भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 181–190

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 181 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७० नाट्यशास्त्रम् इस मुद्रा से सिंह, हाथी, गेंडा, घडिताल, मगर, मत्स्य तथा अन्य हिंसक जन्तुओं का अर्थ प्रदर्शित किया जाता है ॥ १४७ ॥

गजदन्त-कूर्परांसोचितौ हस्तौ यदास्तां सर्पशीर्षकौ ।

गजदन्तः स तु करः कर्म चास्य निबोधत ॥

यदि दो सर्पशीर्ष हस्त स्वस्तिक दशा में एक दूसरे जाएँ तो ' गजदन्त ' हस्तमुद्रा हो जाती है ॥ १४८ ॥

एष च वधूवराणामुद्वाहे चातिभारयोगे च ।

स्तम्भग्रहणे च तथा शैलशिलोत्पाटने चैव ॥

१४८ ॥

स्कन्धों पर रखे १४ ९ ॥ इससे वर वधू का पाणिग्रहण, अतिभारवहन, स्तम्भग्रहण तथा शैल एवं पाषाण का उखाड़ना प्रदर्शित किया जाता है ॥ १४ ९ ॥ अवहित्थ—

शुकतुण्डौ करौ कृत्वा वक्षस्यभिमुखाञ्चितौ ।

शनैरधोमुखाविद्धौ सोऽवहित्थ इति स्मृतः ॥ १५० ॥

यदि दो शुकतुण्डहस्तों को छाती पर नीचे मुंहवाले और लटकते हुए रखे तो ' अवहित्थ ' हस्तमुद्रा हो जाती है ॥ १५० ॥

दौर्बल्ये निःश्वसिते गात्राणां दर्शने तनुत्वे च ।

उत्कण्ठिते च तज्ज्ञैरभिनययोगस्तु कर्त्तव्यः ॥। १५१ ॥

इससे दुर्बलता, निश्वास, शरीर का सौन्दर्य प्रदर्शन, शरीर का पतलापन तथा उत्कण्ठा का भाव प्रदर्शित किया जाए ॥ १५१ ॥

वर्धमान-मुकुलस्तु यदा हस्तः कपित्थपरिवेष्टितः ।

वर्धमानः स विज्ञेयः कर्म चास्य निबोधत ।

जालवातायनादीनां प्रयोक्तव्यो बिघाटने ॥ १५२ ॥

यदि मुकुल हस्त को कपित्थ हस्त से लपेटा जाए तो ' वर्धमान ' हस्त मुद्रा होती है । झरोखा तथा खिड़की के खोलने में इसको विनियोजित करे । अथवा-ज्ञेयो वै वर्धमानस्तु हंस पक्षौ पराङ्मुखौ । १. कूर्परासञ्चितौ- 1- स ० ग ० २. भारयोगेन - ख ० । ३. स्तम्भे ग्रहणे च ग ० ।

पृष्ठ 182

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 182 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नवमोऽध्यायः ७

सङ्ग्रहपरिग्रहोद्धारणञ्च समयञ्च सत्यवचनञ्च ।

' सङ्क्षेपः सङ्क्षिप्तं निपीडितेनाभिनेतव्यम् ॥ १५३ ॥

अथवा – दो नीचे की ओर हंसपक्ष हस्त रखे जांए तो ' वर्धमान ' होजाता है । इस मुद्रा में एक हाथ को दूसरे हाथ से दबाया जाए तो उससे संग्रह, वस्तु का आदान, उद्धार, प्रतिज्ञा, सत्यवचन तथा संक्षेपकरण अर्थ बतलाया जाता है ॥ १५३ ॥

उता येते द्विविधास्त्वसंयुताः संयुताश्च सङ्क्षेपात् ।

अभिनयकरास्तु ये वह तेऽन्यत्राप्यर्थतः साध्याः ॥ १५४ ॥

इस प्रकार संक्षेप से असंयुत तथा संयुत ये दोनों हस्त मुद्राएं बतलाई गई । इनमें जो अभिनय बतलाए गए वे अन्यत्र भी अर्थों के अनुसार प्रयुक्त किये जा सकते हैं । हस्तमुद्राओं की सामान्य विधि—

आकृत्या चेष्टया चिह्नर्जात्या विज्ञाय तत्पुनः ।

स्वयं वित कर्त्तव्यं हस्ताभिनयनं बुधैः ॥ १५५ ॥

अभिनेता के द्वारा हस्तमुद्राओं को उनकी आकृति, गतिविधि, चिन्ह तथा जाति को स्वयं के अनुभव से देखकर फिर प्रयुक्त करना चाहिए ॥१५५ ॥

नास्ति कश्चिदहस्तस्तु नाचें ऽर्थोऽभिनयं प्रति ।

यस्य यद् दृश्यते रूपं बहुरास्तम्मयोदितम् ॥ १५६ ॥

संसार में ऐसा कोई हाथों का कार्य ही नहीं जो किसी अर्थ को न बतलाता हो किन्तु जिस हस्त का जो स्वरूप ( या कार्य ) अनेक बार देखा गया है उसे ही मैंने यहाँ बतलाया है ॥ १५६ ॥

अन्ये चाप्यर्थसंयुक्ता लौकिका ये करास्त्विह ।

छन्दतस्ते प्रयोक्तव्या रसभावविचेष्टितैः ॥ १५७ ॥

इसके अतिरिक्त जो अन्य अर्थों से सम्बद्ध लोक - सामान्य हस्त हों १. सङ्क्षेपतस्तु संक्षिप्तनिपीडिते – ग ० । २. इचेते - ख ० । ३. अभिनयकरा ये त्विह ते ह्यत्राप्यर्थंतः साध्याः - ग ० । ४. वस्तुतः — क ० ख ० । ५. नास्ति कश्चित्तथा हस्तो नाट्याभिनयं प्रति - ग ० । ६. नाट्याभिनयनं - ख ० । ७. संदृश्यते - ख ० । ८. नियोक्तव्या - ग ० ।

पृष्ठ 183

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 183 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७२ नाट्यशास्त्रम् उन्हें भी रस तथा भावों की सूचक चेष्टाओं के साथ स्वेच्छानुसार प्रयुक्त करना चाहिए ।

देशं कालं प्रयोगञ्चाप्यर्थयुक्तिमवेक्ष्य च ।

हस्ता ह्येते प्रयोक्तव्या नृणां स्त्रीणां विशेषतः ॥ १५८ ॥

ये हस्तमुद्राएं पुरुषों तथा विशेषतः स्त्रियों के द्वारा देश, काल, प्रयोग तथा योग्यता ( अर्थयुक्ति ) को देखकर प्रयुक्त की जाएं ॥ १५८ ॥

हस्तमुद्राओं की विविध क्रियाएं-सर्वेषामेव हस्तानां यानि कर्माणि सन्ति वै ।

तान्यहं सम्प्रवक्ष्यामि रसभावकृतानि तु ॥ १५ ९ ॥

उत्कर्षणं विकर्षणं तथा व्याकर्षणं पुनः

। 1

पॅरिप्रहो निग्रहश्वाह्नानं तोदनमेव च ॥ १६० ॥

संश्लेषञ्च वियोगश्च रक्षणं मोक्षणन्तथा ।

विक्षेपधूनने चैव विर्संर्गस्तर्जनन्तथा ॥ १६१ ॥

छेदनं भेदनश्चैव स्फोटनं मोर्टनन्तथा ।

ताडनञ्चेति विज्ञेयं तज्ज्ञैः कर्म करान् प्रति ॥ १६२ ॥

अब मैं ( इन ) सभी हस्तों की उन क्रियाओं को जो रस तथा भाव से युक्त होती हैं - वर्णन करूंगा । ये क्रियाएं हैं — उत्कर्षण, ( ऊपर की ओर उछलना ), विकर्षण ( खींचना ), व्याकर्षण ( बाहर छिटकना ), परिग्रह ( ग्रहण करना ), निग्रह ( विनाश करना ), आह्वान ( बुलाना, संकेत करना ), तोदन ( ताड़न करना ), संश्लेष ( मिलना, मिलाना ), वियोग ( हटाना, हटना ), रक्षण ( रक्षा करना ), मोक्षण ( फेंकना ), विक्षेप ( फेंकना, त्याग करना ), धूनन ( हिलाना कंपाना ); विसर्ग ( ससम्मान अर्पण या त्याग करना ), छेदन ( तोड़ना ), भेदन ( काटना ), स्फोटन ( विकसित करना ), मोटन ( संकोच करना ) तथा ताडन ( पीटना ) ॥ १५ ९ -१६३ )

उत्तानः पार्श्वगश्चैव तथाधोमुख एव च ।

हस्तप्रचारस्त्रिविधो नाट्यतत्वसमाश्रयः ॥ १६३ ॥

१. अर्थयुक्तिम् - ग ० । २. सन्ति हि - ग ० । ३. चैवापकर्षणम् - ग ० । ४. परिग्रहश्चाप्याह्वानं ताडनं तर्जनं तथा - ख ०. ५. नोदनं तथा - ग ० । ६. विसर्गस्तदनन्तरम् - ग ० । ७. मोहनं तथा - ग ० ।

पृष्ठ 184

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 184 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नवमोऽध्यायः नाट्यतत्वों के ( सिद्धान्त के ) अनुसार हस्तप्रचार तीन जाता है । यथा— ( १ ) उत्तान ( ऊपर की ओर मुंह करके ( दायी या बांयीं ओर मुंह करके ) तथा ( ३ ) अधोमुख मुंह करके...... ) ॥ १६३ ॥

सर्वे हस्तप्रचाराश्च प्रयोगेषु यथाविधि ।

नेत्र मुखरागं द्यैः कर्त्तव्या व्यञ्जिता बुधैः ॥

७३ प्रकार से किया ), ( २ ) पार्श्वग ( नीचे की ओर १६४ ॥ इन हस्तप्रचारों को प्रयोग के समय शास्त्र निदर्शित विधि के साथ नेत्र, भौंहे, मुखराग आदि के द्वारा बुद्धिमान प्रयोक्ताजन व्यक्त करें ॥ १६४ ॥

हस्तमुद्राओं का कार्य—

करणं कर्म स्थानं प्रचारयुक्ति क्रियाञ्च समवेक्ष्य ।

हस्ताभिनयः कीर्यस्तज्ज्ञैर्लोकोपचारेण ॥। १६५ ॥

बुद्धिमान ( प्रयोक्ता ) जन इन हस्तों ( हस्ताभिनयों ) का लोक व्यवहार के अनुसार प्रयोग करें तथा उसी समय इनके करण, ( अध्याय ४ में वर्णित ) कर्म, ( पताक आदि ) स्थान, ( ललाट आदि प्रदेश ) प्रचार, ( अल्प, मध्य आदि ) युक्ति ( मुख्य या गौण बनाने का कारण ) तथा क्रिया को देख कर प्रयोग निश्चित कर लें ॥ १६५ ॥

उत्तमानां कराः कार्या ललाटक्षेत्रचारिणः ।

वक्षस्थाश्चैव मध्यामामधमानामधोगताः ॥ १६६ ॥

उत्तम पात्रों के हस्तों को ललाट प्रदेश के समीप, मध्यम पात्रों के वक्षःस्थल के समीप तथा अधमपात्रों के इससे नीचे शरीर के भाग के समीप क्रियाशील रखना चाहिए ॥ १६६ ॥

हस्तमुद्राओं का प्रचार-ज्येष्ठे स्वल्पप्रचाराः स्युर्मध्ये कुर्वीत मध्यमैः ।

अधमेषु प्रकीर्णाचं हस्ताः कार्याः प्रयोक्तृभिः ॥ १६७ ॥

ज्येष्ठ अभिनय में इन हस्तमुद्राओं का प्रचार अल्प रहना चाहिए मध्य में मध्यमप्रचार तथा अधम अभिनय में हस्त मुद्राओं का विपुलता से प्रचार रहना चाहिए ॥ १६७ ॥

लक्षणव्यञ्जिता हस्ताः कार्यास्तूत्तममध्यमैः ।

लोकक्रियास्वभावेन नीचैरप्यर्थ संश्रयाः ॥ १६८ ॥

१. रागैश्च - ग ० । २. सम्प्रेक्ष्य - ग ० । ३. तज्ज्ञैः कार्यो- ग ० । ४. मध्ये मध्यविचारिणः - ख - ग ० । ५. प्रकीर्णास्तु - ग ० ।

पृष्ठ 185

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 185 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७४ नाट्यशास्त्रम् उत्तम तथा मध्यम पात्रों के द्वारा इन हस्तमुद्राओं का प्रयोग शास्त्रीय लक्षणों के अनुसार अर्थाभिव्यक्ति करे परन्तु अधमपात्रों के द्वारा लोकक्रियाओं का हस्ताभिनय में अनुसरण किया जाय ॥ १६८ ॥

अथवान्यादृशं प्राप्य प्रयोगं कालमेव च ।

विपरीताथया हस्ताः प्रयोक्तव्या बुधैर्न वा ॥ १६ ९ ॥

परन्तु जब कोई असम्मान्यप्रयोग या समय हो तो बुद्धिमान इन हस्तमुद्राओं के प्रयोग को वर्णित लक्षण से भिन्न स्वरूप में संयोजित करे या न भी करे ॥ १६ ९ ॥

विषण्णे मूच्छिते हीते जुगुप्सा - शोकपीडिते ।

ग्लाने स्वप्ने विहस्ते च निश्चेष्टे तन्द्रिते जडे ॥ १७० ॥

व्याधिग्रस्ते जरा च भयार्त्ते शीतविप्लुते ।

मत्ते प्रमत्ते चोन्मत्ते चिन्तायां तपसि स्थिते ॥ १७१ ॥

हिमवर्षहते बद्धे " वारिणि प्लवसंश्रिते ।

स्वप्नायिते च सम्भ्रान्ते नर्तसंस्फोटने तथा ॥ १७२ ॥

न हस्ताभिनयः कार्यः कार्यः सत्वसमाश्रयः ।

तथा काकुँविशेषश्च नानार्थरसभावकः ॥ १७३ ॥

जब कोई पात्र खिन ,, मूच्छित, लज्जित, घृणा तथा शोक से प्रपीडित, मलिन ( ग्लान ) सोया हुआ, लूला ( विहस्त ) बेहोश, तन्द्रिल, जड़, बीमार, बुढ़ापे से त्रस्त, भय पीड़ित, ठंड से ठिठुरता हुआ या त्रस्त, मदमत्त, पागल, चिन्तित, तप करते हुए, बर्फ या वर्षा के कारण त्रस्त ( आहत ), कैद, जल या डोंगें में संचारशील, स्वप्न में बकते हुए, भ्रान्तियुक्त, तथा नखों से कुरेदने या पटकनेवाला रहे तो ऐसी दशा में हस्त की योजना न की जाए किन्तु अनेक अर्थ रस तथा भावों को अभिव्यक्त करने वाला तथा विभिन्न स्वरों से अभिव्यक्त होने वाला रसाभिनय प्रारम्भ करना चाहिए ( या उसका ग्रहण करना चाहिए ) ॥ १७०-१७३ ॥ १. बुधैर्नरैः - ग । २. भीते - ख ०, ग ० । ३. सुप्ते - ख ०, ग ० । ४. हिमवर्षंगते - ख ०, ग ० । ५. बन्धे हरिणप्लव संश्रिते - ख ०, ग ० । ६. नख संस्फो - ख ०, ग ० । ७ तथाकारविशेषश्च - ख ०, ग ० । ८. नानाभाव रसान्वितः - ख ०, ग ० ।

पृष्ठ 186

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 186 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नवमोऽध्यायः ७५

यत्र व्यावुभौ हस्तो तत्तंदृष्टिविलोकनैः ।

वाचिकाभिनयं कुर्याद् विरामैरर्थदर्शकैः ॥ १७४ ॥

वाचिकाभिनय के समय विभिन्न ( तथा वर्णित उन सभी ) दृष्टियों तथा अवलोकन क्रियाओं को हस्त क्रियाओं के अनुसार इस प्रकार दक्षता-पूर्वक निर्देशित करना चाहिए जिससे कि उनके द्वारा प्रदर्शित वाचिक अभिनय के विराम आदि नियमानुसार प्रस्तुत करने पर अर्थों की ( स्पष्टतः ) अभिव्यक्ति हो ॥ १७४ ॥

उत्तानः पार्श्वगश्चैव तथाऽधोमुख एव च ।

प्रचारस्त्रिविधोऽङ्गानां नाट्यनृत्तसमाश्रयः ॥ १७५ ॥

नाट्य तथा नृत्त में प्रयोग ( के समय प्रदर्शित ) किया जाने वाला हस्त प्रचार त्रिविध है— यथा ( १ ) उत्तान, ( २ ) पार्श्वग तथा ( ३ ) अधोमुख ॥ १७५ ॥

सानो वर्त्तयः स्थितोऽधोमुख एव च ।

पश्ञ्च प्रचारा हस्तस्य नाट्यनृत्तसमाश्रयाः ॥ १७६ ॥

अभिनय तथा नृत्य में हस्त प्रचार की पांच विधायें हैं । यथा ( १ ) उत्तान ( ऊपर की ओर हथेली का रहना ), ( २ ) वर्तुल ( गोल घुमाव लेना ), ( ३ ) त्र्यस्त्र ( तिरछे या मोड़ कर घुमाना ), ( ४ ) स्थित ( स्थिर रहना ) तथा ( ५ ) अधोमुख ( हथेली को उल्टी करना ) ॥ १७६ ॥

एवं ज्ञेयाः करा ह्येते नानाभिनयसंश्रयाः ।

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि करान् नृत्तसमाश्रयान् ॥ १७७ ॥

इस प्रकार अनेक रसों तथा भावों से सम्बद्ध अनेक हस्त मुद्राओं को मैंने बतलाया अब मैं नृत्त हस्तों को बतलाता हूँ ॥ १७७ ॥

नृत्तहस्ते -..

सोऽङ्गलस्थौ तु प्राङ्मुखौ कंटकामुखौ ।

समानकूर्परांसौ च चतुरस्रौ प्रकीर्तितौ ॥ १७८ ॥

१. नृत्तहस्त - नृत्त के अन्तर्गत होने वाले विभिन्न प्रचार ( चाल ) शारीरिक मुद्राओं तथा स्थितियों में शोभा, सौन्दर्यं तथा आकर्षण उत्पन्न करने के लिए हो १. तत्र दृष्टि - ख; यत्र दृष्टि - ग ० । २. उत्तालोऽधस्तलस्ति गुर्ध्वाऽधोमुख एव च । हस्तप्रचारा विज्ञेया नाटये नृते च पञ्चधा - ग ० । ३. पद्यमेतत् ग - पुस्तके नास्ति । ४. संश्रिताः ग ० । ५ वक्षःस्थोऽष्टाङ्गुल – ग ० । ६. खटका - क - ख ० ।

पृष्ठ 187

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 187 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७६ नाट्यशास्त्रम् चतुरस्र - छाती से आठ अंगुल के अन्तर पर सामने की ओर दोनों हाथों को कटकामुखमुद्रा में तथा दोनों कन्धों तथा कोहनी को समान ऊंचाई पर रखना ' चतुरस्र ' कहलाता है ॥ १७८ ॥

हंसपक्षकृतौ हस्तौ व्यावृत्तौ तालवृन्तवत् ।

उत्ताविति विज्ञेयावथवा तालवृन्तकौ ॥ १७ ९ ॥

उद्वृत्तः - दो हंसपक्ष हस्तों को पंखे के समान हिलाना । इसका अन्य नाम ' तालवृन्तक ' भी है ॥ १७ ९ ॥

चतुरस्त्रस्थितौ हस्तौ हंसपक्षकृतौ तथा ।

तिर्यक स्थितौ चाभिमुखौ ज्ञेयौ तलमुखाविति ॥ १८० ॥

तलमुख - चतुरस्त्र दशा में हंसपक्ष हस्तों को तिरछे तथा एक दूसरे के सम्मुख रखना ॥ १८० ॥

तावेव मणिबन्धान्ते स्वस्तिका कृतिसंस्थितौ ।

स्वस्तिकाविति विख्यातौ विच्युतौ विप्रकीर्णकौ ॥ १८१ ॥

स्वस्तिक – यदि तलमुख नृत्त - हस्त कलाई पर से स्वस्तिक किये जाएं । विप्रकीर्ण - ( तथा ) स्वस्तिक नृत्तहस्त के प्रदर्शन के पश्चात् उन्हें हटा लेना ॥ १८१ ॥

नृत्त -हस्तों की सर्जना की गई । वस्तुतः ये नृत्तहस्त हाथ की विभिन्न अवस्थाएं ही हैं क्योंकि इनसे किसी अर्थविशेष की प्रतीति नहीं होती; फिर भी अंग - भंगों से जो लावण्य निखरता है उसमें नृतहस्तों का बड़ा हाथरहता है । ये समतोलपन ( Balance ) के सिद्धान्त पर निर्मित किये गये ( प्रतीत होते ) हैं, क्योंकि समतलपन ( चतुरस्रता ) भी शरीर के सौन्दर्य में समाविष्ट माना जाता है । नृत्तहस्त हाथ, पैर तथा शरीर के सामंजस्य द्वारा सौन्दर्य उत्पन्न करते हैं और नृत्य प्रदर्शन को शोभा शाली बनाते हैं । इसीलिए ये नृत्य के अलंकार माने गये । नृतहस्तों की उत्पत्ति संयुत तथा असंयुक्त हस्तमुद्राओं से हुई है परन्तु कुछ नृत्तहस्तों में मिश्रमुद्राओं ( के भिन्न मुद्राओं में संयोजन ) की भी योजना रहती है । नृतहस्त हाथ के चालन से निर्मित होने के कारण उनका रेखांकन संभव नहीं; यही कारण है कि संयुत तथा असंयुक्तहस्तों के सभी रेखाचित्र दिये गए पर नृतहस्तों के नहीं दिये जा सके ।

पृष्ठ 188

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 188 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७७

अलपल्लव- संस्थानावूर्ध्वास्यौ पद्मकोशकौ ।

अरालकर्टकाख्यौ चाप्यरालकटकामुखौ ॥ १८२ ॥

अराल कटकामुख – दोनों अलपल्लव हस्तों को ऊपर हथेली रखते हुए पद्यकोश हस्तों में परिवर्तित कर देना । इसका अन्य नाम ' अरालखटका " भी है ॥ १८२ ॥

[ तथैव मणिबन्धान्ते हारीलौ विच्युतावुभौ । ज्ञेयौ प्रयोक्तृभिर्नित्यम् अरालखटकाविति ॥ ] ( प्रक्षिप्तः– यदि दो अराल हस्तों को कलाई को नोक से स्वस्तिक के बाद विच्युत कर दिया जाए तो उसे प्रयोक्तागण अरालकटकामुख जानें । )

भुजांस कूर्परायैस्तु कुटिलावर्तितौ करौ ।

पराङ्मुखतलाविद्धौ ज्ञेयावाविद्धवक्रकौ ॥ १८३ ॥

आविद्धवक्र - विपरीत बाहु, कंधा तथा कोहनी के कोनों को कुटिल ( तिरछी ) गति से दोनों हाथों से स्पर्श करते हुए दोनों अराल मुद्रा की हथेलियों को ऊपर तथा नीचे की ओर कंपित करते हुए बदलना ।

हस्तौ तु सर्पशिरसौ ममाङ्गुष्ठको यदा ।

तिर्यक्प्रसारितास्यौ च तदा सूचीमुखौ स्मृतौ ॥ १८४ ॥

सूचीमुख - दो सर्पशीर्ष हस्तों को अपने अंगूठों के साथ तिरछे फैलाकर हथेली के मध्य का ( मध्यमागुंली का ) स्पर्श करते हुए रखना ॥ १८४ ॥

[ सर्पशीष यदा हस्तौ भवेतां स्वस्तिकस्थितौ । मध्यप्रसारिताङ्गुष्ठौ ज्ञेयौ सूचीमुखौ तदा ] अथवा स्वस्तिक के पश्चात् ( यदि ) दो सर्पशीर्ष हस्तों को मध्यमां-गुली के पास हथेली में अंगूठों का स्पर्श करते हुए रखना सूचीमुख है ।

रेचितौ चापि विज्ञेयौ हंसर्पक्षौ द्रुतमौ ।

प्रसारितोत्तानतलौ रेचिताविति संज्ञितौ ॥ १८५ ॥

रेचित - दो हंसपक्ष हस्तों को तेजी से घुमाकर हथेली को उपर की ओर मुंह कराते हुए फैला देना ॥ १८५ ॥

१. खटका - क - ख ० । २. वाप्य ख; वाग ० । ३. पद्यमेतत् - ग - पुस्तके नास्ति । ४. ह्यरालविच्युता - ख ० । ५ मुखतया - ख ० । ६. मध्यस्था — ख ० । ७ पद्यमेतत् ग - पुस्तके नास्ति । ८. हंस पक्षोद्धृतभ्रमौ - ख ० । ९. संस्थितौ - ख ० ।

पृष्ठ 189

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 189 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७८ नाट्यशास्त्रम्

चतुरश्रो भवेद्वामः सव्यहस्तश्च रेचितः ।

विज्ञेयो नृत्ततत्वज्ञैरर्धरेचितसंशितौ ॥ १८६ ॥

अर्धरेचित - बाएं हाथ को चतुरस्र तथा दाहिने हाथ को रेचित करना नृत्त के विद्वानों के मत में ' अर्धरेचित ' है ॥ १८६ ॥

अञ्चितौ कूर्परांसौ तु त्रिपताकौ करौ कृतौ ।

किञ्चित्तिर्यग्गतावेतौ स्मृतावृत्तावश्चितौ ॥ १८७ ॥

उत्तानवंचित - दो त्रिपताक हस्तों को कुछ तिरछे और कुछ नमाते हुए रखना तथा कन्धों और केहुनियों को हिलाना ॥ १८७ ॥

मणिबन्धनमुक्तौ तु पताकौ पल्लवौ स्मृतौ ।

बाहुशीर्षाद्विनिष्क्रान्तौ नितम्बाविति कीर्तितौ ॥ १८८ ॥

पल्लव – कलाई से दो पताक हस्तों को मिलाना ( तथा हाथों को कन्धे के बराबर रखना ) नितम्ब – ( पल्लव हस्त को या ) दो पताक हस्तों को कन्धे से ऊपर निकाल कर ले जाना ॥ १८८ ॥

केशदेशाद्विनिष्क्रान्तौ परिपार्श्वोत्थितौ तथा ।

विज्ञेयौ केशबन्धी तु करावाचार्यसम्मतौ ॥ १८ ९ ॥

केशबन्ध — केश प्रदेश या शिखा पर से ऊपर घुमाकर दोनों ( पताक- ) हस्तों को दोनों बाजुओं में ( सीधा ) रखना ॥ १८६ ॥

तिर्यक् प्रसारितौ चैव पार्श्वसंस्थौ तथैव च ।

लताख्यौ च करो ज्ञेयौ नृत्ताभिनयनं प्रति ॥ १ ९ ० ॥

लता - ( बन्ध ) — दोनों हाथों को तिरछे फैलाकर बाद में दोनों बाजुओं में फैलाकर रखना ॥ १ ९ ० ॥

समुन्नतो लताहस्तः पार्थ्यात् पार्श्व विलोलितः ।

त्रिपताकोऽपरः कर्णे करिहस्तः प्रकीर्तितः ॥ १ ९ १ ॥

करिहस्त — लता हस्त करने के बाद उसे ऊंचा करते हुए एक बाजू दूसरी बाजू की ओर लाना ( विलोलित ) तथा बाद में एक हाथ का त्रिपताक मुद्रा में कर्ण के समीप रखना ॥ १ ९ १ ॥ १. त्रिपताकाकृतौ करौ - खग ० । २. परिपाश्वंस्थितौ -ख ० । ३. केशबन्धाख्यौ —ख ग ० । ४. करिहस्तौ प्रकीर्तितौ - ग ० ।

पृष्ठ 190

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २, पृष्ठ 190 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नवमोऽध्यायः ७ ९

कटिशीर्षनिविष्टौ द्वौ त्रिपताकौ यदा करौ ।

पक्षवञ्चितको हस्तौ तदा ज्ञेयौ प्रयोक्तृभिः ॥। १ ९ २ ॥

पक्षवंचितक — एक त्रिपताक हस्त कटि प्रदेश पर तथा दूसरा शीर्ष स्थान ( के बराबर - ) पर रखना ॥ १ ९ २ ॥

तावेव तु परावृत्तौ पक्षप्रद्योतकौ स्मृतौ ।

अधोमुखतला विद्धौ शेयौ गरुडपक्षकौ ॥ १ ९ ३ ॥

पक्षप्रद्योतक— पक्षवचितक हस्तों को उलटे कर देना ।

गरुडपक्ष - पक्षवंचित हस्त को आँधी हथेली करते हुए रखना ॥ १ ९ ३ ॥

हंसपक्षकृतौ हस्तौ व्यावृत्तपरिवर्तितौ ।

तथा प्रसारितभुजौ दण्डपक्षाविति स्मृतौ ॥ १ ९ ४ ॥

दण्डपक्ष: —दोनों मपक्ष हस्तों को क्रमशः उलटे सीधे घुमाकर ( तथा ) बाद में कोहनी से कंधे तक बाहुओं को सीधे फैलाकर रखना ॥१६४ ॥

ऊर्ध्वमण्डलिनौ हस्तौ ऊर्ध्वदेशविवर्तनात् ।

तावेव पार्श्वविन्यस्तौ पार्श्वमण्डलिनौ स्मृतौ ॥ १ ९ ५ ॥

ऊर्ध्वमण्डली - दण्डपक्ष हस्त को ऊपर की ओर गोल ( चक्कर )

चुमाना ।

पार्श्वमण्डली – एक बाजू में ऊर्ध्वमण्डली हस्तों को रखना ॥ १ ९ ५ ॥

उद्वेष्टितो भवेदेको द्वितीयश्चापवेष्टितः ।

मिता g रसः स्थाने ह्यरोमण्डलिनौ स्मृतौ ॥ १ ९ ६ ॥

उरोमण्डली – एक उद्वेष्टित ( ऊपर की ओर उठाए हुए ) तथा दूसरे अपवेष्टित ( नीचे की ओर झुके हुए ) हस्त को वक्षःस्थल के समीप घुमाते हुए रखना ॥ १ ९ ६ ॥

अंलपल्लवकारालावुरोऽर्धभ्रमणक्रमात् ।

पार्श्ववर्तश्च विज्ञेयावरः पाश्र्वार्धमण्डलौ ॥ १ ९ ७ ॥

उरः पार्श्वमण्डल - अलपल्लव तथा अराल हस्तों को आधा घुमाव देकर एक को बाजू में व दूसरे को ऊपर ( वक्षःस्थल के समीप ) रखना ॥१ ९ ७ ॥ १. शीषंनिविष्टायौ — ग ० । २. यथा- ग ० । ३. द्वितीयश्च विवेष्टितः - ग ० । ४. भ्रामिता -ख । ५. अरालपल्लवकरावुरो - ख ० ।