भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 211–220
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 211–220
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१०० नाट्यशास्त्रम् जनिता - यदि एक ' मुष्टि ' हस्त छाती पर तथा दूसरा हाथ गोल चक्कर लगाते हुए रखे और पैर ' अमतलसंचर ' दशा में हो तो ' जनिता ' चारी हो जाती है ॥ २५ ॥
पञ्चतालान्तरं पादं प्रसार्य स्यन्दितां न्यसेत् ।
द्वितीयेन तु पादेन तथापस्यन्दितामपि ॥ २६ ॥
स्यन्दिता - यदि एक पैर को दूसरे पैर से पांच ताल के अन्तर से सामने रखी जाए तो ' स्यन्दिता ' चारी होती है । अप ( अव ) स्यन्दिता – स्यन्दिता - चारी के ठीक विपरीत ( यदि दूसरे पैर को पहले पैर के सामने पांच ताल के अन्तर से ) रखा जाए तो ‘ अवस्यन्दिता ' चारी जानों ॥ २६ ॥
तलसञ्चरं पादाभ्यां घूर्णमानोपसर्पणैः ।
समोत्सारितभत्तल्ली व्यायामे समुदाहृता ॥ २७ ॥
समोत्सारित मत्तल्ली - यदि तलसंचर पादों से पीछे की ओर गोल चक्कर लगाते हुए जाया जाए तो ' समोत्सारित - मतल्ली ' चारी होती है ॥ २७ ॥
उभाभ्यामपि पादाभ्यां घूर्णमानोपसर्पणैः ।
उद्वेष्टितापविद्धैश्व हस्तैर्मत्तल्युदाहृता ॥ २८ ॥
मत्तल्ली-- यदि एक गोल चक्कर लगाकर पीछे जाया जाए तथा हस्त उद्वेष्टित तथा पुनः अपविद्ध ( गतिहीन ) स्थिति में रखे तो ' मत्तल्ली ' चारी होती है ॥ २८ ॥
पता भौम्यः स्मृताचार्यो नियुद्धकरणाश्रयाः ।
आकाशिकीनां चारीणां सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥ २ ९ ॥
ये सभी मौमीचारी कहलाती हैं । इनका प्रयोग बाहुयुद्ध तथा करणों के प्रदर्शन में किया जाता है । अब मैं आकाशिकी - चारी के लक्षण बतलाता हूँ ॥ २ ९ ॥
आकाशिकी चारी लक्षण: -कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य पुरतः सम्प्रसारयेत् ।
उत्क्षिप्य पातयेच्चैनमतिक्रान्ता तु सा स्मृता ॥ ३० ॥
१. सञ्चार ग ० । २. घूर्णमानापसर्पणैः - ख ० । ३. समुदाहृताः - ग ० । ४. भौम्यः - ख - ग ० । ५. नियुक्तकरणं - ख - ग ० । ६. आकाशकीनां - ग ० ।
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एकादशोऽध्यायः अतिक्रान्ता - एक ' कुञ्चित ' पैर को ऊपर उठाकर सामने फैलाए तथा ऊपर उठाकर ( फिर ) नीचे पटके तो ' अतिकान्ता ' चारी जानों ॥ ३० ॥
ऊरुभ्यां वलनं कृत्वा कुञ्चितं पादमुद्धरेत् ।
पार्श्वे विनिक्षिपेच्चैनमपक्रान्ता तु सा स्मृता ॥ ३१ ॥
अपक्रान्ता – यदि दोनों उरूओं ( पिंडलियों ) के द्वारा ' वलन ' ( घुमाव ) क्रिया को प्रदर्शित कर फिर एक कुञ्चित पैर को ऊपर उठाकर एक बाजू में पटके तो ' अपक्रान्ता ' चारी होती है ॥ ३१ ॥
कुश्चितं पादमुत्क्षिप्य जानूर्ध्व सम्प्रसारयेत् ।
उद्घट्टितेन पादेन पार्श्वक्रान्ता विधीयते ॥ ३२ ॥
पार्श्वक्रान्ता – यदि पैर को ' कुञ्चित ' दशा में ऊपर उठाकर जंघा से ऊपर ले जाए तथा फिर उसी ऊपर उठे हुए पैर को एक बाजू की ओर ले जाए तो ' पार्श्वकान्ता ' चारी होती है ॥ ३२ ॥
कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य जानु स्तनसमं न्यसेत् ।
द्वितीयश्च क्रमस्तब्धं मूर्ध्वजानुः प्रकीर्तिता ॥ ३३ ॥
ऊर्ध्वजानु – यदि ' कुंचित ' पैर को ऊपर उठाकर और ( इसी पैर की ) जंघा को छाती के बराबर ऊँचा उठाकर रखा जाए, दूसरी जानु स्तब्ध रखे तथा फिर इसी क्रम से दूसरे पैर को कुञ्चित दशा में ऊपर उठाए और पहले को स्थिर रखे तो ' ऊर्ध्वजानु ' चारी होती है ।
कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य जानूर्ध्व सम्प्रसारयेत् ।
पातयेच्चाप्रयोगेन सा सूची परिकीर्तिता ॥ ३४ ॥
सूची - यदि ' कुञ्चित ' पैर को जंघा के ऊपर तक ले जाकर फैला दे और फिर इसके पंजे के आगे वाले भाग को जमीन पर चारी जानो ॥ ३४ ॥
पृष्ठतो ह्यञ्चितं कृत्वा पादमप्रतलेन तु ।
द्रुतं निपातयेद् भूमौ चारी नूपुरपादिका ॥
१. च्चैव - ग ० । २. जानु स्तनसमं न्यसेत् — क ०, पाश्र्वोत्थानगत न्यसेत् गति न्यसेत् -- ग ० । ३. क्रमात् स्तब्ध -- ख - ग ० । ४. जानुरुध्वं - - ख ० पटके तो ' सूची ' ३५ ॥ ख ०, पार्श्वोत्थानो-।
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१०२ नाट्यशास्त्रम् नूपुरपादिका – एक ‘ अंचित ' पैर को ऊपर उठाकर दूसरे पैर के पीछे रखे तथा अग्रतलसंचर स्थितिवाले पैर को जल्दी से पृथ्वी पर पटके तो ' नुपूरपादिका ' चारी कहलाती है ॥ ३५ ॥
कुंचितं पादमुत्क्षिप्य पार्श्वात् पार्श्वन्तु दोलयेत् ।
पातयेदञ्चितञ्चैव दोलपादा प्रकीर्तिता ॥ ३६ ॥
दोलपादा – यदि ' कुंचित ' पाद को ऊपर उठाकर एक ओर से दूसरी बाजू तक हिलाए तथा ' अंचित ' दशा में रख कर पृथ्वी पर पटक दे तो ' दोलपादा ' चारी कहलाती है ॥ ३६ ॥
कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य आक्षिप्य त्वञ्चितं न्यसेत् ।
जङ्घा स्वस्तिकसंयुक्ता चाक्षिप्ता नाम सा स्मृता ॥ ३७ ॥
आक्षिप्ता - यदि ' कुञ्चित ' पैर को उठाकर जल्दी से ' अंचित ' दशा में पृथ्वी पर रख दे तथा जंघाओं को स्वस्तिक करे तो ' आक्षिप्ता ' चारी कहलाती है ॥ ३७ ॥
स्वस्तिकस्याग्रतः पादः कुञ्चितश्च प्रसारितः ।
निपतेदञ्चिताविद्धमाविद्धा नाम सा स्मृता ॥ ३८ ॥
आविद्धा - यदि जंघाओं के स्वस्तिक में एक पैर आगे की ओर फैलाने समय ' कुञ्चित ' रखे तथा उसे ' अंचित ' पाद बना कर पृथ्वी पर जल्दी से पटके तो ' आविद्धा ' चारी जानो ॥ ३८ ॥
पादमाविद्धमावेष्टय समुत्प्लुत्य निपातयेत् ।
परिवृत्य द्वितीयश्च सोद्वृत्ता चायुदाहृता ॥ ३ ९ ॥
उद्वृत्ता – यदि ‘ आविद्ध ' चारी की दशा में कुञ्चित पैर को ( दूसरी जंघा से ) लपेट ले तथा फिर दूसरे को इसी प्रकार बदल कर रखे और ऊपर उठाकर पृथ्वी पर पटके तो ' उद्वृत्ता ' चारी होती है ॥ ३ ९ ॥
पृष्ठतो वलितं पादं शिरोघृष्टं प्रसारयेत् ।
सर्वतो मण्डलाविद्धं विद्युदुद्भ्रान्ता तु सा स्मृता ॥ ४० ॥
विद्युद्भ्रान्ता - यदि पीछे की ओर घुमाकर ( एक ) पैर को मस्तक से १. पार्श्व पार्श्व तु - ख – ग ० । २. तु सा स्मृता - ग ० । ३. व्याक्षिप्य - ख ० । ४. चाञ्चितं - ग ० । ५. उत्क्षिप्ता - ग ० । ६. कुञ्चितस्तु - ग ० । ७. समुत्क्षिप्य - ख - ग ० ।
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एकादशोऽध्यायः १०३ रगड़ खाता हुआ फैलाए और चारों ओर एक गोल चक्कर ले ले तो ' विद्युद्भ्रान्ता ' चारी होती है ॥ ४० ॥
पृष्ठे प्रसारितः पादो वलितोऽभ्यन्तरीकृतः ।
पाणिप्रपतितश्चैव ह्यलाता सम्प्रकीर्तिता ॥ ४१ ॥
अलाता – यदि एक पैर को पीछे की ओर फैला दे तथा घुमाकर इसे अन्दर रखते हुए दूसरे पैर के पंजे के पास पटके तो ' अलाता ' चारी जानों ॥
कुंचितं पादमुत्क्षिप्य त्र्यश्रमूरुं विवर्तयेत् ।
कटीजानु - विवर्त्ताश्च भुजङ्गत्रासिता भवेत् ॥ ४२ ॥
भुजंगत्रासिता - यदि कुञ्चित पैर को ऊपर उठाकर पिंडली को गोल चक्करदार घुमाव दे साथ में कटि तथा जंघा को भी एक गोल घुमाव दे तो ' भुजंगत्रासिता ' चारी जानो ॥ ४२ ॥
अतिकान्तक्रमं कृत्वा चोत्प्लुत्य विनिपातयेत् ।
जङ्घाञ्चित परिक्षिप्ता सा ज्ञेया हरिणप्लुता ॥ ४३ ॥
हरिणप्लुता - यदि अतिक्रान्ताचारी में एक उछाल ( उत्प्लुत्य ) मार कर पृथ्वी पर पैर टिका दे तथा जंघा को अंचित पाद युक्त करते हुए आक्षिप्त दशा में पैर को नीचे पटके तो ' हरिणप्लुता ' चारी होती है ॥ ४३ ॥
नुपुरं चरणङ्कृत्वा पुरतः सम्प्रसारयेत् ।
क्षिप्तमाविद्धकरणं दण्डपादा तु सा स्मृता ॥ ४४ ॥
दण्डपादा - यदि नपुर ( पादिका ) चारी को प्रदर्शित कर एक पैर को फैला कर ( उसे शीघ्र ) पीछे लौटाया जाए तो ' दण्डपादा ' चारी कहलाती है ॥
अतिक्रान्तक्रमं कृत्वा त्रिकन्तु परिवर्तयेत् ।
द्वितीयपादभ्रमणान्तंलेन भ्रमरी स्मृता ॥ ४५ ॥
भ्रमरी - यदि अतिक्रान्ता चारी को प्रदर्शित करते हुए एक पैर को ऊपर उठाया जाए तथा पीठ को घुमाव दे दे ( सारे शरीर को एक गोल चक्कर देकर ) और फिर दूसरे पैर को उसके नीचे भाग में घुमाव दे दे तो ' भ्रमरी ' चारी कहलाती है ॥ ४५ ॥
१. पृष्ठतः सर्वतः पादो वलिताभ्यन्तरीकृतः - ख ० । २. प्रपादितश्चैव ग ३. प्रवर्तयेत् - ग ० । ४. विवर्तन - ग ० । ५. समुत्प्लुल्य विपातयेत् - ग ० । ६. जङ्गाचतोपरि क्षिप्ता - ख - ग ० । ७. हरिणी - ख ० । ८. क्षिप्रग ० । ९. च्चलने - ख ० ।
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१०४ नाट्यशास्त्रम्
आकाशिक्यः स्मृता होता ललिताङ्गक्रियात्मिकाः ।
धनुर्वज्रा सिंशस्त्राणां प्रयोक्तव्या विमोक्षणे ॥ ४६ ॥
ये अङ्गों के ललित संचालन द्वारा होने वाली आकाशिकी चारी हैं । इनकी धनुष, वज्र, असि तथा अन्य शस्त्रों के चलाने में योजना करनी चाहिए ॥ ४६ ॥
अगौ पृष्ठगौ वापि ह्यनुगौ वापि योगतः ।
पादयोस्तु द्विजा हस्तौ कर्तव्यौ नाट्ययोक्तृभिः ॥ ४७ ॥
हे मुनियो, इन सभी प्रदर्शनों के अवसर पर पैरों की गति के अनुसार हस्तों को आगे जानेवाले, पीछे जानेवाले तथा साथ साथ ( रहने वाले ) रखना चाहिए ॥ ४७ ॥
यतः पादस्ततो हस्तो यतो हस्तस्ततः त्रिकम् ।
पादस्य निर्गमं कृत्वा तथोपाङ्गानि योजयेत् ॥ ४८ ॥
क्योंकि जिधर पैर जाए वहीं हाथ भी ( उसका अनुसरण करते हुए ) बढ़े तथा जिधर हाथ जाए वहीं शेष शरीर भी घूमे । पाद की एक डग भरने के उपरान्त उपांगों की योजना अभिनय में करनी चाहिए ॥ ४८ ॥
पादचार्या यथा पादो धरणीमेव गच्छति ।
एवं हस्तं चरित्वा तु कटीदेशं समाश्रयेत् ॥ ४ ९ ॥
किसी भी ' चारी ' के प्रदर्शन ( करने ) के पश्चात् जैसे पैर भूमि पर रखा जाता है वैसे ही हस्त को अपने इष्ट प्रदर्शन के बाद गोल घुमाव लेकर कटि पर रखना चाहिए ॥ ४ ९ ॥
एताश्चार्यो मया प्रोक्ता ललिताङ्गक्रियात्मिकाः ।
स्थानाम्यासां प्रवक्ष्यामि सर्वशस्त्रविमोक्षणे ॥ ५० ॥
इस प्रकार मैंने ललित आंगिक क्रियाओं से होनेवाली ये चारी बतलायी । अब मैं शस्त्रों को चलाने में योजित किये जाने वाले इनके स्थानों को बतलाता हूँ ॥ ५० ॥
१. ब्रज्रादि - ख - ग ० । २ समगो - ग ० । ३. अनुगी - । ४. निर्गति - ख । ५. ज्ञात्वा - ग ग ० ० । ६. पादचार्या - ख - ग ० । ७. हस्तश्चरित्वा - क ० । ८. स्थानानि सम्प्रवक्ष्यामि ग ।
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एकादशोऽध्यायः १०५
' स्थान - ( भेद तथा लक्षण ) -वैष्णवं समपादञ्च वैशाखं मण्डलन्तथा ।
प्रत्यालीढं तथालीढं स्थानान्येतानि पण्णणाम् ॥ ५१ ॥
मनुष्यों के खड़े होने में अवस्था विशेष के निदर्शक ये स्थान छः ( होते ) हैं । यथा: - ( १ ) वैष्णव, ( २ ) समपाद, ( ३ ) वैशाख, ( ४ ) मंडल, ( ५ ) आलीढ़ तथा ( ६ ) प्रत्यालीढ़ ॥ ५१ ॥
वैष्णव - स्थान-द्वौ तालावर्धतालश्च पादयोरन्तरं भवेत् ।
तयोरसमुत्थितस्त्वेकस्थ्यर्थः पक्षस्थितोऽपरः ॥ ५२ ॥
किश्चिदश्चितजंघञ्च सौष्ठवाङ्गपुरस्सरम् ।
वैष्णवं स्थानमेतद्धि विष्णुरंत्राधिदैवतम् ॥ ५३ ॥
यदि दोनों पैर अढ़ाई ताले के अन्तर से रखे जाएँ । इन ( पैरों ) में एक पैर खड़ा ( समुत्थित ) और दूसरा पैर टेढ़ा और बाजू में स्थित रखे जंघा थोड़ी झुकी हुई ( या सिकुड़ी हुई - अंचित ) हो ( और एडी भी तिरछी हो ) शरीर के सभी अवयव ' सौष्ठव ' युक्त हों तो ' वैष्णवस्थान ' कहलाता है । विष्णु इस स्थान के अधिकारी देवता हैं ॥ ५२-५३ ॥
स्थानेनानेन कर्तव्यः संलापस्तु स्वभावजः ।
नाना कार्यान्तरोपे तैर्नृभिरुत्तममध्यमैः ॥ ५४ ॥
१. स्थान - नाट्य शास्त्र में स्थानों के जो लक्षण दिये गए हैं वे अस्पष्ट हैं । इनकी सही स्थिति दक्षिण भारत के कलाकारों द्वारा भी अज्ञात होने के कारण आजकल प्रयोग में नहीं आती । कथकलि में मुद्राओं के प्रदर्शन के अवसर पर जिन स्थानों का उपयोग होता है वे भी ये ही स्थान होंगे ऐसा श्री कुंजुनायर का अनुमान है । वे यह भी कहते हैं कि नाट्यशास्त्र से स्थानों का प्रयोग तथा स्वरूप स्पष्टतः विदित नहीं होता । २. ताल = बारह अङ्गुल की दूरी । इस प्रकार २३ ताल का अर्थ है तीस अङ्गुल के अन्तर से । आगे भी ताल शब्द का दूरी के अर्थ में जहां भी प्रयोग हो इसी प्रकार समझना चाहिए । १. व्यस्रपादस्थितो — ख ० । २. जयोऽसौ - ० । ३. समन्वितः । ४. रेवाधि - ख । ५. न्तरापेतो- ग ० ।
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१०६ नाट्यशास्त्रम् योजना - इस स्थान के द्वारा उत्तम तथा मध्यम प्रकृति के पात्रों का उनके विभिन्न कार्यों से सम्बद्ध सामान्य - ( स्वाभाविक - ) वार्तालाप प्रदर्शित किया जाता है ॥ ५४ ॥
चक्रस्य मोक्षंणे चैव धारणे धनुषस्तथा ।
दत्ताङ्गीलासु तथा क्रोधे प्रयोजयेत् ॥ ५५ ॥
इसकी चक्र फेंकने, धनुष धारण करने, धैर्य दान, लीलायुक्त शारीरिक गति ( अंगलीला ) तथा क्रोध में योजना करनी चाहिए ॥ ५५ ॥
इदमेव विपर्यस्तं प्रणयक्रोध इष्यते ।
उपालम्भकृते चैव प्रणयोद्वेगयोस्तथा ॥ ५६ ॥
शङ्कासूयोग्रताचिन्तामतिस्मृतिषु चैव हि ।
दैन्ये चपलतायाञ्च गर्वोभीष्टेषु शक्तिषु ॥ ५७ ॥
शृङ्गाराद्भुतबीभत्स - वीरप्राधान्य योजितम् । इस स्थान के पलट कर ( विपरीत दिशाओं में ) प्रदर्शन के द्वारा प्रणय-क्रोध, प्रणयोपालम्भ, प्रणयोद्वेग तथा इसी प्रकार शंका, असूया, उग्रता, चिन्ता, मति, स्मृति, दैन्य, चपलता तथा गर्व जैसे संचारीभाव, अभीष्ट बल प्रदर्शन के भाव तथा शृङ्गार, अद्भुत और वीर रस की प्रधानता बतलायी जाती है ॥ ५६-५८ ॥ समपादे समौ पादौ तालमात्रान्तरस्थितौ ॥ ५८ ॥
स्वभावसौष्ठवोपेतौ ब्रह्मा चात्राधिदैवतम् । समपादस्थान- यदि दोनों पैर एक ताल के अन्तर से अपनी स्वाभाविक मुद्रा में समान स्थित हों तथा स्वाभाविक सौष्ठव लिए हुए हों तो
' समपाद स्थान ' होता है । इसके अधिकारी देव ब्रह्माजी हैं ॥ ५८-५९ ॥
अनेन कार्य स्थानेन विप्रमङ्गलधारणम् ॥ ५ ९ ॥
रूपणं पक्षिणाञ्चैव वरं कौतुकमेव च ।
खस्थानां स्यन्दनस्थानां विमानस्थायिनामपि ॥ ६० ॥
लिङ्गस्थानां व्रतस्थानां स्थानमेतत्तु कारयेत् । योजना – इस स्थान से ब्राह्मणों के मंगल आशीष ग्रहण, ( दिव्य ) पुरुष, १. मोक्षणं - ग ० । २. धैर्यदानाङ्गलीलासु — ग ० । ३. प्रकर्षाधिबलस्तथा - ख - ग ० । ४. चपलतायोगे – ग ० । ५. मन्त्राधिक्येषु - ख ० । ६. योषितम् - ग ० । ७. कारणम् - ग ० ।
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एकादशोऽध्यायः १०७ तथा विमान में स्थित पुरुष, शैवसंन्यासी ( लिंगस्थ ) तथा व्रतस्थ पुरुष को बतलाया जाता है ॥ ५ ९ -६१ ॥ तालास्त्रयोऽर्धतालश्च पादयोरन्तरं भवेत् ॥ ६१ ॥
तालास्त्रींनर्धतालांश्च निषण्णोरुं प्रकल्पयेत् ।
यथौ पक्षस्थितौ चैव तत्र पादौ प्रयोजयेत् ॥ ६२ ॥
वैशाखस्थानमेतद्धि स्कन्दश्चात्राधिदैवतम् । वैशाख स्थान - यदि दोनों पैर साढ़े तीन ताल के अन्तर से गतिहीन ( स्तब्ध ) रखें और पैर तिरछे तथा एक दूसरे के सम्मुख बाजू को बतलाते
हुए रखे जाए तो ' वैशाखस्थान ' होता है । इसके अधिदेवता कार्तिकेय हैं ॥
स्थानेनानेन कर्तव्यमश्वानां वाहनं बुधैः ॥ ६३ ॥
व्यायामो निर्गमश्चैव स्थूलपक्षिनिरूपणम् ।
शरासनसमुत्कर्षे व्यायामकृतमेव च ॥ ६४ ॥
रेचकेषु च कर्तव्यमिदमेव प्रयोक्तृभिः । योजना - इस स्थान से अश्वारोहण, व्यायाम, ( एक स्थान विशेषसे ) बहिर्गमन ( निर्गम ), बड़े आकार वाले पक्षियों का निरूपण, धनुष का खींचना या अभ्यास तथा पाद रेचकों का प्रदर्शन किया जाता है ॥६३-६५ ॥ मण्डलस्थान-ऐन्द्रे तु मण्डले पादौ चतुस्तालान्तरस्थितौ ॥ ६५ ॥