भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 261–270

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 261–270

पृष्ठ 261

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१५० नाट्यशास्त्रम् उसी प्रकार सूचित हो जाता है जैसे अंकुश के हाथ में लेने पर हाथी की, पावड़ी लगाने पर घोड़े की तथा रास लेने पर रथ की अभिव्यक्ति होती है । ( अतएव नौका गमन अनुकरणात्मक क्रियाओं के द्वारा अभिनीत किया जाए ) ॥ १०५-१०७ ॥

अश्वाधिरोहण - गति-अभ्वयाने गतिः कार्या वैशाखस्थानकेन तु ।

तथा चूर्ण पदैश्चित्रैरुपर्युपरि - पातितैः ॥ १०८ ॥

घुड़सवारी या घोड़े पर चढ़ते हुए पात्र की गति वैशाखस्थान तथा शीघ्रता से उठाई जाने वाली डगों ( चूर्णपदैः ) की जाए ॥ १०८ ॥

सर्पगति-पन्नगानां गतिः कार्या पादैः स्वस्तिर्कसंयुतैः पार्श्वकान्तं पदं कृत्वा स्वस्तिकं रेचयेदिह सर्पों की गति ' स्वस्तिक ' पदों के द्वारा की जाए पार्श्वक्रान्ता चारी को प्रदर्शित कर फिर स्वस्तिक पदों द्वारा प्रदर्शित ॥। १० ९ ॥ जिसमें पहिले के रेचक द्वारा अभिनय प्रस्तुत नाट्यधर्मिता के द्वारा करना चाहिए ॥ १०६ ॥

१ नौकाभिनय के इस भाग से यह स्पष्ट हो जाता है कि सादे रंगमंच पर कई कार्य तथा दृश्य शारीरिक अनुकरण पर ही प्रदर्शित किये जाते थे । तद्नुसारी दृश्यों से चित्रित पर्दों आदि से सुसज्जित मंच पर नहीं । आचार्य अभिनवगुप्ता-चार्य ने चित्रपट ( दृश्याङ्कित पर्दो ) के बिना भी उक्त अभिनय के प्रदर्शन करने की सहमति प्रदर्शित की है तथा चित्रपट द्वारा बतलाने का उल्लेख भी किया है । ' तेन चित्रपटादिवियोगेऽपि रथगमनाद्यभिनयं नायुक्तम् । सौकर्या तु तत्क-रणमपि भवत्विति भावः ॥ ( अभि ० Vol. II, पृ ० १५४ ) १. इचैव – क ०, तथा तूर्णंप दैश्चित्तै– ख ० । २. संस्थितैः — क ०; संज्ञितैः — ख ० । ३. पार्श्वकान्तक्रमं कृत्वा स्वस्तिकं योजयेत्तथा क ० । ४ कुर्यात् - -क ० । प्रा

पृष्ठ 262

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त्रयोदशोऽध्यायः १५५

विटगति-विटस्यापि च कर्तव्या ' गतिर्ललितविभ्रंमा ।

पादैरो कुश्चितैः किञ्चित्तालाभ्यन्तरपातितैः । ११० ॥

स्वसौष्ठवसमायुक्तौ तथा हस्तौ पदानुगौ ।

खटकावर्धमानौ तु कृत्वा विटॅगतिं व्रजेत् ॥ १११ ॥

विटे पात्र की गति ' ललित विलासित ' होती है । विट की गति को अभिनेता ' कुंचित ' पाद को एक ताल के अन्दर से रखते हुए ' खटकावर्धमानक ' हाथों तथा सौष्ठवयुक्त अंगों द्वारा पैरों की गति के अनुसार हाथों को गतिशील हुए अभिनीत करे ॥ ११०-१११ ॥

कञ्चुकी - गति-कञ्चुकीयस्य कर्तव्या वयोऽवस्था विशेषतः ।

अवृद्धस्य प्रयोगज्ञो गतिमेवं प्रयोजयेत् ॥ ११२ ॥

अर्द्धतालोत्थितैः पादैर्विष्कम्भैर्ऋजुभिस्तथा ।

समुहन्निवाङ्गानि पङ्कलग्न इव १२ व्रजेत् ॥ ११३ ॥

' केचुकी ' ( अन्तःपुर रक्षक ) की गति उसकी अवस्था तथा स्थिति १. विट - कलाविद् तथा वेशोपचार कुशल व्यक्ति जो राजा या राजपरिवार का प्रच्छन्न सेवक ( और कभी यह खलनायक का सेवक ) भी होता है । २. कञ्चुकी – कचुकी का कार्यं अन्तःपुर - रक्षण, कवच आदि लाना ले जाना तथा वेत्रधारण करना होता है । कंचुकी का लक्षण भावप्रकाशन में उसके उपर्युक्त स्वरूपानुसार प्राप्त होता है-अकामा ब्राह्मणाश्चैव कंचुकोष्णीषवेत्रिणः । ज्ञान - विज्ञान - सम्पन्ना कल्चुकीया स्मृता बुधैः ॥ ( भा ० प्र ० बड़ौदा सं ० पृ ० २ ९ २ ) १. गतीर्ललितविक्रमाः - क ० । २. विक्रमा - ख ० । ३. किञ्चिदाकुञ्चितैः पादैः —क ० । ४. राकुचिता – क ० । ५. रङ्गसौष्ठवसंयुक्तं तथा – क ० । ६. कटिस्थितौ —क ० । ७. कार्या विटे गतिः क ० । ८. गतिः काल्चुकिनी प्रोक्ता - क ० । ९ वृद्धे वा मध्यमे वापि तथा चैव कनीयसि —क ० । १०. तदा — क ० । ११. उद्वहन्निव गात्राणि - क; समुद्वहंस्तथाङ्गानि - ख ० १२. व्रजन् - क ० ।

पृष्ठ 263

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१५२ नाट्यशास्त्रम् के अनुकूल रखना चाहिए । यदि कंचुकी युवक हो तो उसकी गति अर्ध ताल पर उठने वाले सीधे पैरों से साधारण गति रखनी चाहिए । वह अपने शरीरावयवों को कीचड़ से सने व्यक्ति की तरह बतलाते हुए अपनी गति प्रदर्शित करे ॥ ११२-११३ ॥

अथ वृद्धस्य कर्त्तव्या गतिः कम्पितदेहिका ।

विष्कम्भनकृतप्राणा मन्दोत्क्षिप्तपदक्रमा ॥। ११४ ॥

यदि वह वृद्ध हो तो शरीर को घुमाते हुए तथा धीरे - धीरे पैरों को उठाते हुए लकड़ी पर शरीर को टिकाकर ( प्रत्येक ) कदम रखे ॥ ११४ ॥

कृश, व्याधिग्रस्त तथा श्रान्त गति-कुंशस्यापि हि कर्तव्या गतिर्मन्दपरिक्रमा ।

व्याधिग्रस्ते ज्वरा च तपःश्रान्ते क्षुधान्विते ॥

विष्कम्भनकृतप्राणः कृशः क्षामोदरस्तथा ।

क्षामस्वरकपालश्च दीनने त्रस्तथैव च ॥

शनैरुत्क्षेपणञ्चैव कर्तव्यं हस्तपादयोः ।

कम्पनश्चैव गात्राणां क्लेशनश्च तथैव हि ॥

११५ ॥

११६ ॥

११७ ॥

कञ्चुकी का वृद्ध होना आवश्यक नहीं क्योंकि नाट्यरचनाओं में उसके दोनों स्वरूप प्राप्त हैं । अवृद्ध कञ्चुकी का प्रतिमा, स्वप्न, वासवदत्त आदि अविमारक, आदि में तथा वृद्ध कंचुकी का शाकुन्तलं, वेणीसंहार आदि नाटकों में उल्लेख मिलता है | अतः वृद्धावस्था में कंचुकी - पद दिये जाने का कोई नियम नहीं है तथा सभी नाट्यरचनाओं में सम्प्राप्त उक्तियों के आधार पर इसकी नियुक्ति अवृद्धावस्था या वृद्धावस्था में होने की पुष्टि भी होती है । १. विष्कम्भितगतिप्राणा क; विष्कम्भेन कृतप्राणा - ख ०; २. कृशाङ्गानां तु — क ० कृशस्याप्यभिनेया वै - ख ०, ग ० ३. मन्दपदक्रमा ग ० । ४. व्याधिग्रस्तो ज्वरात्तंश्च तपःश्रान्तः क्षुधान्वितः - क ०; च तथा तपः शान्तस्य चैव हि ग ० । ५. विष्टम्भन गतप्राणस्तथा क्षामोदरस्तथा— क ० । ६. सन्नगात्रस्तथैव च – क ० । ७. हस्तपादसमुत्क्षेपं शनैस्तत्र प्रयोजयेत् — क ० ।

८. श्लथनञ्चैव योजयेत् — क ० ।

ग ० ॥

व्याधित्रस्तस्य

पृष्ठ 264

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त्रयोदशोऽध्यायः १५३ कृशपात्र की गति धीरे - धीरे पैर उठाकर चलते हुए प्रदर्शित की जाए । रुग्ण ( व्याधिग्रस्त ) ज्वरार्त, तपः क्लेशित तथा क्षुधाग्रस्त पात्र की गति में उसे किसी लकड़ी के सहारे चलने वाला, कृशकाय, खाली पेट ( या सिकुड़े हुए पेट ) वाला क्षीणस्वर, पिचके गाल तथा डबडबायी आँखोंवाला बतलाना चाहिए । यह अपने हाथ और पैरों को धीरे - धीरे उठाता हुआ चले । इसका शरीर घूमता हुआ तथा डग भरते समय प्रत्येक कदम पर साँस लेता हुआ प्रदर्शित किया जाए ॥ ११५-११७ ॥ पथिक— ( लम्बी यात्रा करने वाले पात्र की ) गति-दूरीध्वानं गतस्यापि गतिर्मन्द परिक्रमा | विकूणनश्च गात्रस्य जानुनोश्च विमर्दनम् ॥ ११८ ॥

यात्रा पर निकले हुए या बहुत दूर चल कर आए हुए व्यक्ति की गति धीरे - धीरे डग भरते, शरीर को झुकाते तथा जंघाओं को दबाते हुए प्रदर्शित करनी चाहिए ॥ ११८ ॥

स्थूल - गति-स्थूलस्यापि हि कर्त्तव्या गतिर्देहानुकर्षिणी ।

मन्दोत्क्षिततपदक्रमा ॥ ११ ९ ॥

विष्कम्भगामी च भवेन्निश्वासबहुलस्तथा ।

श्रम स्वेदाभिभूतश्च व्रजेच्चू र्णपदैस्तथा ॥ १२० ॥

स्थल या मोटे पुरुष की गति धीरे - धीरे पैर रखकर बहुत भारी वजन ' ढोने की चेष्टा करते हुए पुरुष के समान प्रदर्शित की जाए । यह चलते समय जोरों से साँस लेता हुआ, थोड़ा सा श्रम करने पर पसीने से लथपथ तथा सादी चाल ( चूर्णपद ) वाला प्रदर्शित किया जाए ॥। ११ ९ -१२० ॥ १. प्रकर्तव्याध्वगस्यापि — क ०, दूराध्वगस्यापि गतिः - क ०; । २. मन्दपदक्रमा क ०, ग ० । ३. विकूणनेन वक्त्रस्य जानुनोश्च विमर्शनात् — क ० । ४. समुद्रहितगात्रा च विलम्बितपदक्रमा - क ० । ५. विष्कम्भगामिनी चैव निश्वासबहुला तथा क ० । ६. अतिक्रान्ता च कर्तव्या क ० । ७. तथा चूर्णपदैः सदाक; व्रजेत् तूर्णंपदैस्तथा - ख ० ।

पृष्ठ 265

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१५४ नाट्यशास्त्रम्

मत्त - गति-मत्तानान्तु गतिः कार्या मंदे तरुणमध्यमे ।

वामदक्षिणपादाभ्यां घूर्णमानाऽपसर्पणैः ॥ १२१ ॥

मद्यपान में तरुण तथा मध्यम मद की अवस्था वाले पात्र की गति बायें तथा दाहिने पैर को घुमाते या लड़खड़ाकर आगे - पीछे ले जाते हुए चलने वाली प्रदर्शित करनी चाहिए ॥ १२१ ॥

अवकृष्टे मदे चैव ह्यनवस्थितपादिका ।

विघूर्णितशरीरा च करैः प्रस्खलितैस्तथा ॥। १२२ ॥

मद्यपान में अधम मद की अवस्था वाले पात्र की गति पैरों को पृथ्वी अनियमित तौर से रखते, शरीर को ( चारों ओर ) डोलाते तथा हाथों को घुमाते हुए प्रदर्शित करना चाहिए ॥ १२२ ॥

उन्मत्त गति-उन्मत्तस्यापि कर्तव्या गतिस्त्वनियतक्रमा बहुचारीसमायुक्ता लोकानुकरणाश्रया रूक्षस्फुटितकेशश्व रजोर्ध्वस्ततनुस्तथा अनिमित्तप्रकथनो बहुभाषी विकारवान् गायत् कस्माद्धसति सङ्गे चापि न सज्जते नृत्यत्यपि च संहृष्टो वादयत्यपि वा पुनः कदाचिद्धावति जवात् कदाचिदवतिष्ठते कदाचिदुपविष्टस्तु शयानः स्यात् कदाचन ॥। १२३ ॥ ॥। १२४ ॥ ॥ १२५ ॥

॥। १२६ ॥ १. तरुणे मध्यमे मदे; क ० ( भ ० ) मन्दे, पदे – क ० । २. घूर्णमानोऽपसर्पणैः, घूर्णमानापसर्पणात् – क ० । ३. अवकृष्टमदे, अपकृष्टे मदे - क; आकाश स्खलितैः प्रायः पादैश्चाप्यन-वस्थितैः – क ०; अवकृष्टे पदे – ख ० । ४. प्रचलितैः– क; पदैः प्रस्खलितैरथ - ख ०; ग ० । ५. गतिस्तु नियत — क ०, ग ०; गतिस्त्वभिनय क्रमात् —ख ० । ६. रेणुध्वस्त - क ० । ७. विकारवाकू - क ० । ८. प्रगीत हसितश्चापि नानाविकृतभूषणः । नृत्ये गीते च वाद्ये च भाषणे च सदा रतः ॥ —क ० ( भ ० ) । ९. शयानश्च कदाचन - क ०; शयितः स्यात् कदाचन - ग ० ।

पृष्ठ 266

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त्रयोदशोऽध्यायः १५५

रथ्यास्वनियतालयः ।

उन्मत्तो भवति ह्येवं तस्यैतांङ्कारयेद् गतिम् ॥ १२७ ॥

स्थित्वा नूपुरपादेन दण्डपादं प्रसारयेत् ।

बद्धौञ्चारीन्तथा चैवङ्कृत्वा स्वस्तिकमेव च ॥ १२८ ॥

अनेन चारीयोगेन परिभ्राम्य तु मण्डलम् ।

बाह्यभ्रमरकञ्चैव रङ्गकोणे प्रसारयेत् ॥ १२ ९ ॥

त्रिकं सुर्वलितङ्कृत्वा लताख्यं हस्तमेव च ।

विपर्यय गतैर्हस्तैः पद्भ्यां सह गतिर्भवेत् ॥ १३० ॥

उन्मत्त ( पागल ) पात्र की गति में पैरों को अनियन्त्रित दशा में ( रखते हुए ) लोक क्रियाओं के अनुकरण पर अनेक चारी को प्रदर्शित करते हुए रखना चाहिए । इस पात्र के बाल रूखे तथा बढ़े हुए, तथा शरीर धूल से सना हुआ होता है । अकारण ही यह बोलने तथा अप्राकृतिक प्रकार से चिल्लानेवाला होता है । यह कभी गाता और कभी हँसता है । इसे किसी का साथ नहीं सुहाता । ( तथा बार - बार रोता है — पाठान्तर से अर्थ ) । यह कभी प्रसन्न होकर नाचता है, कभी कुछ बजाने लगता है । कभी जोर से दौड़ता, कभी ठहर जाता है । कभी बैठा रहता तथा कभी लेट जाता है । यह अनेक वस्त्र पहिने हुए रहता है । उन्मत्त पात्र का यही स्वरूप होता है । इसकी गति निम्न विधि के अनुसार रहे - जिसमें सर्वप्रम यह ' नूपुरपाद ' पैर में स्थित होकर फिर उसे ' दण्डपादा ' दशा में फैला दे फिर ' बद्धा ' चारी को प्रदर्शित कर पैरों को ' स्वस्तिक ' दशा में रखे । इसी प्रकार चारों दिशाओं में घूमकर ' मण्डल ' बनाकर अभिनय करे ( अर्थात् एक चक्करदार घुमाव ले ले ) और फिर पीठ को चारों ओर घुमाते हुए लता हस्तों का अव्यवस्थित रूप में पैरों की गति के साथ हाथों को हिलाते हुए प्रदर्शन करे ॥ १२३-१३० ॥ १. उन्मत्ताभिनयस्त्वेवं तस्येमां कारयेद् गतिम् — क ० २. तस्य तां कारयेद् -क ० । ३. कृत्वा चारों तथोद्वद्वामथ स्वस्तिकमेव चक ० ४. परिक्रम्य चतुर्दिशम् — ग ० । ५. वक्रन्तु भ्रमणञ्चैव रङ्गकोणेषु योजयेत् - क ० । ६. सललितं - क; सुललितं - ग ० । ७. पादै हंसगति व्रजेत् — क ० ।

पृष्ठ 267

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१५६ नाट्यशास्त्रम् खंज ( लँगड़ा ), पंगु ( लूला ) तथा वामन ( बौने ) त्रिविधा तु गतिः कार्या खज्जपङ्गुकवामनैः विकलाङ्गप्रयोगेण कुइँकाभिनयं प्रति एकः खञ्जगतौ नित्यं स्तब्धो वै चरणो भवेत् तथा द्वितीयः कार्यस्तु पादोऽग्रतलसञ्चरः स्तब्धेन स्थापन कार्यमङ्गस्य चरणेन तु गमनेन निषण्णः स्यादन्येन चरणेन तु इतरेण निषीदेव क्रमेणानेन वै व्रजेत् एषा खञ्जगतिः कार्या तलशल्यक्षतेषु च

पात्रों की गति-।

॥ १३१ ॥

॥। १३२ ॥

॥ १३३ ॥

॥। १३४ ॥

अवयवों की विकलता ( कमी या दोष ) के द्वारा हास्य उत्पन्न करने के लिए लँगड़े, लूले तथा बौने पात्र की गति तीन प्रकार ( की स्थितियों वाली ) रखी जाती है । ( प्रथम प्रकार की दशा में ) लँगड़े पुरुष की गति में एक पैर स्तब्ध रहता है । ( दूसरे प्रकार की स्थिति में ) दूसरे पैर को ' अग्रत-लसंचर ' कर उससे डग भरी जाए तथा स्तब्ध पैर पर शरीर का भार रहे । ( तीसरी बार की स्थिति में ) शरीर को उसी के सहारे आगे बढ़ाते हुए दूसरे पैर से बैठा या चला जाए । लँगड़े पात्र के चलने - बैठने में यही क्रम रखा जाए । किसी पात्र के पैर तले चोट, कील या काँटा लगने पर भी इसी गति का प्रदर्शन करना चाहिए ॥ १३१-१३४ ॥

" पादेनाग्रतलस्थेन " गतिः कार्याऽञ्चितेन तु ।

निषण्णदेा पोस्तु नतजङ्घा तथैव च ॥ १३५ ॥

१ हासे त्वथगतिः कार्या तथा खञ्जनवामने - क ० ( भ ); विविधानुगतिः - क ० । २. द्विकलार्धप्रयोगेषु — क ० । ३. कुहना – क ० । ४. खजे गतिस्तु कर्त्तव्या स्तब्धैकचरणाश्रया — क ० । ५. नित्यः स्तब्धो - क ० । ६. नोन्नमनं - क ०; नोद्वाहनं - ख । ७. गमने च निषण्णः क ० । ८. विषण्णः ग ० । ९. दन्यो न चरणेन तु — ग ० । १०. एष खन्जप्रयोगेषु तलशल्यक्षते तथा - क ० । ११. पादेनाग्रतलेनाथ — क ० । १२. अञ्चितेन व्रजेत्तथा - ग ० । १३. निषण्णदेहा कर्तव्या - क ० ।

पृष्ठ 268

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त्रयोदशोऽध्यायः १५७

सर्वसङ्कुचिताङ्गा च वामने गतिरिष्यते ।

न तस्य विक्रमः कार्यों विक्षेपश्चरणस्य च ॥ १३६ ॥

सोद्वाहिता चूर्ण पदे सा कार्या कुहकात्मिका । पंगु पात्र की गति ' अप्रतलसंचर ' तथा अंचितपाद कर बैठे हुए तथा जंघा को मोड़कर चलते हुए बतलाई जाती है । वामन ( बौने ) पात्र की गति में सारे अंग सिकुड़े हुए रखते हैं, पैर शीघ्रता से बड़ी डग नहीं भर पाते तथा जोर से पृथ्वी पर पटके नहीं जाते । यह साधारण चाल में उचक कर चलते हुए दर्शकों विदूषक गति— विदूषकस्यापि गतिर्द्धास्यत्रयविभूषिता अङ्गकाव्यकृतं हास्य हास्यं नेपथ्यजं स्मृतम् दन्तुरः खलतिः कुब्जः खञ्जश्च विकृताननः यदीशः प्रवेशः स्यादङ्गहास्यन्तु तद्भवेत् यदा तु बकवद् गच्छेदुल्लोकितविलोकितैः अत्यायतपदत्वाच अङ्गहास्यो भवेत्त ' सः इसी प्रकार विदूषक की गति भी ( हास्य उत्पन्न को हँसाता है ॥ ॥ १३७ ॥

॥ १३८ ॥

॥ १३ ९ ॥

। करने के लिए ) साधारण प्रकार की रखना चाहिए, जिसमें तीन प्रकार के हास्य रहते हों । ये हास्य अंगों के विकार से होने वाले, ( उच्चारित वाक्यों के ) शब्दों द्वारा ( काव्यकृतं ) होने वाले तथा वेश से ( नेपथ्यजं ) होने वाले होते हैं । इन हास्यों में यदि विदूषक भद्दे और बड़े दाँतवाला ( दन्तुर ), गंजा, कुबड़ा, लँगड़ा तथा वदसूरत हो तो शरीर के द्वारा उत्पन्न हास्य होने से ऐसा हास्य ' अंगजहास्य ' कहलाता है । यदि यही ऊपर - नीचे ( तथा दाँएँ-बाँएँ ) देखते हुए बगुले के समान चले और लम्बी - लम्बी डग भरे तो उसे भी ' अंगहास्य ' कहते हैं ॥ १३७-१४० ॥ १. सङ्कोचिताङ्गी च क ०; २. न तस्यातिक्रमः कार्यो क ० । ३. उद्वाहिता चूर्णपदैः क ० । ४. समन्विता - ग ० । ५ अङ्गहास्यं कार्यंहास्य हास्यं नेपथ्यजं तथा — क ०; अङ्गवाक्यकृतं हास्य — ग ० । ६ कुब्ज: खज्जोऽथ खलतिदन्तुरो विकृताननः —क ० । ७. यत्तादृशो भवेद् विप्राः अङ्गहास्यन्तु तद्भवेत् - -क ० । ८. पदत्वाच्चाप्यङ्गहास्यो — क ० । ९. भवेत् स तु ग ० ।

पृष्ठ 269

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१५८ नाट्यशास्त्रम् विज्ञेयमसम्बद्धं प्रभाषणैः ॥ १४० ॥

अनर्थकैर्विकारैश्च तथा चाश्लील भाषणैः । असम्बद्ध प्रलाप, अश्लील भाषा तथा निरर्थक शब्दों के अप्राकृतिक प्रकार से ( विकारैः ) उच्चारण किये जाने पर ' काव्यहास्य ' ( या शब्दज - हास्य )

होता है । १४०-१४१ ॥

चीरचर्ममषीभस्मगैरिकाद्यैस्तु मण्डितः ॥ १४१ ॥

यस्तादृशो भवेद्विप्रा हास्यो नेपथ्यजस्तु सः । यदि चिथड़े, चमड़े से मढ़ा तथा स्याही, राख या गेरू से रँगा हुआ पात्र हो तो ' नेपथ्यज हास्य ' कहलाता है ॥ १४१-१४२ ॥ तस्मात् प्रकृतिं ज्ञात्वा भावं कार्यञ्च तत्वतः ॥ १४२ ॥

गतिप्रचारं विभजेन्नानावस्थान्तरात्मकम् । अतएव प्रसंगानुसार पात्र की प्रकृति का विचार करते हुए तथा भाव और कार्यों को समझते हुए अनेक अवस्थाओं से युक्त इन ( भावों वाली ) एक या अनेक विदूषक की गतियों को आवश्यकतानुसार प्रदर्शित करना चाहिए । विदूषक गति उसकी विभिन्न अवस्थाओं के अनुसार प्रकट करनी चाहिए या विभाजित करते हुए रखनी चाहिए ॥ १४२-१४३ ॥ स्वभावजायां विन्यस्य कुटिलं वामके करे ॥ १४३ ॥

तथा दक्षिणहस्ते च कुर्याच्चतुरर्कम्पुनः ।

पार्श्वमेकं शिरश्चैव हस्तोऽर्थं चरणस्तथा ॥ १४४ ॥

पर्यायशः " " सन्नमयेल्लयतालवशानुगः । १. वाक्य हास्य – ग ० । २. मसम्बद्धप्रभाषणात् ग ० । ३. अनर्थवाक्यैविविधैस्तथा — क ० । ४. गैरिकादिविभूषणैः – क ०; गैरिकाद्यैस्तु मण्डितः —ग ० ५. यत्तादृशो भवेद्विप्राः हास्यं नेपथ्यजं तु तत् - क ०: ६. तस्य तु प्रकृति ज्ञात्वा तथा भावं विचक्षणः —क ० । ७. दक्षिणचैव हस्तञ्च कुर्याच्चतुरकं तथा — क ० । ८. चतुरकं ततः — ग ० । ९. शिरश्चापि - क ० ।

१०. हस्तं चरणमेव च कः करः सचरणस्तथा ग ० ।

११. पर्यायतः क ० । १२. सन्नमेत - क ० ॥

पृष्ठ 270

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त्रयोदशोऽध्यायः १५ ९ इस पात्र की स्वाभाविक अवस्था में रहने वाली ' गति ' में बाएँ हाथ में ' कुटिलक ' ( दण्डकाष्ठ जो टेढ़ा होता है ) का धारण तथा दाहिने ` हाथ से ' चतुर ' मुद्रा का प्रदर्शन होता है । इसके अतिरिक्त वह अपनी एक कोख, मस्तक तथा हाथ - पैरों को लय तथा ताल के अनुसार झुकाता हुआ चलता है ॥ १४३-१४५ ॥ स्वभावजा तु तस्यैषा गतिरन्या विकारजा ॥ १४५ ॥

अलभ्य लाभाद्भुक्तस्य स्तब्धा तस्य गतिर्भवेत् । इस स्वाभाविक गति के अतिरिक्त ( इसकी ) दूसरी विकारज गति भी होती है । इस गति का अलभ्य भक्ष्य ( लड्डू आदि पक्वाच ) के या

मूल्यवान् वस्तु के प्राप्त होने पर स्तब्ध होकर प्रदर्शन किया जाता है ।

दासादि गति-कार्या चैव हि नीचानां चेटादीनां परिक्रमात् ॥ १४६ ॥

- अधमा इति ये ख्याता नानाशीला ते पुनः ।

पार्श्वमेकं शिरश्चैव करः सचरणस्तथा ॥ १४७ ॥

गंतौ नमेत चेटानां दृष्टिश्वार्थविचारिणी । नीच तथा चेट आदि अनेकविध स्वभाव के अधम पात्रों की गति का प्रदर्शन करना चाहिए । सेवकों की गति चारों ओर घूमते हुए एक कोख, सिर, हाथ या पैर झुकते हुए और उनकी आँखें विभिन्न वस्तुओं पर टिकने वाली ( चंचल ) रखना चाहिए ॥ १४६-१४८ ॥ शकार गति-शकारस्यापि कर्तव्या गतिञ्चञ्चलदेहिका ॥ १४८ ॥

वस्त्राभरणसंस्पर्शोर्मुहुर्मुहुरवेक्षितैः ।

गात्रैर्विकारविक्षिप्तैर्लम्बवस्त्रस्रंजा तथा ॥ १४ ९ ॥

गर्विता चूर्ण पदां शकारस्य गतिर्भवेत् । १. स्वभावजाता - क ० । २. लाभे तथा च भुक्तस्य तुष्टे चापि गतिर्भवेत् — क ० । ३. कार्या चैव तु हीनानां चेव्यादीनां द्विजोत्तमाः - क ० । ४. नानाशीलाः कुवृत्तयः क ० । ५. करं चरणमेव च - क ० । ६. नामयेत्तद्गतौ किञ्चित्कुजन्मा चेटसंज्ञितः - क ० । ७. वज्राभरणसंस्पर्शे - क ० । ८. वस्त्रसृजस्तथाग ० । ९. चूर्णं पादस्य – क; चूर्णंपादा- ग०-