भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 231–240
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 231–240
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१२० नाट्यशास्त्रम् से अतिक्रान्ता चारी को और ) फिर दाहिने पैर से ' अपक्रान्ता चारी ' तथा बाएं पैर से अतिक्रान्ता चारी को प्रदर्शित कर ' भ्रमरी को ( त्रिक परिवर्तन द्वारा ) प्रदर्शन किया जाए तो अलात मण्डल
कहलाता है । २७-२६ ॥
सूचीमाद्यक्रमं कृत्वा ह्यपक्रान्तञ्च वामकम् आद्यो दण्डक्रमश्चैव सूची ' कार्यस्तु वामकः कार्यस्त्रिकविवर्तश्च पार्श्वक्रान्तश्च दक्षिणः आक्षिप्तं वामकं कुर्याद् दण्डपादश्च दक्षिणः ऊरूदृत्तञ्च तेनैव कर्तव्यं दक्षिणेन तु सूची वामक्रमं कृत्वा त्रिकश्च परिवर्तयेत् अलातश्च भवेद्वामः पार्श्वक्रान्तञ्च दक्षिणः अतिक्रान्तः पुनर्वामो वामबन्धे तु मण्डले
।
॥। ३० ॥
।
॥ ३१ ॥
।
॥ ३२ ॥
।
॥ ३३ ॥
वाम - विद्ध ( वामबन्ध ) – दाहिने पैर से ' सूची ' चारी का तथा बाएं पैर से अपक्रान्ता चारी का; फिर दाहिने पैर से दण्डपादा चारी का तथा बाएं पैर से ' सूची ' चारी का; फिर दाहिने पैर से भ्रमरी चारी को ( त्रिक का घुमाव देकर ) प्रदर्शित कर पार्श्वकान्ता चारी का तथा दाहिने पैर से दण्डपादाचारी का, फिर दाहिने पैर से उरूद्वृत्ता चारी तथा बाएं पैर से सूची को प्रदर्शित कर ( त्रिक परिवर्तन द्वारा ) भ्रमरी चारी को प्रदर्शित करे । फिर बाएं पैर से ' अलाता ' चारी का तथा दाहिने पैर से पार्श्वकान्ता चारी का तथा बाएं पैर अतिकान्ता चारी का प्रदर्शन किया जाए तो ‘ वामविद्ध ' मण्डल कहलाता है ॥ २ ९ -३३ ॥
सूचीमाद्यक्रमं दद्यादपक्रान्तञ्च वामकम् ।
पार्श्वकान्तः पुनश्चाद्य भुजङ्गत्रासितः सँ च ॥ ३४ ॥
अतिक्रान्तः पुनर्वाम आक्षिप्तो दक्षिणस्तथा ।
अतिक्रान्तः पुनर्वाम ऊरूतस्तथैव च ॥ ३५ ॥
१. सूचीपादस्तु - ख ० । २. दण्डपार्श्वञ्च - ग ० । ३. करच्चैव - ग ० । ४. कार्यों ललितसञ्चरः - ख ० । ५. कृत्वा अपक्रान्तं ग ० । ६. श्चान्यो - ख ०; ग ० । ७. त्रासितं तथा — ख ०; ग ० । ८. ऊरूवृत्तं तथैव च -ग ० ।
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द्वादशोऽध्यायः १२१
अलातश्च पुनर्वामः पार्श्वक्रान्तश्च दक्षिणः ।
" सूचीवामं पुनर्दद्यादपक्रान्तश्च दक्षिणः ॥ ३६ ॥
अतिक्रान्तः पुनर्वामः कार्यो ललितसञ्चरः ।
एष पादप्रचारस्तु ललिते मण्डले भवेत् ॥ ३७ ॥
ललित - यदि दाहिने पैर से सूची चारी का तथा बाएं पैर से अपक्रान्ता चारी का, फिर दाहिने पैर से पार्श्वकान्ता तथा भुजंगत्रासिता चारी का, फिर बाएं से अतिक्रान्ता तथा दाहिने पैर से आक्षिता का ) फिर बाएं से अतिक्रान्ता तथा उरूद्वृत्ता चारी को प्रदर्शित कर फिर तथा दाहिने पैर से अपक्रान्ता चारी का और फिर बाएं चारी का ललितगति से प्रदर्शन करने से ' ललित ' मण्डल सूचीमाद्यक्रमं कृत्वा ह्यपक्रान्तश्च वामकम् पार्श्वक्रान्तं पुनश्चाद्यं वामं पार्श्वक्रमं तथा भ्रान्त्वा चारीभिरेताभिः पर्यायेणाथ मण्डलम् वामं सूचीं ततो दद्यादपक्रान्तञ्च दक्षिणम् स्वभावगमने ह्येतन्मण्डलं संविधीयते क्रान्तमेतत्तु विज्ञेयं नामतो नामयोक्तृभिः बाएं से अलात से अतिकान्ता कहलाता है ॥ ॥। ३८ ॥ ॥। ३ ९ ॥
।
॥ ४० ॥
क्रान्त - यदि दाहिने पैर से सूची तथा बाएँ पैर से अपक्रान्ता चारी का, फिर दाहिने पैर से पार्श्वकान्ता चारी का तथा बाएं पैर से ही पार्श्वकान्ता चारी को प्रस्तुत कर फिर इन्हीं चारियों के द्वारा क्रमशः सभी दिशाओं में घुमाव लिया जाए । तब फिर बाएं पैर से ' सूची ' का तथा दाहिने पैर से अपक्रान्ता चारी का प्रदर्शन करे तो इस मण्डल को ' क्रान्त ' मण्डल जानो । इसकी स्वाभाविक गति में योजना की जाए क्योंकि इसकी यौगिक अर्थ के द्वारा यही प्रतीति होती है ॥ ३८-४० ॥
एतान्याकाशगानी है ज्ञेयान्येवं दशैव तु ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि भौमानामपि लक्षणम् ॥ ४१ ॥
ये दस आकाशिक मण्डल कहे गए हैं । अब आगे मैं भौमिक मण्डलों के लक्षण बतलाता हूं ॥ ४१ ॥
१. पद्यार्धमेतत् ख०-०- पुस्तकयोः नास्ति । २. ललित संज्ञकः ख ० । ३. प्रसारस्तु — ख ० ग ० । ४. श्चान्यं वामपार्श्व ग ० । ५. गामीनि - ख ० ।
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१२२ नाट्यशास्त्रम्
मौमिक मण्डल - लक्षण -आद्यस्तु जनितः कार्यो वामश्चास्पन्दितो भवेत् ।
शकटास्यः पुनश्चाद्यो वामश्चापि प्रसारितः ॥ ४२ ॥
आद्यो भ्रमरकः कार्यस्त्रिकञ्च परिवर्तयेत् ।
आस्पन्दितः पुनर्वाम शकटास्यश्च दक्षिणः ॥ ४३ ॥
वामः पृष्ठापसप च दद्याद् भ्रमरकं तथा ।
स एवास्पन्दितः कार्यस्त्वेतद् भ्रमरलण्डलम् ॥ ४४ ॥
भ्रमर - यदि दाहिने पैर से ' जनिता ' चारी तथा बाएं पैर से ' आस्कन्दिता ' का, फिर दाहिने पैर से शकटास्या चारी को प्रदर्शित कर बाएं पैर को फैला ले । फिर दाहिने पैर से भ्रमरी चारी का शरीर को घुमाव देकर प्रदर्शन करे | फिर बाएं पैर से ' आस्कन्दिता ' चारी का तथा दाहिने पैर से ' शकटास्या चारी ' का, फिर बाएं पैर से अपक्रान्ता का और त्रिक को घुमाव देते हुए भ्रमरी चारी का प्रदर्शन नामक मण्डल हो जाता है ॥ ४२-४४ ॥ आद्य भ्रमरः कार्यों वामश्चैवाडितो भवेत् ' कार्यस्त्रिकविवर्तश्च शकटास्यश्च दक्षिणः ऊरूदृत्तः स एव स्याद्वामश्चैवापसर्पितः कार्यस्त्रिकविवर्तश्च दक्षिणः स्पन्दितो भवेत् शकटास्यो भवेद्वामस्त देवस्फोटनं भवेत् पतदास्पैन्दितं नाम व्यायामे युद्धमण्डलम् चारी अपसर्पों करे तो भ्रमर
।
॥ ४५ ॥
।
॥ ४६ ॥
।
॥ ४७ ॥
आस्पन्दित ( आस्यन्दित ) –यदि दाहिने पैर से ' भ्रमरी ' चारी का तथा बाएं पैर से ' अड्डिता ' तथा पीठ को एक घुमाव देकर भ्रमरी चारी का, फिर दाहिने पैर से ' शकटास्या ' चारी का तथा पुनः ' उरूद्वृत्ता ' चारी का, फिर बाएं पैर से अतिक्रान्ता चारी ( अपसप ) को प्रदर्शित करे और फिर भ्रमरी को ( पीठ को पूरा गोल घुमाव देकर ) प्रदर्शित करे, फिर दाहिने १. श्चास्कन्दितो —ख ० - ० । २. आस्कन्दितः ख ० - ग ० । ३. एवास्कन्दितः - ख ० - ग ० । ४. ' कार्यस्त्रिक ' इत्यादि पद्ययी ग ० - पुस्तके नास्ति ५. स्कन्दितो - ख ० । ६. तथैवा — ख ० । ७. दास्कन्दितं ख ० - ग ० ।
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द्वादशोऽध्यायः १२३ पैर से स्पन्दिता • चारी का और पुनः बाएं पैर से ' शकटास्या ' चारी का प्रदर्शन कर उसे भूमि पर जोर का झटका देकर पटके तो ' आस्पन्दित ' नामक युद्ध में प्रयुक्त होने वाला मण्डल हो जाता है ॥ ४५-४७ ॥
आद्यन्तु जनितं कृत्वा वामेनं तु निकुट्टकम् ।
शास्यः पुनश्चाद्य ऊरुदृन्त स एव तु ॥ ४८ ॥
पृष्ठापसप वामश्च स च चाषगतिर्भवेत् ।
आस्पन्दितः पुनः सव्यः ५ शकटास्यश्च वामकः ॥। ४ ९ ॥
आद्यो भ्रमरकश्चैव त्रिकन्तु परिवर्तयेत् ।
पृष्ठासप वामश्चेत्यावर्ते मण्डले भवेत् ॥ ५० ॥
आवर्त्त - यदि दाहिने पैर से जनिता चारी तथा बाएं पैर से तलसंचर ( निकुट्टन ) का, फिर दाहिने पैर से शकटास्या तथा उसी से उरूद्वृत्ता का, फिर पीठ को घुमाते हुए बाएं पैर से अतिक्रान्ता चारी ( अपसर्पी ) का तथा चाषगति ' ' चारी का, फिर दाहिने पैर से ' स्कन्दिता ' चारी का तथा बाएं पैर से शकटास्या चारी का, फिर दाहिने पैर से पीठ को चक्कर या घुमाव देते हुए भ्रमरी चारी तथा बाएं पैर से अपक्रान्ता ( अपसर्पो ) चारी को प्रदर्शित करे तो ‘ आवर्त्त ' नामक मण्डल होता है ॥। ४८-५० ॥
कृत्यादौ समपादन्तु स्थानं हस्तौ प्रसारयेत् ।
निरन्तरावूर्ध्वत लावावेष्ट्योद्वेष्ट्य चैव हि ॥ ५१ ॥
कटीतटे विनिक्षिप्य चाद्यमावर्तयेत् क्रमात् ।
यथाक्रमं पुनर्वासमावर्तेन प्रसारयेत् ॥ ५२ ॥
' चार्यानया च भ्रान्त्वा तु पर्यायेणाथ मण्डलम् ।
समोत्सारितमेतच्च ज्ञेयं व्यायाममण्डलम् ॥ ५३ ॥
समोत्सारित - सर्वप्रथम समपाद स्थान का प्रदर्शन कर दोनों हाथों को फैलाकर उनकी हथेली ऊपर की ओर मुंह वाली रखे पुनः हाथों को १. वामन्चैव — ग ० । २. निकुट्टनम् - ख ० । ३. श्चान्यः -- ग ० । ४. आस्कन्दितः - ख ० - ग ० । ५. सद्यः -- ख ०, सौख्यं - ग ० । ६. पृष्ठाव सप- ख ० । ७. समपादं बुधः कृत्वा स्थानं - ख ० - ग ० । 5. क्रमम् - ख ० - ग ० । ९. चारया चानया ग ० । १०. मेतत्तु कार्यं - ग ० ।
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१२४ नाट्यशास्त्रम् आवेष्टन ( हाथों का पारस्परिक लपेटना ) तथा उद्वेष्ठन गति युक्त कर ले, फिर बाएं हाथ को कटि प्रदेश पर रखे और दाहिने हाथ को ' आवर्तित ' गति में रखे, फिर दाहिने हाथ को कटि पर रखे और बाएं हाथ क्रमशः ( पर्याय में ) गोल घुमाव लेते हुए रखने तथा आवर्तित चारी में स्थित रहने पर ' समोत्सारित ' मण्डल हो जाता है ॥ ५१-५३ ॥
पादैस्तु भूमिसंयुक्तैः सूचीविद्वैस्तथैव च ।
एलकाक्रीडितैश्चैव ' तूर्णैस्त्रिकविवर्तनैः ॥ ५४ ॥
सूची विद्वापविद्वैश्च क्रमेणावृत्य मण्डलम् ।
एकाक्रीडितं विद्यात् खण्डमण्डलसंशितम् ॥ ५५ ॥
एलकाक्रीडित – यदि दोनों सम पैरों को पृथ्वी पर टिकाकर फिर ' सूची ' तथा एलकाक्रीडिल चारी को प्रदर्शित करे फिर शीघ्र भ्रमरी चारी का प्रदर्शन कर त्रिक को घुमाव दे, फिर ' सूची ' तथा आविद्धा ( अपविद्धा ) चारी को क्रमशः गोल घुमाव देकर प्रदर्शन करे तो ' खण्डमण्डल ' नाम वाला ' एलकाक्रीडित ' मण्डल हो जाता है ॥ ५४-५५ ॥ सव्यमुद्धट्टितं कृत्वा तेनैवार्वर्तमाचरेत् तेनैवास्कन्दितः कार्यः शकटास्यश्च वामकः आद्यः पृष्ठापस च स च चाषगतिर्भवेत् अर्तिश्च पुनर्वाम आद्यश्चैवापसर्पितः वामो भ्रमरः कार्य आद्य आस्कन्दितो भवेत् तेनैवस्फोटनं कुर्यादेतदर्तिमण्डलम् अड्डित – यदि दाहिने पैर को ' उद्घाट्टित ' लक्षण के फिर ( इसी के अनुसार ) एक सामान्य गोल घुमाव ले ॥। ५६ ॥
।
॥ ५७ ॥
॥। ५८ ॥
अनुसार घुमावे और फिर उसी पैर को ' आस्यन्दिता ' चारी के अनुसार घुमावे तथा बाएं पैर से शकटास्या चारी का, फिर दाहिने पैर को पीछे की ओर क्रमशः अपक्रान्ता ( अपसर्पी ) चारी के अनुसार तथा चाषगति चारी के अनुसार ले जाए, फिर बाय पैर अड्डिता चारी में तथा दाहिना पैर ' अपक्रान्ता ' चारी में रखे, फिर १. तूर्णेत्रिक - ० । २. विवर्तनम् - ख ० । ३. पविद्धश्च - ग ० । ४. वावृत्त - ख ० । ५. आद्यपृष्ठा - ख ० । ६. इतः प्रभृति साधंश्लोकद्वयं ग ० - पुस्तके नास्ति । ७. आद्यश्चास्कन्दितो- ख ० । ८. दङ्गित - ० ।
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द्वादशोऽध्यायः बाएं पैर से ‘ भ्रमरी ' और दाहिने पैर से स्यन्दिता चारी का पर पैरों को जोर से पटके तो ' अडित ' मण्डल होजाता है आद्यन्तु जनितं कृवा तेनैव च निकुट्टकम् स एव शकटास्यश्च वामश्चास्कन्दितो भवेत् पादैश्च शकटास्यस्थैः पर्यायेणाथ मण्डलम् विज्ञेयं शकटास्यन्तु व्यायामे युद्धमण्डलम् १२५ प्रदर्शन कर पृथ्वी ॥ ५६-५८ ॥ ॥। ५ ९ ॥
।
|| ६० ॥
शकटास्य- यदि दाहिने पैर द्वारा जनिता ' ' चारी को और फिर इसे तलसंचरपाद ( निकुट्टक ) लक्षण में गतिशील रखे, फिर इसी पैर से ‘ शकटास्य ' चारी तथा बाएं पैर से स्यन्दिता ( आस्यन्दिता ) चारी का प्रदर्शन करे । फिर शकटास्या चारी में दोनों पैरों के द्वारा क्रमशः गोल घुमाव ले तो ‘ शकटास्य ' मण्डल होता है । युद्धप्रदर्शन में इसी मण्डल की
योजना की जाती है ॥। ५ ९ -६० ॥
आद्यस्तु जनितो भूत्वा स एवास्कन्दितो भवेत् ।
अपसप पुनर्वामः शकटास्यश्च दक्षिणः ॥ ६१ ॥
भ्रान्त्वा चारीभिरेताभिः पर्यायेणाथ मण्डलम् ।
अध्यर्धमेतद्विज्ञेयं नियुद्धे चापि मण्डलम् ॥ ६२ ॥
अध्यर्ध - यदि दाहिने पैर द्वारा ' जनिता ' चारी तथा पुनः उसी से आस्कन्दिता चारी का प्रदर्शन करे, फिर बायां पैर अपक्रान्ता ( अपसर्पित ) चारी का तथा दाहिना पैर शकटाच्या चारी का रखे । चारियों में क्रमशः घुमते हुए मण्डल बनाया जाए तो उसे जानो । इसकी बाहुयुद्ध में योजना की जाती है ॥ ६१-६२ सूचीमाद्यक्रमं कृत्वा ह्यपक्रान्तश्च वामकम् भुजङ्गत्रासितश्चाद्य एवंमेव च वामकः भुजङ्गत्रासितैर्भ्रान्त्वा पादैरपि च मण्डलम् पिष्टकुट्टश्च विज्ञेयं चोरीभिर्मण्डलं बुधैः इस प्रकार इन ' अध्यर्ध ' मण्डल ॥
।
॥ ६३ ॥
।
॥ ६४ ॥
पिष्टकुट्ट – यदि दाहिने पैर द्वारा ' सूची ' चारी का तथा बाएं पैर से अपक्रान्ता चारी का प्रदर्शन करे, फिर दाहिने पैर से भुजत्रासिता चारी १. चारिमण्डलम् - ग ० । २. त्रासितञ्चान्य - ग ० । ३. एष एव तु — ग ० । ४. चारैरपि – ०। J ५. नियुद्धे चारिमण्डलम् - ग ० ।
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१२६ नाट्यशास्त्रम् का तथा बाएं पैर से भी इसी चारी का प्रदर्शन कर फिर दोनों भुजंगत्रासिता चारी वाले पैर वर्तुलाकार गति में घूमते हुए रखे तो इस चारी मण्डल को ' पिष्टकुट्ट ' जानों । इसे भी युद्ध प्रदर्शन में प्रयुक्त किया जाए ॥ ६३-६४ ॥
सर्वेश्चाषगतैः पादैः परिक्रम्य च मण्डलम् ।
एतच्चाषगतं विद्यान्नियुद्धे चापि मण्डलम् ॥ ६५ ॥
चाषगत —–यदि ' चाषगत ' चारी के पादों से गोल घुमाव लेकर मण्डल बनाए तो इसे चाषगत नामक मण्डल जानों । इसकी बाहुयुद्ध में योजना की जाए ॥ ६५ ॥
नानाचारीसमुत्थानि मण्डलानि समासतः ।
उक्तान्यतः परश्चैव समचारी नियोजयेत् ॥ ६६ ॥
समचारी प्रयोगो यस्तत् समं नाम मण्डलम् ।
आचार्यबुद्ध्या तानीह कर्तव्यानि प्रयोक्तृभिः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार अनेक चारियों के द्वारा निर्मित इन ' मण्डलों ' को मैंने संक्षेप में बतलाया । अब ' समचारी ' मण्डल के बारे में सुनिये । जिसमें सम चारियों का निरन्तर प्रयोग हो उसे ' सम ( चारी ) मण्डल ' जानों । नाट्याचार्य द्वारा निर्देशित विधाओं के अनुसार इनका प्रयोग किया जाए ।
एतानि खण्डानि समण्डलानि युद्धे नियुद्धे च परिक्रमे च ।
लीलाङ्गमाधुर्य पुरस्कृतानि कार्याणि वाद्यानुगतानि तज्ज्ञैः ॥ ६८ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे मण्डलविकल्पनं नाम द्वादशोऽध्यायः इस प्रकार इन मण्डलों को युद्ध, बाहुयुद्ध तथा घूमने में लीलापर्ण, तथा सुमधर अंगों का प्रदर्शन करते हुए प्रदर्शित किया जाए तथा वाद्यों की संगत के साथ इनका प्रदर्शन रखे ॥ ६८ ॥
भरतनाट्यशास्त्र का मण्डल विधान नामक द्वादश अध्याय समाप्त १. परिभ्राम्य - ग ० । २. चारिमण्डलम् - ग ० । ३. समचारीणि योजयेत् — ग ० । ४. एकादशोऽध्यायः - क ० ।
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त्रयोदशोऽध्यायः गतिप्रचार
एवं व्यायामसंयोगे कार्य मण्डलकल्पनम् ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि गतीस्तुं प्रकृतिस्थिताः ॥ १ ॥
चारियों के समुदाय से बनने वाले मण्डलों की विधि पिछले अध्याय में हम बतला आए हैं । अब यहां अभिनय के समय किये जाने वाली पात्रों की गतियों का वर्णन किया जा रहा है ॥ १ ॥
पात्रों का रंगमंच पर प्रवेश-तत्रोपवह कृत्वा भाण्डवाद्यपुरस्कृतम् ।
यथामार्ग रसोपेतं प्रकृतीनां प्रवेशने ॥ २ ॥
ध्रुवायां सम्प्रवृत्तायां पटे चैवापकर्षिते ।
कार्यः प्रवेशः पात्राणां नानार्थरससम्भवः ॥ ३ ॥
जब विविध वाद्यवादन के साथ मार्ग, कला एवं रसानुकूल -विचार को ध्यान में रखते हुए उपोहन - क्रिया सम्पन्न हो चुकी हो, त्रुगागान आरम्भ १. आचार्य अभि ० का मत है कि पात्रों की यह गतियाँ उनके स्वरूप, अवस्था रस, देश एवं काल को ध्यान में रखते हुए निर्देशित करना चाहिए । ( दृष्ट- गतिश्च प्रकृति रसमवस्थां देशं कालञ्चापेक्ष्य वक्तव्या ( अभि ० भा ० Vol II पृ ० १२ ९ ). २. उपवहन शब्द उपोहन शब्द का समानार्थक है । उपोहन क्रिया का वर्णन नाट्यशास्त्र खण्ड १ के पृष्ठ २०२ ( अध्याय ५।१८४ की टिप्पणी ) पर दिया जा चुका है । आचार्य अभिनव ने उपोहन की व्याख्या करते हुए कहा है – ' उपोह्यन्ते समासव्यासतः पदकालतालमभिहिताः स्वरा यस्मिन्नङ्गे तत्तथोक्तम् । ' ( Vol I पृ ० १८४ ) अर्थात् ध्रुवागान में रागप्रकाशनार्थं स्थायी स्वर पर आश्रित शुष्काक्षरों का परिग्रह और लघु आदि मात्रिक काल को व्यक्त करने के लिए १. सज्जातं - क ० । २. ऊर्ध्व - क ० । ३. गति तु प्रकृतिस्थिताम् — क ० । ४ तत्रोपवाहनं - ख ० । ५. यथामार्गकलोपेतं - क ० । ६. प्रवेशनम् - ग ० । ७. अवधर्षिते, अपघट्टिते - क ०, अपकर्षिता - ख ०, अवकर्षिते, अवघट्टिते - ग ० ।
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१२८ नाट्यशास्त्रम् हो चुका हो एवं जवनिका को हटाया जा चुका हो तो ऐसे अवसर पर अनेक अर्थ एवं रसों को उत्पन्न करने वाला पात्र - प्रवेश रंगमंच पर किया जाता है ॥ २-३ ॥ ( रंगमंच पर प्रवेश के समय ) उत्तम तथा मध्यमपात्रों की शारीरभङ्गिमा-स्थानन्तु वैष्णवं कृत्वा ह्युत्तमे मध्यमे पुनः । समुन्नतं समश्चैव चतुरस्तमुरस्तथा ॥ ४ ॥
बाहुशीर्षे प्रसन्ने च नात्युत्क्षिप्ते च कारयेत् ।
ग्रीवाप्रदेशः कर्तव्यो मयूराञ्चित- - मस्तकः ॥ ५ ॥
कर्णादेष्टाङ्गुलस्थे च बाहुशीर्षे प्रयोजयेत् ।
उरसश्चापि चिबुकं चतुरङ्गुल संस्थितम् ॥ ६ ॥
हस्तौ तथैव कर्तव्यौ कटिनाभितटस्थितौ ।
दक्षिणो नाभिसंस्थस्तु वामः कटितटे स्थितः ॥ ७ ॥
रंगमंच पर प्रवेश के समय उत्तम तथा मध्यमपात्र वैष्णवस्थान ( अ ० ११/५२, ५३ ) में स्थित रहते हैं । इस समय उनकी छाती सम, ताल का परिग्रह ही उपोहन है जिससे गीत आरम्भ होता हो । इसकी व्युत्पत्ति है— उपोह्यन्ते प्रयोगसूचनाभिनयद्वारेण सूच्यते यत्र तदुपोहनम् । ( अभि ० भा ० Vol IV पृ ० २१६ ) अर्थात् जिसमें प्रयोग या अभिनय के मध्य होने वाली वस्तु या कलिका के मध्य स्वर तथा कला के नियमनार्थं किया जाने वाला जो आलाप हो वही उपोहन है । ( उपोहन के विषय में ना ० शा ० ३१।१३ तथा वहाँ का विवेचन दृष्टव्य । इसके अतिरिक्त सङ्गीतरत्नाकर तालाध्याय में ५।५ ९ पर चतुर कल्लिनाथ का व्याख्यान भी दृष्टव्य है ( दृ ० संगी ० र ० अड्यार सं ० पृष्ठ ३१-३२ ) १. कार्यमुत्तमे - क ० । २. नाव्युत्क्षिप्ते - ख ० । ३. ग्रीवाप्रवेशः - ख ० । ४. मयूराङ्कित मस्तकः - ख ० । ५. कर्णाभ्यां बाहुशिरसी स्यातामष्टाङ्गुलस्थिते – क ०, कर्णादष्ठाङ्गुलिस्थे च - ग ० । ६. च कारयेत् — क ० । ७. उरसश्चापि देशाच्च चिबुकं चतुरङ्गुलम् - क ०, ऊपदेशश्च चिबुकं - ग ० । ८. सम्मितम् - क ० । ९. कटिं नाभि तु संस्थितौ - क, कटीनाभि — ग ० । १०. कटितस्थितः — क ०, कटितके स्थितः ख ० ।
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त्रयोदशोऽध्यायः १२ ९ ऊँची उठी हुई तथा चतुरख रहती है, बाहु तथा मस्तक उन्नत, गला मोर के समान सुन्दर तथा प्रसन्न; बाहु, कान तथा मस्तक से आठ अंगुल दूर, वक्षःस्थल से ठुड्डी चार अंगुल ऊँची और दाहिना तथा बायाँ हाथ क्रमशः नाभि तथा कटि पर स्थित होना चाहिए ॥ ४-७ ॥
पादों की ताल, कला और लय विधान-पादयोरन्तरं कार्य द्वौ तालावर्धमेव च ।
पादोत्क्षेपस्तु कर्तव्यः स्वप्रमाणविनिर्मितः ॥ ८ ॥
चतुस्तालो द्वितालञ्चाप्येकंतालस्तथैव च । ( उपर वर्णित स्थिति में ) पात्र अपने पैर ढाई ताल के अन्तर से उठाए तथा अपने डगों को हाथों के माप के अनुसार, दो तथा एक ताल के अन्तर से पृथ्वी पर रखें ॥ ८ - ९ ॥ चतुस्तालस्तु देवानां पार्थि न च च ॥ ९ ॥
द्वितालश्चैव मध्यानां तालः स्त्रीनीच लिङ्गिनाम् । देवता तथा राजा आदि उत्तम पात्रों को चार ताल के, मध्यम पात्रों को दो ताल के तथा स्त्री तथा नीचपात्रों को एक ताल के अन्तर से डग ( पृथ्वी पर ) रखना चाहिए ॥ ९ -१० ॥ ' चतुष्कलोऽथ द्विकलस्तथा ह्येककलः पुनः ॥ १० ॥
चतुष्कलो ह्युत्तमानां मध्यानां द्विकलो भवेत् ।
तथा चैकलः पातो नीचानां सम्प्रकीर्तितः ॥ ११ ॥
कला – इन डगों का पात्रानुसार चार कला, दो कला तथा एक कला का प्रमाण रखा जाता है । उत्तम पात्रों का चार कला, मध्यम पात्रों का दो कला तथा अधम पात्रों का एक कला का समय समझना चाहिए ॥ १०-११ ॥
स्थितं मध्यं द्रुतञ्चैव समवेक्ष्य लयं बुधः ।
यथाप्रकृति नाट्यज्ञौ " गतिमेवं प्रयोजयेत् ॥ १२ ॥
१. पादक्षेपस्तु - ख ०, पादोत्क्षेपश्च - ग ० । २. द्वितीयश्च - क ० । ३. तथा स्यादेकतालकः - क ० । ४. स्त्रीणाञ्च लिङ्गिनाम् — क ०, स्त्रीनीचसङ्गिनाम् — ख ० ग ० । ५. पद्मार्धमिदं ख ० - पुस्तके प्रक्षिप्तम् । ६. कलः पातो - ख ० । ७. पादो ग ० । ८. स्थिरं मध्यं समं - क ० । ९. समवेक्ष्य लयत्रयम् — ग ० । १०. गतिमेव — क ० । ६ ना ० शा ० द्वि ०