भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 151–160
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 151–160
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४० नाट्यशास्त्रम् त्रिपताक, ( ३ ) कर्तरीमुख, ( ४ ) अर्धचन्द्र, ( ५ ) अराल, ( ६ ) शुकतुण्ड, ( ७ ) मुष्टि, ( ८ ) शिखर, ( ९ ) कपित्थ, ( १० ) कटकामुख, ( ११ ) सूच्यास्य, ( सूचीमुख ), ( १२ ) पद्यकोष, ( १३ ) सर्पशीर्ष, ( १४ ) मृगशीर्ष, ( १५ ) कांगुल, ( १६ ) अलपद्य, ( १७ ) चतुर, ( १८ ) भ्रमर, ( १ ९ ) हंसास्य, ( २० ) हंसपक्ष, ( २१ ) सन्देश, ( २२ ) मुकुल, ( २३ ) ऊर्णनाभ तथा ( २४ ) ताम्रचूर्ण । संयुक्त हस्तमुद्राएं तेरह हैं । जिनके नाम हैं- ( १ ) अंजलि, ( २ ) कपोत, ( ३ ) कर्कट, ( ४ ) स्वस्तिक, ( ५ ) कटकावर्धमानक, ( ६ ) उत्संग, ( ७ ) निषध, ( ८ ) दोला, ( ९ ) पुष्पपुट, ( १० ) मकर, ( १२ ) अवहित्थ तथा ( १३ ) वर्धमान ॥ ४-१० ॥
नृत्तहस्तानतश्चोर्ध्व गदतो मे निबोधत ।
चतुरस्रौ तथोद्वृत्तौ तथा तलमुखौ स्मृतौ ॥
स्वस्तिकौ विप्रकीर्णौ चाप्यरालकटकामुखौ ओविद्धवको सूच्यास्यौ रेचितावर्द्धरेचितौ
उत्तानवञ्चितौ चैव पल्लवो च तथा करौ ।
नितम्बपि विज्ञेयौ केशबन्धौ तथैव च ॥
लताख्यौ च तथा प्रोक्तौ करिहस्तौ तथैव च
पक्षवश्चितकौ चैव पक्षप्रद्योतकौ तथा ।
ज्ञेयौ गरुडपक्षौ च दण्डर्पक्षावतः परम् ॥
ऊर्ध्वमण्डलिनौ चैव पार्श्वमण्डलिनौ तथा । उरोमण्डलिनी चैव उरः पार्श्वार्धमण्डैलौ ।
मुष्टिकस्वस्तिकौ चापि नलिनीपद्मकोशकौ ।
अपल्लवोल्बणौ च ललितौ वलितौ तथा ॥
अब मैं नृत्तहस्त बतलाता हूँ । इन नृत्तहस्तों के ( १ ) चतुरस्र, ( २ ) उद्वृत्त, ( ३ ) तलमुख, ( ४ ) विप्रकीर्ण, ( ६ ) अरालकटकामुख, ( ७ ) आविद्धवक, ( ११ ) गजदन्त, ११ ॥
।
॥ १२ ॥
१३ ॥
।
१४ ॥
१५ ॥
१६ ॥
३० प्रकार हैं-स्वस्तिक, ( ५ ) ( ८ ) सूच्यास्य, १. प्यारालखटकामुखौ – क ० - ख ० । २. अविद्धव - ख ० । ३. उत्तानावञ्चितौ — ख ० - ० । ४. नितम्बौ चापि — ग ० । ५. सम्प्रीक्तौ करिहस्तौ च लताख्यौ च तथैव च - ग ० । ६. हंसपक्षौ तथैव च - ख ०, ग ० । ७. मण्डले - ख ०, ग ० । ८. मुष्टिकः स्वस्ति कश्चापि - ख ० । ९. अलपद्मौत्वणौ चापि ग ० ।
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नवमोऽध्यायः ४१ ( ९ ) रेचित, ( १० ) अर्धरेचित, ( ११ ) उत्तानवच्चित, ( १२ ) पल्लव, ( १३ ) नितम्ब, ( १४ ) केशबन्ध, ( १५ ) लता, ( १६ ) करिहस्त, ( १७ ) पक्षवंचितक, ( १८ ) पक्षप्रद्योतक, ( १ ९ ) गरुड़पक्ष, ( २१ ) ऊर्ध्वमण्डलिन्, ( २२ ) पार्श्वमण्डलिन् ( २३ ( २४ ) उरः पार्श्वमण्डली, ( २५ ) मुष्टिकस्वस्तिक, ( २६ ) ( २७ ) अलपल्लव, ( २८ ) उल्बण, ( २ ९ ) ललित, वलित ॥ ११-१६ ॥
चतुष्पष्टिकरा ह्येते नामतोऽभिहिता मया ।
यथालक्षणमेतेषां कर्माणि च निबोधत ॥ १७
इस प्रकार मैंने चौसठ हस्तमुद्राओं के नाम बतलाए लक्षणों तथा तदनुरूप कर्मों को बतलाता हूँ ॥ १७ ॥
असंयुत - हस्तमुद्राएं ( लक्षण तथा योजना ) -पेताक ( २० ) दण्डपक्ष, ) उरोमण्डली, नलिनीपद्मकोष, तथा ( ३० ) ॥ । अब मैं इनके
प्रसारिताः समाः सर्वाः यस्याङ्गुल्यो ' भवन्ति हि ।
कुञ्चितश्च तथाङ्गुष्ठः स पताक इति स्मृतः ॥ १८ ॥
सभी जंगलियों को फैलाकर यदि अंगूठे की तिरछा ( कुञ्चित ) कर दे और उसे तर्जनी के मूल में लगा दे तो ' पताक ' हस्त - मुद्रा होती है ॥१८ ॥
एष प्रहारपाते प्रतापने नोदने प्रहर्षे च ।
हमिति तज्ज्ञैर्ललाटदेशोत्थितः कार्यः ॥ १ ९ ॥
योजना - प्रहार ( चोंट ) करने, ( शीतनिवारण हेतु आग ) तापने, प्रेरणा देने, हर्ष तथा गर्व बतलाने में पताकमुद्रायुक्त हाथ को ललाट प्रदेश से उठाते हुए रखना चाहिए ॥ १ ९ ॥ १. पताक- उत्पत्ति कथा ) - यह मुद्रा प्राचीन मूर्तियों में अभय मुद्रा रूप में दिखाई देती है । शास्त्र में इस मुद्रा के स्रष्टा ब्रह्मा जी हैं । एक बार सृष्टि के उत्पादक ब्रह्मा ब्रह्मा ( विष्णु ) के समीप गये तथा जय घोष के साथ उनकी बन्दना की । इस समय उनके हाथ ने सहसा पताक ( ध्वज ) के आकार को धारण कर लिया, तभी से इसकी पताक हस्त के रूप में प्रसिद्धि है । १. अथ लक्षणमेतेषां - ग ० । २. प्रसारिताग्राः सहिताः - ख ०, ग ० । ३. यस्याङ्गुल्यौ — क ० । ४. प्रकोपने — क ० । ५. गर्वेष्वह — क ० ।
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४२ नाट्यशास्त्रम्
एषोऽग्निवर्षधारानिरूपणे पुष्पवृष्टिपतने च ।
संयुतकरणः कार्यः प्रविरलचलिताङ्गुलिर्हस्तः ॥ २० ॥
यदि पताक - मुद्रा - युक्त दोनों हाथों को रखकर अंगुलियों को घुमाए तो उनके द्वारा वर्षा, पुष्पवृष्टि और ( उग्रकम्पन द्वारा ) अग्नि की ताप ( या ज्वालाएँ ) बतलाई जाती है ॥ २० ॥
स्वस्तिकविच्युतिकरणात् पल्लवपुष्पोपहारशष्पाणि ।
विरचितमुर्वीसंस्थं यद्द्रव्यं तच्च निर्देश्यम् ॥ २१ ॥
यदि पताक मुद्रा वाले दोनों हाथों से स्वस्तिक करते हुए उसे हटा लिया जाए तो उसके द्वारा पल्लव एवं पुष्पों का उपहार, लहलहाता घास तथा पृथ्वी पर स्थित किये हुए ( बलि आदि ) पदार्थों को बतलाया जाता है ॥ २१ ॥
स्वस्तिक विच्युतिकरणात् पुनरेवाधोमुखेन कर्तव्यम् ।
संवृतविवृतं पाल्यं छन्नं निविडश्च गोप्यश्च ॥ २२ ॥
यदि हाथों को स्वस्तिक दशा से हटाकर उन्हें नीचे की ओर जाता हुआ रखे तो इससे किसी वस्तु के बन्द करने, उघाड़ने, रक्षा करने, ढँकने, घना करने तथा छुपाने ( गोप्य ) का भाव प्रकट होता है ॥ २२ ॥
अस्यैव चाङ्गुलीभिस्त्वधो मुखप्रस्थितोत्थितच लाभिः ।
वायूर्मिवेगवेलाक्षोभश्चौर्घश्च कर्त्तव्यः ॥ २३ ॥
यदि इसी मुद्रायुक्त हाथ को नीचे की ओर ले जाकर ऊपर उठाए तथा तभी आगे पीछे घुमाई जाने वाली अंगुलियां रखी जाएं तो इससे वायु का चलना, लहरों का वेग, समुद्र की वेला, क्षोभ तथा बाढ़ का वेग बतलाया जाता है ॥ २३ ॥
उत्साहनं बहु तथा महाजनप्रांशु पुष्कर महंतम् ।
पक्षोत्क्षेपाभिनयं रेचककॅरणेन कुर्वीत ॥ २४ ॥
यदि इसी मुद्रा में हाथ को रेचक करण युक्त ( रेचित ) किया जाए तो उसके द्वारा प्रोत्साहन, अनेक ( संख्या में विद्यमान ) मनुष्यों का कोलाहल, १. पल्वल - क ० । २. विद्युति - ग ० । ३. भाद्यश्च - ख ०, क्षोभश्चोद्यरच - ग ० । ४. प्रहतिम् — ख ० । ५. रेचककरणैः प्रयुञ्जीत - ग ० ।
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नवमोऽध्यायः ४३ ऊँचाई ( प्रांशु ) ( मृदङ्ग या ) ढोल का पीटना तथा पक्षी का उड़ना ( पक्षियों द्वारा पंखों को फड़फड़ाना या ऊपर उठाना ) बतलाया जाता है ॥ २४ ॥
परिघृष्टतलस्थेन तु धौतं मृदितं प्रमृष्टपिष्टे च ।
पुनरेव शैलधारणमुद्घाटनमेव चाभिनयेत् ॥ २५ ॥
इसी मुद्रा में यदि दोनों हाथों को परस्पर मसला जाए तो उनके द्वारा धोना, मसलना, मांजना, गूंथना, पीसना, पर्वत को उठाना या उखाड़ना आदि भाव बतलाया जाता है ॥ २५ ॥
एवमेष प्रयोक्तव्यः स्त्रीपुंसाभिनये करः ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि त्रिपताकस्य लक्षणम् ॥ २६ ॥
स्त्री तथा पुरुष पात्र के द्वारा इसी प्रकार इस मुद्रा का प्रयोग किया जाए । अब मैं ' त्रिपताक ' मुद्रा का लक्षण कहता हूँ ॥ २६ ॥
' त्रिपताक-पताके तु यदा वकानामिका त्वङ्गुलिर्भवेत् ।
त्रिपताकः स विज्ञेयः कर्म चास्य निबोधत ॥ २७ ॥
यदि पताक मुद्रा युक्त हाथ में अनामिका अंगुली को झुका दिया जाए तो त्रिपताक ' ' मुद्रा हो जाती है । अब इसके द्वारा होनेवाले कार्य बतलाता हूँ ॥ २७ ॥
आवाहनमवतरणं विसर्जनं वारणं प्रवेशश्च ।
उन्नामनं प्रणामो निदर्शनं विविधवचनञ्च ॥ २८ ॥
माङ्गल्यद्रव्याणां स्पर्शः शिरसोऽथ सन्निवेशश्च ।
उष्णीषमुकुटधारणनासास्यश्रोत्रसंवरणम् ॥ २ ९ ॥
योजना – आवाहन, अवतरण ( नीचे उतरना ), विसर्जन वा धारण, १. त्रिपताक - ( उत्पत्तिकथा ) जब देवराज इन्द्र ने वज्र को ग्रहण किया तब उनका हाथ तीन उंगलियों के अलग करने से ( तीन भाग वाले ) ध्वज जैसा हो गया । तभी से इस त्रिपताक मुद्रा का प्रचलन हुआ । १. मुत्पाटन - ख ० ।
२. दशाख्याश्च शताख्याश्च सहस्राख्यास्तथैव च ।
पताकाभ्यान्तु हस्ताभ्यामभिनेयः प्रयोक्तृभिः ॥
( इति क ० पुस्तकेऽधिकं प्रक्षिप्तश्च ) ३. एवमेव - ख ० ।
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४४ नाट्यशास्त्रम् प्रवेश, उन्नामन ( ऊपर चढ़ाना ), प्रणाम, तुलना करना ( निदर्शन ), वैकल्पिक - कथन ( विविध - वचन ) मांगलिक वस्तुओं का स्पर्श तथा मस्तक पर धारण, पगड़ी या मुकुट का धारण तथा नासिका, मुख एवं कानों का ढकना बतलाया जाता है ॥ २८-२९ ॥
अस्यैव चाङ्गुलीभ्यामधोमुखप्रस्थितोत्थितच लाभ्याम् ।
लघुखग पतन स्रोतो भुजगंभ्रमरादिकान् कुर्यात् ॥ ३० ॥
यदि इसी मुद्रा से युक्त दोनों हाथों को नीचे की ओर जाने तथा ऊपर उठने वाली अंगुलियों वाला रखे तो इनके द्वारा छोटे पक्षियों का पतन, स्रोत, सर्प तथा श्रमर आदि बतलाए जाते हैं ॥ ३० ॥
अश्रुप्रमार्जनं तिलकविरचनं रोचनालभनकञ्च ।
" त्रिपताकानामिकयोः स्पर्शनमलकस्य कर्तव्यम् ॥ ३१ ॥
त्रिपताकमुद्रावाले हाथ में अनामिका के स्पर्श द्वारा आंसुओं का पोंछना, तिलक करना, गोरोचना का तिलक आदि के लिए ग्रहण करना, पत्रलेखा रचना ( जो कि भुजाओं तथा वक्षःस्थल पर की जाती है ) और अलक स्पर्श बतलाया जाता है ॥ ३१ ॥
स्वस्तिक त्रिपताकौ तु गुरूणां पादवन्दने ।
परस्पराग्रसंश्लिथै कार्यावुद्वाहदर्शने ॥ ३२ ॥
यदि त्रिपताक हाथ स्वस्तिक दशा में रहें तो उससे गुरुजन के चरण-स्पर्श तथा स्वस्तिक दशा युक्त होकर एक दूसरे के कोनों को छूते हों तो उससे विवाह बतलाया जाता है ॥ ३२ ॥
विच्युतौ चलितावस्थौ कर्तव्यौ नृपदर्शने ।
तिर्यकस्वस्तिकसम्बद्धौ स्यातां तौ ग्रहृदर्शने ॥ ३३ ॥
यदि इसी अवस्था वाले हाथ एक दूसरे से हटते हुए तथा धूज़ते हुए १. मुखप्रस्थितौ - ग ० । २. लघुवटपवन -क, लघुमुखपवन स्रोतो - ख ० । लघुचटपवन -- ग ० । ३. भुजगतभ्रमणादिकान् - ग ० । ४ अश्रुप्रमार्जन तिलकविरोचनलो चनालभनकं च — ग ० । ५. त्रिपताकानामिकया दर्शन मलकस्य कार्यञ्च - ग ० । ६. ' स्वस्तिक त्रिपताकावि'त्यारभ्य ' याने नृणां प्रयोक्तभिरित्यन्तं श्लोक षट्कं ग - पुस्तके नास्ति । ७. वन्दनम् — ख ० ।
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नवमोऽध्यायः ४५ रखे जाएँ तो उनके द्वारा राजा का दर्शन बतलाते हैं और यदि ये स्वस्तिक दशा में तिरछे रखें जाएं तो इनके द्वारा ' ग्रहों ' के दर्शन बतलाए जाते हैं ॥३३ ॥
तपस्विदर्शने कार्यावूर्ध्वो चापि पराङ्मुखौ ।
परस्पराभिमुखौ च कर्तव्यौ द्वारदर्शने ॥ ३४ ॥
यदि त्रिपताक मुद्रावाले हाथ ऊपर की ओर उठे तथा उनको फिर पीछे की ओर रखा जाए तो उससे तपस्विजन का दर्शन बतलाया जाता हैं । और यदि ये ही हाथ एक दूसरे के सम्मुख रखें जाए तो उनसे द्वार का स्वरूप या दर्शन बतलाया जाता है ॥ ३४ ॥
उत्तानाधोमुखौ कार्यावग्रे वक्त्रस्य संस्थितौ ।
asaran ङ्ग्रामे मकराणाञ्च दर्शने ॥ ३५ ॥
यदि ये ही हाथ एक दूसरे के सम्मुख रखकर फिर ( उंगुलियों को हिलाते हुए ) नीचे की ओर मुंह वाले ( मिलाकर ) किये जाएँ तो उससे बडवानल, संग्राम तथा मकर की अभिव्यक्ति होती है ॥ ३५ ॥
अभिनेयास्त्वनेनैव वानरप्लवनोर्मयः ।
पवनश्च स्त्रियश्चैव नाट्ये नाट्यविचक्षणैः ॥ ३६ ॥
और नाट्यविद् आचार्यों के मत में इसी हस्तमुद्रा के द्वारा वानर का उछलना, लहरें, पवन तथा स्त्रियों को भी बतलाया जाता है ॥ ३६ ॥
सम्मुखप्रसृताङ्गुष्ठः कार्यो बालेन्दुदर्शने ।
पराङ्मुखस्तु कर्तव्यो याने नृणां प्रयोक्तृभिः ॥ ३७ ॥
यदि इसी मुद्रावाले हाथ को सम्मुख रखते हुए अँगूठे को फैला दे तो उससे बालचन्द्र तथा यदि इसी हाथ को पीछे की ओर मोड़ लिया जाए तो उससे ( शत्रु के विरुद्ध ) राजा की चढ़ाई ( यान ) बतलाई जाती है ॥ ३७ ॥
' कर्तरीमुख-त्रिपताके यदा हस्ते भवेत् पृष्ठावलोकिनी ।
तर्जनी मध्यमायाश्च तदासौ कर्तरीमुखः ॥ ३८ ॥
१. कर्तरीमुख ( उत्पत्ति कथा ) इस हस्त के सृष्टा शिव हैं । जब भगवान शिव ने अन्धकासुर का उच्छेद करने के लिए इस हस्तमुद्रा में पृथ्वी पर एक चक्कर लगाया तभी से इसका प्रचलन हो गया । १. कार्यों चोव चापि ख ० । २. चैव ख ० । ३. च कुस्य - ख ० ४. सङ्क्रामे ख ० । ५. पततश्च - ख ० । ६. तन्मुख- ख ० ।
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४६ नाट्यशास्त्रम् यदि त्रिपताक मुद्रा वाले हाथ में तर्जनी अंगुली मध्यमा के पीछे फैला-कर रखी जाए ( या झुकायी जाए ) तो ' कर्तरीमुख ' मुद्रा कहलाती है || ३८ ||
पथि ' चरणरचनरञ्जनरङ्गणकरणान्यधोमुखेनैव ।
ऊर्ध्वमुखेन तु कुर्याद्दष्टं शृङ्गश्च लेख्यश्च ॥ ३ ९ ॥
योजना – यदि कर्तरीमुख मुद्रावाला हाथ नीचे मुंहवाला रखते हुए रखा जाए तो उसके द्वारा मार्ग में पैर रखना, पैरों को अलंकृत या रंजित करना, रांगोली रचना करना ( रंगण रंगवल्ली - का निर्माण अथवा बालकों का रेंगना ) बतलाया जाता है । यदि ऊंचे मुंह वाला होकर यही हाथ रहे तो उससे दंशन, शृङ्ग बजाना तथा चित्र लेखन कर्म बतलाया जाता है ॥ ३ ९ ॥
पतनमरणव्यतिक्रमपरिवृत्तवितर्कितं तथा न्यस्तम् ।
. भिन्नवलितेन कुर्यात् कर्तर्यास्याङ्गुलिमुखेन ॥ ४० ॥
और यदि इसी मुद्रा को नीचे की ओर झुकाया या रखा जाए तथा अंगुलियाँ भिन्न २ दिशाओं में घूमने लगे तथा मध्यमांगुलि पीछे की ओर झुकी रहे तो इसके द्वारा पतन, मरण, अपराध ( व्यतिक्रम ), पराङ्मुखी भवन, तर्क करना तथा घरोहर को रखना बतलाया जाता है ॥ ४० ॥
संयुक्तकरणो वा स्यादसंयुतो वा प्रयुज्यते तज्ज्ञैः ।
रुरु - चमरमहिषसुरगजवृषगोपुर शैलशिखरेषु ॥। ४१ ॥
और यदि दो कर्तरीमुख हस्तों या एक कर्तरीमुख हस्त का प्रयोग किया जाए तो इनके द्वारा रूरूमृग, चमरी गाय, महिष, ऐरावत हाथी, वृषभ, गोपुर तथा शैलशिखर ( जैसे पदार्थ ) का भाव प्रदर्शित किया जाता है ॥४१ ॥
' अर्धचन्द्रः-यस्याङ्गुल्यस्तु विनताः सहाङ्गुष्ठेन चापवत् ।
सोऽर्धचन्द्र इति ख्यातः करः कर्मास्य वक्ष्यते ॥ ४२ ॥
यदि अंगुलियों को अंगूठे सहित धनुष जैसी झुका कर फैला दी जाए १. अर्धचन्द्र ( उत्पत्ति कथा ) नटराज शिव ने अलंकार धारण करने की इच्छा से अर्धचन्द्र को जब मस्तक पर धारण किया तो इसी धारण करने के समय से इस मुद्रा का उद्भव हुआ । १. पथिक - ख ० । २. स्याङ्गुलीययुग्मेन - ख ०, ग ० । ३. एष श्लोकः खपुस्तके नास्ति । ४. चापरम् - ग ० ।
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नवमोऽध्यायः ४७ तो ' अर्धचन्द्र ' मुद्रा कहलाती है । अब मैं इससे होने वाले कार्य बतलाता हूँ ॥ ४२ ॥
एतेन बालतरवः शशिलेखा कम्बु कलशवलयानि ।
निर्घार्टनमायस्तं मध्यौपम्यञ्च पीनश्च ॥ ४३ ॥
योजना – इसके द्वारा छोटे वृक्ष, चन्द्रलेखा, शंख, कलश, कंकण ( कटक ), बाहर ढकेलना ( निर्घाटन ), परिश्रम ( आयस्त ), कृशता ( जो कि कटिप्रदेश की तुलना में निर्देशित की जाती हो ) तथा पीनता ( मोटाई ) बतलाए जाते हैं ॥ ४३ ॥
रशना जघनकटी नामाननतल पत्र कुण्डलादीनाम् ।
कर्तव्यो नारीणामभिनययोगोऽर्धचन्द्रेण ॥ ४४ ॥
इस अर्धचन्द्र हस्त के द्वारा स्त्रियों की करधनी ( रशना ), जंघा, कटि, चेहरा ( आनन ), तलपत्र ( अलंकार विशेष जो कि कानों में धारण किया जाता है ) तथा कुण्डल का अभिनय प्रस्तुत करना चाहिए ॥ ४४ ॥
अराले-आद्या धता काय कुञ्चितोऽङ्गुष्टस्तथा ।
शेषा भिन्नोर्ध्ववलिता हॉरालेऽङ्गुलयः करे ॥ ४५ ॥
यदि तर्जनी अंगुली झुकी हुई, अंगूठा ( उसे मिलाने को ) सिकुड़ा हुआ तथा शेष उंगलियां उससे पृथक् तथा ऊपर की ओर खड़ी रखी जाए तो ‘ अराल ' मुद्रा जानों ॥ ४५ ॥
एतेन सत्वशौण्डीर्यवीर्य कान्तिधृतिदिव्यगाम्भीर्यम् ।
आशीर्वादाश्च तथा भावी हितसंज्ञकाः कार्याः ॥ ४६ ॥
योजना – इसके द्वारा सत्व, ( स्थैर्य ) गर्व, पराक्रम ( वीर्य ), शोभा ( कान्ति ) धृति, दिव्य - वस्तु, गाम्भीर्य, आशीर्वाद देना तथा इसी प्रकार के अन्य सुखप्रद भावों को बतलाया जाता है ॥ ४६ ॥
१. अराल ( उत्पत्ति कथा अगस्त ऋषि ने समुद्रपान के समय इसी मुद्रा का प्रयोग किया था । तभी से इसका प्रचलन हुआ । १ निघटनं ग ० । २. रसना - ग ० । ३. धनुर्लता - ख ० । ४. कुञ्चिता -- ख ० । ५. घरालाङ्गुलयः स्मृताः -- ग ० । ६. भावाभिनयसंज्ञकाः कार्याः -- ग ० ।
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४८ नाट्यशास्त्रम् एतेन पुनः स्त्रीणां केशानां सङ्ग्रहस्तथोत्कर्षः सर्वाङ्गिकं तथैव च ' निर्वर्णनमात्मनः कार्यम् ॥
कौतुकविवाहयोगः प्रदक्षिणेनैव सम्प्रयोगञ्च ।
अङ्गुल्यग्रस्वस्तिकयोगान्परिमण्डलेनैव ॥ ४८
प्रादक्षिण्यं परिमण्डलञ्च कुर्यान्महाजनश्चैव ।
यच्च महीतलनिहितं द्रव्यं तच्चाभिनेयं स्यात् ॥
।
४७ ॥
॥
४ ९ ॥
तथा स्त्रियों का केश सम्मार्जन और उनका फैलाना ( उत्कर्षः विकीर्ण-तापादनम् अभि ० भा ० ) तथा अपने सम्पूर्ण शरीर को ध्यान पूर्वक देखना दो अराल हस्तों के अंगुलियों के अग्रभागों के स्पर्श द्वारा बतलाया जाए । इसी में एक थोल घुमाव देने पर विवाह के पूर्व होने वाले भवरों का विधान ( कौतुक -विवाह योग ) तथा दोनों वर वधू के हाथों का मिलाप बतलाया जाता है और इसी हस्त के द्वारा प्रदक्षिणा, गोल वस्तु ( परिमण्डल ), जन कोलाहल तथा पृथ्वी में स्थित वस्तु ( या पृथ्वी. पर सजाई गई वस्तुएं ) भी बतलाई जाती है ॥ ४७–४९ ॥
आह्वानञ्च निवारणनिर्माणे चाप्यनेकवचः ।
स्वेदस्य चापनयने गन्धाघ्राणे शुभः शुभे चैव ॥ ५० ॥
तथा किसी व्यक्ति को बुलाना, रोकना, उदय होना, अनेक बातें बतलाना, ( कहना ) पसीने का पोंछना मीठी सुगन्ध लेना तथा शुभावह कार्य भी इसी मुद्रा के द्वारा बतलाए जाते हैं ॥ ५० ॥
त्रिपताकहस्तजानि तु पूर्व यान्यभिहितानि कर्माणि ।
तानि वरालयोगात् स्त्रीभिः सम्यक् प्रयोज्यानि ॥ ५१ ॥
पिता मुद्रा द्वारा ( जिन कार्यों का पहिले प्रदर्शन बतलाया गया वे सभी कार्य स्त्रियों के द्वारा अराल मुद्रा से भी प्रदर्शित किये जा सकते हैं ॥ ५१ ॥
१. सङ्ग्रहोत्कर्षो -- ग ० । २. निर्वहण --० । ३. योगं - ख ० । ४. प्रदक्षिणेनैव सम्प्रयोगश्च - ख ०, ग ० । ५. यत्र - क ० । ६. आवाहने निवापे निन्दाद्याक्षेपवचने च ख ०; आवाहन निर्वाहण निर्माण-क ०, ख ० । ७. शुभा चैव हि ग ० । ८. त्वरानुयोगात् - ख ० ।
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नवमोऽध्यायः ४ ९
शुकतुण्डे-अरालस्य यदा वकानामिका त्वङ्गुलिर्भवेत् ।
शुकतुण्डस्तु स करः कर्म चास्य निबोधत ॥ ५२ ॥
यदि अरालमुद्रायुक्त हाथ में अनामिका अंगुली को टेढ़ा कर ( झुका ) लिया जाए तो ' शुकतुण्ड ' मुद्रा बन जाती है ॥ ५२ ॥
एतेन त्वभिनेयं नाहं न त्वं न कृत्यमिति चार्थे ।
आवाहने विसर्गे धिगिति च वचने सावशम् ॥ ५३ ॥
योजना – इसके द्वारा “ मैं इसे नहीं तुम इसे नहीं तथा यह किये जाने योग्य नहीं ' इन अर्थों को और, आवाहन, बिदाई ( विसर्ग ) तथा अवज्ञापूर्वक धिक्कारना ( आदि अर्थ ) बतलाए जाते हैं ॥ ५३ ॥
मुष्टि-अङ्गुल्यो यस्य हस्तस्य तलमध्येऽग्रसंस्थिताः ।
तासामुपरि चाङ्गुष्ठः स मुष्टिरिति संज्ञितः ॥ ५४ ॥
यदि सारी अंगुलिय! हथेली में बाँध दी जाएँ और अंगूठे को ऊपर रख ले तो ' मुष्टि ' मुद्रा कहलाती है ॥ ५४ ॥
एष प्रहारे व्यायामे निर्गमे पीडने तथा ।
संवाहनेऽसियष्टीनां दण्डंकुन्तग्रहे तथा ॥ ५५ ॥
योजना – इसके द्वारा प्रहार, व्यायाम, निर्गम, पीड़न ( किसी पशु के थन से दूध निकालने ), मिट्टी तथा डण्डे और भाले को ग्रहण करने ( आदि ) का अभिनय किया आता है । १. शुकतुण्ड ( उत्पत्ति कथा ) इस मुद्रा की प्रसू गौरी हैं । शंकर के साथ प्रणय- कलह के समय इसी हस्त का उनके द्वारा उपयोग किया गया था । तभी से इसका प्रचलन हो गया । २. मुष्टि ( उत्पत्ति कथा ) मधुराक्षस के वध के समय भगवान विष्णु ने इसी मुद्रा का प्रयोग किया था । तभी से इसका प्रचलन हो गया । १. तलमाध्यग्रसंस्थिताः - ख ० । २. हस्तपीडने - ख ० ग ० । ३. कुन्तदण्ड -- ग ० । ४ ना ० शा ० द्वि ०