भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 141–150
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 141–150
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३० नाट्यशास्त्रम् नीचले ओठ का फड़कना ( या नीचे झुकना ) ' विवर्तन ', ओठ का धूजना ' कम्पन ', ओठ का बाहर निकलना ' विसर्ग ', ओठ का अन्दर ले जाना ' विनिगूहन ', ओठ का दाँतों से दबाना ' सन्दष्टक ' तथा ओंठ को बाहर की ओर ऊँचा करना ' समुद्रक ' कहलाता है । ये अधरोष्ठ के लक्षण हैं । अब इनकी योजना सुनिये ॥ १३ ९ -१४१ ॥ योजना-असूयावेदनावंज्ञा हास्यादिषु विवर्तनम् ॥
कम्पन वेदनाशीतभयशेषजवादिषु ।
स्त्रीणां विलासे बिब्बोके विसर्गी रञ्जने तथा ॥
विनिगूहनमायासे सन्दष्टं कोधकर्मसु ।
समुद्गस्त्वनुकम्पायां चुम्बने चाभिनन्दने ॥
१४२ ॥
१४३ ॥
१४४ ॥
असूया, वेदना, लज्जा, अनादर तथा हास्य आदि में ' विवर्तन ' की, वेदना, शीत, भय, क्रोध, वेग आदि में ' कम्पन ' की; स्त्रियों के विलास, बिब्बोक तथा रंजन में ' विसर्ग ' की; ( श्रम तथा ) आयास में ' विनिगूहन ' की, क्रोध के कार्य आदि में ' सन्दष्टक ' की तथा अनुकम्पा, अभिनन्दन और चुम्बन में ' समुद्गक ' की योजना करनी चाहिए ॥ १४२-१४४ ॥
चिबुक कर्म - ( लक्षण ) -इत्योष्ठकर्माण्युक्तानि चिबुकस्य निबोधत ।
कुट्टनं खण्डनं छिन्नं चक्कितं लेहितं समम् ॥ १४५ ॥
दष्टश्च दन्तक्रियया चिबुकन्त्विह लक्ष्यते ।
कुट्टनं दन्तसङ्घर्षः सम्फोटः खण्डनं मुहुः ॥ १४६ ॥
छिन्नन्तु गाढ़संश्लेषश्चक्कितं दूरविच्युतिः ।
लेहनं जिह्वया लेहः किञ्चिच्छ्लेषः समं भवेत् ॥ १४७ ॥
दन्तैर्दष्टेऽधरे दष्टमित्येषां विनियोजनम् । १. वेदनालज्जालस्यादिषु —ख - ग ० । २. वेपनं शीतज्वर रोगजयादिषु ग ० । ३. विसर्ग सुरते स्मृतः - ख ० । ४. क्रोधकर्मणि - ग ० । ५. चिकितं - ख; चुक्षितं - ग ० । ६. लेहनं - ख - ग ० । ७. चिकितं - ख; चुक्षितं - ग ० । ८. किञ्चिचचेष्टः - ख - ग ० ।
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अष्टमोऽध्यायः ३१ इस प्रकार मैंने ओठों के अभिनय कार्य बतलाए, अब मैं चिबुक के ( ठुड्डी के ) कर्म बतलाता हूँ । चिबुक के ७ प्रकार होते हैं — यथा— ( १ ) कुट्टन, ( २ ) खण्डन, ( ३ ) छिन्न, ( ४ ) चुक्कित, ( ५ ) लेहित, ( ६ ) सम तथा ( ७ ) दष्ट । यहाँ दाँतों की क्रिया के अनुसार ही चिबुक कर्मों के लक्षण बतलाए जाते हैं ( अर्थात् ये दांतों के लक्षण हैं तथा चिबुक के भेद और लक्षण भी इसी प्रकार से होते हैं ) दाँतों के संघर्ष ( कड़कड़ाने ) को ' कुट्टन ', दाँतों के बार - बार चबाने को ' खण्डन ', दाँतों का जोर से मिलाना ‘ छिन्न ' दाँतों को परस्पर ऊपर तक हटा लेना ' चुकित ' जिह्वा से दाँतों का चाटना ' लेहित ' दाँतों का थोड़ा मिलना ' सम ' तथा दाँतों से ओठ का दबाना ' दष्ट ' कहलाता है ॥ १४५-१४८ ॥ योजना-भयशीतज्वरक्रोधेग्रस्तानां कुट्टनं भवेत् ॥ १४८ ॥
जपध्ययन सल्लापभक्ष्ययोगे च खण्डनम् ।
छिन्नं व्याधौ भये शीते व्यायामे रुदिते मृते ॥ १४ ९ ॥
जृम्भणे चक्कितं कार्य तथा लौल्यै च लेहनम् ।
समं स्वभावभावेषु सन्दष्टं क्रोधकर्मसु ॥ १५० ॥
इति दन्तोष्टजिह्वान करणे चिबुकक्रिया । इनमें भय, शीत व्याधि तथा ज्वर में ' कुट्टन ' की; जप, अध्ययन, संलाप ( संवाद ) तथा भक्षण करने में ' खण्डन ' की, व्याधि, भय, शीत, व्यायाम, रूदित तथा मृत में ' छिन्न ' की, चुम्बन लेने में ' चुकित ' की; लेहन कर्म ( चाटने ) में ( पाठान्तर - चंचलता में ) ' लेहन ' की; स्वाभाविक चेष्टाओं में ' सम ' की तथा क्रोध के कार्यों में ' सन्दष्ट ' की योजना करनी चाहिए । इस प्रकार मैने दन्त, ओष्ठ तथा जिल्ह्वा से सम्बद्ध ( इन ) चिबुकों के
कार्य बतलाए । १४८-१५१ ॥
मुखज कर्म * विनिवृत्तश्च विधुतं निर्भुग्नं भुग्नमेव च ॥ १५१ ॥
१. व्याधि - ख - ग ० । २. जप्या- ख ० ग ० । ३. रुषितेक्षिते - ख ० । ४. चिकितं - ख, चुक्षितं - ग ० । ५. लेह्ये- 1 - स - ग ० । ६. ' विनिवृत्तञ्च विधुतम् ' इत्यादयोऽष्टौ श्लोकाः वचनादर्शेषु प्रक्षिप्ताः ।
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३२ नाट्यशास्त्रम्
विवृत्तञ्च तथोद्वाहि कर्माण्यत्रास्यजानि तु ।
व्यावृत्तं विनिवृत्तं स्याद् विधुतं तिर्यगायतम् ॥। १५२ ॥
अवाङ्मुखत्वं निर्भुग्नं व्याभुग्नं किञ्चिदायतम् ।
विश्लेष्ठोष्टञ्च विवृत्तमुद्वाह्याक्षिप्तमेव च ॥ १५३ ॥
मुखज कर्म ६ हैं - यथा - ( १ ) विनिवृत्त, ( २ ) विधुत ( ३ ) निर्भुग्न, ( ४ ) भुग्न ( ५ ) विवर्त तथा ( ६ ) उद्वाही । सीधा खुला हुआ ' विनिवृत्त ', तिरछा खुला हुआ मुह ' विधुत ', नीचे की ओर झुका हुआ ' निर्भुग्न ', कुछ खुला हुआ ' भुझ ' ( व्याभुग्न ), ओठों से लगा हुआ मुँह वि ' ' तथा ऊपर की ओर उठा हुआ मुंह ' उद्वाही ' कहलाता है ॥ १५१-१५३ ॥ योजना-विनिवृत्तमसूयायामीको पकृतेषु ' च अवज्ञाविहृतादौ च स्त्रीणां कार्य प्रयोक्तृभिः विधुतं वारणे चैव नैवमित्येवमादिषु निर्भुग्नञ्चापि विज्ञेयं गम्भीरालोकनादिषु भुग्नं लज्जान्विते योज्यं यतीनां तु स्वभावतः निर्वेदौत्सुक्यचिन्तासु तथा विनयमन्त्रणे स्त्रियों के असूया, ईर्ष्या, कोप, अवज्ञा तथा विहृत
।
॥ १५४ ॥
।
॥ १५५ ॥
।
॥। १५६ ॥
आदि भावों में ' विनिवृत ' की; निवारण तथा निषेध कथन में ' विधुत ' की; गम्भीर आलोकन आदि में ' निर्भुग्न ' की तथा लज्जित व्यक्ति तथा निर्वेद, औत्सुक्य चिन्ता, विनय विचार ( मन्त्रणा ) भावों में ' भुग्न ' की योजना करनी चाहिए । यह यतीजन में स्वाभाविक होता है ॥। १५४-१५६ ॥
विवृतं वापि विज्ञेयं हास्यशोकभयादिषु ।
स्त्रीणामुद्राहि लीलायां गर्वे गच्छत्यनादरे ॥ १५७ ॥
एव नामेति कार्यञ्च कोपवाक्ये विचक्षणैः ।
ससाचीकृताद्युक्तं यच्च दृष्टिविकल्पनम् ॥ १५८ ॥
१. क्रोधकृतेत - ग ० । २. स्वभावजम् ख - ग । ३. तथा च विनिमन्त्रणे - ख - ग ० । ४. गच्छत्वना - ख - ग ० । ५. समं साचीकृता चुक्ता - ख - ग ० । ६. विकल्पितम् - ख - ग ० ।
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अष्टमोऽध्यायः ३३ तज्ज्ञैस्तदनुसारेण कार्ये तदनुगं मुखम् । हास्य, शोक तथा भय आदि में ' विवृत ', स्त्रियों की लीला तथा गर्व में, अनादर, ‘ जाओ ' तथा ऐसा ही कार्य है इस प्रकार के कथन में एवं क्रोध पूर्ण वचनों में ' उद्वाही ' मुख की योजना करनी चाहिए । नाट्यप्रयोक्ताजन द्वारा दृष्टि भेदों के जो सम तथा साची भेद पहिले
बतलाए गए उन्हीं के अनुसार मुख की भी योजना करनी चाहिए ।
मुख - राग-अथातो मुखरागस्तु चतुर्धा सम्प्रकीर्तितः ॥ १५६ ॥
स्वाभाविकः प्रसन्नश्च रक्तः श्यामोऽर्थसंश्रयः । अब मैं ' मुख- राग ' को बतलाता हूँ । ये अपने अर्थों के अनुसार चार प्रकार के होते हैं । यथा - ( १ ) स्वाभाविक, ( २ ) प्रसन्न, ( ३ श्याम ॥ १५ ९ -१६० ॥ योजना-स्वाभाविकस्तु कर्तव्यः स्वभावाभिनयाश्रयः मध्यस्थादिषु भावेषु मुखरागः प्रकीर्तितः प्रसन्नवद्भुते कार्यो हास्यशृङ्गारयोस्तथा वीररौद्रमदाद्येषु रक्तः स्यात् करुणे तथा भयानके सबीभत्से श्यामं सञ्जायते मुखम् एवं भावर सार्थेषु मुखरागं प्रयोजयेत् ) रक्त तथा ( ४ ) ॥ १६० ॥
।
॥ १६१ ॥
।
॥ १६२ ॥
। ' स्वाभाविक मुखराग ' की; स्वाभाविक अभिनय में तथा मध्यस्थ आदि भाव में; ‘ प्रसन्न मुख राग ' की अद्भुत, हास्य तथा शृंगार में; रक्त मुखराग की वीर, रौद्र रस और मद तथा करुण, भयानक तथा श्याम मुख राग की योजना करनी चाहिए । इसी प्रकार भाव तथा रस के प्रस्तुत करने में मुख की जाए ॥ १६०-१६३ ॥ शाखाङ्गोपाङ्गसंयुक्तः कृतोऽप्यभिनयः शुभः मुखरागविहीनस्तु नैव शोभान्वितो भवेत् शारीराभिनयोऽल्पोऽपि मुखरागसमन्वितः बीभत्स रस में राग की योजना ॥ १६३ ॥
।
॥ १६४ ॥
१. स्तेनानुसारेण - ख ० ग ० । २. प्रयोक्तृभिः -ख - ० ग ० । ३. ह्यभिनयः - ख ० । ३ ना ० शा ० द्वि ०
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३४ नाट्यशास्त्रम्
द्विगुणां लभते शोभां रात्राविव निशाकरः ।
नयनाभिनयोऽपि स्यान्नानाभावंरसस्फुटः ॥
• मुखरागान्वितो यस्मान्नाट्यमत्र प्रतिष्ठितम् ।
यथा नेत्रं प्रसर्पेत मुखदृष्टिसंयुतम् ॥
तथा भावरसोपेतं मुखरागं प्रयोजयेत् ।
इत्येष मुखरागस्तु प्रोक्तो भावरसाश्रयः ॥
शाखा, अंग तथा उपांग के अभिनय अच्छी प्रकार १६५ ॥ १६६ ॥ १६७ ॥ किये जाने पर भी यदि वे ' मुखराग ' से रहित हो तो उसकी शोभा नहीं होती । पर जब शारीराभिनय के अल्प मात्रा में प्रस्तुत करते हुए भी यदि उसे मुखराग से युक्त रखा जाए तो रात्रि में चन्द्र के समान द्विगुणित शोभा को प्राप्त करता है । नयनाभिनय भी यदि मुखराग ' युक्त रहे तो वह अनेक भाव तथा रसों को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करता है क्योंकि ' नाट्य ' इसी पर निर्भर है ( स्थित है ) । मुख, भ्रू, दृष्टि आदि से युक्त हो जिस प्रकार नेत्र हों मुखराग भी उसी प्रकार के भाव तथा रसों से युक्त रखते हुए प्रयुक्त करना चाहिए । इस प्रकार मैंने भाव तथा रस का आधारभूत तत्त्व ' मुखराग ' का स्वरूप यहाँ बतलाया ॥ १६३-१६७ ॥
ग्रीवाकर्म - लक्षण तथा योजना-अतः परं प्रवक्ष्यामि श्रीवांकर्माणि वै द्विजाः ।
समा नतोन्नता ध्यना रेचिता कुञ्चिताञ्चिता ॥ १६८ ॥
वलिताच विवृत्ता च ग्रीवा नवविधार्थतः । हे मुनिजन! अब मैं आपको ग्रीवा के कार्य बतलाता हूँ । ये ग्रीवा कर्म नौ प्रकार के हैं । यथा: - ( १ ) समा, ( २ ) नता, ( ३ ) उन्नता, ( ४ ) त्र्यस्रा, ( ५ ) रेचिता, ( ६ ) कुञ्चिता, ( ७ ) अञ्चिता, ( ८ ) वलिता, तथा ( ९ ) विवृत्ता ॥ १६८-१६६ ॥ समा स्वाभाविकी ध्यानस्वभावजपकर्मसु ॥ १६ ९ ॥ नता नतास्यालङ्कारबन्धे कण्ठावलम्बने । १. भावरसान्वितः - ख ० । २. इत्येवं - ख ० । ३. ग्रीवाकर्म द्विजोत्तमाः - ख ० । ४. निवृत्ता - ख ० ।
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अष्टमोऽध्यायः ३५ उन्नताभ्युन्नतमुखी ग्रीवा चोर्ध्वादिदर्शने ॥ १७० ॥
यत्रा पार्श्वगता ज्ञेयां स्कन्धभारे च दुःखिते ।
रेचिता विधुत भ्रान्ता भावे मथननृत्तयोः ॥ १७१ ॥
कुञ्चिताऽकुञ्चिता मूर्ध्नि भारिते गलरक्षणे । अपनी सहज अवस्था में विद्यमान मीवा ' समा ' कहलाती है, इसकी योजना ध्यान, सहज भाव तथा जपकर्म में की जाए । यदि ग्रीवा झुकी हो तो ' नता ' कहलाती है, इसकी योजना अलंकारों के धारण करने तथा किसी व्यक्ति के कण्ठ का सहारा लेने में करना चाहिए । ऊपर की ओर चेहरे को उठा कर रखी हुई ग्रीवा ' उन्नता ' कहलाती है । इसे ऊपर की ओर देखने के भाव में प्रयुक्त करना चाहिए । यदि ग्रीवा को किसी एक ओर मोड़ा जाए तो यह ' त्र्यत्रा ' कहलाती है । इसकी कन्धों से भार वहन तथा दुःख के प्रदर्शन में योजना की जाए । यदि ग्रीवा कम्पित या घूमते हुए रखी जाए तो ' रेचिता ' कहलाती है । इसकी योजना भाव, मथन तथा नृत्त में की जाए । यदि मस्तक सहित ग्रीवा को नीचे की ओर झुकाया जाय तो ' कुञ्चिता ' कहलाती है । इसकी योजना भारयुक्त होने तथा गले का बचाव करने में की जाए || १६ ९ -१७२ ॥ अश्चितापसृतोद्वद्ध केश कर्षोर्ध्वदर्शने ॥ १७२ ॥
पार्श्वोन्मुखी स्याद् वलिता श्रीवाभङ्गे च वीक्षिते ।
विवृत्ताभिमुखीभूता स्वस्थानाभिमुखादिषु ॥ १७३ ॥
यदि ग्रीवा को मस्तक सहित पीछे की ओर मोड़ा जाए तो ' अचिता ' कहलाती है । इसकी योजना ऊपर की ओर लटकने, ( फांसी लगा कर मरने हेतु ), बालों को खींचने तथा ऊपर देखने में की जाए । यदि ग्रीवा चहरे सहित बगल में मोड़ ली जाए तो ' वलिता ' कहलाती है । इसकी योजना ग्रीवा को झुका कर देखने के भाव में की जाए । यदि ग्रीवा सामने की ओर स्थित रहे ( अभिमुखीभूता ) तो ' विवृत्ता ' कहलाती है । इसकी योजना अपने उद्दिष्ट स्थान की ओर प्रस्थान करने में की जाए ॥ १७२-१७३ ॥ १. चोर्ध्वनिवेशने — ख ० । २. चैव —ख ० । ३. विधुत भ्रान्ता हावे - ख ० । ४. कुञ्चिताकुञ्चिते मूर्ध्नि धारिते - ख, ग ० । ५. केशकर्षोच्चदर्शने - ख ०, ग ० । ६. वीक्षणे - ख ० ।
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३६ नाट्यशास्त्रम्
इत्यादिलोकभावार्थ ग्रीवाभेदैरनेकधा ।
ग्रीवाकर्माणि सर्वाणि शिरः कर्मानुगानि हि ॥ १७४ ॥
शिरसः कर्मणा कर्म ग्रीवायाः सम्प्रवर्तते । इस प्रकार मनुष्यों के भाव तथा व्यवहार आदि के अनुसार ये ग्रीवा के अनेक भेद बतलाए गये हैं । ये सभी ग्रीवाकर्म मस्तक की क्रिया का अनुसरण करते हैं और मस्तक के कर्म ग्रीवा के कम से ही प्रवृत्त होते हैं ॥ १७४-१७५ ॥ इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं शीर्षोपाङ्गसमाश्रयम् ॥ १७५ ॥
अङ्गकर्माणि शेषाणि गदतो मे निबोधत ॥ १७६ ॥
इस प्रकार मैंने मस्तक के उपांगसहित सभी लक्षण बतलाए । अब मैं शेष अंगों के कर्म तथा लक्षण बतलाता हूँ जिन्हें आप समझिए ॥१७५-१७६ ॥ इति भारतीये नाट्यशास्त्रे उत्तमाङ्गाभिनयो [ उपाङ्गाभिनयो ] नाम अष्टमोऽध्यायः । G भरत नाट्यशास्त्र का उत्तमांगाभिनय ( उपांगाभिनय ) नामक अष्टम- अध्याय समाप्त । १. ग्रीवाभङ्गे — ख ० ।
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नवमोऽध्यायः
एवमेतच्छिरोनेत्रं भ्रूनासोष्ठकपोलजंम् ।
कर्म लक्षणसंयुक्तमुपाङ्गानां मयोदितम् ॥ १ ॥
हस्तानान्तु प्रवक्ष्यामि कर्म नाट्यप्रयोजकम् ।
यथा येनाभिनेयञ्च गर्दतो मे निबोधत ॥ २ ॥
भरतमुनि बोले— हे मुनिजन! अब तक आपको मैंने लक्षणों से युक्त शिर, नेत्र, भौंहें, नासिका, ओठ एवं कपोल से होनेवाले उपांगों के अभिनय को बतलाया । अब मैं हाथों का नाट्यप्रयोगों में होने वाला अभिनय कार्य — जैसे और जिस व्यक्ति के द्वारा अभिनीत किया जाए - बतलाता हूँ ॥ १-२ ॥
हस्तोरः पार्श्वजठर कटीजङ्घा रुपादतः ।
लक्षणं सम्प्रवक्ष्यामि विनियोगञ्च तत्त्वतः ॥ ३ ॥
अब मैं क्रमशः हाथ, उरःस्थल, पार्श्व, उदर, कटी, जंघा, ऊरू, ( पिंडलियाँ ) तथा पैरों के अभिनय कार्य तथा लक्षणों को बतलाता हूँ ॥३ ॥
हस्तमुद्राएँ— '
पतापिताकश्च तथा वै कर्तरीमुखः ।
अर्धचन्द्रो हारालश्च शुकतुण्डस्तथैव च ॥ ४ ॥
१. हस्तमुद्राओं के विषय में आचार्यो में अतिशय मतभेद दृष्टिगोचर होता तथा नाट्यशास्त्र की कई प्रतियों में उपलब्ध पाठान्तरों के अनुसार भी अनेक भिन्नताएं दृष्टिगोचर होती । जैसे- सूचीमुख को सूच्यास्य, कांगुलम् को लांगुलम्, अलपद्यम् को अलपल्लव या उत्पलपद्यम्, उत्पलपदम् इत्यादि । अभिनयदर्पण में असंयुक्त मुद्राएं २८ तथा ४ पूरक मुद्राओं सहित ३२ मिलती है । इसमें नाट्य - शास्त्र के अतिरिक्त ये मुद्राएँ हैं— अर्धपताक, मयूर, चन्द्रकला, सिंहमुख, त्रिशूल, व्याघ्र, अर्धसूची, कंटक तथा पल्ली । ( इनमें नाट्यशास्त्र की ऊर्णनाभ मुद्रा को छोड़ शेष सभी अतिरिक्त मुद्राएँ हैं । ) नाट्यशास्त्र तथा अभिनय - दर्पण की १६ १. इत्येतच्छिरसो नेत्र —क, च्छिरसो नेत्रे, ख- ग ० । २. कपोलकम् — क ० । ३. हस्तादीनां - क ० । ४. तन्मे निगदतः शृणु - ग ० ।
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३८ नाट्यशास्त्रम्
मुष्टिश्च शिखराख्यश्च कपित्थः कटकामुखः ।
सूच्यास्यः पद्मकोशश्च तथा वै सर्पशीर्षकः ॥ ५ ॥
मृगशीर्षः परो ज्ञेयो हस्ताभिनययोक्तृभिः ।
लाङ्गलोत्पलपद्मश्च चतुरो भ्रमरस्तथा ॥ ६ ॥
हंसास्यो हंसपक्षश्च सन्दंशो मुकुलस्तथा । ऊर्णनाभस्ताम्रचूडश्चतुर्विंशतिरीरिताः 119 11
असंयुता संयुताश्च गदतो मे निबोधत ।
अञ्जलिश्च कपोतश्च कर्कटः स्वस्तिकस्तथा ॥ ८ ॥
कैटकावर्धमानश्च द्युत्सङ्गो निषधस्तथा ।
दोल: gouge श्चैव तथा मकर एव च ॥ ९ ॥
मुद्राएँ ही समान हैं परन्तु इन मुद्राओं के अभिनय - दर्पण में जहाँ नाम समान है । तो लक्षण भिन्न हैं । ये हैं- कर्तरीमुख, कटकामुख, सूचीमुख, हंसमुख, ( हंसास्य ) मृगशीर्ष, सन्देश तथा ताम्रचूड़ । इस प्रकार यहाँ संयुक्त और असंयुक्त हस्तमुद्राओं के विषय में संक्षेप में बतलाया गया है । विशेष विवेचन के लिए परिशिष्ट देखिये । नाट्यशास्त्र में हस्तमुद्राओं का कुलयोग ६४ बतलाया गया है परन्तु हैं । वे ६७ तथा भरतमुनि द्वारा प्रतिपादित भी और ये ( नाट्यशास्त्र में ) भरतमुनि सम्मत ही मुद्राएँ निरूपित भी की गयी हैं । इस संख्या का उल्लेख श्रीकण्ठकृत रसमंजरी में ( इस प्रकार ) किया गया है: - ' एतेऽभिनयहस्ताः स्युः सप्तत्रिंश-मुनेर्मता: ' ( रसमंजरी ms - पत्र ६४ B. O. R. I. Poona ) हस्तमुद्राएं ( विशेष ) - मुद्रा का स्वरूप तथा उसका विनियोग नाट्यशास्त्र... में लक्षण दिया गया है । इसके अतिरिक्त भी इन मुद्राओं के द्वारा अनेक अर्थं सूचित किये जा सकते हैं जिनका आगे चित्राभिनय ( नाट्यशास्त्र अध्याय २६ ) में वर्णन हैं । कुछ अन्य शास्त्रीय ग्रन्थों में मूल मुद्राओं की उद्भव कथाएं तथा रस के समान इन मुद्राओं का भी वर्णं ( रंग ) जाति तथा अधिदेवता भी बतलायी गयी हैं । इन उल्लेखों से आचार्यों के नृत्य - शास्त्र में सौन्दर्य - पूर्ण सूक्ष्म तथा संशोधकदृष्टि के दर्शन सहज प्राप्य हैं । अभिनय दर्पण आदि ग्रन्थों के द्वारा प्रदर्शित विभिन्न अर्थो को ( जो नाट्यशास्त्र में नहीं दर्शाये गए ) हमने परिशिष्ट में बतलाने का उद्योग किया है । यह विषय विस्तृत तथा अध्ययन सापेक्ष है । १. खटकामुखः - क ख ० । २. पद्यार्धमेतत् क- पुस्तके नास्ति । ३. काङ्गुल कोऽलपद्मश्च - क ० । ४. खटका क ० ।
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नवमोऽध्यायः ३ ९
गजदन्तोऽवहित्थश्च वर्धमानस्तथैव च ।
एते तु संयुता हस्ता मया प्रोक्तास्त्रयोदश ॥ १० ॥
असंयुक्त हस्तमुद्राएं २४ हैं । जिनके नाम हैं- ( १ ) पताक, ( २ ) यहाँ केवल उनकी मुद्रा, जाति, वर्णं तथा देवता दिये जा रहे हैं उत्पत्तिकथा उस मुद्रा कारण इस अध्याय में मुद्रानाम ( १ ) पताक ( २ ) त्रिपताक ( ३ ) कर्तरीमुख ४ ) अर्धचन्द्र ( ५ ) अराल ( ६ ) शुकतुण्ड ( ७ ) मुष्टि ( ८ ) शिखर ( ९ ) कपित्थ ( १० ) कटकामुख ( ११ ) सुचीमुख ( १२ ) पद्यकोष ( १३ ) सर्पशीर्ष ( १४ ) मृगशीर्ष ( १५ ) कंगुल ( १६ ) अलपद्य ( १७ ) चतुर ( १८ ) भ्रमर ( १ ९ ) हंसास्य ( २० ) हंसपक्ष ( २१ ) सन्देश ( २२ ) मुकुल ( २३ ) ऊर्णनाभ ( २४ ) ताम्रचूड के लक्षण के नीचे पाद टिप्पणी में दे दी टिप्पणियाँ भी संक्षिप्त ही रखी हैं । देवता जाति प्रब्रह्मा ब्राह्मण शिव क्षत्रिय चक्रपाणि - विष्णु क्षत्रिय महादेव वैश्य वासुदेव मिश्र मरीचि ब्राह्मण चन्द्र शूद्र कामदे गान्धर्व गर्भ - विष्णु ऋषि रघुराम देव विश्वकर्मा देव भार्गव यक्ष किन्नर शिव III महेश्वर शिव II ऋषि पद्म, II III गान्धर्व सूर्य III मिश्र गरुड III मिश्र ब्रह्मा मिश्र कामदेव अप्सरा वाल्मीकि विद्याधर चन्द्र इन्द्र देव कूर्मावतार क्षत्रिय । प्रत्येक मुद्रा की गई है तथा इसी वर्ण श्वेत रक्त ताम्र धूम्र रक्त रक्त नील धूलियाँ श्वेत ताम्र श्वेत श्वेत पीत श्वेत सुवर्ण धूलि धूलि घन ( काला ) श्वेत नील श्वेत श्वेत रक्त