भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 301–310
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 301–310
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१ ९ ० · नाट्यशास्त्रम्-करना चाहिए, क्योंकि इन्हीं देशों की प्रजा पर इस प्रवृत्ति निर्भर करता है ॥ ४२ ॥
पूर्वीय अङ्गा वङ्गाः कलिङ्गाश्च वत्साश्चैवोदमागधाः अन्तर्गिरिबहिंर्गिराः तथा प्लवङ्गमा ज्ञेया मलदा मल्लुवर्तकाः ब्रह्मोत्तरप्रभृतयो भार्गवा मार्गवास्तथा प्राग्ज्योतिषाः पुलिन्दाश्च वै देहास्ताम्रलिप्तकाः प्रीप्रभृतयश्चैव युञ्जन्तीहौदमागधीम् प्रदेशों में ( जो ) अंग, वंग, कलिंगे, वत्स, का नाट्यप्रयोग
।
|| ४३ ॥
।
॥ ४४ ॥
।
॥ ४५ ॥
उद् ( औद ) मगध, पुण्ड्र, नेपाल, अन्तर्गिरि, बहिर्गिरि, प्लवंगम, मलदा, मल्लवर्तक, ब्रह्मोत्तर, भार्गव, मार्गव, प्राग्ज्योतिष, पुलिन्द ( न्ध्र ), विदेह तथा ताम्रलिप्त ( आदि ) प्रदेश हैं वे औढमागधी प्रवृत्ति प्रयोग को पसन्द करते हैं ॥ ४३-४५ ॥
• अन्येऽपि देशाः प्राच्या ये पुराणे सम्प्रकीर्तिताः ।
तेषु प्रयुज्यते ह्येष प्रवृत्तिश्चोद्धमागधी ॥ ४६ ॥
इसी प्रकार पुराण आदि में जो पूर्वीय प्रदेश कहे गए हैं उनमें भी इसी औदमागधी प्रवृत्ति का व्यवहार होता है [ और इस प्रवृत्ति में भारती तथा कैशिकी वृत्ति प्रधान रहती है । ] ॥ ४६ ॥
पांचालमध्यमा प्रवृत्ति–
पाश्चालाः शौरसेनाश्च काश्मीरा हास्तिनापुराः ।
वाह्रीकाः शाकलाचैव मद्रकौशीनरास्तथा ॥ ४७ ॥
१. कलिंग = वर्तमान उड़ीसा के आसपास का प्रदेश । । मलदा = वर्तमान मालदह जिला जो बंगाल में है । मलवर्तक = वर्तमान मल्लभूम प्रवेश ( बंगाल में बांकुरा ) । भार्गव और मार्गव शब्द अस्पष्ट हैं और सम्प्रति इस नाम के कोई प्रदेश प्राप्त नहीं होते । १. पौण्ड्रा नेपालिकाश्चैव – ख ०, ग ० । २. बहिर्दुरा: - ख ०, ग ० । ३. प्लवङ्गमाहेन्द्र मलदामलवर्तका: ख, ग ० । ४. ताम्रलिप्तकाः - ख ०; ग ० । ५. प्रांशुप्रवृत्तयः क ०; प्राङ्गाप्रावृत्तयः - ख ०; ग ० । ६. युज्यन्ति चौढ़मागधी - ख ०, ग ० । ७. प्राच्यां - ख ०; ग ० । ८. त्वेषा - ख ०, ग ० ९. चान्ध्रमागधी- क ० । १०. शाल्यका क ० शाल्वका - घ ० । SIA P
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चतुर्दशोऽध्यायः १ ९ १
हिमवत्संथिता ये तु गंङ्गायाश्चोत्तरां दिशम् ।
। ये श्रिता वै जनपदास्तेषु पाञ्चालमध्यमा ॥ ४८ ॥
पांचाल, शौरसेन, काश्मीर, हस्तिनापुर, वाल्हीक, शाकल ( शल्यक या शाल्व ) मद्र. उशीनर प्रदेश तथा गंगा नदी के उत्तर में या हिमाचल पर स्थित प्रदेश हैं, ये सभी पांचालमध्यमा प्रवृत्ति को ग्रहण करते हैं ॥
पाञ्चाल मध्यमायान्तु सात्वत्यारभटी स्मृती ।
प्रयोगस्त्वल्पगीतार्थ आविद्धगतिविक्रमः ॥ ४ ९ ॥
इस ( पांचालमध्यमा ) प्रवृत्ति में सात्वती तथा आरभटी वृत्ति का प्राधान्य रहता है । इसके व्यवहार में गीत की न्यूनता तथा असामान्य गति और पादचालन का आधिक्य रखा जाता है ॥ ४ ९ ॥ प्रवृत्ति ( के अवेक्षण ) में दो क्रियाएं-द्विधा क्रिया भवत्यासां रङ्गपीठपरिक्रमे । प्रदक्षिणप्रवेश च तथा चैवाप्रदक्षिणा ॥ ५० ॥
रंगमंच पर चलने में उपयोग की जाने वाली क्रियाएं इन प्रवृत्तियों के द्वारा दो प्रकार से प्रदर्शित की जाती हैं — एक दाहिनी ओर से तथा दूसरी बायीं ओर से मंच पर प्रवेश करते हुए ॥ ५० ॥
आवन्ती दाक्षिणात्या च प्रदक्षिणपरिक्रमे ।
अपसव्य प्रवेशौ तु पाञ्चाली चोदमागधी ॥ ५१ ॥
आवन्ती तथा दाक्षिणात्या प्रवृत्ति में दाहिनी ओर से रंगमंच I पर प्रवेश कर चलना होता है तथा पांचाली और औदमागधी प्रवृत्ति में यह बार्थी ओर से रहता है ॥ ५१ ॥
आवन्त्यां दाक्षिणात्यायां पार्श्वद्वारमथोत्तरम् ।
पाञ्चाल्यामोदमागध्यां योज्यं द्वारन्तु दक्षिणम् ॥ ५२ ॥
आवन्ती तथा दाक्षिणात्या प्रवृत्ति में उत्तर दिशा के बाजू के द्वार से तथा पांचाली और औदमागधी में दक्षिण प्रवृत्ति द्वार से प्रवेश करने की योजना करनी चाहिए ॥ ५२ ॥
१. तथा प्राप्य प्रदक्षिणम् -क ० । २. ये चाश्रिता - क ० । ३ श्रिता - क ० । ४ प्रदेशास्तु – ख ०; ग ० । ५. प्रदेशा च - ख ०, ग ० । ०६. योज्यं द्वार - ख ० ग ०, घ ० ।
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१ ९ २ नाट्यशास्त्रम्
एकीभूताः पुनश्चैताः प्रयोक्तव्याः प्रयोक्तृभिः ।
पर्षद देशकालौ चाप्यर्थयुक्तिमवेक्ष्य च ॥ ५३ ॥
परन्तु किसी विशेष सभा, स्थान, कार्य तथा प्रयोजन ( अर्थ ) या अर्थ विशेष की अभिव्यक्ति को देखते हुए इन नियमों को सम्मिलित ( एकत्रित या समान ) भी कर सकते हैं ॥ ५३ ॥
येषु देशेषु या कार्या प्रवृत्तिः परिकीर्तिता ।
तद्वत्तिकानि रूपाणि तेषु तज्ज्ञः प्रयोजयेत् ॥ ५४ ॥
चतुर नाट्य प्रयोक्ता इन प्रवृत्तियों में से जिन देशों में जो व्यवहार होते हों वहां नाट्य प्रदर्शन करते समय वैसी ही प्रवृत्तियां बतलाएं ॥ ५४ ॥
एकीभूताः पुनस्त्वेताः नाटकादौ भवन्ति हि ।
अवेक्ष्य वृत्तिबाहुल्यं तत्तत् कर्म समाचरेत् ॥ ५५ ॥
ये नियम ( नाटिकादि ) नाट्य ' रचना में सम्मिलित रूप में रखने पर संक्षिप्त किये जाएं तथा प्रवृत्तियों की अधिकता को देखते हुए प्रयोक्ताजन इनके आवश्यक या महत्वपूर्ण कुछेक कार्यों का प्रयोग या प्रदर्शन करें ।
साथै बाहुल्यमेकस्य शेषाणामथ बुद्धिमान् ।
येषामन्यस्य बाहुल्यं प्रवृत्तिं पूरयेत्तथा ॥ ५६ ॥
जिसमें सभी का सामूहिक ( सार्थ ) या मिश्र रूप हो वहां किसी एक का तथा जहां वैसा न हो वहां शेष का, इसी प्रकार जहां दूसरे की अधिकता न हो वहां प्रवृत्तियों की बीच में अधिकता से पूर्ति करनी चाहिए ॥ ५६ ॥
१. आशय यह है कि जिन प्रदेशों या देशों में जिस वृत्ति का उपयोग होता हो या जिन वृत्तियों में जनसमुदाय रुचि लेता हो वहाँ प्रस्तुत किये जाने वाले नाटकादि में उसी देश के नायक, या अन्य प्रवृत्तियों को प्रधानता देते हुए नाट्य-प्रयोग प्रस्तुत करना चाहिए । यह कार्यं कविगण अपनी रचना में तथा प्रयोक्ता-गण अपने प्रयोग के प्रस्तुतीकरण में बिना किसी अपवाद के अवश्य रखें । १. वर्षञ्च देशं कालञ्च – क ०; देशं कालमवस्थाञ्च काव्ययुक्तिमवेक्ष्य च-क ०; वर्षञ्च देशं कालौ चाप्यथंयुक्तिमवेक्ष्य च – ख ० । २. पूर्व – ०; खग ० । ३. यदा त्वेताः क ० । ४. गानका दौ - ख ०; ग ० । ५. कर्माचरेत् सदा ख ० ग ० । ६. पद्यमिदं ख - पुस्तके नास्ति । ७. यस्यामन्येऽस्य क ० ।
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चतुर्दशोऽध्यायः १ ९ ३
नाट्य रचना के दो सामान्य प्रकार-प्रयोगो द्विविधश्चैव विज्ञेयो नाटकाश्रयः ।
सुकुमारस्तथाविद्धो नाट्ययुक्तिसमाश्रयः ॥ ५७ ॥
नाट्य व्यवहार ( नियम ) के अनुसार नाट्य प्रयोग दो प्रकार का
सामान्य रूप में माना जाता है । ये हैं — सुकुमार तथा आविद्ध ॥। ५७ ।
आविद्ध नाट्य - प्रयोग-यत्त्वविद्धाङ्गहारन्तु छेद्यभेद्या हवात्मकम् ।
मायेन्द्रजाल बहुलं पुस्तनेपथ्यसंयुतम् ॥ ५८ ॥
पुरुषैर्बहुभिर्युक्तमल्पस्त्रीकं तथैव सात्वत्यारभटीप्रायं नाट्यमाविद्धमेव तत्
च ॥। ५ ९ ॥
आविद्ध नाट्य - प्रयोग में अंगहारों के साथ छेदन, भेदन तथा युद्ध का ( युद्ध की चुनौती देने का ) प्रदर्शन रहता है । इसमें माया तथा इन्द्रजाल आदि शक्तियों का उपयोग बतलाया जाता है तथा मुख - रचना ( नेपथ्य ) में पलस्तर की बहुलता होती है । इसमें पुरुष - पात्र अधिक तथा स्त्री- पात्र कम रखे जाते हैं और इसमें सात्वती और आरभटी वृत्ति का ( अधिकांश ) प्रदर्शन रहता है ॥ ५८-५९ ॥
डिमः समवकारश्च व्यायोगेहामृगौ तथा ।
एतान्यविद्धसंज्ञानि विज्ञेयानि प्रयोक्तृभिः ॥ ६० ॥
रूपकों में डिम, समवकार, व्यायोग तथा ईहामृग को नाट्यकुशल महानुभाव आविद्ध नाट्यप्रकार मानते हैं ॥ ६० ॥
एष प्रयोगः कर्तव्यो देव दानवराक्षसैः ।
उद्धता ये च पुरुषाः शौर्यवीर्यबलान्विताः ॥ ६१ ॥
आविद्ध नाट्य प्रकार का प्रयोग देव, दानव, राक्षस तथा शौर्य, वीर्य एवं शक्ति सम्पन्न उद्धत प्रकृति के पुरुषों के द्वारा किया जाना चाहिए ॥ ६१ ॥
१. नाटकाश्रितः क ० । २. तत्राविद्धा - सत्वाविद्धाङ्ग –क ० । ३. ह्वात्मकः - क ० । ४. बहुलो — क ० । ५. संयुतः - क ० । ६. प्रयोगः पुरुषप्रायस्तथाल्पस्त्रीक एव च - क ० । ७. भटीयुक्तो ज्ञेय आविद्धसंक्षितः - क ० । ८. आविद्धसंज्ञा विज्ञेमाः प्रयोगस्य वशानुगाः - क ० । ९. एष - ग ० । १०. दैत्य - ख; ग ० । ११. उद्धताश्चैव क ० । १२. समन्विताः क ० । THER P १३ नाः शा ० द्वि ०
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१ ९ ४ नाट्यशास्त्रम्
सुकुमार नाट्य - प्रयोग-नाटकं सप्रकरणं भाणो वीथ्यङ्क एव च ।
सुकुमारप्रयोगाणि मानुषेष्वाश्रितानि तु ॥ ६२ ॥
नाटक, प्रकरण, वीथी तथा अंक को सुकुमार नाट्य प्रयोग माना जाता है तथा इसका अभिनय केवल मनुष्यों के द्वारा किया जाता है ॥ ६२ ॥
अथ बाह्यप्रयोगे तु प्रेक्षागृहविवर्जिते ।
विदिक्ष्वपि भवेद्रङ्गं कदाचिद्भर्तुराज्ञया ॥ ६३ ॥
यदि कोई नाट्य - प्रदर्शन खुली जगह पर किया जाए जहाँ स्थायी प्रेक्षागृह न हो तो स्वामी की आज्ञा से उस प्रेक्षागृह का किसी विदिशा ( ईशान्य आदि कोणों ) की ओर मुंह रखा जा सकता है ॥ ६३ ॥
पृष्ठे कृत्वा कुतपं नाट्यं युङ्क्ते यतो मुखं भरतः ।
सा पूर्वा मन्तव्या प्रयोग - कालेन नाट्यशैः ॥ ६४ ॥
अभिनेता वाद्यों की ओर पीठ रखते हुए कभी अभिनय नहीं करता है अतएव वाद्याभिमुख स्थित नट के मुख की ओर ही पूर्व दिशा मान ली जाए ॥ ६४ ॥
द्वाराणि षट्चैव भवन्ति चार्त्र रङ्गस्य दिग्भाण्डविनिश्चितानि ।
नाट्यप्रयोगेन खलु प्रवेशे प्राच्यां प्रतीच्याश्च दिशि प्रवेशः ॥ ६५ ॥
विधानमुत्क्रम्य यथात्र रहे विना प्रमाणाद्विदिशः प्रयोगे ।
द्वारन्तु यस्मात्समृदङ्गभाण्डं प्राचीं दिशं तां मनसार्ध्यवस्येत् ॥६६ ॥
चयोऽनुरूपः प्रथमं तु वेषो वेषानुरूपश्च गतिप्रचारः ।
गतिप्रचारानुगतञ्च पाठ्यं पाठ्यानुरूपोऽभिनयश्च कार्यः ॥६७ ॥
प्रेक्षागृह के दिशा तथा उनके भागों के विभागानुसार छः द्वार बतलाये ये हैं परन्तु नाट्य प्रदर्शन के समय पात्रों का प्रवेश केवल पूर्व या पश्चिम द्वार से ही होना चाहिये । बिना विधान के ( कदाचित् स्वामी आदि के आदेश से ) ईशान्य आदि विदिक् की ओर भी रङ्गमञ्च का द्वार रखा जा १. वीथ्यङ्कनाटिके - ख; ग ० । २. योज्यान्येतानि मानुषैः- -क ० । ३. भवेद्रङ्गः -- ख ०; ग ० । ४ कृत्वास्य - ख ० ग ० । ५. प्रयोगकाले तु - ख ०, ग ० । ६. चास्य - ख; ग ० । ७. कृतः कथञ्चिद्विदिशः प्रयोगः– क ०; लीना प्रमाणाद्विदिश: - ख ०; ग ० । ८. मनसा व्यवस्येत क ० । ९. प्रथमस्तु - ख ०, ग ० ।
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चतुर्दशोऽध्यायः १ ९ ५ सकता है । वैसे ही मृदङ्ग आदि वाद्यों का जिधर मुंह रखा जाये उस द्वार को भी पूर्व द्वार स्वीकार करना चाहिये । नाट्य प्रदर्शन में वय के अनुरूप ( स्वाभाविकता उत्पन्न करने के लिए ) वेश, वेष के अनुरूप गति आदि क्रियाएँ, गति प्रचार के अनुकूल संवाद ( पाठ्य ) तथा संवाद के अनुकूल ही अभिनय का संयोजन रहना चाहिये ॥ ६५-६७ ॥
लोक तथा नाट्य धर्मी-धर्मी या द्विविधा प्रोक्ता मया पूर्व द्विजोत्तमाः ।
लौकिकी नाट्यधर्मी च तयोर्वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ ६८ ॥
मैंने पहिले ( उद्देशकथन के अवसर पर ) जो लोक तथा नाट्य धर्मी बतलाये थे, अब उनका लक्षण बतलाता हूँ ॥ ६८ ॥
लोकधर्मी—
स्वभावभावगतं शुद्धंन्त्वविकृतं तथा ।
लोकवार्ताक्रियोपेतमङ्गलीला विवर्जितम् ॥ ६ ९ ॥।
स्वभावाभिनयोपेतं नानास्त्रीपुरुषाश्रयम् ।
यदशं भवेन्नाट्यं लोकधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७० ॥
यदि कोई रूपक लोक स्वभाव के अनुसार भाव प्रदर्शित करने वाला सादगी तथा बिना बाहरी दिखावट वाला हो, ( अविकृतं ) जो अपनी ( कथा वस्तु में ) सामान्य प्रजाजन के आचार तथा क्रियाएं प्रदर्शित करने वाला तथा आंगिक प्रदर्शन जो - लीला तथा वर्तना आदि के अभिनय - से रहित सादे एवं सहज भावप्रदर्शन करता हो, जिसमें विभिन्न पुरुष तथा स्त्री पात्र हों तो उसे ' लोकधर्मी ' नाट्य प्रकार समझना चाहिये ॥ ६ ९ -७० । |
नाट्यधर्मी-अतिवाकर्य क्रियोपेतमतिसत्वाति - भावकम् ।
लीलाङ्गद्दाराभिनयं नाटयलक्षणलक्षितम् ॥ ७१ ॥
१. तु क्र ० । २. स्वभावकर्मोपगतं - क ० । ३. शुद्धञ्च विकृतञ्च यत् - क ० । ४. नानाभाव रसान्वितम् -क ० । ५. भिनयस्थानम् — क ० । ६. अति त्वक्रियोपेतम् गीतवाद्यक्रियोपेतम् – क ० । ७. भाविकम् – क ०; भाषितम् — ख ०; ग ० । ८. नाट्यताललयान्वितम् — क ० ।
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१ ९ ६ नाट्यशास्त्रम् स्वरीलङ्कारसंयुक्तमस्वस्थपुरुषाश्रयम् यदीदृशं भवेन्नाट्यं नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७२ ॥
यदि किसी रूप में वाक्यावली, क्रियाएँ, प्राणी - वर्ग ( पुरुष या दिव्य जाति के पात्र ) तथा भाव असामान्य हों, जिसमें लीला ( मनोहर चेष्टाओं ) से युक्त अङ्गहारों तथा लक्षण सम्पन्न नृत्य का प्रदर्शन हो, स्वर तथा अलङ्कारों की ( काव्य - रचना तथा संगीत में ) सुव्यवस्थित योजना हो, जिसमें ( भूमिका धारण करने वाले ) अदिव्य पुरुषों के भाव तथा चरित्र कुशलतापूर्वक वहन किये जाएँ तो उसे नाट्यधर्मी प्रकार जानिये ॥७१-७२ ॥
लोके यदभियोज्यश्च पदमत्रोपयुज्यते ।
मूर्तिमत्साभिभाषश्च नाट्य धर्मी तु सा स्मृता ॥ ७३ ॥
जिसमें लोक प्रसिद्ध वस्तु का मूर्तरूप में वैसी ही कुशलता से संवाद सहित प्रयोग किया जाये तो उसे भी ' नाट्यधर्मी ' जानो ॥ ७३ ॥
आसन्नोक्तश्च यद्वाक्यं न शृण्वन्ति परस्परम् ।
अनुक्तं श्रूयते यश्च नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७४ ॥
( प्रदर्शन के समय ) जहाँ समीपतर वचन भी न सुने जाएँ और अनुक्त वचन का भी सुनते हुए प्रत्युत्तर दिया जाता हो उसे भी ' नाट्यधर्मी ' समझो ॥ ७४ ॥
शैल यानविमानानि चर्मवर्मायुधध्वजाः ।
मूर्तिमन्तः प्रयुज्यन्ते नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७५ ॥
जिसमें पर्वत, वाहन, विमान तथा ढाल, कवच, शस्त्र तथा ध्वज आदि का मूर्त रूप में प्रयोग किया गया हो तो उसे भी ' नाट्यधर्मो ' जानो । ७५ ॥
यँ एक भूमिकां कृत्वा कुर्वीतैकान्तरेऽपराम् ।
कौशल्यादेककत्वाद्वा नाट्यधर्मीति सा स्मृता ॥ ७६ ॥
१. अभिनवगुप्ताचार्य ने बतलाया है कि इसका उदाहरण है - माया - पुष्पक नामक नाटक में ब्रह्मशाप का मूर्तरूप में रङ्ग पर प्रवेश । १. सर्वालङ्कार - क ० । २. नाट्यस्थ - क ०; मस्वर्भू - ख ० ग ० । ३. लोकप्रसिद्धद्रव्यन्तु यदा नाट्ये प्रयुज्यते - क ०; ख ० । ४. वृत्तिमत् साभिभाषञ्च - ख ०; ग ० । ५. साभिलाषञ्च क ० । ६. कृतं हि तत् - क ० । ७. पद्यद्वयं खग पुस्तकयोर्नास्ति । ८. पुनरन्यां प्रयोजयेत् — क ० । ९. कोशलादेककृत्यत्वात् — क ० ।
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चतुर्दशोऽध्यायः १ ९ ७ जिसमें अभिनेता एक भूमिका का निर्वाह कर चुकने पर पुनः दूसरी भूमिका धारण कर ले तथा अपनी कुशलता से दोनों भूमिकाओं का एक समान सफलतापूर्वक निर्वाह करे तो उसे भी ' नाट्यधर्मी ' जानो ॥ ७६ ॥
याऽगम्या प्रमदा भूत्वा गम्या भूमिषु युज्यते ।
गम्या भूमिवगम्या वा नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७७ ॥
जो स्त्री अभिनेत्री पहिले अगम्य स्त्री ( पूज्य या वृद्धा ) की भूमिका धारण करने के उपरान्त गम्या स्त्री ( नायिका या प्रेयसी ) की भूमिका धारण करे या गग्या स्त्री की भूमिका के साथ अगम्या स्त्री की भूमिका भी धारण करे तो यह ( केवल नाट्य प्रयोजन या कार्य चलाने के कारण ) ' नाट्यम ' कहलाता है ॥ ७७ ॥
ललितैरङ्गविन्यासैस्तथोत्क्षिप्तपदक्रमैः ।
नृत्यते गम्यते चापि नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७८ ॥
( किसी नाटक में पात्रों की ) गति ललित अङ्गों की हलचल के साथ पैरों की डग भरते हुए प्रदर्शित की जाने पर सामान्य गति होने पर भी ( सुन्दरता के कारण ) नृत्य की गति के समान असामान्य लगे तो उसे भी ' नाट्यधर्मी ' समझना चाहिये ॥ ७८ ॥
योऽयं स्वभावो लोकस्य सुखदुःखक्रियात्मकः ।
सोऽङ्गाभिनयसंयुक्तो नाट्यधर्मी प्रकीर्तितः ॥ ७ ९ ॥
जब प्रतिदिन होने वाले स्वाभाविक सुख दुःखों की क्रियाओं का ( अभिनेताओं के द्वारा ) अङ्गादि अभिनयों से युक्त हूबहू प्रदर्शन किया जाता हो तो उसे भी ' नाट्यधर्मी ' समझना चाहिये ॥ ७ ९ ॥ यश्वेतिहास वेदार्थो ब्रह्मणा दिव्यमानुषरत्यर्थ नाट्य धर्मी तु १. योज्यते - क ० । २. यश्चाङ्गहारविन्यास -- क ० । ३. चैव क ० । ४. यश्च स्वभावो - क ० । ५. तु सा स्मृता क ० । ६. यत् सेतिहास – क ० । ७. काव्यसम्मतः, काव्यधर्मतः क ० । ८. देव -- क ० । ९. रत्यर्थी - क ० ।
समुदाहृतः ।
सः स्मृतः ॥
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१ ९ ८ नाट्यशास्त्रम् ( प्रक्षिप्त - ब्रह्मा के द्वारा अभिहित इतिहास तथा वेद के अर्थों का निदर्शक जो नाट्यवेद निर्मित किया गया है । जो देवता और मनुष्यों का मनोरञ्जक उपस्करण है उस नाट्यशास्त्र को भी ' नाट्यधर्मो ' समझना चाहिये । ) । यश्च कक्ष्याविभागोऽयं नानाविधिसंमाश्रितः रङ्गपीठगतः प्रोक्तो नाट्यधर्मी तु सः स्मृतः ॥ ८० ॥
अभी जो रङ्गमञ्च तथा उसकी कक्ष्याओं का विधिवत् विभाग बतलाया गया वह भी ‘ नाट्यधर्मी ' प्रकार का उदाहरण समझिये ॥ ८० ॥
नाट्यधर्मी प्रवृत्तं हि सदा नाट्यं प्रयोजयेत् ।
न ह्यङ्गाभिनयात् किञ्चिदते रागः प्रवर्तते ॥ ८१ ॥
सदा ‘ नाट्यधर्मी ' के द्वारा सम्पन्न होने वाले ' नाट्य प्रयोग ' का प्रदर्शन करना चाहिए । क्योंकि आंगिक अभिनय के प्रदर्शन से हीन नाट्य - प्रयोग दर्शकों को प्रसन्न नहीं कर सकता ॥ ८१ ॥
सर्वस्य सहजो भावः सर्वो ह्यभिनयोऽर्थतः ।
अङ्गालङ्कारचेष्टा तु नाधर्मी प्रकीर्तिता ॥ ८२ ॥
मनुष्यों में विद्यमान सभी सहज भाव जब आंगिक अभिनय, अलङ्कार तथा चेष्टाओं के साथ आवश्यकतानुसार ( अर्थतः ) प्रदर्शित किये जाते हैं तो वे सभी अन्ततोगत्वा नाट्यधर्मी ही कहलाते हैं ॥ ८२ ॥
एवं कक्ष्याविभागस्तु धर्मी युक्तय एव च ।
विज्ञेया नाट्यतत्त्वज्ञैः प्रयोक्तव्याश्च तत्वतः ॥। ८३ ॥
( मैंने ) इस प्रकार कक्ष्या विभाग, धर्मों तथा प्रवृत्तियों के विषय में जो बतलाया उसे नाट्य - प्रयोक्ता ठीक से समझे और फिर उसे प्रयत्न-पूर्वक ( यथातथ्य ) प्रदर्शित करे ॥ ८३ १. देशसमाश्रयः क ० । २. किञ्चिद्विना नाट्यं— क ० । ३. थंज: - क ० । ४. धर्मीति संज्ञिता क ० । ५. विभागास्तु - ग ० । ६. धर्मी- युक्तस्तथैव च - क; धर्मयुक्ताः ७. विज्ञेयो - क ० ।
८. प्रयोक्तव्यश्च - क ० ।
॥
प्रकीर्तिता. ग ० ।
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चतुर्दशोऽध्यायः १ ९९
उक्तो मयेहाभिनयो यथावच्छांखाकृतो यस्तु कृतोऽङ्गद्दारैः ।
पुनश्च वाक्याभिनयं यथावद् वक्ष्ये स्वरव्यञ्जनवर्णयुक्तम् ॥ ८४ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे कक्ष्यां प्रवृत्ति - धर्मी व्यञ्जको नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ इस प्रकार मैंने शाखा तथा अङ्ग से निर्मित होनेवाले अभिनय का विधिवत् वर्णन किया । ( अर्थात् समग्र आंगिकाभिनय बतलाया ) अब मैं स्वर तथा व्यंजन से निर्मित वाक्याभिनय ( वाचिकाभिनय ) को ( अगले अध्याय में ) बतला रहा हूँ ॥ ८४ ॥
भरत मुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र का कक्ष्या - प्रवृत्ति धर्मों आदि का निरूपक ‘ चतुर्दश अध्याय ' समाप्त १. भावः कृतो यश्च कृताङ्गहारः – ख ०; कृताङ्गहारै:: - ग ० । २. वक्ष्यामि वाक्याभिनयं स्वशक्त्या भूयः स्वरव्यञ्जन - क ० । ३. नाट्यधर्मी प्रवृत्तिव्यञ्जनो नाम - क ०; करयुक्तिधर्मीव्यञ्जको नाम त्रयो-दशोऽध्यायः - ख ०, प्रवृत्तिधमंध्यञ्जको नाम - ग ० ।