विशेष मोहकरूप धारण करता है । इसी का विकास दर्शक के अन्तःकरण में आनन्ददायक दशा में होता है. तथा आनन्ददायक होने के कारण इसे रस कहते हैं । इस प्रकार प्रेक्षकों के द्वारा रस की सत्ता का अनुमान होने से विभावादि इसके अनुमापक बन जाते हैं तथा रस हो जाता है अनुमाप्य । इस प्रकार श्रीशंकुक अनुमितिवाद का आधार लेकर यहाँ स्पष्टतापूर्वक समझते हैं कि वास्तविक रति आदि दुष्यन्त या रामादि में है किन्तु अभिनेता में उसकी अनुकरणात्मकता के रहने के कारण अनुक्रियमाण स्थायीभाव ही रस रूप में अनुमानित किया जाता है । श्रीशंकुक के अनुमिति या अनुकरणवाद की समीक्षा आचार्य अभिनवगुप्त-पाद के नाट्यशास्त्र के आचार्य भट्टेन्दुराज तथा भट्टतोत ने विस्तार से की थी जिसका उल्लेख अभिनवगुप्तपाद ने किया है । इन आचायों के मत में श्री-शंकुक का यह सिद्धान्त कि ' अनुक्रियमाण स्थायीभाव रस है ' स्वीकार नहीं

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( ७३ ) किया जा सकता है । क्योंकि यह न तो दर्शक या सामाजिक के दृष्टिकोण से, न अभिनेता के दृष्टिकोण से और न ही नाट्यशास्त्र के आचार्य भरतमुनि की दृष्टि से आदरणीय ( या अभिमत ) है । प्रथमतः दर्शक या सामाजिक के दृष्टिकोण से श्रीशंकुक का सिद्धान्त स्वीकृत नहीं किया जा सकता, क्योंकि अनुकरण की प्रतीति तभी होगी जब उसका प्रत्यक्ष या प्रामाणिक ज्ञान हो जिसको अनुकृत कहा जाता है । सुरापान का अनुकरण करता हुआ जब कोई अभिनेता दुग्धपान करते हुए यह बतलाये कि इसी प्रकार व्यक्ति मदिरापान करता है तो दर्शक उसके दूध पीने को देखकर ( किसी ) व्यक्ति के मदिरापान की बात अनुकृति के आधार पर मान लेगा । परन्तु नाट्यप्रदर्शन में दर्शक ऐसी कौन - सी वस्तु को अभिनेता में देखता है जिसको स्थायीभाव की अनुकृति माना जाए । क्योंकि जो प्रत्यक्ष दिखलाई देता है वह तो अभिनेता का शरीर तथा उस पर स्थित मुकुटादि है, जिससे युक्त होकर अनुभाव तथा सात्वि कादिभावों का वह प्रदर्शन कर रहा है । परन्तु यहाँ यह तो कोई नहीं मान सकेगा कि ये सब स्थायीभाव के अनुकरण हैं, क्योंकि दोनों में आधार तथा स्वरूपगत विभेद है । प्रत्यक्ष होने वाली वस्तुएं भौतिक हैं और स्थायीभाव आत्मा का आधार लेकर मूलरूप से मानसिक है । फिर इनको जानने के साधन भी अलग - अलग होते हैं । भौतिक वस्तुओं का नेत्रादि इन्द्रियों से प्रत्यक्ष-ज्ञान होता है जब कि स्थायीभाव की प्रतीति अन्तःकरण से होती है । इसमें दूसरा कारण यह भी है कि अनुकरण का ज्ञान बिना अनुकार्य तथा अनुकृति के प्रत्यक्षज्ञान के नहीं हो सकता । अनुकरण सदृशतामूलक होता है । तथा मुख्य अनुकार्य रामादि ( ऐतिहासिक मूल व्यक्ति ) तथा अमुख्य अनुकर्ता-अभिनेता दोनों पर देखने पर ही अनुकरण की प्रतीति होती है । इस मूल ऐतिहासिक व्यक्ति या अनुकार्य के रत्यादि भाव प्रेक्षकों में से किसी के भी द्वारा प्रत्यक्ष नहीं किया गया, अतः अभिनेता राम के रतिभाव का अनुकरण करता है तथा यह अनुक्रियमाण रत्यादिस्थायीभाव रसरूप में अनुमाप्य होता है यह मानना आधारहीन है; क्योंकि प्रत्यक्षीकरण के अभाव में अनुकार्य का तो अनुकरण जब संभव ही नहीं होता तब स्वरूप में अनुक्रियमाण रत्यादि को कैसे अनुमाप्य मानें । इस प्रकार जब अनुकार्य का अनुकरण ही संभव नहीं तो फिर अनुमाप्य रस कैसे हो सकेगा । यह युक्ति भी अधिक सारवती नहीं है । कि भरतमुनि ने स्वयं इस अनुकरण सिद्धान्त का समर्थन किया है, क्योंकि नाट्यशास्त्र में ऐसा कोई विवरण या अंश नहीं मिलता है जिसके प्रकरणादि को देखकर पर्याप्त रूप से अनुकरण के सिद्धान्त का समर्थन हो सके । इस प्रकार श्रीशंकुक का यह सिद्धान्त कि रङ्गमन्च पर प्रदर्शित स्थायीभाव अनु-कृतिस्वरूप है, प्रत्येक दृष्टि से दोषग्रस्त है ।

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( 68 ) भट्टनायक का भुक्तिवाद या त्रिविध - व्यापारवाद - आचार्य भट्टनायक ने भट्टलोल्लट तथा श्रीशंकुक के पूर्वोक्त मतों की समीक्षा करते हुए खण्डन किया है । इनने रस की प्रतीति, उत्पत्ति या अभिव्यक्त का निषेध किया क्योंकि रस की प्रतीति, उत्पत्ति अथवा अभिव्यक्ति को पात्रनिष्ठ अथवा परगत मानने पर प्रेक्षकों को रसास्वादन सम्भव नहीं होगा । यदि स्वगत अथवा प्रेक्षकनिष्ठ स्वीकार करें तो करुणरस के प्रसङ्ग में प्रेक्षक का हृदय शोकाप्लावित होने लगेगा । तथा परगत स्वीकार करने से सामाजिक को कोई रसानुभूति नहीं होगी और रस की प्रतीति स्वीकार करने पर दुःख-प्रधान रसों में प्रेक्षकों के शोकाभिभूत हो जाने की आशङ्का होने लगती है । इसलिये भट्टनायक ने रसानुभूति के लिये नवीन सिद्धान्त प्रस्तुत किया, जिसे भुक्तिवाद कहा जाता है । इसमें त्रिविध - व्यापार के अन्तर्गत प्रथम है अभिधाशक्ति जिसके द्वारा वाच्यार्थ का ज्ञान होता है, तदन्तर नाट्य प्रयोग या काव्य में भावकत्व और भोजकत्व नामक दो अन्य व्यापार और होते हैं । भावकत्व या भावना व्यापार द्वारा सामाजिक के अन्तःकरण में राम और सीतारूप विभावादि का साधारणीकृत रूप में आविर्भाव होता है, जिनमें उनके रत्यादि भाव साधारणीकृत होकर सामाजिक या प्रेक्षक के अन्तःस्थिति रत्यादि भाव से तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं और उनके रत्यादि स्थायीभावों में सामाजिक स्वयं विलीन हो जाता है । सामाजिक की परत्व एवं ममत्व-परक भेदवृत्ति इसी व्यापार से विलीन हो जाती है तथा इसी भावकत्व व्यापार के परिणामस्वरूप भोग का जो रस का साक्षात्कारक होता है-प्रादुर्भाव होता है । इनके मत में रसास्वादन की दशा में सामाजिक की अनुभूति में रजस् और तमस् तत्त्व की अपेक्षा सत्त्व का ( अधिक ) आविर्भाव होता है, जो प्रकाश, आनन्द तथा विश्रान्तिमयता सम्पन्न होता है । आनन्द की यह दशा चेतना के ऐसे चरम आनन्द का स्वरूप होती है जो ब्रह्मास्वाद - सहोदर है । ब्रह्म की आध्यात्मिक अनुभुति से इसका अन्तर यह है कि रसानुभूति सीमित होती है, यद्यपि रसानुभव काल में इस सीमा का भान नहीं रहता, क्योंकि नाट्यप्रदर्शन तथा प्रेक्षक में साधारणीकरण व्यापार द्वारा तादात्म्य रहता है । इस रसानुभूति को सामान्य लौकिक अनुभव मानने में प्रत्यक्ष स्मृति आदि की अपेक्षा माननी पड़ेगी, अतः सत्त्व की प्रमुखता के कारण एक पूर्ण आनन्द की दशा में साधारणीकृत दर्शक के साधारणीकृत विषय रूप वाली रसानुभूति भट्टनायक का प्रतिपाद्य है । भट्टनायक का महत्व इसलिये है कि इनने रस का सम्बन्ध सामाजिकों के साथ जोड़ने का श्लाघनीय प्रयास करते हुए साधारणीकरण व्यापार की उद्भावना की, जो नाट्यशास्त्र सम्मत, व्यवहारिक तथा उपयुक्त भी थी, परन्तु

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भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १, पृष्ठ 90 का मूल पृष्ठ
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( ७५ ) इतने जो दो अतिरिक्त व्यापार माने उनकी प्रामाणिकता में परवर्ती विद्वानों ने सन्देह प्रकट किया तथा इन व्यापारों को रसनिष्पत्ति में आवश्यक भी माना । इसके अतिरिक्त इनके मत में यह विशेषतः स्पष्ट नहीं होता था कि जिस स्थायीभावका भोग किया जाता है, उसका आश्रय या स्थिति पात्र या प्रेक्षक में से किसमें मानी जाए । आचार्य अभिनवगुप्त का अभिव्यक्तिवाद - भट्टलोल्लट के पूर्ववर्ती नाट्यशास्त्रीय व्याख्याकार विद्वानों से लेकर आचार्य अभिनवगुप्त के बीच में आने वाले नाट्यशास्त्रीयव्याख्याकार भट्टनायक जैसे विद्वानों ने अभिनवगुप्त के सिद्धान्त के लिये पर्याप्त विचार सामग्री एकत्र कर दी थी । साहित्य के जिस युग में आचार्य अभिनवगुप्त का आविर्भाव हुआ उसकी अपनी ऐतिहासिक महत्ता अनेक कारणों से है । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने रस - सिद्धान्त में अभि-व्यक्तिवाद का प्रवर्तन किया । यह कार्य इनके द्वारा आचार्य आनन्दवर्द्धन के सिद्धान्त तथा अपने नाट्यशास्त्रीय उपाध्याय भट्टतोत के निर्देश के आधार को लेकर सम्पन्न किया गया था । इस समय मानवीय अनुभूतियों का विश्लेषण सिद्धान्त - ग्रन्थों का आधार बन रहा था जिसमें उपयुक्त तर्कवाद को संयुक्त किया जाता था । आचार्य अभिनवगुप्तपाद का संसार में विद्यमान शास्त्रों के अध्ययन और व्याख्यान तथा शैवसिद्धान्त की साधना के अतिरिक्त जीवन का अन्य लक्ष्य भी नहीं था । दर्शन, तन्त्र, व्याकरण तथा काव्य शास्त्र के समग्र प्राचीन ज्ञान की विपुल राशि को इनने आत्मसात् कर लिया था और इसी कारण रससिद्धान्त की समस्याओं को नये दृष्टिकोण से समझकर अपने सिद्धान्त की रचना करने में ये पूर्ण सक्षम हो गये थे, जो इनकी बहुशास्त्र-चिन्तना का पिण्डीभूत परिणाम था । इनने रसनिष्पत्ति का सिद्धान्त काश्मीरी शैव दर्शन के आभासवादी दृष्टिकोण को अपनाते हुए रसानुभव सम्बन्धी समस्याओं से लेकर उपस्थापित किया । अभिनवभारती में इनका यह मन्तव्य विस्तार से ( प्रस्तुत संस्करण में भी ) विद्यमान है जिसका आधार लेकर काव्यप्रकाशकार मम्मटभट्ट तथा अन्य परवर्ती आलंकारिक आचार्यों ने रस-मीमांसा की थी । ( अतः हम उनके सिद्धान्त का अति - संक्षिप्त विवरण यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं ) । आचार्य अभिनवगुप्तपाद के मत में निष्पत्ति शब्द का अर्थ है अभिव्यक्ति तथा संयोग शब्द से विभावादित्रय का सम्मिलित रूप लिया गया है, जो रसाभिव्यक्ति में कारण है, किन्तु अभिनवगुप्ताचार्य रस में पूर्व आचार्यों की तरह कारण, कार्यं तथा सहकारी जैसे सम्बन्धों का निषेध करते हैं । इनके मत में रस अलौकिक है, लौकिक नियमों से परे है । ये भट्टनायक के भावकत्व एवं भोजकत्व जैसे ( दो ) अतिरिक्त व्यापारों को न मानकर केवल उनके