भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 91–100

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 91–100

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( ७६ ) साधारणीकरण व्यापार को स्वीकार करते हैं, किन्तु इनका यह साधारणी-करण व्यापार सर्वसाधारण से सम्बद्ध है जिसमें विभावादि का सम्बन्ध नायक-नायिकादि से दूर हटा दिया गया है । अभिनवगुप्त की यह साधारणीकरण की कल्पना अतिशय व्यावहारिक, उपयुक्तयुक्ति समन्वित तथा नाट्यशास्त्र-सम्मत भी है तथा इसी कारण सभी पूर्ववर्ती व्याख्याओं से अधिक मान्य है । सहृदय रसानुभूति कैसे करता है? इस प्रश्न को उठाते हुए आचार्य अभिनवगुप्त ने समाधान हेतु साधारणीकरण सिद्धान्त प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार पात्र, काल, देश आदि की सभी विशेषताओं से निर्मुक्त होकर प्रेक्षक विभावानुभावों को देखकर ऐसे आनन्द की अनुभूति करता है जो सभी सह-दयों को भोग्य है । दुष्यन्त और सकुन्तला की रङ्गमश्वस्थ रत्यानुभूति को देखकर प्रेक्षक को ऐसी प्रतीति नहीं होगी कि यह अनुभूति दुष्यन्त और शकुन्तला की ही है उनकी नहीं । रति का इस प्रकार विशेषता निर्मुक्त रूप उन्हें साधारणीकरण व्यापार में उपलब्ध होता है और साधारणीकृत रत्यादि स्थायीभाव का सहृदय आनन्द लेते हैं जो कि अलौकिक है । यही रसानुभूति अभिनव की प्रतिपाद्य थी, क्योंकि वे रामादि पात्र में रसानुभूति का निषेध करते हैं । इनकी युक्ति यह है कि जैसे मद्य का आस्वादन मद्य का पात्र नहीं करता, किन्तु वह दूसरों को मद्यपान करवाने में हेतु बनता है इसी प्रकार अभि-नेता भी स्वयं रसानुभूति प्राप्त न करके सामाजिक या प्रेक्षक को ही रसास्वा दन करवाने में हेतु हो जाता है । इसका कारण यह है कि अभिनेता को तो अभिनय प्रस्तुत करने के समय श्रम होता है, अतः उसे रसास्वाद कैसे होगा । नाट्यरस की अनुभूति के आधार सहृदय कैसे हो? इन प्रश्न का उत्तर देते हुए अभिनवगुप्त ने बतलाया कि ये प्रेक्षक या सहृदय स्वभावतः निर्मल-दर्पण के समान पारदर्शी हृदयवाले होते हैं, जो रूपक के प्रत्यक्ष करने के समय सामान्य जन की तरह लौकिक क्रोध - मोहादि से परे रहते हुये मश्व पर प्रस्तुत किये गये अलौकिक रस का आनन्द प्राप्त करते हैं । ऐसा होने पर जो रसा नुभूति इन्हें होती है, वह लोकजन्य न होकर नाट्यजन्य हो जाती है । ऐसी ही अनुभूति काव्य पाठ या काव्यश्रवण के समय भी सहृदयों में देखी जाती है तथा इसी कारण वे काव्यजन्य रसानुभूति से भी अलोकिक रस का आनन्द प्राप्त करते हैं । इस अनुभूति का कारण होता है सहृदय के अन्तःकरण में विद्यमान रत्यादि भाव की वासना या संस्कार जिससे उनके अन्तःकरण भावित होते हैं । ऐसा स्थायीभाव जब साधारणीकृत विभावादि की उपस्थिति से उबुद्ध हो जाता है तो यही अभिव्यक्ति हो जाती है, जिससे सहृदय तन्मयी भाव की दशा में आकर परमानन्द रस का आस्वादन करने लगता है ।

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( ७७ ) रससूत्र में स्थायिन शब्द का भरतमुनि द्वारा समावेश नहीं करने की कारणमीमांसा - यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि भरतमुनि ने रस-निष्पत्ति सूत्र में स्थापित् शब्द का प्रयोग नहीं किया है । इस संकेत को नाट्य-शास्त्र के दो व्याख्याकारों - ( १ ) श्रीशंकुक तथा ( २ ) आचार्य अभिनवगुप्त-पादने अर्थपूर्ण बतलाया है । हम क्रमशः उनके मन्तव्य यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं: -श्रीशंकुक के अनुसार स्थायीभाव अनुमानप्रमाण के द्वारा बोध्य होता है । भरतमुनि ने स्थायिन् शब्द का यहाँ प्रयोग इसलिये नहीं किया है । रस स्थायीभाव के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं होता तथा जिसका प्रत्यक्ष होने वाले विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों के आधार पर अनुमान किया जाता है । इसका आशय यही है कि भरतमुनि के अनुसार दर्शक के अन्तःकरण में जिस स्थायीभाव का बोध होता है वह विभावादि के बोध से भिन्न है । जिन विभा वादि का ज्ञान प्रत्यक्षप्रमाण से होता है उन्हें तो मुनि ने शब्दों से बतलाया है । किन्तु स्थायीभाव का बोध अनुमान से होने के कारण ( स्थायी शब्द का ) अत्यावश्यक होने पर भी रससूत्र में भरतमुनि ने समावेश नहीं किया । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने रस- परिभाषा सूत्र में स्थायिन् पद के भरत-मुनि द्वारा प्रयोग न करने की विशद मीमांसा की है तथा इस प्रश्न को उठा-कर दो स्थानों पर इसका उत्तर दिया है । इसमें प्रथम अभिनवभारती में रस-सूत्र के व्याख्यान प्रसङ्ग में तथा दूसरा ध्वन्यालोक की ( प्रथमोद्योत १।२१ की ) लोचन व्याख्या में रस व्याख्यान के अवसर पर भी है । आचार्य अभिनवगुप्त के अनुसार विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारीभाव से पृथक् रूप में स्थायीभाव का अनुभव नहीं होकर वह उनके मिश्रित तथा सामुदायिक रूप का वैसा ही अनुभव है जिसकी समानता प्रपाणकरस से दी जाए | जैसे प्रपाणक रस का स्वाद इसके विधायक किसी एक अङ्गभूत पदार्थ का नहीं होता, किन्तु यह एक विशिष्ट स्वाद है जो इन सभी विविधि पदार्थों के सामंजस्यपूर्ण मिश्रण के कारण विलक्षण रूप में व्यक्त हुआ है । अतः जो यह प्रतिपादित करते हैं कि विभावादि के प्रत्यक्षबोध से ज्ञात स्थायीभाव का अनुभव ही रसास्वादन है, यह उचित नहीं है । इसका कारण यह भी है कि रसानुभाव के विधायक तत्वों में जो प्रधानतत्त्व है वह है स्थायीभाव | इस स्थायीभाव की प्रतीति या बोध भी किसी स्वीकृत प्रमाण - परिपाटी से सम्भव नहीं है । यह प्रतीति मानसिक होने के कारण प्रत्यक्षप्रमाण से अवगत भी नहीं हो सकती है । अनुमानप्रमाण से भी इसका बोध सम्भव नहीं है, क्योंकि अनुमानप्रमाण से इसका ज्ञान मानने पर इसका सम्बन्ध किसी दूसरे के साथ

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( ७८ ) अवश्य मानना पड़ेगा तथा ऐसा होने पर फिर यह स्थायी आस्वाद्यमान नहीं रह पाएगा । भरतमुनि ने भी रससूत्र में स्थायिन् शब्द का प्रयोग इसलिए नहीं किया था तथा वे भी इससे यही स्पष्टतः सूचित करना चाहते थे कि जब विषयरूप स्थायीभाव का ज्ञान किसी प्रमाण से सम्भव ही नहीं होता है तो फिर इस शब्द का निवेषकर रस का स्वरूप कैसे बतलाया जा सकता है । इसका अन्य कारण यह भी है कि स्थायी नाटकादि के नायक के साथ तादात्म्य प्राप्त करने के कारण दर्शक की उपचेतना से निकल कर और फिर चेतनांग में जाकर अभिव्यक्ति प्राप्त करता है । स्थायीभाव रसविधायक तत्वों में मुख्य ( होता ) है, यह अनेक बार बतलाया जा चुका है । ( तथा यह भी कि ) स्थायीभाव से संयुक्त रहने पर ही विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारीभाव जैसे रस विधायक तत्त्वों का महत्त्व माना जाता है । रसों के विभेद एवं संख्या - रसों की संख्या के सम्बन्ध में भारतीय नाट्यशास्त्रीय परम्पराएँ अनेक ( विरोधी ) मान्यताओं को लिये हुए है । इन ( विरोधी ) मान्यताओं के प्रसङ्ग में ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि ऐसी दशा में रस शब्द का प्रयोग एक ही अर्थ में नहीं ( किया गया ) है । कहीं पर प्रसङ्गानुसार रस शब्द का आशय रसास्वादन किया गया है तो कहीं रसानु-भावक संमिश्रित सामग्री के समुदायरूप अर्थ के भाव में रस शब्द का प्रयोग हुआ है तथा कहीं इन दोनों अर्थों को क्रोडीकृत किया गया है । इससे जो मत-भिन्नता आई उसके अनुसार रसों की संख्या भी भिन्न - भिन्न विनिश्चित हुई । धाराधीश भोज ने मानवात्मा में विद्यमान अहङ्कार को ही रसराज शृंगार-रूप एकरस स्वीकार किया और भवभूति के उल्लेख से करुणरस ही मूल रस है, जिससे शृंगारादि रसों की उद्भूति या प्रवृत्ति होती है । आचार्य भरत-मुनि के मान्य व्यवहारिक आठ रस हैं । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में अपने परम्परा प्राप्त पाठ को मानकर नो रस स्वीकारते हुए शान्त रस को सभी रसों का मूल मानने की सप्रमाण व्याख्या की है । अन्य शास्त्रकार इन नौ प्रभेदों में वात्सल्य, लौल्य एवं भक्ति को मिलाकर रस के बारह भेद तक निरूपित करते हैं । सभी आचार्यों ने अपनी जीवनदृष्टि तथा रचनाओं को ध्यान में रखकर तदनुरूप रस के स्वरूप तथा संख्या आदि का विनिश्चय किया था, यह इससे स्पष्ट होता है । भरत मुनि के अनुसार व्यावहारिक दृष्टि से जो नाट्य में आठ रस हैं उनमें मूल रस चार हैं, जिनसे चार रसों की उत्पत्ति हुई है । इसमें शृङ्गार से हास्य, वीर से अद्भुत, रौद्र से करुण तथा बीभत्स से भयानक रस उत्पन्न हैं ।

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( 198 ) आचार्य अभिनवगुप्तपाद का कहना है कि भावों तथा रसों के आन्तरिक सम्बन्धों का यह व्याख्यान भरतमुनि ने रसों की उत्पत्ति दिखाकर जिस प्रकार प्रस्तुत किया है यह कोई स्पष्टरूप में नियम - निश्चय नहीं है । रसों की संख्या के सम्बन्ध में जो भी कुछेक आचार्यों में विभेद हो, परन्तु आठ रस सभी आचार्य स्वीकार करते हैं । तथा भरतमुनि के द्वारा निरूपित चार रसों से अन्य चार रसों के उद्भव के कारण आठ रस के सिद्धान्त को मानवीय अन्तश्चेतना की विकासशील प्रक्रिया के अतिशय समीप तथा अनुरूप भी माना जाता है । एकरस वाद: -धाराधीश भोज ने मात्र एक शृङ्गार ही रस माना है, जिसमें रत्यादि भाव शृङ्गार या अभिमान से उद्भुत ( होते ) हैं । यहाँ शृङ्गार शब्द अहङ्कार या अभिमान का समानार्थक है । यही अहङ्कार रस है, जो सुखादि भावों के अनुभव का कारण है । यह एक विशेष प्रकार का अहङ्कार है, क्योंकि इसकी उत्पत्ति सत्वप्रधान प्राणियों के पुण्यकर्मों से होती हैं । यही सहृदय के मन में जागता है । जिसमें अहङ्कार मूलरूप में रहता है, वही स्वात्मानुभवात्मा रस है । इनके मतानुसार इसी श्रृंगार के कारण सहृदय के अन्तःकरण में रत्यादि भाव उत्पन्न होते हैं । ' शृङ्गार ही केवल रस है ' इस सिद्धान्त के प्रसङ्ग में श्रृंगार शब्द का रस- सामान्य के रूप में प्रयोग इष्ट नहीं है । शृङ्गार का सामान्य अर्थ है, वह रसानुभावक सामग्री जिसका प्रधान अंश रति नामक स्थायीभाव होता है? भोज ने शृंगार का अर्थ एक विशेष प्रकार का स्वात्मानुभव लिया जिसका कारण सात्विक पुरुषों के पुण्यकर्म हैं और जिसकी उत्पत्ति पूर्व-जन्म के संस्कारों से होती है । यह शृङ्गार एक रस- कोटि में इसलिये आता है, क्योंकि इसके द्वारा सहृदय व्यक्ति को उन्नततल पर आसीन करवाया जाता है ( येन शृङ्गमुच्चयो रीयते स शृंगारः - श्रृंगारप्रकाश ) । भवभूति के करुणरस पर विचार करने से विदित होता है कि सामान्यतः जिस पद्य में करुण शब्द का प्रयोग एक विशिष्ट रस के लिये किया गया है । तथा जो उत्तररामचरित के तीसरे अङ्क में दर्शाया भी गया है । अतएव इतने उल्लेख मात्र से यह कहना ठीक नहीं होगा कि भवभूति केवल करुणरस को ही प्रमुख या उद्भावक रस की कोटि में भोज के केवल शृङ्गार की तरह मानते थे । स्वीकृत रस - रसों की संख्या के सम्बन्ध में चाहे आचार्यों में मत विभेद हों किन्तु प्रायः सभी आठ या नौ रसों को स्वीकार करते हैं । क्रमशः इनका विवरण इस प्रकार है १. शृङ्गार - शृङ्गार रस का स्थायीभाव रति है । इसके संयोग तथा विप्रलम्भात्मा दो प्रकार होते हैं । इसमें आलस्य, उग्रता और जुगुप्सा के अति-

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( ८० ) रिक्त तभी संचारीभाव रखे जाते हैं । करुण तथा शृङ्गार के विप्रलम्भप्रभेद में यही अन्तर है कि करुण निरपेक्ष है तथा उसमें निराशा के भाव से जीवन दुःखमय रहता है परन्तु विप्रलम्भ में आशा का बन्धन होने से प्रेम - भाव स्थिरता बनाये रहता है । शृङ्गार के भरत मुनि ने वाक्य, वेष तथा क्रिया भेद से तीन प्रकार और भी माने हैं । २. हास्य- इसका स्थायीभाव हास होता है । इसमें अवहित्था, आलस्य तथा तन्द्रा आदि संचारीभाव होते हैं । इसके आत्मत्स्थ तथा परस्थ दो विभेद होते हैं । हास्य संक्रमणशील स्वरूप वाला होता है । मानव प्रकृति के अनुसार स्मित, हसित, विहसित, उपहसित, अपहसित ये छः भेद हैं जो क्रमशः दो - दो के प्रभेदों में उत्तम, मध्यम तथा अग्रम प्रकृति के पात्रों में दिखाई देते हैं । यह भी अङ्ग, वाक्य तथा वेष - रचना के भेद से तीन प्रकार का होता है । ३. करुण - करुण रस का स्थायीभाव शोक है । धर्मनाश, बन्धुनाश तथा अर्थनाश से उत्पन्न करुण रस के तीन प्रकार और हो जाते हैं । इसमें निर्वेदादि संचारी भाव होते हैं । भरतमुनि ने करुण तथा शृङ्गार को स्थायी-भाव प्रभव तथा अन्य रसों को स्थायीभावात्मक बतलाया है । ४. रौद्र - रौद्र रस का स्थायीभाव क्रोध होता है । इसके भी अङ्ग, वेष तथा रचनाभेद से तीन प्रकार होते हैं । ५. वीर - इसका स्थायीभाव उत्साह है । इसमें धृति, स्मृति आदि संचारीभाव होते हैं । इसके दान, धर्म तथा युद्ध - वीर नामक तीन प्रभेद और हो जाते हैं । ६. भयानक — इसका स्थायीभाव भय है । इसके स्तम्भ, स्वेद आदि व्यभिचारीभाव होते हैं । यह भय स्वाभाविक तथा कृत्रिम दो स्वरूप वाला होता है, स्त्री, नीच - पुरुष तथा बालादि में स्वाभाविक भय तथा उत्तम प्रकृति के व्यक्तियों में कृत्रिम भय रहता है । ७. बीभत्स - इसका स्थायीभाव जुगुप्सा होता है । इसके अपस्मार, उद्वेग, आवेग आदि व्यभिचारीभाव होते हैं । यह पुनः शुद्ध तथा अशुद्ध दो भेदों का और भी हो जाता है । ८. अद्भुत - इसका स्थायीभाव विस्मय है । इसमें स्तम्भ, अश्रु आदि संचारी भाव होते हैं । यह दिव्य तथा आनन्दज भेद से और दो प्रकार का हो जाता है । शान्त रस - नाट्यशास्त्र के षष्ठ- अध्याय में शान्तरस की स्थिति एक विचारणीय समस्या है तथा इस रस की भरत - निरूपित मान्यता के सम्बन्ध में अभिनवगुप्त के पूर्ववर्ती एवं परवर्ती आचार्यों में पर्याप्त मतभेद परिलक्षित होता है । इस क्रम में सर्वप्रथम स्थान प्राचीन आचार्य उद्भट का आता है जो

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( ८१ ) नाट्यशास्त्र के व्याख्याकार भी थे तथा जिनने शान्तरस को नवम रस के रूप में मान्य किया है । आचार्य आनन्दवर्धन तथा आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने शान्तरस के उद्घटादि द्वारा इसी परम्परागत नाट्यशास्त्रीय पाठ को मान्य किया था । एक सम्पूर्ण उपप्रकरण में अभिनवभारती में इसके स्वरूप की विशद मीमांसा करते हुए यह सिद्ध किया गया है कि शान्तरस सभी रसों का मूल या प्रधान रस है तथा यही सर्वाधिक स्वतन्त्र भी है । धनञ्जय ने दश-रूपक में यद्यपि भरतमुनि के द्वारा निरूपित सिद्धान्तानुसारी रूपक विवरण देने की बात कही है किन्तु उसने रस के आठ प्रभेद ही स्वीकार किये । इसके मत में नाट्यप्रदर्शन में या रङ्गमश्व पर शान्त रस प्रदर्शित होना सम्भव नहीं है । दूसरे जब नाट्यशास्त्र में ही शान्त रस का उल्लेख न हो तो फिर नाट्य में इस रस को कैसे स्थान दिया जाए । नाट्यशास्त्र के उद्भटादि की परम्पराओं में स्वीकृत शान्तरस के पाठ को न मानने वाले रूढ़िवादी आचार्यों ने जिनमें धनञ्जय भी थे, इस शान्तरस के पाठ ( वाले मूलपाठ ) को अस्वीकार किया । इनका तर्क यह था कि न तो मुनि ने शान्तरस का लक्षण किया है और न ही इसके विभावादिकों का विव-रण ही । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने इन ( आचार्यों के ) तर्कों का साधारण निराकरण करने का उद्योग करते हुए कहा कि प्रथम तो शान्तरस अनुभव तथा ग्रन्थ पाठ दोनों के आधार पर सिद्ध हो जाता । दूसरे इनका यह भी मत है कि नाट्यशास्त्र के परवर्ती पाठ में भी यदि शान्तरस का अंग जोड़ दिया जाय तो भी बुरा नहीं । हमें इस रस को इसलिये भी मानना आवश्यक है, क्योंकि ऐहिक तृष्णाओं के नाश होने पर सभी को इस रस की अनुभूति होती है । आचार्य - अभिनवगुप्तपाद ने विस्तार से शान्तरस का विवेचन करते हुए नवम रस के रूप में इसकी प्रमुख एवं अनिवार्य स्थिति प्रतिपादित की । आधुनिक समीक्षकों में बड़ौदा से प्रकाशित नाट्यशास्त्र के द्वितीय संस्क-रण के सम्पादक श्रीरामास्वामीशास्त्री का मत कि शान्तरस का प्रक्षिप्त पाठ नाट्यशास्त्र के मूलभाग में अभिनवगुप्तपाद के पूर्व ही समाविष्ट हो चुका था, जिस पर अभिनवगुप्तपाद ने अपनी व्याख्या भी की थी । यह भी कदा-चित् संभव है कि अभिनवगुप्त द्वारा शान्तरस के स्वतंत्ररूप में प्रतिपादित विवरण को परवर्ती किसी अन्य आचार्य ने नाट्यशास्त्र में संन्दर्भ देखकर संयुक्त कर दिया हो तथा नाट्यशास्त्र के शान्तरस सम्बन्धी प्रक्षेप से भी इसका अधिक सम्बन्ध न हो । संभवतः यह ( प्रक्षेप करने का ) कार्य अभिनवगुप्त-पाद के ध्वन्यालोक लोचन में व्यक्त विचारों को आधार मानकर नाट्यशास्त्र के शान्तरस विवरण में ऐसे प्रक्षेप के बाद किया गया होगा । समीक्षकों के उपर्युक्त तथा इसी प्रकार के अन्य आशंका भरे मतों का

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( ८२ ) आचार्य अभिनवगुप्त ने प्राचीन काल में स्वयं यी अनुभव करते हुए निराकरण किया था जिसका वर्णन दिया जा चुका है तथा शान्तरस के प्रकरण में विस्तार से प्रस्तुतग्रन्थ के सम्बद्धअध्याय में उसे उपस्थापित भी किया गया है । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने मनुष्य की विभिन्न मनोभावना एवं पुरुषार्थों को आंगिक आदि अभिनयों के द्वारा नाट्य स्थिति में दर्शाये जाने पर आस्वाद्यमान भावदशा ही रस हो जाती है यह बतलाया भी है । अतः नाट्य ही रस है, जो -आनन्द स्वरूप है तथा जो नाट्य के अतिरिक्त काव्य में भी विद्यमान रहता है । तथा आस्वाद्य भी है । अतः यदि व्यापक दृष्टि से देखें तो नाट्य एवं रस एक ही बिन्दु पर मिलते हैं जिसे धाराधीश भोज ने अहङ्कार शृंगार के नाम से अभिहित किया है जहाँ मानवात्मा की प्रज्वलित दीप्ति सात्विक आवेग से मिल कर आनन्द की ज्योतिरश्मियों को प्रस्फुरित करती है । आचार्य अभिनवगुप्तपाद बिना किसी संशय के नौ से अधिक रस भेद स्वीकार ही नहीं करते हैं । इनके मत में वात्सल्य रस में विद्यमान मृदुता रति ही है जो शृङ्गार का स्थायी भाव है । यही दशा भक्ति और लौल्य की है । क्योंकि हास्य के प्रसङ्ग में लौल्य केवल रति का वही रूप होता है जो किसी वस्तु की उत्कट अभिलाषा को प्रकट करे । इसी प्रकार भक्ति भी श्रद्धाभाव के अतिरिक्त और कुछ नहीं जिसमें सब कुछ अर्पित किया जाता है । जो अन्य शास्त्रकार नौ से अधिक इस प्रकार के रस भेद मानते थे उनका खण्डन संक्षिप्त रूप में एक ही गद्यखण्ड में इस प्रकार अभिनवगुप्त आचार्य ने कर दिया है । भाव एवं उनके स्वरूप - नाट्यशास्त्र के सप्तमाध्याय में भावों का विवेचन है । भाव चित्तवृत्ति स्वरूप होने से प्राणिमात्र में व्याप्त है । नाट्य का साध्य यदि रस है तो भाव उसके साधन हैं, अतः बिना भाव के रस की सिद्धि ही नहीं हो सकती । भरत मुनि ने भाव के इस व्यापक स्वरूप का नाट्य प्रसंग में विस्तार में शास्त्रीय तत्व बतलाया है । भरतमुनि ने सर्वप्रथम यह प्रश्न उठाया कि भाव शब्द चित्तवृत्ति के लिये क्यों प्रचलित हुआ? इसके उत्तर में स्वयं मुनि ने ही दो तरह से समाधान भी प्रस्तुत किये । प्रथम तो ये भाव इसलिये कहे जाते हैं क्योंकि ये चित्तवृत्ति के रूप में स्थित रहते हैं । अथवा ये आंगिक, वाचिक एवं सात्विक अभिनय द्वारा काव्यार्थ रूप रस की भावना करवाते हैं, इसीलिये ये भाव हैं । भाव शब्द व्याप्ति का बोधक है, अतः सभी में व्याप्त होने के कारण भी यह भाव कहलाता है, तथा यही भाव कवि, प्रयोक्ता तथा प्रेक्षक तीनों में नाट्य प्रयोग के प्रसङ्ग में व्याप्त माना जाता है । भाव का स्वरूप मुनि ने अपने प्रसिद्ध पद्य ' विभावेनाहृतो योऽर्थो ह्यनुभावैश्च गम्यते ' ( ना ० शा ० अ ० ७११ ) में स्पष्टतः बतलाया जिसका

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( ८३ ) अभिनवगुप्तपाद ने विस्तार से विवेचन किया है । भावों के अन्तर्गत विभावों तथा अनुभावों की गणना मुनि ने नहीं की क्योंकि इनके मत में ये लोक-स्वभाव का अनुकरण करने वाली बाह्य स्थिति मात्र हैं तथा अभिनयक्रम में ये भावों के साथ ही व्यक्त एवं तिरोहित होते रहते हैं । भाव तथा अभिनव में पूर्वपश्चात् भाव या कारण कार्य की स्थिति वास्तविक नहीं होती चाहे प्रत्यक्ष भले ही वैसा जान पड़े । अतः भावों के पश्चात् होने से इनको अनुभाव जो आचार्य मानते हैं तथा स्थायीभावों के बाद कार्य रूप में उत्पन्न होने वाले अनुभावों के द्वारा ही स्थायीभाव का भावन होता है यह भी जो मानते हैं उनका मत भरत मत के अनुकूल नहीं कहा का सकता । विभाव एवं अनुभाव - विभाव एवं अनुभाव से युक्त भाव होता है, अतः इन दोनों का भाव से सम्बन्ध होता ही है । चित्तवृत्तियों के ( जो भाव-रूप है ) उद्बुद्ध करने का कारणरूप विषय विभाव कहलाता है, जैसे विपत्ति का आना शोक के उद्बुद्ध करने का कारणरूप विषय होकर करुणरस का कारण या चन्द्रोदय होना रति के उबुद्ध करने का कारकरूप विषय होकर शृङ्गाररस का कारण बन जाता है । प्रेक्षक के द्वारा वाचिक आदि अभिनय का अनुभावन ही अनुभाव है । ये अनुभाव वाचिकादि अभिनय के अन्तर्गत होने वाली चेष्टा या व्यापार रूप हैं । अनुभाव भावों के साथ ही उत्पन्न होते हैं तथा तिरोहित भी । विभाव शब्द हेतु वाचक होने से स्थायी तथा व्यभि-चारी भावों का ज्ञान इसी विभाव शब्द के द्वारा संभव होता है तथा तभी रसप्रतीति की सम्भावना होती है । नाट्य प्रयोग के सन्दर्भ में इसी कारण-वाचक शब्द के रूप में भी विभाव का प्रयोग किया जाता है । स्थायीभाव - जो जो भाव निरन्तर वर्तमान रहते हों, वे स्थायीभाव हैं परन्तु जो अनियमित रूप से यदा कदा प्रवहमान भाव धारा में गति देकर चलते रहते हों उन्हें संचारी समझा जाता है । दशरूपककार धनञ्जय ( द ० रू ० ४।३४ ) ने भी स्थायीभाव को समुद्र - सा व्यापक कहा है । जैसे समुद्र समस्त मिलने वाली नदियों को आत्मसात् कर लेता है, उसी प्रकार स्थायी-भाव से भी प्रतिकूल या अनुकूल सभी भाव विच्छिन्नता प्राप्त कर नहीं सकते तथा वे सभी स्थायी के आत्मरूप बन जाते हैं । इसको एक अन्य उदाहरण से भी समझा जा सकता है । इनकी स्थिति फूल - माला के समान है । जैसे एक सूत्र में कई पुष्प गंथ दिये जाते हैं वैसे ही एक स्थायी या प्रधान भाव के साथ अन्य अनेक भाव भी संयुक्त कर दिये जा सकते हैं । अतः पुष्पमाला में सूत्रभूत होने वाला भाव जो सभी से सम्बद्ध हो वही स्थायी तथा पुष्परूप में पृथक् पृथक् रहने वाले संचारी होते हैं । नाट्यशास्त्र में उनचास भावों के अन्तर्गत आठ स्थायी भावों को मुख्यता दी गयी है । इसका कारण यह है कि स्थायीभाव रूपी आठ वासनाएँ प्राणियों

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( ८४ ) के अन्तःकरणों में सर्वदा स्थित होती हैं तथा सहज भी । इन वासनाओं के सदा विद्यमान रहने के कारण ही, भाव भी स्थायीभाव कहा जाता है । इसके विपरीत संचारी भावरूपी वासनाएं वे हैं जो सदा विद्यमान नहीं रहतीं किन्तु उपयुक्त विभावादि के उपस्थित होने पर ही उद्बुद्ध हो जाती हैं । संचारी भाव - भरतमुनि के अनुसार जो भाव विविध प्रकार से रसा-भिमुख होकर संचरण करते हैं वे संचारी भाव या व्यभिचारी भाव कहलाते हैं । ये संचारी अनुभावों से युक्त होकर स्थायीभाव को रसत्व की ओर अभि-मुख करने या ले जाने वाले होते हैं, अतएव ये स्थायीभाव के सहायक भाव भी हैं । व्यभिचारी भावों की संख्या तैतीस है । सभी व्यभिचारी भाव आत्मगत, परस्थ तथा मध्यस्थ भेद से तीन प्रकार के माने जाते हैं; जिनका देश, काल एवं अवस्था की अनुरूपता के सन्दर्भ में उत्तम, मध्यम तथा अधम श्रेणी के व्यक्तियों के ( या पात्रों के ) द्वारा उपयोग किया जाता है । इन सभी भावादि का स्वरूप नाट्यशास्त्र में विस्तार से प्रतिपादित है । सात्विक भाव - भरतमुनि ने आठ सात्विक भाव बतलाकर सात्विकभावों के निरूपण को आरम्भ करते हुए यह प्रश्न उठाया कि इन आठों भावों को सात्विक क्यों कहा जाता है? फिर इसके उत्तर में स्वयं मुनि ने बतलाया कि सत्व की उत्पत्तिसमाहित मन से होती है, अतः चित्त की एकाग्रता या समाहित-मनस्त्व से सात्विकभाव उत्पन्न होते हैं । सात्विक अभिनय मन की एकाग्रता के बिना सम्भव ही नहीं होता है । जिस अभिनय में सत्व की अतिरिक्तता होगी वही उत्तम अभिनय होगा । अन्य अभिनयों की तुलना में समान मात्रा में सत्व रहने पर मध्य तथा सत्व के अभाव में अधम या निम्न कोटि का अभिनय हो जाता है । भरत का यह मन्तव्य ध्यान देने योग्य है । इससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि सात्विक भाव अनेक प्रकार के अभिनयों पर आश्रित होकर सभी रसों में विद्यमान रहते हैं और इन्हीं का व्यवस्थित प्रयोग प्रेक्षक के हृदय में रसोदय करवाता है । अतएव नाट्य में स्थायी, सात्विक तथा संचारी भावों का समायोजन कौशल के साथ वैसे ही किया जाए जैसे चतुर मालाकार, विविध पुष्पों को यथास्थान ग्रथित कर एक सुन्दर माला को प्रस्तुत कर देता हो । स्थायी तथा संचारी के इस विभेद के अतिरिक्त रस तथा भाव में भी विभेदक तत्व विद्यमान है तथा भाव ही पराकाष्ठा तक विकसित होकर रसदशा को प्राप्त करता है, यह पहिले बतला आये हैं किन्तु इस मान्यता को भी कुछ आचार्य नहीं मानते हैं । कुछ अन्य आचार्यों के मतानुसार सभी भाव समान रूप में आवश्यकतानुसार या परिस्थितिवस स्थायी और संचारी हो सकते हैं । इस प्रकार स्पष्ट है कि नाट्यप्रयोग में प्रस्तुत किये जाने वाले भावों की

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( ८५ ) गणना एवं उनकी विनियोजना के विषय में भरतमुनि के द्वारा प्रस्तुत तथ्य ही महत्वशाली है । मानव स्वभाव की जो गहन तलस्पर्शिता हमें नाट्यशास्त्र के भावादि विवरण में मिलती है वह बड़ी आश्चर्यमयी तब हो जाती है जब हमें उसका वर्तमान मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी तथैव दिखाई देने लगता है । मानवीय संवेदन- भूमि के अन्तरतम प्रदेश का जो समुज्ज्वल स्वरूप नाट्यशास्त्र में है वही नाट्यविद्या की आत्मा है और इसी कारण भरत मुनि के द्वारा किया गया इन भावों का विवेचन अतिशय मौलिकता के साथ - साथ परवर्ती सभी आचार्यों द्वारा सामान्यतः उपजीव्य बना रहा, यह सभी जानते हैं । मुनि का यह विराट् प्रयास वैज्ञानिक और तर्कसम्मत होकर इसी कारण सर्वमान्य हुआ है तथा ऐसा विवरण विश्व के तत्कालीन किसी अन्य नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थ में तो नितरां अप्राप्य है । पाठसङ्केत — इस प्रकार यहाँ नाट्यशास्त्र के प्रथम से सप्तमाध्याय तक के विवरण को ( प्रथम खण्ड में ) उपस्थापित किया गया । अष्टमाध्याय से त्रिशाध्याय तक इसी प्रकार अगले खण्डों में क्रमशः विवेचन किया जाता रहेगा । हम यह पूर्व में दिखला आए हैं कि नाट्यशास्त्र के प्रस्तुत संस्करण में प्रायः सभी अद्यतन उपलब्ध पाठगत सामग्री का यथाशक्य उपयोग किया गया है तथा प्रायः सभी प्राप्य तथ्यों का अनुशीलन भी । इनमें क पाठ के अन्तर्गत बड़ौदा से प्रकाशित अभिनवभारती टीका के अनुसारी पाठ तथा इसी के अन्तर्गत अन्य सभी पाठान्तरों को दर्शाया गया है, ख पाठ के अन्तर्गत काव्यमाला बम्बई से प्रकाशित पाठों को तथा ग पाठ के अन्तर्गत काशी संस्कृत ग्रन्थमाला - चौखम्बा, वाराणसी के पाठों को लिया गया है । मूलपाठ काशी की दीर्घपाठ परम्परा के अनुसार ही यथासंभव रखा गया है, किन्तु आवश्यकतानुसार इसमें अनेक स्थानों पर परिवर्तन भी किया गया है । नाट्यशास्त्र के चतुर्थाध्याय के ताण्डव प्रकरण में वर्णित करणों के चिदम्बरम् के नटराज मन्दिर में उत्कीर्ण प्रतिमाओं के रेखाचित्रों को भी यथास्थान विनियोजित किया गया है तथा नाट्यमण्डप के रेखाचित्रों को भी । इससे नाट्यशास्त्र के व्यापक बोध का मार्ग प्रशस्त होगा ऐसी आशा है । इसी क्रम में द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ खण्डों में भी अपेक्षित रेखाचित्रों को रखा जायगा । नाट्यशास्त्र के शेष सभी खण्ड यथाशक्य शीघ्र ही प्रस्तुत किये जायेंगे ऐसी चेष्टा है । आवश्यक विवेचन को ध्यान में रखकर प्रस्तुत खण्ड में परिशिष्ट १ में अतिरिक्त टिप्पणियों तथा परिशिष्ट २ में पद्यार्धानुक्रमणिका आदि लगाई गयी है । अन्त में शुद्धिपत्र भी दे दिया गया है, जिससे अशुद्धियों का भी परिमार्जन हो सके । इसमें दृष्टिदोष या प्रमाद से छूटी हुई अशुद्धियों ७ प्रस्ता ० ना ० शा ० प्र ०