भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 271–280

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 271–280

पृष्ठ 271

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१६० नाट्यशास्त्रम् शकार की गति अहंकार पूर्ण तथा साधारण डगों ( चूर्णपाद ) वाली होती है । यह चलते समय अपने वस्त्र तथा अलंकारों को छूता या बार - बार कभी - कभी देखता हुआ चलता है । यह अस्वाभाविकता से अपने अंगों को उठा कर तथा लटकने वाली अपनी माला तथा वस्त्रों को फटकारता हुआ चलता है ॥ १४८-१५० ॥ नीचपात्र गति-जात्यां नीचेषु योक्तव्या विलोकनपरा गतिः ॥ १५० ॥

असंस्पर्शाच लोकस्य स्वाङ्गानि विनिगूह्य च । नीच कुल में उत्पन्न पात्रों की गति चारों ओर आँखों को घुमाते हुए तथा दूसरों से शरीर को सिकुड़ा कर स्पर्श न करते हुए चलने वाली रखना चाहिए || १५०-१५१ ॥ म्लेच्छ गति-म्लेच्छानां जातयो यास्तु पुलिन्देशबरादयः ॥ १५१ ॥

तेषां देशानुरूपेण कार्य गतिविचेष्टितम् । म्लेच्छों तथा ( इसी प्रकार ) पुलिन्ध्र, शबर आदि जातियों की गति उनके आचार, जाति, स्वभाव तथा देश के अनुार रखनी चाहिए ॥ १५१ ॥

पशु - पक्षी गति-पक्षिणां श्वापदानाश्च पशूनाश्च द्विजोत्तमाः ॥ १५२ ॥

स्वस्वजातिसमुत्थेन स्वभावेन गतिर्भवेत् । पक्षियों, हिंस्र जानवरों तथा चौपायों की गति उनकी अपनी प्रकृति तथा चेष्टाओं के अनुसार प्रदर्शित की जाए ॥ १५२-१५३ ॥ सिंहर्क्षवानराणाञ्च गतिः कार्या प्रयोक्तृभिः ॥ १५३ ॥

या कृता नरसिंहेन विष्णुना प्रभविष्णुना । सिंह, रीछ तथा वानर जैसे पात्रों की गति को —जो भगवान् विष्णु द्वारा नरसिंह अवतार में की गई थी - इस प्रकार प्रदर्शित करना चाहिए ॥ आलीढं स्थानककृत्वा गात्रन्तस्यैव चानुगम् ॥ १५४ ॥

जानूपरि करं ह्येकमंपरं वक्षसि स्थितम् । १. जातिनीचेषु — क ० । २. कर्तव्या - क ० । ३. अत्यस्पर्शाच्च - ग ० । ४. पुलिन्दाद्याः द्विजोत्तमाः क ० ।. गतिविचारेण क ०, ग ० । ६. विचेष्टितैः - क ० । ७. स्वभावे प्रतियोजयेत् — क ० । ८. आलीढ़स्थानकं — क ०, ग ० । ९. चैकमपरं — ग ० ।

पृष्ठ 272

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त्रयोदशोऽध्यायः १६१ अवजोक्य दिशः सर्वाश्चिबुकं बाहुमस्तके ॥ १५५ ॥

गन्तव्यं विक्रमैर्विप्राः पञ्चतालान्तरोत्थितैः । ( इसमें ) आलीढ़ स्थान को प्रदर्शित कर शरीर को उसी गति के अनुसार रखे । एक हाथ को घुटने पर तथा दूसरे को वक्षस्थल पर रखकर चारों ओर एक बार ठुड्डी को कन्धे पर रखते हुए तथा क्रूर दृष्टि से देखते हुए एवं पैरों को पाँच ताल के अन्तर से रखते हुए चले ॥ १५४-१५६ ॥ नियुद्धसमये चैव रङ्गावतरणे तथा ॥ १५६ ॥

सिंहादीनां प्रयोक्तव्या गतिरेषा प्रयोक्तृभिः । सिंह आदि ( पात्रों ) की यही गति रंगमंच पर प्रवेश तथा उनके युद्ध के समय भी प्रदर्शित करनी चाहिए ॥ १५६-१५७ ॥ शेषाणामर्थयोगेन र्गंति स्थानश्च योजयेत् ॥ १५७ ॥

वाहनार्थप्रयोगेषु रङ्गावतरणेषु शेष प्राणियों की गति तथा स्थानों की योजना च उनके । मंच पर अवतरित होने, पीठ पर किसी वस्तु के ढोने, चढ़ाने आदि अर्थों के प्रदर्शन में उपयुक्त स्वरूप के अनुसार करनी चाहिए ॥ १५७–१५८ ॥ एवमेताः प्रयोक्तव्या नराणांङ्गतयो बुधैः ॥ १५८ ॥

नोक्ता या या मया ह्यत्र ग्राह्यास्तास्ताश्च लोकतः ।

अतः परं प्रवक्ष्यामि स्त्रीणां गति विचेष्टितम् ॥। १५ ९ ॥

इस प्रकार विभिन्न प्राणियों की ये गतियाँ चतुर पात्रों द्वारा अभिनीत की जाएँ । जिन प्राणियों की गति मेरे द्वारा इस प्रसंग में न बतलाई जा सकी हो उन्हें स्वयं बुद्धि द्वारा लोक व्यवहार को देखते हुए प्रदर्शित किया जाए । अब मैं स्त्रियों की गति तथा चेष्टाओं का वर्णन करता हूँ । १. विलोलितं शिरः कृत्वा - क ० । २. दिशः कृत्वा चिबुकं - ग ० घ ० । ३. विक्रमैश्चैव पञ्चतालान्तरस्थितैः क ० । ४. नियुद्धे संशये चैव —क ० । ५. च योक्तव्या — क ० । ६. स्थानान्यपि च कारयेत् — क ० । ७. स्थाने च ग ० । ८. अतः परं गजवाजिरथादींस्तु चिह्नमात्रेण कारयेदित्यधिकम् - क ० पुस्तके । ९. नृणान्तु गतयो बुधैः-: क ० । १०. अत्र नाभिहिता यास्तु विज्ञेया शास्त्रलोकतः - क ०; नोक्ताश्च या मया न ग्राह्मास्ता अपि लोकतः - ग ० घ ० । ११ ना ० शा ० द्वि ०

पृष्ठ 273

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१६२ नाट्यशास्त्रम् गति के समय स्त्रियों की शारीरिक स्थिति-स्त्रीणां स्थानानि कार्याणि गतिष्वाभाषणेषु च । अश्वक्रान्तमथापि च ॥। १६० ॥ आयतञ्चावहित्थञ्च स्त्रियों के भाषण तथा गति के समय होने वाले तीन स्थान होते हैं- ( १ ) आयत, ( २ ) अवहित्थ तथा ( ३ ) अश्वक्रान्त ॥ १६० ॥

दक्षिणस्तु समः पादस्त्रयश्रः पक्षस्थितोऽपरः ।

समुन्नतकटिश्वायते स्थानके भवेत् ॥ १६१ ॥

वामः - दाहिना पैर ' सम ', बायाँ पैर तिरछा होकर एक ताल के आयत उठा हुआ तथा बायीं ओर कमर उठी हुई होने पर अन्तर से एक बाजू ' आयत ' स्थान होता है ॥ १६१ ॥

आवाहने विसर्गे च चिन्तायाञ्चावहित्थे च रङ्गावतरणारम्भः मन्मथेभ्यद्भवं कोपं निषेध गर्वगाम्भीर्यमौनं

तथा निर्वर्णनेषु च ।

स्थानमेतत्प्रयोजयेत् ॥

पुष्पाञ्जलिविसर्जनम् ।

तर्जन्यङ्गुलिमोटनम् ॥

मानावलम्बनम् । स्थानेऽस्मिन् संविधातव्यं दिगन्तरनिरूपणम् १६२ ॥ १६३ ॥ ॥। १६४ ॥ इस स्थान की योजना निमन्त्रण देने, पुकारने, आवाहन, विदाई या त्याग ( विसर्ग ) करने, ध्यानपूर्वक देखने ( निर्वर्णने ), चिन्ता करने तथा २. ष्वाभरणेषु च — ग ० । १. तथाश्वक्रान्तमेव च क ०; अश्वक्रान्तमथापि वा — ग ० । ३. वामो नतः कटीपार्श्वमायते स्थानके भवेत् — क ० । ४. अतः परं क ० पुस्तके आयतस्थान लक्षणं मित्थं दृश्यते-वामः स्वभावतो यत्र पादो विरचितः समः । तालमात्रान्तरे न्यस्तस्त्यश्रः पक्षस्थितोऽपरः ॥

प्रसन्नमाननमुरः समं यत्र समुन्नतम् ।

लतानितम्ब हस्तौ स्थानं ज्ञेयं तदायतम् ॥

५. निर्वहणेषु च - क ० । ६. वतरगारम्भं — क ० । ७. यद्भवः कोपः — क ० । ८. तर्जनाङ्गुलि — ख ०

९. मौनमायावलम्ब - क ०; मौनमानाव - ख ।

१०. सन्निधानीयं — क ० ॥

पृष्ठ 274

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त्रयोदशोऽध्यायः १६३ छल - कपट करने ( अवहित्थ ) में की जाए । इसी प्रकार रंगमंच पर सर्वप्रथम प्रवेश करने, रंगमंच पर पुष्पाञ्जलि बिखेरने, ईर्ष्यायुक्त प्रणय ( दर्शाने ) में क्रोध करने तथा तर्जनी के ऐंठने ( या मुड़ाव करने ) ( मोटनम् ); निषेध, गर्व, गम्भीरता, मौन तथा मान ( प्रणय कोप ) धारण करने तथा क्षितिज ( दिगन्तर ) के अवलोकन में भी इसी स्थान की योजना

की जाए । १६२-१६५ ॥

संमो यत्र स्थितो वामत्र्यः पक्षस्थितोऽपरः ।

समुन्नत कटिर्वामस्त्ववहित्थन्तु तद्भवेत् ॥ १६५ ॥

अवहित्थ ( स्थान ) – बांयाँ पैर ' सम ', दाहिना पैर एक बाजू में रखा हुआ तथा कमर बायीं ओर उठी हुई रखने स्थान होता है ॥ १६५ ॥

स्त्रीणामेतत्स्मृतं स्थानं संल्लापे तु स्वभावजे ।

निश्चये परितोषे च वितर्के लजिते तथा ॥

विलास लीलाविब्वोक शृङ्गारात्मनिरूपणे ।

स्थानमेतत्प्रयोक्तव्यं भर्तृमार्गावलोकने ॥

तिरछा होकर पर ' अवहित्थ ' १६६ ॥ १६७ ॥ इस स्थान की योजना स्त्रियों के स्वाभाविक संताप ( पारस्परिक संभाषण ), निश्चय, अतिहर्ष, वितर्क ( या संयोग ), लज्जायुक्त होने, विलास, लीला, विब्बोक, शृङ्गार तथा इसी सदृश अन्य रसों के प्रदर्शित करने तथा प्रियतम की बाट जोहने में की जानी चाहिए ॥ १६६-१६७ ॥ पादः समुत्थितश्चैक एकश्चाग्रतलाञ्चितः । १. समस्थितो वामपादस्त्र्यत्रतालान्तरोऽपरः- क ० । २. वामोन्नतं त्रिकं यस्मिन्नवहित्थं तु क ० क ० ग ० - पुस्तकयोरवहित्य-स्थानस्यापरं लक्षणमपि दृश्यते-पुरो विचलितस्त्रयश्रस्तदन्योऽपसृतः समः । पादस्तालान्तरन्यस्तस्त्रि कमीषत्समुन्नतम् 11

पाणिताख्यो यत्रैकस्तदन्यस्तु नितम्बगः ।

अवहित्थं समाख्यातं स्थानमागमभूषणैः ॥

३. स्थानमेतत्तु नारीणां क ० । ४. विवाहलीलालावण्ये - ग ० विलासलीलालावण्ये -- घ ० । ५. शृङ्गारादिनिरूपणे - ग ० । ६. तथा मार्गाव - ग ० ७. एकः समस्थितः पाद एकस्त्वत्र तलाञ्चितः क ० । घ ० ।

पृष्ठ 275

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१६४ नाट्यशास्त्रम् सूचीविद्धमविद्धं वा तदश्वक्रान्तमुच्यते अश्वक्रान्तस्थान — यदि एक पैर उठा हुआ, दूसरा पैर ( दूसरा पैर उसके पंजे पर रखे हुए ) स्थिति में सूची या में हो अथवा न हो तो ( भी ) ' अश्वकान्त ' स्थान होता है शाखावलम्बने कोर्ये स्तबकग्रहणे तथा विश्रामेष्वथ नीचानां नारीणाञ्चार्थयोगतः योजना — इस स्थान के द्वारा वृक्ष की टहनी को छूने, ॥ १६८ ॥

' अग्रतल ' संचर आविद्धा चारी ॥ १६८ ॥

॥ १६ ९ ॥

गुच्छे को ग्रहण करने, अधम पात्र के विश्राम लेने तथा स्त्रियों के किसी प्रयोजन को उसके अर्थानुसार प्रदर्शन किया जाता है ॥ १६६ ॥

स्थानकन्तावदेव स्याद्यावश्चेष्टा प्रवर्तते ।

भग्न स्थानकं नृत्ते चारी चेत् समुपस्थिता ॥ १७० ॥

एवं स्थानविधिः कार्यः स्त्रीणां नृणामथापि च ।

पुनश्चासां प्रवक्ष्यामि गतिं प्रकृतिसंस्थिताम् ॥ १७१ ॥

ये ‘ स्थान ' किसी चेष्टा के प्रारंभ करने के पूर्व तक ही ( केवल कुछ क्षण तक ) किसी अभिनेत्री ( नर्तकी ) द्वारा प्रदर्शित किये जाएँ परन्तु इसी प्रकार ' नृत्त ' में चारी का प्रदर्शन प्रारंभ करने पर ' स्थान ' समाप्त कर देना चाहिए । ( अर्थात् चारी के पूर्व ही ' स्थान ' का प्रदर्शन किया जाए । ) पुरुष तथा स्त्रियों के लिए ' स्थान ' के ये ही नियम हैं । अब मैं स्त्रियों की उन गतियों को बतलाता हूँ जो उनके स्वभावानुसार होती हैं ॥ १७०-१७१ ॥ युवती स्त्रीगति-कृत्वावहित्थं स्थानन्तु वामञ्चाधोमुखं भुजम् । १. अस्मात् परं क पुस्तकेऽधिकं पद्यट्टयं लभ्यते । तद्यथा-स्खलितं घूर्णितं चैव गलिताम्बरधारणम् । कुसुमस्तवकादानं परिरक्षणमेव च ॥ वित्रासनं सललितं तरुशाखावलम्बनम् । स्थानेऽस्मिन् संविधानीयं स्त्रीणामेतत् प्रयोक्तृभिः ॥ इति । २. कार्याक ० । ३. विश्रान्तिषु तथैव स्यात् पादताडन एव चक ० । ४. देवानां दाराणाञ्चात्र योगतः - ख ०; ग । ५. भग्नेऽवस्थानके - क ० । ६. स्त्रीणां सम्यग् द्विजोत्तमाः– क ० । ७. पुनरासां — क ० । ८. गतस्तु प्रकृतिस्थिताः - क ० । ९. करम् - ख ०, ग ० घ ० ।

पृष्ठ 276

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त्रयोदशोऽध्यायः नाभिप्रदेशे विन्यस्य सम्यञ्च कटकामुखम् ततः सललितं पादं तालं मात्रसमुत्थितम् दक्षिणं वामपादस्य बाह्यपार्श्वे विनिक्षिपेत् तेनैव समकालञ्च लताख्यं वाकं भुजम् दक्षिणं विनमेत्पार्श्व न्यसेन्नाभितटे ततः नितम्बे दक्षिणङ्कृत्वा हस्तश्चोद्वेष्ट्य वामकम् । ततो वामपदं दद्यात हस्तञ्च दक्षिणम् लीलयोद्वाहितेनाथ शिरसानुगतेन १६५ ॥ १७२ ॥

॥ १७३ ॥

॥ १७४ ॥

॥ १७५ ॥

किञ्चिन्नतेन गात्रेण गच्छेत्पञ्चपदीं ततः

च ॥। १७६ ॥

( युवती स्त्री की गति में क्रमशः स्थान एवं कार्यों को इस प्रकार प्रदर्शित करते हैं ), सर्व प्रथम ' अवहित्थ ' स्थान को प्रदर्शित कर बांयी भुजा ( बाएँ हाथ ) को नीचे की ओर हाथ वाली रखे और दाहिना हाथ ' कटकामुख ' मुद्रा में नाभि पर रखे । फिर दाहिने ' ललित - संचर ' पाद को एक ताल के प्रमाण पर उठाए और उसे बायें पैर के बगल में रखे, फिर बाएं हाथ को उसी समय ' लता ' मुद्रा में नाभि पर रखकर दाहिनी कोख को झुकावे, फिर दाहिने हाथ को नितम्ब पर तथा बाएँ हाथ को ' उद्वेष्टित ' मुद्रा में करे । फिर बाएं पैर को आगे बढ़ाए और दाहिने हाथ को ' लता ' मुद्रा में रखे ( इस प्रकार स्थान तथा क्रियाओं के प्रदर्शनोपरान्त ) फिर शरीर को थोड़ा झुका कर तथा मस्तक को ' उद्वाहित ' हुए पांच कदम चले ॥ १७२–१७६ ॥

यों विधिः पुरुषाणान्तु रङ्गपीठपरिक्रमे ।

स एव प्रमदानां वै कर्तव्यो नाट्ययोक्तृभिः ॥

रंच मंच पर पुरुष पात्रों के चलने की जो विधि है वही भी समझना चाहिए ॥ १७७ ॥

षट्कलन्तु न कर्तव्यं तथाष्टकलमेव च । १. तालमात्रं समु — क ० । २. बाह्ये पार्श्वे – क ० । ३. समतालाख्यं क ० । ४. वामपादकमक ० । ५. च नयेत् पाश्व - क; विनयेत् — क ० ( म ० ) । ६. लतापादञ्च - क ० । ७. शिरसोऽनुगतेन च - ख ०; मुद्रा में रखते १७७ ॥ स्त्रियों के लिए ग ० । ८. चाङ्गेन – क ० । ९. सार्धः श्लोकः ख ० ग ० पुस्तकयोर्नास्ति । १०. षट्कलं तत्तु कर्त्तव्यं - क ०; षट्कलं न प्रयोक्तव्यं - क ० ( भ ) ।

पृष्ठ 277

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१६६ नाट्यशास्त्रम् पादस्व पातनं तज्ज्ञैः खेदन ' तद्भवेत् स्त्रियाः ॥ १७८ ॥

स्त्रियों की डग छः या आठ कला के प्रमाण वाली नहीं रखनी चाहिए क्योंकि ऐसी डग स्त्रियों को थका देती है तथा प्रदर्शन करने में भी बड़ा आयास करना होता है ॥ १७८ ॥

सयौवनानां नारीणामेवं कार्या गतिर्बुधैः ।

स्थानीया या स्त्रियस्तासां सम्प्रवक्ष्याम्यहं गतिम् ॥ १७ ९ ॥

युवती स्त्रियों की गति इसी प्रकार की रहनी चाहिए ।

( प्रौढ़ा ) स्त्रियों की गति बतलाता हूँ ॥ १७ ९ ॥

प्रौढ़ास्त्री गति-कृत्वावहित्थं स्थानन्तु वामं न्यस्य कटीतटे आद्यञ्चारालमुत्तानं कुर्यान्नाभिस्तनान्तरे न निषण्णं न च स्तब्धन्न चापि परिवाहितम् कृत्वा गात्रं ततो गच्छेत्तेनैवेह क्रमेण तु अब मैं मध्या ॥। १८० ॥

॥ १८१ ॥

ये ' अर्वाहत्थ ' स्थान को बाएं हाथ को कटि पर तथा दाहिने हाथ को ‘ अराल ' मुद्रा में ऊपर की ओर मुंह करते हुए नाभि तथा स्तनों के मध्य रखते हुए प्रदर्शित करने के पश्चात् शरीर को ढीला हिलते डुलाते हुए ( उसी प्रकार ) चलें ॥ १७ ९ -१८१ ॥ दासी ( प्रेष्या ) की गति-प्रेष्याणामपि कर्तव्या गतिरुड्रान्तगामिनी किञ्चिदुन्नमितैर्गाचैराविर्द्धभुजविक्रमा स्थानङ्कृत्वावहित्थञ्च वामञ्चाधोमुखं भुजम् नाभिप्रदेशे विन्यस्य सव्यश्च खटकामुखम् , स्थिर और न ॥। १८२ ॥

॥ १८३ ॥

दासियों की ' गति ' भ्रान्ति के कारण ऊपर देखते हुए रखी जाए । वे शरीर को थोड़ा तान कर भुजाओं को घुमाती हुई रहें । ( अर्थात् भुजाओं को ' आविद्ध ' दशा में रखें ) । ये ' अवहित्थ स्थान ' को बाएँ हाथ को नीचे तथा दाहिने हाथ को ' कटकामुख ' मुद्रा में रखते हुए प्रदर्शित करते हुए ( उपर्युक्त नियमानुसार ) चलें ॥ १८२-१८३ ॥ ११. खेदने – क ० । १. स्थवीयसीनामेतासां - ख ०; ग ० । २. कृत्वापविद्धं - ख ०; ग ० । ३. तेनैवाद्य क्रमेण तु क ० । ४. गतिविभ्रान्त — क ० । ५. राविद्धपदविक्रमा - क ०; आविद्धगतिविक्रमा - ख ० ६० ।

पृष्ठ 278

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त्रयोदशोऽध्यायः १६७

नपुंसक गति-अर्धनारीगतिः कार्या स्त्रीपुंसाभ्यां विमिश्रिता ।

उदात्तललितैर्गात्रैः पादेर्लीलासमन्वितैः ॥ १८४ ॥

नपुंसक पात्र की गति में पुरुष तथा स्त्री पात्र की मिश्रित ' गति ' रहनी चाहिए । ये शरीर को उदात्त तथा ललित हलचल में रखते हुए लालित्यपूर्ण डग भरें ॥ १८४ ॥

यो पूर्वमेवाभिहिता ह्युत्तमानाङ्गतिर्मया ।

स्त्रीणां कापुरुषाणाञ्च ततोऽर्धार्धन्तु योजयेत् ॥ १८५ ॥

पहिले मैंने उत्तम पुरुष तथा स्त्री पात्रों की गति में जो समय बतलाया उसका आधा भाग स्त्रियों ( दासी आदि स्त्रियों ) तथा उसका भी आघा भाग नपुंसकपात्र की गति के लिए रखा जाए ॥ १८५ ॥

मध्यमोत्तमनीचानां नृणां यद्गतिचेष्टितम् ।

स्त्रीणान्तदेव कर्तव्यं ललितैः पदविक्रमैः ॥ १८६ ॥

उत्तम, मध्यम, तथा अधम पुरुष पात्रों की जो ' गति ' बतलाई गई वही गति ( उत्तम, मध्यम तथा अधम ) स्त्रीपात्र की भी होती है स्त्री पात्र के डग ' ललितसंचरपाद ' स्थिति में रखे जाते हैं ॥ बालगति-बालानामपि कर्तव्या स्वच्छन्दर्पदविक्रमा । न तस्यां सौष्ठवं कार्य न प्रमाणं प्रयोक्तृभिः बालकों की गति उनके इच्छानुसार रखी जाए । इसमें न समय - प्रमाण ( तालानुसारिता आदि ) रहता है ॥ १८७ नपुंसक ( अथवा स्त्री - पुरुष - लक्षणधारी पात्र ) गति-तृतीया प्रकृतिः कार्या नाम्ना चैव नपुंसका । नरस्वभावमुत्सृज्य स्त्रीगतिं तत्र योजयेत् ॥ १. पदैर्लीला – ख ० । २. या मयाभिहितापूर्व – क ०; या पूर्वमेव विहिता - घ ० । ३. गतिर्बुधाः - क ० ( म ० ) । ४. तदर्धेन तु — क ० । ५. उत्तमाधममध्यानां - क ० । ६. गतिविक्रमा - ख; १८६ ॥ ॥ १८७ ॥

न सौष्ठव और ॥ १८८ ॥ ग ० । ७. तस्या: - ख; ग ० । ८ न प्रमाणं तथाविधम् - क ० । ९. नपुंसके – क ० ।

पृष्ठ 279

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१६८ नाट्यशास्त्रम् जो नपुंसक पात्र हैं उनमें पुरुष पात्र से विलग कर ' स्त्री ' पात्र की ' गति ' की योजना करनी चाहिए ॥ १८८ ॥

भूमिका परिवर्तन में पात्रों की गति -' विपर्ययः प्रयोक्तव्यः पुरुषस्त्रीनपुंसकैः । स्वभावमात्मनस्त्यक्त्वा तद्भावगमनादिह ॥ १८ ९ ॥ पुरुष, स्त्री तथा नपुंसक पात्रों ने यदि अपना स्वरूप परिवर्तन कर जिस वेष को धारण किया हो उसी के अनुरूप तब उन्हें ' गति ' का प्रदर्शन करना चाहिए ॥

व्याजेन क्रीडया वापि तथा भूयश्च वञ्चनात् ।

स्त्री पुंसः प्रकृतिं कुर्यात् स्त्रीभावं पुरुषोऽपिच ॥ १ ९ ० ॥

धैर्योर्येण सत्वेन बुद्धया तद्वच्च कर्मणा ।

स्त्रीपुमांसं त्वभिनयेद् वेषवाक्यविचेष्टितैः । १ ९ १ ॥

पुरुष स्त्री का तथा स्त्री पुरुष का वेष ( परिवर्तन ) व्याज, क्रीडा तथा धोखा देने के लिए करें । स्त्री पुरुष का अभिनय करते समय धैर्य, औदार्य, सत्व, बुद्धि और उपयुक्त वेष, वचन तथा कार्यों का प्रदर्शन करें ॥१ ९०-१९ १ ॥

स्त्रीवेषभाषितैर्युक्तः प्रेक्षितप्रेक्षितैस्तथा ।

मृदुर्लन्नगतिश्चैव पुमान् स्त्रीभावमाचरेत् ॥ १ ९ २ ॥

इसी प्रकार पुरुष स्त्री का अभिनय करते समय स्त्री के वेष तथा भाषण, उसी के अनुसार कभी किसी वस्तु के देखने तथा न देखने की क्रियाओं द्वारा कोमल तथा मन्द गति का प्रदर्शन करे ॥ १ ९ २ ॥

नीचजाति की स्त्रियों की गति-जातिहीनाश्च या नार्यः पुलिन्दशबराङ्गनाः ।

याश्चापि तासां कर्तव्या तज्जातिसदृशी गतिः ॥ १ ९ ३ ॥

जो नीच कुल में उत्पन्न या पुलिन्द, भील आदि अनार्यजाति की स्त्रियां हो उनकी अपनी जाति के अनुकूल स्वाभाविक ' गति ' रखनी चाहिए ॥ १. विपर्यस्तप्रयोगस्तु पुरुषस्त्रीनपुंसके क ० । २. परभावेन योजयेत् —क ० । ३. निजां प्रकृतिमुत्सृज्य क्रीडयावञ्चनेन वा —क ० । ४. सौष्ठवेनाथ सत्वेन – क ०; धैर्योदारेण क ० । ५. युक्तं क्र ० । ६. प्रेषिता प्रेषितैस्तथा — ख ०; ग ० । ७. स्मितैः - क ० । ८. मृदु मन्दगति – ख ०; ग ० ।

पृष्ठ 280

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त्रयोदशोऽध्यायः १६ ९

तपस्विनी स्त्री गति-व्रतस्थानां तपःस्थानां लिङ्गस्थानां तथा पुनः ।

खस्थानाश्चैव नारीणां समपादम्प्रयोजयेत् ॥ १ ९ ४ ॥

जो स्त्रियां व्रत, तप, दीक्षा लिए हुए संन्यासिनी तथा आकाशगामिनी दिव्य हों तो उनकी गति में ' समपाद ' चारी की योजना की जाए ॥१ ९ ४ ॥

उद्घता येऽङ्गद्दाराः स्युर्याश्चार्यो मण्डलानि वा ।

तानि नाट्यप्रयोगशैर्न कर्तव्यानि योषिताम् ॥ १ ९ ५ ॥

जो अङ्गहार, चारी और मण्डल उद्धत प्रकार के हों उनकी स्त्री पात्रों में चतुर नाट्यनिर्देशक योजना न करे ॥ १ ९ ५ ॥ ( स्त्री तथा पुरुष पात्रों का ) आसन विधान-अथार्सनविधिः कार्यः स्त्रीणां नृणामथापि च । नानाभावसमायुक्तस्तथैवं शयनाश्रयः ॥ १ ९ ६ ॥ पुरुष तथा स्त्रियों के बैठने की विधि ( आसन - विधि ) उनके विभिन्न भावों से युक्त एवं प्रसंगानुसार रखना चाहिए और इसी प्रकार इनकी शयन विधि भी होती है ॥ १ ९ ६ ॥ स्वस्थ दशा में उपवेशन - विधि—

विष्कम्भताञ्चितौ पादौ त्रिकं किञ्चित्समुन्नतम् ।

स्तो ट्यूरुविन्यस्तौ स्वस्थे स्यादुपवेशने " ॥ १ ९ ७ ॥

१. तथैव च - ख ०; ग ० ध ० । २. स्वस्थानाचैव - ख ०; ग ० घ ० । ३. योषिता - ख ०; ग ०! ४. तथासन ख ० । ५. स्तथा च — क ०. ग ० । ६. अनयोर्मध्ये श्लोकद्वयं क ( म ० ) मातृकायाम् पव्यते । तद्यथा-स्वस्थं मन्दालसं क्लान्तं स्रस्तालसमथापि च । विष्कम्भितमुत्कटिकं मुक्तजानु तथासनम् ॥

जानुगतं विमुक्तञ्च स्थानकान्युपवेशने ।

लक्षणं पुनरेतेषां विनियोगञ्च वक्ष्यते ॥

७. विष्कम्भेना - ख ०, ग ० घ ० । ८. वक्षः- क ० । ९. हस्ताः कट्यूरुविन्यस्ताः - ग ० । १०. बाहुशीर्षाश्रितं शिरः - ख ० । ११ अस्मादनन्तरं स्वभावाभिनये चैव तथा स्वस्थोपवेशने । आविष्कृतेषु सर्वेषु भावेष्वेतत् प्रयोजयेत् ॥ इति अधिकं पद्यम् क ० पु ० ।