भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 21–30
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 21–30
पृष्ठ 21
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( १२ ) से नहीं जाना जाता है फिर भी वहाँ मुद्रा ( नाट्यशास्त्र का सन्देश ) तथा अर्धचन्द्र जैसे हस्तों की विविध भङ्गिमाओं वाले रूपों में योजना रख कर प्रयोग को सौष्ठव युक्त रखा जाता है । हस्ताङ्गुलियों तथा बाहुओं का सञ्चलन प्रकार नाट्यशास्त्र में हस्तकरण के प्रसंग में चार प्रकार से हस्त संचलन दिखलाया गया है यह हम पूर्व में दिखला आये हैं । यहाँ पर हस्तकरण हस्त की अंगुलियों की विभिन्न क्रियाओं की स्थितियाँ होती हैं तथा इन्हीं का विभिन्न नृत्यों में प्रयोग किया जाता है । इनके लक्षण भी नाट्यशास्त्र में ( ६।२१५-२१८ ) दिये गये हैं । इसी प्रकार नाट्यशास्त्र में बाहुओं की विविध दशाओं में रहनेवाली संचलन क्रियाओं ( वाले हस्तों ) का वर्णन है जिन्हें बाहुप्रचार कहा गया है । यद्यपि हन्त के भेदों का करणों के अन्तर्गत सञ्चलन दिखलाया गया था किन्तु बाहुप्रचार भी नाम देकर पृथक से उन्हें फिर दिखलाया गया है । यहाँ बाहुओं के संचलन के नाममात्र मिलते हैं उनके लक्षण नहीं परन्तु आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने इनके स्वरूप की थोड़ी व्याख्या दे दी है । तदनुसार इनका विवरण इस प्रकार है: -( १ ) तिर्यक् या तिर्यग्गत — दोनों बाजुओं में तिरछे रखे गये हाथ । ( २ ) ऊर्ध्वसंस्य - मस्तक पर ऊँचे कर रखे गये या उठाये हुए हाथ । ( ३ ) अधोमुख - नीचे रखा गया या पृथ्वी को छूने वाला हाथ । ( ४ ) अञ्चित - हाथ को वक्षःस्थल के पास से मस्तक तक ले जाकर पुनः उसी प्रकार अपने मूल स्थान पर वापस लाना । ( ४ ) अपविद्ध - हाथ को वक्षःस्थल के पास से घुमाते हुए चक्राकार गति में सभी ओर बढ़ाते हुए आगे ले जाना । ( ६ ) मण्डलगति - हाथ को शरीर के चारो ओर फिराना या घुमाव देना । ( ७ ) स्वस्तिक - बायें हाथ से दाहिने हाथ की और दाहिने हाथ से बाँये हाथ की भुजा को पकड़ना या छूना । ( ८ ) पृष्ठानुसारी — पीछे रखा या ले जाया गया हाथ । ( ९ ) उद्वेष्टित - हाथ को कलाई का सहारा लेकर निकालते या फैलाते हुए दोनों को छूते हुए रखना और फिर एक को दूसरे का अनुगत करना ।
पृष्ठ 22
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( १३ ) ( १० ) प्रसारित - हाथ को आगे की ओर लम्बा करते हुए फैलाना । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने इन बाहुप्रकारों की संचलनक्रियागत योजना को द्रुत, मध्य या विलम्बित गति में रख कर विचित्रता उत्पन्न करने का भी निर्देश दिया । इनके मत में इसके अतिरिक्त अन्य हस्त प्रचारों की आवश्यकता नहीं है जो अन्य आचार्यों ने दिखलाये हैं । क्योंकि ऐसे अतिरिक्त प्रकारों का अन्तर्भाव इन्हीं दस प्रभेदों में सरलता से किया जा सकता है । परन्तु नाट्यशास्त्रसंग्रह तथा सङ्गीतरत्नाकर ग्रन्थों में बाहुओं के सोलह प्रभेद दिये गये । इनमें नाट्यशास्त्र के उपर्युक्त दस प्रभेदों के अतिरिक्त छः अन्य प्रभेद भी मिलते हैं । इनके नाम तथा स्वरूप इस प्रकार हैं: - ( १ ) आविद्ध, ( २ ) कुञ्चित, ( ३ ) नम्र, ( ४ ) सरल, ( ५ ) आन्दोलित तथा ६ ) उत्सारित । इनके क्रमशः लक्षण इस प्रकार हैं: - -( १ ) आविद्ध - बाहर से अपनी ओर खींचा गया हाथ । ( २ ) कुञ्चित - कोहनी को सिकुड़ा कर हाथ को मोड़ना । ( ३ ) नम्र - सहज भाव से थोड़ा तिरछा रखा या झुकाया हुआ हाथ । ( ४ ) सरल - दोनों बाजुओं की ओर सौष्ठवपूर्ण रीति में सरलता से या सीधा रखा हुआ हाथ । ( ५ ) आन्दोलित - हाथों को झूलते हुए रखना । ( ६ ) उत्सारण - विरुद्ध दिशा में रखे हुए हाथ को अपनी बाजू से दूसरी ओर चलता हुआ रखना । अङ्गों के अन्य अभिनय - नाट्यशास्त्र के दशम अध्याय में अभिनय-विधि के प्रसंग में हृदय, उदर, पार्श्व, कटि, ऊरु, जङ्घा तथा पाद के द्वारा होने वाले अभिनय का विवेचन है । इनमें हृदय या वक्षःस्थल की पांच अवस्थाएं या प्रकार होते हैं । ये हैं: -आभुग्न, निर्भुग्न, प्रकम्पित, उद्वाहित तथा सम । इनके स्वरूप तथा अभिनययोजना का विशद विवरण है । उदर के तीन रूप या प्रभेद होते हैं । ये हैं — क्षाम, खल्व तथा पूर्ण । दुबला या पिचका हुआ उदर ' क्षाम ', फुला हुआ ' पूर्ण ' तथा अतिशय झुका हुआ या गढ़े वाला नत उदर ' खल्व ' कहलाता है । इनमें हास्य, रुदन आदि में ' क्षाम ' की, व्याधि, तपस्या आदि में ' खल्व ' की तथा तन्द्रा, स्थूलता या अतिभोजन की स्थिति में ' पूर्ण ' की योजना की जाती है । पार्श्व के ( बाजू ) भी नत, समुन्नत, प्रसारित, विवर्तित तथा प्रसृत नामक पाँच प्रभेद होते हैं ।
पृष्ठ 23
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( १४ ) जिनसे क्रमशः प्रसर्पण, अपसर्पण, आनन्द प्राप्ति, चक्राकार भ्रमण तथा सीधे पीछे हटने के भावों का अभिनय किया जाता है । इसी प्रकार कटिके भी पाँच प्रभेद होते हैं । यथा - ( १ ) छिन्ना, ( २ ) निवृत्ता, ( ३ ) रेचिता, ( ४ ) कम्पिता तथा ( ५ ) उद्वाहिता । इनका स्वरूप तथा योजना को यथास्थान दिखलाया गया है । ऊरु, जंघा तथा पाद के भी कर्म या क्रिया के कारण पाँच - पाँच प्रभेद हो जाते हैं । इनमें ऊरु के पाँच कम हैं— ( १ ) कंपन, ( २ ) वलन, ( ३ ) स्तम्भन, ( ४ ) उद्धर्तन, ( ५ ) निवर्तन | इनकी विभिन्न स्वभाव एवं स्थितियों में योजना रखी जाती है । इसी प्रकार आवर्तित, ( २ ) नत, ( ३ इनकी योजना भी पात्रों के जाती है । इसी प्रकार पाद उद्घट्टित, ( २ ) सम, ( कुश्चित । इनके स्वरूप तथा दिया है । इसके अतिरिक्त जङ्घा के भी पाँच कर्म माने जाते हैं- ( १ ) ) क्षिप्त, ( ४ ) उद्घाहित तथा ( ५ ) परिवृत्त । स्वभाव, स्थिति, गति तथा नृत्य आदि में की के भी पाँच प्रभेद माने गये हैं । यथा - ( १ ) ३ ) अग्रतलसञ्चर ४ ) अश्वित तथा ( ५ ) योजना का विवरण भरत मुनि ने विस्तार से प्राप्य अन्य पाठ को भी लिया जाए तो पाद के ' त्र्यस्र ' तथा ' सूची ' नामक और दो प्रभेद होते हैं जिनका लक्षण तथा योजना भी मिलती हैं । ये पाद, जंघा तथा ऊरू के कार्य या व्यापार परस्पर सम्बद्ध होते हैं तथा भाव एवं रस की स्थिति के अनुसार इनको एक साथ रखते हुए संचालित किया जाता है और इनके समन्वित कार्य या व्यापार से अभिनय प्रयोग पूर्ण तथा प्रभावकारी बन जाता है । इनमें भी सर्वाधिक महत्त्व पाद का माना गया है । क्योंकि उसी के आधार या आश्रय पर ऊरू तथा जंघा के कार्य निर्भर करते हैं तथा इन्हीं तीनों के कार्यों के समीकरण या एकीभाव से ' चारी ' का निर्माण होता है । इसी कारण ' पैरों ' का नृत्य तथा अभिनय दोनों के ही लिये समान महत्त्व है । चारीविधान - नाट्यशास्त्र का एकादश अध्याय ' चारीविधान ' है । हम बतला आये हैं कि कटि, पर्श्व, ऊरू- ( तथा ) जंघा और पाद के द्वारा होने वाले कार्य या व्यापार का एक साथ होना ' चारी ' है, जिनमें चेष्टाएँ व्याप्त रहती हैं । इनका अभिनय में बड़ा महत्त्व माना गया है, क्योंकि चारी के द्वारा ही नृत्त तथा अङ्गहारों की रचना तथा शस्त्रों का चलाना भी सम्पन्न होता है । नाट्य में चारी की स्थिति को बतलाते हुए भरतमुनि ने बतलाया कि बिना चारी के मस्तक, हस्त आदि अंगों का संचालन नहीं हो सकता
पृष्ठ 24
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( १५ ) अतः आङ्गिक अभिनय की आधारभूत रहने से चारी का अभिनय के क्षेत्र में असाधारण महत्त्व माना गया है । इसके अतिरिक्त नृत्य के कारण, खण्ड तथा मण्डल का भी चारी ही आधार होती है, जिसकी विशेषरूप से ' नृत्त ' में संयोजना की जाती है तथा युद्ध एवं शस्त्रप्रहार के अभिनय प्रसंगों में प्रयोग रखे जाते हैं । एक पाद के प्रचार या आगे बढ़ने के व्यापार से चारी की दो बार पाद. प्रचार के द्वारा ' करण ' की तथा करणों के एकीभाव या समयोग से ' खण्ड ' की तथा दो या तीन खण्डों के योग से ' मण्डल ' का निर्माण होता है । चारी के अभिनयव्यापार को सर्व प्रथम दो भागों में विभक्त किया जाता है । एक भौमी तथा दूसरी आकाशिकी चारी । इनमें प्रत्येक चारी के सोलह - सोलह भेद रखे गये हैं जो कुल भेद बत्तीस हो जाते हैं । अभिनयदर्पण में चारी के आठ प्रभेद दिखलाये गए तथा यहाँ भौमी एवं आकाशिकी के रूप में उनका विभाग भी नहीं मिलता । ' संगीतरत्नाकर ' में देशी चारी के अतिरिक्त प्रभेद भी दिखलाये गये हैं जो कोहल आदि नृत्याचार्यों ने अपने ग्रन्थों में दिये थे । तदनुसार ३५ भौमी चारियाँ तथा २७ आकाशिकी चारियाँ मानी गयी हैं । कोहल ने ३५ मधुपाचारी को भी बतलाया या जिनका विवरण ' संगीत-रत्नाकर ' की चतुरकल्लिनाथ की व्याख्या में मिलता है । आचार्य कोहल ने नृत्याचार्य की अपेक्षा से चारी में संवर्द्धन या संशोधन को भी सहमति दी हुई थी । इस प्रकार चारी के भेदों के विषय में प्राचीन तथा उत्तरवर्ती आचार्यों में पर्याप्त मतभेद है जो इसके प्रयोग के महत्त्व को दर्शाता है । चारी को वर्तमान कलाविद् ' चाल ' शब्द से ( भी ) दिखलाते हैं । इन चारियों के मेल या समूह से ' मण्डल ' का निर्माण होता है । ये भी अपनी आधारभूत चारियों के भेद के कारण आरम्भ में भौम तथा आकाशिक भेद से दो प्रकार के हो जाते हैं । इन मण्डलों के भी भौम प्रभेद दस तथा आकाशिक प्रभेद दस होकर कुल संख्या बीस हो जाती है । भौमी चारी- मूलतः एवं मुख्य रूप से चारियों का प्रयोग भूमि पर होने के कारण अपनी संज्ञा के अनुरूप ही इनका ' भोमी ' अन्वर्थ नामकरण है । इनके सोलह प्रभेद हैं । जो इस प्रकार हैं- ( १ ) समपादा, ( २ ) स्थितावर्ता, ( ३ ) शकटास्या, ( ४ ) अध्यधिका, ( ५ ) चाषगति, ( ६ ) विच्युता, ( ७ ) ऐलकाक्रीडिता, ( ८ ) बद्धा, ( ९ ) उरुद्वत्ता, ( १० ) अड्डिता, ( ११ ) उत्स्पन्दिता, ( उत्स्यन्दिता ) ( १२ ) जनिता, ( १३ )
पृष्ठ 25
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( १६ ) स्पन्दिता, ( १४ ) अपस्पन्दिता, ( १५ ) समोत्सारित मत्तल्ली तथा ( १६ ) मत्तल्ली । इनके लक्षण तथा योजनादि विवरण नाट्यशास्त्र में विद्यमान है । आकाशिकी चारी - आकाशिकी चारी के अन्तर्गत आकाश की ओर अर्थात् ऊपर होने वाले पाद प्रयोग या अभिनय व्यापारों का समावेश रहता है तथा इसी कारण इसका भी अन्वर्थं नामकरण है । इनके पारस्परिक अन्तर की स्थिति बतलाते हुए भरतमुनि ने एक प्रयोगगत विशिष्ट तथ्य भी संकेतित किया कि भौमीचारी का प्रयोग मुख्यरूप से करणाश्रित नृत्य तथा द्वन्द्वयुद्ध में होता है तथा प्रासंगिक रूप में ' नाट्य ' में रखा जाता है जबकि आकाशिकी चारी का प्रयोग ललित अंग से युक्त क्रियाओं के प्रसंग में तथा धनुष, वज्र, असि आदि शस्त्रों के चलाने के ( युद्धगत ) व्यापार में किया जाता है । आकाशिकी चारी के भी सोलह प्रभेद होते हैं । ये हैं— ( १ ) अतिक्रान्ता, ( २ ) अपक्रान्ता, ( ३ ) पार्श्वक्रान्ता, ( ४ ) ऊर्ध्वजानु ( ५ ) सूची, ( ६ ) नूपुरपादिका, ( ७ ) दोलपादा, ( ८ ) आक्षिप्ता, ( ६ ) आविद्धा, ( १० ) उद्वृत्ता, ( ११ ) विद्युद्भ्रान्ता, ( १२ ) अलाता ( १३ ) भुजङ्गत्रासिता, ( १४ ) हरिणीप्लुता, ( १५ ) दण्डा ( दण्डपादा ) तथा ( १६ ) भ्रमरी । इनके लक्षण तथा प्रयोगादि योजना का विवरण नाट्यशास्त्र में है । इस प्रकार यद्यपि नाटयशास्त्र ( आदि ग्रन्थों ) में इन चारियों के लक्षण तथा योजना की रीति निर्देशित की गयी किन्तु यह सभी शास्त्रीयपदावलि तथा सांकेतिक पद्धति में रखी जाने के कारण केवल नाट्यशास्त्र के अध्येता या अभ्यासकों के द्वारा ही वेद्य होती हैं । भारत की विभिन्न नृत्य या नाट्य प्रणालियों में अभी भी इन चारियों में से अधिकांश का प्रयोग चल रहा है यह ठीक है किन्तु इतने से भी इसकी व्यवस्थित स्थिति का स्पष्ट परिभान नहीं होता । इसे यदि सरल शब्दों में संक्षेप में समझना चाहें तो यही कि पाद की गति को तीन प्रकारों में बाँटा गया है । इनमें प्रथम को गति: द्वितीय को चारी तथा तृतीय को ' मॅडल ' कह सकते हैं । इन चारियों के प्रदर्शन के अवसर पर नाट्य या नृत्य प्रयोग के प्रसंग में हस्त एवं पाद प्रचार का पारस्परिक अनुगत सम्बन्ध या क्रियाक्रम रखा जाता है । नाट्य, नृत्य ( तथा नृत्त के ) प्रयोग में कभी हस्त प्रचार की कभी पादप्रचार की तथा कभी दोनों की समान रूप में प्रमुखता होती है । अतएव हस्तप्रचार की प्रधानता में पादप्रचार ( उसी का ) अनुगत रहता
पृष्ठ 26
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( १७ ) है तथा पादप्रचार की प्रमुखता में हस्तप्रचार भी उसी प्रकार अनुगत हो जाता है । यदि दोनों की प्रमुखता रखना हो तो फिर दोनों का प्रत्येक का एककालिक विनियोजन हो जाता है । इस प्रसंग में भरतमुनि का यह सिद्धान्त बड़ा ही न्यायसम्मत तथा ध्यान देने योग्य है जो नाट्यप्रयोग के सुदीर्घं अनुभव को दिखलाते हुए इस सम्बन्ध में दिखलाया गया है । स्थान - विविध अभिनय प्रदर्शन के अवसर पर चारी तथा हस्तादि के प्रदर्शन को करते समय शरीर को एक विशिष्ट एवं नियतस्थिति में रखना अपेक्षित होता है । इस स्थिति को ' स्थान ' कहा जाता है जिसे आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने कायसन्निवेश या शरीर की विशिष्ट स्थिति कहा है । स्थान के विषय में नाट्य नृत्य के आचार्यों में मतैक्य नहीं है । नाट्य शास्त्र के अनुसार इनकी संख्या छः मानी गयी है । यथा - ( १ ) वैष्णव, ( २ ) समपाद, ( ३ ) वैशाख, ( ४ ) मण्डल, ( ५ ) आलीढ़ तथा ६ ) प्रत्यालीढ़ । इन स्थानों के अधिष्ठाता देवता तथा इनकी योजना आदि का शास्त्र में विवरण दिया गया है जिसका संक्षेप इस प्रकार है: वैष्णवस्थान — इसके अधिष्ठाता देव श्रीविष्णु हैं । इसमें दोनों पैर अढ़ाई ताल के अन्तर से, एक पैर खड़ा हुआ और दूसरा टेढ़ा, जंघा ऊँची तथा झुकी हुई और अंग सौष्ठव सम्पन्न रखा जाता है । समपाद - स्थान: - इसके अधिष्ठाता देव श्री ब्रह्मा हैं । इसमें दोनों पैर का अन्तर एक ताल का और दोनों ( ही ) पैर सहज सौष्ठव से युक्त होते हैं । वैशाख - स्थान- इसके अधिष्ठाता देव श्री स्कन्द ( कार्तिकेय ) है । इसमें दोनों पैर तीन ताल के अन्तर से तिरछे, स्तब्ध तथा एक दूसरे के सम्मुख बाजू को बतलाते हुए । मण्डल स्थान — इसके अधिष्ठाता देव श्री इन्द्र हैं । इसमें दोनों पैरों का अन्तर चार ताल, दोनों एक दूसरे के सम्मुख तिरछे तथा घुटने और कटि सहज भाव में रखकर खड़े होना । आलीढ़ तथा प्रत्यालीढ - स्थान- इन दोनों स्थानों के अधिष्ठातृ देव श्रीरुद्र हैं । इसमें मण्डल स्थान की स्थिति में दाहिना पैर पाँच ताल के अन्तर पर आगे रखने पर ' आलीढ़ ' तथा इसके विपरीत बायाँ पैर इसी प्रकार आगे रखना या दाहिना पैर सिकोड़ कर वायाँ पैर आगे रखने पर प्रत्यालीढ़ ' स्थान ' । नाट्यशास्त्र में इन स्थानों के स्वरूप तथा उनकी अभिनय योजना दी २ ना ० भू ० द्वि ०
पृष्ठ 27
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( १८ ) गयी है । इन स्थानों के अतिरिक्त अन्य शास्त्रीय ग्रन्थों में भी स्थानकों का वर्णन मिलता है । इनमें सङ्गीतरत्नाकर में आसन तथा स्थान का विवरण अधिक स्पष्ट तथा व्यवस्थित रूप में मिलता है । ये स्थान इस प्रकार हैं: -( १ ) स्वस्तिक, ( २ ) वर्धमान, ( ३ ) नन्द्यावर्त, ( ४ ) संहत, ( ५ ) समपाद, ( ६ ) एकपाद, ( ७ ) पृष्ठोत्तानतल, ( ८ ) चतुरस्र, ( ९ ) पार्ष्णिविद्ध, ( १० ) पाष्णिपार्श्वगत, ( ११ ) एकपार्श्वगत, ( १२ ) एकजानुगत, ( १३ ) परावृत्त, ( १४ ) समसूची, ( १५ ) विषम-सूची, ( १६ ) खण्डसूची, ( १७ ) ब्राह्म, ( १८ ) वैष्णव, ( १६ ) शैव, ( २० ) गारुड, ( २१ ) कूर्मासन, ( २२ ) नागबन्ध तथा ( २३ ) वृष-भासन । इनमें समसूची, विषमसूची, खण्डसूची, गारुड, कूर्मासन, नागबन्ध तथा वृषभासन ये सभी आसन ( स्थान ) है तथा शेष स्थान है । नृत्याचार्यों के मत में ( इन्हीं में से ) पाष्णिविद्ध, पाष्णिपार्श्वगत तथा एकपार्श्वगत जैसे स्थानों के स्पष्ट लक्षण ज्ञात नहीं हैं । अशोकमल्ल आदि उत्तरवर्ती नृत्य नाट्य के आचार्यों के मत के अनुसार वैष्णव, समपाद आदि छः पुरुष स्थानक कहलाते हैं, जिनका नाट्यशास्त्र में विवरण दिया गया है । इसके अतिरिक्त आठ स्त्री स्थानक भी होते हैं । इनके नाम है: - आयत, अवहित्य, अश्वक्रान्त, गतागत, वलित, मोटित, विनिवर्तित, तथा प्रोन्नत । इसके अतिरिक्त पूर्वकथित तेईस देशी स्थानक भी होते हैं तथा छः शयन या सुप्त स्थानक होते हैं । यथा- -सम, नत, आकुञ्चित, विवर्तित तथा उद्वाहित । सङ्गीतरत्नाकर में भी छ पुरुष स्थानक तथा उपर्युक्त आठ स्त्री स्थानक के अतिरिक्त ये छः सुप्तः स्थानक बतलाये गये हैं तथा साथ ही नौ उपविष्ट स्थान भी बतलाये गये हैं । ये नौ उपविष्ट स्थान इस प्रकार हैं, ( १ ) स्वस्थ, ( २ ) मदालस, ( ३ ) क्रान्त, ( ४ ) विष्कम्भित, ( ५ ) उत्कट, ( ६ ) स्रस्तालस, ( ७ ) जानुगत, ( ८ ) मुक्तजानु तथा ( ९ ) विमुक्त । विस्तार भय से इनके लक्षणादि विवरण को यहाँ नहीं दे रहे हैं । न्याय - अभिनय में शस्त्रमोक्षण की चार विधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं । जिनकी शास्त्रीय संज्ञा ' न्याय ' कहलाती है । क्योंकि इन्ही न्याय के आश्रित अङ्गहार तथा ' न्याय ' से ही उपस्थित युद्ध को रंगमञ्च पर लाते हैं । ये न्याय चार हैं: - ( १ ) भारत, ( २ ) सात्वत, ( ३ ) वार्षगण्य तथा ( ४ ) कैशिक । भारत के अनुसार कटि प्रदेश पर, सात्वत के अनुसार पैर पर, वार्षगण्य के अनुसार वक्षःस्थल पर तथा कैशिक के अनुसार मस्तक से शस्त्र प्रहार का विधान होता है ।
पृष्ठ 28
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आसनस्थान क्रमशः ( ना ० शा ० पृष्ठ १८ प्रस्तावना ) १. गारुडम् आसन २. वृषभ आसनं २. विषम सूची आसन आसन स्थान ४. कूर्म आ ५. नागबन्ध आसन
पृष्ठ 29
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( ना ० शा ० पृष्ठ १८ प्रस्तावना ) ( ७ ) स्वस्तिक स्थान ( ८ ) वर्धमानक स्थान ( १ ) नद्यावर्त्त स्थान ( १० ) संहत स्थान ( ११ ) परावृत्त स्थान ( १२ ) ब्राह्म स्थान
पृष्ठ 30
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( १६ ) भारतन्याय के अनुसार पात्र प्रवेश करते हुए बायें हाथ में खेटक तथा दाहिने हाथ में शस्त्र लेकर रंगमश्व पर परिक्रमा करता है । इसी प्रकार अन्य न्यायों में भी थोड़े परिवर्तन के साथ शस्त्रों को लेकर ( नाट्य - प्रदर्शन में ) परिक्रमा की जाती है । भरतमुनि ने शस्त्रमोक्षण के इन अभिनयों ( के सम्बन्ध ) में प्रयुक्त ( इन ) न्यायों के विषय में कुछ निषेध भी बतलाये हैं । तदनुसार धनुष या वज्रादि के प्रहार या प्रयोग की स्थिति में वह संकेतमात्र से छोड़ा जाए न कि उससे वास्तविक रक्तस्राव कराने वाला प्रहार हो परन्तु यदि ऐसा आवश्यक ही हो तो फिर आहार्यविधि के अभिनय विधान का आवश्यकता के अनुसार अनुगमन किया जाए । सौष्ठव — इस प्रकार जो नाट्य प्रयोग में चारी की योजना का विधिवत् विधान दिखलाया गया परन्तु चारी के प्रयोग में ' अङ्ग सोष्ठव ' आवश्यक होता है, क्योंकि अङ्गसौष्ठव से ही नाट्य या नृत्य में शोभा का संचार ( सम्भव ) होता है । जब कटि, कर्ण, स्कन्ध तथा मस्तक सम स्थिति में और वक्षःस्थल उन्नत या उठा हुआ रखते हुए शरीर को व्यवस्थित करते हैं तो यही ' सौष्ठव ' कहलाता है । इसमें शरीर को लक्षणानुसारी क्रम में रखा जाता है क्योंकि अङ्ग - सौष्ठव ही पात्रों के अभिनय को प्रभाव एवं समृद्धिशाली बनाते हैं । इस प्रकार स्पष्ट है कि नाट्यप्रयोग में चारी विधान का अतिशय महत्व होता है, जिसके मूल में भरतमुनि की शास्त्रीय दृष्टि तो है ही साथ में लौकिकता की धारा भी संयुक्त होकर चल रही है । इनमें सर्वत्र ही — चाहे हस्तसञ्चार हो या शस्त्रप्रक्षेप या पाद ( प्रक्षेप या ) प्रचार एक अनुगतता अवश्य विद्यमान रहती है । इसके अतिरिक्त रङ्गमञ्च पर किये गये छेदन आदि के निषेध, अङ्गों के सौष्ठव पूर्ण विधान तथा व्यायामकर्म आदि सभी नाट्यविधानों की प्रयोग में महत्त्वपूर्ण शृङ्गला रहती है जो भरतमुनि की प्रयोगगत सूक्ष्म एवं व्यावहारिक दृष्टि की अभिव्यक्ति करती है । मण्डलप्रचार - नाट्यशास्त्र का द्वादश अध्याय ' मण्डलविधान ' नामक अध्याय है । यह बतलाया जा चुका है कि चारी द्वारा आङ्गिक अभिनय सम्पन्न किया जाता है जो करण, खण्ड तथा मण्डल का आधार होता है । इनमें एकपाद के प्रचार से ' चारी ' दोनों पादों के प्रचार के द्वारा ‘ करण तथा करणों के योग मेल से ' खण्ड ' तथा खण्डों के योग से ' मण्डल ' का निर्माण होता है । चारियों के समूह से यह मण्डल निर्मित होता है । चारियों के समान मण्डल को भी भौमिक तथा आकाशित वर्ग में विभाजित किया गया