भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 221–230
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 221–230
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११० नाट्यशास्त्रम् बायें हाथ में ढाल को सामने रखते हुए तथा दाहिने हाथ में तलवार ( शस्त्र ) लेकर अभिनेता रंगमंच पर चले । फिर वह सामने की ओर हाथ को पूरा फैला दे और पीछे की ओर खींच ले और तब ढाल को पीछे आगे तथा दायें - बायें घुमाए, ( और ) फिर अपने मस्तक के चारों ओर तलवार या शस्त्र को घुमावे ( फिर ) उसे कपोल प्रदेश के समीप गोल घुमावे और फिर हाथ में तलवार तथा ढाल लेकर ललित क्रम से घुमाते हुए मस्तक के चारों ओर एक चक्कर लगाले । ( इस प्रकार ) शस्त्रों के चलाने में ' भारत ' न्याय के प्रदर्शन के समय इसी विधि से मंच पर चलना ( विचार ) चाहिए ॥
सात्वत-सात्वते तु प्रवक्ष्यामि प्रविचारं यथाविधि ।
स एवं प्रविचारस्तु शस्त्र खेटकयोः स्मृतः ॥ ८१ ॥
केवलं पृष्ठतः शस्त्रं कर्तव्यं खलु सात्वते । अब मैं सात्वतन्याय में होने वाली चाल को बतलाता हूँ । भारतन्याय के समान सात्वत न्याय में भी शस्त्र और ढाल की चाल वही होगी केवल इसमें शस्त्रों का घुमाना पीछे से होता है ॥ ८१-८२ ॥ वार्षगण्य-गतिश्च वार्षगण्येऽपि सात्वतेन क्रमेण तु ॥
शस्त्र खेटकयोश्चापि भ्रमणं संविधीयते ।
" शिरः परिगमस्तद्वच्छस्त्रस्येह भवेत्तथा ॥
उरस्युद्वेष्टनं कार्य शस्त्रस्यसेऽथवा पुनः । वार्षगण्य न्याय में भी सात्वत न्याय के क्रमानुसार २८ ॥ ८३ ॥ ही गति ( चाल ) रहती है । इसमें शस्त्र ( तलवार ) तथा ढाल को साथ साथ घुमाया जाता है और इन शस्त्रों को मस्तक का एक चक्कर लगाते हुए घुमाते हैं और इसके बाद शस्त्र छाती या कन्धे के सामने वाले स्थान पर घुमाये जाते हैं ॥८२-८१ ॥ कैशिक-भारते प्रविचारो यः कर्त्तव्यस्स तु कैशिके ॥ ८४ ॥
विभ्रमय्य तथा शस्त्रं केवलं मूर्ध्नि पातयेत् । १. एवं - ख — ग ० । २. शक्रं ग ० । ३. खड्ग — ख ० । ४. शिरः परिगमादस्मिस्तस्य शस्त्रस्य केवलम् - ख ० ग ० । ५. शस्त्रस्याङ्गेन वा पुनः ग ० । ६. प्रविचारोऽयं – ग ० । ७. विभ्रमश्च - ख ० ।
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एकादशोऽध्यायः १११ तलवार ( शस्त्र ) का छाती या कन्धों के पास घुमाना भारत न्याय जैसा कैशिक न्याय में भी ठीक उसी तरह से रखना चाहिए । इसमें केवल अन्त में शस्त्र को घुमाकर मस्तक के ऊपर ले जाया जाए प्रविचाराः प्रयोक्तव्या ह्येवमेतेऽङ्गलीलया ॥ धनुर्वजांसिशस्त्राणां प्रयोक्तव्या विमोक्षणे । शरीर की लीला युक्त हलचलों के साथ इन न्यायों के तलवार आदि शस्त्रों को घुमाना ( या चलाना ) चाहिए ॥ न भेद्यं नापि च च्छेद्यं न चापि रुधिरस्स्रुतिः र प्रहरणे कार्यो न चापि व्यक्तघातनम् । * संज्ञामात्रेण कर्तव्यं शस्त्राणां मोक्षणं बुधैः अथवाभिनयोपेतं कुर्याच्छेद्यं विधानतः । रंगमंच पर प्रदर्शित होनेवाले ( इन ) युद्धों में भेदन ॥ ८४-८५ ॥ ८५ ॥ द्वारा धनुष, वज्र, ८५-८६ ॥ ॥ ८६ ॥
॥ ८७ ॥
, छेदन और रक्त का बहना या यथार्थ प्रहार नहीं बतलाना चाहिए । यहाँ शस्त्रों को केवल नाट्य - संकेतों से छोड़ना चाहिए या फिर लक्षणों ( या अभिनय से सम्बद्ध विधान ) के अनुसार एक दूसरे को शस्त्रों के प्रहार से
जाए ॥। ८६-८८ ॥
सौष्ठव-अङ्गसौष्ठवसम्पन्नैरङ्गहारैर्विभूषितम् ॥ ८८ ॥
व्यायामं कारयेत् सम्यग्लयतालसमन्विर्तम् । " सौष्ठवे हि प्रयत्नस्तु कार्यो व्यायामवेदिभिः नहि सौष्ठवहीनाङ्गाः शोभते नाट्यनृत्तयोः । क्षतविक्षत किया ॥ ८ ९ ॥ यह व्यायाम ( स्वरूप चारी का प्रदर्शन ) अङ्गों के सौष्ठव तथा अंगहारों से पूर्ण होना चाहिए | इसके साथ ताल तथा लय से युक्त संगीत की भी योजना रहे । व्यायाम प्रदर्शन में सदा ' सौष्ठव ' का ध्यान रहना चाहिए । क्योंकि सौष्ठव से विहीन अङ्ग नाट्य तथा नृत्य में सौन्दर्य की सृष्टि नहीं कर सकते ॥ ८८ - ९ ० ॥ १. प्रविचाराश्च कर्त्तव्या - ग ० । २. वज्रादि - ग ० । ३. रङ्गप्रहरण- ग ० । ४. राज्ञा (? ) – ख ० । ५. अङ्गैः सौष्ठव — ग ० । ६. समन्वितः - ख - ग ० । ७. सौष्ठवेन तु यत्नस्तु – ग ० । ८. सेविभिः ग ० ।
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११२ नाट्यशास्त्रम् अचञ्चलमकुब्जञ्च संन्नगात्रन्तथैव च ॥ ९ ० ॥ नात्युच्चं च पादश्च सौष्ठवाङ्गं प्रयोजयेत् । शरीर को सीधे, न झुके हुए, यथेच्छ, न ऊँचे तने और हुए रखकर अङ्गों का सौष्ठव प्रदर्शित करना चाहिए ॥ ९ १ [ कटी कर्णसमा यत्र कूर्परांसं शिरस्तथा । " समुन्नतमुरश्चैव सौष्ठवं नाम तद्भवेत् । ] न अधिक झुके ॥ [ प्रक्षिप्त - जिसमें कटि प्रदेश तथा कान एक समान या सीधे हो, इसी प्रकार कलाई, कन्धे तथा मस्तक भी रहे, छाती थोड़ी ऊँची तनी रहे तो ' सौष्ठव ' समझना चाहिए । ] ॐ नित्यं प्रयतो हि विधेयो मध्यमोत्तमैः ॥ २१ ॥
नाट्यं नृत्तश्च सर्व हि सौष्ठवे सम्प्रतिष्ठितम् । मध्यम तथा उत्तम पात्रों द्वारा सौष्ठव को ( प्रयत्नपूर्वक ) ठीक प्रदर्शित करने का उद्योग करना चाहिए क्योंकि नाट्य, नृत्त तथा नृत्य ' सौष्ठव ' पर
ही आधारित हैं ।
चतुरस्र-कटीनाभिचरो हस्तौ वक्षश्चैव समुन्नतम् ॥ ९ २ ॥
वैष्णवं स्थानमित्यङ्गं चतुरश्रमुदाहृतम् ॥
( यदि ) दोनों हाथ, कटि तथा नाभि घूमने वाले हों, छाती तनी हो और वैष्णवस्थान हो तो ' अङ्गों ' का यह सारा एक साथ होने वाला प्रदर्शन ' चतुरस्र ' कहलाता है ॥ ९ २ - ९ ३ ॥ करण— ( के कार्य ) परिमार्जन दानं सन्धानं मोक्षणन्तथा ॥ ९ ३ ॥ धनुषस्तु प्रयोक्तव्यं करें णन्तु चतुर्विधम् । १. चासन्नगात्रं — ग ० । २. मथापि च । ३. चलपातं - ग ० । ४. कूपं रोंऽसस्थितः -- ग ० । ५. सौष्ठवं लक्षणं प्रोक्तवत्मना क्रमयोजितम् - - ग ० । ६. पद्यमिदं ग - पुस्तके नास्ति । ७. प्रपन्नो हि विधये - ख ० । ८. खरौ -- ग ० । ९. त्यङ्गचतुरस्र - ख ० । १०. संमार्जनं -- ख ० । ११. ग्रहणं क्रिया -- ख ग ० ।
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एकादशोऽध्यायः धनुष के चार कार्य ( करण ) प्रयुक्त होते हैं । यथा—- ( ( धनुष चलाने की तैयारी करना ), ( २ ) आदान ( बाणों का ( ३ ) सन्धान ( बाण को धनुष पर चढ़ाना ) तथा ( ४ ) मोक्षण ( छोड़ प्रमार्जनं परामर्श आदानं ग्रहणक्रिया ॥ सन्धानं शरविन्यासो विक्षेपो मोक्षणं भवेत् । धनुष का ( बाण छोड़ने के लिए ) झुकाना ' परिमार्जन ', ११३ १ ) परिमार्जन हाथ में लेना ),
देना ) । ९३-६४ ।
९ ४ ॥
बाण को छोड़ने के लिए ले लेना ' आदान ', धनुष पर बाण को चढ़ाना ' सन्धान ' तथा छोड़ देना ' मोक्षण ' जानो ॥ ९४-६५ ॥ व्यायाम विधि— तैलाभ्यक्तेन गात्रेण वामृदितेन च ॥ ९ ५ ॥ व्यायामं कारयेद् श्रीमान् भित्तावाकाशिके तथा । ( अङ्गहार तथा चारी के अभ्यासार्थ ) पृथ्वी पर या ऊँचे दुमंजिले भवन ( आकाशिके ) में व्यायाम करना चाहिए । इस समय अभिनेता शरीर पर तिल के तेल या जो की पीठी से मालिश करे ॥ ९ ५ - ९ ६ ॥ योग्या या मातृकाभित्तिस्तस्माद् भित्तिं समाश्रयेत् ॥ ९ ६ ॥ भित्तौ प्रसारिताङ्गन्तु व्यायामं कारयेन्नरम् । व्यायाम के लिए ' भूमि ' अधिक उपयुक्त होती है । इसलिए व्यायाम भूमि पर ही किया जाए । पृथ्वी पर शरीर को फैला कर व्यायाम करना चाहिए ॥ ९ ६ - ९ ७ ॥ बलार्थश्च निषेवेत नस्यं बस्तिविधिं तथा ॥ ९ ७ ॥
स्निग्धान्यन्नानि च तथा रसकं पार्नकन्तथा ।
आहाराधिष्ठिता प्राणाः प्राणे योग्या प्रतिष्ठिताः ॥ ९ ८ ॥
तस्माद् योग्य प्रतिष्ठार्थमाहारे यत्नवान् भवेत् । शरीर को शक्तिसम्पन्न रखने के लिए नस्य तथा बस्तिविधि ( जैसे आयुर्वेदशास्त्र के अनुसार कथित प्रयोगों ) का उपयोग करे तथा पुष्ट अत्र, मांस तथा ( द्राक्षा आदि ) फलों के रसों का भी सेवन करे । क्योंकि ' प्राण ' ( शक्ति - सम्पन्नता ) आहार पर निर्भर है और व्यायाम १. युवा श्वासोदितेन च — ग ० । २. योग्यायां - ख ० ग ० । ३. भित्तौ प्रसारितायां तु - ख ० । ४. नस्यं च त्रिविधं - ग ० । ५. स्निग्धान्यशनिताथा - ख ० । ६. पानकानि च - ख ० । ७. प्रसिद्धयर्थं - ख०-० । ना ० शा ० द्वि ०
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११४ नाट्यशास्त्रम् शक्तिसम्पन्नता पर । अतएव शक्तिसम्पन्न रहने के लिए उपयुक्त आहार का
( प्रयत्नपूर्वक ) सेवन करना चाहिए ।
अशुद्धकार्य प्रक्लान्तमतीव क्षुत्पिपासितम् ॥ ९९ ॥
अतिपीतं तथा भुक्तं व्यायामं नैव कारयेत् । जब शरीर स्वच्छ न हो, ( शरीर ) थका हुआ हो, भूख ( या ) प्यास लग रही हो, पानी ( काफी ) पी लिया हो ( या ) डटकर भोजन कर
लिया हो तो उस समय चारी व्यायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिए ।
अचलैर्मधुरैर्गात्रैश्चतुरश्रेण वक्षसा ॥ १०० ॥
व्यायामं कारयेद्धीमान्नरमङ्गक्रियार्थिनम् । योग्य शिक्षक अपने ऐसे शिक्षार्थियों को- जिनका शरीर सुन्दर, स्थिर हो वक्षस्थल चौखट जैसा विशाल हो -- अधिक अलकारों को धारण न किये हो- -व्यायाम की शिक्षा दें ॥ १००-१०१ ॥ एवं व्यायामसंयोगे कार्यश्चारीकृतो विधिः ॥ १०१ ॥
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि मण्डलानां विकल्पनम् ॥ १०२ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे चारीविवानो नामैकादशोऽध्यायः । शरीर के व्यायाम के साथ होनेवाली प्रदर्शन के इन चारी के ये ( ही ) नियम हैं । तदनुसार चारी का प्रदर्शन करना चाहिए । अब मैं विभिन्न मण्डलों का ( अगले अध्याय में ) वर्णन करूँगा ॥ १०१-१०२ ॥ भरत नाट्यशास्त्र का चारीविधान नामक एकादशोऽध्याय समाप्त । श्र फ १. क्रियात्मकम् - ख ० ग ० । २. चारीविधानो नाम दशमोऽध्यायः — क ० ।
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300 द्वादशोऽध्यायः मण्डलप्रचार
एताचार्यो मया प्रोक्ता यथावच्छस्त्रमोक्षणे ।
चारी संयोगजानीह मण्डलानि निबोधत ॥ १ ॥
हे मुनियों, मैंने पूर्व अध्याय में शस्त्रों के प्रयोग के साथ चारी विधान बतलाया । अब मैं ( इन ) चारियों के समूह ( मेल ) से बनने वाले मण्डलों
को बतलाता हूँ । ( आप इन्हें समझिए ) ॥ १ ॥
अतिक्रान्तं विचित्रञ्च तथा ललितसञ्चरम् ।
सूचीविद्धं दण्डंपादं विहृतालातके तथा ॥ २ ॥
वाम विद्धं सललितं कान्तञ्चाकाशगानिह । आकाशिक मण्डल दस हैं । यथा: - ( १ ) अतिकान्त, ( २ ) विचित्र, ( ३ ) ललितसंचर, ( ४ ) सूचीविद्ध, ( ५ ) दण्डपाद, ( ६ ) विहृत, ( ७ ) अलातक, ( ८ ) वामविद्ध, ( ९ ) ललित तथा ( १० ) क्रान्त ॥ २-३ ॥ भ्रमरास्कन्दिते स्यातामावर्तश्च ततः परम् समोत्सारितमप्याहुरेकाक्रीडितं तथा अडितं शकटास्यश्च तथाध्यर्धकमेव च पिटकुट्टञ्च विज्ञेयं तथा चाषगतं पुनः पतान्यपि दशोक्तानि भूमिगानिह नामतः अतः परं प्रवक्ष्यामि लक्षणानि यथाक्रमम् भौमिक मण्डल भी दस हैं । यथा: - ( १ ) भ्रमर, ( ( ३ ) आवर्त, ( ४ ) समोत्सारित, ( ५ ) एलकाक्रीडित, शकटास्या, ( ८ ) अध्यर्धक, ( ९ ) पिष्टकुट्ट तथा ( ( क्रमशः ) अब मैं इनके लक्षण बतलाता हूँ ॥ ४-६ ॥
।
॥ ४ ॥
।
॥ ५ ॥
।
॥ ६ ॥
२ ) आस्कन्दित, ( ६ ) अड्डिता, १० ) चाषगत । १. दण्डपादविहृता - ख ० – ग ० । २. वामबन्धं - ख०- ग ०! ३. काशगामि च - ख ० ग ० । ४. तथा परम् - ग ० । ५. समाक्रन्दित - ख ० - ग ० । ६. रेडका - ख०-० । ७. भूमिकामण्डला ह्येते लक्षणञ्च निबोधत - ग ० ।
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११६ नाट्यशास्त्रम् आकाशिक मण्डल – लक्षण
' आद्यं पादश्च जनितं कृत्वोद्वाहितमाचरेत् ।
अलातं वामकञ्चैव पार्श्वक्रान्तश्च दक्षिणम् ॥
सूची वामं पुनश्चैव त्रिकञ्च परिवर्तयेत् ।
तथा दक्षिणमुत्तमलातश्चैव वामकम् ॥
परिच्छिन्नन्तु कर्तव्यं बाह्यभ्रमरकेण तु ।
अतिक्रान्तं पुनर्वामं दण्डपादश्च दक्षिणम् ॥
७ ॥
८ ॥
९ ॥
* विशेयमेतद् व्यायामे त्वतिक्रान्तन्तु मण्डलम् । अतिक्रान्त - यदि ( आरंभ में ) दाहिने पैर से ' जनिता ' चारी प्रदर्शित करें फिर शकटास्या चारी का जिसमें वक्षःस्थल उद्वाहित हो । फिर बाएँ पैर से ' अलात ' तथा दाहिने पैर से ' पार्श्वकान्ता ' चारी का प्रदर्शन करे । फिर बाएँ पैर से ' सूची ' और भ्रमरी चारी को कमर का घुमाव लेते हुए प्रदर्शित करें । पुनः दाहिने पैर से उद्वाहित चारी तथा बाएँ पैर से अलात चारी को प्रदर्शित कर उसे भ्रमरी चारी में परिवर्तित कर फिर इसी बाएँ पैर से अलातचारी और दाहिने पैर द्वारा दण्डपाद चारी का प्रदर्शन करने पर यह ( नृत्य ) व्यायाम में होनेवाला अतिक्रान्तमण्डल होजाता है ॥७-१० ॥ आद्यन्तु जनितं कृत्वा तेनैव च निकुट्टनम् आस्पन्दितन्तु वामेन पार्श्वक्रान्तश्च दक्षिणम् वामं सूचीपदं दद्यादपक्रान्तश्च दक्षिणम् भुजङ्गत्रासितं वाममतिक्रान्तश्च दक्षिणम् " उद्वृत्तं दक्षिणश्चैव ह्यलातश्चैव वामकम् पार्श्वक्रान्तं पुनः सव्यं सूची वामक्रमं तथा विक्षेपो दक्षिणस्य स्यादपक्रान्तश्च वामकः [ बाह्यभ्रमरकञ्चैव विक्षेपञ्चैव योजयेत् ] विज्ञेयमेतद् व्यायामे विचित्रं नाम मण्डलम् ॥ १० ॥
।
॥ ११ ॥
।
॥ १२ ॥
॥। १३ ॥
। विचित्र - यदि दाहिने पैर को कंपाते हुए ' जनिता ' चारी का प्रदर्शन करे तथा उसे ही तलसंचर ( निकुट्टक ) पाद बनाए । फिर बाएँ पैर से १. आद्यपादं तु तं कृत्वा उद्वाहितमथाचरेत् — ग ० । २. सूचीपादं - ख ० - ग ० । ३. मुद्धृत्य अलातं - ख ० - ग ० । ४. पद्यार्धमेतत् क - ख- पुस्तकयोः नास्ति । ५. उद्धृतं - ख ० ग ० । ६. दपत्रान्तञ्च वामकम् - ख ० ग ० ।
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द्वादशोऽध्यायः ११७ स्पन्दिता चारी ( आस्पन्दिता ) तथा दाहिने पैर से पार्श्वकान्ता का ( फिर ) बाएँ पैर द्वारा ' सूचीचारी ' तथा दाहिने पैर से अपक्रान्ता चारी का, फिर बाएँ पैर से भुजंगत्रासिता चारी तथा दाहिने पैर से ' अतिकान्ता ' का फिर दाहिने पैर से उद्वृत्ता चारी का तथा बाएँ पैर से ' अलाताचारी ' का, फिर दाहिने पैर से पार्श्वकान्ता चारी तथा बाएँ से सूची का, फिर दाहिने पैर से ' विक्षिप्ता ( व आक्षिप्ता ) चारी का तथा बाएँ से अपक्रान्ता चारी का ( फिर बाहरी ओर से भ्रमरी तथा आक्षिप्ता चारी का ) प्रदर्शन करे तो ' विचित्र ' नामक मण्डल कहलाता है । ११-१४ ॥ कृत्वोर्ध्वजानु चरणमाद्यं सूचीं प्रयोजयेत् ॥ १४ ॥
अपक्रान्तः पुनर्वाम आद्यः पार्श्वगतो भवेत् ।
सूची पुनर्दद्यात् त्रिकञ्च परिवर्तयेत् ॥ १५ ॥
[ पार्श्वक्रान्तं पुनश्चाद्यमतिक्रान्तञ्च वामकम् । सूचीमाद्यक्रमं कृत्वा ह्यपक्रान्तञ्च वामकम् ॥ ] पार्श्वक्रान्तं पुनश्चाद्यमतिक्रान्तञ्च वामकम् ॥ १६ ॥
परिच्छिन्नञ्च कर्तव्यं बाह्यभ्रमरकेण च ।
एष चारीप्रयोगस्तु कार्यों ललितसरे ॥ १७ ॥
ललितसंचर - यदि दाहिना पैर अपनी जंघा को ऊपर उठाकर ' सूची ' का ( प्रदर्शन करे ) और बांया पैर ' अपक्रान्ता ' का तथा दाहिना पैर ' पार्श्वकान्ता ' का, ( फिर ) बांया पैर ' सूची ' चारी का प्रदर्शन कर भ्रमरी चारी का प्रदर्शन करे ( भ्रमरी चारी के समय पीठ को एक घुमाव देना चाहिए ) ( प्रक्षिप्त - फिर दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता तथा बाएं से अतिक्रान्ता का फिर दाहिने पैर से ' सूची ' तथा बाएं पैर से अपक्रान्ता का ) फिर दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता तथा बाएं पैर से अपक्रान्ता चारी को प्रदर्शित कर उसे भ्रमरी चारी में परिवर्तित ( परिच्छिन्न ) करे तो ' ललितसंचर ' मण्डल बन जाता है ॥ १६-१७ ॥ १. कृत्वोध्वं वामचरण - ख ० ग ० । २. वामसूची - ख ० ग ० । ३. सूचीवामक्रमं - ख - ग ० । ४. पुनश्चान्यो वामोऽतिक्रान्त एव च - ख ० ग ० । ५. हि - ख ० - ग ० । ६. सञ्चरैः - ख ० - ग ० ।
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११८ नाट्यशास्त्रम्
सूची वामपदं दद्यात् त्रिकश्च परिवर्तयेत् ।
पार्श्वक्रान्तः पुनश्चाद्यो वामोऽतिक्रान्त एव च ॥ १८ ॥
' सूचीमाद्यं पुनर्दद्यादपक्रान्तञ्च वामकम् ।
पार्श्वकान्तं पुनश्चाद्यं सूचीविद्धे तु मण्डले ॥ १ ९ ॥
सूचीविद्ध - यदि बाएं पैर से ' सूची ' को प्रदर्शित कर भ्रमरी चारी को प्रदर्शित करे ( अर्थात् शरीर को घुमाव दे दे ) फिर दाहिने पैर से पार्श्वकान्ता चारी का, बाएं पैर से अतिक्रान्ता चारी का, फिर दाहिने पैर से ' सूची ' चारी का और बाएं पैर से अपक्रान्ता चारी का तथा दाहिने पैर से भी अपक्रान्ता चारी का प्रदर्शन करे तो ' सूचीविद्ध ' मण्डल जानो ॥ १८-१९ ॥ आद्यस्तु जैनितो भूत्वा स च दण्डक्रमो भवेत् वामं सूचीं पुनर्दद्यात् त्रिकञ्च परिवर्तयेत् उद्वृत्तो दक्षिणश्च स्यादलातश्चैव वामकः पार्श्वकान्तः पुनश्चाद्यो भुजङ्गत्रासितस्तथा अतिक्रान्तः पुनर्वामो दण्डपादस्तु दक्षिणः वामः सूची त्रिकावर्ती दण्डपादे तु मण्डले दण्डपाद - यदि दाहिना पैर जनिताचारी प्रदर्शित कर
।
॥ २० ॥
।
॥ २१ ॥
।
॥ २२ ॥
दण्डपादा चारी को प्रदर्शित करे फिर बाये पैर से ' सूची ' को प्रदर्शित कर भ्रमरी चारी को प्रदर्शित किया जाए । फिर दाहिने पैर से उद्वृत्ता चारी का, बाएं पैर से अलाता चारी का, दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता चारी को, दाहिने पैर से ही दण्डपादाचारी को तथा बाएं पैर से सूची को प्रदर्शित कर त्रिक को घुमाव दे कर भ्रमरी चारी को प्रदर्शित करे तो ' दण्डपाद ' मण्डल
हो जाता है । २०-२२ ॥
आद्यन्तु जनितं कृत्वा तेनैव च निर्कुट्टकम् ।
आपदितञ्च वामेन ह्युद्वृत्तं दक्षिणेन च ॥ २३ ॥
अलातं वामकं पादं सूचीं दद्यात्तु दक्षिणम् ।
पार्श्वकान्तः पुनर्वाम आक्षिप्तो दक्षिणस्तथा ॥ २४ ॥
१. श्चान्यो– ख ० ग ० । २. एतत् पद्यार्धं ख- पुस्तके नास्ति । ३. तद्गतो - ख ० । ४. तद्वत्तो- ख ०, उद्वर्तो- ग ० । ५. श्चान्यः - ग ० । ६. निकुट्टनम् - ख ० - ग ० । ७. आस्कन्दितञ्च - ख ० - ० । ८ ह्युत्तमं - ख ०; उद्धत्तं ग ० । ९. क्रान्तं - ख ० - ० ।
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द्वादशोऽध्यायः ११ ९
समवर्त्य त्रिकश्चैव दण्डपादं प्रसारयेत् ।
सूची वामपदं दद्यात् त्रिकञ्च परिवर्तयेत् ॥ २५ ॥
भुजङ्गत्रासितश्चाद्यो वामोऽतिक्रान्त एव च ।
एष चारी प्रयोगस्तु विहृते मण्डले भवेत् ॥ २६ ॥
विहृत - यदि दाहिने पैर द्वारा जनिता चारी का तथा इसी पैर द्वारा तलसंचर पाद ( निकुट्टन ) का, फिर बाएं पैर से स्पन्दिता ( आस्कन्दिता ) तथा दाहिने पैर से उद्वृत्ता चारी का, फिर बाएं पैर से अलात चारी का और दाहिने पैर से सूची का, फिर बाएं पैर से पार्श्वकान्ता चारी का तथा दाहिने पैर से आक्षिप्ता का प्रदर्शन कर भ्रमरी चारी प्रदर्शित करे फिर एक घुमाव लेकर या त्रिक को परिवर्तित कर दण्डपादा चारी, फिर बाएं पैर से सूची और भ्रमरी चारी का ( त्रिक को घुमाकर ) प्रदर्शन करे फिर दाहिने पैर से भुजंगत्रासिता चारी तथा बाएं पैर से अतिक्रान्ता चारी का प्रदर्शन करने पर ' विहृत ' मण्डल हो जाता है ॥ २३-२६ ॥
सूचीमद्यकमं दद्यादपक्रान्तञ्च वामकम् ।
पार्श्वकान्तः पुनश्चाद्यो ह्यलातश्चैव वामकः ॥ २७ ॥
' भ्रान्त्वा चारीभिरेताभिः पर्यायेणाथ मण्डलम् ।
षट्संख्यं सप्तसंख्यं वा ललितैः पादविक्रमैः ॥ २८ ॥
[ ' आद्यं कुर्यादपक्रान्तमतिक्रान्तञ्च वामकम् । ]
" अपक्रान्तः पुनश्चाद्यो वामोऽतिक्रान्त एव च ।
पादभ्रमरकश्च स्यादलाते खलु मण्डले ॥ २ ९ ॥
अलात - दाहिने पैर से ' सूची ' चारी का तथा बाएं पैर से अपक्रान्ता चारी का, फिर दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता चारी और बाएं पैर से अलाता का फिर इन्हीं चारियों से क्रमशः ललितपाद विन्यासों द्वारा छः या सात बार घुमाव लेना चाहिए । ( प्रक्षिप्त दाहिने - पैर से अपक्रान्ता तथा बाएं १. परिवृत्य - ग ० । २. सूचीवामपदं — ग ० । ३. विवृते - ख ० । ४. सूचीमाद्यं क्रमं - ख ० । ५. कृत्वा चापक्रान्तं ग ० । ६. पार्श्वक्रान्तस्ततश्चान्योऽप्यलात - ग ० । ७. इतः प्रभृति साधै पद्यत्रयं ग ० - पुस्तके नास्ति । ८. तत् संख्यं - ख ० ९. एतत् पद्यार्धं ख ० - पुस्तके नास्ति । १०. अतिक्रान्तः - ख ० ।