भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 31–40

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 31–40

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( २० ) भौमिक तथा आकाशिक मण्डल के दस दस प्रभेद किये गये हैं । है । इनमें जो सब मिल कर मण्डलों के बीस प्रभेद बनाते हैं । इनका नामादि विवरण इस प्रकार है-भौमिकमण्डल - ( १ ) भ्रमर, ( २ ) आस्कन्दित, ( ३ ) आवर्त, ( ४ ) समोत्सारित, ( ५ ) एलकाक्रीडित, ( ६ ) अड्डित, ( ७ ) शकटास्य, ( ८ ) अध्यर्धक, ( ६ ) पिष्टकुट्ट तथा ( १० ) चाषगत । आकाशिक मण्डल - ( १ ) अतिक्रान्त, ( २ ) विचित्र, ( ३ ) ललित-सश्वर, ( ४ ) सूचीविद्ध, ( ५ ) दण्डपाद, ( ६ ) विहृत, ( ७ ) अलातक, ( ८ ) वामविद्ध, ( ६ ) ललित तथा ( १० ) क्रान्त । नाट्यशास्त्र में इनके स्वरूपादि का विवरण है । इन मण्डलों का युद्ध, तथा बाहुयुद्ध आदि में लीलापूर्ण अङ्ग सञ्चालन के साथ वाद्यों के सञ्चरण वादन के अनुगत प्रदर्शन रंगमञ्च पर प्रस्तुत किया जाता है । गतिप्रचार - नाट्यशास्त्र का तेरहवाँ अध्याय ' गतिप्रचार ' अध्याय अभिनय के क्रम में पात्रों द्वारा प्रयोज्य विभिन्न अवस्था, भाव, है । आङ्गिक उनकी जो चाल या गति होती है वह भी स्थान, आसन आदि के समय विभिन्नता लिये हुए रहती है तथा इसी विभिन्नता सम्पन्न गति से इन पात्रों के स्थान, भाव, प्रचार आदि का विधान निश्चय किया जाता है । यही विधान ' गति प्रचार ' कहलाता है जिसमें पात्रों की अवस्था, काल, स्थान आदि विविध सन्दर्भों में स्वरूपानुसार उनकी चाल या गति को दिखलाया जाता है । इसका कारण यह है कि नाट्य प्रयोग में विविध पात्रों की चाल उनकी प्रकृति तथा कार्य के अनुरूप बदलती हुई रखना आवश्यक होता है तथा पात्र की अपनी चाल में भी कभी - कभी समय, अवस्था या कारणवश ( संयोगवश भी ) भिन्नता आ जाती है । जिसका प्रभाव शरीर के अङ्ग तथा उपाङ्गों पर ( विभिन्न रूप में ) पड़ता है तथा इनसे उनके पाद-प्रचार या गति प्रभावित ( या परिचालित ) रहती है । अतएव गतिविधान नाट्यप्रयोग की सिद्धि में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है । इसके अन्तर्गत पात्र जब रङ्गमञ्च पर प्रवेश करे तभी से लेकर उसके निष्कमण तक की प्रत्येक गति का विधान विभिन्न भूमिकाओं के प्रस्तुतीकरण की स्थिति में अपना अतिशय ( महत्व एवं ) मूल्य रखती है । पात्र प्रवेश - नाट्यप्रयोग के आरम्भ में रङ्गमञ्च पर पात्र का प्रवेश होता है । यह प्रवेश इस प्रकार होना चाहिए कि उससे प्रतिपाद्य

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( २१ ) या साध्य रस के उदय का आरम्भ सामाजिकों में होने लगे । इसलिये ऐसे समय भाण्डवाद्य के वादन के साथ - साथ मार्ग एवं रस से युक्त ध्रुवागान को ( पात्र प्रवेश - काल में ) रखा जाता है । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ' ने कोहल आचार्य का इस सन्दर्भ में मत दिखलाते हुए बतलाया कि प्रवेशकाल के समय नाट्यप्रयोग के अनुसार ध्रुवा या शुष्काक्षर गान करवाया जाए तथा पात्र को ' उचित स्थान, दृष्टि, मुखराग आदि से संयुक्त रखते हुए रखा जाए, जिससे सामाजिकों के अन्तःकारण में शीघ्र प्रतिपाद्य ( मुख्य ) रस के उदय का आरम्भ होने लगे । इसमें उत्तम तथा मध्यम पात्रों का प्रवेश वैष्णवस्थान द्वारा किया जाता है । उस समय उनका वक्षः, बाहु तथा मस्तक सम, उन्नत तथा एक समान रखा जाता है, ग्रीवा मयूर सी उन्नत, सुन्दर तथा प्रसन्न, दाहिना तथा बायाँ हाथ क्रमशः नाभि तथा कटि के पास अवस्थित रखते हुए भूमिकानुसार उन्हें अन्तर ( तथा समय ) लेते हुए अपने डगों को रखना चाहिए । इस प्रकार रङ्गमन्च पर प्रविष्ट पात्र के चरण अपनी प्रकृति और मानसी दशा के अनुरूप निश्चित दूरी पर समय के अनुसार रखे जाएँगे । इसका कारण पात्रों की अपनी प्रकृति रहती हैं । उत्तमपात्रों की प्रकृति गम्भीर होती है तथा अधम की चंचल या असंयत । देवता तथा राजा जैसे उत्तमपात्रों के पादक्षेप का अन्तर चार ताल, मध्यमपात्रों का दो ताल तथा स्त्री एवं नीच पात्रों का अन्तर एक ताल की दूरी पर होता है । इसी प्रकार इनका समय भी दिखलाया गया है । यथा— उत्तम पात्र के पाद क्षेप में चार कला, मध्यम में दो कला तथा अधम में एक कला का समय लगना चाहिए । इसके अतिरिक्त इसे लय के अनुगत भी रखा जाता हैं अतः उत्तमपात्रों का गति क्रम स्थित या विलम्बित लय में, मध्यमपात्र का मध्यम लय में तथा अधम पात्रों का द्रुत लय में रखा जाता है । इस विवरण से स्पष्ट परिलक्षित होता है कि जब गति का निर्धारण ताल, लय तथा समय का आश्रय लेकर नियमानुसार रखा जाता है तो उसे सत्व या मनोदशा के सन्दर्भ में भी रहना चाहिए । क्योंकि मनःस्थिति जब असाधारण तो पात्रों की उपर्युक्त गति में प्रकृतिभेद से उसे रखा जाएगा क्योंकि सत्व प्रकृति की अपेक्षा से आवश्यक रहता है । चरणों के अन्तर में रखे गये काल, लय और गति के क्रम में प्रकृति की अपेक्षा से चित्तवृत्तियों की १. द्रष्ट ० अभि ० भार ० vol II पृ ० १३७.

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( २२ ) भी प्रमुखता रहती है । इसी कारण भयत्रस्तता तथा हर्ष की अवस्था में उत्तम प्रकृति के पात्रों का पाद प्रचार या गति ' द्रुत ' तथा क्षुधा, व्याधि एवं शोक आदि की दशा में अधम प्रकृति के पात्रों का पाद प्रचार भी विलम्बित या स्थित लय में रखा जाता है । अतएव पात्रों की प्रकृति के सन्दर्भ में उनकी गति का स्वरूप चित्तवृत्ति या सत्व की अपेक्षा से निश्चित किया जाता है यह स्पष्ट नियम दिखलाई देता है । परन्तु उत्तमपात्र की गति मध्यम पात्र में तथा मध्यमपात्र की ( निर्धारित ) गति की योजना उत्तमपात्र में नहीं करना चाहिए । इसका कारण यह है कि पात्रों की गति का निश्चय उनके गुण के आधार पर किया जाता है, क्योंकि ऐसा करने से ही रस की स्थिति सम्भव है । भरत का यह विधान लोकानुवर्तन की स्थिति एवं प्रवृत्ति की पुष्टि करता है । इस सन्दर्भ में आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने बतलाया कि जब भी मानसिक दशाओं के कारण गति के निश्चय में विपर्यय या अनियम असामान्य दिखलाई पड़ेगा फिर भी उसमें सत्व से अनुगत एक सूक्ष्म सूत्र के सदृश नियम विद्यमान रहेगा ही; जिससे उत्तमपात्र की शोकादि में द्रुत धारा का अनुगमन कर दी जाती है । इस प्रकार स्पष्ट है कि भरता-तथा अधम की विलम्बित चार्य ने प्रत्येक गति का सत्व तथा रस के अनुरूप विस्तृत विधान ही इसके सन्दर्भ में दिखलाया है । रसगति - भरतमुनि ने प्रत्येक रस के अनुरूप गति का अतिसूक्ष्म एवं प्रभावकारी विवरण के साथ रसों के नियम तथा गति को दिखलाया है । संक्षेप में यहाँ उन्हें दिया जारहा है । शृङ्गार रस - इसमें पात्र की ललित एवं कोमल गति रखी जाती है । यहाँ चरण भी ताल लयाश्रित मन्द तथा स्वच्छन्द भाव से पृथ्वी पर रखे जाते हैं । प्रच्छन्न कामी पात्र चन्द्रज्योत्स्ना से प्रकाशित मार्ग में शब्दमात्र से आशंकित एवं भीत होकर चुपचाप लड़खड़ाते चरणों से डग भरते हुए चलता है तथा उस समय इसकी स्वच्छन्द या निर्भीक स्थिति नहीं होती है । यहीं जब अन्धकार पूर्ण मार्ग पर चलता है तो इसे धूजते या लड़खड़ाते चरणों में ठोकर खाते हुए रखा जाता है । हास्यरस में पात्र की गति विक्षिप्त रखी जाती है । करुणरस में शिथिलगति में पात्र चलता है । इस गति की योजना मरण के समय विशेष रूप से की जाती है । इसमें स्थित ( विलम्बित ) लय में पाद प्रचार तथा अथुओं के प्रवाह से अवरुद्ध नयन रखें जाते हैं । यहाँ उत्तमपात्र की गति धैर्य युक्त सहज अश्रु प्रवाह तथा निश्वास और ऊर्ध्व-

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( २३ ) निरीक्षण के साथ रखी जाती है । इस समय पादप्रक्षेप या प्रचार ही सहज होता है । शोकग्रस्त पात्र का वक्षःस्थल ' नत ' रखा जाता है तथा गाढ़ प्रहार की स्थिति में शरीर को भुजा के सहारे टिका हुआ दर्शाया जाता है । रौद्ररस में चण्डगति होती है । इस गति की योजना क्रोध में शत्रु का पीछा करने में की जाती है । इसमें पैरों का अन्तर चार ताल का रखा जाता है । राक्षस एवं दैत्य पात्रों में इसे स्वाभाविक गति के रूप में रखा जाता है, क्योंकि ऐसे पात्र स्वभाव से ही रौद्र प्रकृति के होते हैं । इसमें पाद प्रचार विषम रहता है । वीररस के प्रयोग में गौरवगति रहती है जो उत्तम या वीर प्रकृति के पात्रों की सहज गति मानी जाती है । इसमें गति का क्रम द्रुत तथा इसी कारण चरणविन्यास न्यूनकलाओं वाला रखा जाता है । भयानकरस में गति भयत्रासित रखी जाती है । इसमें दोनों बाजुओं की ओर देखना, धूजना, आँखों को खुली रखना, ओठों का सूख जाना आदि के साथ स्खलितगति में पादसंचार रहता है । इसमें गति चूर्णपद में रहती है तथा विकल तथा कापुरुष व्यक्ति की यह स्वाभाविक गति मानी गयी है । बीभत्सरस में सङ्कोचगति रहती है । इसमें हाथ पैर के पीछे रखे जाते हैं तथा चरणविन्यास पास पास या एक के पीछे एक या एक दूसरे के मध्य में रखे जाते हैं । ( तथा यह अनियन्त्रित स्वरूप में भी रहता है ) । अद्भुत-रस में आश्चर्यगति रहती है । इसमें पैरों की गति लड़खड़ाते हुए तथा चारों ओर घूमते हुए रहती है तथा पात्र मुग्धभाव में रहता है । शान्तरस में स्थिरगति या अचंचलगति रखी जाती है, जो स्थितप्रज्ञ या शान्त पुरुष की होती है । इसमें समपाद की स्थिति में पात्र अवस्थित रहता है । विविध पात्र गति - नाट्यशास्त्र में पात्रों के स्तर, दशा तथा प्रकृति की विभिन्नता के आधार पर तथा उनके उत्तम, मध्यम एवं अधम श्रेणी के विभाजन के द्वारा ( उनकी ) गति का विस्तार से निरूपण किया गया है । इसका कारण है – अभिनय में यथार्थता आकर प्रतिपाद्य रस में निर्बाध आस्वाद्यमानता का उत्पन्न होना । भरत का यह विविध पात्रों की गति का विवरण अति विस्तीर्ण है, जिसमें उत्तम आदि पात्रों में परिगणनीय नृप, सचिव, यति, वणिक्, तपस्वी, वृद्ध एवं युवा, स्थूल तथा कृश, मत्त एवं उन्मत्त तथा पंगु, वामन, कुब्ज एवं खञ्ज पुरुष के अतिरिक्त शकार, चेट, विदूषक, कञ्चुकी तथा दास जैसे पात्रों की गतियाँ निरूपित हैं । यह गति निरूपण नाट्य के प्रयोग में उपयोगी एवं प्रभावकारी तो है ही बड़ा ही मौलिक भी है ।

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( २४ ) इसके अतिरिक्त मुनि ने म्लेच्छ, शबर आदि प्रजातियों की प्रकृति एवं स्थिति के अनुरूप गति निरूपण के साथ - साथ नाट्य में प्रयुज्यमान सिंह, वानर, रीछ जैसे पशुओं तथा पक्षि एवं सर्प आदि प्राणियों की गति का भी व्यवस्थित विवरण दिया है । इसके अतिरिक्त पुरुषपात्रों के समान ही स्त्री-पात्रों की गति का भी विस्तार से विवरण है । सुकुमार प्रकृति के कारण स्त्रियों की गति में कला, ताल एवं लय के प्रमाण को पुरुष की अपेक्षा आधा रखा जाता है, तथा अवस्था भेद से भी युवती, मध्या, प्रौढ़ा तथा वृद्धा के भेद से भी स्त्रीगति में अन्तर रहता है । जैसे बाला की गति में अधिक स्वच्छन्दता रहनी चाहिए तथा सभी स्त्रियों की गति में लालित्य एवं विलास के साथ-साथ सौष्ठव भी दिखना चाहिए । ( ये ) सभी पात्रों की गतियाँ उनकी प्रकृति, चित्तवृत्ति, अवस्था, देश एवं काल के अनुरूप रखी जाती है । इन विवरणों में जिन जातियों, पदार्थों ( या वस्तु ) का विधान न हो उन्हें लोकव्यवहार एवं उनके स्वरूप को देख कर नाट्यप्रयोग में आचार्यबुद्धि से नियोजित करना चाहिए । भूमिका विपर्यय - नाट्यप्रयोग की अपेक्षा या अन्य स्थितिवश इसके अतिरिक्त भी पात्रों की भूमिका में परिवर्तन किया जा सकता है । मुनि ने ऐसे उद्देश्यों की पूर्ति के लिये भूमिका विपर्यय का विधान दिया है । इसमें ऐसे कार्य का उद्देश्य तथा विधान के साथ पर्याप्त व्यवस्थित विश्लेषण ( भी किया गया ) है कि पुरुष एवं स्त्रीपात्र अपने स्वभाव, स्थिति एवं प्रकृति के विपरीत ऐसी भूमिका क्यों ग्रहण करते हैं । यह दो स्थितियों में होता है - ( १ ) आत्मस्वभाव या स्वरूप का परिवर्तन तथा ( २ ) परभाव या समय के अनुसार इष्ट स्वरूप का धारण या तद्भावगमन । इस प्रकार स्त्रीपात्र वेष, कर्म, भाषा एवं गति से पुरुषों का तथा पुरुष भी स्त्रीवेष तथा मृदुगति आदि से स्त्रीभाव का अभिनय सम्पन्न करता है । यह भूमिकाविपर्यय सिद्धान्त अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है । प्रथम तो यह प्रयोग की दृष्टि से विलक्षणता लिये हुए है, क्योंकि इसमें अधिक नाटय-कौशल दिखलाना पड़ता है जो अतिशय अभ्यास तथा परिश्रम की अपेक्षा रखता है । दूसरे इसका ऐतिहासिक महत्व भी कम मूल्यवान् नहीं है । इससे यह स्पष्ट है कि भरतमुनि के समय तक नाट्यविज्ञान इतना विकसित तथा समृद्ध हो चुका था, जिसमें मनोवैज्ञानिक स्तर पर चमत्कार की उद्भावना के उद्देश्य के अतिरिक्त अन्य तात्कालिक व्यवस्था की पूर्ति के लिये ' भूमिकाविपर्यय ' की योजना हो सकती थी । इसने संस्कृत नाट्यप्रयोग

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( २५ ) को गति एवं सौन्दर्य प्रदान करने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया यह निर्विवाद है । विमान आदि गति - नाट्यप्रदर्शन में कथावस्तु के अनुरोध से अनेक दृश्यों का दिखलाना आवश्यक रहता है, किन्तु सामान्यतः ऐसे नाट्यप्रयोग में विमान आदि प्रत्यक्ष दर्शाना संभव नहीं । ऐसी परिस्थिति में भरतमुनि ने विमानगमन, रथारोहण, पर्वतारोहण, जलसन्तरण, आकाशगमन, अन्धकार-यात्रा जैसे दृश्यों, पदार्थों एवं क्रियाओं को नाट्य में प्रस्तुत करने के लिये कुछ प्रतीकात्मक अभिनयों तथा युक्तियों की परिकल्पना की है । इस प्रसंग में की जाने वाली पात्रों की गतियों का निरूपण अतिशय स्पष्ट विवरण के साथ किया गया है । निर्जीव पदार्थों एवं सजीव प्राणिपात्रों की रङ्गमञ्च पर अवतारणा की यह पद्धति नाट्यप्रयोग के क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण स्थिति रखती है । देश, काल आदि भेद से प्रतीकात्मक अभिनय के तथा तदनुरूप काव्यपाठ के द्वारा ऐसे दृश्यों को रूपायित करने का विधान रखा गया है । जो लोकानुसारी होता है । इस सन्दर्भ में आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने अनुकृतियों के प्रयोग करने की भी सहमति दी है । उनका मत है कि अनुकृत प्रतिकृतियों तथा शोभाधायक पटचित्रों के द्वारा भी ऐसे दृश्यों को उपस्थापित करना चाहिए । पतञ्जलिमुनि ने अपने व्याकरण महाभाष्य में शोभाधायक चित्रपटों के धारण करने वाले शोभिकों का उल्लेख किया था जो अभिनवगुप्त के विचारों का उत्स प्रतीत होता है । इस प्रकार नाटयधर्मी प्रतीकों तथा अभिनयों के द्वारा न केवल आन्तर चित्तवृत्तियों की किन्तु बाह्य जगत् के स्वरूप एवं सौन्दर्य की अभिव्यक्ति सम्भव है यह भरतमुनि ने अपने विवरणों से दिखलाया जो नाटयार्थ ग्रहण करवाने में अतिशय मूल्यवान् है । गति के अनुगत सङ्गीततत्त्व - विभिन्नपात्रों के रङ्गमञ्च पर होने वाले गति प्रचार का ( जो उनके प्रवेश से लेकर निष्क्रमण तक है ) विवरण इतनी उतमता के साथ अन्यत्र कहीं प्राप्त नहीं है । इनमें अभिनेता या पात्र केवल एक निश्चित प्रमाणयुक्त गति से पादनिक्षेप करते हुए मञ्च पर आते ही नहीं हैं किन्तु यहाँ उनकी गति को उपयुक्त संगीत का अनुगमन या संगत भी करनी पड़ती है, विशेष कर वाद्य तथा कण्ठ संगीत की । वाद्यों में इनकी संगत बासुरी तथा वीणा से होती थी तथा विभिन्न मृदङ्गवादन के विषय में एक नियम था । ऐसे समय गायी जाने वाली ध्रुवाओं के लिये भी विधान ( या नियम ) था जिनका प्रयोगादि के साथ स्वरूप विवरण नाट्यशास्त्र के

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( २६ ) अध्याय ३२ में दिया गया है । उस समय का यह वाद्यवादन दर्शकों को • दिखलायी पड़ता था तथा आज के समय की तरह पार्श्वसंगीत या पर्दे के पीछे से यह कार्य नहीं किया जाता था । जब यह कहा गया कि नाट्य एक कला है जो स्वयं यथार्थ नहीं है परन्तु यथार्थ का अनुकरण है । अतः इस नाटय में संगीत के अभिव्यञ्जक एवं भावस्पर्शी कार्य को लगाना उसी के उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए रसों की समृद्धि करना है । मुनि को यहाँ ऐसे प्रयोक्ता पात्र की अपेक्षा रही जो दर्शकों के समक्ष आवें तथा वे जब तक अपना सम्भाषण या संवाद कथन आरम्भ न करें या उसे समाप्त न करें । इसी कारण ऐसे समय मृदंग या बासुरी का शीघ्र ही वादन आरम्भ किया जाता था और उसी के साथ पर्दे के हटते ही पात्र रङ्गमश्व पर प्रवेश करेगा तथा यह क्रम तब तक चलता रहता था जब तक कि वह संवाद या सम्भाषण की स्थिति में न पहुँच पाए । इसी प्रकार का क्रम उसके रङ्गमञ्च से निष्क्रमण के समय भी रहता था । अतः यही वह समय था जब ध्रुवा गान हो । कण्ठ तथा वाद्य संगीत का यह चलने वाला प्रयोगक्रम ( नृत्यगत ) अभिनेता एवं अभिनेत्रियों के पादविक्षेप तथा अभिनय के साथ - साथ चलता था जो आज हमें किसी बॅलेट या आपेरा नाट्य या नृत्य की सूचना सा देता दिखाई देता हैं तथा नाटकीय संवाद के साथ चलने वाले संगीत के कारण यह पुनः आपेरा के समीप आ जाता है । ये विवरण या नाट्यप्रयोग के नियम भारत में प्राचीन काल में प्रस्तुत नाट्य-विधान में प्राप्त हैं, जो आज भी विश्व कलासन्धान के महत्वपूर्ण स्रोत एवं आधार बनने में समर्थ होकर अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं । स्थानक या स्थान - नाट्यशास्त्र में गति विधान के प्रसंग में स्त्रियों एवं पुरुषों के स्थानक तथा भूमिका विपर्यय का विचारपूर्वक निरूपण किया गया है । इनमें पात्रों के सम्भाषण एवं गति के समय तीन प्रकार के स्थानक होते हैं - ( १ ) आयतस्थान, ( २ ) अवहित्य स्थान तथा ( ३ ) अश्वक्रान्तक स्थान । आयतस्थान - इसमें नारी का दाहिना पैर सम, बायाँ तिरछा होकर एक ताल के अन्तर से उठा हुआ तथा बायीं ओर से कमर ऊपर उठी हुई रहती है । नाट्यप्रयोग की दृष्टि से यह स्थान बड़ा महत्वपूर्ण माना जाता है । इसके द्वारा आवाहन, विसर्जन, चिन्ता, पुष्पमोक्षण जैसी क्रियाओं तथा कोप, गर्व, मान आदि स्त्रीजनोचित भावों का अभिनय किया जाता है ।

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( २७ ) अवहित्थस्थान - इसमें बायाँ पैर सम, दाहिना तिरछा तथा कटि का बायाँ भाग उन्नत या उठा हुआ रहता है । इसके द्वारा सहजसम्भाषण, निश्चय, वितर्क आदि क्रियाओं तथा लीला, विलास, विव्वोक आदि नारी सुलभ सुकुमार भावों का अभिनय किया जाता है । अश्वकान्तकस्थान — इसमें एक चरण उठा हुआ, दूसरा अग्रतलसंचर स्थिति में झुका हुआ तथा सूची या आविद्ध चारी रहती है । इसके द्वारा वृक्ष की टहनियों को छूने, पुष्प गुच्छकों को ग्रहण करने, अङ्गों से वस्त्र के खिसकने आदि क्रियाओं का तथा लालित्यपूर्ण नाटयार्थ के ग्रहण करने जैसे अर्थों का अभिनय किया जाता है । इन स्थानकों का प्रदर्शन चेष्टाएँ तथा चारी के आरम्भक क्षण तक ही रखा जाता है । ये स्त्री तथा पुरुष पात्रों के द्वारा सामान्यतः नियमानुसार रखे जा सकते हैं । नाट्यशास्त्र में स्थानक का विवरण अल्प है तथा इनकी स्थिति का स्वरूप भी ( इसी कारण ) पूर्ण नहीं प्रतीत होता । परन्तु अभिनयदर्पण, सङ्गीतरत्नाकर तथा नृत्यरत्नकोश आदि नाट्यसंगीत ग्रन्थों में स्थानों का विवरण विस्तार से प्राप्त होता है । यह स्थानकों का विवरण इसी कारण यहाँ देना आवश्यक है । स्थानों का प्रयोग भी विविध अभिनय तथा मुद्राओं के प्रस्तुत करने के समय रखा जाता है, जहाँ एक नियत स्थिति में पात्र को खड़ा रहना होता है । यही स्थिति ' स्थान ' ( Pose ) कहलाती है । " ये स्थान ( आरम्भ में ) : छ हैं- ( १ ) वैष्णव, ( २ ) समपाद, ( ३ ) वैशाख, ( ४ ) मण्डल, ( ५ ) आलीढ तथा ( ६ ) प्रत्यातीढ़ । इन सभी स्थानों के अधिष्ठाता देवता भी नियत है तथा इनका विवरण शास्त्र में मिलता है । तदनुसार यह क्रम इस प्रकार है: -वैष्णव- देवता विष्णु । आगे रखने का प्रमाण ३ ' ताल के अन्तर से, एक पैर ऊँचा तथा दूसरा तिरछा, जंघा ऊँची तथा एडी तिरछी रखी जाती है । १. नाट्य के इस स्थानक विवरण की विस्तार से मीमांसा यहाँ सम्भव नहीं है परन्तु इन विवरणों के आधार पर हमने कुछ रेखाचित्र लगा दिये हैं । इन्हें नाट्यशास्त्र के अभिनयप्रयोग विवरण में उपयोगी तथा परम्परानुमोदित मानकर आज भी दक्षिण भारत के कलाकार इन्हें प्रस्तुत करते रहे हैं । ( अतः ये प्राचीन ही हैं ) सम्पादक ।

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( २८ ) समपाद - देवता ब्रह्मा । दोनों पैरों का अन्तर का प्रमाण एक ताल का तथा दोनों पैर घुटनों के साथ सहज मुड़े हुए । वैशाख – देवता कार्तिकेय । पैर एक दूसरे के पीछे तीन बल में लपेट लिये हुए रख कर नमे हुए होकर खड़ा रहना । मण्डल -- देवता इन्द्र । दोनों पैरों का यहाँ अन्तर तीन ताल तथा कटि. तथा पृष्ठ सीधी रखकर झुकते हुए खड़े रहना । आलीढ - तथा प्रत्यालीढ - दोनों के देव इन्द्र । मण्डल -स्थान में दाहिने पैर को पांच ताल के अन्तर से आगे रखने पर आलीढ़ तथा इसके विपरीत दाहिने पैर को सिकुड़ा कर बायें पैर को पाँच ताल के अन्तर से आगे रखना प्रत्यालीढ है । उपर्युक्त छः स्थान पुरुषसंस्थान है तथा नाट्यशास्त्रानुमोदित हैं, परन्तु शास्त्रीय ग्रन्थों में इनके अतिरिक्त अन्य स्थान भी प्राप्त होते हैं । ' सङ्गीत-रत्नाकर ' में इस सन्दर्भ में तेईस ( देशी ) स्थान दिखलाये गये हैं । जिनका स्वरूप सहज बोध्य है । ये इस प्रकार हैं- ( १ ) स्वस्तिक, ( २ ) वर्धमान, ( ३ ) नन्द्यावर्त, ( ४ ) संहज, ( ५ ) समपाद, ( ६ ) एकपाद, ( ७ ) पृष्ठोत्तानतल, ( ८ ) चतुरस्र, ( 2 ) पाष्णिविद्ध, ( १० ) पार्ष्णि-पार्श्वगत, ( ११ ) एकपार्श्वगत, ( १२ ) एकजानुगत, ( १३ ) परावृत्त, ( १४ ) समसूचि, ( १५ ) विषमसूचि, ( १६ ) खण्डसूचि, ( १७ ) ब्राह्म, ( १८ ) वैष्णव, ( १६ ) शैव, ( २० ) गारुड, ( २१ ) कूर्मासन, ( २२ ) नागबन्ध तथा ( २३ ) वृषभासन । इनमें समसूची, विषमसूची, खण्डसूची, गारुड, कूर्मासन, नागबन्ध तथा वृषभासन ये आसन हैं तथा शेष स्थान हैं । इनमें स्थानकों के कुछ चित्र हमने दिये भी हैं, जिनसे इनका स्वरूप स्पष्टतः समझा जा सके । इन स्थानकों का ग्रन्थगतरूप स्वरूप इस प्रकार है स्वस्तिक — दाहिने पैर को बायीं ओर तथा बायी ओर रखते हुए दोनों पैरों की तिरछे करते हुए रखना ( Cross ) । ये सहजभाव में शुके हुए और एक दूसरे को छूते हुए रखे जाएँ । वर्धमान - दोनों पैरों की एडी को एक दूसरे की ओर मुँह किये हुए पास - पास रखकर दाहिने पैर की नोक दाहिनी ओर तथा बायें की बायीं ओर रखते हुए खड़े रहना । नद्यावर्त - वर्धमान स्थिति में खड़े होकर दोनों पैरों का अन्तर छः से बारह अंगुल रखना ।

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( २६ ) संहत — दोनों पैरों को मिला कर रखते हुए उनके अंगूठे तथा टक को एक दूसरे से लगा कर खड़े हो जाना । समपाद- दोनों पैरों को एक बालिश्त के अन्तर पर समान रूप में एडी के बल पर खड़े रहना । यह स्थिति वैष्णव - स्थान में आगे बतलायी गयी है । एकपाद - समपाद में एक पैर को ऊपर उठाना । पृष्टोत्तान तल - एक सीधे पैर के पीछे दूसरा पैर एड़ी को ऊँचा कर पंजे ( के फण ) को ऊँचा करते हुए मोड़ कर रखना और एक पैर से उसे पीछे ढकेलना । चतुरस्र - नद्यावर्त को स्थिति में पैरों का अन्तर ढ़ाई अंगुल के अन्तर से रखना । पार्ष्णिविद्ध - एक पैर की एड़ी को दूसरे पैर के अंगूठे का स्पर्श हो इस प्रकार खड़े रहना । पाणि पार्श्वगत- बायाँ पैर सीधा रख दाहिने पैर की एड़ी बाँयीं पैर की ओर रहे इस प्रकार आड़ी रख कर खड़े रहना । एक पार्श्वगत - उपर्युक्त स्थान में दाहिने पैर को उलटी रीति से अर्थात् दाहिने पैर की एड़ी दाहिनी ओर रखकर खड़े होना । एकजानुगत - एक पैर को सीधा रख कर दूसरे पैर को एक बाजु में चार अंगुल दूर टखने से सहज मोड़ के साथ रखना । परावृत्त - वाये पैर की एड़ी के सामने दाहिने पैर का अंगूठा तथा दाहिने पैर की एड़ी के पास बायें पैर की कनिष्ठिका अंगुली को एक दूसरे के साथ स्वस्तिक रखना । समसूचि - एड़ी तथा जंघा को जमीन से स्पर्श कर दोनों पैरों को तिरछे तथा लम्बे ( क्रमशः ) करना । विषमसूची - समसूचि में एक पैर को पीछे लंबा करना अर्थात् एक पैर आगे और दूसरा पीछे की ओर लम्बा कर स्थित होना । खण्डसूची - नियमसूचो की स्थिति में एक ( अर्थात् अगले ) पैर को सिकुड़ा लेना ( तथा पिछले पैर को लम्बा रख कर बैठना । ) ब्राह्म - एक पैर से सीधे खड़े होकर पिछला पैर पीठ की ओर घुटनों को मिला कर रखना । वैष्णव- इसे नाट्यशास्त्र में दिखलाया ही है । शैव - बायाँ पैर जमीन पर सीधा रख कर वाहिना पैर घुटने से ऊपर