भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 201–210
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 201–210
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९ ० नाट्यशास्त्रम् यथा दर्शनमन्यच्च लोकाद् ग्राह्यं प्रयोक्तृभिः ॥ ३२ ॥
इत्यूर्वोर्लक्षणं प्रोक्तं जङ्घ ' योस्तु निबोधत । इसके अतिरिक्त उरू की अन्य क्रिया तथा अवस्थाएं प्रयोक्ता जन कार्य के अनुसार लौकिक स्थिति से ग्रहण करें । इस प्रकार ' उरू ' का वर्णन किया गया । अब ' जंघाओं ' का कार्य कहता हूँ, उन्हें भी जानिये ॥३२-३३ ॥ जंघा - ( भेद एवं लक्षण ) आवर्तितं नतं क्षितमुद्वाहितमथापि वा ॥ ३३
परिवृत्तं तथा चैव जङ्घा कर्माणि पञ्चधा ।
वामो दक्षिणपार्श्वेन दक्षिणाच्चापि वामतः ॥
पादो यत्र वजेद्विप्रास्तदावर्तितमुच्यते ।
जानुनः कुञ्चनाच्चैव नतं ज्ञेयं प्रयोक्तृभिः ॥
विक्षेपाच्चापि जङ्घायाः क्षिप्तमित्यभिधीयते उाहितञ्च विज्ञेयमूर्ध्वमुद्वाहनादिद्द ॥ ३६ ॥
प्रतीपनयनं यत्तु परिवृत्तं तदुच्यते । जंघा के पांच भेद होते हैं: ( १ ) आवर्तित, ( २ क्षिप्त, ( ४ ) उद्वाहित तथा, ( ५ ) परिवृत्त ॥। ३४ ॥ ३५ ॥ । ) नत, ( ३ ) यदि बायां पैर सीधी ओर तथा सीधा पैर बायीं ओर घूमे तो ' आवर्तित ', जंघा को सिकुड़ाने ( कुंचनात् झुकाने ) पर ' नत ', जंघा को झटके से आगे फेंकने पर ‘ क्षिप्त ', जंघा को ऊपर ( की ओर ) उठाने को ' उद्वाहित ' तथा पीछे की ओर मोड़ने ( या ' उद्वाहित ' के विपरीत बढ़ाने ) को ' परिवृत्त ' जानो ॥ ३३-३७ ॥ आवर्तितं प्रयोक्तव्यं विदूषकपरिक्रमे ॥ ३७ ॥
नतञ्चापि हि कर्तव्यं स्थानासनगतादिषु ।
क्षिप्तं व्यायामयोगेषु ताण्डवे च प्रयुज्यते ॥ ३८ ॥
१. जंघायास्तु – ग ० । २. जंघा स्वस्तिक योगेन क्रमादावर्तितं भवेत् — इति क - पुस्तके प्रक्षिप्तम-धिकञ्च । ३. जानुनः कुञ्चनं वापि - ग ० । ४. नतं स्याज्जानुनमनाद् क्षिप्तं विक्षेपणाद्वहिः – क – ख ० । ५. यत्तत् ग ० । ६. सम्भ्रमातिपरिक्रमेख
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दशमोऽध्यायः ९ १
तथा चोद्वाहितं कीर्यमाविद्धगमनादिषु ।
ताण्डवादी प्रयोक्तव्यं परिवृत्तं प्रयोक्तृभिः ॥ ३ ९ ॥
योजना - विदूषक की गति में आवर्तित की, स्थिति ( खड़े होने ) तथा आसन ग्रहण करने में ' नत ' की, व्यायाम तथा ताण्डवनृत्य में ' क्षिप्त ' की आविद्ध ( वक्र ) गति आदि में ' उद्वाहित ' की तथा ताण्डव आदि के प्रस्तुतीकरण में ' परिवृत्त ' जंघा की योजना करनी चाहिए ॥ ३७-३९ ॥ पादकर्म - ( लक्षण तथा योजना )
' इत्येवं जङ्घयोः कर्म पादयोस्तु निबोधत ।
उद्घट्टितः समश्चैव तथाग्रतलसञ्चरः ॥ ४० ॥
अश्चितः कुञ्चितश्चैव पादः पञ्चविधः स्मृतः । मैंने ये जंघा के कार्य बतलाए । अब आप पैरों के कार्य सुनिये । पादकर्म के पांच भेद हैं । ( १ ) उद्घट्टित, ( २ ) सम, ( ३ )
अग्रतलसंचर, ( ४ ) अंचित तथा ( ५ ) कुंचित ।
स्थित्वा पादतलाग्रेण पाणिर्भूमौ निपात्यते ॥ ४१ ॥
यस्य पादस्य करणे भवेदुद्धट्टितस्तु सः ।
अयमुद्धट्टित करणेष्वनुकरणार्थ प्रयोगमासाद्य ॥ ४२ ॥
द्रुतमध्यमप्रचारः सकृदसकृद्वा प्रयोक्तव्यः । पैरों से पंजे के बल खड़े होकर एड़ी से भूमि का स्पर्श करने पर ' उद्घट्टित पाद ' होता है । इसको अनुसरण करने तथा एक या अनेक बार होने वाली द्रुत और मध्यम गति में संयोजित किया जाता है ॥४१-४३ ॥ स्वभावरंचितो भूमौसमस्थानश्च यो भवेत् ॥ ४३ ॥।
संमपादः स विज्ञेयः स्वभावाभिनयाश्रयः ।
स्थिरः स्वभावाभिनये नानाकरणसंश्रये ॥ ४४ ॥
चलितश्च पुनः कार्यों विधिज्ञैः पादरेचिते ।
समस्यैव यदा पाणिः पादस्याभ्यन्तरे भवेत् ॥ ४५ ॥
१. कुर्यादाविद्ध - ग ० । २. इत्येतज्जङ्घयो: - ग ० । ३. उद्घट्टितं समचैव – ख - ग ० । ४. कुञ्चितः सूचीपादः षोढा प्रकीर्तितः- ख ० । ५. अयमुद्वेष्टित - क ० । ६. हृत मध्यम - ख - ग ० । ७. स्वभावरचिते - ग ० । ८. समस्थाने - ग ० । ९. समः पादः ख ग ० । १०. चलिताव ग ० । ११. विक्षेपः - ख ० ग ० । १२. एतत् श्लोकद्वयं - ख ग - पुस्तके नास्ति ।
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९ २ नाट्यशास्त्रम्
बहिः पार्श्वस्थितोऽङ्गुष्ठस्य श्रपादस्तु स स्मृतः ।
कृत्वा समपदं स्थानम् अश्वक्रान्तं तथैव च ॥ ४६ ॥
स्याद्विक्लवादिष्वर्थेषु यथः पादो यथाविधि । स्वाभाविक रूप समतल भूमि पर स्थापित पैर को ' समपाद ' कहते है । इसका स्वभाविक अभिनय में उपयोग होता है । विभिन्न करणों से युक्त स्वाभाविक स्थिति को प्रदर्शित करने में स्थिर ' समपाद ' रखना चाहिए तथा ' रेचक ' अवस्था के प्रदर्शित करने में ( इसे ) चलित दशा में रखते हैं । समपाद में ही पैर का पंजा ( पार्ष्णि ) दूसरे पैर के अन्दर चला जाए और अंगूठा एक बाजू बाहर टिका रहे तो ' त्र्यश्रपाद ' जानो । समपादस्थान तथा अश्वकान्तस्थान के प्रदर्शन करने के उपरान्त विक्लवादि भावों की अभिव्यक्ति के लिये ' त्र्यश्रपाद ' का विधिवत् प्रयोग किया जाता है ॥ ४३-४७ ॥ [ अस्यैव समपादस्य पाणिरभ्यन्तरे भवेत् । त्र्यपादः स विज्ञेयः स्थानकादिषु संश्रयः ॥ ] ( प्रक्षिप्त - यदि इसी ' समपाद ' में पंजा अन्दर रख ले तो त्र्यश्रपाद होता है । इसका स्थानग्रहण करने आदि में प्रयोग किया जाए । ) उत्क्षिप्ता तु भवेत् पाणिः प्रसृतोऽङ्गुष्ठकस्तथा ॥ ४८ ॥
अङ्गुल्यश्चाञ्चिताः सर्वाः पादे ऽग्रतलसञ्चरे ॥ ४ ९ ॥ यदि एड़ी उठी हुई, अंगूठा आगे की ओर फैला हुआ और उंगलियां झुकी हुई हो तो ' अग्रतल - संचर ' नामक पाद होता है ॥ ४८-४९ )
तोर्दन निकुट्टने स्थितनिशुम्भने भूमिताडने भ्रमणे ।
विक्षेप विविधरेचक पाष्णिकृतागमनमेतेन ॥ ५० ॥।
प्रेरणा, कूटना ( तोड़ना ), स्थित होना ( स्थानक दशा में ) ( ठोकर से ) पीटना, पृथ्वी की ताड़ना करना, भ्रमण, ( किसी वस्तु का ) फेंकना, विभिन्न रेचक गतियों की दशा में तथा एड़ी के बल आने में ' अमतलसंचर ' पाद की योजना की जाएं । १. अयं श्लोकः क - पुस्तके प्रक्षिप्तः । २. पाष्णिरचितो ग ० । ३. पादोऽग्रतलसञ्चरः ख ग ० । ४. नोदन - निकुट्टितेस्थित निसुंभिते भूमिताडनभ्रमणे - ग ० । ५ पाष्णिक्षताग्रगमन -ख - ग ० ।
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दशमोऽध्यायः ९ ३
पाणिर्यस्य स्थिता भूमौ पादमग्रतलन्तथा ।
अङ्गुल्यश्चाश्चिताः सर्वाः स पादोऽश्चिंत उच्यते ॥ ५१ ॥
एड़ी भूमि पर टिकी हो, पंजा ऊपर उठा हुवा तथा उंगलियां सिकुड़ी हुई ( झुकी हुई ) रहे तो ' अंचित ' पाद कहलाता है ।
पादाग्रस्थितसञ्चारे वर्तितोद्वर्तिते तथा ।
एष पादाहते कार्यो नाना भ्रमरकेषु च ॥ ५२ ॥
पंजों के बल खड़े होकर चलने, किसी ओर घूमने और लौटने ( वर्तितोद्वर्तिते ), पैर से पीटने तथा भ्रमरी - चारी के प्रदर्शन में इस अश्चित पाद की योजना करनी चाहिए ॥ ५२ ॥
उत्क्षिप्ता यस्य पाष्णिः स्यादङ्गुल्यः कुञ्चितास्तथा ।
तथाकुञ्चितमध्यश्च स पादः कुञ्चितः स्मृतः ॥ ५३ ॥
जिसमें एड़ी ऊपर उठाई हुई, उंगलियां सिकुड़ी हुई तथा पैर का आधा भाग ( मध्यभाग ) नमा हुआ रहे तो ' कुंचित ' पाद कहलाता है ॥ ५३ ॥
उदात्तगमने चैव वर्तितोद्वर्तिते तथा ।
अतिक्रान्तक्रमे चैव पादमेतं प्रयोजयेत् ॥ ५४ ॥
शिष्टजन की चाल ( उदात्तगमन ), सीधी ओर घूमने, लौटने और अतिक्रान्ताचारी के प्रदर्शन में इस कुञ्चित पाद की योजना करनी चाहिए ॥ ५४ ॥
[ उत्क्षिप्ता तु भवेत् पाणिरङ्गुष्ठाग्रेण संस्थितः ।
वामश्चैव स्वभावस्थः सूचीपादः प्रकीर्तितः ॥
नृत्ते नूपूरकरणेच प्रयोगस्तस्य कीर्तितः । ] [ प्रक्षिप्त - यदि ( दाहिने पैर की एड़ी उठी हुई, पंजा अंगूठे के बल पर टिका हुआ तथा बायां पैर स्वाभाविक दशा में खड़ा रखा जाए तो ' सूची ' पाद कहलाता है । इस पाद की नृत्त तथा नूपुर धारण में योजना करनी चाहिए । ] १. भूभावृध्वंमप्रतलं तथा - ख ० । २. स पादस्त्वञ्चितः स्मृतः - ग ० । ३. अतिकान्तक्रमे चैव पादमेतं प्रयोजयेत् —ख ० । ४. पद्यार्धमेतत् - ख ० - - पुस्तके नास्ति । ५. उत्क्षिप्तं तु - ग ० । ६. संस्थिता - ग ० । ७ नृतेऽन्तःपुरकरणे - ख ० । ८. कीर्त्यते ग ० ।
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९ ४ नाट्यशास्त्रम्
पाद जङ्गोरुकरणं समं कार्य प्रयोक्तृभिः ।
पादस्य करणं सर्वजङ्घोरुकृतमिष्यते ॥ ५५ ॥
नाट्यप्रयोक्ता पाद, जंघा तथा उरू की गतियों को एक साथ ही प्रयुक्त करें क्योंकि पैरों की गति के प्रदर्शन करने में जंघा तथा उरू की गतियां भी सम्मिलित रहती ही हैं ॥ ५५ ॥
यथा पादः प्रवर्तेत तथैवोरुः प्रवर्तते ।
तयोः समानकरणात् पादचारीं प्रयोजयेत् ॥ ५६ ॥
क्योंकि पैर जिधर घूमता है पिंडली भी उसी ओर जाएगी, ( तथा जंघा भी ) इसी कारण इन ( दोनों ) की ( समान ) गति से ' पादचारी ' बनती है ॥
इत्येतदङ्गजं प्रोक्तं लक्षणं कर्म चैव हि ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि चारीव्यायामलक्षणम् ॥ ५७ ॥
यह मैंने विभिन्न अंङ्गों का अभिनय बतलाया । अब मैं ( विभिन्न ) चारियों के भेद एवं लक्षण ( अगले अध्याय में ) बतलाऊंगा ॥ ५७ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे शारीराभिनयो नाम दशमोऽध्यायः । || भरतनाट्य शास्त्र का शारीराभिनय नामक दसवां अध्याय समाप्त!! १. करणं ग०- २. अनयोः - ग ० । ३. अङ्गिकाभिनयो नाम नवमोऽध्यायः – क ० ख ० ।
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एकादशोऽध्यायः चारी विधान
' चारी-एवं पादस्य जङ्घाया ऊरो: कट्यास्तथैव च ।
समानंकरणे चेष्टा चारीति परिकीर्तिता ॥ १ ॥
( हाथ ) पैर, जंघा, ऊरू तथा कटि ( आदि ) अङ्गों की एक साथ ( निर्दिष्ट पद्धति से ) चलनात्मक चेष्टा ' चारी ' कहलाती है ॥ १ ॥
विधानोपगताचार्यो व्यायच्छन्ते परस्परम् ।
यस्मादङ्गसमायुक्तास्तस्माद् व्यायाम उच्यते ॥ २ ॥
टिप्पणी- १ ' चारी ' शब्द का आशय वर्तमान ' चाल ' शब्द से है तथा उसे ही ' चारी ' शब्द से यहां निर्दिष्ट किया गया है यही सामान्यतः कहा जा सकता है । कथकलि में ' सारी ' तथा मणिपुरी नृत्य में होने वाली ' चाली ' इसी शब्द का अपभ्रंश या वर्तमान प्रचलित नाम है जिसे अंग्रेजी में Step कहते हैं । इसे ' चारी ' शब्द द्वारा प्रकट कर सकते हैं । नाट्यशास्त्र भौमीचारी तथा आकाशिकी- चारी के ३२ प्रकार बतलाए गए हैं । संगीतरत्नाकर में देशीचारी के अतिरिक्त प्रकार भी बतलाये हैं जो नाट्यशास्त्र के परवर्ती आचार्यो - ( कोहल तथा अन्य परवर्ती आचार्यो ) द्वारा ' निरूपित की गई । इनमें ३५ भौमी तथा २ ९ आकाशिकी चारी है । संगीत - रत्नाकर के व्याख्याकार चतुर कल्लिनाथ ने ( अपनी व्याख्या में ) कोहल का मत उद्धृत करते हुए २५ मधुपाचारी को बतलाया जो अपने ' कुट्टन ' विधान के द्वारा चारी- समूह में स्वतंत्र महत्त्व रखती है । आचार्य कोहल ने नृत्याचार्यों की आवश्यकतानुसार चारी में संवर्द्धन या संशोधन को भी मान्यता दी है । इस प्रकार चारी के भेदों के विषय मे प्राचीन एवं मध्यवर्ती नाट्याचार्यो में पर्याप्त मतभेद परिलक्षित होता है । चारी के विषय में संक्षेप में इतना ही पर्याप्त है । विशेष जिज्ञासुजन - संगीत रत्नाकर ७ ९२०-१०२६, भरतार्णव अध्याय ८।४ ९३-५।४३, के अतिरिक्त अभिनयदर्पण तथा संगीतराज का चारी-वन भी देखें । १. ऊर्वो: - ख - ग ० । २. समान करणाच्चेष्टा - ख - ग ० । ३. विधानोभयतश्वाय - ख ग ० । ४. व्यायच्छन्ति ख - ग ० ।
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९ ६ नाट्यशास्त्रम् क्योंकि यह विधान से युक्त ( होकर ) अङ्गों ( अवयवों, हस्त, पैंर इत्यादि ) को परस्पर सम्बद्ध करती हैं, इसीलिये ' चारी ' व्यायाम ( भी ) कहलाती है ॥ २ ॥
एकपादप्रचारो यः सा चारीत्यभिसंज्ञिता ।
द्विपादकमणं यत्त करणं नाम तद्भवेत् ॥ ३ ॥
करणानां समायोगः खण्डं इत्यभिधीयते ।
खण्डैस्त्रिभिश्चतुभिर्वा संयुक्तैर्मण्डलं भवेत् ॥ ४ ॥
एक पैर के द्वारा भरा जाने वाला डग ' चारी ' ' ( संचारी ) तथा दोनों पैरों से होने वाली गति ' करण ' कहलाती है । ( तीन ) करणों का योग ‘ खण्ड ' तथा तीन या चार खंडों के मिलने पर एक ' मण्डल ' बनता है ॥ चारी — उपयोगिता
चारीभिः प्रसृतं नृत्तं चारीभिश्चेष्टितं तथा ।
चारीभिः शस्त्रमोक्षश्च चार्यो युद्धे च कीर्तिताः ॥ ५ ॥
चारी से नृत्त व्याप्त है, चारी से ही हलचल ( गति आदि ) की जाती है तथा शस्त्रों का फेंकना और करना भी चारी के द्वारा ही प्रस्तुत होता है ॥ ५ ॥
यदेतत् प्रस्तुतं नाट्यं तच्चारीष्वेव संस्थितम् ।
न हि चार्या विना किञ्चिन्नायें ऽङ्गं सम्प्रवर्तते ॥ ६ ॥
' नाट्य ' रूप में जो भी ( वर्णित ) है वह सब चारी में ही समाविष्ट
जानो; क्योंकि कोई भी नाट्य का विभाग चारी के बिना नहीं होता ।
( रहता ) ॥ ६ ॥
तस्माच्चारीविधानस्य सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् या यस्मिंस्तु ग्रंथा योज्या नृत्ते युद्धे गतौ तथा ॥ ७ ॥
टिप्पणी- १ चारी - चारी के संचारी करण, खण्ड तथा मण्डल का आज कहीं प्रयोग नहीं होता, इस विषय में अन्य नृत्य - नाट्य ग्रन्थों में भी केवल उल्लेखात्मक विवरण ही उपलब्ध है । १. समायोगात् - ग ० । २. खण्डमि - ग ० । ३. प्रस्तुतं - ख - ग ० । ४. संज्ञितम् - ग ० । ५. नाट्ये ह्यङ्गं प्रवर्तते - ग ० । ६. प्रयोक्तव्या — खग ।
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एकादशोऽध्यायः ९ ७ अतएव अब मैं उन ( सभी ) के लक्षण, विधान ( आदि ) को बतलाऊँगा जिनकी नृत्य, गति तथा युद्ध में योजना की जाती है ॥ ७ ॥
भौमी चारी तथा आकाशिकी चारी-समपादा स्थितावर्ता शकटास्या तथैव च ।
अध्यर्धिका चाषगतिर्विच्यवा च तथापरा ॥ ८ ॥
पलकाक्रीडिता बद्धा उरुत्ता तथाडिता ।
उत्स्पंदिताथ जनिता स्पन्दिता चापस्पन्दिता ॥ ९ ॥
समोत्सारित मत्तल्ली मत्तल्लीचेति षोडश । एता भौम्यस्मृताचार्य:, ये सोलह भौमी चारी हैं - यथा: - ( १ ) समपादा, ( २ ) स्थितावर्ता, ( ३ ) शकटास्या, ( ४ ) अध्यधिका, ( ५ ) चाषगति, ( ६ ) विच्यवा, ( विच्युता ), ( ७ ) एलकाक्रीडिता, ( ८ ) बद्धा, ( ९ ) ऊरूद्धृता, ( १० ) अड्डिता ( अंगिता ), ( ११ ) उत्स्पन्दिता ( उत्स्यन्दिता ), ( १२ ) जनिता, ( १३ ) स्पन्दिता, ( १४ ) अपस्पन्दिता, ( १५ ) समोत्सारित - मत्तल्ली तथा ( १६ ) मत्तल्ली ॥ ८-१० ॥ शृणुताकाशिकीः पुनः ॥ १० ॥
अतिक्रान्ता पक्रान्ता पार्श्वक्रान्ता तथैव च ।
ऊर्ध्वजानुश्च सूची च तथा नूपुरपादिका ॥ ११ ॥
डोलापादा तथाक्षिप्ता आविद्धोद्वत्तसंज्ञिते ।
विद्युद्भ्रान्ता लाता च भुजङ्गत्रासिता तथा ॥ १२ ॥
मृगप्लुता च दण्डा च भ्रमरी चेति षोडश ।
आकाशिक्यः स्मृता होता लक्षणञ्च निबोधत ॥ १३ ॥
आकाशिकी चारी ( मी ) सोलह हैं । यथा: - ( १ ) अतिक्रान्ता, ( २ ) अपक्रान्ता, ( ३ ) पार्श्वक्रान्ता, ( ४ ) ऊर्ध्वजानु, ( ५ ) सूची, ( ६ ) नूपुरपादिका, ( ७ ) दोलपादा ( डोलापादा ), ( ८ ) आक्षिप्ता, ( ९ ) आविद्धा, ( १० ) उद्घृता, ( ११ ) विद्युद्भान्ता ( विद्युत्कान्ता ), ( १२ ) अलाता, ( १३ ) भुजंगत्रासिता, ( १४ ) हरिणीप्लुता ( मृग-प्लुता ) ( १५ ) दण्डा ( दण्डपादा ), तथा ( १६ ) भ्रमरी । अब मैं इनके क्रमशः लक्षण बतलाता हूँ ॥ ११-१३ ॥ १. स्थिता वार्त्ता - ख - ग ० । २. उत्स्यन्दिता - ख - ग ० । ३. चापि ग ० । ४. व्याविद्धोद्धृत सं - ख- ना ० । ७ ना ० शा ० द्वि ०
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९ ८ नाट्यशास्त्रम् भौमीचारी - लक्षण पदैर्निरन्तरकृतैस्तथा समनखैरपि 1
।
समपादा तु सा चारी विज्ञेया स्थानसंश्रया ॥ १४ ॥
समपादा- दोनों पैरों को पास रखते हुए तथा नखों को बराबर मिलाते हुए अपने स्थान पर स्थित रहने ( या खड़े रहने ) को ' समपादा ' चारी कहते हैं ॥ १४ ॥
भूमिघृष्टेन पादेन कृत्वाभ्यन्तरमण्डलम् ।
पुनरुत्सारयेदन्यं स्थितावर्ता तु सा स्मृता ॥ १५ ॥
स्थितावर्त्ता - यदि भूमि पर रगड़ते हुए एक ( अग्रतलसंचर ) पाद को ऊपर उठाकर स्वस्तिक दशा बनाते हुए दूसरे पैर को अपने पास खीचे तथा दोनों के पृथक होने के पश्चात् यही गति पुनः आवृत्त की जाए तो ' स्थितावर्त्ता ' चारी होती है ॥ १५ ॥
निषण्णाङ्गस्तु चरणं प्रसार्य तलसञ्चरम् ।
उद्वाहितमुरः कृत्वा शकटीस्यां प्रयोजयेत् ॥ १६ ॥
शकटास्या - शरीर को सीधा रखते हुए एक चरण को ' अग्रतलसंचर ' दशा में सामने ( की ) ओर रखे तथा छाती को ' उद्वाहित ' स्थिति में रखे तो ‘ शकटास्या ' चारी होती है ॥ १६ ॥
सव्यस्य पृष्ठतो वामश्चरणस्तु यदा भवेत् ।
तस्यापसर्पणञ्चैव ज्ञेया साध्यर्धिका बुधैः ॥ १७ ॥
अध्यधिका - यदि बाएं पैर एड़ी ( के पिछले भाग ) पर दाहिना पैर रखकर फिर उसे पीछे हटाया जाए ( तथा यह डेढताल के कालप्रमाण पर हो ) तो ' अध्यधिका ' चारी जानो ॥ १७ ।
पादः प्रसारितः सव्यः पुनश्चैवोपसर्पितः ।
वामः सव्यापसप च चाषगत्यां विधीयते ॥ १८ ॥
चाषगति — यदि दाहिने पैर को ( आगे ) फैलाकर फिर पीछे की ओर रख दिया जाए और बाय पैर उसी समय पीछे की ओर रखकर पुनः आगे बढ़ाकर रख दे तो ' चाषगति ' चारी जानों ॥। १८ ॥ १. स्मृता - ख - ग ० । २. स्थिता वार्ता - ख - ग ० । ३. शकटास्यं ग ० ।
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एकादशोऽध्यायः ९९
विच्यंवात् समपादाया विच्यवां सम्प्रयोजयेत् ।
निकुस्तलाग्रेण पादस्य धरणीतलम् ॥ १ ९ ॥।
विच्यवा - यदि समपादा चारी के दोनों पैरों को अलग हटा कर ( उनके ) पओं को पृथ्वी पर ( ताल देते हुए ) पटकें तो ' विच्यवा ' चारी जानों ॥ १ ९ ॥
तलसञ्चरपादाभ्यामुत्प्लुत्य पतनन्तु यत् ।
पर्यायशैश्च क्रियते एडकाक्रीडिता तु सा ॥ २० ॥
एलकाक्रीडिता - यदि तलसंचर पादों से उछाल लेकर पृथ्वी पर क्रमशः गिरता रहे तो ' एलकाक्रीडिता ' चारी जानो ॥ २० ॥
अन्योन्य जङ्घा संवेधात् कृत्वा तु स्वस्तिकं ततः ।
ऊरुभ्यां वलनं यस्मात् सा बद्धा चार्युदाहृता ॥ २१ ॥
बद्धा- दोनों जंघाओं को ' स्वस्तिक ' बनाकर पिडलियों को धीरे - धीरे हिलाने पर ' बद्धा ' चारी हो जाती है ॥ २१ ॥
तलसञ्चरपादस्य पाणिर्वाह योन्मुखी यदा ।
जङ्घाश्चिता तथोद्वत्ता ऊरुद्वृत्तेति सा स्मृता ॥ २२ ॥
उरूद्वृता - यदि ' तलसंचरपाद ' में पआ आगे रख दिया जाए और एक पिंडली थोड़ी नमाकर जंघा को ऊपर उठाले तो ' उरूद्वृत्ता ' चारी होती है ॥ २२ ॥
अग्रतः पृष्ठतो वापि पादो ऽग्रतलसञ्चरः ।
द्वितीयपादनिर्घृष्टो यस्यां स्यादड्डिता तु सा ॥ २३ ॥
अड्डिता - यदि एक ' अग्रतलसंचर ' पैर को आगे या ( और ) पीछे की ओर पृथ्वी को रगड़ता हुआ रखा जाए तो ' अड्डिता ' चारी जानो ॥ २३ ॥
शनैः पादो निवर्तेत बाह्येनाभ्यन्तरेण च ।
यद् रेचकानुसारेण साचार्युत्पन्दितास्मृता ॥ २४ ॥
उत्स्पन्दिता – यदि ' रेचक ' के अनुसार दोनों पैरों को क्रमशः एक दूसरे के पीछे घुमाया जाएं ( जिससे कि वह आगे आए और पीछे चला जाए ) तो ' उत्स्पन्दिता ' चारी होती है ॥ २४ ॥
मुष्टिहस्तश्च वक्षस्थः करोऽन्यश्च प्रवर्तितः ।
तलसञ्चरपादश्च जनिता चार्युदाहृता ॥ २५ ॥
१. वीच्यवाक् समपादायांख - ग ० । २. स्तथाग्रेण - ख - ग ० । ३. पर्यायतश्च - ख - ग ० । ४. पृष्ठतश्चापि - ख ० । ५. पादस्तु तलसञ्चरः - ख - ग ० । ६. चायुत्सन्दिता - ग ० ।