भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 281–290

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

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१७० नाट्यशास्त्रम् स्वस्थ दशा में ( विश्रामावस्था में ) ( स्वस्थे ) बैठने पर दोनों पैरों को वैशाखस्थान में फैलाकर सुन्दरता से रखे, पीठ थोड़ी तनी हुई और दोनों हाथ ऊपर और पिंडली पर ( रखे ) रहना चाहिए ॥ १६७ ॥

विचारावस्था में उपवेशन - विधि-पादः प्रसारितः किश्चिदेकश्चैवासनाश्रयः ।

' शिरः पार्श्वनतश्चैव सचिन्त उपवेशने ॥। १ ९ ८ ॥

यदि कोई पुरुष गहरे विचार में बैठा हो तो उसे ( स्वस्थ दशा के स्वरूप में ) अपना एक पैर कुछ फैला कर रखना तथा दूसरा पैर किसी आसन पर टिकाते हुए मस्तक को एक ओर झुका हुआ रखना चाहिए ॥

शोकावस्था में उपवेशन - विधि-चिबुकोपाश्रितौ हस्तौ बाहुशीर्षानतं शिरः ।

सम्प्रणष्टेन्द्रियमना * भवेच्छोकोपवेशने ॥। १ ९९ ॥

यदि पुरुष गहरे शोक में हो तो ( स्वस्थ दशा के स्वरूप में ) अपनी ठुड्डी को दोनों हाथों पर रखे या उसका मस्तक दोनों भुजाओं के सहारे टिका रहे तथा मन और इन्द्रियां अपनी दशा को खोये से मूर्च्छा आदि में उपवेशन— प्रसार्य बाहू शिथिलौ तथा चापाश्रयाश्रितः मूर्च्छामदश्रमग्लानिविषादेषूपवेशयेत् १. एकः प्रसारितः किञ्चित्पादोऽन्यस्त्वासनाश्रितः — क ० २. शिरः पार्श्वगतञ्चैव स्थानं मन्दालसं तु तत् ।

चिन्तायाञ्च तदौत्सुक्ये निर्वेदे विरहे तथा ।

विवादादिषु चाधेयं स्थानमेतत् प्रयोक्तृभिः ॥

इति सार्धश्लोकमधिकम् क ० पुस्तके ।

३. चिबुकोपाश्रयौ हस्तौ बाहुशीर्षाश्रयं शिरः ।

सम्प्रनष्टेन्द्रियमना विज्ञेयं क्लान्तमासनम् ॥

बलेन निगृहीतस्य रिपुणा खण्डितस्य च ।

रहें ॥ १ ९९ ॥

॥ २०० ॥

। शोकग्लानस्य चौत्सुक्ये स्थानमेतद्विनिर्दिशेत् ॥ इति क ० पुस्तके पाठः । ४. शोकोत्सुक्योपवेशने - ग ० घ ० । : चोपाश्रयाश्रितः - ख ०, ग ० घ ० । ६. श्रमग्लानिविषादेषु मदे चोपविशेद्बुधः – क ० । ७. क ० ( भ ० ) पुस्तके एतस्य स्थाने-

पृष्ठ 282

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त्रयोदशोऽध्यायः यदि पुरुष मूर्च्छा, मद, श्रम, ग्लानि तथा विषाद की दोनों भुजाओं को फैलाकर ढीली छोड़ दे और किसी टिककर बैठे ॥ २०० || लज्जा - रोग निद्रा - आदि में उपवेशन-सर्वपिण्डीकृताङ्गस्तु संयुक्तः पादजानुभिः व्याधित्रीडितनिद्रासु ध्याने चोपविशेन्नरः १७१ दशा में हो तो वस्तु के सहारे

॥ २०२ ॥

यदि कोई ( पुरुष ) पात्र व्याधि, लज्जा, निद्रा तथा ध्यान में हो तो उसे पैर और घुटनों के बीच अपने शरीर को सिकुड़ा कर रखना चाहिए ॥ २०१ ॥

धार्मिक - विधि सम्पादन में उपवेशन-तथा चोत्कटिकं स्थानं स्फिक्पार्णीनां समागमः पित्र्ये निवापे जप्ये च सन्ध्यास्वाचमनेऽपि च पितरों का तर्पण करने, मन्त्र जपने, सन्ध्या करने तथा में कूबड़ तनी हुई ( उत्कटिकं ) तथा दोनों पैरों के गट्टों पंजों को मिलाकर बैठना चाहिए ॥ २०२ ॥

स्रस्तौ हस्तौ विमुक्तौ च शरीरमलसं तथा ।

खेदालसं तथा चक्षुर्यत्र स्रस्तालसं तु तत् ॥

श्रमग्लानौ मदे चैव मूर्च्छायां व्याधितेषु च ॥

॥ २०२ ॥

आचमन करने ( स्फिक् ) और मोहे प्राणभये चैव विषादे चैव तद्भवेत् ॥ इति वर्तते । १. सम्पाते - ख ० । २. एतस्य स्थाने क ( म ० ) पुस्तके तु—

विष्कम्भादञ्चितौ पादौ उरू विष्कम्भितौ भुजौ ।

निमीलितं तथा चक्षुः स्थाने विष्कम्भनामनि ॥।

स्ववक्षोगतया दृष्टया योगध्याने विधीयते ।

स्वभाव संस्थया चैव नानामुपवेशने ॥

३. तथा चोत्कटकं स्थानं – ख ०; तथा चोत्कटिकास्थानस्फिक्पार्णीनां समागमः -- ग ० । एतस्य स्थाने क ( म ० ) पुस्तके च-समौ पादौ समाधाय समं यदुपविश्यते । अस्पष्टभूतलचैव ज्ञेयमुत्कटिकासनम् ॥ पित्र्ये समाधिजप्ये च होमादिकरणेषु च । एतत्स्थानं विधातव्यं तथाचमनकर्मणि ॥ इति वर्तते । ४. पित्र्ये निवापसलिले — ख ० ।

पृष्ठ 283

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१७२ नाट्यशास्त्रम् प्रियाप्रसादन में उपवेशन-विष्कम्भतम्पुनश्चैव जानु भूमौ निपातयेत् ।

प्रियाप्रसादने कार्य होमादिकरणेषु च ।

मंहीगताभ्यां जानुभ्यामधोमुखमवस्थितम् ॥ २०३ ॥

मान ले कर बैठी हुई प्रियतमा को रिझाने तथा होम आदि धार्मिक विधि सम्पन्न करने की दशा में ( सामान्य अवस्था में ) पुरुष अपने फैले हुए घुटनों को पृथ्वी पर रखे और नीचा मुंह किये हुए बैठे ॥ २०३ ॥

देव वंदना आदि दशा में उपवेशन-देवाभिवन्दने कार्य रुषितानां प्रसादने ।

शोके चाक्रन्दने ती मृतानाञ्चैव दर्शने ॥ २०४ ॥

त्रासने च कुसत्वानां नीचानाञ्चैव याचने ।

होम क्रियायाञ्च प्रेष्याणाञ्चैव कारयेत् ॥ २०५ ॥

मुनीनां नियमेष्वेवं भवेदासनजो विधिः । देवगण की वन्दना, क्रुद्ध स्वामी को प्रसन्न करने, तीव्र शोक में कन्दन करने, मृत पुरुष को देखने, ( छोटे मनुष्यों को ) सताने वाले पशुओं को डराने, नीच पुरुष या सेवकों से याचना करने तथा होम या यज्ञ किया में दर्शनार्थ उपस्थित होने की दशा में भी पूर्ववत् नीचा

१. एतस्य स्थाने क ० ( म ० ) पुस्तके तु -एकं जानु यदास्यैव महीपृष्ठे निधीयते ।

मुक्तानुकमेतद्धि विज्ञेयं ह्यासनं बुधैः ॥

एतत्कृतव्यलीकानां प्रियाणां सम्प्रसादने । मार्जने कुट्टिमानाञ्च तथा भूम्यनुलेपने । इति २. एतस्य स्थाने क ० ( म ० ) पुस्तके च - महीगताभ्यां जानुगतं भवेत् — इति पाठः । मुंह और दोनों वर्तते । जानुभ्यां स्थानं ३. देवाभिगमने चैव – क ०, ख ० । ४. रुष्टानाञ्च - ( म ) । ५. तीव्रं मृतानां - ख ०; तीव्रमृतानां - ग ० । ६. सन्त्रासने - क ० । ७ एतस्य स्थाने क ( म ) पुस्तके तु । भूमौ यदूर्ध्वपतनं तद्विमुक्तमिति स्मृतम् । प्रहारे तत्प्रयोक्तव्यमावेगे क्रन्दिते तथा ॥ इति । ८. नियमेष्वेष - ख ०; ग ० ।

पृष्ठ 284

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त्रयोदशोऽध्यायः १७३ घुटनों को पृथ्वी पर टिका कर बैठना चाहिए । मुनिजन के दैनिक आचरण तथा नियम आदि में भी बैठने की यही विधि रखें ॥ २०४-२०६ ॥ विभिन्न पात्रों के लिये निर्धारित आसन-तथासनविधिः कार्यों विविधो ' नाटकाश्रयः ॥ २०६ ॥

स्त्रीणाञ्च पुरुषाणाञ्च बाह्यश्चाभ्यन्तरस्तथा ।

आभ्यन्तरस्तु नृपतेर्बाह्यो बाह्यगतस्य च ॥ २०७ ॥

नाटक में स्त्री तथा पुरुष पात्रों के लिए निर्धारित आसन विधान को सुनिये । यह दो प्रकार का होता है- ( १ ) आभ्यन्तर ( स्वतन्त्र आसन ) तथा ( २ ) बाह्य ( सामान्यजन के हेतु ) आसन - विधान । इन दोनों आसनों में आभ्यन्तर आसन राजा से तथा बाह्य आसन सम्बद्ध होते हैं ॥ २०६-२०७ ॥ पुरुष पात्रों के लिए निर्धारित आसन-देवानां नृपतीनाञ्च दद्यात् सिंहासनं द्विजाः पुरोधसाममात्यानां भवेद्वे त्रासनन्तथा मुण्डासनन्तु दातव्यं सेनानी युवराजयोः काष्ठासनं ब्राह्मणानां कुमाराणां कुथासनम् एवं राजसभां प्राप्य कार्यस्त्वासनजो विधिः हे मुनियो, नाट्य प्रदर्शन में देवता तथा राजा के पुरोहित तथा अमात्यों ( मन्त्रियों ) के लिए वेत्रासन, सामान्यजन से

॥ २०८ ॥

॥ २० ९ ॥

। लिए सिहासन, सेनापति तथा युवराज के लिए मुण्डासन, ब्राह्मणों के लिए काष्ठासन ( चौकोर पाटला ) तथा राजकुमारों के लिए कुथासन ( गलीचे सा आसन ) की व्यवस्था रहनी चाहिए । राजसभा में इन्हीं आसनों का यथायोग्य व्यक्तियों को देने का नियम रखना चाहिए ॥ २०८ ॥

१. विधिवन्नाटकाश्रयः क ० । २. बाह्याभ्यन्तरस्तथा - क ० । ३. योज्यं - क ० । ४. तथा क ० । ५. कर्त्तव्यं - क ० । ६. अस्मादनन्तरं क ० पुस्तके तु— प्रकृतीनान्तु सर्वासां तथा ज्ञानसमुत्थितम् । पुरुषाणां भवेदेष विधिरासनसंश्रयः ॥ इति अधिकम् ।

पृष्ठ 285

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१७४ नाट्यशास्त्रम् स्त्री पात्र के लिये आसन -स्त्रीणाञ्चैवासनविधिं सम्प्रवक्ष्याम्यहम्पुनः ॥

सिंहासनन्तु राज्ञीनां देवीनां मुण्डमासनम् ।

पुरोधोऽमात्य पत्नीनां यात्रा सनन्तथा ॥

भोगिनीनां तथा चैव वस्त्रं चर्म कुथापि वा ।

ब्राह्मणी तापसीनाञ्च पट्टासनमथापि च ॥

वेश्यानामपि कर्तव्यमासनं हि मसूरकम् ।

शेषाणां प्रमदानाञ्च भवेद् भूम्यासनं द्विजाः ॥

एवमाभ्यन्तरो ज्ञेयो बाह्यश्वासनजो विधिः ।

२१० ॥

२११ ॥

२१२ ॥

२१३ ॥

तथा स्वगृहवार्तासु छन्देनासनमिष्यते ॥ २१४ ॥

अब मैं स्त्री पात्रों के लिए दिये जाने वाले आसन नियम बतलाता हूँ । पट्टरानी को सिंहासन, रानियों को मुण्डासन, पुरोहित और मन्त्रियों की पत्नियों को वेत्रासन, भोगिनी ( राजा द्वारा विवाहित या रक्षित सेनापति आदि की कन्या ) के लिए गलीचा, चर्म या वस्त्र निर्मित आसन, ब्राह्मणी तथा तापसी को पट्टासन ( पाटला ), वैश्य तथा श्रेष्ठिजन की पत्नी को तकिये वाला आसन ( जिसके सहारे आराम से बैठा जा सके — मसूरक ) दिया जाता है । शेष स्त्री पात्रों के लिए भूमि पर बैठने की विधि होती है । आसन का यही नियम आभ्यन्तर तथा बाह्य के लिए निर्धारित है । तथा अपने घर में रहने पर सामान्य दशा में स्वतन्त्रतापूर्वक किसी भी आसन का स्वेच्छा से ग्रहण किया जा सकता है ॥ २१०-२१४ ॥ मुनि तथा संन्यासी पात्र के लिये आसन—

नियमस्थो मुनीनाञ्च भवेदासनंजो विधिः ।

लिङ्गिनाम सिनविधिः कार्यो व्रतसमाश्रयः ॥ २१५ ॥

१. म्यतः परम् — क ० । २. सिंहासनं महादेव्या राज्ञीनां - क ० । ३. भवेद्वेन्त्रा — क ० । ४. भगिनीनान्तु कर्तव्यं वस्त्रं चर्मं कुथापि वा क ० । ५. ब्राह्मणीनां तापसीनां क ०, ब्राह्मणीनां यतीनाञ्च - ख ०; ग ० । ६. वैश्याना – क ०, ख ०, । ७. एवमन्तःपुरे ज्ञेयो — क ० । ८. नियमस्थमुनीनाञ्च – ख ०; ग ० । ९. दासनतो - क ० । १०. लिङ्गिनां वासनविधिः - ख ० ।

पृष्ठ 286

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त्रयोदशोऽध्यायः १७५ मुनिजन के अपने नियमानुकूल आसन रहते हैं तथा विभिन्न मतावलम्बी संन्यासी पात्रों के उनके व्रतानुसार आसन रहते हैं ॥ २१५ ॥

वृसीमुण्डासनप्रायं वेत्रासनमथापि वा ।

होमे यज्ञक्रियायाश्च पित्र्यर्थे च प्रयोजयेत् ॥ २१६ ॥

जब होम, यज्ञ, तथा पितृतर्पण करना हो तो उस समय वृसी, मुण्डासन या वेत्रासन पर बैठना चाहिए ॥ २१६ ॥

आसन का सामान्य विधान-स्थानीया ये च पुरुषाः कुलविद्यासमन्विताः तेषामासनसत्कारः कर्तव्यं इह पार्थिवैः समे समासनं दद्यान्मध्यमे मध्यमासनम् अतिरिक्तेऽतिरिक्तञ्च हीने भूम्यासनं भवेत् उपाध्यायस्य नृपतेर्गुरुणाञ्चाग्रतो बुधैः भूम्यासन तथा कार्यमथवा काष्ठमासनम् नौ - नाग- रथैयानेषु भूमिकाष्ठासनेषु च सहासनं न दुष्येत गुरूपाध्यायपार्थिवैः ॥। २१७ ॥

॥ २१८ ॥

॥ २१ ९ ॥

॥ २२० ॥

जो स्थानीय पुरुष अवस्था में बड़े, कुलीन तथा विद्वान हों उनका राजा उचित आसन देते हुए सत्कार करे । इनमें भी जो समान स्थिति के हों उन्हें बराबरी का, मध्यम पात्रों को मध्यम, श्रेष्ठ जन को ( अपने ) से ऊंचा तथा हीन पात्रों का पृथ्वी पर ( नीचा ) आसन रखना चाहिए । बुद्धिमान पुरुष अपने उपाध्याय, राजा तथा गुरुजन के सम्मुख पृथ्वी पर या काष्टासन पर ही बैठे । ( परन्तु ) नौका, हाथी, रथ तथा यान में अपने गुरु, उपाध्याय तथा राजा के साथ - साथ बैठने पर भी आसन दोष नहीं रहता ॥ २१६-२२० ॥

शयनावस्था में शरीर की स्थिति-आकुञ्चितं समञ्श्चैव प्रसारितविवर्तने ।

उद्वाहितं नर्तश्चैव शयने कर्म कीर्त्यते ॥ २२१ ॥

१. कर्तभ्यो गुरुपार्थिवैः — क ० । २. मध्ये मध्यं तथासनम् — क ० । ३. गुरुणामग्रतो बुधैः- -ग ० । ४. भूम्यासनं सदा कार्यमथवा – ख ० । ५ रथभूमीषु - क ० । ६. नवं षोढा शय्यास्थानानि निर्दिशेत् —क ० ।

पृष्ठ 287

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१७६ नाट्यशास्त्रम् शयनावस्था में होने वाली छः स्थितियाँ हैं- ( १ ) आकुंचित, ( २ ) सम, ( ३ ) प्रसारित, ( ४ ) विवर्तित, ( ५ ) उद्वाहित तथा ( ६ ) नत ॥ आकुंचित-

सर्वैराकुञ्चितैरङ्गैः शय्याविद्धे तु जानुनी ।

स्थानमाकुञ्चितं नाम शीतार्तानां प्रयोजयेत् ॥ २२२ ॥

दोनों घुटनों को बिछोने में रखकर सारे शरीर को झुकाकर सिकुड़ा हुए सोना ' आकुंचित ' दशा कहलाती है । इसकी योजना ठण्ड से ठिठुरते पात्र में की जाती है ॥ २२२ ॥

सम-उत्तानितमुखञ्चैव प्रत्यङ्मुक्तकरन्तथा ।

समं नाम प्रसुप्तस्य स्थानकं संविधीयते ॥ २२३ ॥

मुंह ऊपर की ओर, हाथ खाली ढीले और नीचे की ओर फैले हुए रखकर सोने को ' सम ' स्थान जानो । इसकी सोये हुए पुरुष में योजना की जाए ॥ २२३ ॥

प्रसारित-एकं भुजमुपाधाय सम्प्रसारित जानुकम् ।

स्थानं प्रसारितं नाम सुखसुप्तस्य कारयेत् ॥ २२४ ॥

एक बाँह को सिरहाना बनाकर जंघाओं को फैलाते हुए सोना ' प्रसारित ' स्थान होता है । इसकी आनन्दपूर्वक या निश्चिन्तता से सोने की अवस्था बतलाने में योजना करनी चाहिए ॥ २२४ ॥

विवर्तित-अधोमुखस्थितञ्चैव विर्वर्तितमिति स्मृतम् ।

शस्त्रक्षत मृतोत्क्षिप्तमत्तोन्मत्तेषु कारयेत् ॥ २२५ ॥

नीचा मुंह कर सोना ‘ विवर्तित ' कहलाता है । शस्त्रों के घाव लग जाने, , ऊपर से या ऊंचे स्थान से गिर जाने, ( उत्क्षिप्त ), नशे के कारण मस्त मरण जाने तथा पागल होने की दशा में इसकी योजना की जाती है ॥ २२५ ॥

हो १. शीतानान्तु - ख ०; ग ० । २. तु सुप्तस्य - ख ०; ग ० । ३. खलु सुप्तस्य - ख ०; ग ० । ४. विवर्तनम् — क ०; विकर्तनम् - ख ०; ग ० ।

पृष्ठ 288

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त्रयोदशोऽध्यायः १७७

उद्वाहित-परिशिरः कृत्वा कूर्परक्षोभमेव च ।

उद्वाहितन्तु विज्ञेयं लीलायां वचने प्रभोः ॥ २२६ ॥

यदि सिर को कन्धे पर या कलाई को दबाते हुए शयन किया जाए ( कूर्परक्षोभ ) तो ' उद्वाहित ' स्थान जानो । इसकी क्रीडा तथा ( अपने ) स्वामी के साथ संभाषण ( बैठने, प्रवेश ) करने की दशा में योजना की जाए ॥ २२६ ॥

नत

ईषत्प्रसारिते जङ्घे यत्र संस्तौ करावुभौ ।

आलस्यश्रमखेदेषु नतं स्थानं विधीयते ॥ २२७ ॥

यदि जघाएं थोड़ी फैली हुई हों ( तथा ) दोनों हाथ ढीले रखकर सोया जाने पर ‘ नत ' स्थान कहलाता है । इसकी योजना आलस्य, श्रम तथा थकावट कदशा प्रदर्शन में की जाए ॥ २२७ ॥

गतिप्रचारस्तु मयोदितोऽयं नोक्तश्च यः सोऽर्थवशेन साध्यः । अतः परं रङ्गपरिक्रमस्य वक्ष्यामि कक्ष्यान्तरसंविधानम् ॥ २२८ ॥

मुनियो, इस प्रकार मैंने आपको गतिप्रचार के ये स्वरूप तथा लक्षण बतलाये । इसमें जो बातें बतलाई न जा सकी हों उन्हें आप लोक-व्यवहार में प्रयुक्त अर्थों के आधार पर स्वयं साध लें । अब मैं रंगमंच ( पर ) की ( जाने वाली ) कक्ष्याओं की तथा उनमें संचार करने की विधियों को ( अगले अध्याय में ) कहूँगा ॥ २२८ ॥

इति भारतीये नाट्यशास्त्रे गतिप्रचारो नाम त्रयोदशोऽध्यायः भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र का ' गतिप्रचार ' नामक त्रयोदश अध्याय सम्पूर्ण १. हस्तोपरि - क ० । २. लीलयाविशने - क ० । ३. सृष्टौ – क ० । ४. अस्मात् परं क — पुस्तके ' रङ्गे विकृष्टे ' इत्यादि ( ना ० शा ० १३।२० ) पद्यं ' वयोऽनुरूपः प्रथमस्तु वेष: ' ( १४।६८ ) इत्यादि पद्यञ्च समुपलभ्यते । ५. नोक्तस्तु - क ० । ६. रङ्गविधिक्रमस्य —- ख ०; ग ० । ७. कक्ष्यां प्रविभागयुक्ताम् — ग ०, घ ० । ८. द्वादशोऽध्यायःक, क ( भ ० ), ख ० । १२ ना ० शा ० द्वि ०

पृष्ठ 289

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cet चतुर्दशोऽध्याय ३ ( कक्ष्यापरिधि तथा लोकधर्म - निरूपणाध्याय )

THE TIS ये तु पूर्व मया प्रोक्तास्त्रयो वै नाट्यमण्डपाः ।

तेषां विभागं विज्ञाय ततः कक्ष्यां प्रयोजयेत् ॥ १ ॥

नाट्यगृह के तीन प्रकारों को समझते हुए जिनका कि पहिले वर्णन किया जा चुका है अतः उनके विभेदों को जानकर रंग - मंच की कक्षाओं का विभाग नियत किया जाए ' ॥ १ वाद्यों की स्थापना

ये नेयथ्यगृद्दद्वारे मया पूर्व प्रकीर्तिते ।

तयोर्भाण्डस्य विन्यासो मध्ये कार्यः प्रयोक्तृभिः ॥ २ ॥

नेपथ्य गृह के जिन दो द्वारों को पहिले बतलाया जा चुका है उनके मध्यवर्ती प्रदेश में ( बीच में ) भाण्ड वाद्य वादकों को बिठाया जाए ॥२ ॥

१. पूर्व अध्याय में गति के प्रचारादि में उपयोगी स्थानों का विभागपूर्वक उल्लेख नहीं किया गया । इन स्थानों का रंगमंच पर विभाजित रूप से निर्देश आवश्यक होने के कारण पिछले अध्याय से इस अध्याय की संगति स्थापित होती है । यद्यपि उद्देशक्रम में ' कदया ' का स्थान अन्तिम है तथापि बिना कन्दया के अभिनयादि उपपन्न नहीं हो सकते इसलिये यहां भरतमुनि ने उसे विषयप्र-तिपादन की आवश्यकता को दृष्टि में रखकर ही उचित स्थान दे दिया है । यहाँ क्रम का उल्लंघन भी इसी कारण हो गया है तथा इसके यहाँ प्रतिपादन करने का विशेष कारण यह भी है कि गन्तव्य प्रदेश का आश्रय लेने के कारण गतियों का एवं जल, स्थल आदि अनेक सम या विषम प्रदेशों का आश्रय रखने के कारण देशों का रंगमंच के प्रयोग स्थान पर कक्ष्या के बिना प्रदर्शन सम्भव नहीं हो सकता था । अतएव इस कारण भी कक्ष्याओं का निरूपण अब आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था । १. अथ त्रयोदशोऽध्यायः – क ०, ख ० । २. कक्षां - ख ० ३. नेपथ्य रङ्गभूमौ तु यौ विभागौ प्रकीर्तितौ - क ० । ४. प्रकीर्तिताः- क ० । ( 0 ( 0 ) ५. तेषां - क.०

पृष्ठ 290

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चतुर्दशोऽध्यायः १७ ९ कक्ष्या - गत विभाग- श

कक्ष्याविभागो निर्देश्यो रङ्गपीठपरिक्रमात् ।

परिक्रमेणं रङ्गस्य ह्यन्या कक्ष्या भवेदिहं ॥ ३ ॥

• रंगमंच की परिधि के भाग में चलने से उसके विभाग सूचित ( या प्रतीत ) हो जाते हैं । जब किसी पात्र को अपनी कक्ष्या परिधि परिवर्तित करना हो वह उसे परिक्रमण - या अन्य कक्ष्या में चलने के द्वारा प्रदर्शित करे ' ॥ ३ ॥

कक्ष्या विभाग की उपयोगिता-कक्ष्याविभागे ज्ञेयानि गृहाणि नगराणि च ।

उद्यानाराम सरितस्त्वाश्रमा अटवी तथा ॥ ४ ॥

पृथिवी सागराचैव त्रैलोक्यं सचराचरम् ।

वर्षाणि सप्त द्वीपाश्च पर्वता विविधास्तथा ॥ ५ ॥

आलोकश्चैव लोकश्च रसातलमथापि च ।

दैत्य नागालयाश्चैव गृहाणि भवनानि च ॥ ६ ॥

इस कक्ष्या विभाग की परिधि में ( जो पात्र के किसी विभाग विशेष पर स्थित होने से जानी जाती हो तथा जिस दृश्य का निरूपण करना इष्ट हो ) गृह, नगर, उद्यान, आदि से युक्त प्रदेश, ग्राम तथा नगर, नदी, आश्रम, वन, पृथ्वी, समुद्र, जड़, चेतन पदार्थ समन्धित त्रैलोक्य, पृथ्वी के किसी भी वर्ष, द्वीप, विविध पर्वत, लोकालोक पर्वत, पाताल, दैत्य तथा सर्पों के निवासस्थान, आराम गृह तथा नगर आ जाते हैं ॥ ४-६ ॥ १. इस विवरण से प्रतीत होता है कि केवल रंगमंच पर विभिन्न स्थानों के द्वारा ही दृश्य और प्रदेश बतलाये जाते थे और दृश्य - परिवर्तन की अधिक आवश्यकता होने पर अन्य अंक के द्वारा यह भी हो सकता था । दृश्यों के परिवर्तनार्थं पटपरिवर्तन जैसे किसी विधान का कम ही उपयोग होता था । १. कक्ष्याविभागो निर्देश्यौ रङ्गपीठपरिक्रमैः – क ० । २. परिक्रमे चक ० । ३. विधीयते - ग ०, घ ० । ४. उद्यानाराम सहितो देशो ग्रामोऽटवीं तथा — ख ०, ग ० । ५ ससागरा च पृथिवी तथा त्रैलोक्यमेव च – क ० । ६. द्वीपा सप्ताथ वर्षाणि क ० । ७. दैत्यानामालयश्चैव – ख ०, ग ० । ८. च वनानि च - घ ० ।